30 मई 1826 से हिंदी पत्रकारिता का श्रीगणेश होता है. इस लम्बे सफर की ख़ास बात यह रही कि समय गुजरने के साथ साथ हिंदी पत्रकारिता का फलक बढ़ता गया. बात यहाँ तक पहुंच गई कि अंगेरजी के प्रकाशनों को हिंदी की ओर आना पड़ा. आपातकाल से भी जूझ कर हिंदी पत्रकारिता ने अपना गौरव बढ़ाया लेकिन कोरोना काल आते तक सम्पादक की सत्ता समाप्त हो चुकी थी. कल की पत्रकारिता आज की मीडिया बन गई थी. नतीजा यह निकला कि बड़ी संख्या में साथी बेरोजगार हो गए. अख़बार मरे तो नहीं मरणासन्न हालात में पहुंच गए इन्ही मुद्दों पर चर्चा समागम के नए अंक में. विस्तार से पूरा अंक पढ़ने के लिए समागम के वेबसाइट www.sabrangweb.com पर जाकर पीडीफ देखें
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
‘ऋषि समागम व्याख्यान’-2026
दुनिया ने कहा ईश्वर ही सत्य है और गांधी ने कहा सत्य ही ईश्वर-अनुराधा शंकर सिंह भोपाल। यूरोप ने भारतीय मेधा का अपने फायदे के लिए लाभ लिया...
-
-अनामिका कोई यकीन ही नहीं कर सकता कि यह वही छत्तीसगढ़ है जहां के लोग कभी विकास के लिये तरसते थे। किसी को इस बात का यकिन दिलाना भी आस...
-
शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक स्वाधीनता संग्राम और महात्मा गांधी पर केन्द्रीत है. ...
-
प्रो. मनोज कुमार बिहार इलेक्शन में प्रशांत किशोर कागज के फूल साबित हुए हैं. चुनाव परिणाम के पहले वे कह रहे थे कि उनकी पार्टी जनसुराज को 13...
