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December 28, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सम्पादक, मैनेजर और जवाबदारी

मनोज कुमार       जब हम सब स्कूल में पढ़ते थे तो एक स्वाभाविक सी आदत होती थी कि हम अपनी गलती दूसरों पर ढोल दें. ऐसा करके हम कुछ समय के लिये डांट से बच जाते थे लेकिन इससे हमें ही नुकसान होता था. इस बात को कितने लोगों ने समझा और सीखा, मुझे नहीं मालूम लेकिन मुझे जल्द ही अपनी गलती का अहसास हो गया और कोशिश करके अपनी गलती अपने सिर लेने लगा. इससे मुझे दो फायदे हुये जिसमें पहला यह कि पोल खुल जाने पर बड़ी सजा का डर मन से खत्म हो गया और दूसरा अपनी गलती मान लेने पर आत्मविश्वास जागने लगा. आज जब उम्र के पचास के आसपास हूं तो यह मेरी शक्ति बन चुका है. खैर, इन दिनों इसी को संबद्ध करते हुये एक नये अनुभव से गुजर रहा हूं. अखबारों में छपने वाले लेख के आखिरी में सारी जवाबदारी लेखक पर थोपते हुये कि व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, इनसे समाचार पत्र का कोई लेना-देना नहीं है.
अखबारों में इन पंक्तियों ने मेरे बचपन की यादें ताजा कर दी हैं. ऊपर जो बातें मैंने लिखी, वह इन पंक्तियों से बहुत अलग नहीं है. अब मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि जब अखबारों में सम्पादक नाम की संस्था होती है और वह प्रकाशन के पूर्व लेखों के तथ्…