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सहिष्णुता-असहिष्णुता का विलाप

मनोज कुमार  सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का यह मुद्दा उन लोगों का है जिनके पेट भरे हुए हैं। जो दिन-प्रतिदिन टेलीविजन के पर्दे पर या अखबार और पत्रिकाओं के पन्ने पर पक्ष लेते हैं दिखते हैं अथवा देश और सरकार को कोसते हैं। ये वही आमिर खान हैं जिन्होंने कभी भोपाल में कहा था कि उनकी मां उनसे कहती हैं कि बेटा,चार पैसा कमा ले। बेचारे गरीब आमिर को इस बार उनकी पत्नी कहती हैं कि देश असहिष्णु हो चला है,चलो देश छोड़ देते हैं। आमिर अपनी निजी बातें सार्वजनिक मंच से शेयर करते हैं. आमिर का यह विलाप देश की चिंता में नहीं है, यह अपने गिरते हुए फिल्मी बाजार को सम्हालने की कोशिश हैं। देश आमिर से पूछना चाहता है कि आमिर तुम स्टार नहीं होते तो यह बातें किस सार्वजनिक मंच से कहने का अवसर मिलता?कौन तुम्हें बोलने का मौका देता और मिल भी जाता तो कौन सुनता?चलो,आमिर कुछ देर के लिए मान भी लेते हैं कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे से तुम जख्मी हो और पत्नी की बात देशवासियों को अपना परिवार मानकर उनसे शेयर कर रहे हो। अब सवाल यह है कि देश में लगभग हर राज्य में किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो क्या एक देशभक्त आमिर का कर्तव्…