तकली की याद में...


-मनोज कुमार
यादें हैं यादों का क्या! जाने कब और कैसे आ जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। जब सारी दुनिया सोशल साइट्स की दीवानी हो रही हैं तब मुझे बापू की तकली का अनायस स्मरण हो आया। आपको भी तकली की याद हो? आपने भी अपने स्कूली समय में पोनी से तकली के माध्यम से सूत कातना सीखा होगा। मैंने तो ऐसा खूब किया है। तकली की याद दरअसल अनायस नहीं आयी बल्कि बच्चों को संस्कार देने की गरज से तकली को याद करना पड़ा। जैसे गांधी व्यक्ति नहीं एक विचार हैं, वैसा ही उनकी तकली एक उपक्रम नहीं बल्कि विचार है जो न केवल मन को एकाग्र करती है बल्कि यह विशवास भी दिलाती है कि भारत की जमीन यहीं से शुरू होती है और आगे चलती जाती है। ग्लोबल विष्व का जो सपना दुुनिया देख रही है, उसमें भारत का गांव कहीं नहीं दिखता है। गांधी जी की बातें खूब हो रही है, पर गांधी विचार पर केवल फैषन के रूप में बात हो रही है। मेरा मन तब आहत हो जाता है जब मेरे आसपास की नयी पीढ़ी का संबोधन गांधीजी को लेकर लगभग अभद्र होता है। उनकी यह अभद्रता सोची-समझी नहीं है बल्कि संस्कारगत अभाव के कारण पनपी हुई है। नयी पीढ़ी के व्यवहार को जांचने पर पाया कि उनमें विचार का पौधा तो कभी लगाया ही नहीं गया। उन्हें दौड़ना सीखा दिया गया लेकिन जिंदगी जीना नहीं सिखाया गया और परिणामस्वरूप वे बिना मकसद भाग रहे हैं। उनका मकसद मोटी सैलरी वाली नौकरी, एक बड़ी कार और तिस पर कमाऊ बीवी ही पाना रह गया है। इसको पाने के बाद मां-बाप भी यूजएंडथ्रो की श्रेणी में आ जाते हैं। यह अस्वाभाविक नहीं है और इसके लिये स्वयं पालक जवाबदार हैं। उन्होंने अपने जीवन में जो सीखा, उसे अपनी बाद की पीढ़ियों में हस्तांतरित करने की कोई कोशि
श नहीं की और उल्टे कहा नयी पीढ़ी है....नये जमाने के साथ चलेगी।
नये जमाने की बात करते हैं तो एक डॉयलाग कि जमाना जितना भी बदल गया हो, बच्चे आज भी औरतें ही जनती हैं, सारी सोच बदल जाती है। लगता है कि क्या जमाने के साथ हमारी सोच भी छोटी होती चली जा रही है? क्या हम नयी चीजों को सीखने के साथ पुराने संस्कारों को भूलते चले जा रहे हैं? इन्हीं पुराने संस्कारों में बात होती है तकली की। तकली को मैं एक विचार के रूप में अपने साथ रखना चाहता हूं। तकली के रूप में इस विचार को नयी पीढ़ी के साथ बांटना चाहता हूं। एक ऐसा विचार जो न केवल संस्कार देता है बल्कि संयम भी सिखाता है। सरपट भागती जिंदगी में एकाएक सबकुछ पा लेने की चाहत को हवा देेने के बजाय आहिस्ता आहिस्ता पा लेने की सीख देती है तकली। तकली के रूप में यह विचार हमारे बीच से कैसे और कब गायब हो गया, अहसास ही नहीं हुआ। अब जबकि भौतिक रूप से तकली को संजोने की इच्छा जागृत हुई तो मैं अवाक था। तकली हमारे विचारों और यादों से ही नहीं, बाजार से भी लुप्त हो गई है। भोपाल से दिल्ली तक के बाजारों में ढूंढ़ने पर भी तकली नहीं मिली। तकली प्राप्त करने के अपने प्रयासों में सबसे पहले तो मुझे याद दिलाना पड़ा कि तकली होती क्या है। कुछ ने चरखा बता दिया लेकिन जब उनके स्कूल के दिनों की याद दिलायी तो उन्हें स्मरण हो आया। खैर, अब तक की कोशिश  में मैं नाकाम हूं लेकिन उम्मीद है कि तकली और तकली का विचार ओझल है लेकिन विस्मृति की स्थिति में नहीं। कोई ना कोई, एक दिन मुझे तकली और विचारों से मेरे मन को उजास से भर देगा। तब तक मैं तकली का रास्ता देखता हूं....   

टिप्पणियाँ

  1. तब यह तकली केवल 15 पैसे में मिलती थी। सचमुच उस समय कक्षा में तकली कातने का एक विशेष कालखंड होता था। हम खूब धागे बुनते। सपने की तरह। कभी काम आएगी यह कला। पर आज यह कला लाक हो गई है, दिमाग के किसी कोने मे। यह शर्म की बात है कि लोगों को बताना पड़ता है कि तकली होती क्‍या है ? कितनी तकलीफ की बात है।

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