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एक थी माँ मदर इंडिया

मनोज कुमार माँ हाड़-माँस से बनी कोई जीव नहीं है. वह वस्तु भी नहीं है. माँ न केवल एक परिवार, एक समाज की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की संरचना की बुनियाद है. भारतीय संस्कृति में माँ का दर्जा हमेशा से उच्च रहा है. शायद यही कारण है कि एक स्त्री जब माँ बनती है तो उसका सम्मान, उसका ओहदा और उसके प्रति लोगों का भाव स्नेह से भर उठता है. माँ त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में हम सब में विद्यमान हैं. छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा व्यक्ति भी आज कामयाब है तो वह माँ के कारण. हमने इसलिए माँ को प्रथम पाठशाला भी कहा है. भारतीय संस्कृति में बच्चे को जन्म देने वाली माँ नहीं है अपितु जो धरती हमारा बोझ उठाती है, उसे भी हम माँ कहते हैं. सदियों से निर्झर बहती नदियों को भी हमने माँ का दर्जा दिया है. अन्न को केवल खाद्य वस्तु नहीं मानकर, माँ के समान माना है और अन्न के अपमान को माँ का अपमान कहा है. यह तो मेरी समझ की छोटी और अनगढ़ परिभाषा माँ के लिए है. माँ शब्द का केनवास बहुत बड़ा है. बावजूद इसके इन दिनों माँ के खिलाफ चुपके से जो जाल बुना जा रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं बल्कि शर्मनाक है. आप टेलीविजन के हाईप्रोफाइल …