<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337</id><updated>2012-02-16T05:01:31.032-08:00</updated><category term='media'/><category term='Devanad'/><category term='sankat'/><category term='media aur rajniti'/><category term='bharat bhawan'/><category term='netaji'/><category term='javan'/><category term='jano apne adhikar'/><category term='samaj'/><category term='mera shahar'/><category term='nukatchini'/><category term='khuch khash'/><category term='problam'/><category term='janmdin'/><category term='सामयिक'/><category term='avisvash'/><category term='bat-bebat'/><category term='apni baat'/><category term='naya ank'/><category term='aaj-kal'/><category term='हम सब एक है'/><category term='प्रोफेसनल्स'/><category term='पच्चीस बरस बाद'/><category term='bimari'/><category term='aurat'/><category term='मीडिया मीमांशा'/><category term='prayas'/><title type='text'>REPORTER</title><subtitle type='html'>हिन्दी पत्रकारिता पर एकाग्र, शोध एवं अध्ययन का मंच</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>121</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-8136359601494759798</id><published>2012-02-12T21:30:00.000-08:00</published><updated>2012-02-12T21:30:19.052-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bharat bhawan'/><title type='text'>Aaj-Kal</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;रंगमंडल की उदासी से मुस्कराया राज्य नाट्य विद्यालय&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;तीस बरस पहले जब भोपाल में भारत भवन की स्थापना हुयी थी तो यह भारत भवन एक उम्मीद की बुनियाद थी। संस्कृति, कला और साहित्य के लिये। भारत भवन के बूते भोपाल ने पूरे विश्व में एक सांस्कृतिक नगर का गौरव पाया था। बाद के&amp;nbsp; वर्षाें में अपने अनेक उत्कृष्ट आयोजनों के साथ दुनिया के कला मंच पर भारत भवन की ख्याति बढ़ती गयी और उम्मीदें भी। आहिस्ता आहिस्ता समय गुजरता गया। इस गुजरते समय ने भारत भवन की पहचान को पुख्ता नहीं किया बल्कि ख्याति सीजने लगी। स्वार्थाें की यह सड़न और सीड़न ने भारत भवन को असमय असामयिक बना दिया। तीस बरस के इस सफर में उसकी खूबियां, उसकी कामयाबी और उसकी चमक विवादों में खो गयी। कल का कलागृह अब कलह गृह के रूप में पहचाना जाने लगा और बाद के वर्षाें में यही उसकी स्थायी पहचान बन गयी। इस तीस बरस की समीक्षा करेंगे तो पाएंगे कि जिस तरह संस्कृति और कला के साधकों ने इस पर अपनी धाक जमाने की कोशिश की तो राजनेताओं ने भी इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली तक अपनी आवाज की छाप छोड़ने के लिये जब भी जरूरत पड़ी, भारत भवन का इस्तेमाल किया गया। राजनीतिक गलियारों में भी भारत भवन को लेकर उत्पन्न हुआ रोमांच आहिस्ता आहिस्ता थम सा गया।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भारत भवन के बारे में चर्चा करें तो रंगमंडल एक बड़ा अध्याय होता है। लगभग पन्द्रह बरस पहले हमने भारत भवन के कलाकारों और उनसे जुड़े संस्कृति के लोगों से चर्चा में इस बात पर जोर दिया था कि रंगमंडल भारत भवन के परिसर से बाहर क्यों नहीं जाता है? तब छत्तीसगढ़ अलग नहीं हुआ था। इस बारे में तर्क कम और कुतर्क अधिक था। रंगमंडल की गतिविधियों का विकेन्द्रीकरण नहीं हो सका और जो जहां था, वहीं का रह गया। एन.एस.डी. की जो पहचान थी, उससे इतर भारत भवन के रंगमंडल के पहचान बनाने की कोई कोशिश नहीं हुई। कभी अपने प्रभावशाली प्रदर्शनों के लिये रंगमंडल की एक छाप थी, यह छाप भी धुंधलाता गया। रंगमंडल लगभग नेपथ्य में ही चला गया। आज भारत भवन के आंगन में लगातार नाटकों का प्रदर्शन हो रहा है किन्तु इसकी गुणवत्ता पर कोई चर्चा&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नहीं होती है। नाटकों को दर्शकों का अभाव लगातार बना हुआ है। शुक्र इस बात का करना चाहिए कि एक सिलसिला तो कायम है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कभी इस बात को गौर से न तो सोचा गया और न ही किया गया कि आखिर इस सांस्कृतिक विरासत का संवर्धन और संरक्षण कैसे किया जाए, इसका परिणाम यह हुआ कि भारत भवन को विस्तार देने के बजाय उसके बराबर में दूसरी संस्थाएं खड़ी की गई। विस्तार का यह चेहरा भी बुरा नहीं है लेकिन सुखकारक नहीं कहा जा सकता है। भारत भवन के बराबर में कोई और खड़ा हो तो गुरेज नहीं लेकिन एक विरासत को विस्तार देना ज्यादा सार्थक होता। इस स्थिति के लिये भारत भवन परिवार ही ज्यादा दोषी है। जिन लोगों ने भारत भवन में रहकर सीखा, समझा और कम से कम देश में अपना नाम किया, वे लोग भारत भवन से परे हो गये। अपनी एक नयी दुनिया गढ़ ली। अपने को आबाद कर गये और जहां से सीखा, नाम पाया, उसे अकेला छोड़ गये। भारत भवन एक बिÏल्डग है, बस्ती नहीं। बस्ती होती तो शोर होता। शोर उन लोगों के खिलाफ जिन लोगों ने एक पीढ़ी गढ़ने तक भी इंतजार नहीं किया। बाबा कारंत, स्वामीनाथन के देहांत के बाद भारत भवन की रौनक कम हुई है। यह प्रकृति का नियम है। एक दिन उन्हें हमसे बिछड़ना था तो प्रकृति ने यह नियम भी बनाया है कि परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये कुछ लोग शिक्षित होते हैं और वे उनकी परम्परा को आगे बढ़ाते हैं। भारत भवन इस मामले में दुर्भाग्यशाली रहा। बिलकुल उसी तरह जिस तरह देश के अनेक प्राचीन और ख्यातिनाम संस्कृति और शिक्षा के घर दुर्भाग्यशाली रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-hvQNWOHmnSM/TzifnoYhT9I/AAAAAAAAAFQ/tp4-qrOx_bI/s1600/ceramic3.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="300px" sda="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-hvQNWOHmnSM/TzifnoYhT9I/AAAAAAAAAFQ/tp4-qrOx_bI/s320/ceramic3.jpg" width="320px" /&gt;&lt;/a&gt;प्रकृति का एक और नियम है। यह नियम कहता है कि तू नहीं और सही, इसी की तर्ज पर राज्य नाट्य विद्यालय की स्थापना हो गयी। राज्य नाट्य विद्यालय की मुस्कराहट रंगमंडल की इस उदासी का ही परिणाम मानने में किसी को हिचक नहीं होना चाहिए। जो काम रंगमंडल अपने चमकते दिनों में कर सकता था, उसने नहीं किया और आज वही काम राज्य नाट्य विद्यालय कर रहा है। छत्तीसगढ़ अलग हो जाने के बाद मध्यप्रदेश के अंचलों में राज्य नाट्य विद्यालय के विद्यार्थी नये किस्म के प्रयोग कर रहे हैं। वे सीखने के बाद प्रदर्शन के लिये दिल्ली तक अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शन में पहुंच गये हैं। एक कल्पनाशील संस्कृति अधिकारी के बूते राज्य नाट्य विद्यालय की यह कामयाबी चमत्कारिक नहीं है बल्कि योजनाबद्ध तरीके से अपने उद्देश्य को अंजाम तक पहुंचाना है। इसे रंगमंडल की नाकामयाबी तो मान ही लेना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;भारत भवन के इस तीस बरस के सफर में पहले दस साल बहुत खुशनुमा रहे। संस्कृति, साहित्य और कला का संगम को देखना अभूतपूर्व था। बाद के दस वर्ष में यह अहसास थोड़ा कम हुआ और बचे दस वर्षाें में भारत भवन लगभग अनदेखा किया गया। आयोजनों की खनक अब वैसी ऊर्जा उत्पन्न नहीं करती जैसा कि खजुराहो का नृत्य उत्सव आज भी करता है। अब भारत भवन के वर्षगांठ की प्रतीक्षा वैसी नहीं रहती जैसा कि मध्यप्रदेश आदिवासी लोककला परिषद के लोकरंग के आयोजन को लेकर आज भी है। भारत भवन के आंगन में होने वाले राज्य के प्रतिष्ठापूर्ण सम्मान समारोह भी अब बेसमय होने लगे हैं। एक सच यह भी है कि दस बीस बरस पहले भोपाल आने वाले लोगों की उत्कंठा भारत भवन देख लेने की होती थी, वह भी आहिस्ता आहिस्ता मरने लगी है। अब उम्मीद कर सकते हैं कि भारत भवन में एक सुबह होगी जो अपने गौरव को लौटाने के संकल्प के साथ होगी। एक आस फिर जागेगी जो कला और संस्कृति के लिये आम आदमी में भारत भवन की तरफ लौटने को विवश करेगी। बस एक उम्मीद ही है भारत भवन का फिर से भारत भवन बन जाने की।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-8136359601494759798?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/8136359601494759798/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/02/aaj-kal.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8136359601494759798'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8136359601494759798'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/02/aaj-kal.html' title='Aaj-Kal'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-hvQNWOHmnSM/TzifnoYhT9I/AAAAAAAAAFQ/tp4-qrOx_bI/s72-c/ceramic3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-259695154710535832</id><published>2012-02-10T05:27:00.000-08:00</published><updated>2012-02-10T05:27:37.727-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='samaj'/><title type='text'>khari khari</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;&lt;strong&gt;कोलावरी डी अब गाना नहीं, लोरी है&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मां और बच्चे के बीच स्नेह का रिश्ता प्रगाढ़ करने वाले गीत को हम बचपन से लोरी के नाम पर सुनते आये हैं। रोता बच्चा, भूखा बच्चा, परदेस गये पिता की याद में बिसूरता बच्चा जब अपनी मां से मीठी लोरी सुनता है तो देखते ही देखते उसकी पलके झपकने लगती है और वह सो जाता है। इस मीठी लोरी गाने वाली मां को अपनी आवाज नहीं मांजनी होती है और ना ही उसे कोई रियाज करना होता है। स्नेह के साथ थपकी देती मां के बोल सो जा राजा, सो जा बिटिया रानी…और बस इसी के साथ बच्चे सपनों की दुनिया में डूबने उतरने लगते हैं अपनी मां की बाहें थामे। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लोरी एक पुरानी विधा है बच्चों को पालने की, उन्हें सीख देने की और इस विधा को फिल्मों में भी खूबसूरती से फिल्माया गया है। लल्ला लल्ला लोरी…दूध की कटोरी…या फिर मेरे घर आयी एक नन्हीं परी…आदि इत्यादि। अनेक ऐसे गीत लोरी बनकर भारतीय दर्शकों का न केवल मनोरंजन करते रहे हैं बल्कि घरों में काम आते रहे हैं। समय बदला, चीजें बदली, सोच बदली और बदल गयी दुनिया। मां भी आधुनिक हो गयी है। आज की मां ने खुद लोरी सुनकर निंदिया रानी की गोद में गयी होगी लेकिन अब वक्त की कमी है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह कह देना पूरी तरह से गलत होगा कि लोरी के दिन लद गये बल्कि यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि लोरी अब नये अवतार में है। कोलावरी डी के रूप में। अपने घर आंगन से लेकर ट्रेन के सफर में रोते बच्चे को मां कहती है बेटा चुप हो जा..तुझे कोलावरी डी सुनाती हूं। बच्चा धधकते और धकड़ते संगीत के शोर में लगभग चिल्लाते हुए, बोल भी अनजान और एक मध्यमवर्गीय परिवार के समझ से बाहर कोलावरी डी को सुन कर, शायद डर कर भी कहें तो गलत नहीं होगा…बच्चा आंखें मींच लेता है और आहिस्ता आहिस्ता नींद के आगोश में चला जाता है। इस लोरी को गाने की जरूरत भी नहीं है…मोबाइल चालू कर दीजिये, आइपॉड से भी सुना सकते हैं…&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लोरी कोलावरी डी से बच्चा सो जाता है लेकिन भीतर ही भीतर सहम जाता है। कोलावरी डी उसे साहस नहीं देता है, लल्ला लल्ला लोरी…उसे साहस देता था…चंदा और चिड़िया की बातें बच्चों की दुनिया गढ़ती थीं…कोलावरी डी को सुनकर बच्चों के चेहरे पर सोते समय की मीठी मुस्कान नहीं दिखती है…चंदा और चिड़िया के टूटे-फूटे गीतों को सुनकर बच्चे के चेहरे पर एक शांत चमक आ जाती है। मैं अंग्रेजी कम जानता हूं..इस बात का धन्यवाद कर सकता हूं…वह इसलिये कि मुझे कोलावरी डी का हिन्दी अनुवाद नहीं मालूम लेकिन जिन लोगों को कोलावरी डी का हिन्दी अनुवाद मालूम है, उनसे एक आग्रह है, निवेदन है कि वे उसका अर्थ जान लें….यह किसी भी अर्थ में लोरी हो नहीं सकती..होना भी नहीं चाहिए..बच्चों को चांद और चिड़िया, परी और पंख की लोरी ही सुनने दें…उनके मन में विश्वास पलने दें… &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-259695154710535832?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/259695154710535832/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/02/khari-khari_10.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/259695154710535832'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/259695154710535832'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/02/khari-khari_10.html' title='khari khari'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-8617230568651960845</id><published>2012-02-04T09:47:00.000-08:00</published><updated>2012-02-04T09:47:32.652-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>khari khari</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;खबर का मजा या मजे की खबर&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मनोज कमार&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अखबार में खबर पढ़ते हुए लोगों की अक्सर टिप्पणी होती है खबर में मजा नहीं आया, सवाल यह है कि पाठक को मजे की खबर चाहिए या खबर में मजा? हालांकि इन दोनों के बीच एक बारीक सी लकीर होती है। सच तो यह है कि खबर न तो मजे की होती है और न खबर में मजा होता है। खबर सिर्फ खबर होती है लेकिन दुर्भाग्य से पाठक खबर में मजा तलाशने की जद्दोजहद कर रहा है। खबर में मजा की बात करेंगे तो सहसा यह आरोप भी मीडिया के माथे मढ़ दिया जाएगा क उसने ही खबर में मजा देने की शुरूआत की। बात आधी सच है। खबर को तो खबर की शक्ल में पेश किया गया किन्तु खबर में मजा ढूंढ़ लेने वालों की कमी नहीं दिखी और आहिस्ता आहिस्ता इसने एक बीमारी की सूरत अख्तियार कर ली। मीडिया को भी यह मजेदार लगने लगा और अब हर खबर मजा देने वाली बनने लगी खबर की भाषा को भी मजेदार बनाने की कोशिश की गयी। दो-तीन दशक पहल व्यापार पेज की साप्ताहिक समीक्षा में तेल फिसला और सोना चमका, चांद लुढ़की और मिर्च का रंग सुर्ख हुआ, जैसे शीर्षक लगाये जाते थे लेकिन बीत समय में ऐसे शीर्षक गंभीर खबरों में भी लगाये जाने लगे हैं। खबर तो खबर शीर्षक में भी पाठक को मजा आना चाहिए। राजा का बजा बाजा, मन मोहने मे विफल, प्रणव मुखर्जी वित्त मंत्री से दादा और कभी रेलमंत्री रहीं ममता बेनर्जी रेलमंत्री से दीदी बन जाती हैं। शीर्षकों की गंभीरता खबर की तासीर बताती थी लेकिन अब तुकबंदी वाले शीर्षक हर खबर को मजेदार बना देते हैं। जब शीर्षक मजेदार हो तो खबर क्यों न हो। खबरों में मजा अथवा मजे की खबर तलाश करने की प्रवृत्ति समूची पत्रकारिता के लिये खतरनाक है। खबर मनोरंजन नहीं है बल्कि एक सूचना का विस्तार है जिसमें गंभीरता और शालीनत की उम्मीद की जाती है। शालीन और गंभीर खबरें ही पाठकों को वास्तविक स्थिति से अवगत कराते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पत्रकारिता मजे की चीज नहीं है और न ही मजे के लिये पत्रकारिता की जाती है। पाठकों को अनायास या कहें कि सायस जिसे हम साजिश भी कह सकते हैं, के साथ यह बात दिया गया है कि खबरें पैसे लेकर लिखी जाती हैं। इस बात से भी इंकार नहीं है कि यह दौर पेडन्यूज का है। किन्तु क्या कोई बताएगा कि सोलह पन्ने के अखबार अथवा तकरीबन साठ से अधिक पन्नों की पत्रिका में कितना हिस्सा पेडन्यूज का होता है? पेडन्यूज की चर्चा करते समय हम यह भूल जाते हैं कि पेडन्यूज का भी एक पर्व होता है जिससे हमारा साबका ज्यादतर चुनावी उत्सव के दौरान होता है। बाकि के दिन लगभग सूखे ही गुजरते हैं। मुझे नहीं मालूम है कि किसी नेता को जिताने अथवा एक पन्ने पर पांच नेताओं को एक ही क्षेत्र से जिताने की खबर के पैसे कैसे मिल जाते हैं किन्तु मेरा अनुभव है कि सड़क, शिक्षा, पानी, स्वास्थ्य की खबरों के लिये किसी से एक टका नहीं मिले। अखबार या पत्रिकाओं के पन्नों पर इन्हीं खबरों की बहुलता होती है तो फिर किस आधार पर हम कहें कि पत्रकारिता बिकाऊ हो चली है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पाठक खबरें इसलिये पढ़ता है कि उसे नवीन सूचनाओं के साथ विस्तार से जानकारी चाहिए। उसे समाचार विश्लेषण चाहिए। वह निष्पक्ष खबर चाहता है और जब वह कहता है कि खबर में मजा नहीं आया तो वह मिर्च-मसाले वाली खबर की उम्मीद नहीं करता बल्कि उसके मजे का अर्थ होता है एक अच्छी खबर। पाठक की इस अच्छी खबर की चाहत को हमने खबर में मजा को मान लिया है और उसी तरह की खबरें परोसने लगे हैं। न केवल खबरें परोसने लगे बल्कि उसके मन में पत्रकारिता को लेकर एक गलत धारणा भी बना दी ताकि वह एक अलग दुनिया में जिये। सही और पक्की खबर में भी उसे खोट नजर आये। खबरों को लेकर पाठकों को यह जताने का समय आ गया है कि उन्हें बतायें कि जिस खबर में उसे मजा नहीं आ रहा है, उस खबर को रचने में, गढ़ने में कितना वक्त लगता है, कितनी मेहनत लगती है। मेहनत की रोटी भले ही सूखी हो मन को तृप्त कर जाती है। तब मेहनतसे तैयार की गयी खबर भले ही मजे की न हो, पाठकों को संतोष दे जाएगी इसलिये जरूरी है कि हम पाठक को सिर्फ और सिर्फ खबर दें, मजा देने के लिये सिनेमा और टेलीविजन का पर्दा है ना।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-8617230568651960845?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/8617230568651960845/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/02/khari-khari.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8617230568651960845'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8617230568651960845'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/02/khari-khari.html' title='khari khari'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-2238736693968504987</id><published>2012-01-24T09:52:00.000-08:00</published><updated>2012-01-24T09:52:03.947-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='javan'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;u&gt;जीवन मंत्र-१&lt;/u&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;हदों से परे होता समाज&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मेरे एक बुर्जुग मार्गदर्शक मित्र हैं। वे भोपाल की तेजी से बढ़ रही एक कॉलोनी में रहते हैं। उन्होंने मुझसे शिकायत की कि उनके घर के आसपास एक प्रभावशाली व्यक्ति ने अपने घर का दायरा सड़क तक बढ़ा लिया है। उनका यह बढ़ा हुआ दायरा वैधानिक है या अवैधानिक, किसी को नहीं मालूम। बात आयी और गयी। मेरे मन के भीतर यह बात सालती रही। हालांकि इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है कि बढ़ा हुआ दायरा वैधानिक है या वैधानिक किन्तु इस बात से फर्क जरूर पड़ता है कि इस सीमा को लांघने से एक व्यवस्था छिन्न-भिन्न होती है। सीमा यानि अपनी हद लांघने से हमारे जीवन में विविध किस्म की समस्याओं का जन्म होता है। अपनी हद में नहीं रहने वाले लोग ही समाज के लिये समस्या हैं। हद लांघने की बात को जरा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे तो पूरी तस्वीर सामने आ जाएगी।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक पिता अपने बेटे से इसलिये परेशा है कि वह उनकी अवज्ञा कर रहा है अर्थात हद लांघ रहा है। एक शिक्षक की तकलीफ यही है कि विद्यार्थी उदंड होते जा रहे हैं और गुरूजनों की अवज्ञा कर रहे हैं। यहां भी मामला हद लांघने की है। एक सास अपनी बहू की अवज्ञा से परेशान है। एक अधिकारी अपने कर्मचारी से, एक मंत्री अपने मातहतों से और भी भिन्न भिन्न लोग इस अवज्ञा वाली स्थिति से परेशान हैं। लगभग पूरे समाज में अराजकता की स्थिति बन चली है। सवाल यह है कि यह हद लांघने का साहस कैसे हो रहा है? इस पर चिंतन करने की जरूरत है। मामला बहुत पेचीदा नहीं है लेकिन हम समझना ही नहीं चाहते हैं। अवज्ञा करने की कोई नहीं सोचता है और न ही करना चाहता है किन्तु भौतिक सुख-सुविधाओं ने इसे विस्तार दे दिया है। इसे थोड़ा और विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लगभग कई दिनों से मैं भौतिक सुख-सुविधाओं के बारे में चिंतन-मनन कर रहा हूं। सवाल अनेक हैं लेकिन जवाब कोई भी नहीं। एक बड़ी चमचमाती कार पूरे रफ्तार के साथ मेरे बगल से गुजर गयी। सड़कों पर लगभग हर रोज एक नयी कार दौड़ती नजर आएगी। इन कारों को देखकर सहसा मेरे मन में प्रश्न उठा कि कार के स्वामी का जीवन लक्ष्यविहिन होगा। लक्ष्य है भी तो अधिकाधिक सुख की प्राप्ति। यह सुख भी शाश्वत नहीं है, क्षणिक है। कार के स्वामी ने पहले तो अपना सारा श्रम और मस्तिष्क कार की रकम चुकाने में लगायी होगी। कदाचित बैंक लोन से भी खरीद लिया होगा तो अब उसे बैंक का किश्त जमा करने के लिये रोज अधिक मेहनत बल्कि अधिक चालबाजी करनी पड़ती होगी। यह भी सच है कि जिस व्यक्ति के पास ऐसी कार है, उसके आय के स्रोत से उसका परिवार वाकिफ होगा और वह यह भी जानता है कि इतनी महंगी कार उस आय के स्रोत से नहीं खरीदी जा सकती है। बात साफ है कि कार के सुख के पीछे मेहनत कम, मक्कारी ज्यादा है जिसे आज के समय में हम भ्रष्टाचार का नाम दे सकते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जब परिजन को यह पता है कि उनका घर भ्रष्टाचार से चल रहा है तो अवज्ञा की स्थिति सहज ही बन जाती है। पहले तो अनावश्यक डिमांड की जाती है। चिकचिक से बचने अथवा अपना प्रभाव दिखाने के लिये उन अनावश्यक जरूरतों को पूरा किया जाता है। यदाकदा की मांग बाद के समय में आदत में बदल जाती है और जब आदत बिगड़ जाए तो सिर्फ अवज्ञा की स्थिति बनती है। यह बात पूरे समाज में, हर वर्ग में और हर क्षेत्र में लागू होती है। हद के बाहर होने के कारण ही समाज में अनैतिकता, अनाचार और अव्यवस्था का जन्म हो रहा है। जिस दिन हम अपनी हदों में रहना सीख जाएंगे, उस दिन समस्यायें स्वयमेव समाप्त हो जाएगी। कल्पना कीजिये कि समुद्र अपना स्थान छोड़कर रहवासी इलाकों में चला आता है तो कैसी तबाही मचती है। समुद्र समाज में शुचिता बनी रहे, लोगों में भय न हो इसलिये वह अपनी हद में रहता है। हद से बाहर होते समाज में आप व्यवस्था, शुचिता, सौजन्यता या सम्मान की बात नहीं कर सकते हैं। हद से बाहर होने का एक अर्थ लालसा भी है और यह लालसा अवज्ञा का पर्याय है। अब आपको यह तय करना है कि हम सब हद में रहें, इसके लिये अपने लालच पर नियंत्रण पाने की कोशिश करना होगी। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-2238736693968504987?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/2238736693968504987/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/01/blog-post_24.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/2238736693968504987'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/2238736693968504987'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/01/blog-post_24.html' title=''/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-766599276279782156</id><published>2012-01-07T07:54:00.000-08:00</published><updated>2012-01-07T07:54:01.996-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>समागम</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="color: #cc0000; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;समागम  के ११ वर्ष&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-5b4vT6T8DDI/TwhprCfi4QI/AAAAAAAAAFI/jj_bXAYq9x4/s1600/SAMAGAM+Jan-12.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://2.bp.blogspot.com/-5b4vT6T8DDI/TwhprCfi4QI/AAAAAAAAAFI/jj_bXAYq9x4/s200/SAMAGAM+Jan-12.jpg" width="156" /&gt;&lt;/a&gt;भोपाल से प्रकाशित मीडिया एवं सिनेमा की द्विभाषी मासिक शोध पत्रिका समागम ने अपने  प्रकाशन के ११ वर्ष पूर्ण कर लिया है। एक छोटी सी कोशिश के साथ शुरू हुई इस  पत्रिका को मीडिया ने गंभीरता से लिया और हरसंभव मदद की। गंभीर पत्रकारिता में  समागम ने अपनी जगह बनाने में कामयाबी हासिल की है।&lt;br /&gt;फरवरी-२०१२ में समागम का नया  सफर नये साल के साथ आरंभ होगा। परम्परा ऐसे मौकों पर उत्सव मनाने की होती है  किन्तु समागम किसी मंचीय उत्सव के पक्ष में नहीं है। जितना धन इन समारोह में  होगा, उतने में पत्रिका के पन्नों में बढ़ोत्तरी कर कंटेंट को और सम्पन्न बनाया  जा सकेगा। इस इरादे के साथ समागम के बारहवें वर्ष का पहला अंक सिनेमा के सौ साल  पर केन्द्रित होगा।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;उल्लेखनीय है कि फरवरी का बासंती महीने में सिनेमा  अपनी उम्र के सौ बरस पूरे कर रही है और संयोग से समागम का भी एक नया पड़ाव शुरू  होगा। इस संयोग को यादगार बनाने की दृष्टि से समागम का नया अंक सिनेमा के सौ साल  पर होगा। करीब सौ पन्नों के इस अंक में सिनेमा का इतिहास, क्षेत्रीय  सिनेमा एवं सिनेमा से जुड़े शोधपत्रों का प्रकाशन किया जा रहा है। सम्पादक  मनोज कुमार ने इस अंक के लिये सिनेमा में रूचि रखने वालों से लिखने का  आग्रह किया है।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;अपने ग्यारह वर्षाें के सफर में समागम को मीडिया ने  गंभीरता से लिया है। देश की बहुप्रतिष्ठित समाचार पत्रिका &lt;span style="color: #741b47;"&gt;इंडिया टुडे&lt;/span&gt; ने १६  नवम्बर ११ के अंक में लिखा है - &lt;i style="color: red;"&gt;लगातार दस वर्षाें से मीडिया एवं सिनेमा पर  द्विभाषी मासिक पत्रिका का बिन रूके प्रकाशित करना और वह भी हर अंक में  विशेषज्ञों के पठनीय आलेखों के साथ प्रकाशित करना कोई हंसी-खेल नहीं है लेकिन  मनोज कुमार ने अपने सुलझे हुए सम्पादन में यह कर दिखाया है।&lt;/i&gt; कुछ इसी भाव  के साथ साहित्यकार महीपसिंह की पत्रिका &lt;i&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;संचेतना&lt;/span&gt;&lt;/i&gt; एवं मप्र शासन की  मासिक पत्रिका &lt;i&gt;&lt;b style="color: #20124d;"&gt;पंचायिका&lt;/b&gt;&lt;/i&gt; में भी समागम का उल्लेख किया गया है। भोपाल से  प्रकाशित&lt;i style="color: blue;"&gt; रंग-संवाद&lt;/i&gt; पत्रिका ने लिखा है कि समागम के जरिये मौजूदा दौर के  अनेक ज्वलंत मुद्दों पर मीडिया की दृष्टि और उससे जुड़े शोध को एक जरूरी  मंच प्रदान किया है।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;समागम का जनवरी अंक मीडिया और जनआंदोलन पर  केन्द्रित है। यह अंक विशेष रूप से महात्मा गांधी को समर्पित है। ३० जनवरी उनकी  पुण्यतिथि है और समागम मीडिया और जनआंदोलन के बहाने बापू को अपनी श्रद्वांजलि  समर्पित कर रहा है। समागम के इसके पूर्व अनेक विशेष अंकों का प्रकाशन किया है  जिसमें महात्मा गांधी की पत्रकारिता, आदिवासी पत्रकारिता, महिला,  पर्यावरण, दलित, लता मंगेश्कर, मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता आदि पर  है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-766599276279782156?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/766599276279782156/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/01/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/766599276279782156'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/766599276279782156'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='समागम'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-5b4vT6T8DDI/TwhprCfi4QI/AAAAAAAAAFI/jj_bXAYq9x4/s72-c/SAMAGAM+Jan-12.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-5435224849642693046</id><published>2012-01-06T04:32:00.000-08:00</published><updated>2012-01-06T04:32:32.480-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media aur rajniti'/><title type='text'>Rajniti</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;राजनीति का नाटक या नाटक की राजनीति&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हर राजनेता के मन में एक ऊंचे पद पाने की हसरत रहती है। प्रदेश का नेता है तो मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब बुनता है और देश का नेता है तो सहज स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर उसकी नजर होती है। ख्वाब बुनने में कोई बुराई नहीं है लेकिन जब जब राजनेताओं से यह सवाल किया जाता है अधिकांश नेता मुकर जाते हैं और वर्तमान मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री को ही अपना नेता बताते थकते नहीं हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज ही एक न्यूजचैनल पर छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल से प्रेस ने पूछ लिया कि क्या वे राज्य के भावी मुख्यमंत्री हैं, सवाल को दरकिनार कर गये और कांग्रेस पर भावी शब्द गढ़ने का आरोप लगा दिया लेकिन वे चेहरे की चमक को छिपा नहीं पाये। यह सच है कि भावी भविष्य के गर्त का सवाल है और अमर अग्रवाल को जरूर पता होगा कि आडवाणीजी भावी से वर्तमान नहीं बन पाये। कांग्रेस में भी कई भावी प्रधानमंत्री हुए लेकिन वे वर्तमान नहीं बन पाये। शायद इसलिये भी उन्हें यह भावी शब्द डराता होगा। पुराने अनुभवों से सीख लेना भी कोई कम बात नहीं होती है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;शब्दों से खेलना भले ही राजनेताओं का शगल न हो लेकिन वे खेलते जरूर हैं। सुबह सुबह पत्रकार दीपक चौरसिया ने उप्र चुनाव मैदान में डटे डीपी यादव से एक कसम की बात कर ली कि वे अब किसी पार्टी की तरफ मुंह नहीं करेंगे। दीपक के सवाल का जवाब तो नहीं दिया और उल्टे उनसे कसम लेने लगे कि वे आज जिस न्यूज चैनल में हैं, वे उसी में बने रहेंगे। राजनेताओं को बात समेटना भी आता है। इसी किस्से को विस्तार देने के बजाय डीपी यादव ने पांव पीछे खींचे और कह दिया कि समय सब कुछ तय करता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;शब्दों के इस जाल से राजनीति का नाटक शुरू होता है और नाटक में राजनीति होती है, यह बात कई बार साबित हो चुका है। लालू यादव की बतियाना मीडिया को भी उतना ही भाता है जितना कि आम आदमी को। अर्जुनसिंह मीडिया फ्रेंडली रहे हैं लेकिन हमेशा संयत, सर्तक और गंभीर। इन दिनों दिग्विजयसिंह अपनी बातों से लोगों को मोह रहे हैं। आखिर में कहना होगा, बातें हैं बातों का क्या कहना।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-5435224849642693046?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/5435224849642693046/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/01/rajniti.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/5435224849642693046'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/5435224849642693046'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/01/rajniti.html' title='Rajniti'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-8679344639770984528</id><published>2012-01-01T00:54:00.001-08:00</published><updated>2012-01-01T00:54:53.302-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bat-bebat'/><title type='text'>media</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;किसने कह दिया कि समाज का विष्वास नहीं रहा मीडिया पर!&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;-मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अरूण षौरी पत्रकार हैं या राजनेता, अब इसकी पहचान कर पाना बेहद कठिन सा होता जा रहा है। वे पत्रकार की जुबान बोल रहे हैं या राजनेता की, यह कह पाना भी संभव नहीं है। पिछले दिनों भोपाल में एक मीडिया सेमीनार में उन्होंने जो कुछ कहा, उसमें एक पत्रकार तो कहीं था ही, नहीं बल्कि एक राजनेता की भड़ास दिख रही थी। पता नहीं उन्हें क्या हो गया था, वे भी औरों की तरह मीडिया को कटघरे में खड़ा कर गये। वे अपनी रौ में कह गये कि मीडिया पर समाज विष्वास नहीं करता है। अरूण षौरी को कौन बताये कि जिस मीडिया पर आप सवाल उठा रहे हैं, वह मीडिया भी आपसे ही षुरू होता है। अरूण षौरी षायद यह भूल रहे हैं कि वे उसी समाज का हिस्सा हैं जहां उनकी बोफोर्स रिपोर्ट की गूंज दो दषक से ज्यादा समय से हो रही है। वे एक राजनेता के रूप में मीडिया की विष्वसनीयता पर सवाल उठा सकते हैं किन्तु एक पत्रकार के रूप् में उन्हें यह कहना षोभा नहीं देता है। मीडिया को अविष्वसनीय कहने का मतलब है स्वयं को अविष्वनीय बताना और हमारा मानना है कि अरूण षौरी अविष्वनीय नहीं हो सकते। पत्रकार अरूण षौरी कतई अविष्वसनीय नहीं हो सकते हैं, राजनेता अरूण षौरी के बारे में कुछ कहना अनुचित होगा।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अरूण षौरी जिस कद के पत्रकार हैं, उन्हें बहाव का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। उन्हें ऐसा कुछ नहीं बोलना चाहिए जिससे अपनों को ठेस लगे लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने ऐसा ही सब कहा। वे जिस केन्द्र के आयोजन में बोल रहे थे, जो इस समय अनेक कारणों से चर्चा में है। इस मंच से ऐसे ही अमृत वचन की अपेक्षा थी, सो वे उनके मानस को षांत कर गये। लगभग एक दषक से मीडिया घोर आलोचना के केन्द्र में है। कुछ अपने कर्मों से तो कुछ दूसरों के रहम पर। मीडिया पर, पत्रकारों पर सवाल उठाने के बजाय उन मीडिया घरानों पर क्यों पत्थर नहीं उछाले जाते जो लोग अपने कारोबार को बचाने के लिये मीडिया को कारोबार बना दिया है। जिन लोगों का पत्रकारिता का क,ख,ग नहीं आता, वे लोग मीडिया हाउस बनाते हैं तो अरूण षौरी उन लोगों का विरोध क्यों नहीं करते। पुरानों की बात छोड़ दें, नयी पीढ़ी को अरूण षौरी पत्रकारिता की षुचिता का पाठ क्यों नहीं पढ़ाते। अरूण षौरी अब महज एक पत्रकार नहीं हैं बल्कि अनुभव की एक पाठषाला हैं और पाठषाला ही जब सार्वजनिक मंच से अपनी ही आलोचना करेगा तो समाज का विष्वास उठना आवष्यक है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह कम दुर्भाग्य की बात नहीं है कि अकेला पत्रकारिता एक ऐसा प्रोफेषन है जहां उनके गुरू सार्वजनिक रूप से स्वयं की आलोचना करते हैं। इसे भी सकरात्मक नजर से देखना चाहिए लेकिन बात केवल आलोचना तक ही रह जाती है। सुधार की कोई कोषिष किसी भी स्तर पर नहीं हो रही है, यह इससे भी बड़ा दुर्भाग्यजनक बात कहीं जानी चाहिए। मीडिया एवं मीडिया षिक्षण में आ रहे लोगों के पास प्रषिक्षण की कमी है। जिस तरह मीडिया में काम करने वालों को इस बात की समझ पैदा नहीं की जा रही है कि उनकी समाज के प्रति किस गंभीर किस्म की जवाबदारी है, उसी तरह मीडिया षिक्षकों के पास भी प्रषिक्षण की कमी है। मीडिया षिक्षकों के लिये अरूण षौरी सरीखे पत्रकार षिक्षण के काम आ सकते हैं। सेमिनारों की संख्या में बढ़ोत्तरी करने के बजाय षिक्षण-प्रषिक्षण में समय और साध्य लगाना उचित होगा। अच्छा होता कि मंच से मीडिया की आलोचना करने के बजाय वे इसकी सुधार की बात करते। स्वयं कोई पहल करने का संदेष दे जाते। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम उम्मीद और केवल उम्मीद कर सकते हैं कि अरूण षौरी एवं उनके समकालीन पत्रकार पत्रकारिता की नवीन पीढ़ी को यह पाठ बार बार नहीं पढ़ाएगी कि मीडिया पर समाज का विष्वास उठ गया है बल्कि वह यह बताने की कोषिष करेगी कि समय के साथ मीडिया का विस्तार हुआ है और यह विस्तार दिषाहीन है। विस्तार को दिषा देने की जरूरत है। मंच पर खड़े होकर विलाप करने से मीडिया का भला नहीं होने वाला है और न ही समाज का। मेरा अपना मानना तो है कि समाज का विष्वास मीडिया पर और बढ़ा है और कदाचित इसी विष्वास के कारण मीडिया की छोटी सी छोटी भूल को भी समाज चिन्हित करता है ताकि मीडिया सजग और सबल बने। इस बात को सभी को समझना होगा। स्वयं अरूण षौरी जी को भी। और उन लोगों को भी जिन्हें मंच और माईक मिलते ही मीडिया की आलोचना करने पर टूट पड़ते हैं। मैं उन सब लोगों से आग्रह करूंगा कि वे लोगों के बीच जाएं और बतायें कि एक सिंगल कॉलम की खबर लिखने में एक पत्रकार को कितनी मेहनत करनी होती है। एक पत्रकार सुविधाभोगी नहीं है और नहीं हो सकता है यदि वह ताउम्र मीडिया में है तो। इस बहाने राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोषी को याद कर लीजिये। और पहले जाएं तो पराड़करजी का भी स्मरण करना उचित होगा। मायाराम सुरजन भी इसी कड़ी में एक नाम हैं। नीरा राडिया प्रकरण में उछलने वाले नाम पर आरोप तो दागे गये लेकिन वे आज किसी न किसी माध्यम में बैठे हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि समाज ने उन्हें अस्वीकार नहीं किया है। ऐसे में समाज का मीडिया पर से विष्वास उठ जाने की बात निराधार है। अरूण षौरीजी एक राजनेता के रूप् में मीडिया अविष्वसीनयता की बात करते हैं तो ठीक है लेकिन पत्रकार अरूण षौरी ऐसा कहते हैं तो उन्हें एक बार फिर सोचना होगा कि सच क्या है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-8679344639770984528?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/8679344639770984528/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/01/media.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8679344639770984528'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8679344639770984528'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2012/01/media.html' title='media'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' 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Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-9126709291001891541</id><published>2011-12-04T01:17:00.001-08:00</published><updated>2011-12-04T01:17:53.703-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Devanad'/><title type='text'>Cinema</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;!--[if gte mso 9]&gt;&lt;xml&gt;  &lt;w:WordDocument&gt;   &lt;w:View&gt;Normal&lt;/w:View&gt;   &lt;w:Zoom&gt;0&lt;/w:Zoom&gt;   &lt;w:PunctuationKerning/&gt;   &lt;w:ValidateAgainstSchemas/&gt;   &lt;w:SaveIfXMLInvalid&gt;false&lt;/w:SaveIfXMLInvalid&gt;   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Fks ysfdu mu yk[kksa yksxksa ds fy;s os ,d vkn’kZ Fks tks nso vkuan ls thuk lh[krs FksA nsokuan us thou esa dHkh gkj ugha ekuhA gj iy dks os thuk tkurs Fks vkSj gj gkj] gj vlQyrk mUgsa lQyrk ds fy;s izsfjr djrh FkhA os thrus dk ekík j[krs Fks ysfdu fu;fr ls os vkf[kjdkj gkj gh x;sA mudh ;g ijk;t vuk;l ugha cfYd lk;l gSA ,d ckj tc nso vkuan ls fdlh i=dkj us iwNk fd vc vki vyksdfiz; gks x;s gSa vkSj vkidh fQYeksa dks ns[kus ds fy;s lkS&amp;amp;ikap lkS yksx igqaprs gSa rks mudk tokc Fkk fd fQj eSa dSls vyksdfiz; gqvk\ ikap lkS yksx rks vkt Hkh eq&amp;gt;s pkgrs gSa ukA ,sls gkftj tokc jktw xkbM gels nwj gks x;k gSA vkikrdky dk fojks/k gks ;k ;qok ih&amp;lt;+h dks jkg fn[kkus ds fy;s fQj Hkyk jktw xkbM dgka ls vk,xkA &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;DevLys 010&amp;quot;; font-size: 16pt;"&gt;88 cjl ds bl ukStoku fQYe vfHkusrk dh dgkuh Hkh fnypLi gSA lky 1923 ds 26 flrEcj dks mudk tUe ikfdLrku esa gqvk FkkA firk is’ks ls odhy Fks fdUrq mUgsa ek;kuxjh [khap yk;hA os pkgrs rks vius firk dh rjg odhy cu ldrs Fks ysfdu ,slk mUgksaus ugha fd;k cfYd muds jkLrs ij muds nks HkkbZ vkSj ,d cfgu Hkh py iM+haA nso vkuan ds vkjafHkd fnu LVªxyj ds Fks! gkykafd mudk la?k"kZ nwljksa dh rjg yEck ugha pyk vkSj cgqr tYn feYVªh laslj vkfQl dh ,d lkS lkB #i;s dh ukSdjh dks vyfonk dgus dk ekSdk ge ,d gSa fQYe ds cgkus fey x;kA izHkkr VkWdht dh bl fQYe us nsokuan dks lQyrk ds jkLrs ij ys pyhA igys xq:nÙk ls vkSj ckn esa v’kksd dqekj ls mudh eqykdkr gqbZA ckEcs VkWdht izksMD’ku dh fQYe ftíh us nsokuan dks LFkkfir dykdkjksa dh iafDr esa yk [kM+k fd;kA fQYeh nqfu;k esa os LFkkfir gksus vk, Fks vkSj mudk y{; lkQ FkkA 1948 ds ftíh vfHkusrk us ,d lky ckn gh viuh fQYe daiuh dh cqfu;kn j[k nh vkSj uke j[kk uodsruA 1951 esa ftíh nsokuan&lt;span&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;us xq:nRr ds funsZ’ku esa ckth fQYe dk fuekZ.k fd;k vkSj os ml le; dh lQy fQYeksa esa ls ,d FkhA &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;DevLys 010&amp;quot;; font-size: 16pt;"&gt;nsokuan dh jkgh vkSj vkaf/k;ka ds ckn vkbZ VsDlh MªkbZoj] tks fgV lkfcr gqbZA bl fQYe dh lQyrk us nsokuan dh ftanxh dks ,d u;k eksM+ fn;k vkSj bl fQYe esa muds lkFk vfHku; dj jgha dYiuk dkfrZd mudh thou lafxuh cu x;hA 1956 esa bUgsa ,d iq= gqvk] ftldk uke lquhy vkuan j[kk x;kA dYiuk mudh thou lkFkh rks cuha fdUrq lqjS;k dh deh mUgsa ges’kk [kyrh jghA nsokuan vkSj lqjS;k dh eksgCcr ds fdLls vke Fks fdUrq /keZ ds vkM+s vk tkus ls os nksuksa vyx gh jgsA lqjS;k ls eksgCcr dh ckr dcwy djus okys nsokuan dk ekuuk Fkk fd lqjS;k muds thou esa vkrh rks mudh ftanxh dqN vkSj gh eksM+ ysrhA lqjS;k ls eksgCcr ds ckn Hkh nsokuan ds oSokfgd ftanxh esa dksbZ rwQku ugha [kM+k gqvkA &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;DevLys 010&amp;quot;; font-size: 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xk;dksa ds lkFk dke fd;k mues ls dqN bl çdkj gSa] 'kadj&amp;amp;t;fd'ku] vks ih uS;j] dY;k.k th&amp;amp; vkuan th] lfpu nso ceZu] jkgqy nso ceZu] ys[kd: gljr t;iqjh] et:g lqYrkuiqjh] uhjt] 'kSysUæ] vkuan c['kh] xk;d eksgEen jQh] egsaæ diwj] fd'kksj dqekj] eqds'k vkfn FksA fQYe dkykikuh ds fy;s mUgsa 1959 esa loZJs"B vfHkusrk dk fQYe Qs;j iqjLdkj feyk FkkA&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;DevLys 010&amp;quot;; font-size: 16pt;"&gt;gky gh esa e/;izns’k ’kklu us vf[ky Hkkjrh; fd’kksj dqekj lEeku ds fy;s mUgsa e/;izns’k ds [kaMok esa vkeaf=r fd;k Fkk fdUrq LokLF;xr dkj.kksa ls mudk vkuk laHko ugha gks ik;kA Hkkjrh; ijEijk ds vuq:i e/;izns’k ljdkj Lo;a nso vkuan ds ?kj igqap dj mUgsa lEekfur dj Lo;a dks xkSjokafor fd;kA &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;DevLys 010&amp;quot;; font-size: 16pt;"&gt;bl HkkofoHkksj dj nsus okys izlax ds lk{kh Fks fe= lquhyA lquhy feJ bl vk;kstu ds esa crkSj laLd`fr foHkkx ds vf/kdkjh ekStwn FksA lquhy crkrs Fks fd fdruk mueas viukiu Fkk] fdruh muesa ÅtkZ Fkh] ;g lkeus ns[kdj gh irk pyrk FkkA &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;DevLys 010&amp;quot;; font-size: 16pt;"&gt;nso vkuan dks lu 2001 esa Hkkjr ljdkj us dyk {ks= esa in~e Hkw"k.k ls lEekfur fd;k FkkA flrEcj 2007 esa nso vkuan vkRedFkk jksekaflax fon ykbQ muds tUe fnol ds volj ij çnf'kZr dh x;hA &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;DevLys 010&amp;quot;; font-size: 16pt;"&gt;vkt vpkud muds pys tkus ls gelc LrC/k gSaA nso vkuan dk pys tkus dk vFkZ ,d fQYedkj dk gh pys tkuk ugha gS cfYd ,d lnh ds pys tkus dh ckr gSA flusek rks pyrk jgsxk ysfdu nso vkuan dh txg dksbZ ys ik,xk] ;g rks dHkh eqedhu gksxk gh ughaA&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;DevLys 010&amp;quot;; font-size: 16pt;"&gt;uk;d ds :Ik esa os yEcs le; rd jtriV esa lfØ; jgs vkSj vkus okyh ’krkfCn rd mudh ;knsa cuh jgsaxhA nso vkuan dh fQYeksa dh lwph cgqr yEch gSA fuekZrk] funsZ’kd vkSj ys[kd ds :I esa Hkh mudh mifLFkfr jgh gSA &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;DevLys 010&amp;quot;; font-size: 16pt;"&gt;crkSj ys[kd@fuekZrk nsovkuan dh fQYeksa esa 1993 esa cuh I;kj dk rjkuk] 1978 dh nsl ijnsl rFkk fuekZrk ds :Ik esa 1998 dh eSa lksyg cjl dh dk mYys[k fd;k tk ldrk gSA crkSj funsZ’kd mudh fQYeksa esa çse iqtkjh] gjs jkek gjs d`".kk] ghjk iUuk] b’d b’d b’d] nsl ijnsl] ywVekj]&lt;span&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;vkuan vkSj vkuan] ge ukStoku] lPps dk cksyckyk] vOoy uEcj] lkS djksM+] I;kj dk rjkuk] xSaxLVj] eSa lksyg cjl dh] lsalj] yo ,V VkbEl LDoSj] feLVj izkbe fefuLVj gSaA mudh izeq[k fQYeksa esa feLVj çkbe fefuLVj veu ds Qfj'rs] yo ,V VkbEl LDoSj] lsalj] fjVuZ v‚Q ToSyFkhQ] xSaxLVj lkS djksM+] vOoy uEcj] lPps dk cksyckyk] y'dj] ge ukStoku] vkuUn vkSj vkuUn] Lokeh nknk] eu ilUn] ywVekj] nsl ijnsl] lkgsc cgknqj] MkfyaZx MkfyaZx] dykckt] tkuseu] cqysV] okjaV] vehj xjhc] b'd b'd b'd] çse 'kL=] 'kjhQ cnek'k] Nqik #Lre] tks'khyk] cukjlh ckcw] ghjk iUuk] ;g xqfyLrk¡ gekjk] xSEcyj] rsjs esjs lius] gjs jkek gjs —".kk] t‚uh esjk uke] çse iqtkjh] n bZfoy fon bu] egy] nqfu;k] dgha vkSj py] ToSyFkhQ] I;kj eksgCcr] xkbM] rhu nsfo;k] rsjs ?kj ds lkeus] fdukjs fdukjs] vlyh udyh] ckr ,d jkr dh] tc I;kj fdlh ls gksrk gS] ge nksuksa] ek;k] :i dh jkuh pksjksa dk jktk] tkyh uksV] cEcbZ dk ckcw] ,d ds ckn ,d dkyk cktkj] eafty] ljgn] yo eSfjt] dkyk ikuh] vej] lksyok¡ lky] ckfj'k] nq'eu] ukS nks X;kjg] isbax xsLV] lh vkbZ Mh] QaVw'k] i‚dsVekj] equhe th] Qjkj] gkml uEcj 44] bUlkfu;r] feyki] VSDlh Mªkboj] cknck¡] d'rh] ifrrk] jkgh] vk¡f/k;ka] tky] rek'kk] tytyk] vkjke] ckth] nks flrkjs] uknku] lue] ltk] LVst] fujkyk] vQlj ] fcjgk dh jkr] fny#ck] fgUnqLrku gekjk] [ksy] e/kqckyk] fuyh] 'kkbj] 'kk;j] m/kkj] ge Hkh balku gSa] fo|k] vkxs c&amp;lt;+ks] ,oa ge ,d gSaA &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-9126709291001891541?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/9126709291001891541/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/12/cinema.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/9126709291001891541'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/9126709291001891541'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/12/cinema.html' title='Cinema'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-2351324495104635199</id><published>2011-11-25T05:38:00.000-08:00</published><updated>2011-11-25T05:38:34.438-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='nukatchini'/><title type='text'>Aaj-Kal</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;यह थप्पड़ लोकतंत्र पर है, पवार पर नहीं&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मनोज कुमार&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान एक नौजवान ने देश के कृषिमंत्री को थप्पड़ जड़ दिया। कृषिमंत्री को लगा यह थप्पड़ दरअसल किसी मंत्री का मामला नहीं है बल्कि समूचे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर थप्पड़ पड़ने का मामला है। देश में फैल रहे अराजकता की यह गूंज है और इस गूंज के लिये कहीं न कही अण्णा हजारे जवाबदार हैं। अण्णा हजारे ने जब भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगु फूंका तो एकबारगी पूरा देश उनके साथ हो लिया था। इस बात से कोई असहमत नहीं हो सकता कि समूचा देश भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुका है किन्तु चार दिन पहले अण्णा ने जब हिटलरी अंदाज में शराब पीने वालों को पेड़ से बांधकर पीटने की बात कही तो लोगों को इस तथाकथित गांधी से हिटलर की बदबू आने लगी। उनकी बातों ने देश में अराजकता का माहौल बना दिया है। और ताजा मामला इसी की बानगी है। उनके ताजा बयान को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि बस एक ही थप्पड़, उनकी सोच को सार्वजनिक करता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;याद रखा जाना चाहिए कि जो लोग अण्णा के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हैं उनमें अधिकांश युवा वर्ग हैं और किसी भी सार्वजनिक मंच पर खड़े व्यक्ति की यह जवाबदारी हो जाती है कि इस युवाशक्ति को सकरात्मक दिशा में ले जाएं। यह उस व्यक्ति की जवाबदारी है कि वह युवाशक्ति को कैसे संयमित रखे लेकिन अण्णा अपनी जवाबदारी से चूक गए हैं। यह ठीक है कि रालेगांव में अण्णा शराब का सेवन करने वालों को पेड़ से बांध कर पीटते हों या टेलीविजन के पर्दे पर केवल धार्मिक फिल्मों का प्रसारण होता हो किन्तु यह जरूरी नहीं है कि पूरे देश में यह व्यवस्था लागू हो। अण्णा एक साथ पूरे तंत्र को, पूरी व्यवस्था को बदलने की कोशिश में लग गये और वे यहीं से चूक गए। वे आहिस्ता आहिस्ता चलते तो शायद जिन लोगों ने अण्णा में गांधी का अक्स देखा था, उनके वे आदर्श बन गये होते लेकिन अब अण्णा एक आदर्शवादी गांधी बन पाएंगे, इस बात पर लम्बी बहस की शुरूआत हो चुकी है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अण्णा की बातों ने देश की युवाशक्ति को दिग्भ्रमित कर दिया है और जिन समस्याओं का समाधान युवा स्वयं की कोशिशों से कर सकते थे, अब वे हिंसक हो गए हैं। देश के कृषिमंत्री को थप्पड़ मारने वाले युवक को कानून के तहत सजा हो सकती है किन्तु यह अराजक ध्वनि पूरे देश में, गांव गांव में गूंज रही है और जिसका परिणाम पल प्रति पल हर जगह होने से इंकार करना मुश्किल है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कानून के लिये यह अराजकता एक और बड़ी समस्या के रूप में सामने आएगा। जिस भ्रष्टाचार को लेकर देश उबल रहा है, अब उसके सामने एक नये किस्म की चुनौती आ खड़ी हुई है। जो युवा देश के कृषिमंत्री को थप्पड़ मारने की हिमाकत कर सकता है, वह कल अपने बुर्जुगों के साथ गुस्से में क्या नहीं करेगा, इसकी कल्पना करना भी बेमानी है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दुनिया में हम लोकतंत्र के सबसे बड़े माने जाते हैं। वि·ा के कई देश हमारी नीतियों को सराह रहा है और उस पर चलने की बात कर रहा है। वै·िाकरण के इस दौर में मूल्य बदल रहे हैं। महंगाई को लेकर हमारा जो गुस्सा है वह पूरी तरह सकारण नहीं है। हमारे नेताओं ने, तंत्र इस बात को समझाने में विफल रहा कि महंगाई के कारण क्या हैं। दरअसल वोट की राजनीति में हम सस्ती लोकप्रियता के दौर में विकास को दरकिनार करते आये हैं और जो महंगाई हमें दो दशक पहले झेल लेना चाहिए थी, आज हम झेलने के लिये मजबूर हैं। सब्सिडी ने हमारी आदतें खराब कर दी हैं। हमें हर चीज सस्ते में चाहिए, रियायतें चाहिए और जब अधिकारों की बात आती है तो हम हड़ताल पर उतर आते हैं। दो दशकों में महंगाई बढ़ी है, इस बात से इंकार नहीं लेकिन इसकी तुलना में वेतन में जो बढ़ोत्तरी हुई है, मजदूरी में जो बढ़ोत्तरी हुई है, क्या इस पर ध्यान नहीं देंगे। अभी हाल ही में लागू छठें वेतनमान ने राहत का पिटारा खोल दिया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कुछ लोग ऊपर कही गयी मेरी बातों से असहमत हो सकते हैं लेकिन क्या कभी उन्होंने इस बात की जांच की कि उनके घर में राशन पर कितना खर्च होता है और मोबाइल पर बात करने में कितना? शायद नहीं। लगभग पचास लोगों से बात करने पर पता चला कि उनके परिवार में पांच लोग हैं और उनके घर पर राशन प्रतिमाह अढ़ाई से तीन हजार रुपये का आता है और मोबाइल का बिल तो उसकी कीमत है लगभग आठ से दस हजार रुपये। एक परिवार में प्रति व्यक्ति औसतन दो मोबाइल सेट हैं और एक का बिल लगभग ८ सौ से एक हजार रुपये आता है। क्या आपने कभी मोबाइल शुल्क में रियायत की मांग की तो उनके पास कुतर्क था कि कंपनिया स्वयं होकर रियायत दे देती हैं। अब इन महानुभावों को कौन समझाए कि जब देश में लगातार हर चीजों की कीमतों में वृद्धि हो रही है तब मोबाइल की दरें क्यों कम हो रही हैं?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब मेरा सवाल अण्णा और उनकी टीम से है कि क्या उन्होंने इस बात पर कभी कोई जनजागरण का प्रयास किया? अण्णा एक सवाल मेरा यह भी है कि वे अपनी टीम के सदस्यों से इस बात का शपथ पत्र लें कि उनकी टीम के साथियों ने कभी शराब नहीं पी और यदि पी है तो वे कभी नहीं पियेंगे और इसके बाद भी पी तो अण्णा उन्हें सरेराह पेड़ से बांधकर कोड़े लगाएंगे। यह बातें सहज नहीं है और आसान भी नहीं। गांधीजी ने कभी कलफ किया हुआ चमकता हुआ कुर्ता और धोती नहीं पहनी, उन्होंने अपने हर उस ऐब को समाज के सामने खुलकर बयान किया और बताया कि उन्होंने उससे क्या सीखा। दरअसल गांधी के रास्ते पर चल कर सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाना है तो पहले युवाशक्ति को संयमी बनायें, उन्हें अहिंसक बनायें।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-2351324495104635199?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/2351324495104635199/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/11/aaj-kal.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/2351324495104635199'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/2351324495104635199'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/11/aaj-kal.html' title='Aaj-Kal'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-1014727882317197910</id><published>2011-11-10T01:07:00.001-08:00</published><updated>2011-11-10T01:07:38.509-08:00</updated><title type='text'>samikha</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-yodHY-pQnCw/TruUMYdn5KI/AAAAAAAAAEo/X21bJ8TOYfs/s1600/SAMAGAM.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320px" ida="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-yodHY-pQnCw/TruUMYdn5KI/AAAAAAAAAEo/X21bJ8TOYfs/s320/SAMAGAM.jpg" width="306px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-1014727882317197910?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/1014727882317197910/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/11/samikha.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-6192378742557308574</id><published>2011-10-24T23:26:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T23:26:13.627-07:00</updated><title type='text'>Sarokar</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;नशे के खिलाफ आम आदमी के साथ सरकार&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अनामिका&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;छत्तीसगढ़ में नशे के खिलाफ स्त्रियों ने हमेशा से आगे आकर मोर्चा खोला है। नब्बे के दशक में शराब के खिलाफ जो अभियान छेड़ा गया था, उसकी गूंज आज भी सुनायी दे रही है। छत्तीसगढ़ संभवत: देश का पहला राज्य है जहां शराबबंदी के लिये किये गये आंदोलन पर किसी वि·ाविद्यालय में पीएचडी की गई हो। वैसे भी नशा किसी भी किस्म का हो, वह स्वास्थ्य के साथ समाज के विकास में बाधक होता है। नशा एक सामाजिक बुराई है। नशे के खिलाफ हम महापुरूषों की जयंती अथवा पुण्यतिथि पर बात कर लेते हैं और इसके बाद भूल जाते हैं। नशे के खिलाफ एक सुनियोजित लड़ाई लड़ना वर्तमान समय की जरूरत है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में तो इसकी जरूरत कहीं अधिक है। एक दशक पहले बने इस राज्य में विकास की अपार संभावनाएं हैं किन्तु नशे में गुम युवा शक्ति इन संभावनाओं को धूमिल कर सकती है। नशे में युवा स्वयं को गुमराह तो करते ही हैं, उनका उपयोग समाज के विकास में हो सकता है, वह भी रूक जाता है। राज्य सरकार ने इस बात को शिद्दत से महसूस किया और समय रहते इलाज करने की भी ठानी। छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने नशे के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है। राज्य सरकार की इस पहल को एक जवाबदेह लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी की दृष्टि से देखना उचित होगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य है और यहां शराब का सेवन परम्परागत रूप से किया जाता है। समय के साथ आदिवासियों में जागरूकता आयी है और लगभग दो दशक से राज्य के अलग अलग हिस्सों में शराब के खिलाफ महिलाओं ने मोर्चा खोला है। जिन इलाकों में शराबबंदी की मांग की गयी वे धुर आदिवासी बसाहट वाले क्षेत्र रहे हैं। अनेक स्थानों पर तो एक दशक से पूरी तरह शराबबंदी लागू है। आदिवासी महिलाओं के साहस और आत्मवि·ाास ने छत्तीसगढ़ में शराबबंदी के लिये नजीर पेश किया है। रायपुर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर बसे गांव भानसोज में तो लगातार ३०४ दिनों के आंदोलन के बाद सरकार को शराब की दुकान का लायसेंस निरस्त करना पड़ा। संभवत: देश का यह पहला गांव होगा जहां शराबबंदी आंदोलन पर पंडित रविशंकर शुक्ल वि·ाविद्यालय रायपुर के विद्यार्थियों ने पीएचडी की है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;छत्तीसगढ़ में नब्बे के दशक में आरंभ हुआ शराबबंदी आंदोलन को सरकार का समर्थन आज दो हजार ग्यारह में मिल रहा है। यही नहीं, सरकार स्वयं आगे बढ़कर शराब दुकानों को लायसेंस देने से मना कर रही है। सरकारी सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी में बताया गया है कि राज्य के दो हजार की आबादी वाले गांव में देसी-विदेशी शराब दुकानों के लिये लायसेंस नहीं दिये जा रहे हैं। अब तक ढाई सौ से ऊपर शराब दुकानों का लायसेंस निरस्त किया जा चुका है। राज्य सरकार ने हालांकि यह कदम प्रयोग के तौर पर उठाया है और यह सफल रहा तो आगे भी इसे विस्तार दिया जाएगा। राज्य सरकार ने अपने फैसले के बरक्स आबकारी नीति में भी परिवर्तन कर दिया है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;छत्तीसगढ़ राज्य सरकार का फैसला अन्य राज्यों के लिये मिसाल बन सकता है। अब तक धारणा बनी रही है कि आबकारी से सरकार को बेहतर राजस्व की प्राप्ति होती है और वह किसी भी दशा में आय के इस भारी भरकम स्रोत में कटौती का साहस नहीं करेगी। छत्तीसगढ़ सरकार ने इस धारणा को बदल दिया है और यह साबित कर दिया है कि सरकार में इच्छाशक्ति हो तो सबकुछ संभव है। मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह इसे जनचेतना की दिशा में उठाया गया कदम मानते हैं और कहते हैं कि इसे और भी सख्त बनाने के लिये महिलाओं को संगठित कर भारत माता वाहनियों का गठन किया जा रहा है। मुख्यमंत्री का यह भी मानना है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस व्यसन मुक्त भारत का सपना देखा था, उस सपने को सच करने की यह हमारी पहल है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;छत्तीसगढ़ सरकार ने शराबबंदी के लिये जो कदम उठाये हैं, वह स्वागत योग्य तो है ही किन्तु कुछ पुरातन परम्परा पर भी नियंत्रण पाने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ में गुडाखू का प्रचलन लम्बे समय से किया जाता है। मोलाइसस से बने गुड़ाखू में वह सभी चीजें मिलायी जाती हैं जिससे स्वास्थ्य पर बुरा असर होता है। गुड़ाखू की खपत राज्य में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में होता है। गुड़ाखू का उपयोग वयस्क से लेकर कच्ची उम्र के बच्चे तक करते हैं। पहले पहल इसे शौक के तौर पर उपयोग किया जाता है किन्तु बाद में यह आदत में परिवर्तित हो जाता है। कई बार तो यह अपने साथ घातक बीमारी को भी लेकर आता है। यह तथ्य भी साफ है कि बहुत ही मामूली कीमत पर मिलने वाला गुड़ाखू उद्योगपतियों को मालामाल बना देता है। राजस्व की प्राप्ति भी सरकारी खजाने को होती होगी लेकिन एक सामाजिक बुराई को दूर करने में सरकार को आगे आना होगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;किसी भी किस्म का नशा तात्कालिक रूप से भले ही आनंद का अनुभव दे जाए किन्तु दीर्घकालिक परिणाम दुखद होते हैं। खासतौर पर ऐसे परिवारों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है जहां उस परिवार की आजीविका का सहारा वह व्यक्ति स्वयं हो जो नशे का शिकार बन चुका होता है। नशे की लत में कामकाज तो प्रभावित होता है और इसके परिणामस्वरूप आय पर भी असर होता है। आय घटने से परिवार को आर्थिक दिक्क्तों का सामना करना होता है बल्कि रोज रोज कलह भी होने की आशंका बनी रहती है। छत्तीसगढ़ एक विकसित राज्य है और नशा एक सामाजिक बुराई है। जिस तरह शराबबंदी के लिये सरकार ने प्रयास शुरू किया है, उसी तरह अन्य नशे पर भी शिकंजा कसे जाने से सामाजिक बुराई को दूर कर राज्य का विकास किया जा सकता है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-6192378742557308574?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/6192378742557308574/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/10/sarokar.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/6192378742557308574'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/6192378742557308574'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/10/sarokar.html' title='Sarokar'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-8445245418816481583</id><published>2011-10-09T23:49:00.003-07:00</published><updated>2011-10-09T23:49:34.482-07:00</updated><title type='text'>Beti</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;संदर्भ ः मध्यप्रदेश में बेटी बचाओ अभियान&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बेटियों के बैरी के खिलाफ शिवराजसिंह का संकल्प&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;-मनोज कुमार&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;स्त्री के तौर पर हमारे पास मां, बहन, बेटी, भाभी, मौसी, चाची, नानी, दादी और ऐसे ही अनगिनत रिश्तों का ताना बाना है। इन रिश्तों से हम हमेशा अपेक्षा करते रहे हैं किन्तु इनकी सुरक्षा की दिशा में शायद ही हम कभी गंभीर हो सके हैं। यही कारण है कि स्त्रियों की गिनती के आंकड़ें हमें भयभीत कर देते हैं। भयभीत कर देने वाले आंकड़ों के पीछे अनेक कारण गिनाये गये जिसमें सर्वोपरि बेटे की चाहत रही है। सदियों से स्त्री कुछ शापित सी रही है। समाज को हर स्त्री से एक बेटे की चाह रही है लेकिन उस बेटे की पत्नी कौन होगी, मां कौन कहलायेगी? रिश्तों का वह ताना बाना जिसकी हम ऊपर बात कर रहे हैं, किनसे बुना जाएगा? इसकी चिंता हममे से शायद बहुत लोगों ने नहीं की। प्रकृति का नियम है बराबरी का। दिन में सूरज के प्रकाश से दुनिया आलौकित होती है तो सांझ ढलते ही चंदा मामा प्रहरी बन कर खड़े हो जाते हैं। दोनों के लिये बराबरी का समय। विज्ञान भी बराबरी की बात करता है किन्तु कुछ निष्ठुर और निर्दयी लोगों ने प्रकृति और विज्ञान को भी चुनौती देने से पीछे नहीं हटे। सच तो यह है कि हमारी इसी हिमाकत की सजा हम पा रहे हैं और आने वाला समय कठिन है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;शुक्र कीजिये कि इस दिशा में हम सब जागने लगे हैं। यह जागरण अनायस नहीं है बल्कि हमारे डर ने हमें जागने के लिये मजबूर किया है। भारत के इतिहास में मध्यप्रदेश जो काम करने जा रहा है वह डर का नहीं, लोकप्रियता के लिये नहीं बल्कि सच्चे मन से स्त्री के लिये आदरभाव के साथ है। बेटी बचाओ अभियान के पीछे एकमात्र मकसद है बेटियों को बचाना। यह तय है कि आज बेटियों को बचाने के लिये समाज आगे नहीं आएगा तो कल उसके ही अस्तित्व पर संकट आ जाएगा। अस्तित्व को बचाने के लिये भी जरूरी है कि हम बेटियों को आसमान में उड़ने दें, उन्हें बढ़ने दें। बहुत पीछे न भी जाएं तो मध्यप्रदेश बेटियों के हक में हमेशा से आगे खड़ा रहा है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मध्यप्रदेश में स्त्री साक्षरता का प्रतिशत कम है किन्तु जागरूकता का अभाव नहीं है। बालविवाह जैसे रूढ़िवादी परम्परा का नाश हो रहा है। साल-दर-साल आंकड़े गिर रहे हैं। यह इस बात का पुख्ता सबूत है कि हमारी महिलाएं जागरूक हैं और उनके प्रयासों से ही यह संभव होता दिख रहा है। फकत सात बरस में बेटियों के हक-हूकुक के लिये मध्यप्रदेश सरकार ने सारे दरवाजे खोल दिए हैं। गांव से लेकर शहर तक की सत्ता में महिलाओं को बराबरी का भागीदार बनाया गया है। पढ़ाई से लेकर रोजगार तक की हर जरूरतें पूरी की जा रही है। जिंदगी को सही मायने में जी रही हैं हमारे अपने प्रदेश की बेटियां। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मध्यप्रदेश संभवतः देश एकमात्र राज्य है जहां महिलाओं को पूरा सम्मान दिया जा रहा है बल्कि उन्हें हर स्तर पर आर्थिक सुरक्षा भी। उनके हक में लगभग एक दर्जन से अधिक प्रभावशाली और लोकप्रिय योजनाओं का संचालन हो रहा है। मध्यप्रदेश की लाडली लक्ष्मी योजना ने तो दूसरे राज्यों को भी हमकदम बना डाला है। बेटी पालने की जवाबदारी से बचते लोग अनेक बार आर्थिक कारणों से बेटी को मार डालते थे किन्तु सरकार की तरफ से मिलने वाली आर्थिक सुरक्षा उन्हें ऐसा करने से रोक रही है। स्कूल में पढ़ने वाली बिटिया को मुफ्त शिक्षा, किताबें, ड्रेस और भोजन का इंतजाम। ग्रामीण इलाकों की प्रतिभावान बेटियों को उच्च शिक्षा के लिये वजीफा। विवाह, प्रसव जैसी जरूरतों के लिये भी सरकार का खजाना खुला हुआ है। इतना सब हो जाने के बाद भी अभी बेटियों के लिये काफी कुछ करना है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;देश के दूसरे हिस्सों की तरह मध्यप्रदेश में भी बेटियां गिनती में पीछे हैं। साल-दर-साल उनकी तादाद कम होती जा रही है। मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चैहान का संकल्प है कि बेटियों को हर हाल में बचाया जाएगा। वे शायद देश के पहले मुख्यमंत्री होंगे जिन्होंने यह संकल्प लिया है। उनका संकल्प पूरा करने की जवाबदारी हर पिता, हर भाई, हर चाचा, हर मामा, नाना और दादा की है। हर स्तर पर तैयारी कर ली गयी है। कोशिश की गयी है कि बेटियों के बैरी को कोई मोहलत न दी जाए। घर से लेकर अस्पताल तक घेराबंदी की मुकम्मल योजना बनायी गयी है। खामी फिर भी हो सकती है। बेटियों के बैरी फिर भी बचने का रास्ता खोज सकते हैं किन्तु सरकार के साथ हमारी नैतिक एवं सामाजिक जवाबदारी होगी कि हम अपनी बेटियों के बैरी ह्नदय परिवर्तन करें और स्वयं भी इस पाप से बचें।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;समाज की एक बड़ी जवाबदारी यह भी है कि वह बेटियों को मारने वाले छल- कपट के विज्ञापनों से परहेज करे। भ्रूण हत्या के लिये कानून है किन्तु भू्रण को पेट में न आने देने के लिये दवाओं का उपयोग भी नैतिक पाप है। छल भरे विज्ञापन कानून को दगा दे सकते हैं किन्तु एक नैतिक समाज इसके फेर में नहीं आएगा। इस पाप के गर्त में डूबने वालों को बचाने का मुहिम चलाना होगा। लाख हम पश्चिमी सभ्यता में रंग गये हों किन्तु अभी भी हम अपनी संस्कृति से विलग नहीं हुए हैं। यह बात विज्ञान के स्तर पर प्रमाणित हो चुकी है कि प्रकृति के साथ अन्याय करने वाली दवाओं से फौरीतौर पर व्यक्ति मनमानी कर सकता है किन्तु इसके दुष्परिणाम वे वह बच नहीं पायेगा। खासतौर पर जब हम स्त्री की बात करते हैं तो इन छलावा भरे विज्ञापनों को बेहद गंभीरता से लेना होगा क्यांेकि छलिया विज्ञापनों में बतायी गयी दवाएं स्त्री को कमजोर करती हैं। स्त्री कमजोर होगी तो परिवार कमजोर होगा। किसी कमजोर से आप कितनी उम्मीद रखते हैं। बेटी के प्रति आप के मन में मोह है तो आप किसी स्त्री को कमजोर नहीं होने देंगे और न ही मध्यप्रदेश में चलने वाले बेटी बचाओ अभियान को।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आखिर हम सब की भी जिम्मेदारी है बेटियां बचें, नई दुनिया रचें।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-8445245418816481583?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/8445245418816481583/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/10/beti.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8445245418816481583'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8445245418816481583'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/10/beti.html' title='Beti'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-1138822223089402464</id><published>2011-10-09T02:24:00.000-07:00</published><updated>2011-10-09T02:24:56.531-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='naya ank'/><title type='text'>समागम</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-hnslFZwtRaE/TpFoBJ3vyTI/AAAAAAAAAEk/9rjo_R_40Ws/s1600/Graphic2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320px" kca="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-hnslFZwtRaE/TpFoBJ3vyTI/AAAAAAAAAEk/9rjo_R_40Ws/s320/Graphic2.jpg" width="237px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;समागम का ताजा अंक दलित पत्रकारिता एवं रचनाकर्म पर&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मीडिया एवं सिनेमा की शोध पत्रिका समागम ऐसे विषयों को केन्द्र में रखकर सामग्री का प्रकाशन कर रही है जिसमें समूचे जीवन की धड़कन महसूस हो सके। समागम का ताजा अंक दलित पत्रकारिता एवं उनके रचनाकर्म पर है.....&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-1138822223089402464?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/1138822223089402464/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/1138822223089402464'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/1138822223089402464'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='समागम'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-hnslFZwtRaE/TpFoBJ3vyTI/AAAAAAAAAEk/9rjo_R_40Ws/s72-c/Graphic2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-3323339167892241755</id><published>2011-06-02T22:41:00.000-07:00</published><updated>2011-06-02T22:41:08.339-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>kuch alg</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;ईमानदारी पर भारी बेईमानी&lt;br /&gt;मनोज कुमार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आज दो खबरें हैं जिसमें पहली खबर मायने रखती है। खबर एक रिक्षा चालक को लेकर है। किसी सवारी ने रिक्षे में पचास हजार रुपये का बैग भूल आया था। रिक्षे वाले ने ईमानदारी का परिचय देते हुए उसे लौटा दिया। निष्चित रूप से इस खबर को जगह मिलनी चाहिए थी सो मिली किन्तु ठीक इसके नीचे एक खबर और लगी है कि पचास करोड़ के आसामी कार चोर थे। इस खबर को उतनी ही जगह दी गई है जितना कि रिक्षे वाले की ईमानदारी की खबर को। सवाल यह है कि ईमानदारी पर भारी पड़ती बेईमानी की खबर क्या इतना वजूद रखती है अथवा कि ईमानदारी और बेईमानी को एक तराजू पर तौला जाना चाहिए? &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; राय अलग अलग हो सकती है किन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि खबरें दोनो महत्वपूर्ण हैं किन्तु रिक्षा चालक की खबर ज्यादा मायने रखती है और कारचोरों की खबर कोई खास मायने की नहीं है। दूसरी खबर इस मायने में बेकार है अथवा अर्थहीन है कि इस समय समाज में सबसे बड़ा मुद्दा भ्रश्टाचार का है और ऐसे में ईमानदारी की कोई खबर सामने आये तो इसे बड़ी खबर माना जाना चाहिए। औसतन दस खबरों में छह तो बेईमानी की होती हैं। बेईमानी के मुद्दे और तथ्य अलग अलग होते हैं किन्तु चरित्र एक सा होता है। इस हालात में रिक्षा चालक की ईमानदारी को सलाम करना चाहिए। यह खबर सुकून देती है कि बिगड़ते दौर में भी ईमानदारी बाकि है और षायद यही ईमानदारी ही हमारे देष और समाज को बचाये रखी है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मीडिया की जवाबदारी है कि जब वे संेध लगाकर लोगों के निजी जीवन में ताक-झांक कर मसालेदार खबरें खोज लाते हैं तो ऐसे ईमानदार लोगों को भी सामने लायें ताकि किसी अन्ना हजारे को, किसी रामदेव को भ्रश्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाने की जरूरत ही ना पड़े क्योंकि इस मुहिम के कई अर्थ हैं। भ्रश्टाचार मिटाना इनका लक्ष्य है किन्तु कई बेईमान इनके साथ खड़े होकर स्वयं ही ईमानदार होने का सर्टिफिकेट पा रहे हैं। इस विसंगती से समाज को बचाने के लिये जरूरी है कि सकरात्मक खबरों को प्रमोट किया जाए। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-3323339167892241755?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/3323339167892241755/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/06/kuch-alg.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/3323339167892241755'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/3323339167892241755'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/06/kuch-alg.html' title='kuch alg'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-1645626891505973010</id><published>2011-06-01T05:09:00.000-07:00</published><updated>2011-06-01T05:09:12.840-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>Sarkar aur Dar</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;सरकार के डरने का डर&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इन दिनों एक बात सुनियोजित ढ़ंग से स्टेबलिस करने की कोशिशें हो रही हैं कि सरकार डर रही है। सरकार के डर के पीछे के जो कारण बताये जा रहे हैं, उसकी मीमांसा अलग अलग ढ़ंग से हो रही है किन्तु कहीं भी कोइ्र भी, इसका तर्कपूर्ण जवाब नहीं दे पा रहा है। विवाद की स्थिति को निपटाने को सरकार का डर कहा जा रहा है तो इस पर कोई तर्क नहीं किया जा सकता है। एक लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व होता है कि वह हर अवसर पर आगे आकर लोगों की सुने, समझे और एक सर्वमान्य हल निकालने की कोशिश करे। हाल-फिलहाल केन्द्र सरकार यही कर रही है और इसे सरकार के डरने की बात कही जा रही है। मेरे विचार से यह निरर्थक प्रयास है। सरकार तो सरकार होती है और डरने का शब्द उसकी डिक्शनरी में नहीं होता है और होना भी नहीं चाहिए। अक्सर होता यह है कि जो फैसले हमारी मर्जी के मुताबिक होते हैं, उन्हें हम सही फैसला मान लेते है किन्तु जब ऐसा नहीं होता है तो हम उस सरकार की कमजोरी मान लेते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सरकार के डरने का शब्द सबसे पहले गढ़ा गया अन्ना हजारे के लोकपाल के मुद्दे को लेकर। सरकार ने पहल की और हजारे की बात सुनी और अपनी बात रखी। सरकार ने अलग अलग आयामों पर सोचा होगा, समझा होगा और सरकार हजारे की बात से सहमत हुई। सरकार के इस फैसले को उसके डरे होने का फैसला माना गया। इसी मामले में अब बाबा रामदेव अनशन की धमकी दे रहे हैं। सरकार एक बार फिर पहल कर बाबा को समझाने के लिये आगे आयी तो इसे भी सरकार का डर बताया जा रहा है। अभी हाल में आतंकवादियों को सजा देने और न देने के मुद्दे में सरकार को डरा हुआ कहा गया है। सवाल यह है कि सरकार डरे तो किससे और क्यों? कोई माकूल जवाब तो लोगों के पास हो। अनुभव यही बताता है कि मीडिया रोज एक नया शब्द गढ़े और उसे प्रचारित कर दे। जो शब्द चलन में आ जाए, वही चरित्र बन जाता है। कभी शाइनिंग इंडिया शब्द गढ़ा गया था और उसका जो हश्र हुआ वह सब जानते हैं। जहां तक सरकार के डरने का मामला है तो यह गफलत पैदा करता है और गफलत का खामियाजा पूरे समाज को भुगतना होता है। मीडिया शब्दों के चयन को लेकर सावधान नहीं है। उसकी यह प्रवृत्ति आने वाले समय के लिये घातक और मारक है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सरकार के डरने को लेकर एक इमेज बनाने की जो कोशिशें हो रही हैं, वह दुखद है। सरकार एक तंत्र है और तंत्र पूरी व्यवस्था के साथ काम करता है। सरकार में केवल राजनीतिक दल के चुने हुए लोग ही शामिल नहीं होते हैं बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक दायित्वों वाले लोगों की भागीदारी भी होती है जो सरकार के सभी निर्णय में शामिल होते हैं। मीडिया हमेशा विपक्ष की भूमिका में रहता आया है और रहना भी चाहिए किन्तु विपक्ष का अर्थ विरोध करना नहीं बल्कि सरकार को सर्तक करना भी होता है। सरकार डरती तो महंगाई काबू आने में घंटों लगते, सरकार डरती तो मेघा पाटकर का आंदोलन कभी का खत्म हो जाता, सरकार डरती तो घोटालों का पर्दाफाश नहीं हो पाता, सरकार डरती तो और भी जाने क्या क्या हो जाता। किसी आतंकवादी को फांसी न देने अथवा अन्ना हजारे या बाबा रामदेव से चर्चा की पहल को सरकार का डर बताना सर्वथा अनुचित है। सरकार के इन फैसलों को लोकतांत्रिक चश्मे से देखा जाना चाहिए न कि सरकार के विरोधी बनकर। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-1645626891505973010?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/1645626891505973010/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/06/sarkar-aur-dar.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/1645626891505973010'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/1645626891505973010'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/06/sarkar-aur-dar.html' title='Sarkar aur Dar'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-4179669971909809434</id><published>2011-05-24T11:06:00.000-07:00</published><updated>2011-05-24T11:06:39.141-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>हिन्दी पत्रकारिता दिवस ३० मई पर विशेष</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;पाठकों के हिस्से में सेंधमारी कब तक?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;b&gt;&amp;nbsp; -मनोज कुमार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; उपभोक्ताओं को जागरूक बनाने के अनेक उपक्रम संचालित हो रहे हैं। केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों में यह अभियान चला हुआ है। करोड़ों रुपयों के विज्ञापन प्रकाशित किये और कराये जा रहे हैं। उपभोक्ताओं की श्रेणी में उन्हें रखा जा रहा है जो टीवी, फ्रिज, कूलर से लेकर दवाएं खरीदते हैं। इस श्रेणी में संभवतः पत्र-पत्रिकाएं और केबल कनेक्शन लेने वालों को शामिल नहीं किया गया है। इसका कारण शायद इनकी श्रेणी अलग है क्योंकि इन्हें उपभोक्ता न कहकर पाठक और दर्शक कहा जाता है अर्थात इनका संबंध बाजार से न होकर बौद्धिक दुनिया से है। कानून की भा में भले ही ये उपभोक्ता नहीं कहलाते हों किन्तु प्राथमिक रूप से यह उपभोक्ता की ही श्रेणी में आते हैं। पढ़ने के पहले की प्रक्रिया पत्र-पत्रिका खरीदना अथवा केबल कनेक्शन के लिये तयशुदा रकम चुकाना है, ऐसे में वे पहले उपभोक्ता होते हैं और बाद में पाठक या दर्शक। पाठक और दर्शकों के हिस्से में सेंधमारी लम्बे समय से की जा रही है, वह अन्यायपूर्ण है बल्कि ये पाठक और दर्शक तानाशाही के शिकार हो चले हैं। सीधे तौर पर पाठक और दर्शकों के हिस्से में सेंधमारी का मामला साफ नहीं होता है किन्तु मैंने अपने अध्ययन में पाया है कि एक साल में पाठकों के हिस्से में लगभग पच्चीस फीसदी हक पर सेंधमारी की जाती है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; सभी अखबारों की कीमत तय है, वैसे ही जैसे साबुन की टिकिया की। वह कम या ज्यादा हो सकती है किन्तु यह प्रबंधन का फैसला है कि वह अखबार की कीमत क्या तय करे किन्तु जो कीमत तय की जाती है, वह पाठकों से वसूली जाती है। कीमत में कमी अथवा बढोत्तरी भी की जाती है। यह सब ठीक है किन्तु जब तयशुदा कीमत आप वसूल रहे हैं तो आपकी जवाबदारी बन जाती है कि जितने पन्नों के अखबार का वायदा किया है, वह पाठकों को दिया जाए। पन्ने ही नहीं बल्कि खबरों वाले पन्ने दिये जाएं किन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है। हमें पढ़ाया गया है, बताया गया है कि किसी समय अखबारों में छपने वाले विज्ञापनों के लिये एक हिस्सा तय होता था। पहले अस्सी प्रतिशत खबरें और बीस प्रतिशत विज्ञापन और बाद में यह प्रतिशत बदल गया और साठ प्रतिशत खबरें और चालीस प्रतिशत विज्ञापन की जगह हो गई। शायद अभी भी यही फार्मूला काम कर रहा है किन्तु कागज में, वास्तविकता में नहीं। अखबार जब तब पाठकों के हिस्से में सेंधमारी कर देते हैं। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; हर साल एबीसी अर्थात आडिट ब्यूरो सर्कुलेशन पड़ताल कर यह जानकारी देता है कि किन अखबारों की बिक्री में कितना इजाफा हुआ अथवा कितना ग्राफ उसका गिरा। एबीसी मशीन पर छपने वाले अखबार की प्रतियों गिनने के बाद अपना निर्णय सुनाता है। लिहाजा हर अखबारों की संख्या अलग अलग होती है तथा इसमें भी शहरवार अलग अलग होते हैं। एबीसी के ये आंकड़ें प्रबंधन तक होते हैं, आंकड़ों को सार्वजनिक करने का काम उनका नहीं है किन्तु अपनी श्रेष्ठता सिद्व करने के लिये अखबार वाले तत्काल एक पूरा पेज कौन किससे आगे, कौन किससे पीछे और वे किस मायने में श्रेष्ठ हैं बताने के लिये छाप देते हैं। साल में एक बार पूरा का पूरा पेज जो खबरों के लिये होता है, पाठकों के हिस्से में सेंधमारी कर स्वयं की वाहवाही में निकाल दिया जाता है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; यह तो एक उदाहरण मात्र है। उत्सव के समय तो विज्ञापनों के बीच खबरों को तलाश करना पड़ता है। दीपावली के पांच दिनों के अखबारों का विश्लेशण करेंगे तो पाएंगे कि बीस प्रतिशत खबरें होती हैं और अस्सी प्रतिशत विज्ञापन किन्तु अखबार के मूल्य में कोई परिवर्तन नहीं होता है। कई बार का अनुभव यह रहा है कि विज्ञापनों के लिये वद्वि किये पन्ने की कीमत भी पाठकों से वसूल कर ली जाती है। इसे कहना चाहिए आम के आम और गुठलियों के दाम भी प्रबंधन ले लेता है। इसी तरह चुनाव के समय अखबारों में भी पाठकों के साथ अन्याय होता है तो राजनीतिक दलों में नियुक्तियां, आगमन, स्वागत आदि के पूरे पूरे पन्ने का विज्ञापन प्रकाशित कर खबरों को कम कर दिया जाता है। केन्द्र एवं राज्य सरकार की अधिसूचना प्रकाशन के समय भी अतिरिक्त पष्ठ नहीं जोड़े जाते हैं। एक तरफ तो विज्ञापन प्रकाशित कर पाठकों के हिस्से में सेंधमारी की जाती है तो दूसरी तरफ रविवार के परिशिष्ट की कीमत सामान्य दिनों से अतिरिक्त वसूली जाती है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पेड न्यूज का हल्ला मचाने वाले लोगों को इस बात का इल्म नहीं होगा, यह कहना गैरवाजिब है किन्तु पाठकों के हक में जो सेंधमारी हो रही है, उसके बारे में खामोश बने रहना ठीक नहीं है। पाठकों की हिस्सेदारी में सेंधमारी का एक और तरीका है पाठकों की राय के बिना नियमित स्तंभों को बदलना। इस बारे में कुछ लोगों से बात करने पर उनका यह कहना था कि यह प्रबंध का सर्वाधिकार है कि वह अखबार को किस तरह निकालता है अथवा में उसमें संशोधन करता है जब कुछ लेखक और पाठकों से बात की गई तो उनका कहना था कि अखबार प्रकाशन में लाभ का मामला प्रबंधन का हो सकता है किन्तु अखबार तो पाठक की पसंद और उसकी जरूरत के अनुरूप्‌ निकलना चाहिए। इस बारे में उनका कहना था कि हिन्दी अखबारों में अंग्रेजी की अनुदित सामग्री प्रकाशित की जा रही है जिससे हिन्दी के मूल विचारों से पाठकों का वास्ता खत्म हो रहा है। &lt;br /&gt;एक बड़े वर्ग की चिंता पाठकों के पत्र कॉलम को लेकर भी जाहिर हुई। इस वर्ग का कहना यह था कि पाठकों के पत्र के माध्यम से न केवल विचारों का आदान प्रदान होता था बल्कि वह समस्याएं जिनका हल मुद्दत से नहीं होता था, उसके निदान में भी मदद मिलती थी। अब पाठकों के पत्र औपचारिक रूप से प्रकाशित किये जा रहे हैं। इस वर्ग की चिंता इस बात को लेकर भी थी कि इससे पाठकों की हिस्सेदारी खत्म हो रही है जो अखबारों की गंभीरता के लिये खतरनाक है।&amp;nbsp; पाठकों के हिस्से पर सेंधमारी के सवाल पर महिला पाठकों से चर्चा करने पर यह बात भी सामने आयी कि जो अखबार प्राथमिक शाला की भूमिका में थे, उनका लोप हो गया है बल्कि अपनी बिक्री बढ़ाने के लिये ईनाम बांटे जा रहे हैं। अखबारों से हम बाजार से सौदा कैसे करें सीखते थे किन्तु अखबारों की यह सामाजिक जवाबदारी भी कम होती जा रही है। बाजार में ठगने से कैसे बचें, लालच में खरीददारी नहीं करें जैसे नैतिक बातें सिखाने वाले अखबार स्वयं लालच देकर अखबार बेचने की कोशिश में जुटे हुए हैं। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; लगभग सभी पाठकों को इस बात की निराशा थी कि हर अखबार अपने आपको सर्वाधिक लोकप्रिय बताने पर जुटा है किन्तु सबका दावा पाठक संख्या पर है न कि बिक्री पर। अखबारों का स्लोगन होता है कि उनकी पाठक संख्या कितनी है। इस बारे में मीडिया पर अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों से हुई बातचीत में उनका कहना था कि अपने को श्रेश्ठ बताने का यह शॉर्टकट रास्ता है।&amp;nbsp; मैंनेजमेंट की टर्मानोलॉजी के मुताबिक एक परिवार पांच सदस्यों का माना जाता है और एक अखबार के पांच पाठक होते हैं। इसी तरह सार्वजनिक स्थलों पर अखबारों का पठन पाठन करने वालों की संख्या को अखबार चौगुनी करके देखता है और इस हिसाब से वह तुलना कर अपनी प्रसार संख्या के स्थान पर पाठकों की संख्या बता देता था। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पाठकों के हिस्सेदारी में सेंधमारी के संदर्भ में अध्ययन के दौरान मुझे याद आया कि अपनी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में हम लोगों को सिखाया जाता था कि अखबार के पाठक नहीं बल्कि पाठकों की आंखों की संख्या से अखबार की रीडरशिप गिनी जाए अर्थात एक व्यक्ति की दो आंखें और पाठक पाठक यानि दस आंखें। हालांकि यह बातें हमें अखबार की सामाजिक एवं नैतिक जिम्मेदारी के मद्देनजर बताया जाता था कि हमारी एक गलती से किसी भी व्यक्ति की मानहानि किस स्तर पर और कैसे हो सकती है जिसकी भरपाई करना अखबार के लिये नामुमकिन होगा। तथ्यों की पड़ताल और संबंधित व्यक्ति का पक्ष सुन लेने के बाद खबर लिखना चाहिए। हालांकि तीस वर्श पुरानी पत्रकारिता की नैतिक बातें आज भी उतनी मूल्यवान हैं किन्तु व्यवहार से परे हो चली हैं। फिलवक्त चिंता इस बात की है कि पाठकों की हिस्सेदारी पर जो सेंधमारी हो रही है, उसे कैसे रोका जाए। यह चिंता मामूली नहीं है क्योंकि साबुन की टिकिया एक समय के बाद अपना अस्तित्व खो देती है किन्तु एक अखबार इतिहास बन जाता है और इतिहास में पाठकों के हिस्से की सेंधमारी हिस्सा न बन पाये, इसकी चिंता पाठक को, पत्रकार को और प्रबंधन को करना होगी। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-4179669971909809434?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/4179669971909809434/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/05/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/4179669971909809434'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/4179669971909809434'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='हिन्दी पत्रकारिता दिवस ३० मई पर विशेष'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-4647959840570157294</id><published>2011-05-14T05:19:00.000-07:00</published><updated>2011-05-14T05:19:12.442-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>ek aur kadam</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-trnzFUUQuZM/Tc5zFfK0jGI/AAAAAAAAAEY/vuTRbVDtVio/s1600/Samagam-+pani.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/-trnzFUUQuZM/Tc5zFfK0jGI/AAAAAAAAAEY/vuTRbVDtVio/s320/Samagam-+pani.jpg" width="272" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-4647959840570157294?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/4647959840570157294/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/05/ek-aur-kadam.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/4647959840570157294'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/4647959840570157294'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/05/ek-aur-kadam.html' title='ek aur kadam'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-trnzFUUQuZM/Tc5zFfK0jGI/AAAAAAAAAEY/vuTRbVDtVio/s72-c/Samagam-+pani.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-2895607260525707752</id><published>2011-05-05T10:46:00.000-07:00</published><updated>2011-05-05T10:46:29.809-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='netaji'/><title type='text'>aaj-kal</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b style="color: black;"&gt;हंगामा है क्यों बरपा....&lt;br /&gt;मनोज कुमार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;दिग्विजयसिंह एक चतुर राजनेता हैं और मीडिया के दोस्त भी। वे अक्सर बयान देते रहते हैं जिन्हें बेबाक बोल कहना उचित होगा। कुछ बातों पर से तो वे पलटते नहीं है किन्तु कुछ बातों को वे गप कर जाते हैं। राजनीतिक बयानों को लेकर उनके विरोधी तो पस्त रहते ही हैं, उनके अपने दल के लोग भी परेषान हो जाते हैं। उनका एक बयान हो तो बात करें, बहस करें किन्तु यहां तो उनके बयानों की फेहरिस्त है। इस समय में दिग्विजयसिंह ऐसे नेता हैं जो मीडिया में अपनी जगह पक्की कर लेते हैं। लोग भले ही उन्हें भला बुरा कहते रहें लेकिन वे एकाध पखवाड़े में ऐसा बयान दाग देते हैं कि सब उन्हींे के पीछे पड़ जाते हैं। ताजा मामला लादेन का है। पहले तो उन्होंने लादेन के अंतिम क्रियाकर्म करने को लेकर बयान दिया और जब लोग इस बात से नाराज हो गये तो लादेन को सम्मान के साथ जी लगाकर संबोधन दिया। पहले दिन जो लोग नाराज थे, दूसरे दिन उनके नथूने फूलने लगे। लोग पानी पी पीकर दिग्वजयसिंह को कोसते रहे और मुझे नहीं मालूम कि दिग्विजयसिंह पर इसका कोई फर्क पड़ा होगा। &lt;br /&gt;दिग्विजयसिंह हमेषा बयानों की झड़ी लगा देते हैं। ऐसा भी नहीं है कि उनका हर बयान बेबुनियाद हो किन्तु यह भी सच है कि कई बार वे चर्चा में बने रहने के लिये बयान देते हैं। ताजा प्रकरण को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। लादेन के आखिरी संस्कार की बात गंभीर रही होगी किन्तु जब इस पर बवाल मचा तो षायद जानबूझकर लादेनजी कहकर संबोधित कर फिर चर्चा में आ गए। &lt;br /&gt;एक सफल राजनेता की तरह उन्हें अखबार और टेलीविजन पर बने रहना आता है। कोई चैनल अपनी टीआरपी जांच रहा होगा तो जितनी टीआरपी उसे लादेन के मरने की खबर में मिली होगी तो कम से कम आधी तो दिग्विजयसिंह केे बयान की भी रही होगी। अखबारों की बिक्री में उनके बयान का सहयोग होगा। एक समय लालू प्रसाद यादव अपने बयानों से चर्चा में बने रहते थे। दिग्विजयसिंह और लालू दोनों ही षिक्षित हैं और समय की नब्ज पकड़ना जानते हैं। मीडिया को यह मान लेना चाहिए कि हवा का रूख मोड़ने की ताकत दिग्विजयंिसंह रखते हैं। एक तरफ लादेन को मारे जाने की खबर को जितनी जगह मीडिया दे रहा था, लगभग उतनी ही जगह मीडिया में दिग्विजयसिंह ने पा ली है। एकाधे बयान के बाद अरसे तक मीडिया में नेता गुम रहते हैं किन्तु दिग्विजयसिंह एक बयान के बाद उसके सर्पोटिंग में कई बयान देकर अरसे तक मीडिया में बने रहते हैं। सच कहा जाए तो मीडिया को अपनी तरफ मोड़ने की कला जो उनमें है, वह दूसरों को सीखने की है। ऐसा भी नहीं है कि दूसरे नेताओं ने उनके रास्ते पर चलने की कोषिष नहीं की है किन्तु वे सफल नहीं हुए। चलो, बाद का बाद देखेंगे। लादेन की मौत से बड़ी खबर दिग्विजयसिंह के बयान बन गई है। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-2895607260525707752?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/2895607260525707752/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/05/aaj-kal.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/2895607260525707752'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/2895607260525707752'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/05/aaj-kal.html' title='aaj-kal'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-7892110563201808064</id><published>2011-05-02T20:23:00.000-07:00</published><updated>2011-05-02T20:23:01.259-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='aaj-kal'/><title type='text'>media</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;u&gt;प्रेस दिवस पर खास&lt;/u&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;विकीलीक्स की पत्रकारिता के अर्थ&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मनोज कुमार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;विकीलीक्स की पत्रकारिता जनसरोकार की न होकर खोजी पत्रकारिता का आधुनिक चेहरा है बिलकुल वैसा ही जैसा कि कुछ साल पहले तहलका का था। विकीलीक्स और तहलका के होने का अर्थ अलग अलग है। तहलका खोजी पत्रकारिता का भारतीय संस्करण है और उसका रिष्ता खोजी होन के साथ साथ जन के सरोकार का भी था। उसके निषाने पर तंत्र और राजनेता, अफसर थे तो इसका अर्थ समाज को दिषा से देने से था किन्तु विकीलीक्स का होने का अर्थ कुछ और ही है। पहला तो यह कि विकीलीक्स हमारी भारतीय पत्रकारिता से बिलकुल अलग है। अचानक उदय हुए इस इंटरनेटिया पत्रकारिता ने कई देषों की नींद उड़ा देने के बाद भारतीय तंत्र को भी भेदने की कोषिष की है। कहना न होगा कि वह कई मायनों में कामयाब भी रहा है। विकीलीक्स की पत्रकारिता पर संदेह नहीं किया जा सकता है और न ही किया जाना चाहिए। &lt;br /&gt;नये माध्यम की पत्रकारिता को मैं पत्रकारिय सरोकार से परे कुछ और खतरे तरफ देखने की कोषिष कर रहा हूं। विकीलीक्स तब चर्चा मंे आया जब उसने अमेरिका के तंत्र को भेदने की कोषिष की और कुछ रहस्य का खुलासा किया। जो खुलासा हुआ था उसमें भारत के साथ अमेरिका की दोमुंही नीति की बातें भी थीं। स्वाभाविक है कि इस खुलासे ने हर भारतीय मन को खुष किया। खुष होने लायक खुलासा था। यही विकीलीक्स भारत के तंत्र को भी भेदना षुरू किया। विकीलीक्स के खुलासे को लेकर भारतीय राजनीति दो भागों में बंट गयी है। जिनके खिलाफ मामला है, वे परेषान हैं और जिनके खिलाफ नहीं है, वे विकीलीक्स के पैरोकार बने हुए हैं। भारत जिस तेजी के साथ विष्व पटल पर छा गया है, उससे उसके विरोधियों की संख्या बढ़ रही है। भारत के पुराने दुष्मनों से तो पूरी दुनिया वाकिफ है। ऐसे में यह सवाल उपजना स्वाभाविक है कि कहीं कोई विकीलीक्स को औजार बनाकर हमारे तंत्र को नुकसान पहुंचाने की कोषिष तो नहीं कर रहा है। इस संदेह की पड़ताल करना चाहिए।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;ऐसे में यह अंदेषा सहज और स्वाभाविक है कि क्या विकीलीक्स का उद्देष्य महज पत्रकारिता है अथवा उनके साथ किसी और का हाथ है जो हमारी अस्मिता पर आंच लगते देखना चाहते हैं। यह बेहद दुखदायी है कि भारतीय मीडिया विकीलीक्स को हाथोंहाथ ले रही है। उसके खुलासे को खबर बनाकर छाप रही है। हमें यह याद रखना चाहिए कि खोजी पत्रकारिता में भारतीय पत्रकारिता ने हमेषा से अपना झंडा फहराया है किन्तु उसने कभी दूसरे देषों के तंत्र को न भेदने की कोषिष की है और न हस्तक्षेप की। याद रहे कि बोफोर्स घोटाला तकरीबन पच्चीस बरस बाद भी गूंज रहा है तो इसका श्रेय पत्रकार अरूण षौरी को जाता है। यह तो खोजी पत्रकारिता का एक नमूना है। यह एक ऐसा मामला था जिसका रिष्ता दूसरे देषों से भी था किन्तु भारत ने बोफोर्स को छोड़कर दूसरे मामलों में दखल नहीं दिया।&lt;br /&gt;विकीलीक्स की पत्रकारिता को सपोर्ट करते हमारे लोगों को देखकर ऐसा लगता है कि सबने मान लिया कि वो जो कुछ बता रहा है, लिख रहा है, सत्य है और इसके अलावा बाकि सत्य से परे है। आखिर हम विदेषियों से इतना मोहित क्यों रहते हैं। अब तक षिक्षा और फैषन की बात थी तो किसी तरह पचा लिया गया किन्तु अब जब पत्रकारिता की बात है तो कम से कम मुझे यह हजम नहीं होगा कि कोई विदेषी हमारी धरती पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराये। विकीलीक्स के संस्थापक असांजे का एक बयान आया है कि उनका मकसद किसी सरकार को अस्थिर करना नहीं है बल्कि वह लोगों को न्याय दिलाना चाहते हैं। मेरा मानना है कि भारतीय मीडिया के पास इतनी ताकत है किवह अपने देष और देषवासियों की हितों की रक्षा के लिये अपनी कलम पैनी कर सके। विकीलीक्स को यह समझ लेना चाहिए कि यह वही भारत है जिसकी पत्रकारिता ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिये मजबूर कर दिया था। आजाद हिन्दुस्तान में जो लोग करप्ट हैं, उन्हें ठीक करना भी भारतीय पत्रकारिता को आता है। स्टिंग ऑपरेषन को लेकर विमत होना एक दूसरा मुद्दा हो सकता है किन्तु पत्रकारिता के इस नये औजार ने गड़बड़ियों की नींद हराम कर दी थी। विकीलीक्स की पत्रकारिता और भारतीय पत्रकारिता में बहुत अंतर है। हम अपनी खूबी और कमजोरी को खूब पहचानते हैं किन्तु विकीलीक्स हमारे बारे में यह जान ले, कतई जरूरी नहीं। विकीलीक्स ने भारतीय जमीन पर अपनी पत्रकारिता के बीज डाल दिये हैं, यहां तक तो ठीक है किन्तु अब हमें सर्तक रहना होगा क्योंकि भारतीय पत्रकारिता हमेषा से अजेय रही है और बनी रहेगी।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-7892110563201808064?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/7892110563201808064/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/05/media.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/7892110563201808064'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/7892110563201808064'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/05/media.html' title='media'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-5737590827024702750</id><published>2011-05-01T22:42:00.000-07:00</published><updated>2011-05-01T22:42:29.411-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='problam'/><title type='text'>pani...pani...re...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;जल संरक्षण और मानवाधिकार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; -मनोज कुमार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जल ही जीवन है और जीवन की धुरी दायित्व एवं अधिकारों पर टिकी हुई है। प्रकृति का नियम है जीवन है तो मृत्यु निश्चित है। निराशा है तो आशा भी है अर्थात सब कुछ नकरात्मक नहीं है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हम भारतीयों में अधिकार पाने की भावना प्रबल हुई है। इसे अनुचित नहीं कहा जा सकता है किन्तु अधिकारों के साथ दायित्व के प्रति निराशा का भाव सवालिया निशान लगाता है। हम अपने अधिकारों के प्रति सर्तक और सजग हैं किन्तु दायित्व निभाने के समय हम इसकी अपेक्षा दूसरों से करते हैं। इन सब बातों का सीधा संबंध मानवाधिकारों से जुड़ा हुआ है।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; इस समय मानव की बुनियादी जरूरतों में एक बड़ी जरूरत जल की है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जल पर हम अपना अधिकार जताने से कभी नहीं चूकते हैं किन्तु जल की बचत करने में हमारा रवैया लापरवाही का होता है जिससे हम दूसरे के अधिकारों का हनन करते हैं। जल हमारे लिये जितना जरूरी है उतना ही जरूरी इस पृथ्वी पर निवास करने वाले दूसरे मानव के लिये भी है। अनुभव यह बताता है कि हम अपनी जरूरत पूर्ति हो जाने के बाद दूसरों की जरूरतों को नजरअंदाज कर देते हैं। एक मानव का दूसरे मानव के प्रति यह व्यवहार मानवाधिकार हनन की श्रेणी में आता है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; ग्रीष्म ऋतु के आरंभ होने के साथ ही जल संकट अपने पांव पसारने लगता है। बहुत ज्यादा तो नहीं किन्तु बीते डेढ़ दशक से इस बात की चेतावनी दी जा रही है कि अब जो वि·ा युद्ध होगा वह पानी के लिये होगा। इस चेतावनी को गंभीरता के साथ लिया जाना चाहिए। वि·ा युद्ध की चेतावनी निर्मूल साबित हो, यह हमारी कामना और कोशिश होगी किन्तु जो हालात स्थानीय स्तर पर बन रहा है उसके चलते भविष्य संकट भरा दिखता है। पानी न मिलने के कारण आपसी विवाद और इस विवाद के चलते आत्मघाती रास्ते अपनाये जा रहे हैं। एक दूसरे पर सांघातिक वार और कई बार तो जान लेने की नौबत आ जाती है। हाल ही में भोपाल की अदालत ने एक ऐसा ही फैसला दिया है जिसमें बीते वर्ष पानी के विवाद को लेकर हत्या हुई थी जिसमें आरोपियों को आजन्म कारावास की सजा सुनायी गयी। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; यह घटनाएं कानून की नजर में अपराध हैं। आज नगर, जिला, प्रदेश के स्तर पर पानी को लेकर विवाद जारी हैं। इस संदर्भ में यह याद कर लेना चाहिए कि पानी के बंटवारे को लेकर हमारे ही देश के राज्यों के बीच तनातनी का माहौल बना हुआ है। एक देश के ही लोग पानी पर अपना अपना अधिकार जता रहे हैं। अलग अलग मंचों पर समस्या का हल तलाशने का प्रयास जारी है किन्तु यही समस्या आने वाले दिनों में विकराल होने से इंकार करना मुश्किल होगा। देश की सीमा से पार भी पानी के लिये विवाद की स्थिति बनी हुई है और यही विवाद एक दिन वि·ा युद्ध में बदल जाए तो चेतावनी का सच हम सहजता से देख सकते हैं। पानी के लिये स्थानीय विवाद अथवा प्रादेशिक तनाव या कि वि·ा युद्ध एक शिक्षित समाज के लिये कलंक है क्योंकि हमने शिक्षा तो ली किन्तु हमारी शिक्षा अक्षर ज्ञान तक सीमित रह गयी। शिक्षा का अर्थ जागृत होना होता है और जलसंकट को लेकर समूची दुनिया को जागृत होना होगा।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जलसंकट को लेकर मानवाधिकार हनन की शिकायतें बढ़ रही हैं तो हमारी परम्परा भी संकट में है। अतिथि के घर आने पर सबसे पहले स्वागत जल पिलाकर ही किया जाता था किन्तु अब इसमें कमी दिखायी दे रही है। सेवाभावी संस्थाएं मुसाफिरों के लिये&amp;nbsp; एकाध किलोमीटर के भीतर कम से कम दो सार्वजनिक प्याऊ का निर्माण करती थी। दूर-दराज से काम की तलाश में आये लोगों-व्यापारियों को भीषण गर्मी में शीतल जल पाकर राहत का अहसास होता था। बीते एक दशक में यह परम्परा टूटती नजर आ रही है। आहिस्ता-आहिस्ता प्याऊ की संख्या में कमी होती जा रही है। प्याऊ की संख्या घटने के पीछे एकमात्र कारण जलसंकट है। पानी की कमी के चलते प्याऊ बंद होते जा रहे हैं। परम्परा के इस क्षरण ने पानी के व्यवसाय को बढ़ाया है। शुद्धता का दावा करती बोतल बंद पानी अब लोग मोल देकर चुका रहे हैं। पानी मानव की बुनियादी जरूरत है और इस पर उसका अधिकार है किन्तु पानी के लिये कीमत चुकाना मानवाधिकार हनन का एक पहलू है। परम्परा के क्षरण और परम्परा के कारोबार में बदलने की यह मानसिकता भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारों का यह दायित्व बन जाता है कि वह परम्परा को जीवित रखने में सक्रियता दिखायें। जैसा की ठंड के मौसम में अलाव जलाने के लिये सरकार के पास एक अलग बजट होता है तो ग्रीष्मऋतु में बिना कीमत चुकाये हर आधे किलोमीटर की दूरी पर शासकीय प्याऊ संचालित किया जाकर मानवाधिकार को संरक्षित किया जाए।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जल और मानवाधिकार को एक दूसरी नजर से भी देखने की जरूरत है। मुझे यहां इस बात का उल्लेख करते हुए प्रसन्नता होती है कि जब भोपाल की जीवनदायिनी बड़ा तालाब सूख गया था तब लगातार अथक प्रयास कर लोगों ने उसे पुनजीर्वित कर दिया। यह परम्परा भारतीय समाज की धरोहर है। अधिकारों के साथ दायित्व निभाने की यह कोशिश मानवाधिकार की रक्षा की दिशा में किये गये प्रयास के रूप में रेखांकित किया जाना चाहिए। मेरा मानना है कि राजधानी भोपाल में जब यह परम्परा को जीवित रखने का प्रयास हो सकता है तो इसकी आवाज दूर-दराज के गांव और कस्बो तक पहुंचाने की जरूरत है। हमारी पुरातन परम्परा रही है कि तालाबों और नदियों को जीवित करने के लिये हम श्रमदान करते हैं। आर्थिक रूप से सम्पन्न परिवार धन लगाते हैं और बाकि समाज श्रमदान कर इस प्रयास को सार्थकता प्रदान करता है। परम्परा के साथ अधिकार और दायित्व को संबद्ध कर देखा जाए तो हम पाएंगे कि मानवाधिकार की रक्षा में हम कामयाब हो रहे हैं। बार बार और हर बार मानवाधिकार की रक्षा के लिये सरकार या तंत्र से गुहार करने के बजाय हमें स्वयं होकर पहल करनी होगी। जल की बचत करते हैं, जलरुाोतों का संरक्षण और संवर्धन में पहल करते हैं तो निश्चित रूप से हम मानवाधिकार की रक्षा में पहल करते हैं।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-5737590827024702750?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/5737590827024702750/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/05/panipanire.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/5737590827024702750'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/5737590827024702750'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/05/panipanire.html' title='pani...pani...re...'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-5457738865769941862</id><published>2011-04-30T00:32:00.000-07:00</published><updated>2011-04-30T00:32:23.001-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='janmdin'/><title type='text'>aam admi ka neta</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b style="color: yellow;"&gt;एक मई जन्मदिवस पर खास&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: blue;"&gt;न रूकने वाले और न कभी थकने वाले बिरजू भइया&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;-मनोज कुमार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय नेताओं की गिनती की जाएगी तो बृजमोहन अग्रवाल का नाम सबसे आगे होगा। उनकी लोकप्रियता जन की लोकप्रियता है। वे छत्तीसगढ़ के अपनी तरह के अकेले राजनेता हैं जिनके दरवाजे आम आदमी के लिये हमेषा से खुले रहे हैं। वे मंत्री हों या विधायक, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है और उन्हें इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता है कि उनसे मिलने वाला उनके&amp;nbsp; अपने दल का है या विरोधियों का। वे हर किसी से, हर समय दिल से मिलते हैं। मदद के लिये भी उनके दरवाजे खुले होते हैं। बृजमोहन की यह खासियत उनके कॉलेज के दिनों से रही है जब वे कॉलेज की राजनीति करते थे। सत्ता के मखमली रास्तों पर भी चले और कांटे भी चुभे किन्तु जनता ने हमेषा उन्हें हाथों हाथ लिया। वे अविभाजित मध्यप्रदेष में भी मंत्री बने तो स्वतंत्र राज्य छत्तीसगढ़ के सबसे प्रभावषाली मंत्रियों में एक हैं। उनका यह प्रभाव राजनीति नहीं बल्कि आम आदमी की ताकत का प्रभाव है। षायद यही कारण है&amp;nbsp; िकवे मुख्यमंत्री न होते हुए भी किसी मुख्यमंत्री से कम की ताकत नहीं रखते हैं।&lt;br /&gt;विन्रमता और अनुषासन उन्होंने विरासत में पायी है। भारतीय जनता युवा मोर्चा से अपनी राजनैतिक पारी षुरू करने वाले बृजमोहन की गिनती उन लोगों में की जा सकती है जिन्होंने भाजपा को मध्यप्रदेष एवं छत्तीसगढ़ में पहचान दी। मध्यप्रदेष के वर्तमान मुख्यमंत्री षिवराजसिंह चौहान एवं पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती उनके साथी रहे हैं। आज भी षिवराजसिंह से उनका वही आत्मीय संबंध है जो आरंभिक दिनों में था। उनके इन्हीं प्रयासों का परिणाम कहा जाना चाहिए कि जब मध्यप्रदेष का विभाजन हुआ और छत्तीसगढ़ पृथक राज्य के रूप् में अस्तित्व में आया तो उन्हें छत्तीसगढ़ के नेता के रूप् मंे देखा जाने लगा। छत्तीसगढ़ नब्बे विधानसभा सीटों के साथ बना था। अंकगणित के आधार पर सत्ता कांग्रेस को मिली थी और भाजपा को विपक्ष में बैठना था लिहाजा यह माना गया कि कांग्रेस की नींद हराम करने में बृजमोहन ही सफल होंगे। भाजपा की अंदरूनी राजनीति को यह गंवारा नहीं हुआ। बृजमोहन को नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाये जाने से समर्थकों में आग लग गयी। सबने सीमा तोड़कर प्रदर्षन किया और बात हिंसा तक जा पहुंची। एकात्म परिसर तब आगजनी का षिकार हुआ। &lt;br /&gt;इसका खामियाजा बृजमोहन को ही भुगतना पड़ा और उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। बृजमोहन पार्टी की इस कार्यवाही से निराष तो हुए किन्तु दुखी नहीं हुए। वे पार्टी लाईन का सम्मान करना जानते थे सो संयम रखकर पार्टी हाईकमान तक बात पहुंचायी और अविलम्बन उनका निष्कासन रद्द कर दिया गया किन्तु बृजमोहन किनारे कर दिये गये। तीन साल बाद राज्य में सत्ता की बागडोर कांग्रेस से फिसल कर भाजपा के हाथों में आयी और एक बार फिर हसरत बंधी कि अबकी सत्ता के षीर्ष में बृजमोहन होंगे किन्तु ऐसा नहीं हो सका। बृजमोहन को दूसरे नम्बर पर रखा गया। वे रूचिवान और संस्कारित हैं और उनकी रूचि कला संस्कृति में रही है सो संस्कृति, गृह और पर्यटन विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गयी। छोटी सी चीज को भी बड़ा बना देने की कला बृजमोहन में है सो उन्होंने संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय को महत्वपूर्ण बना दिया। &lt;br /&gt;दषाब्दियों से छत्तीसगढ़ की धर्मस्थली राजिम में बहने वाली नदियों के संगम पर कुंभ की नींव डालने का श्रेय उन्हें ही जाता हैं। अपने प्रयासों को सफल करते हुए उन्होंने देषभर से साधुओं को आमंत्रित किया। दिग्गजों ने लगातार तीन साल तक यहां आकर कुंभ की बुनियादी जरूरतों को समझा और आखिरकार ऐलान कर दिया गया कि राजिम में प्रतिवर्ष कंुभ का आयोजन किया जाएगा। इस कुंभ को अर्धकुंभ का दर्जा दिया गया। पर्यटन के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ में अद्वितीय काम हुआ। अनेक अनुछुये और गुमनाम ऐतिहासिक स्थलों को उकेरा गया। विष्व पर्यटन नक्षे पर उन्हें स्थापित किया गया और एक बड़ा राजस्व देने वाले विभाग के रूप में छत्तीसगढ़ का पर्यटन विभाग स्थापित हो गया। संस्कृति के क्षेत्र में भी उन्होंने कुछ ऐसा ही काम किया। &lt;br /&gt;काम के धुनी बृजमोहन को हमेषा पीछे करने की कोषिषें की जाती रही हैं। एक बार फिर उन्हें हाषिये पर धकेलने की कोषिष हुई जब उनसे गृह मंत्रालय वापस लिया गया। राजनीतिक गलियारों में इसे बृजमोहन के पर काटने की संज्ञा दी गई किन्तु लोगों को यह पता नहीं था कि बृजमोहन सत्ता के लिये नहीं, जनता के लिये बने हैं। सत्ता के लिये न तो वे जनसम्मान खोना चाहेंगे और न ही पार्टी के सामने कोई धर्मसंकट खड़ा करेंगे। उनके इस स्वभाव ने उनका कद और बढ़ा दिया। मुख्यमंत्री से विवाद करने वाले एक अन्य प्रभावषाली मंत्री को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था और विनम्र बृजमोहन ने अपना स्थान और बड़ा कर लिया। राज्य में भाजपा सरकार लोकप्रिय है किन्तु संकटमोचक के रूप में बृजमोहन हमेषा उपस्थित रहे हैं। राज्य में होने वाले उपचुनावों की कमान भाजपा ने बृजमोहन को सौंपी और वे पार्टी के विष्वास पर हमेषा खरा उतरे। स्थानीय निकायों के चुनाव में भी बृजमोहन ने भाजपा को जीत दिलायी।&lt;br /&gt;बिरजू भइया के नाम से मषहूर हर दिल अजीज बृजमोहन अग्रवाल देररात तक काम करते हैं और आम लोगों से मिलने का समय भी यही होता है। वे न थकते हैं और न ही रूकते हैं। उनकी लोकप्रियता का मिसाल इसी बात से जान लीजिये कि छत्तीसगढ़ के किसी भी स्थान पर वे मुख्यअतिथि हों और उनके पहुंचने में देर नहीं बल्कि महादेर भी हो जाए तो लोग उनके आये बिना कार्यक्रम आरंभ नहीं करते हैं। षाम सात बजे होने वाले प्रोग्राम में वे एक बार तो दो बजे रात को पहुंचे तो देखा लोग उनके इंतजार में खड़े हैं। बृजमोहन की यह देरी कार्यक्रम स्थल से काफी दूर रहने के कारण हुई। इस वाकये में सबसे खास बात यह है कि आयोजक और अतिथि दोनों ही तत्पर रहे। मुसीबतजदा लोगों के लिये तो बृजमोहन के ही दरवाजे खुले हैं। खुले हाथों से मदद करना कोई उनसे सीखे। उनकी इसी खासियत की वजह से वे मीडिया के दोस्त कहलाते हैं। मुझे तो लगता है कि उनका जन्म एक मई को इसलिये ही हुआ क्योंकि वे राजनेता न होकर जननेता हैं और जननेता के लिये श्रमजीवी होना जरूरी है। मजदूर दिवस को सार्थक करता है बृजमोहन अग्रवाल का जन्मदिन। आज के समय में ऐसे राजनेता का मिलना दुलर्भ बात है किन्तु हम भाग्यषाली हैं कि हमारे साथ बृजमोहन हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-5457738865769941862?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/5457738865769941862/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/04/aam-admi-ka-neta.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/5457738865769941862'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/5457738865769941862'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/04/aam-admi-ka-neta.html' title='aam admi ka neta'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-1410350568470825600</id><published>2011-04-29T05:33:00.001-07:00</published><updated>2011-04-29T05:33:36.468-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='aurat'/><title type='text'>aaj-kal</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;प्रताड़ना के औजार&lt;br /&gt;मनोज कुमार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;स्त्री को प्रताड़ित करने के लिये समाज ने कई तरह के औजार एकत्र कर लिये हैं। उसके जन्म से मृत्यु तक ऐसे अनेक औजार हैं जिन्हें वह समय समय पर रूप बदल बदल कर उपयोग में लाता रहा है। भ्रूण हत्या एक औजार है तो बाल विवाह दूसरा औजार और इससे भी बात न बने तो चरित्रहीन, डायन कहकर स्त्री को मरने के लिये छोड़ दिया जाए। विधवा स्त्री के जीवन का सच और उसके लिये प्रताड़ना का औजार तो पहले से तैयार है। किसी समय, कहीं कहीं आज भी सती नाम से एक औजार उपयोग में आ रहा है। प्रताड़ना के औजार के खिलाफ कागज पर कानून बनते रहे हैं किन्तु सच में औजार अपना काम निर्बाध रूप से कर रहा हैं। लगभग पांच बरस हो गए छत्तीसगढ़ की सरकार ने स्त्री प्रताड़ना के उस औजार को भोथरा करने के लिये टोनही निरोधक कानून बनाया था लेकिन आज भी स्त्री टोनही के नाम पर सार्वजनिक प्रताड़ना का षिकार हो रही हैंं। कहीं कहीं तो नौबत जान देने की आ जाती है। अब राजस्थान सरकार ने इसी औजार को भोथरा करने के लिये डायन कहने, प्रताड़ित करने या ऐसा कुछ करने के लिये कठोर कानून बनाने जा रही है। हम तो उम्मीद कर सकते हैं कि स्त्री प्रताड़ना का यह औजार भोथरा हो जाए किन्तु सच और कागज में एक फर्क होता है बिलकुल वैसे ही जैसा कि बाल विवाह रोकने के लिये षारदा एक्ट अस्तित्व में है किन्तु मानने वाले अदृष्य हैं। हर वर्ष बाल विवाह के नाम पर हजारों बच्चियां बेड़ियों में बांध दी जाती हैं। &lt;br /&gt;भ्रूण हत्या पहले एक रिवाज रहा होगा किन्तु अब यह फैषन में आ गया है। सरकार भू्रण हत्या रोकने के लिये अथक प्रयास कर ले किन्तु बाजार ऐसा नहीं होने देगा। हर साल आंकड़ें आएंगे जिनमें बेटियां गुमनाम होती जाएंगी। सरकार ने लिंग परीक्षण पर रोक लगा दिया है तो बाजार ने एक छोटा सा हथियार ईजाद कर दिया है जिसके जरिये युवती यह जान लेगी कि वह गर्भवती है कि नहीं। लिंग परीक्षण की नौबत ही नहीं आने दी जाएगी। इस तरह सरकार का कानून भी नहीं टूट रहा है और भ्रूण हत्या भी जारी है। इस साजिष के खिलाफ सरकार कब आएगी? स्त्री प्रताड़ना का यह नया औजार फैषनपरस्त समाज को भा रहा है। नैतिकता की बातें आले में रख दी गई हैं। उसे कई झंझटों से मुक्ति और मुक्त जीवन का अहसास हो रहा है। स्त्री प्रताड़ना के इस नये औजार के बारे में सरकार फिर कभी कोई कानून बनाएगी, इसके पहले हमें ही जागना होगा। नहीं जागे तो बेटियों की गुम होती हंसी हमारी नींद ले उड़ेगी। समय रहते चेत जाने में ही हमारी भलाई है।&lt;br /&gt;मैं इस बात को लेकर हैरान भी हूं और परेषान भी कि आखिर स्त्री प्रताड़ना के औजार बनाने वाले कितने षातिर दिमाग के हैं। उनकी षैतानी दिमाग में कभी यह सवाल नहीं उपजा कि बेटियां कम हो जाएंगी तो उन्हें राखी बांधने वाला कौन होगा? यह सवाल भी बाद का है पहले तो लोरी सुनाने वाली अम्मां ही नहीं रहेगी तो लोरी सुनने वाला कहां से आएगा? भीड़ में गुम होते ये सवाल आज हमारे सामने यक्ष प्रष्न बन कर खड़ा है। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूं कि समाज में पुरूष को कब टोनही या डायन कह कर बुलाया जाएगा या फिर कब उसे सता होने का गौरव प्राप्त होगा। अभी तो सवाल यही है&amp;nbsp; िकइस बार अक्षय तृतीया पर कितने मासूमों को ब्याह की बेड़ियों में जकड़ा जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-1410350568470825600?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/1410350568470825600/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/04/aaj-kal_29.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/1410350568470825600'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/1410350568470825600'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/04/aaj-kal_29.html' title='aaj-kal'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-6216023452010892288</id><published>2011-04-24T10:49:00.000-07:00</published><updated>2011-04-24T10:49:26.740-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bimari'/><title type='text'>aaj-kal</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;भ्रष्टाचार की जड और उसका इलाज&lt;br /&gt;-मनोज कुमार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अभी एक दो दिन में खबर पढ़ रहा था कि जायज काम के लिये रिष्वत देना गलत नहीं है। अन्ना साहेब के अभियान को इस खबर से ठेस पहुंची होगी। यह स्वाभाविक भी है किन्तु सवाल यह है कि भ्रष्टाचार की जड़ में क्या है? क्यों भ्रष्टाचार का हम इलाज नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं? भ्रष्टाचारियों को मारना या उन पर नियंत्रण पाना उतना मुष्किल नहीं है जितना कि भ्रष्टाचार के कारणों को ढूंढ़ना। हमारे देष में लाखों की संख्या में मौत इसलिये नहीं होती है कि उन्हें इलाज नहीं मिल पाया बल्कि मौतों का कारण उसकी बीमारी का समय रहते पता नहीं लग पाना होता है। अन्ना साहेब को और हमसब को इस दिषा में प्रयास करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार की जड़ को ढूंढ़ने का समवेत प्रयास करें। &lt;br /&gt;मध्यप्रदेष में भ्रष्टाचार की जड़ को पहचााने की कोषिष की गई है और फकत सात महीनों में इसकेे परिणाम देखने को भी मिल रहे हैं। राज्य सरकार ने सात महीने पहले लोक सेवा गारंटी अधिनियम बनाया। यह अधिनियम लोकलुभावनी नहीं है और न ही यह अधिनियम सरकार को सत्ता में बने रहने की गारंटी देता है बल्कि यह आम आदमी के लिये राहत का कानून है। अधिनियम में षासन स्तर पर हर काम के लिये समय सीमा दी गई है। इस तयषुदा समयसीमा में काम नहीं करने वाले सेवकों को दंड भुगतना होगा। सात महीने बाद समीक्षा में जो आंकड़ें आये हैं, उन पर भले ही यकिन न किया जाए किन्तु इस बात पर यकिन किया जा सकता है कि लोगों को अधिनियम से राहत तो मिली है। आंकड़ें भरमाने और रिझाने के लिये होते हैं, खासकर तब जब वह सरकारी हों।&lt;br /&gt;यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि लोकसेवा गारंटी अधिनियम और भ्रष्टाचार की जड़ ढूंढ़ने का आपस में क्या रिष्ता हो सकता है। सीधे न सही, किन्तु दोेनों के बीच गहरा रिष्ता है। समय पर काम नहीं होने के कारण आदमी परेषान हो जाता है और वह कोषिष करता है कि जैसे तैसे लेदेकर अपना काम करवा ले। षासकीय सेवक को भी यह रास्ता आसान लगता है कि समय पर काम नहीं करो तो झकमार कर आम आदमी उसकी हथेली गरम करेगा। जब बाबू स्तर का आदमी काम रोकने और करनेे के एवज में कमाता है तो इसका हिस्सा भी उसे उपर तक देना होता है। यह तंत्र का असली चेहरा है और मध्यप्रदेष सरकार ने इस चेहरे को पहचान लिया था। इसे आप सहज भाषा में ताजा हिन्दी फिल्म दम मारो दम के एएसपी कामथ के रूप में मुख्यमंत्री को और राणे के रूप में बाकि तंत्र को देख सकते हैं।&lt;br /&gt;यहां हम भ्रष्टाचार राडिया के रार वाली नहीं कर रहे हैं बल्कि हम उस छोटे से पौधे की बात कर रहे हैं जो आगे चलकर वटवृक्ष बन जाता है और देष का अधिकांष उर्जा इस वटवृक्ष को उखाड़ने में लग जाता है जिससे हमारा स्वाभाविक विकास का रास्ता अवरूद्ध हो जाता है। आज अन्ना हजारे जैसे सक्रिय भारतीय की ताकत भ्रष्टाचार को हटाने में लगी हुई है तब सहज रूप से यह विचार आना स्वाभाविक है कि असली चेहरा तो यही है। मध्यप्रदेष में लोकसेवा गारंटी योजना सफल हो रही तो इसका अर्थ हुआ कि भ्रष्टाचार पर चोट हो रही है। समय पर काम की गारंटी ही भ्रष्टाचार को रोकने में कामयाब हो सकती है और भ्रष्टाचार के खिलाफ जूझ रहे लोगों को यह बात समझ लेना चाहिए कि चोट कहां करनी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-6216023452010892288?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/6216023452010892288/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/04/aaj-kal.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/6216023452010892288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/6216023452010892288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/04/aaj-kal.html' title='aaj-kal'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-6918612610006259889</id><published>2011-04-22T01:06:00.000-07:00</published><updated>2011-04-22T01:06:32.407-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>ajj-kal</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;कलम की विनम्रता और पत्रकारिता के संस्कार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मनोज कुमार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;साल के दो महीने खास होते हैं जिनमें पहला महीना अप्रेल का होता है। इस महीने पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, पंडित माधवराव सप्रे और राजेन्द्र माथुर के नाम है तो दूसरा महीना मई का है। मई की पहली तारीख श्रमजीवियों के नाम है जिसे हम मजदूर दिवस के नाम पर जानते हैं। इसी महीने की तीन तारीख को प्रेस दिवस है और तीस मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं। ये दोनों महीने बेहद अर्थवान हैं, खासकर पत्रकारिता के लिये। यहां मैं मीडिया षब्द से परहेज करने की कोषिष करूंगा क्योंकि मेरा मानना है कि मीडिया का अर्थ पत्रकारिता से एकदम जुदा है। बहरहाल, हम पत्रकारिता के संदर्भ में बात करेंगे। पत्रकारिता के संदर्भ में दो बातें हैं कि इन दोनों महीनों की तारीख पत्रकारिता के पुरोधाओं से जुड़ी हुई है और इन तारीखों का सीधा संबंध कलम से है। मेरी बातें उलझी उलझी लग सकती हैं किन्तु इस पर जब विस्तार से लिखी गयी मेरी बातों को पढ़ेंगे, मनन करेंगे तो षायद आप भी मुझसे सहमत होंगे।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; दादा माखनलाल की विष्व प्रसिद्व रचना है पुश्प की अभिलाशा। इस कविता में उन्होंने फूल की विन्रमता का बखान किया है और इससे जुड़ी बात कलम की मैं कहता हूं। कलम भी आपको विनम्रता सिखाती है। आप देखेंगे कि आमतौर पर कलम नीचे की तरफ होती है अर्थात वह विनम्र है। पत्रकारिता भी विनम्रता सिखाती है और विनम्र पत्रकारिता ही दुनिया बदलने की ताकत रखती है। तलवार नीचे की तरफ होगी तो वह भीरूपन का परिचायक होगी किन्तु कलम ऊपर की तरफ होगी तो उसकी अकड़ दिखेगी। क्या कलम अकड़ दिखा सकती है? नहीं, कभी नहीं। कलम की प्रकृति रचने की है, सिखाने की है और रचियता हमेषा विनम्र होता है। जो लोग आस्तिक नहीं हैं वे भी इस बात को मानेंगे कि ईष्वर, अल्लाह, ईषु, गुरूनानक किसी ने भी, कहीं भी विनयषील व्यवहार के अलावा कोई सीख नहीं दी है। &lt;br /&gt;जब हम यह मानते हैं कि कलम विन्रम है तो भला हममें विनम्रता क्यों नहीं आना चाहिए। पत्रकारिता का दायित्व समाज के किसी भी दायित्व से बड़ा है। दूसरे दायित्व कम नहीं हो सकते हैं किन्तु उनमें कहीं न कहीं, लाभ की लालसा बनी होती है किन्तु पत्रकारिता में लाभ का कोई लोभ नहीं होता है। पत्रकारिता सहज रूप् से एक सुंदर, विचारवान और विकसित समाज की रचना करने की कोषिष है। कुछ लोग इस बात को हजम नहीं कर पाएंगे कि आज जब चौतरफा पत्रकारिता के व्यवसायिक हो जाने की बात चल रही है, कदाचित प्रमाणित भी हो चुकी है तब मेरा यह कहना केवल काल्पनिक बातें हो सकती हैं। मेरा उन सभी लोगों से आग्रह है कि वे इसे दूसरी नजर से देखें। पत्रकारिता तो आज भी नफा-नुकसान से परे है। आप एक पत्रकार हैं तो आप खबर लिखते हैं समाज के लिये किन्तु जिस कागज पर खबर छपती है वह वस्तु है और वस्तु का सौदा होता है। आपकी लिखी खबर षब्द सत्ता है और इसकी कोई कीमत नहीं होती है। पत्रकार का लाभ इतना ही होता है कि उसे जीवनयापन के लिये वेतन के रूप् में कुछ हजार रुपये मिल जाते हैं। यदि आप और हम पत्रकार नहीं भी होते तो किसी और व्यवसाय में भी यही करते। संभवतः इसलिये ही हमें श्रमजीवि कहा जाता है क्योंकि श्रम ही हमारे जीवन का आधार है। हम सरस्वती के उपासक हैं और हमारी उपासना का माध्यम हमारी कलम है। इस कलम की विन्रमता देखिये कि यदि इसे आप सीधा कर देते हैं तो यह लिखने का उपक्रम रोक देती है किन्तु जैसे ही यह झुकती है, वह नदी के पानी की तरह बहने लगती है। हमारे विचार और कलम की स्याही एक सुंदर अभिव्यक्ति का माध्यम बनते हैं। &lt;br /&gt;मेरा यह विचार महज एक लेख नहीं है बल्कि एक आग्रह है उस युवा पत्रकार पीढ़ी से जो इस महायज्ञ में षामिल तो हो गये हैं किन्तु उन्हंे अपनी ताकत का अहसास नहीं है। वे हर समय भ्रम की स्थिति में रहते हैं। अच्छा लिखना जानते हैं, अच्छा सोचते हैं और अच्छा करने का जज्बा भी उनमें है किन्तु उन्हें इस बात का इल्म नहीं है&amp;nbsp; िकवे फकीरी के पेषे में आये हैं। वे लिखेंगे तो समाज और देष में षुचिता का निर्माण होगा और उनके इस लिखे से अखबार का मालिक कदाचित मालामाल बनेगा। षुचिता और माल के बीच हमारी नयी पीढी को तय करना होगा कि वे आखिर उनका रास्ता क्या हो? वे माल की तरफ भागें या समाज में षुचिता के लिये जो जवाबदारी उनके कंधों पर है, उसे पूरा करें। इस बात को लिखने में मुझे परहेज नहीं है कि हममे से अनेक दिग्गज पत्रकार भावी पीढ़ी में कलम का संस्कार उत्पन्न करने के बजाय कमाने की संस्कृति पैदा कर रहे हैं। भावी पत्रकारों को इस गफलत में नहीं पड़ना चाहिए। हमें महान पत्रकार दादा माखनलाल की पत्रकारिता को, गांधीजी की पत्रकारिता को स्मरण में रखकर कलम के संस्कार को आगे बढ़ाना है। झुकने का अर्थ समझौता नहीं है बल्कि यह विनम्रता है और पत्रकारिता विनम्रता की पहली सीढ़ी है। पत्रकारिता के अवधूतों के प्रसंग में जो बातें लिखी हैं, वह मेरी भावना है और मेरा विष्वास है कि कलम के संस्कार की पत्रकारिता हमेषा अपनी आभा बिखरेते रहेगी।(लेखक मीडिया एवं सिनेमा की षोध पत्रिका समागम के सम्पादक एवं मीडिया अध्येता हैं।)&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-6918612610006259889?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/6918612610006259889/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/04/ajj-kal.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/6918612610006259889'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/6918612610006259889'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/04/ajj-kal.html' title='ajj-kal'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-8018407610835672990</id><published>2011-04-20T11:45:00.000-07:00</published><updated>2011-04-20T11:45:20.720-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bat-bebat'/><title type='text'>bachpan bachye</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;बचपन को ईमानदार बनाना जरूरी&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;-मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अन्ना हजारे ने बेइमानों के खिलाफ हल्ला बोल दिया है। देखते ही देखते सैकड़ों लोग उनके मुरीद हो गये हैं। अपनी बात कहने के पहले अन्ना हजारें को मेरा सलाम। इस मुहिम से जुड़े कितने लोगों का यह मालूम है कि वास्तव में भ्रश्टाचार होता क्या है? पहली बात तो यह कि जो लोग अन्ना हजारे के साथ बेइमानों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं अथवा हो गये हैं, उनमें से ऐसे कितने लोग हैं जो राषनकार्ड बनवाने, रेल में आरक्षण पाने, टेलीफोन के बिल पटाने में बचने की कोषिष, बिजली की चोरी या ऐसे ही रोजमर्रा की जरूरत को जल्द से जल्द निपटा लेेने के लिये रिष्वत नहीं दिया है? मेरे खयाल में कुछ प्रतिषत को ऐसे लोग होंगे किन्तु इनकी संख्या मुट़ठी भर होगी और उन लोगों की तादात अधिक होगी जो कहेंगे कि बेइमानी तो अब हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है यानि भ्रश्टाचार को षिश्टाचार मानने और बताने वालों की संख्या अधिक है। क्या हम ऐसा सोचकर अथवा अपना समय बचाने के लिये जो बेइमानी कर रहे हैं, क्या वह इस मिषन के खिलाफ नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दरअसल जीवन में बहुत सारी ऐसी गलतियां हम करते हैं और कर रहे हैं जिन्हें हम बेइमानी नहीं मानते हैं। अक्सर यह बात कही जाती है कि फलां अफसर बेहतरीन काम करता है। क्या किसी के पास जवाब है कि एक सरकारी मुलाजिम, भले ही वह अफसर क्यों न हो, सरकार खराब काम करने का वेतन देती है? जवाब ना में होगा तो फिर भला हम क्यों इनकी तारीफ के पुल बांधे? हमें इस बात का इल्म भी नहीं होता है कि एक आदमी की तारीफ करने से दूसरे अनेक लोगों में हीनभावना घरकर आती है जिससे पूरा तंत्र प्रभावित होता है और कदाचित बेइमानी की षुरूआत यहीं कहीं से होती है। सिर्फ पैसा लेना ही भ्रश्टाचार नहीं है बल्कि इसकी कहानी एक बड़े केनवास पर है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जनलोकपाल बनना चाहिए और सरकार के साथ साथ पूरे देष को इसके लिये पहल करनी चाहिए किन्तु यह जनलोकपाल कागजी घोड़ा न बन कर रह जाए। मध्यप्रदेष में लोकसेवा गारंटी अधिनियम लागू है। काम की समय-सीमा भी सरकार ने तय कर दी है किन्तु वास्तव में क्या ऐसा हो रहा है? इस बात की पड़ताल की जानी चाहिए। सरकार ने ऐलान कर दिया कि षासकीय सेवकों को भ्रश्टाचार के लिये दंडित किया जाएगा किन्तु आज तक कितने ऐसे भ्रश्टों को सजा मिली है, सरकार बताने की स्थिति में नहीं है। छापे डल रहे हैं, माल निकल रहा है और एक नया भ्रश्ट बाहर आ रहा है किन्तु जांच पर जांच और तारीखों पर तारीख के चलते मामला जस का तस बना हुआ है। सरकार कह सकती है कि हम बेइमानों को पकड़ने की कोषिष कर रहे हैं किन्तु दंड तो तभी मिलेगा जब अपराध साबित होगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मेरी अपनी निजी सोच यही है कि अन्ना हजारे जैसे इस देष में सौ-पचास नहीं बल्कि लाखों की संख्या में ईमानदार लोग हैं जिनके लिये पैसे से बढ़कर वतन है। ऐसे लोगों को सामने लाइये और लोगों के लिये उन्हें रोल मॉडल के तौर पर प्रस्तुत कीजिये। आज की पीढ़ी तो भ्रश्टाचार में डूब चुकी है। बचाना है तो भविश्य को बचाइए। बचपन को बचाइए। उन्हें सिखायें कि ईमानदारी का फल क्या होता है। हर पिता, हर माता अपने बच्चों को नेक कथायें पढ़ायें और उनमें संयम उत्पन्न करें। धीरज रखना सिखायें न कि काम निकालने के लिये रिष्वत देकर समय बचाने की आदत डालें। उन्हें लोभ और लालच से बचायें। बच्चों को बचा लिया तो आप यकिन मानिये कि हमारा आने वाला कल बेइमान नहीं होगा। एक अन्ना हजारे के सामने आने से देष का भला नहीं होने वाला और न ही बेइमानों का पत्ता साफ होगा। यह कांेषिष जारी रहना चाहिए लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है बचपन को बचाना। बचपन बचा लिया तो मान लीजिये कि भ्रश्टाचार की जंग आपने जीत ली है। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-8018407610835672990?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/8018407610835672990/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/04/bachpan-bachye.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8018407610835672990'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8018407610835672990'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/04/bachpan-bachye.html' title='bachpan bachye'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-3557011147616288173</id><published>2011-03-15T04:35:00.000-07:00</published><updated>2011-03-15T04:35:59.961-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>SAMAGAM</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;मासिक पत्रिका  समागम अब&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt; मीडिया और सिनेमा की शोध पत्रिका&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="https://lh4.googleusercontent.com/-VAqH2Q0wTss/TX9Ottiag3I/AAAAAAAAADs/T7Id-3P1U-k/s1600/SAMAGAM.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="https://lh4.googleusercontent.com/-VAqH2Q0wTss/TX9Ottiag3I/AAAAAAAAADs/T7Id-3P1U-k/s1600/SAMAGAM.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;भोपाल।&lt;/strong&gt;  विगत दस सालों से निरंतर प्रकाशित हो रही मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका  समागम अब मीडिया और सिनेमा की शोध पत्रिका के रूप में प्रकाशित होगा। समागम  का पंजीयन शोध पत्रिका के रूप में हो चुका है। मार्च 2011 का अंक शोध  पत्रिका के रूप में आया है। समागम के इस नये अंक में पांच अलग अलग शोध  पत्रों का प्रकाशन किया गया है। मीडिया और सिनेमा शोध पत्रिका के रूप में  प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका संभवतः अपनी तरह की इकलौती पत्रिका है। इस  आशय की जानकारी समागम के सम्पादक मनोज कुमार ने दी।    &lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;पत्रिका समागम&lt;/strong&gt;  के बारे में वे बताते हैं कि मीडिया में शोध और अनुसंधान खूब हो रहे हैं  किन्तु इन पर शोध पत्रिकाओं की कमी है। कोशिश होगी कि समूची दुनिया में हो  रहे शोध  अनुसंधान को प्रकाशित  किया जाए ताकि पत्रकारिता की नयी पीढ़ी को  इससे लाभ हो सके।   शोध पत्रिका समागम का मार्च 2011 का अंक मीडिया केनवास  पर महिलाएं पर केन्द्रीत है। पत्रिका का पूर्व का हर अंक किसी खास मुद्दे  को केन्द्र में रखकर प्रकाशित किया गया है। मीडिया पर गंभीर किस्म की  सामग्री को पत्रिका में प्रकाशित किया जा रहा है। इस पत्रिका का टारगेट  आडियेंस पत्रकारिता के विद्यार्थी एवं स्कॉलर हैं। सम्पादक का यह भी  कहना  है कि पत्रिका में मीडिया एवं सिनेमा पर हो रहे शोध  को प्रमुखता दी जाएगी  किन्तु दूसरे विषयों  पर हो रहे प्रामाणिक एवं सारगर्भित शोधपरक प्रकाशन  सामग्री के लिये भी पत्रिका में स्वागत है।   अप्रेल का महीना पंडित  माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे एवं राजेन्द्र माथुर के नाम है। ये लोग  अपने समय के चर्चित सम्पादक रहे हैं किन्तु आज के दौर में सम्पादक की  स्थिति नही के बराबर है। सम्पादक का स्थान मैनेजर ने ले लिया है। आज के दौर  के इस सामयिक विषय पर समागम का केन्द्रीय सब्जेक्ट होगा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-3557011147616288173?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/3557011147616288173/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/03/samagam.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/3557011147616288173'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/3557011147616288173'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/03/samagam.html' title='SAMAGAM'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='https://lh4.googleusercontent.com/-VAqH2Q0wTss/TX9Ottiag3I/AAAAAAAAADs/T7Id-3P1U-k/s72-c/SAMAGAM.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-6408793266620115405</id><published>2011-02-12T02:46:00.000-08:00</published><updated>2011-02-12T02:46:53.253-08:00</updated><title type='text'>Bharat Bhavan</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;झाडू, सूपा, चलनी, कुटेला और भारत भवन&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;-मनोज कुमार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;झाडू, सूपा, चलनी अब हमारे घरों से बाहर हो रहा है। झाडू की जगह मोप और सूपा और चलनी की जगह मिक्सर ग्राइंडर जैसी आधुनिक मशीनें आ गयी है। कुटेला भी अब विदाई के कगार पर है। कपड़े अब कुटेला की कुटाई से बच जाएंग क्योंकि वाशिंग मशीन के भीतर वह बेहद आहिस्ता आहिस्ता घूम घूम कर सफाई करा सकेगा। आपको भी लग रहा होगा कि लिखने वाला पगला गया है। कहां से झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला की बातें करने लगा है। भला यह भी कोई चीज है जिस पर चर्चा की जाए?&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;आपकी तरह मुझे भी तकरीबन बीस बरस पहले ऐसा ही लगा था। तब जब मैं पहली दफा भारत भवन गया था। भारत भवन में एक हिस्सा इन चीजों के लिये सुरक्षित रख दिया गया है। पहली पहली दफा जब मैंने इन सामानों को देखा तो मुझे हंसी आ गयी। समझ में नहीं आया कि हमारे जीवन की रोजमर्रा की जरूरतों की इन चीजों को भला यहां क्यों सजा कर रखा गया है। मैं अपनी जगह गलत नहीं था क्योंकि मैं महानगर का रहने वाला नहीं था और न ही उस रईस परिवार से मेरा कोई वास्ता था जिनकी दुनिया हर घंटे में बदल जाया करती है। मैं तो कस्बानुमा शहर रायपुर से भोपाल अपने अखबारी नौकरी के सिलसिले में भोपाल आ गया था। तब मध्यप्रदेश विभाजित नहीं था।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;मैं एक पत्रकार और लेखक होने के नाते बार बार और कई बार भारत भवन का चक्कर लगाया। मेरी जिज्ञासा थी कि रोजमर्रा की जरूरतों की चीजों को इतना सहेज कर क्यों रखा गया है। किसी से पूछने का साहस भी नहीं हुआ। मेरे अपने सवाल और सवाल का जवाब ढूंढ़ने की स्वयं की चुनौती। कई बार जाने के बाद आखिरकार मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल ही गया। मैं आज से आगे चलकर देखने लगा। उस बदलती दुनिया की कल्पना करने लगा जब आहिस्ता आहिस्ता ये सारी चीजें खत्म हो जाएंगी तब बच्चों को बताने और समझाने के लिये भारत भवन का यह हिस्सा काम आएगा।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;समय ने करवट ली। इन बीस बरसों में दुनिया ही बदल गयी। उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों के घरों से झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला बाहर हो गया। उनकी जगहों पर आधुनिक मशीनों ने अपना स्थान बना लिया। जमाना बदल रहा है किन्तु आम मीडिल क्लास फेमिली आज भी झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला पर आश्रित है। वह दिन दूर नहीं जब इनके घरों से भी इन सामानों की विदाई हो ही जाएगी।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला की बात करते समय मुझे अपने एक भाई शेषप्रकाशजी की तीस बरस और शायद कुछ ज्यादा पुरानी बात याद आ जाती है। वे बता रहे थे कि उनकी नातिन मुंबई से रायपुर आयी थी। भाईसाहब के घर गाय पलती थी। मुंबई में जन्मी इस नन्हीं बच्ची ने न कभी गाय देखा था और न गाय का तबेला। उसके लिये यह एकदम नयी चीज थी। &amp;nbsp;उसने अपने नाना से बेसाख्ता सवाल कर डाला- वोह दिस इस काउ। हम सब उसकी अज्ञानता पर मुस्करा पड़े लेकिन आज मुंबई तो छोड़िये, भोपाल के बच्चों के लिये भी यह सब हैरत में डालने वाली चीजें हैं। यूज एंड थ्रो और पाउच संस्कृति में गाय, गांव और किसान बीती बातें बन कर रह जाएंगे।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;बहरहाल, वापस भारत भवन प्रसंग पर। अचानक आज हाथ में फैशन की एक महंगी पत्रिका आ गई। महंगे खूबसूरत कागज और वैसी ही छपाई। पत्रिका मुझ जैसे मध्यमवर्गीय पत्रकार-लेखक के लिये तो हो नहीं सकती। खैर, इस पत्रिका में वह सब उत्पाद शामिल थे जो धनाड्य परिवार उपयोग में लाते हैं किन्तु इसके&lt;br /&gt;दो या शायद तीन पन्ने पर छपी एक फीचर स्टोरी मेरा ध्यान आकर्षित कर गयी। इस लेख में झाडू को लगभग दुर्लभ बताते हुए एक संग्रहालय का उल्लेख किया गया था। रूचिकर विषय था सो पढ़ लिया लेकिन इसके साथ ही मैं तकरीबन बीस बरस पहले की दुनिया में जा पहुंचा। बीस बरस पहले जो विषय मेरी जिज्ञासा का सबब था, आज वही विषय मेरे आसपास है। बदलती दुनिया के साथ झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला की यादें लिये उस किसान की तरह वापस लौटने की कोशिश कर रहा हूं जब भारत को सोने की चिड़िया और किसानों को अन्नदाता कहा जाता था।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-6408793266620115405?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/6408793266620115405/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/02/bharat-bhavan.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/6408793266620115405'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/6408793266620115405'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/02/bharat-bhavan.html' title='Bharat Bhavan'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-6698240978917371050</id><published>2011-01-29T16:46:00.000-08:00</published><updated>2011-01-29T16:46:57.448-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>Mahtma Gandhi</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: white;"&gt;साथियों, &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: white;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: white;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: white;"&gt;आज उस महात्मा की पुण्यतिथि है जिन्हें हम महात्मा गांधी के नाम से जानते हैं। महात्मा को भारतीय पत्रकारिता के एक छोटे से प्रतिनिधि की हैसियत से इस लेख के माध्यम से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;महात्मा की पत्रकारिता दिल्ली से देहात के बीच&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;-मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_AAc9TdcmpQU/TUS0qTkJ51I/AAAAAAAAADk/oZSDAR8Tsu8/s1600/Mahatma-Gandhi-2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" s5="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_AAc9TdcmpQU/TUS0qTkJ51I/AAAAAAAAADk/oZSDAR8Tsu8/s1600/Mahatma-Gandhi-2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;महात्मा की पत्रकारिता और वर्तमान समय को लेकर विमर्श हो रहा है और यह कहा जा रहा है कि महात्मा की पत्रकारिता का लोप हो चुका है। बात शायद गलत नहीं है किन्तु पूरी तरह ठीक भी नहीं। महात्मा की पत्रकारिता को एक अलग दृष्टि से देखने और समझने की जरूरत है। महात्मा की पत्रकारिता दिल्ली से देहात तक अलग अलग मायने रखती है। पत्रकारिता का जो बिगड़ा चेहरा दिख रहा है वह महानगरीय पत्रकारिता का है। वहां की पत्रकारिता का है जिन्हें एयरकंडीशन कमरों में रहने और इसी हैसियत की गाड़ियों में घूमने का शौक है। पत्रकारिता का चेहरा वहां बिगड़ा है जहां पत्रकार सत्ता में भागीदारी चाहता है और यह भागीदारी महानगर में ही संभव है। दिल्ली से देहात की पत्रकारिता के बीच फकत इसी बात का फरक है। दिल्ली की पत्रकारिता से महात्मा पत्रकार दूर हैं तो देहाती पत्रकारिता में वे आज भी मौजूद हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस अर्थ में पत्रकार महात्मा की इस दौर में अनुपस्थिति शायद ठीक ही है। पत्रकारिता का आज जो हाल है उसे देखकर पत्रकार महात्मा स्वयं को माफ नहीं कर पाते। वे पत्रकारिता को समाजसेवा का साधन मानते थे किन्तु पत्रकारिता आज स्वयं के जीवन का साध्य बन कर रह गयी है। आजादी के साढ़े छह दशक में पत्रकारिता ने अनेक बदलाव देखे हैं। इन बदलाव की पत्रकारिता गवाह रही है। विदेशी आक्रमण से लेकर देश के भीतर इमरजेंसी को पत्रकारिता ने करीब से देखा है। आज वही पत्रकारिता पेडन्यूज छापने के लिये रोज ब रोज दागदार हो रही है। ठीक ही है कि पत्रकार महात्मा गांधी इस समय हमारे साथ नहीं हैं। उनकी पत्रकारिता आज के दौर में छिन्न-भिन्न हो गयी है। सत्ता को रास्ता बताने वाले सत्ता के साथ चलने लगे हैं। आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति को उसका हक दिलाने वाली पत्रकारिता उनका हक छीनने में आगे हो गयी है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;महात्मा की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता को जांचने के पहले कुछ बुनियादी बातों की चर्चा कर लेना सामयिक होगा। पत्रकार महात्मा द्वारा पत्रकारिता के लिये बताये गये मानदंड और आज की पत्रकारिता के मानदंड में कोई साम्य नहीं है। दोनों की पत्रकारिता एक तरह से नदी के दो पाट की तरह हो गये हैं जो चलेंगे तो साथ साथ किन्तु कभी मिल नहीं पाएंगे। पत्रकारिता की बात होगी और पत्रकारिता के लिये पत्रकार महात्मा को याद किया जाएगा किन्तु जब उनके बताये रास्ते पर चलने की बात होगी तो दोनों वापस नदी के दो किनारों की तरह हो जाएंगे। यह बात तो शीशे की तरह साफ है कि आज की पत्रकारिता में महात्मा की पत्रकारिता का लोप हो चुका है किन्तु क्या यह सच नहीं है कि इतना स्याह हो जाने के बाद भी पत्रकारिता की बुनियाद उन्हीं बातों पर टिकी है जो पत्रकार महात्मा बता गये थे। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पत्रकार महात्मा के साथ साथ चलते हुए इस दौर के महान पत्रकारों के बारे में बात करना लाजिमी होगा। पत्रकारिता की जो बुनियादी बातें हैं उनमें पहला है पत्रकारिता की निष्पक्षता। दूसरी बात है पत्रकारिता का तथ्यों को तटस्थ होकर पाठकों के समक्ष रखना न कि न्यायाधीश बनकर फैसला देना। तीसरी बात पत्रकारिता को व्यवसाय न बनाना। फौरीतौर पर तीनों ही बातें पत्रकारिता से खारिज कर दी गयी लगती हैं किन्तु सच यह है कि पत्रकारिता आज भी इन्हीं तीन बातों के कारण जनमानस की आवाज बनी हुई है। जीवन जीने के बुनियादी अधिकार को दिलाने में पत्रकारिता हमेशा से सक्रिय रहा है किन्तु कभी इस पर चर्चा नहीं की गई। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नीरा राडिया मामले में पत्रकारिता की जो भूमिका रही हो उसको लेकर ऐसा हंगामा हो रहा है कि मानो पत्रकारिता नेस्तनाबूद हो गई हो। पत्रकारिता पर कयामत आ गयी हो गई। जो लोग इस मामले को लेकर हंगामा कर रहे हैं वे शायद भूल गये हैं कि अरूण शौरी आज भले ही राजनेता के रूप में स्थापित हों किन्तु उन्हीं की कलम का कमाल था कि तीन दशक बाद भी बोफोर्स का मामला खत्म नहीं हुआ। मेरा सवाल है कि नीरा राडिया के साथ चलने वाले दस पांच पत्रकारों के नाम आ भी गये तो हंगामा क्यों होना चाहिए? क्यों कभी किसी ने अरूण शौरी से सवाल नहीं किया कि उन्हें राजनीति में आने की क्या जरूरत थी? अब अरूण शौरी के नक्शेकदम पर बाद की पत्रकारिता की पीढ़ी चलती है तो इसे सहज रूप में लेना चाहिए। समाज के हर वर्ग में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो अपने उद्देश्य से भटकते नजर आते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दिल्ली और देहात की पत्रकारिता का फर्क वास्तव में यही तो है। दिल्ली की पत्रकारिता नदी का एक किनारा है और जो आज का सच है तो देहात की पत्रकारिता नदी का दूसरा किनारा है जो महात्मा की पत्रकारिता है। एक सच यह भी है कि ऐसे पत्रकारों के खिलाफ लिखकर पत्रकारों का एक वर्ग वाहवाही लूटना चाहता है। मुद्दा तो यह है कि इतना हंगामा करने और लिखने के बाद कथित दोषी पत्रकारों को समाज ने बहिष्कृत क्यों नहीं किया। जिस प्रभु चावला को एक प्रबंधन ने सीधी बात कर हटा दिया तो दूसरे प्रबंधन ने सच्ची बात कहने के लिये अपने साथ ले लिया। अब इसे कौन तय करेगा कि प्रभु चावला को दोष के कारण हटाया गया या इस दोष के चलते उनकी ख्याति को भुनाने के लिये दूसरे ने अपने साथ ले लिया। दिल्ली की पत्रकारिता में सबकुछ चलता है किन्तु देहात की पत्रकारिता में इस तरह की छूट नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पत्रकार महात्मा की उस पंक्ति को याद कर लेना सामयिक होगा जिसमें वे कहते हैं कि कम समय में सच को जांच लेना मुश्किल होता है और इसलिये अच्छा है कि ऐसा लिखा ही न जाए। इस संदर्भ में एक अनुभव स्मरण हो रहा है देहाती पत्रकारिता का जिसे हम महात्मा की पत्रकारिता कह सकते हैं बल्कि कहना चाहिए। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पत्रकारिता में अपना जीवन गुजार चुके पत्रकार ने बताया कि एक बार वे एक महिला को अपनी खबर में वेश्या लिख दिया। महिला की मौत हो चुकी थी। गुस्से में लाल-पीला होता उसका बेटा हाथ में हथियार लिये वह अखबार के दफ्तर में प्रवेश कर गया। गंदी गालियों के साथ वह उस पत्रकार को तलाश करने लगा जिसने यह खबर लिखी थी। उक्त वरिष्ठ पत्रकार का डर जाना स्वाभाविक था किन्तु अपना नाम छिपाते हुए उस युवक से आपत्ति की वजह जाननी चाही। युवक को खबर में अपनी मां को वेश्या लिखे जाने पर आपत्ति थी और उसका तर्क था कि क्या उसकी मां को किसी सरकार ने या शासन ने लायसेंस दिया था, यदि नहीं तो किस आधार पर यह लिखा गया।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;युवक का गुस्सा जायज था। वरिष्ठ साथी को अपनी गलती का अहसास हुआ और आगे से दुबारा बिना जांचे कोई खबर नहीं लिखने की कसम खा ली। गांधीजी यही बात कहते थे। इस अनुभव का अर्थ यही है कि देहात की पत्रकारिता में महात्मा की पत्रकारिता आज भी मौजूद है किन्तु दिल्ली की पत्रकारिता में नहीं है। यदि ऐसा होता तो नैतिकता के नाते ही सही, आरोपों के जद में आये पत्रकार अपने वर्तमान दायित्व को स्वेच्छा से छोड़कर स्वतंत्र रूप से लेखन करते किन्तु आज के दौर की पत्रकारिता में यह कहां संभव है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;थोड़ी देर के लिये मान लिया जाए कि जिन पत्रकारों के नाम आरोपों की जद में आये हैं, उनसे पत्रकार बिरादरी ने नाता तोड़ लिया है क्या? क्या उन्हें जिन पत्रकार संगठनों की मान्यता या संबद्धता है, उनसे अलग कर दिया गया है, शायद यह भी नहीं। क्या पत्रकारों ने उनसे विमर्श बंद कर दिया है, शायद यह भी नहीं। जब स्वयं पत्रकार बिरादरी में इतना साहस नहीं है तो बेवजह अखबार के पन्ने और आम आदमी का वक्त जाया करने की जरूरत ही क्या है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इसमें जीवन के सभी रंग समाये हुए हैं। जिसमें खुशियों की इंद्रधनुषी रंग हैं तो कुछ स्याह हिस्सा भी है। नीरा मामले में जो कुछ घटा और पत्रकार कथित आरोपों से घिरे अपने उन साथियों के बारे में लिखा है और लिख रहे हैं तो यह साहस पत्रकारिता में ही हो सकता है। किसी अन्य पेशे में यह साहस नहीं हो सकता बल्कि हरचंद कोशिश की जाती रहती है कि किस तरह साथी को बचाया जा सके। इस तरह के अनेक उदाहरण समाज के पास हैं जिन्हें पत्रकारिता ने बेनकाब किया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कितना भी कठिन दौर क्यों न हो, पत्रकारिता अपने बुनियादी उसूलों से मुंह नहीं मोड़ सकता है। ठीक उसी तरह जिस तरह एक वकील यह जानते हुए भी कि उसका मुवक्किल एक अपराधी है किन्तु उसे बचाने का यत्न करता है क्योंकि फीस उसने उसे बचाने की ली है। एक डाक्टर की तरह जो कितना भी निर्माेही हो किन्तु मरीज को देखना नहीं भूलता है। यहां मैं अपवादों की बात नहीं करता बल्कि उन सच्चाईयों की बात कर रहा हूं जिसे पत्रकारिता कहते हैं। आज पत्रकार महात्मा होते तो यह देखकर इत्मीनान कर लेते कि इस कठिन समय में पत्रकार अपना दायित्व निभा रहे हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-6698240978917371050?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/6698240978917371050/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/01/mahtma-gandhi.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/6698240978917371050'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/6698240978917371050'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/01/mahtma-gandhi.html' title='Mahtma Gandhi'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_AAc9TdcmpQU/TUS0qTkJ51I/AAAAAAAAADk/oZSDAR8Tsu8/s72-c/Mahatma-Gandhi-2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-8032348262938882994</id><published>2011-01-26T19:52:00.001-08:00</published><updated>2011-01-26T19:57:04.308-08:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: yellow;"&gt;निर्गुण पद्म&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;-मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मध्यप्रदेश के प्रहलाद टिपणिया को इस वर्ष का पद्मश्री से सम्मानित किया जाना पद्मश्री निर्गुण है, इस बात को एक बार फिर स्थापित किया है। प्रहलाद कोई राजनैतिक शख्शियत नहीं है और न ही वह कोई पहुंच रखने वाले परिवार का वारिसदार। वह एक लोक गायक है जो बीते पच्चीस बरस से कबीर के शब्दों को अपनी आवाज देकर दुनिया में उजाला फैलाने में लगा हुआ है। प्रहलाद को यह सम्मान मिलना इस बात का संदेश है कि यह सम्मान आज भी निर्गुण बना हुआ है और आगे भी निर्गुण मन को मिलता रहेगा। अखबारों में, खासकर मध्यप्रदेश के अखबारों में प्रहलाद को पद्मश्री मिलने की खबर को प्रमुखता नहीं मिली है, जो मेरे लिये दुख का कारण हो सकता है। प्रशासनिक और राजनीतिक क्षेत्रों के लोगों को यह सम्मान मिलना कोई बड़ी बात नहीं है किन्तु एक लोकगायक का यह सम्मान अर्थात पद्मश्री का सम्मान है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मालवा की माटी का यह सपूत कबीर की तरह निर्गुण है। लोभ लालच से परे जब वह कबीर के पदों को गाता है तो सुनने वाले ठिठक जाते हैं। पच्चीस बरस से कबीर और प्रहलाद का जादू दुनिया पर चल रहा है। इस निर्गुणी गायक का सम्मान पहली दफा नहीं हुआ है बल्कि संगीत नाटक अकादमी दिल्ली और मध्यप्रदेश का सर्वाेच्च शिखर सम्मान से भी उन्हें नवाजा जा चुका है। प्रहलाद टिपणियां की आवाज का जादू मालवा के माटी में रचा बसा तो है ही वाराणसी के कबीर चौरा को भी यह आवाज गूंजती है। कबीर फांउडेशन इसका दस्तावेजीकरण कर रही है तो प्रहलाद की मीठी तान अमेरिका तक गंूजने लगी है। प्रहलाद को अपनी भारत की धरती के लोगों को रूढ़ियों के खिलाफ जगाने से फुर्सत नहीं मिली है सो वह अमेरिका नहीं गये। अमेरिकी प्रोफेसर को लगा कि ऐसे निर्गुणी के पास खुद को आना चाहिए वह तलाश करती हुई मालवा के गांव लुनियाखेड़ी पहुंच गयी। प्रोफेसर डॉ. लिंडा हैंस कबीर की वाचिक परम्परा पर शोध कर रही हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;प्रहलाद से अनेक बार मुलाकात हुई। भोपाल में तो अनेक बार। एक बार दिल्ली में भी उन्हें सुनने का अवसर मिला। प्रहलाद को सुनना हर बार एक नये रूप में होता है। मन भरता ही नहीं। कबीर को पढ़ा है और प्रहलाद को सुना। दोनों को मिला दो तो एक नये रूप से आपका परिचय होगा। कदाचित मुझे लगता है कि जो लोग समाज बदलने की बात मंचों पर चिल्ला चिल्ला कर कर रहे हैं, वे एक बार प्रहलाद के मुख से कबीर की वाणी सुन लें तो वे स्वयं बदल जाएंगे। प्रहलाद टिपणियां आज भी वैसा गायक है जिसकी आवाज में बनावट नहीं है। उसका ध्येय रूढ़ियों खिलाफ समाज को जगाने का है और वह इस सिलसिला को आगे बढ़ा रहा है। वह कहता है कबीर तो बेराग है, उसके शब्दों में संदेश है। वह समाज को एक नये स्वरूप में देखना चाहता है। प्रहलाद टिपणियां कहते हैं- सब काहू से लीजिए, सांचा शब्द निहार। शायद अब इसके बाद कुछ कहने, लिखने और बताने की जरूरत नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-8032348262938882994?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/8032348262938882994/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/01/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8032348262938882994'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8032348262938882994'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title=''/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-1096187622692583711</id><published>2011-01-24T02:42:00.000-08:00</published><updated>2011-01-24T02:42:41.131-08:00</updated><title type='text'>hamare log</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;जन्मदिन पर विशेष&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966; color: red;"&gt;लक्ष्मीकांतजी को जन्मदिन मुबारक&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;मनोज कुमार&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_AAc9TdcmpQU/TT1XZFbwAvI/AAAAAAAAADc/8HOX0v4o7tI/s1600/images.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" s5="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_AAc9TdcmpQU/TT1XZFbwAvI/AAAAAAAAADc/8HOX0v4o7tI/s1600/images.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;बात लगभग डेढ़ साल पुरानी होगी। भोपाल में पत्रकारिता की कुछ किताबों&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;का विमोचन था। इन किताबों में मेरी भी एक किताब थी। मुख्यअतिथि के&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;रूप में वर्तमान में जनसम्पर्क, संस्कृति और उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा &lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;मौजूद थे। आमतौर पर जैसा होता है वही हुआ। इस मंच से भी पत्रकारिता &lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;के अवमूल्यन की बातें हो रही थी। कार्यक्रम में मौजूद अतिथिगण पत्रकारिता &lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;के अवमूल्यन को लेकर चिंता जाहिर करने के साथ ही पत्रकारों को सदाशयता की सीख देना नहीं भूले।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;इन अतिथियों के बीच मुख्यअतिथि के रूप में जब लक्ष्मीकांतजी बोलने को उठे तो एकबारगी लगा कि वे भी कुछ ऐसा ही बोलेंगे। आरंभ में मेरी कोई रूचि उनको सुनने में नहीं थी किन्तु जब उन्होंने बोलना शुरू किया तो उनका संबोधन चैंकाने वाला था। उन्होंने इस बात को खारिज नहीं&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;किया कि पत्रकारिता का अवमूल्यन हुआ है किन्तु वे इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं दिखे। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि किस तरह देहात के पत्रकार अलग अलग किस्म की समस्याओं से जूझते हुए दायित्व की पूर्ति करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;स्थानीय होने के नाते इन पत्रकारों को कभी थानेदार से तो कभी पटवारी&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;से तो कभी पंचायत अध्यक्ष से स्वयं को बचाना होता है। उनकी बातें सुनकर&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;मैं दंग था। मेरे साथ बैठे कुछ पत्रकार साथी भी इस बात से सहमत थे कि&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;वास्तविकता यही है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;कुछ इस तरह अपरोक्ष रूप से लक्ष्मीकांतजी को एक मंत्री के रूप में मैंने&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;पहिचाना। वे पत्रकारिता के लिये जितना सजग और सर्तक हैं उतना ही संस्कृति और शिक्षा के लिये भी। संस्कृति विभाग के आयोजनों में शामिल होना और गंभीरता से कार्यक्रमों को लेना उनकी प्रवृत्ति में है। उच्च शिक्षा की बेहतरी के लिये उनके प्रयास साफ दिखते हैं। शिक्षा माफिया को खत्म करने की दिशा में पिछले दिनों उठाये गये कदम उनकी सख्ती की एक मिसाल है। उनका मानना है कि शिक्षा मात्र एक साधन नहीं बल्कि साध्य है पीढ़ियों को&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;शिक्षित और संस्कारित करने का और वे इसमें कोई घालमेल पसंद नहीं&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;राजनीति में आना अकस्मात नहीं है तो राजनीति में रम जाना भी अकस्मात&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;नहीं है। वे सीधी बात करते हैं। वे कभी यह कहने से संकोच नहीं करते&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;हैं कि पंडिताई उनका संस्कार और रिवाज है। उनकी दिलीइच्छा भी है कि&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;अवसर मिलने पर वे संस्कारपूर्ण आयोजन करेंगे। यजमान कौन मिलता है, यह समय बताएगा। वे जाबांज भी हैं। सड़क दुघर्टना में गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी हताश नहीं हुए बल्कि दुघर्टना को उन्होंने पराजित कर दिया। थोड़े विश्राम के बाद बिस्तर पर लेटे लेटे मंत्रालय के काम निपटाने लगे। मिलने वालों से उसी आत्मीयता से मिलते थे जैसा कि उनका रूटीन पहले था। आहिस्ता आहिस्ता सहारा लेकर चलने लगे। कार्यक्रमों में उपस्थित होने लगे। अब तो उनकी सक्रियता को देखकर कोई कह नहीं सकता कि उनके साथ कभी कोई ऐसा विकट हादसा हुआ होगा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;उम्मीद और उमंग से भरे इस राजनेता को प्रदेश के लोग लक्ष्मीकांत शर्मा&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;के नाम से जानते हैं। आज इस जननेता का जन्मदिन है। जन्मदिन तो इसके पहले भी उन्होंने मनाये होंगे किन्तु यह जन्मदिन उनके लिये विशेष है। हादसे को परास्त कर एक नये जीवन के आरंभ का उनका यह दिन मुबारक दिन है। ऐसे मिलनसार और मृदुभाषी राजनेता को उनके जन्मदिन पर प्रदेश की एक मुस्कान के साथ जन्मदिन की बधाई। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-1096187622692583711?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/1096187622692583711/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/01/hamare-log.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/1096187622692583711'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/1096187622692583711'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/01/hamare-log.html' title='hamare log'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_AAc9TdcmpQU/TT1XZFbwAvI/AAAAAAAAADc/8HOX0v4o7tI/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-3037454865993984904</id><published>2011-01-22T06:22:00.001-08:00</published><updated>2011-01-22T06:22:52.882-08:00</updated><title type='text'>Mera Bhopal</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;ग्रीन नहीं, गरीब सिटी बोलिये....&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ये मेरे शहर को क्या हो गया है? विकास के नाम पर सरेआम मेरे शहर को उजाड़ा जा रहा है। जिन हजारों लोगों की रोजी प्रदूषण से शहर को बचाने के नाम पर छीन ली गयी उन भटसुअर के चालक मालिक भोपाल के पहचान थे बिलकुल वैसे ही जैसे आज काटे जा रहे हरे-भरे पेड़। हम सब खामोश हैं। मिटती हरियाली में हमें विकास दिख रहा है। किसी न किसी रूप में हम सब उन राजनेताओं और नौकरशाहों के साथ खड़े दिख रहे हैं जिनके लिये कल की मुसीबत आज विकास की बुनियाद है। कल्पना कीजिये कि शरीर को जला देने वाली गर्मी में भी भोपाल की सड़कों में ठंडक का अहसास होता था। बारिश में बचने के लिये किसी पेड़ की छांह तले आप खड़े हो जाते थे। जब ये पेड़ ही नहीं बचेंगे तो कौन आपके मन को शीतल करेगा और कौन बरसते पानी से भीगने से आपको बचाएगा। बड़ी खूबसूरत बसें शहर का सीना चीरकर बेदम गति से भाग रही हैं। भला लगता है इन बसों को देखना। इनमे सवारी करना लेकिन जब प्रदूषित हवाएं हम पर सवार हो जाएंगी। बीमारियां जब हमारे गले पड़ जाएंगी तब शायद भोपाल की याद आए। उस भोपाल की जिसे आज दुनिया ग्रीन सिटी के नाम से जानती है। संभव है कि प्रकृति की अकूत सम्पदा सहेजे इस शहर को गरीब सिटी के नाम से जाना जाएगा। कल तक लोग भोपाल में बसने के लिये बेताब थे किन्तु आने वाले कल में लोग भोपाल से भागने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे तो यह समझ नहीं आ रहा है कि अपनी विरासत बड़ी झील को बचाने के लिये श्रमदान करने वाले भोपाली कहां गुम हो गये हैं। अपना वजूद खो बैठी बड़ी झील एक बार फिर इतराती हुई दिख रही है तो उन हजारों लोगों की मेहनत के बदौलत जिन्हें बड़ी झील बचाने का जुनुन था। वो सारे लोग एक बार फिर सड़क पर निकल आएं तो विनाश का यह खेल बंद हो जाएगा। शहर को बचाना हमारी जवाबदारी है। हम कैसे पीछे रह सकते हैं। पेड़ होंगे तो पानी होगा और पानी होगा तो जीवन। पेड़ों के जीने का अर्थ हमारा जीवन का बचना है। इससे जुड़ा एक संकट है पेड़ काटने के बाद कांक्रीट की सड़कों का बनना। कच्ची मुरूमी, डामर की सड़कों से बहने वाला पीने धरती छाती में समा जाती थी लेकिन इन कांक्रीट की सड़कों का क्या करें जो पानी को अपनी ओर रिसने भी नहीं देती हैं। नर्म मुलायम मिट्टी गुस्से से लाल होते सूरज की तपिश को अपने में समा लेती थी। अब इसकी कोई सूरत बचती नहीं दिख हरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी पत्नी चिंतक नहीं है, पत्रकार भी नहीं है। उसकी दुनिया उसके चौके-चूल्हे में है। वह शौकिया चित्रकार है किन्तु उसके भीतर की स्त्री को इस बात अहसास है कि पेड़ों का कटना खुशियों का खो जाना है। घर से बाजार और मेले की तरफ जाती इस गृहणी घर से खुशी खुशी निकलती है और सड़क पर आते आते उसका चेहरा किसी कटे पेड़ की तरह हो जाता है। यह चिंता उस अकेले स्त्री की नहीं है बल्कि शायद हम सबकी है। वो मुझसे अपना दुख बांट लेती है क्योंकि वह एनजीओ नहीं चलाती है जो हल्ला बोल की स्थिति में खड़ी रह सके। वह मुझे कई बार कोसने भी लगती है। कभी कभी तो वह संतों की तरह मेरी चुप्पी पर प्रवचन देने से भी नहीं चूकती है। मेरा धर्म लिखना है और मैं अपने धर्म का पालन कर रहा हूं। मैं जगाने की कोशिश कर रहा हूं। अब देखना है कि ग्रीन सिटी भोपाल को हम लोग गरीब सिटी बन जाने से कब बचा पाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-3037454865993984904?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/3037454865993984904/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/01/mera-bhopal.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/3037454865993984904'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/3037454865993984904'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/01/mera-bhopal.html' title='Mera Bhopal'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-1439576356775554329</id><published>2011-01-12T23:06:00.001-08:00</published><updated>2011-01-12T23:06:51.569-08:00</updated><title type='text'>media</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;समागम अब मीडिया की शोध पत्रिका&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का प्रकाशन अब शोध पत्रिका के&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;रूप में किया जाएगा। यह शोध पत्रिका द्विभाषी होगी।&amp;nbsp; मीडिया का विस्तार हो&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;रहा हैऔर मीडिया शोध का कैनवास भी बड़ा हुआ है किन्तु शोध पत्रिकाओं का&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;प्रकाशन अभी भी नगण्य है। इस कमी को पूरा करने की दृष्टि से एक विनम्र&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;प्रयास विगत दस वर्षाें से प्रकाशित हो रही मीडिया पर एकाग्र मासिक&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पत्रिका समागम करने जा रहा है। पत्रिका का जनवरी २०११ का अंक महात्मा&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गांधी की पत्रकारिता पर केन्द्रित है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का सफर जनवरी&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;२०११ में दस वर्ष पूरे कर फरवरी दो हजार ग्यारह में पत्रिका ग्यारहवें&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वर्ष में प्रवेश करेगी। अपने सफर के दस वर्ष के अनुभव को विस्तार देने&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;तथा मीडिया में शोध प्रकाशन की जरूरत की पूर्ति करने की दृष्टि से समागम&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;का प्रकाशन मीडिया की शोध पत्रिका के रूप में होगा। उन्होंने मीडिया में&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;शोध कर रहे साथियों से प्रकाशन सामग्री भेजने का आग्रह किया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;विज्ञप्ति में जानकारी दी गई है कि समागम के फरवरी अंक से कुछ पन्ने&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सिनेमा पर भी होंगे। सिनेमा में गंभीर लेखन को बढ़ावा दिया जाएगा।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश फिल्म विकास निगम ने पटककथा नामक पत्रिका का&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;प्रकाशन किया था। निगम के बंद हो जाने के साथ ही फिल्म मीडिया की गंभीर&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पत्रिका पटकथा का प्रकाशन भी बंद हो गया। पटकथा की तर्ज पर समागम में&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सिनेमा पर सामग्री दी जाएगी। समागम को शोध पत्रिका के रूप में विकसित&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;करने के साथ ही पत्रिका के पृष्ठों में वृद्धि करने की भी योजना है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;शोध आलेख भेजने के लिये डाक का पता है सम्पादक समागम, ३, जूनियर एमआयजी,&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अंकुर कॉलोनी, शिवाजीनगर, भोपाल-१६ अथवा मेल कर सकते हैं -&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;k.manojnews@gmail.com&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-1439576356775554329?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/1439576356775554329/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/01/media.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/1439576356775554329'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/1439576356775554329'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2011/01/media.html' title='media'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-8498457571249392625</id><published>2010-12-07T20:52:00.000-08:00</published><updated>2010-12-07T20:52:49.844-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>Sarokar</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color: yellow;"&gt;मत रखियों अपनी बिटिया का नाम नीरा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;-मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;शीर्षक पढ़ कर आपको शायद अच्छा न लगे किन्तु सच यही है। जो लोग जिम्मेदार हैं और जिन लोगों से प्रेरणा पाकर समाज उनका अनुसरण करता है वही लोग इस तरह के कर्म करेंगे तो कहना ही होगा कि मत रखियों अपनी बिटिया का नाम नीरा। आइए इस बहाने ही सही एक बार नामकरण पर थोड़ी चर्चा हो ही जाए। भारतीय मानस हमेशा से चर्चित और प्रेरणा देने वालों के नाम पर अपने बच्चों का नामकरण करता आया है। भारतीय समाज में साक्षरता का प्रतिशत भले ही कम हो किन्तु समाज हमेशा से विवेकवान रहा है। जिस समय हर मंच पर नीरा राडिया और नीरा यादव की चर्चा हो रही है। अखबार के पन्नों और टेलीविजन के पर्दे पर उनकी बात कही और सुनी जा रही है तब संभव है कि कुछ माता-पिता इन नामों पर फिदा हो जाएं और जैसे होता आया है हर चर्चित नाम अपने बच्चों के कर दिये जाएं। &lt;br /&gt;राम एक सर्वकालिक चरित्र हैं। चरित्रवान बच्चे की तमन्ना के साथ राम का नाम सदियों से लोग रखते आये हैं और लक्ष्मण को आज्ञाकारी भाई के रूप में देख कर उसका नाम भी स्नेहपूर्वक रखा गया है। भरत को भी समाज ने अनदेखा नहीं किया और अनेक परिवारों में ऐसे नाम रखे गये। समय समय पर इतिहास में नाम दर्ज कराने वाले व्यक्तियों के नाम भी अनेक परिवारों में दर्ज हो गये। भारतीय समाज विवेकवान है इसलिये उसे राम, लक्ष्मण, भरत, सीता, पार्वती, राधा, कृष्ण नाम रखने में कभी संकोच नहीं हुआ किन्तु उसने कभी अपने बच्चे का नाम विभीषण नहीं रखा। ऐतिहासिक तथ्य है कि अपने भाई से विद्रोह कर राम की मदद करने वाले विभीषण को लोग याद करते हैं किन्तु यह नहीं भूलते कि जो अपने परिवार का नहीं हुआ, अपने भाई का नहीं हुआ वह भला हमारा कैसे हो सकता है? ऐसे में उनका नाम किसी ने अपने बच्चे का नाम नहीं बनाया। आधुनिक समाज में भी गांधी और नेहरू के नाम पर हजारों बच्चे मिल जाएंगे, इंदिरा नाम की बच्चियों की तादात भी कम नहीं होगी लेकिन कानून की परिधि से बाहर जाकर काम करने वाले फूलनदेवी, मलखानसिंह और दाउद के नाम वाले शायद ढूंढ़ने से भी न मिले। खिलाड़ियों और फिल्मस्टार के नाम पर तो लगभग हर परिवार में एक चिराग मिल जाए। &lt;br /&gt;इस सिलसिले में मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के एक परिवार की घटना का उल्लेख करना सामयिक होगा। यहां एक पिता ने सानिया मिर्जा के नाम पर अपनी लाडली का नाम रख दिया। सोचा सानिया ने जैसे देश का नाम किया है वैसा ही उसकी बेटी भविष्य में करेगी लेकिन उसे निराशा अपनी बेटी से नहीं सानिया से हुई। सानिया ने पाकिस्तानी से ब्याह का ऐलान किया। सानिया के इस फैसले से दुखी पिता ने तत्काल अपनी बेटी का नाम बदल कर सोनिया कर दिया। पिता को इस बात का भय रहा होगा कि उसकी बेटी एक दिन अपने देश का नाम खराब न कर दें। इसे सहज और स्वाभाविक प्रतिक्रिया मानी जानी चाहिए और उस व्यक्ति के देशप्रेम को सलाम किया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;हमारे देश में इन दिनों नीरा नाम पर ग्रहण लगा हुआ है। नीरा राडिया का नाम खबर की सुर्खियों से धुंधला पड़ा ही नहीं था कि एक और नीरा के कारनामे सुर्खियों में आ गये। ये दूसरी हैं नीरा यादव। नीरा यादव उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यसचिव हैं और उन्हें जमीन घोटाले के मामले में चार साल की कैद सुनायी गयी है। समाज का मूलभूत नियम तो यह कहता है कि एक शक्तिशाली एक निरीह और जरूरतमंद को अपनी तरह शक्तिशाली बनाये किन्तु अनुभव ठीक इसके विपरीत है। नीरा राडिया और नीरा यादव सशक्त स्त्रियों के रूप में सामने आयी हैं किन्तु इन दोनों महिलाओं ने स्त्रियों की दशा सुधारने में कोई प्रयास नहीं किया। समय बतायेगा कि नीरा राडिया और नीरा यादव कितनी सही और गलत थीं लेकिन आज तो यह बात साफ है कि इनकी कमाई के एजेंडे में, लाभ देने वाले लोगों की सूची में पांच गरीब और असहाय महिलाएं भी होती तो समय न सही, समाज का एक वर्ग तो इन्हें माफ कर देता। इस मामले में सच तो यही है कि सशक्त और बलशाली लोगों की कौम एक अलग होती है और निशक्त: और निर्बल लोगों की एक अलग कौम। हम उम्मीद कर सकते हैं कि बार बार नीरा का नाम आ रहा है किन्तु जिस तरह समाज ने विभीषण जैसे नामों से परहेज किया वैसा ही कुछ भाव भी इन नामों के साथ होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-8498457571249392625?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/8498457571249392625/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/12/sarokar.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8498457571249392625'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8498457571249392625'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/12/sarokar.html' title='Sarokar'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-3102976825511072811</id><published>2010-12-03T19:34:00.001-08:00</published><updated>2010-12-03T19:34:55.632-08:00</updated><title type='text'>Samagam</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_AAc9TdcmpQU/TPm20LuQagI/AAAAAAAAADU/fDE57akeJ44/s1600/Graphic2.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" ox="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_AAc9TdcmpQU/TPm20LuQagI/AAAAAAAAADU/fDE57akeJ44/s320/Graphic2.jpg" width="148" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-3102976825511072811?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/3102976825511072811/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/12/samagam.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/3102976825511072811'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/3102976825511072811'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/12/samagam.html' title='Samagam'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_AAc9TdcmpQU/TPm20LuQagI/AAAAAAAAADU/fDE57akeJ44/s72-c/Graphic2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-2786084228171847300</id><published>2010-11-30T22:49:00.001-08:00</published><updated>2010-11-30T22:49:51.302-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>rajniti</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: yellow;"&gt;जो जीता वहीं सिकंदर यानि अब नीतिश और सिर्फ नीतिश&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह माना हुआ सच है कि जो जीता वही सिकंदर और इस अर्थ में इस समय नीतिश कुमार सिकंदर बन गये हैं। बिहार में उन्होंने जो तूफानी जीत हासिल की है उसने उन्हें भारतीय राजनीति का सिरमौर बना दिया है। भारतीय राजनीति, खासतौर पर क्षेत्रीय दलों के लिये वे नये रोल मॉडल के रूप में उभरे हैं। बिहार चुनाव जीतने में उन्होंने किस तरह की रणनीति अपनायी और वे उसमें सफल रहे, इस बात की मीमांसा की जा रही है। यह तो तय है कि ऐसी जीत बिहार में नीतिश कुमार को नहीं मिली होती तो आज उनका कोई नामलेवा नहीं होता और लालूप्रसाद यादव सिरमौर होते। कभी यही हाल लालू प्रसाद का हुआ करता था और उनकी लोकलुभावन शैली प्रादेशिक राजनीति की दिशा बदल दिया करती थी। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भारतीय राजनीति में, खासतौर पर प्रादेशिक राजनीति में पिछले दो दशकों में काफी परिवर्तन देखने को मिला है। एक समय था जब समूचे दलों के लिये प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से गुजरात के नरेन्द्र मोदी रोल मॉडल बन गये थे। उनके हिन्दुत्व का एजेंडा सबको लुभा रहा था। सत्ता के लिये हिन्दुत्व का कार्ड सहज और सरल रास्ता था। गुजरात के बाद उत्तरप्रदेश और बिहार में जाति का कार्ड खेला गया। नीतिश कुमार इसी रास्ते से सत्ता में आये थे और मायावती इसी रास्ते से सत्तासीन हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मोदी जिस हालात में लगातार गुजरात की सत्ता में बने रहे तो राजनीति में उनकी अलग पहचान बन गयी किन्तु मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जब भारतीय जनता पार्टी ने दुबारा सत्ता सम्हाली तो हिन्दुत्व और जातिवाद से परे होकर विकास का मुद्दा सामने आया। इस बार छत्तीसगढ़ के डाक्टर रमनसिंह और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान विकास के रोल मॉडल बन गये। प्रादेशिक राजनीति के ये नये ब्रांड एम्बेसडर बन गये। छत्तीसगढ़ नया राज्य है और इस लिहाज से यह माना गया कि कांग्रेस के विकास के प्रति उपेक्षा ने उन्हें सत्ता में आने नहीं दिया किन्तु मध्यप्रदेश में भाजपा के लिये ऐसा कोई कारण नहीं था। दस बरस के कांग्रेस के कार्यकाल में दिग्विजयसिंह के राज में विकास को पीछे धकलने का आरोप लगा और वे सत्ता से बाहर हो गये किन्तु भाजपा बहुमत के साथ सत्ता में लौटी और आरंभ के दो बरस में दो मुख्यमंत्री बदल दिये गये। विकास का मुद्दा तब भी हाशिये पर था और शिवराजसिंह तीसरे मुख्यमंत्री बने। पहली बार भाजपा और मध्यप्रदेश में गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह को लगातार तीन वर्ष काम करने का अवसर मिला। इस तीन वर्ष में शिवराजसिंह ने महिलाओं, आदिवासियों और किसानों के लिये कुछ काम करने की कोशिश की। राज्य में पूर्व की तरह बिजली, पानी, सड़क आदि की समस्या का कोई बड़ा हल नहीं निकला था किन्तु शिवराजसिंह ने अपनी जीत दर्ज करा दी। लगभग यही स्थिति छत्तीसगढ़ में थी। बावजूद के दोनों राज्यों में भाजपा को मिली जीत को विकास की जीत कहा गया। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बिहार में जो जीत नीतिश कुमार को मिली है वह मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का दुहराव है। कल तक विश्लेषक बिहार की स्थिति को बहुत संतोषजनक नहीं बता रहे थे और नीतिश की वापसी पर भी एकराय नहीं थे किन्तु स्थितियां बदली और नीतिश कुमार के पक्ष में हवा बहने लगी। लालू यादव किनारे कर दिये गये। बिहार में नीतिश कुमार की सरकार लौट आयी और एक बार फिर विश्लेषकों ने इसे विकास की जीत कहा। वैसा ही जैसा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की वापसी पर कहा गया था।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह हो सकता है कि यह जीत विकास की हो किन्तु मेरा मानना है कि यह जीत विकास की न होकर बल्कि विकास को परखने की जीत है। एक नजर से देखें तो अब मतदाता इस बात के लिये तैयार नहीं हैं कि पांच बरस में सरकार बदल दें और आने वाली नयी सरकार फिर से प्रदेश को प्रयोगशाला बना दें। पूर्ववर्ती सरकारों की योजनाओं को तो थोड़ा बदला जाता है किन्तु उन योजनाओं के नाम बदलने पर करोड़ों रुपये और वक्त जाया करते हैं। शायद इस दृष्टि से अब मतदाता ने मन बना लिया है कि कम से कम दो कार्यकाल तो एक सरकार को मिले ताकि उनके द्वारा पहले पांच वर्ष में आरंभ किये गये कार्याें को एक मुकाम तो मिल सके। इन योजनाओं का परिणाम आमजनता देख सके और वह फिर तय करें कि इस सरकार को तीसरा मौका दिया जाना चाहिए या नहीं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस बात को इस तर्क के साथ देखा जा सकता है कि दिल्ली की कांग्रेस सरकार को क्यों मौका मिला? अनेक किस्म की शिकायतें और गुस्सा होने के बावजूद कांग्रेस की जीत का यही एक कारण हो सकता है। पश्चिम बंगाल में तीन तीन बार सरकार का चुना जाना आम आदमी के मन में सरकार के प्रति वि·ाास का होना ही है। आगामी दो हजार तेरह में जब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और इनके साथ जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होना है वहां सरकार की परीक्षा होगी। विकास कार्याें को आम आदमी जांचेगा और तय है कि खरा नहीं उतरने पर सरकारें बदल दी जाएंगी। मीडिया ने आम आदमी को शिक्षित कर दिया है। कंबल और नोट बांटकर सरकारें बनाने के दिन अब लदते दिख रहे हैं। बदलाव की यह सूरत एकाएक नहीं है। चौंसठ वर्ष की आजादी के बाद यह सूरत देखने को मिली है। सूरत तो बदल रही है किन्तु एकाएक किसी राज्य में सरकार की जीत को रोल मॉडल मान कर उसे दोहराने की कोशिश राजनीति दलों को भारी पड़ सकती है। स्थितियों और परिस्थितियों पर राजनीति दलों की हार-जीत तय होती है न कि एक राज्य की जीत पर दूसरे राज्य की जीत। बहरहाल, अभी तो जयकारा हो रही है बिहार की और मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-2786084228171847300?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/2786084228171847300/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/rajniti.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/2786084228171847300'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/2786084228171847300'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/rajniti.html' title='rajniti'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-2198433474534864252</id><published>2010-11-28T19:50:00.000-08:00</published><updated>2010-11-28T19:50:55.286-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='samaj'/><title type='text'>samaj</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: purple;"&gt;&lt;strong&gt;लोकतंत्र में राजशाही का दबदबा बता गया किचन शेफ&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भारत में लोकतांत्रिक सरकार के चौंसठ बरस होने जा रहे हैं। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजा का बाजा बहुत पहले श्रीमती इंदिरा गांधी ने बजा दिया था। प्रीविपर्स की समाप्ति के साथ राजा-रजवाड़े के दिन लद गये थे। वे अपनी सम्पत्ति के साथ अपने महलों में राज कर रहे थे। उन्हें राजा कहना या उन्हें सलामी देने की बाध्यता समाप्त हो गयी थी। अपनी भावी पीढ़ी को भी मैं यही बताता रहा हूं कि भारत में लोकतंत्र का उदय हो चुका है और राजशाही के दिन लद गये हैं। किन्तु तीन दिन पहले अक्षय कुमार के रियलिटी शो किचन शेफ देखते समय अंदाज हुआ कि भारत में लोकतंत्र और राजशाही दोनों साथ साथ चल रहे हैं। समानांतर सत्ता की तरह। थोड़ा विस्तार में बता दें। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;किचन शेफ उन लोगों के लिये है जो विभिन्न किस्म के खाना बनाना जानते हैं और जो इनमें सबसे ज्यादा हुनरमंद होगा, उन्हें किचन शेफ ऐलान किया जाएगा। विभिन्न पड़ावों से होता हुआ यह प्रोग्राम जब ढाबे पर प्रतियोगियों को जांचने पहुंचा तो भला लगा कि फाईव स्टार होटल ही नहीं, ढाबे के खाने का सलीका भी होना चाहिए। मेरी यह खुशी थोड़े समय तक ही रही क्योंकि प्रोग्राम अब राजस्थान एक राजदरबार में पहुंच गया था। कभी रहे होंगे राजा किन्तु अक्षय उन्हें श्रीजी कह कर पुकार रहे थे। गुलामी की भाषा हिज हाइनेस कह रहे थे। स्वाभाविक है कि प्रतियोगियों को भी यही सब कहना था।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अक्षय अपने राजा साहब के लिये बार बार जोर देकर कह रहे थे कि श्रीजी को इंतजार की आदत नहीं है। वे दो बजे खाना खाते हैं। यह कहते हुए अक्षय भूल गए थे कि उनके श्रीजी इस वक्त खाने के लिये नहीं, एक जज के तौर पर थे और उन्हें प्रोग्राम के मुताबिक चलना था न कि उनके मुताबिक प्रोग्राम। अब जब राजा कह कर संबोधन दिया जा रहा है तो गुलाम जनता की क्या मजाल कि वे अपने मुताबिक चल सकें। जिस तरह श्रीजी को सलामी ठोंक अनुमति ली गयी और भोजन परोसा गया, उसने सचमुच की राजशाही के दिनों की याद दिला दी। बच्चे बड़े जिज्ञासा से पूछते हैं कि राजा ऐसे होते थे? उन्हें इस तरह सलामी दी जाती थी। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस पूरी कहानी का मकसद श्रीजी की भव्यता सुनाना नहीं है बल्कि यह बताना है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के कोने कोने में राजशाही व्यवस्था लागू है। ये राजशाह लोकतंत्र का माखौल उड़ा रहे हैं। यह शानो-शौकत उनका निजी मामला हो सकता है किन्तु करोड़ों दर्शकों के लिये बनाये जा रहे प्रोग्राम के जरिये किसी राजा को महिमामंडित करने का अर्थ देश की करोड़ों जनता का अपमान करना है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजा और प्रजा एक हैं। यहां चुनी हुई सरकारें काम करती हैं। संविधान एक है। ऐसे में इस तरह के प्रोग्राम से आयोजकों को आर्थिक लाभ हो सकता है किन्तु देश की भावना पर जो जख्म लगते हैं, उसकी भरपायी कैसे होगी?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-2198433474534864252?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/2198433474534864252/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/samaj.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/2198433474534864252'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/2198433474534864252'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/samaj.html' title='samaj'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-8690301164983564534</id><published>2010-11-27T20:29:00.000-08:00</published><updated>2010-11-27T20:29:13.135-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='khuch khash'/><title type='text'>sarkar ka din</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;२९ नवम्बर २०१० के लिये विशेष&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: yellow;"&gt;हमारे समय के रॉबिनहुड - शिवराजसिंह चौहान&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;-मनोज कुमार-&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान इन दिनों वनवासी सम्मान यात्रा पर निकले हुए हैं। यात्रा का तीसरा दौर समाप्त हो चुका है और आने वाले उन्तीस नवम्बर तक पूरे प्रदेश में उनकी यात्रा पूरी हो जाए। वनवासी सम्मान यात्रा के दौरान उन्होंने शिद्दत के साथ परतंत्रता के दौर के रॉबिनहुड यानि जननायक टंट्या मामा को याद किया। उनकी यादों को स्थायी बनाने के लिये प्रयास कर रहे हैं। टंट्या मामा से लेकर आज तक का समय बदल चुका है। रॉबिनहुड यानि जननायक हर दौर में हुए हैं। कुछ को याद किया गया तो कुछ भुला दिये गये। टंट्या मामा उन लोगों में हैं जिन्हें भुला देने का अर्थ अपनी परम्परा को भुला देना है किन्तु बदलते समय में हमारे बीच जो जननायक हुए उन्हें भुला देना भी उचित नहीं होगा। अब सवाल यह है कि हमारे समय का कौन है जननायक? किसे हम रॉबिनहुड मानें और इसे मानने के पीछे का मापदंड क्या हो? सवाल कठिन है किन्तु जवाब बहुत मुश्किल नहीं। खासतौर पर उस दौर में सवाल का जवाब ढूंढ़ना मुश्किल नहीं है जब देश के सबसे बड़े और ह्दय प्रदेश मध्यप्रदेश पुर्नगठित हो गया हो और उसके पुनर्गठन के दस बरस गुजर चुके हों। बेशक हमारे समय के जननायक शिवराजसिंह चौहान हैं और वे इसलिये नहीं कि वे राज्य के मुख्यमंत्री हैं बल्कि इसलिये कि जो काम परतंत्रता काल में टंट्या मामा ने किया था वही काम आज के दौर में शिवराज मामा कर रहे हैं। तंत्र को पारदर्शी बनाकर, भूमाफियाओं से कब्जे छुड़ाकर और गरीबों, महिलाओं और बच्चों को उनके अधिकार दिलाकर। अपने पांच बरस के कार्यकाल में शिवराजसिंह ने सरकार और आम आदमी के बीच की दूरी खत्म कर जननायक बन गये हैं। यह भी संयोग है कि वनवासी सम्मान यात्रा की शुरूआत टंट्या मामा को स्मरण कर वह शिवराजसिंह कर रहे हैं जिन्हें हमारे समय में हमारे समाज ने बच्चों के मामा होने का सम्मान दिया है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सन् दो हजार में मध्यप्रदेश का विभाजन हुआ और उससे अलग कर छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण किया गया। छत्तीसगढ़ नवनिर्मित राज्य बना तो मध्यप्रदेश विभाजित होकर पुर्नगठित हो गया। हालांकि इस मायने में पुर्नगठन शब्द उचित नहीं है क्योंकि छत्तीसगढ़ के अलग हो जाने के बाद भी मध्यप्रदेश की भौगोलिक आकार ही छोटा हुआ और कोई बदलाव नहीं आया। सन् उन्नीस सौ छप्पन में नवगठित मध्यप्रदेश और चौंतीस बरस बाद विभाजित मध्यप्रदेश में तीन साल बाद दो हजार तीन में पहला विधानसभा चुनाव हुआ। इस चुनाव में दस साल से सत्तासीन कांग्रेस को बाहर कर भारतीय जनता पार्टी ने बहुमत के साथ प्रदेश की कमान सम्हाल ली। छत्तीसगढ़ में भी गैरकांग्रेसी सरकार ने सत्ता सम्हाल ली थी। अविभाजित मध्यप्रदेश में भी गैरकांग्रेसी सरकारें रही हैं किन्तु इस बार गैरकांग्रेसी दल का सरकार बनाने का अर्थ कई मायने में भिन्न था। यह बदलाव का संकेत था तो एक नये युग में प्रवेश का संदेश भी। पुराना अनुभव यह बताता रहा है कि अविभाजित मध्यप्रदेश में गैरकांग्रेसी सरकारों का जीवन लम्बा नहीं रहा है। इस बार भी यही आशंका थी लेकिन समय गुजरने के साथ आशंका निर्मूल साबित हुई। पहले पांच बरस भाजपा सरकार ने सफलतापूर्वक राज किया तो दूसरी बार दो हजार आठ के चुनाव में कब्जा कायम रहा। राजनीतिक विश्लेषकों को यह बदलाव चौंका गया। अनेक तरह के विश्लेषण हुए और इस बदलाव के पीछे कई कारक बताये और बनाये गये।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;छत्तीसगढ़ नवगठित राज्य है इसलिये कहा जा सकता है कि यह बदलाव वर्षाें से उपेक्षित रहने का परिणाम है किन्तु मध्यप्रदेश के साथ यह बात लागू नहीं होती है। इस बरस मध्यप्रदेश अपनी उम्र के चौंवन साल पूरे कर चुका है और भाजपा सरकार आठ बरस। गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान दो पारियों में किन्तु लगातार पांच वर्ष मुख्यमंत्री रह कर मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा चुके हैं। मध्यप्रदेश में किसी गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री के लगातार पांच वर्ष पूरे करने को सहजता से नहीं लिया जा सकता है बल्कि इसके पीछे के कारणों की तलाश करेंगे तो यह बात सहज रूप से सामने आएगी कि वे हमारे समय के रॉबिनहुड हैं और जिन्हें सही मायने में समाज का जननायक कहा जा सकता है। अवसर विशेष पर ऐसे विशेषण दिये जाने की परम्परा है किन्तु यह शायद पहला अवसर होगा जब जननायक शब्द उनके लिये विशेषण न रहकर एक सच्चाई है। आइए इस जननायक शब्द की पड़ताल कर लें।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दो हजार तीन में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो सहज रूप से चुनाव का बागडोर सम्हालने वाली तत्कालीन भाजपा नेत्री उमा भारती को मुख्यमंत्री बनाया गया। एक साल बीतते बीतते कानूनी बाध्यता के चलते उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और उनके स्थान पर भाजपा के वरिष्ठ नेता बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया। संयोग से भाजपा के आंतरिक कलह के चलते गौर को भी मुख्यमंत्री पद का त्याग करना पड़ा। उमा के बाद गौर की रवानगी के बाद सर्वमान्य नेता के रूप में शिवराजसिंह चौहान का चयन मुख्यमंत्री के रूप में किया गया। उनकी छाप एक सौम्य एवं मृदुभाषी राजनेता की रही है। वे लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं और प्रदेश की राजनीति में उनका दखल कम रहा है। उन्हें जब मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गयी तो यह माना गया कि उमा और गौर की तरह थोड़े समय में उनकी विदाई हो जाएगी। समय समय पर कयास लगाये गये और उनके विरोधियों ने विवाद की स्थिति भी उत्पन्न की किन्तु सारे अनुमान और विरोध भोथरे पड़ गये और दिन-पर-दिन शिवराजसिंह चौहान एक कामयाब और सफल जननायक के रूप में स्थापित हो गये। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह ने उन्नतीस नवम्बर दो हजार पांच को शपथ ली तब सुनहरे भविष्य संभावनाएं कम और आशंका अधिक थी। आरंभिक दिन भी कुछ ऐसे गुजरे। एक किसान परिवार के बेटे और और एक सांसद के रूप में पांव पांव वाले भइया के नाम पर ख्याति पाने वाले शिवराजसिंह की सौम्यता एवं सादगी पर अफसरशाही के हावी हो जाने की आशंका बनी हुई थी किन्तु यह खबर नहीं थी कि जनता का प्रतिनिधि जनता के हक में काम करने के लिये बेलगाम अफसरशाही को कस भी सकता है और ठीक भी कर सकता है। आहिस्ता आहिस्ता दिन गुजरने लगे और शिवराजसिंह सरकार की कार्यशैली से तंत्र का परिचय होने लगा। अफसरशाही की आवाक और आम आदमी खुश। एक साल पूरा होते न होते शिवराजसिंह आम आदमी की उम्मीदों पर खरा उतरने लगे थे। लाडली लक्ष्मी योजना लागू कर उन्होंने मातृशक्ति का वि·ाास जीत लिया था। लिंगभेद को कम करने में उनके प्रयास एक ओर जहां सार्थक बना वहीं मां-बाप के चेहरे से चिंता की लकीरें मिटने लगीं। कल तक की अभिशप्त बेटियां आज हर परिवार के लिये लाडली लक्ष्मी बन गयी हैं। राजनीति में स्त्रियों की पचास फीसदी भागीदारी सुनिश्चित कर उन्होंने जता दिया कि उनकी कथनी और करनी एक है। उन्होंने इस बात का दावा नहीं किया कि वे भ्रष्टाचार को जड़ से मिटा देंगे लेकिन भ्रष्टाचार की जड़ पर चोट करने में वे पीछे नहीं रहे और इसी मंशा के तहत उन्होंने कह दिया कि महिला एवं बच्चों की योजनाओं में गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं होगी। सत्ता में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित कर भ्रष्टाचार पर अंकुश पाने की उनकी पहल को देशव्यापी पहचान मिली।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अपने पहले एक साल की शुरूआत के साथ उनकी छवि जननायक की बन गयी। यह छवि प्रदेश के आखिरी छोर तक तब पहुंची जब उन्होंने मुख्यमंत्री की चौपाल कार्यक्रम का आगाज किया। हर वर्ग और हर हुनर के लिये उन्होंने उन गुमनाम लोगों के लिये मुख्यमंत्री निवास का दरवाजा खोल दिया जो कभी आम आदमी के लिये तिलस्म बना हुआ था। पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों ने भी आम आदमी को जोड़ने की गरज से दरबार लगाते रहे हैं किन्तु उन अभियानों में मुख्यमंत्री के राजा होने की धमक होती थी किन्तु शिवराजसिंह के चौपाल में आम आदमी के शिवराजसिंह के साथ होने का अहसास था। आजादी के बाद से गांव की सुरक्षा में जुटे कोटवार को मुख्यमंत्री, उनके निवास तो दूर की बात, राजधानी भोपाल आना भी मयस्सर नहीं था लेकिन मुख्यमंत्री की पाती पर न केवल उनका सपना सच हुआ बल्कि मुख्यमंत्री के साथ बैठकर भोजन कर उन्होंने पहली दफा शायद स्वतंत्र होने का अर्थ भी समझा होगा। यही अनुभव अन्नदाता कहलाने वाले किसान, भूमिपुत्र आदिवासी, गृहलक्ष्मी मातृशक्ति, आर्थिक क्षमता बढ़ाने वाले कारोबारी, खेल के मैदान में जौहर दिखाने वाले खिलाड़ी और अनजाने, गुमनाम सिद्वहस्त कारीगरों को भी मिला। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुख्यमंत्री की चौपाल मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के विरोधियों के लिये एक सस्ती लोकप्रियता थी किन्तु जमीनी स्तर पर सरकार की जो पकड़ बनी, उसका अंजाम दो हजार आठ के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला जब भारतीय जनता पार्टी दुबारा उसी ठाठ से प्रदेश की सत्ता में लौट आयी। विनम्र मृदुभाषी शिवराजसिंह के लिये यह जीत उनकी जीत नहीं थी, जनता जीत थी, भाजपा की जीत थी। वे एक आम कार्यकर्ता के भांति पहले की तरह खुद को बनाये रखा। मुख्यमंत्री बन जाने के बाद आमतौर पर लुक बदल जाता है किन्तु शिवराजसिंह मुख्यमंत्री तो बन गये लेकिन अपना लुक नहीं बदला। उसी पाजामा-कुर्ते में बने रहे। अफसरशाही ने कोशिशें की होंगी लेकिन वे नाकायाब हो गये। अफसरशाही मुख्यमंत्री को संवारना जानती है और शिवराजसिंह चौहान जनता की नब्ज पहचानते हैं। जनता को अपने बीच का अपने जैसा नेता चाहिए और शिवराजसिंह वैसे ही बने रहे जैसा कि वे अपने आरंभिक दिनों में थे। यही कारण है कि वे पांच बरस में मुख्यमंत्री न रहकर जननायक बन गये।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;शिवराजसिंह के जननायक बनने की कहानी टंट्या मामा की कहानी से अलग नहीं है। कोई बात अलग है तो समयकाल की। टंट्या मामा परतंत्रता के दौर के जननायक थे तो शिवराजसिंह हमारे समय के जननायक हैं। टंट्या मामा के लिये दुश्मनों से लड़ना आसान नहीं था तो मुश्किल भी नहीं क्योंकि दुश्मनों के लिये निर्मम हो जाने में कोई तकलीफ नहीं होती है किन्तु शिवराजसिंह के लिये यह मुश्किल का दौर है। मुश्किल इसलिये कि उन्हें दुश्मनों से नहीं बल्कि अपने ही उन लोगों से लड़ना है जो अपने स्वार्थ के लिये अपने ही लोगों के दुश्मन बन गये हैं। मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह ने यह चुनौती भी मंजूर की। एक आम आदमी का सपना होता है कि उसका अपना घर बने और प्रदेश में भूमाफियाओं का जाल ऐसा था कि चौवन बरस में किसी सरकार ने उन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं की। शिवराजसिंह ने भूमाफियाओं पर नकेल डालने की न केवल हिम्मत दिखायी और कार्यवाही की। राज्य के अनेक हिस्सों में हजारों लोगों ने राहत की सांस ली। जिन भूमाफियाओं के खिलाफ कार्यवाही शुरू हुई उन्हें यह बात रास नहीं आयी लेकिन वे बेबस बने हुए हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुख्यमंत्री शिवराजसिंह की यह कार्यवाही टंट्या मामा की उस कार्यवाही की तरह है जिसमें टंट्या मामा ने अंग्रेजों के हाथों से छीन कर गरीबों में बांट दिया। कुछ कुछ शिवराजसिंह चौहान भी इसी तरह की कार्यवाही कर रहे हैं। भूमाफियाओं के हाथों से गैरकानूनी ढंग से हथियायी गयी सम्पत्ति को वाजिब हकदारों को दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह की नजर अफसरशाही पर भी है जो अकूत धनसंपदा के मालिक हैं। ऐसे कई अफसरों के खिलाफ कार्यवाही की। सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों पर नियंत्रण पाने के मकसद से दुनिया में पहली दफा लोकसेवा गारंटी अधिनियिम मध्यप्रदेश सरकार ने पारित किया। अपनी जिम्मेदारी से कोताही बरतने वाले अफसर और कर्मचारी हर आदमी के लिये जवाबदार होंगे। आने वाले दिनों में जनप्रतिधियों को भी इस कानून की जद में लाने की कोशिश है। एक तरफ सूचना का अधिकार और दूसरी तरफ लोकसेवा गारंटी अधिनियिम ने तंत्र को पारदर्शी बना दिया है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-8690301164983564534?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/8690301164983564534/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/sarkar-ka-din.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8690301164983564534'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8690301164983564534'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/sarkar-ka-din.html' title='sarkar ka din'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-6484787454596476181</id><published>2010-11-26T02:24:00.001-08:00</published><updated>2010-11-26T02:24:50.355-08:00</updated><title type='text'>REPORTER: rone ke liye hum nahi</title><content type='html'>&lt;a href="http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/rone-ke-liye-hum-nahi.html"&gt;REPORTER: rone ke liye hum nahi&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-6484787454596476181?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/rone-ke-liye-hum-nahi.html' title='REPORTER: rone ke liye hum nahi'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/6484787454596476181/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/reporter-rone-ke-liye-hum-nahi.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/6484787454596476181'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/6484787454596476181'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/reporter-rone-ke-liye-hum-nahi.html' title='REPORTER: rone ke liye hum nahi'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-4042471293848620391</id><published>2010-11-26T02:24:00.000-08:00</published><updated>2010-11-26T02:24:10.943-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>rone ke liye hum nahi</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: yellow;"&gt;विलाप नहीं, कीमत खुद तय करें&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;-मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक नौजवान पत्रकार साथी ने शोषण के संदर्भ में एक अखबार कह कर जिक्र किया है और संकेत के तौर पर साथ में एक टेबुलाइड अखबार देने की बात भी कही है। समझने वाले समझ गये होंगे और जो नहीं समझ पाए होंगे, वे गुणा-भाग लगा रहे होंगे। यहां पर मेरा कहना है कि एक तरफ तो आप शोषण की कहानी साथियों को बता सुना रहे हैं और दूसरी तरफ आपके मन में डर है कि अखबार का नाम बता देने से आपका भविष्य संकट में पड़ सकता है। आप नौजवान हैं और पत्रकारिता के चंद साल ही हुए हैं। अपने आरंभिक दिनों में यह डर मुझे कुछ ठीक सा नहीं लगता है। बोलते हैं तो बिंदास बोलिये वरना खामोशी ही बेहतर। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पत्रकारिता में आने वाले हर साथी से हमारा आग्रह है और उन्हें सलाह भी कि पत्रकारिता में हम तो गंवाने ही आये हैं, कमाना होता तो इतनी काबिलियत है कि कहीं बाबू बन जाते और बैठकर सरकार को गालियां देते रहते। ये हमारी फितरत में नहीं है। इस तस्वीर को बदलने के लिये ही हम आए हैं। जहां तब बात शोषण की है तो सभी को यह समझ लेना चाहिए कि यह शोषण हमारी ट्रेनिंग की पहली सीढ़ी है। जब हम खुद शोषित होते हैं तो पता चलता है कि समाज में शोषण किस स्तर पर हो रहा है। मैं शोषण की तरफदारी नहीं कर रहा हूं लेकिन यह जरूर कहता हूं कि आप काबिल हैं तो अपनी कीमत खुद तय कीजिए। आपको लगता है कि आपकी एक रिपोर्ट/लेख की कीमत पांच हजार है तो उतना मांगिये और नहीं दे तो रिपोर्ट/लेख लिखने की जरूरत ही नहीं। ऐसी बातों से कुंठित होकर आप अपना समय खराब कर रहे हैं। देश के नामचीन अखबारों में शोषण आम बात है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लगे हाथ को आपको एक मिसाल दे जाऊं, शायद अच्छा लगे और आपके काम आए। पत्रकारिता के व्यवसायिक हो जाने की बात काफी अर्से से चल रही है। आप जैसे कुछ नौजवान साथियों से इस बारे में मैंने बात की। वे भी इस बात के पक्षधर थे। मैंने उनसे एक सवाल किया कि देश के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबार में आप नौकरी करते हैं और महीने में आपको दस हजार की तनख्वाह दी जाती है। इसके बदले में आप माह भर में दस एक्स्कूलसिव खबरें देते हैं। यानि हर खबर की कीमत एक हजार रुपये। वे मेरी बात से सहमत हुए लेकिन पूरी तरह नहीं। वे तब भी यह मानने को तैयार नहीं कि पत्रकारिता व्यवसायिक नहीं हुई है। आखिरकार मुझे थोड़ा गुस्सा आया और सच से उन्हें वाकिफ करना पड़ा कि उस अखबार का सर्कुलेशन एक लाख हो तो आपको दस पैसे के हिसाब से भुगतान किया जाता है। दस पैसे की पत्रकारिता और बातें बड़ी बड़ी। तो आपने कहा है कि दो सौ से एक हजार रुपये तक का भुगतान किया जाता है तो यहां भी मामला एक खबर का भुगतान दस पैसे जैसा ही है। वे पाठक से अखबार की कीमत तीन रुपये और कहीं कहीं अधिक वसूलते हैं और बदले में पाठक को पूरे अखबार की खास खबर के नाम पर एकाध रुपये की खबर देते हैं। शेष खर्चा तो प्रबंधन में होता है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दोस्त, सच यही है और इस सच से आप मुंह चुराएंगे या विलाप करेंगे तो स्थिति नहीं बदलने वाली। यदि आप इतने ही दुखी हैं तो साहसी साथियों को साथ लेकर कोई उपक्रम कीजिये और यह मेहनत अपने लिये कीजिये। मेरे लिये कहना आसान है किन्तु इसे व्यवहार में लाना कठिन। फिर आपको यह भी पता होना चाहिए कि पत्रकारिता में आने के लिये आपको किसी ने आमंत्रण नहीं दिया। स्थितियों को बदलने की आग लेकर पत्रकरिता के मैदान में आयें हैं तो चुनौती का सामना करना भी सीखें। मुझे वह दिन देखना है जब आप जैसे साथी कहीं लिखेंगे कि आपने अपनी कीमत खुद पहचान ली है। चलते चलते मैं बता दूं कि एक भड़ास जैसे एक नयी नवेली मीडिया वेबसाइट का निमंत्रण आया कि मैं उनके लिये लिखूं तो मैंने फौरन पूछ लिया कि कितने पैसे दोगे? तो उनका जवाब था कि हमारे यहां नीति नहीं है भुगतान की। जब उनके पास भुगतान की नीति नहीं है तो मैंने कहा था कि वेबसाइट लांच करो। बावजूद इसके वह वेबसाइट चल रही है और चलेगी भी। भड़ास पर लिखता हूं तो अपनी मर्जी से। स्वयं के आनंद के लिये और जब लगेगा कि यशवंत भाई से भी मेहनताना मांगा जाए तो पीछे नहीं हटूंगा।यह भी सच है कि आपको यह पता होना चाहिए कि गुंबद हमेशा से चमकदार होती है किन्तु बुनियाद का कोई नामलेवा नहीं होता है। विलाप नहीं, क्रांति कीजिए और शोषकों से लोहा लीजिए।&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-4042471293848620391?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/4042471293848620391/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/rone-ke-liye-hum-nahi.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/4042471293848620391'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/4042471293848620391'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/rone-ke-liye-hum-nahi.html' title='rone ke liye hum nahi'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-2873933962231732565</id><published>2010-11-24T21:16:00.000-08:00</published><updated>2010-11-24T21:16:34.888-08:00</updated><title type='text'>REPORTER: bahas</title><content type='html'>&lt;a href="http://mpreporter.blogspot.com/2009/08/bahas.html#links"&gt;REPORTER: bahas&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-2873933962231732565?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://mpreporter.blogspot.com/2009/08/bahas.html#links' title='REPORTER: bahas'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/2873933962231732565/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/reporter-bahas.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/2873933962231732565'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/2873933962231732565'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/reporter-bahas.html' title='REPORTER: bahas'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-8437436688382642409</id><published>2010-11-09T04:50:00.000-08:00</published><updated>2010-11-09T04:50:33.158-08:00</updated><title type='text'>Samagam</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;समागम का नया अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का नवम्बर २०१० का अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत है। मीडिया के विस्तार एवं विकास के दौर में भी जनजातीय पत्रकारिता हमेशा से अछूती रही है। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ समेत अनेक राज्य हैं जहां की आदिवासी आबादी बहुलता में है। इन राज्यों में भी कभी जनजातीय पत्रकारिता को स्थान नहीं दिया गया। समागम ने एक कोशिश की है। नामचीन पत्रकार, साहित्यकार एवं शोधार्थियों के आलेख इस अंक में शामिल किया गया है, इस उम्मीद के साथ की मीडिया में इस विषय पर चर्चा होगी। आज नहीं तो कल जनजातीय पत्रकारिता को भी ग्रामीण पत्रकारिता की तरह स्वरूप मिल सकेगा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-8437436688382642409?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/8437436688382642409/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/samagam.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8437436688382642409'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/8437436688382642409'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/samagam.html' title='Samagam'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-178220822187759420</id><published>2010-11-03T05:05:00.000-07:00</published><updated>2010-11-03T05:05:56.948-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>Media</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;जनजातीय पत्रकारिता शिक्षा की जरूरत&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हिन्दुस्तान का ह्दय प्रदेश मध्यप्रदेश की पहचान एक बड़े हिन्दी एवं आदिवासीबहुल प्रदेश की है। अलग अलग अंचलों यथा भोपाल रियासत, मालवा, विंध्य, महाकोशल, बुंदेलखंड एवं छत्तीसगढ़ को मिला कर चौवन साल पहले नये मध्यप्रदेश का गठन किया गया था। दस वर्ष पहले छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश से अलग होकर पृथक राज्य की पहचान बना ली किन्तु अपनी स्थापना के साथ ही अविभाजित मध्यप्रदेश निरंतर अपनी पहचान के लिये संघर्षरत रहा है। उसका यह संघर्ष अभी भी समाप्त नहीं हुआ है। ऐसा भी नहीं है कि इन सालों में उसने विकास नहीं किया या समय के साथ कदमताल करने में पीछे रहा किन्तु कुछ बुनियादी कमियों के चलते मध्यप्रदेश की छवि एकजाई नहीं बन पायी। मध्यप्रदेश की बात शुरू होती है तो उसकी परम्परा और सांस्कृतिक विरासत को लेकर। अपने जन्मकाल से पहले ही मध्यप्रदेश की धरा हमेशा से साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में सम्पन्न रहा है। उसकी यह सम्पन्नता समय के साथ और भी बढ़ी है। इस बात का साक्षी रजतपट भी बन गया है। मुंबई के बाद अब मायानगरी बनने के लिये मध्यप्रदेश फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद बनती जा रही है। राजधानी भोपाल सहित प्रदेश के अनेक हिस्सों में पहले भी कई फिल्मों की शूटिंग हुई है और अब इसकी संभावना बढ़ चली है। भोपाल में फिल्म सिटी के लिये स्थान का चयन भी हो चुका है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मध्यप्रदेश में भाषायी फिल्म निर्माण में हमेशा संकट बना रहा है और आने वाले समय में भी इसे दूर किया जाना संभव नहीं दिखता है। ऊपर जैसा कि हमने कहा कि मध्यप्रदेश का निर्माण विभिन्न अंचलों को लेकर हुआ है तो स्थानीय बोली में बनने वाली फिल्में उस खास अंचल का प्रतिनिधित्व करती हैं न कि समूचे मध्यप्रदेश का। उदाहरण के तौर पर मालवा क्षेत्र में बनने वाली क्षेत्रीय भाषायी फिल्म मालवा का प्रतिनिधित्व करती है तो बुंदेली में बनने वाली क्षेत्रीय भाषायी फिल्म बुंदेलखंड की होगी न कि समूचे मध्यप्रदेश की। यह हाल राज्य के दूसरे अंचलों की भी है। इसे दूसरी तरह से देखें तो दस साल पहले मध्यप्रदेश से पृथक होकर छत्तीसगढ़ राज्य को अपनी पहचान के लिये इस तरह का संघर्ष नहीं करना पड़ रहा है। वहां बनने वाली फिल्में छत्तीसगढ़ी फिल्में कहलाती हैं और सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। छत्तीसगढ़ को लगातार और बड़ी संख्या में बनने वाली फिल्मों के कारण छालीवुड नाम भी दिया गया है। मध्यप्रदेश के सामने यह संकट है और बना रहेगा।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में फिल्म निर्माण में आदिवासी समुदाय की हमेशा से अनदेखी की गई है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में शासन स्तर पर तो कुछ फिल्मों का निर्माण किया जा रहा है किन्तु सरकारी होने के ठप्पे से वे बरी नहीं हो पायी हैं। मध्यप्रदेश ने एक कदम आगे बढ़कर अन्तर्राष्ट्रीय जनजाति फिल्मोत्सव का आयोजन भी कर रहा है किन्तु इस आयोजन का प्रभाव अभी देखने को नहीं मिला है। इस आयोजन से प्रभावित होकर निजी फिल्म निर्माता यदि रूचि दिखाते हैं तो मध्यप्रदेश का स्वरूप एक बड़े केनवास में देखने को मिल सकेगा। निजी फिल्म निर्माताओं की एक सबसे बड़ी बाधा यह है कि जब वे आदिवासी समुदाय पर फिल्म बनाने का काम करते हैं तो उन्हें उनके शोषण की कहानी ही मिलती है। यह सच है कि आदिवासी समाज का शोषण होता रहा है और समय के साथ इसमें बदलाव की गुंजाईश से भी इंकार नहीं किया जा सकता है किन्तु सिर्फ उनके शोषण को केन्द्र में रखकर फिल्म निर्माण की सोच आदिवासी समाज के साथ अन्याय होगा। आदिवासी समाज में आ रहे बदलाव एवं उनकी उत्कृष्ट परम्पराएं मुख्य धारा में जी रहे समाज के लिये मिसाल है। इस बात को जानना चाहिए कि आदिवासी समाज के मूल में तीन महत्वपूर्ण बातें हैं जिसमें पहला यह कि आदिवासी समाज हमेशा से वाचिक परम्परा में जीता आया है, दूसरा यह कि वह राज्याश्रित नहीं है तथा तीसरा यह कि वह अपने आपमें स्वतंत्र है इसलिये&amp;nbsp; किसी तरह की क्रांति की तरफ उसकी सोच नहीं जाती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उनकी अपनी परम्पराएं हैं, रीति-रिवाज हैं जो आधुनिक समाज को कई बार सीख देते हैं। उनकी इस खास चीजों को रेखांकित किये जाने की जरूरत है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आदिवासी समाज और आधुनिक समाज के बीच सेतु का काम मीडिया कर सकता है। मीडिया की पहुंच व्यापक है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है किन्तु आदिवासी समाज को लेकर मीडिया को भी शिक्षण-प्रशिक्षण की जरूरत है। अभी तक मीडिया में दो तरह से आदिवासी समुदाय को प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है पहला वह जो सरकार की विभिन्न संस्थाओं द्वारा दिये गये साहित्य को आधार बनाकर खबरें, लेख व फीचर प्रकाशित किये जाते रहे हैं और दूसरा मंत्रालयों में दौड़ रही आदिवासी समाज की कल्याण व अकल्याण की खबरें। इसमें भी वास्तविकता तलाशने के स्थान पर सनसनी का भाव ज्यादा रहता है। इसे इस तरह से भी हम समझ सकते हैं कि झाबुआ का भगोरिया, बस्तर का घोंटुल या छिंदवाड़ा के पातालकोट को लेकर कई तरह की भ्रम-विभ्रम की स्थिति बनी हुयी है। कुछ कारण तो सरकार की वो बंदिशें हैं जहां सुरक्षा की दृष्टि से जारी हैं। इस पर भी ध्यान देना होगा।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आदिवासी समाज के विकास और विस्तार में मीडिया की भूमिका कारगर हो सकती है बशर्तें मीडिया का प्रशिक्षण हो। मध्यप्रदेश में देश का पहला जनजातीय वि·ाविद्यालय के आरंभ होने की कार्यवाही जारी है। वि·ाविद्यालय के पूर्ण स्वरूप आने में अभी समय है और तब तक या इसके बाद भी भोपाल स्थिति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार वि·ाविद्यालय में जनजातीय पत्रकारिता पर पाठ्यक्रम आरंभ किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है। लगभग पन्द्रह से अधिक नये विषयों का पाठ्यक्रम इस वि·ाविद्यालय ने आरंभ किय है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए किन्तु अपने ही प्रदेश में अपने ही विषय का पाठ्यक्रम का न होना, अखरने वाली बात है। कुछ माह पहले रायपुर स्थित स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार वि·ाविद्यालय ने अखिल भारतीय स्तर पर जनजातीय पत्रकारिता पर वर्कशॉप का आयोजन कर अपनी चिंता जाहिर की थी। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में भोपाल के साथ रायपुर का पत्रकारिता वि·ाविद्यालय जनजातीय पत्रकारिता पाठ्यक्रम आरंभ करने की दिशा में पहल करेगा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-178220822187759420?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/178220822187759420/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/media.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/178220822187759420'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/178220822187759420'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/11/media.html' title='Media'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-7673951545993219508</id><published>2010-10-17T03:49:00.000-07:00</published><updated>2010-10-17T03:49:00.517-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;समागम का नया अंक पेडन्यूज के खिलाफ आवाज उठाने वाले अखबारों को समर्पित&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का अक्टूबर २०१० का अंक बिहार के दो प्रमुख समाचार पत्रों प्रभात खबर एवं हिन्दुस्तान को सलाम करता है जिन्होंने बातों से आगे बढ़कर व्यवहार में पेडन्यूज नहीं छापने का ऐलान किया है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-7673951545993219508?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/7673951545993219508/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/7673951545993219508'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/7673951545993219508'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title=''/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-275675355090502709</id><published>2010-10-17T03:39:00.001-07:00</published><updated>2010-10-17T03:39:28.947-07:00</updated><title type='text'>media</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पत्रकारिता में हर कोई वरिष्ठ?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;-मनोज कुमार&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इन दिनों पत्रकारिता में वरिष्ठ शब्द का चलन तेजी से हो रहा है। सामान्य तौर पर इसके उपयोग से कोई आपत्ति नहीं होना चाहिए किन्तु हम शब्दों के सौदागर हैं तो शब्दों के उपयोग और प्रयोग से सावधान रहना चाहिए। अमूनन दो पांच वर्ष काम कर चुके पत्रकार अपने नाम के साथ वरिष्ठ पत्रकार का उपयोग करना नहीं भूलते हैं। वरिष्ठ शब्द के उपयोग के पीछे शायद मंशा अधिक सम्मान और स्वयं को वि·ासनीय बनाने की हो सकती है किन्तु मेरी समझ में पत्रकारिता एकमात्र ऐसा पेशा है जहां वरिष्ठ और कनिष्ठ शब्दों का बहुत कोई अर्थ नहीं है। हमारे पेशे में महत्व है तो आपके लेखन का। रिर्पाेटिंग करते हैं तो आपकी रिपोर्ट आपकी वरिष्ठता और कनिष्ठता का पैमाना बनती है और आप सम्पादक हैं तो समूचा प्रकाशन आपका आईना होता है। कदाचित लेखक हैं तो विषयों की गंभीरता आपके वरिष्ठता का परिचायक होती है। इधर अपनी लेखनी, रिपोÍटग और सम्पादकीय कौशल से परे केवल पत्रकारिता में गुजारे गये वर्षाें के आधार पर स्वयंभू वरिष्ठ बताने की ताक में लगे हुए हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वरिष्ठ क्या होता है, इसकी मीमांसा भी कर लेते हैं। मेरी राय में वरिष्ठ से आशय उस शब्द से है जो किसी भी क्षेत्र में एक समय तक काम कर लेने एवं ख्याति प्राप्त कर लेने के बाद प्राप्त होता है। राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, डॉ. वेदप्रताप वैदिक, आलोक मेहता आदि इत्यादि ऐसे नाम हैं जो स्थापित हैं और जिन्हें आप स्वयं आगे आकर वरिष्ठ कहला कर स्वयं को गौरवांवित महसूस करते हैं किन्तु उन हजारों पत्रकारों को जिन्हें दो, पांच अथवा दस साल काम करते हुए हैं और वे अपने आपको वरिष्ठ पत्रकार लिखते हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं हूं। वरिष्ठता वास्तव में काम किये गये वर्षाें से नहीं होती है बल्कि काम में प्राप्त ख्याति से होती है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मेरी बातों से असहमत साथी कह सकते हैं कि किसी समाचारपत्र अथवा पत्रिका में सम्पादक पद सुशोभित करने वालों को वरिष्ठ पत्रकार नहीं माना जाना चाहिए? मैं यहां भी ना में कहूंगा। सवाल यह है कि अपने सम्पादक रहने की अवधि में उन्होंने ऐसा क्या किया कि समाचार पत्र को अलग से ख्याति मिली। यदि ऐसा है तो उन्हें स्वयं ही वरिष्ठता का दर्जा मिल जाएगा किन्तु ऐसा नहीं है तब उन्हें इस तखल्लुस का स्वयं होकर उपयोग करना होगा। यह सर्वविदित है कि किस तरह आज के दौर में जोड़-तोड़ कर सम्पादक बना जाता है। कहीं राजनीतिक सिफारिश के बूते पर तो कहीं किसी और माध्यम से। किसी सम्पादक की सफलता उसके नाम से अखबार की पहचान हो, ऐसा होना चाहिए न कि अखबार के नाम से सम्पादक की पहचान हो। ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं जिनमें अखबार बाद में, सम्पादक पहले होते थे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इन दिनों एक गलत परम्परा शासकीय विभाग भी डाल रहे हैं। वे जाने-अनजाने में ऐसे अनेक पत्रकारों के नाम के साथ वरिष्ठ पत्रकार जोड़ देते हैं जो किसी भी कीमत पर इसके हकदार नहीं हैं। उनके पीछे उनका मकसद उनके अखबारों में अपनी खबरों के लिये पर्याप्त जगह पाना होता है। शायद शासकीय विभाग अपने मकसद में कामयाब हो भी जाते होंगे किन्तु पत्रकार साथी एक बार वरिष्ठता पदनाम में कैद हो जाता है तो वह फिर कभी नहीं उबर पाता है। इन दिनों विभिन्न वेबसाइट एवं ब्लॉग में लिखने वाले पत्रकारों को भी वरिष्ठ पत्रकार लिखा जा रहा है, जो एक हद तक तो ठीक है किन्तु इसके बाद शायद नहीं। पत्रकारों के काम का लेखा-जोखा करने के बाद ही वरिष्ठ लिखा जाना बेहतर होगा। वरिष्ठ शब्द का मायने मेरे लिये अपने काम के प्रति अधिक जिम्मेदार होना है। जिम्मेदारी ही वरिष्ठता का दूसरा रूप है। वरिष्ठता शब्द का उपयोग सोच-समझ कर किया जाना ही वरिष्ठता शब्द का सम्मान किया जाना होगा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-275675355090502709?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/275675355090502709/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/10/media.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/275675355090502709'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/275675355090502709'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/10/media.html' title='media'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-4879824183146094114</id><published>2010-09-23T05:49:00.000-07:00</published><updated>2010-09-23T05:49:28.095-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>media</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;अब क्यों बात नहीं होती पीत पत्रकारिता की?&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मनोज कुमार&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लगभग एक दशक पहले पत्रकारिता का भेद हुआ करता था। एक पत्रकारिता होती थी सकरात्मक एवं दूसरा नकरात्मक जिसे हम हिन्दी में पीत पत्रकारिता और अंग्रेजी में यलो जर्नलिज्म कहा करते थे। बीते एक दशक में पत्रकारिता का यह फर्क लगभग समाप्त हो चला है। अब पीत पत्रकारिता की बात नहीं होती है। हैरत नहीं होना चाहिए कि इस एक दशक में आयी पत्रकारिता की पीढ़ी को इस पीत पत्रकारिता के बारे में कुछ पता ही नहीं हो क्योंकि जिस ढर्रे पर पत्रकारिता चल रही है और जिस स्तर पर पत्रकारिता की आलोचना हो रही है, उससे ऐसा लगने लगा है कि समूची पत्रकारिता ही पीत हो चली है। हालांकि यह पूरी तरह सच नहीं है और हो भी नहीं सकता और होना भी नहीं चाहिए। पत्रकारिता की इस फिलासफी के बावजूद यह बात मेरे समझ से परे है कि ऐसा क्या हुआ कि पत्रकारिता से पीत शब्द गायब हो गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि समूची पत्रकारिता का शुद्विकरण हो गया हो और पूरी पत्रकारिता सकरात्मक भूमिका में उपस्थित दिखायी दे रही हो किन्तु यह भी नहीं है क्योंकि यदि ऐसा होता तो पत्रकारिता की आलोचना जिस गति से हो रही है, वह नहीं होती। इसका मतलब साफ है कि पत्रकारिता के मंच पर स्याह का रंग और गहराया है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पत्रकारिता की इस समस्या को हल्के से नहींं लिया जाना चाहिए। स्कूल के दिनों में मास्टरजी सिखाया करते थे कि सफेद रंग का महत्व तब तक है जब तक कि काला रंग मौजूद हो और जब काला रंग गायब हो जाएगा तो सफेद महत्वहीन हो जाएगा और यही बात काले रंग के साथ भी है। उसका अस्तित्व भी सफेद पर टिका है। इस आधार पर पत्रकारिता के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि सकरात्मक पत्रकारिता को जानने और पहचानने के लिये पीत पत्रकारिता का भेद करना जरूरी है किन्तु जब समूची पत्रकारिता सकरात्मक हो जाएगी तो भेद कैसे होगा। दुर्भाग्य से इन दिनों समूची पत्रकारिता भले ही सकरात्मक न हो पायी हो किन्तु पीत जरूर हुयी है। इस स्थिति से पत्रकारिता को बचाना जरूरी होगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पत्रकारिता का विस्तार हुआ है और इसी के साथ विश्वसनीयता का संकट पैदा हुआ है तो सिर्फ इसलिये कि अब हम पीत पत्रकारिता की बात नहीं करते हैं। उसे नया नाम दे रहे हैं जैसे पेड न्यूज। पेडन्यूज भी तो पीत पत्रकारिता का हिस्सा है। मेरी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में बताया गया था कि पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लिखी गयी खबर अथवा दी गयी सूचना पीत पत्रकारिता कहलाती है। समाज हित में, देशहित में इससे बचना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि लगभग तीस साल पहले की पीत पत्रकारिता उतनी भी स्याह नहीं थी जितना कि आज हम महसूस कर रहे हैं। पत्रकारिता में सकरात्मकता का स्थान समाप्त हो रहा है तो इसका कारण यह नहीं है कि अच्छे लोगों ने काम करना बंद कर दिया है बल्कि सकरात्मक पत्रकारिता के समाप्त होने का भय इसलिये ज्यादा हो रहा है कि नयी पीढ़ी को पत्रकारिता की मुफलिसी, उसकी जवाबदारी नहीं बतायी जा रही है बल्कि उसे बताया जा रहा है कि जल्द से जल्द धनवान कैसे बनें? &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह सच है कि युवा मन वह भले ही पत्रकार हो, अच्छी जिंदगी जीने की चाहत होती है और जब यह ज्ञान मिले तो इससे ज्यादा सुखकर क्या होगा? अपने काम की कीमत हर प्रोफेशनल्स को मालूम होना चाहिए लेकिन इसके पहले अपने प्रोफेशन की जवाबदारी का अहसास होना ज्यादा जरूरी है और हो यही रहा है कि उत्तरदायित्व तो हमें मालूम नहीं लेकिन अधिकार के बारे में हम सजग हो गये हैं। यह एक सच है जिसने पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता में समाहित कर दिया है। यह सब सकारण नहीं हो रहा है और न ही सुनियोजित ढंग से बल्कि यह अनजाने में और अनियोजित ढंग से। इसके लिये डिग्री कॉलेजों की तरह रोज खुल रहे वो पत्रकारिता शिक्षण संस्था भी जवाबदार हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-4879824183146094114?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/4879824183146094114/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/09/media.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/4879824183146094114'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/4879824183146094114'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/09/media.html' title='media'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-3932139806034528406</id><published>2010-08-29T07:12:00.000-07:00</published><updated>2010-08-29T07:12:46.779-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='sankat'/><title type='text'>nathaa</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;नत्था के आगे क्या होगा ओंकारदास मानिकपुरी का?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मनोज कुमार&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;लगभग अनजाना सा एक लोककलाकार रातोंरात सुपरस्टार बन जाता है। सालांे से परदे के पीछे छिपे इस कलाकार की प्रतिभा किसी ने न देखी और न दिखायी दी। आमिर खान को धन्यवाद किया जाना चाहिए कि उसने छत्तीसगढ़ की माटी से हीरा तलाश कर करोड़ों दर्शकों तक पहुंचाया। आमिर के इस प्रयास के बाद भी ओंकारदास मानिकपुरी आज भी गुमनाम है। कोई जानता है और पहचानता है तो नत्था को। यह पहचान का संकट अकेले ओंकारदास मानिकपुरी का नहीं है बल्कि पहचान का यह संकट हर लोककलाकार के सामने है। इन संकटों में एक बड़ा संकट तो मैं यह देख रहा हंू कि आमिर खान ने पीपली लाइव बनाकर ओंकारदास को नत्था बना कर एक पहचान दिला दी किन्तु अब नत्था उर्फ ओंकारदास को और कितनी फिल्में मिल पाएंगी? कितने फिल्मकारों को नत्था की जरूरत होगी? क्या इनमें से कोई आमिर खान की तरह नत्था का उपयोग कर पाएगा? जवाब भी ओंकारदास के पहचान की तरह गुमनाम है। ओंकारदास पहले लोककलाकार नहीं हैं जिन्हें यह ख्याति मिली। इसके पहले भी और लोक कलाकार हैं जिन्हें यह अवसर मिला किन्तु इसके बाद वे गुमनामी के अंधेरे में डूब गये। &lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_AAc9TdcmpQU/THpqmovVK-I/AAAAAAAAADM/zqAsDy1WHKQ/s1600/natha.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" ox="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_AAc9TdcmpQU/THpqmovVK-I/AAAAAAAAADM/zqAsDy1WHKQ/s320/natha.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;ओंकारदास ने पीपली लाइव में अभिनय कर यह तो जता दिया कि उनमें वे सब खूबियां हैं जो बड़े परदे की जरूरत है किन्तु इस कामयाबी ने ओंकारदास की आंखों में जो सपने जगाये हैं, वह आगे चलकर उसे निराश न कर दें। अपनी कामयाबी से खुश ओंकारदास भिलाई पहुंचने पर बातचीत में कहा है कि थियेटर में तो तंगहाली के दिन है। अब वह बच्चों को अच्छे से पढ़ा सकेगा। एक पिता होने के नाते यह चिंता जायज है किन्तु क्या उसे इस बात का वायदा मिला है कि आगे भी उन्हें फिल्में मिलेंगी? यदि ऐसा है तो यह बहुत बढ़िया खबर है और नहीं है तो चिंता की बात।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;इन संकटों के बीच मुझे लगता है कि इन लोककलाकारों को एक किस्म के चरित्र में कैद रहने के बजाय फिल्म की हर वो खूबी सीखने की कोशिश करनी चाहिए ताकि फिल्मों में उनका भविष्य सुरक्षित हो सके। नत्था किसान बार बार दोहराया नहीं जाएगा लेकिन किसान के रूप में, मजदूर के रूप में, एक आम आदमी के रूप में ये कलाकार चरित्र अभिनेता बन सकते हैं इस दिशा में इन्हें कोशिश करनी चाहिए। फिल्म वालों को भी इस तरफ ध्यान देना चाहिए ताकि ओंकारदास मानिकपुरी ओंकारदास बना रहे, नत्था बन कर गुम न हो जाए।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-3932139806034528406?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/3932139806034528406/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/08/nathaa.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/3932139806034528406'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/3932139806034528406'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/08/nathaa.html' title='nathaa'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_AAc9TdcmpQU/THpqmovVK-I/AAAAAAAAADM/zqAsDy1WHKQ/s72-c/natha.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-4088845348585914178</id><published>2010-08-03T21:07:00.001-07:00</published><updated>2010-08-03T21:07:53.776-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='nukatchini'/><title type='text'>vivad</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;स्त्री के लिये कानून नहीं, मन साफ करें&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;-मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;केन्द्र सरकार के रवैये पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार की खबरें अभी धुंधली भी नहीं हुई थी कि एक और महाशय ने महिलाओं के प्रति अभद्र बयान दे डाला। हालांकि दो दिन बाद उन्होंने अपने बयान के लिये सफाई दी और माफी भी मांग ली। क्या इन महाशय के माफी मांग लेेने से समूची महिला समाज आहत हुई हैं, उनके जख्म पर मरहम लग जाएगा? मुझे तो नहीं लगता कि ऐसा हो पायेगा। इस पूरे मामले से एक बात यह जरूर साफ हो गई है कि स्त्री की स्वाधीनता के लिये हम चाहे जितना कानून बनाये, बंदिशें लगायें, इसके पहले हमारा मन साफ करना होगा। मन के भीतर जो रचा बसा है, वह दूर नहीं हो सका तो कानून केवल कागज में कैद हो कर रह जाएंगे। स्त्री के सम्मान के खिलाफ यह पहली बार नहीं बोला गया है। बार बार और हर बार किसी न किसी बहाने स्त्री को टारगेट पर रखा जाता है। यदि स्त्री चरित्रहीन है तो उसे ऐसा बनाने वाले तो हमारा पुरूष समाज ही है जो अपनी स्वार्थ की पूर्ति के लिये भेड़िये की तरह तरह तरह की साजिश करता रहता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;राजनीति के मंचों पर पचास फीसदी आरक्षण देने से उनके अधिकारों की रक्षा तो हो जाएगी किन्तु जब स्त्री ही सुरक्षित नहीं रहेगी तो उनकी रक्षा कोैन करेगा। पेट के लिये अनाज की जरूरत होती है न कि अनाज के लिये पेट की जरूरत। कानून स्त्री की रक्षा करने के लिये बनता है और जब स्त्री ही नहीं बचेगी तो कानून किसके काम आएगा। उच्च पदों पर आसीन लोगों को बोलने से पहले अपने आप में मंथन करना होगा कि उनके बोलने का अभिप्राय क्या है और इसका असर पूरे समाज पर क्या होगा। चरित्र और नैतिकता की बातें करने वाले लोग जब अपनी सीमा लांघ जाते हैं तो इस तरह की समस्या उठ खड़ी होती है। यह बात भी तय है कि थोड़ा समय गुजर जाने के बाद लोग भूल जाएंगे किन्तु क्या इतिहास इस बात को विस्मृत कर पाएगा? क्या ऐसे बयान देेने वाले अपने आपको माफ कर पाएंगे? उन्हें तो न बोलने का मलाल है और न माफी मांगने पर शर्म। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस पूरे संदर्भ में लगभग अनुचित किस्म की ही सही, शिकायत है कि मीडिया में ऐसे लोगों को स्थान नहंीं दिया जाना चाहिए। यह बात सही है कि मीडिया में ऐसे लोगों की करतूतांे को स्थान नहीं दिया गया तो लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि बड़ी बड़ी कुर्सियों पर बैठने वाले महानुभाव अपनी ही जननी अर्थात किसी भी स्त्री के बारे में कितने उम्दा खयाल रखते हैं। इसके बावजूद ऐसे बेहूदे बयान को उसकी हैसियत के अनुरूप् स्थान दिया जाना चाहिए। बल्कि इससे एक कदम आगे यह कि आने वाले दिनों में मीडिया में ऐसे लोगों को ब्लेकलिस्ट कर दिया जाना चाहिए और उनके नाम को, काम को कहीं भी स्थान नहीं दिया जाए। इस बात से किसी को इंकार नहीं होगा कि मीडिया अगर इन्हें स्थान न दे ंतो शायद कोई इन्हें जानें तक नहीं इसलिये ऐसे लोगों के खिलाफ मीडिया का रूख कठोर होना चाहिए। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-4088845348585914178?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/4088845348585914178/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/08/vivad.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/4088845348585914178'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/4088845348585914178'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/08/vivad.html' title='vivad'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-5338954598965951567</id><published>2010-08-02T23:39:00.000-07:00</published><updated>2010-08-02T23:39:38.185-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='jano apne adhikar'/><title type='text'>RTI Aur Hum</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;आरटीआई का उपयोग और आपकी छवि&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;-मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सूचना का अधिकार कानून का यदि आप उपयोग नहीं करते हैं तो समझ लीजिये कि आप इस संसार के सबसे अच्छे लोगों में हैं और इसका उपयोग करते हैं तो आप उन लोगों के बीच खलनायक के तौर पर माने जाएंगे जिनका आपके हस्तक्षेप से कुछ नुकसान होने की आशंका है। पहले तो आपको समझाया जाएगा कि आप भले आदमी हैं। आपकी ऐसी छवि नहीं है और जब आप इन बातों में नहीं आएंगे तो वे कहेंगे आखिर आप भी वैसे ही निकले। लब्बोलुआब यह है सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने वाले किसी भी उस व्यक्ति की जो आमतौर पर किसी विवादों में नहीं पड़ता है। मुझे पता नहीं कि आपने आरटीआई अर्थात सूचना के अधिकार के तहत कोई जानकारी मांगने का कभी कोई प्रयास किया या नहीं और यदि इस कानून का उपयोग आप कर रहे हैं तो आपके अनुभव की भी मुझे कोई जानकारी नहीं। इस मामले में मैं अपना अनुभव जरूर आज आपसे बांटना चाहूंगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आरटीआई है क्या, यह तो अब लोगों, खासतौर पर इलिट क्लास को बताने की जरूरत नहीं है। इसका उपयोग कहां और कैसे करना, यह भी उन्हें मालूम है और यह भी कि इसके उपयोग से उनके हितों पर क्या असर पड़ सकता है। कभी इस कानून का सच जानना है तो आप सीधे न सही, उस व्यक्ति के कान में फुसफुसा दीजिये कि आप फलां जानकारी के लिये सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने जा रहे हैं। यकिन मानिये, ऐसा करने से वे आपको रोकेंगे तो बिलकुल भी नहीं लेकिन आपको नेक सलाह दी जाएगी...कहां आप झंझट में पड़ रहे हैं। आपकी छवि ऐसी नहीं है। देख लेते हैं कि रास्ता कहां से निकल सकता है। मुझे एकाधि बार ऐसे अनुभव से गुजरना पड़ा है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैं नहीं जानता कि ऐसे सलाह देने वाले मेरे दोस्त हैं या दुश्मन लेकिन उन्होंने मेरे अधिकार का हनन जरूर किया है अथवा कर रहे हैं, यह मेरा मानना है। जब वे कहते हैं कि आपकी छवि ऐसी नहीं है तो मुझे लगता है कि सूचना के अधिकार के तहत मैं जानकारी मांगने गया तो इलिट वर्ग में कुख्यात हो जाऊंगा। जो लोग आरटीआई का उपयोग कर रहे हैं, लगभग हर आदमी को इसी नजर से देखा जाता है। सवाल यह है कि इस कानून के उपयोग से इतना डर क्यों? क्यों कानून के उपयोग से रोका जाता है? क्या इस कानून के तहत मांगी गई जानकारी से पोल खुल जाती है? इन सभी सवालों का जवाब हां में होगा क्योंकि डर इस बात का है कि आपके द्वारा मांगी गयी जानकारी उन तमाम गलत फैसलों और उन निहित स्वार्थों को सामने ले आएगी जो वे छिपाना चाहते हैं। यह भी सच है कि आरटीआई ने जानकारी छिपाने वालों की नींद उड़ा दी है। शायद यही कारण है कि आरटीआई का उपयोग करने वालों को लगभग असामाजिक तत्व मान लिया गया है। मध्यप्रदेश में नहीं किन्तु किसी अन्य राज्य में इस कानून का उपयोग करने वाले किसी एक्टिविस्ट को मौत के घाट उतार दिया गया है। मध्यप्रदेश इस मामले में अभी भीरू है लेकिन ये भीरू कब वीरता का परिचय दे बैंठेंगे, कहा नहीं जा सकता। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सूचना के अधिकार का डर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है क्योंकि इस अधिकार का उपयोग करने पर रोक तो नहीं है किन्तु जानकारी देने का अर्थ छिपी बातों को उजागर करना है। यह उनकी स्वेच्छारिता से नहीं, बल्कि कानून के डंडे के डर से हो रहा है। शायद यही वजह है कि पहले पहल तो हरसंभव कोशिश की जाती है कि किसी भी तरह से इस कानून का उपयोग नहीं किया जाए और किया गया तो उपयोगकर्ता को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यहां तक कि उसके साथ बैठने में भी परहेज किया जा रहा है जबकि कल तक उसी के साथ बैठने में यही लोग गर्व का अनुभव करते थे। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने का नागरिक हक संविधान में है और इस बारे में हीला-हवाली करने वालों के खिलाफ दंड का प्रावधान भी है। व्यावहारिक रूप् में देखा जाए तो अधिकांश मामलों में टालने का रवैया अख्तियार किया जाता है। यह भी सच है कि कानून का उपयोग करने वालों को पूरी प्रक्रिया पता नहीं होती है और इसका फायदा संबंधित लोग उठाने से नहीं चूकते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ऐसा भी नहीं है कि सूचना के अधिकार देने में लगभग सभी लोग खुद को बचाना चाह रहे हैं अथवा जानकारी देने से बचने की कोशिश में है। इसका एक पक्ष और भी है जिस पर गौर करना, सोचना और रास्ता निकालने की कोशिश करना चाहिए। नब्बे बल्कि पिचनाबे फीसदी जानकारी छिपायी जा रही है या नहीं दी जा रही है अथवा लेटलतीफ की जा रही है तो यह तंत्र की कमजोरी है किन्तु सूचना के अधिकार के तहत जानकारी चाहने वालों के समक्ष एक बड़ी बाधा उन लोगों से भी है जो निजी हित के लिये इसका उपयोग धड़ल्ले से कर रहे हैं। यह कहना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा है कि कौन सी जानकारी सर्वजनहित के लिये है और कौन सी जानकारी व्यक्तिगत हित अथवा परेशानी खड़ी करने के लिये। ऐसी स्थिति में कई बार आवश्यक होने के बावजूद सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मिल पाना दुष्कर कार्य हो जाता है। सूचना के अधिकार कानून से जुड़े लोगों से बात करने पर यह जानकारी मिलती है उनकी परेशानी का कारण ज्यादतर वे लोग होते हैं जो रंजिशवश जानकारी हासिल करना चाहते हैं। जानकारी उपलब्ध कराना कानूनी दायित्व है किन्तु इस सबमें समय और अर्थ दोनों का बड़ा नुकसान होता है। ये लोग इस बात को मानते हैं कि सही और जनहित से संबंधित जानकारी मांगी जानी चाहिए किन्तु सिर्फ जानकारी के लिये जानकारी मांगने से कई तरह की उलझने पैदा हो रही हैं। पहले से सूचना के तहत जानकारी मांगने वालों की लम्बी लाइन है। जो वास्तव में जनहित में अथवा न्याय पाने की गरज से जानकारी चाहते हैं, उन्हें परेशानी हो रही है। किसी भी विभाग का प्रशासकीय अमला सीमित है और एक जानकारी देने में उस प्रशासकीय अमले का सत्तर फीसद अमला जुट जाता है। मांगी गयी जानकारियों का कहां और किस तरह उपयोग किया जाएगा अथवा किया जा रहा है, इस बारेे में कुछ बातें अस्पष्ट हैं, इस बात का भी खुलासा किया जाना चाहिए। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सूचना के अधिकार के तहत जानकारी नहीं देने के प्रयास में संबंधित लोग नहीं रहते हैं तो कुछ परेशानियां अकारण इस कानून का उपयोग करने वालों से भी हो रही है। हालांकि दूसरा पक्ष शायद बड़ा नहीं है। यदि होता तो बार बार और हर बार सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने की बात से ही अड़चनें पैदा नहीं की जाती। ऊपर जिन पांच फीसदी लोगों का उल्लेख मैंने किया है, वह गैरवाजिब नहीं है किन्तु इन पांच फीसदी लोगों की आड़ लेकर पिचानबे फीसदी लोगों को जानकारी से वंचित किया जा रहा है, यह भी सच है। मुझे लगता है कि इस कानून का उपयोग करने से यदि कोई आपको खलनायक मान कर चलता है तो चले लेकिन आप अपने अधिकार का उपयोग करना नहीं भूलें। इसके लिये यह भी जरूरी है कि आप कानून का अध्ययन कर लें और उन बारीकियों को समझ लें जिससे आपको इस कानून के उपयोग में सुविधा होगी। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-5338954598965951567?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/5338954598965951567/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/08/rti-aur-hum.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/5338954598965951567'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/5338954598965951567'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/08/rti-aur-hum.html' title='RTI Aur Hum'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-I16h8mwqSnE/Ta-3omyAPcI/AAAAAAAAAD4/JJNPXUjxcn4/s220/Manoj%2BKumar.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5788123601717760337.post-3392366991968368038</id><published>2010-08-02T08:46:00.000-07:00</published><updated>2010-08-02T08:46:25.495-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>jago sathiyo</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;हम क्यों करें मुफ्त की समाजसेवा&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;-मनोज कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लगभग एक सप्ताह पहले दिल्ली से आरंभ हो रहे किसी बेवसाइट के संचालक का फोन आया। वे चाहते थे कि मैं उनके लिये लिखूं। साथ ही उनकी मंशा थी कि मेरे ब्लॉग पर लगे आलेख का वे उपयोग करें। पहले पहल तो मुझे उनके आग्रह पर कोई आपत्ति नहीं हुई। मैंने हामी भर दी कि जो आलेख मेरे ब्लाग पर पब्लिश हो चुके हैं, उनका आप उपयोग कर सकते हैं। उन्होंने ऐसा किया भी। बेवसाइट शुरू होने के पहले तक मुझे पता नहीं था कि वे कितने और कैसे लेख का उपयोग करेंगे अथवा कर रहे हैं। इस बीच मैंने फोन करने वाले सज्जन को मेल से संदेश भेजा कि आप चाहें तो केवल आपके लिये आलेख लिखूंगा किन्तु इसके बदले मानदेय की व्यवस्था जरूर चाहूंगा। मेरे इस मेल का जवाब देना जरूरी नहीं समझा। अलबत्ता दो दिन बाद उनका संदेश मिला जिसमें बेबसाइट के आरंभ होने की सूचना थी। वेबसाइट पर जाकर सर्च किया तो पता चला कि मेरे दो आलेख का उपयोग किया गया है। एक आलेख मेरे नाम के साथ और एक आलेख बिना नाम के दिया गया है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बेवसाइट के आरंभ होने पर बधाई का संदेश तथा एक नया आलेख बेवसाइट के लिये प्रेषित किया। अपनी शिकायत भी मैंने संदेश में भेजा। इस बार उन महाशय का जवाब आया इस सफाई के साथ कि इस वेबसाइट का संचालन कोई समाजसेवी संस्था करती है और जो लेखकों को भुगतान नहीं करती है। महोदय साथ में लिखते हैं कि वे मुझे अंधेरे में नहीं रखना चाहते हैं इसलिये जानकारी दे रहे हैं और साथ में लेख वापस भेज रहे हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आप सोच रहे होंगे कि इस सब रामकहानी का मतलब क्या? आप ठीक सोच रहे हैं। दरअसल मैं अपने साथ हुए इस वाकये के माध्यम से यह बताना चाहता हूं कि बेवसाइट बनाने के लिये, संचालन के लिये तो सबके पास धन है किन्तु लेखकों को देने के लिये उनके पास कौड़ी नहीं है। यह ठीक है कि वे समाजसेवा करें किन्तु हम पत्रकार/लेखकों से मुफ्त की सेवा की उम्मीद क्यों रखते हैं। हमारा जीवन तो लेखन से ही चलता है और हम मुफ्त के चंदन घिसते रहे तो हमारी हालत समझी जा सकती है। बेवसाइट समाजसेवा के लिये है तो विज्ञापन क्यों लिया जा रहा है, उससे होने वाली कमायी आखिर किसके जेब में जा रही है। मैं अपने उन तमाम ब्लॉगर लेखक/पत्रकार साथियों से आग्रह करता हूं कि जो लोग समाजसेवा का दंभ भर रहे हैं, उनके लिये एक लाइन न लिखें। हम मीडिया के लोग हैं और मीडिया के लिये बिना शर्त लिख रहे हैं और लिखते रहेंगे। जिन्हें समाजसेवा का शौक है, वे हमसे कोई उम्मीद न करें। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5788123601717760337-3392366991968368038?l=mpreporter.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mpreporter.blogspot.com/feeds/3392366991968368038/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/08/jago-sathiyo.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/3392366991968368038'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5788123601717760337/posts/default/3392366991968368038'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mpreporter.blogspot.com/2010/08/jago-sathiyo.html' title='jago sathiyo'/><author><name>Manoj Kumar</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07148316160659906464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' 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लेकिन इससे इतर उनकी तादात भी कम नहीं है जो संपादकीय विभाग के साथी तो नहीं थे लेकिन उनसे भी कमतर नहीं। इन सबको याद करते हुए मैं अपने पुराने दिनों में लौट जाना चाहता हूं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बहरहाल, इस बारे में बातंे तफसील से करता हूं। गुुजरे दो दशक में पत्रकारिता का चेहरा बदल गया है। टेक्नॉलाजी ने विस्तार पा लिया है। अब हें
