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November 2, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मीडिया और गर्ल

मैं नहीं जानता कि बहस किस बात पर चल रही है किन्तु जिन मुद्दों पर बात चल रही है वह एतराज करने वाली है। मैं एक बेहद पारम्परिक परिवार से हूं जहां छोटी छोटी बातों पर गौर किया जाता है किन्तु मैं और मेरा परिवार लड़कियों के भविष्य के खिलाफ कतई नहीं रहा है। मेरा आग्रह हमेशा रहा है कि मर्यादित व्यवहार कर लड़की हो या लड़का, अपने काम की तरफ पहले ध्यान दे। बहरहाल, पहली बात तो यह कि लड़कियों के काम करने पर जो लोग आपत्ति दर्ज करा रहे हैं, वे डरे हुए लोग हैं। मैं एक बेटी का पिता हूं और उसकी उम्र अभी महज दस वर्ष है लेकिन उसके भविष्य के लिये मेरे पास अगले दस साल की प्लानिंग है। वह भी पायल और पायल जैसी लड़कियों की कतार में लगेगी और अपना कैरियर बनाने की कोशिश करेगी। मेरे लिये आज की पायल और कल की अपूर्वा में कोई फर्क नहीं दिखता।दूसरा एक मुद्दा कपड़े पहने जाने को लेकर है। यह भी समझ से परे है कि एक लड़की के जींस पहने जाने पर हंगामा क्यों? मेरा तो मानना है कि शरीर के बनावट और काम की जरूरत के हिसाब से कपड़े पहने जाने चाहिए। रिपोर्टिेग करते जाते समय किसी भी लड़की से अपेक्षा की जाये िकवह लहंगा-चुन्नी पहन कर काम करे तो …

बहस

यह कैसा राज्योत्सव?
मनोज कुमार
साल 1956 के एक नवम्बर को जन्मे मध्यप्रदेश की सर्जरी सन् 2000 में उसी तारीख को हुई थी। इस सर्जरी से मध्यप्रदेश का एक बड़ा हिस्सा अलग हो गया जिसे स्वतंत्र छत्तीसगढ़ राज्य के नाम से पुकारा गया। विकास के नाम पर छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य का दर्जा तो दे दिया गया किन्तु विकास कितना हुआ, यह बहस का विषय है। फिलहाल तो बात कर रहे हैं उस ऐतिहासिक भूल की जिसे मध्यप्रदेश पिछले 9 वर्षों से कर रहा है। एक नवम्बर को छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने पर राज्योत्सव मनाया जाना तो ठीक है किन्तु मध्यप्रदेश अपने विखंडित स्वरूप् में अपनी स्थापना दिवस का जश्न मनाये, यह मामला थोड़ा अनुचित लगता है। इस मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए कि मध्यप्रदेश का राज्योत्सव मनाया जाना कितना उचित है।
साथियों, यदि आप मध्यप्रदेश से वास्ता रखते हैं तो और नहीं रखते हैं तो भी, इस विषय पर अपनी राय जरूर भेजें। @जीमेल.com