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कुछ अलग

मदनलाल को गुस्सा क्यों न आये...
-मनोज कुमार
मदनलाल शरद जोशी की कहानी के किसी एक आम किरदार की तरह हैं। फर्क इतना है कि मदनलाल इस समाज में हैं और मध्यप्रदेश के उन लाखों लोगों में हैं जो किसी की कामयाबी को अपना मानते हैं। उनका यह मानना एक हिन्दुस्तानी होने के नाते है और ऐसे लोग हिन्दुस्तान को एक परिवार मानते हैं। जो लोग एक भारतीय की कामयाबी पर जश्न मनाते हैं, उन्हें पूरा हक है कि ऐसी मोहब्बत को ठुकराने वालों पर गुस्सा किया जाए। उज्जेन के मदनलाल को इस बात का गुस्सा है कि भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा में उन्होंने अपनी लाडली की सूरत देखी। उन्होंने भीतर ही भीतर कहीं सपना पाल लिया कि उनकी लाडली भी सानिया की तरह उनके अपने हिन्दुस्तान का नाम रोशन करेगी। अपने सपने की बुनियाद उन्होंने कोई आठ बरस पहले पैदा हुई अपनी बिटिया का नाम सानिया रख कर डाला था। संभव है कि मदनलाल अपनी लाडली को परियों के किस्से सुनाने के बजाय सानिया की बातें सुनाता होगा। बच्ची को बताता रहा होगा कि सानिया खेलती कैसे है...आदि इत्यादि। सानिया को लेकर इतने संवेदनशील मदनलाल का दिल टूट गया जब उसने खबर पढ़ी कि सानिया ने पाकिस्तानी …

जश्न

मीडिया मासिक पत्रिका समागम प्रकाशन के दसवे साल में मीडिया पर एकाग्र मासिक हिन्दी पत्रिका समागम ने अपने प्रकाशन का एक और शानदार गौरवशाली वर्ष पूर्ण कर लिया है। इसके साथ ही समागम दसवें वर्ष में प्रवेश कर गया है। समागम अपने सभी साथियों, मीडिया की वेबसाइट्स व परोक्ष, अपरोक्ष रूप से सहयोग करने वालों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए भविष्य में ऐसे ही सहयोग बनाये रखने की कामना करता है। भोपाल से प्रकाशित पत्रिका का समागम एक विशेष अंक फोटो पत्रकारिता पर केन्द्रीत है। इसमें मध्यप्रदेश सहित देश के वरिष्ठ फोटो पत्रकारों के बारे में जानकारी देने के साथ ही फोटो पत्रकारिता का इतिहास, वर्तमान और संभावनाओं की पड़ताल करने की कोशिश की जाएगी। साथ ही इस क्षेत्र में शिक्षा, रोजगार और तकनीकी पक्षों का भी समावेश किया जाएगा।
समागम का मई २०१० का अंक हिन्दी पत्रकारिता : कल और कल पर केन्द्रीत है। मई का माह पत्रकारिता के लिये विशेष महत्व का है। माह की पहली तारीख श्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है और पत्रकार भी श्रमजीवी होते हैं। पहले महत्वपूर्ण तारीख के बाद तीन मई को पत्रकारिता दिवस एवं तीस मई को प्रथम हिन्दी दैनिक उद…
नये दौर की, नये तेवर वाली गांव की लीडर
-मनोज कुमार

घर की चहारदीवारी और घूंघट में कभी अपना जीवन होम करने वाली ग्रामीण औरतें अब नये जमाने के साथ कदमताल कर रही हैं। वे नये तेवर के साथ मध्यप्रदेश के अलग अलग हिस्सों में यह जता दिया है कि वे एक बेहतर लीडर हैं जो न केवल घर सम्हाल सकती हैं बल्कि अवसर मिलने पर वे गांव की तस्वीर बदलने का माद्दा भी रखती हैं। मध्यप्रदेश के लिये यह नये किस्म का अनुभव है जब किसी ग्राम पंचायत की सरपंच अपने भ्रष्टाचारी सचिव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है तो कहीं गांधीगिरी के साथ ऐसे नाकाबिल सचिव के खिलाफ मैदान में उतर आयी हैं। यह वही मध्यप्रदेश है जहां भ्रष्टाचार से लड़ने में नाकाम सरपंच अपने दायित्वों से पलायन कर जाती थीं लेकिन आज वे सक्सेस लीडर के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। पन्द्रह बरस से शायद कुछ अधिक ही हुआ होगा जब मध्यप्रदेश में पंचायतीराज व्यवस्था लागू की गई थी। महात्मा गांधी का सपना था कि सत्ता में ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी हो और इसके लिये वे पंचायतीराज व्यवस्था को लागू करने पर जोर दिया करते थे। उनकी मंशा थी कि इस व्यवस्था में स्त्रियों को बराबर का भागीदार…