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August 28, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

स्वरोजगार बनाम स्टार्टअप

मनोज कुमार लम्बे सफर के बाद जब आप अपनी मंजिल तक पहुंचने वाले होते हैं तब रेल्वे स्टेशन पर सहसा आपकी नजरें कुली को ढूंढने लगती थी. कोई कुली लपक कर आता और आपके बोझ को अपने कंधों पर उठाकर रेल्वे स्टेशन से बाहर छोड़ आता था. लेकिन अब ऐसा नहीं होता है. अब आप कुली को नहीं ढूंढते हैं और रेल्वे स्टेशन पर कुली भी आपको नहीं मिलता है. समय बदल गया है. चुपके से आप यात्री के साथ साथ स्वयं भी कुली बन गए हैं, यह खबर स्वयं को नहीं हो पायी है. जब आप सफर के लिए सूटकेस खरीदने जाते हैं तो और खासियतों के साथ दुकानदार आपको बताता है कि इस सूटकेस के  पहिए घुमावदार और मजबूत है. आपको सामान ले जाने में दिक्कत नहीं होगी. तब वह आपको अपरोक्ष रूप से बता देता है कि कुली के तौर पर आप अपना भार स्वयं उठाने के लिए तैयार हैं. हमें भी लगता है कि कोई सौ-पचास रुपये बचाकर हमने बड़ा काम कर लिया है लेकिन यह भूल जाते हैं कि ऐसा करके हमने एक आदमी का रोजगार छीन लिया है. हमारे बोझ को उठाकर हमें राहत देता था तो हमें मिलने वाली राहत से उसके घर का चूल्हा जलता था. हम बेखबर रहे और हमारी वजह से कई घरों के चूल्हे बुझने लगे. कुछ लोग शायद म…