मंगलवार, 28 जुलाई 2015

यूं छू लिया आसमां

-अनामिका
कहते हैं कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती और ऐसी कोशिश करने वाले और आसमां छू लेने वालों से मुलाकात करनी है तो आपको छत्तीसगढ़ राज्य के उन गांवों में जाना होगा जिन गांवों के बारे में आज भी लोगों को ठीक से मालूम नहीं होता यदि उनके गांव की बिटिया अपने हौसलों के बूते खुद के साथ गांव का नाम रोशन नहीं किया होता। छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों और उनके सहयोग से स्वयं सहायता समूह की सफलताओं की अनेक कथाएं हैं लेकिन अब इससे आगे निकल कर उन लड़कियों ने मिसाल बनायी है जिस पर चलने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी लेकिन ऐसा हुआ है। शारीरिक रूप से अक्षम मानी जाने वाली लड़कियों के लिए बैशाखी उनका सहारा नहीं रही तो लगन ने ऐसे बेटियों को देश के नक्शे पर उभरने का अवसर दिया है। महिला सहभागिता और उनके आर्थिक समृद्धि-सशक्तिकरण के लिए किये जा रहे प्रयासों की अनकथ कथाएं और महिलाओं के लिए पे्ररणा का कार्य करती हैं।
राजधानी रायपुर से महज 25-30 किलोमीटर की दूरी पर बसा है धरसींवा विकासखंड और इसी विकास खंड का एक छोटा सा गांव है गिरौद। गिरौद दूसरे गांव की तरह कभी था लेकिन आज उसकी पहचान तारामती की सफलता के कारण अलग से चिंहित है। किसी राहगीर से पूछिए कि गिरौद कहां है तो शायद वह बता नहीं पाए लेकिन तारामती वाले गिरोद का पता वह झट से बता देगा। सवाल उठता है कि तारामती है कौन? कोई नेता, सामाजिक कार्यकर्ता या क्या जिसके नाम से गांव की पहचान बन गयी? जीहां, तारामती इनमें से कोई नहीं है। यह नाम है उस हौसलामंद युवती का जिनके आत्मविश्वास ने उन्हें और उनके गांव को नयी पहचान दी है। विशेष नि:शक्तता से पीडि़त तारामती का परिवार पिता की आमदनी पर पल रहा था। उनके पिता की आय से तारामती की कॉलेज की पढ़ाई भी चल रही थी लेकिन एक अनहोनी हो गई। पिता की अकाल मृत्यु से संकट का पहाड़ खड़ा हो गया। तारामती के कॉलेज की पढ़ाई तो दूर, रोजमर्रा के खर्चे के लिए खींचतान मचने लगी। तारामती के मन में था कि वह अपने परिवार को आर्थिक मदद करे। इसके लिए वह डाटा एंट्री ऑपरेटर बनना चाहती थी लेकिन यह ट्रेनिंग पाना उसके लिए मुसीबत भरा था। बिना फीस चुकाये कहां और कैसे ट्रेनिंग करे? यह बात अपनी जगह ठीक थी तो यह बात भी सच है कि जहां चाह है, वहां राह है। 
तारामती की हिम्मत और जज्बे के आगे सारी मुसीबतें छोटी साबित हुई हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना ने तारामती के सपने को साकार करने में मदद दी। खुद तारामती बताती हैं कि हुआ यो कि संासद महोदय ने गिरौद गांव को आदर्श ग्राम बनाने हेतु चयन किया। इसलिये हमारा गांव पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना हेतु चिन्हांकित किया गया। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन अंतर्गत पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना की जानकारी मुझे मिली। थोड़ी कोशिश के बाद इस योजना के तहत मुझे कस्टमर केयर एक्जीक्यूटिव का 03 माह का नि:शुल्क प्रशिक्षण ओरियन एडूयेक्ट प्राईवेट लिमिटेड,रायपुर से प्राप्त करने का अवसर मिला। प्रशिक्षण के दौरान, प्रशिक्षण सामग्री, यूनिफार्म, बैग इत्यादि नि:शुल्क प्राप्त हुआ इसके साथ ही घर से प्रशिक्षण केन्द्र तक आने-जाने हेतु 100 रूपये प्रति दिन प्राप्त हुये।उन्हें प्रशिक्षण उपरांत ओरियन एडूयेक्ट प्राईवेट लिमिटेड, रायपुर में बैक ऑफिस एक्जीक्यूटिव का काम मिला। उन्होंने बताया कि आज वे अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपने सारे काम अच्छे से कर रही हैं। उनका वेतन 6 हजार रू. प्रतिमाह है। आर्थिक रूप से सक्षम होने के कारण अब वे अपने परिवार की भी मदद कर रही हैं। वे इस योजना के लिए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और शासन को धन्यवाद देते नहीं थकती हैं।
नि:शक्ता को पीछे छोडक़र अपने पैरों पर खड़े होने वाली गिरौद की तारामती जैसी ही रोचक कहानी है कि मायासिंह सिरदार की। कोरबा जिले की 22 साल की माया के पिता पुन्नीराम सिदार घर पर ही छोटा सा किराना दुकान चलाते हैं। इसके अलावा परिवार की आर्थिक जरूरतों की पूर्ति के लिए खेतों में भी काम करते हैं। हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी वह बच्चों की उच्चशिक्षा का बोझ नहीं उठा पा रहे थे। ऐसे में माया ने 12 कक्षा के बाद पारिवारिक आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। तारामती की तरह माया ने भी हौसला नहीं छोड़ा और अपने सहपाठियों से उसे जानकारी मिल की मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के तहत  हूनरमंद लोगों के लिए नि:शुल्क कोर्स चलाए जा रहे हैं। इसके लिए उसने अपने नजदीकी वेदान्त आई. एल. एंड एफ.एस स्किल्स स्कूल में सम्पर्क किया और हास्पिटालिटी कोर्स के लिए अपना नाम दर्ज कराया । राज्य सरकार की इस योजना में माया ने 45 दिनों के प्रशिक्षण के दौरान होटल में होने वाली सभी जरूरी बातें तथा स्वयं के व्यक्तित्व विकास के बारे में कई तरीके सीखें । जैसे-मेहमानों का स्वागत करना, उनसे बातें करना,खाना-परोसना आदि। 
माया की औपचारिक शिक्षा भले ही 12वीं कक्षा तक थी लेकिन कौशल उससे कहीं आगे की। राजधानी रायपुर स्थित एक होटल में 7 हजार की नौकरी भी की लेकिन उसकी उड़ान की तो यह शुरूआत थी। माया अब नए अवसरों की तलाश में थी। जल्द ही माया को गुजरात के पोरबंदर के होटल लॉड्स ईको इन में होस्टेस के पद पर काम करने का अवसर मिल गया। आज वह हर माह 12,500 का वेतन पा रही है। अपनी खुद की कमाई से उसने आगे पढ़ाई जारी रखते हुए स्नातक की डिग्री हासिल की और अब माया एम.बी.ए. भी करना चाहती है।  माया बताती है कि जिंदगी में कई बार इंसान को कुछ कड़े फैसले सिर्फ इसलिए लेने चाहिए ताकि वे अपनी जीवन शैली में एक बड़ा बदलाव ला सके। तारामती हो या माया, इनके बुलंद हौसलों ने इन्हें नयी जमीन दी है। सरकार की योजनाएं इनके लिए महज माध्यम बना है लेकिन इनके जज्बे ने इन्हें उड़ान भरने का मौका दिया है।

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

मीडिया नहीं, उद्योग की शिक्षा

मनोज कुमार 
     पत्रकारिता बीते जमाने की बात हो गई है, अब दौर मीडिया है इसलिए पत्रकारों के स्थान पर मीडिया कर्मियों का निर्माण किया जा रहा है. यूं भी मीडिया को उद्योग का दर्जा दिए जाने की मांग अर्से से चली आ रही है. कागज में कानूनन भले ही मीडिया को उद्योग का दर्जा नहीं दिया गया हो लेकिन व्यवहार में उसकी कार्यशैली एक उद्योग की भांति ही है. मीडिया पहले अपने लाभ को देखता है और इसे बचे शेष हिस्से में वह समाज का शुभ देखने की कोशिश करता है. इसमें मीडिया हाऊसों का दोष नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि कोई भी उद्योग शुभ की बात अपने लाभ प्राप्ति के बाद ही सोचता है और यह मीडिया उद्योग यही कर रहा है. इसी से जुड़ा प्रश्र है मीडिया शिक्षा का. मीडिया का चाल-चलन जब एक उद्योग के स्वरूप का है तो उसे काम करने वाले भी उसी नेचर के ही चाहिए होंगे, यह बात मान लेना चाहिए.
मीडिया शिक्षा संस्थानों की संख्या दिन-प्रति-दिन बढ़ रही है तो इसके पीछे क्या कारण होंगे? इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है और यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि लगभग तीन दशक पहले जब मीडिया शिक्षा नहीं थी तो पत्रकार किस दुनिया से आते थे? इन सवालों में ही जवाब छिपा हुआ है क्योंकि पत्रकार बनाया नहीं जा सकता है बल्कि वे अपने जन्म से ही पत्रकार होते थे और जो कमियां रह जाती थी, वह जमीनी अनुभव उन्हें पक्का कर देती थी. इसलिए कभी पत्रकार कर्मी जैसा शब्द चलन में नहीं आया किन्तु जब मीडिया की बात करते हैं तो इसके पीछे संस्थानों को मेहनत करनी होती है और उन्हें कॉरपोरेट कल्चर सिखाया जाता है. लिखने-पढऩे की योग्यता बहुत मायने नहीं रखती है किन्तु सलीकेदार कपड़े पहनना, अंग्रेजी में बोलना और संस्थान के प्रति स्वयं से बढक़र समर्पित होना. उन्हें यह भी सिखाया जाता है कि वे कॉरपोरेट जर्नलिस्ट हैं और समाज के गरीब, पिछड़े और अत्याचार के शिकार लोगों पर तब खबर लिखी जाए, जब अखबार या टेलीविजन चैनल की लोकप्रियता में कमी आने लगे. वरना लाइफस्टाइल, खाना-खजाना, कार, मोबाइल और ऐसे मंहगे उत्पादों के बारे में ही बात करते रहना जिससे विज्ञापनों से होने वाली आय में कमी ना हो. मीडिया शिक्षा को इस तरह डिजाइन किया गया है जहां हिन्दी को सर्वोच्च स्थान देने की बात तो कही जा रही है लेकिन अंग्रेजी का पल्लू पकडऩा मजबूरी बना दी गई है. 
ऐसा भी नहीं है कि मीडिया में आने वाली नई पीढ़ी के भीतर आग नहीं है या वह सामाजिक सरोकार से बाबस्ता नहीं रखती हैं किन्तु तीन वर्ष की शिक्षा के दरम्यान उनका मानस कॉरपोरेट का बना दिया जाता है. सपनों की दुनिया में उन्हें इस तरह धकेल दिया जाता है कि वे पत्रकारिता की चुनौतियों का सामना करने का साहस नहीं कर पाते हैं और सुविधाओं की मीडिया का लाल कॉरपेट उन्हें भाने लगता है. बंद शीशे वाली बड़ी गाडिय़ों में, महंगे मोबाइल सेट्स पर सोशल मीडिया से जुडक़र वे एक खासवर्ग की पसंद हो जाते हैं. विचारधारा का कोई स्थान नहीं होता है और तर्क के स्थान पर कुतर्क उनका अंतिम औजार होता है. मीडिया शिक्षा की यह कमजोरी नहीं बल्कि मीडिया उद्योग की यह नसीहत है. 
एक थे प्रभाष जोशी जिन्हें शायद हमारे समय के आखिरी सम्पादक के तौर पर चिंहित किया गया है, उनके नक्शेकदम पर चलने वाले लोग थोड़े से बचे हैं तो पत्रकारिता से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की दुनिया में पहला कदम रखने वाले एसपी सिंह को कौन भुला सकता है? ये दोनों महारथी पत्रकारिता के ऐसे मिसाल हैं जो आधुनिक समय में अपनी पहचान बनायी और नयी पीढ़ी के लिए सीख. प्रभाषजी के बताये रास्ते पर चलकर साल में बड़ी संख्या में पत्रकार खबरों के लिए शहीद होते हैं तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसपी सिंह के रास्ते में चलने वाले पत्रकारों की कमी नहीं. असल पत्रकारिता शिक्षा जमीनी है और मीडिया तो उद्योग की शिक्षा है जहां अंग्रेजी की प्रेतछाया हमेशा अपनी मौजूदगी का अहसास कराती रहेगी।

सोमवार, 29 जून 2015

‘नेट न्यूट्रलिटी’ का अनसुलझा सवाल


-मनोज कुमार
संचार माध्यमों के विस्तार के साथ ही इंटरनेट ने एक ऐसी दुनिया क्रियेट की जिसके चलते विश्व-ग्राम की अवधारणा की स्थापना हुई। बहुसंख्या में आज भी लोग इंटरनेट फ्रेंडली भले ही न हुए हों लेकिन ज्यादतर काम इंटरनेट के माध्यम से होने लगा है। बाजार ने जब देखा कि इंटरनेट के बिना अब समाज का काम नहीं चलना है तो उसने अपने पंजे फैलाना आरंभ कर दिया और अपनी मनमर्जी से इंटरनेट यूजर्स के लिए दरें तय कर दी। भारत में चूंकि इस तरह का कोई कानून नहीं है लेकिन केन्द्र सरकार की सख्ती से अभी यह पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है। समाज का एक बड़ा वर्ग ‘नेट न्यूट्रीलिटी’ अर्थात नेट-निरपेक्षता का पक्षधर है अत: बाजार का फिलहाल कब्जा नहीं हो पाया है लेकिन उसने अपने नथुने दिखाना शुरू कर दिया है। ं ‘नेट न्यूट्रीलिटी’ देश के बहुसंख्यक लोगों के लिए यह शब्द एकदम नया,अबूझ और कुछ विदेशी रंग लिए हुए है।यह मसला पूरी तरह से इंटरनेट की आजादी और बिना किसी भेदभाव के स्वतंत्रता पूर्वक इंटरनेट का इस्तेमाल करने देने का मामला है। सामान्य भाषा में कहें तो कोई भी दूरसंचार कम्पनी या सरकार इंटरनेट के इस्तेमाल में भेदभाव नहीं कर सकती और न ही किसी खास वेबसाइट को फायदा और न ही किसी वेबसाइट को नुकसान पहुंचाने जैसा कदम उठा सकती है।  ‘नेट न्यूट्रलिटी’ शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले कोलम्बिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर टिम वू ने किया था। ‘नेट न्यूट्रलिटी’ को हम ‘नेट निरपेक्षता’, तटस्थ इंटरनेट या नेट का समान इस्तेमाल भी कह सकते हैं। 
नई तकनीकी ने दूरसंचार कम्पनियों के व्यवसाय को बहुत नुकसान पहुंचाया है। मसलन एसएमएस के जरिये संदेशों का आदान-प्रदान करने की सुविधा को व्हाट्सऐप, स्काइप, वाइबर, हाइक जैसे तमाम ऐप ने लगभग मुफ्त में देकर कम्पनियों की अकूत कमाई में सेंध लगा दी है। स्काइप के बाद व्हाट्सऐप और इसके जैसी कई इंटरनेट कॉलिंग सेवाओं से देश में और खासकर विदेशी फोन कॉलों पर काफी प्रभाव पड़ रहा है क्योंकि लम्बी दूरी की अंतरराष्ट्रीय फोनकॉल के लिहाज से इंटरनेट के जरिए फोन करना कहीं अधिक सस्ता पड़ता है। यही कारण है कि देश में एयरटेल की अगुआई में देश की तमाम दिग्गज दूरसंचार कम्पनियां खुले या छिपेतौर पर गोलबंद होकर व्हाट्सऐप,स्काइप, वाइबर, हाइक जैसे ऐप के बढ़ते उपयोग को देखते हुए अब वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल यानी वीओआईपी सेवाओं के लिए ग्राहकों से अलग से शुल्क वसूलना चाहती हैं। इसकी शुरुआत भी एयरटेल ने की और एक ही डाटा पैक से नेट सर्फ के लिए अलग शुल्क और वाइस कॉल के लिए अलग शुल्क और एयरटेल जीरो जैसी लुभावनी योजनाओं की घोषणा करके नेट निरपेक्षता पर विवाद खड़ा कर दिया। हालांकि जनता, सरकार और इस बदलाव की जद में आने वाली कम्पनियों के दबाव में फौरीतौर पर इन योजनाओं को वापस ले लिया गया लेकिन ‘नेट निरपेक्षता’ का जिन्न अभी बोतल में बंद नहीं हुआ है। इस मुद्दे से जुड़े अनेक सवाल खड़े हैं और बहस जारी है।
  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंदिश लगाने का अर्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करना है और इससे कई तरह की समस्याएं सामने आती है जिसमें सत्ता और प्रशासन का निरकुंश हो जाना सबसे पहले होता है. नेट निरपेक्षता को हमारे अपने मुल्क भारत के संदर्भ में देखें तो चिंता स्वाभाविक होने के साथ साथ बड़ी हो जाती है. भारत में साक्षरता का प्रतिशत वैसे भी बहुत उत्साहजनक नहीं है और इंटरनेट के उपयोग करने वालों का प्रतिशत भी बहुत संतोषजनक नहीं है. आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों की संख्या भी अधिक नहीं कही जा सकती है और जब इंटरनेट सेवाओं का अलग अलग प्रभार लेने की स्थिति बनेगी तो भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में गिरावट स्वाभाविक होगी। यह स्थिति भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए चिंताजनक है क्योंकि इस स्थिति में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अपरोक्ष रूप से कुठाराघात होगा.
देखा जाए तो जनसंचार के विविध माध्यमों की तरह इंटरनेट का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। लगभग लगभग तीन दशक पूर्व इंटरनेट का जन्म हुआ और इस तीन दशक में इंटरनेट ने पूरे विश्व में स्वयं को स्थापित कर लिया। इंटरनेट यूं तो जनसंचार का ही एक स्वरूप मान लिया गया है किन्तु वास्तविकता यह है कि इंटरनेट महज एक तकनीक है और इस तकनीक के सहारे जनसंचार को विस्तार मिला है। इंटरनेट के आ जाने के बाद सबसे ज्यादा नुकसान मुद्रित माध्यम को हुआ। भारत सहित पूरी दुनिया में समाचार पत्र और पत्रिकाएं डिजीटल की दुनिया में आ गए. भारत को छोडक़र अन्य देशों में तो कागज पर अखबारों का मुद्रण बंद हो गया है और आने वाले समय में अखबार तो बने रहेंगे लेकिन इसका स्वरूप डिजीटल होगा. रेडियो और टेलीविजन जैसे माध्यमों के लिए इंटरनेट एक बहुउपयोगी तकनीक साबित हुआ है. सूचनाओं एवं विचारों के विश्वव्यापी आदान-प्रदान के लिए सोशल मीडिया का सर्वोच्च साधन इंटरनेट बना हुआ है. इस स्थिति में नेट निरपेक्षता को समाप्त किया जाता है तो यह समूचे विश्व के लिए घाती कदम होगा.
तीस साल की अल्प अवधि में अपना साम्राज्य फैलाने वाले इंटरनेट पर बाजार की नजर पहले से थी लेकिन शायद वे थोड़ा और समय इंतजार करना चाहते थे. भारत में साजिशन इसे लागू करने की प्रक्रिया आरंभ की गई किन्तु लगातार विरोध के बाद कदम तो बाजार ने पीछे खींच लिया लेकिन अभी वापस लौटने के मूड में दिखायी नहीं देता है. वैसे इस मामले में अब तक सरकार का कहना है कि इंटरनेट तक पहुंच को लेकर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने इस मामले पर एक कमेटी भी बनाई है जो जल्दी ही इस मसले पर अपनी राय देगी। इस मुद्दे पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया आम जनता या नेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों ने दी है। ट्राई को इस बारे में एक लाख से ज्यादा ईमेल भेजे गए हैं। सोशल मीडिया पर भी यह विषय छाया हुआ है। अब सारा दारोमदार सरकारी रपट, ट्राई की भूमिका और इंटरनेट यूजर्स की एकता पर टिका है क्योंकि मसला लाखों-करोड़ों के मुनाफे का है।

सोमवार, 22 जून 2015

पंचायतों का अस्तित्व


मनोज कुमार
मध्यप्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था में सरपंच की कुर्सी को नीलाम करने की कई खबरें पहले भी प्रकाश में आती रही हैं और इन खबरों ने पंचायतीराज व्यवस्था की कामयाबी पर सवालिया निशान लगाया है. हाल ही में आयी एक ताजा खबर ने तो पंचायतीराज व्यवस्था को ही दांव पर लगा दिया है. खबर है कि एक महिला सरपंच ने अपने पद को पॉवर ऑफ अटार्नी से दूसरे को हस्तांतरित कर दिया है. इसके पीछे महिला का तर्क है कि वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है, इसलिए उसने ऐसा किया. अपने आपमें चौंकाने वाला यह मामला यूं ही दबा रहता, यदि कोई चौकस पंचायत सचिव नहीं आता तो. नए पंचायत सचिव के आने से मामले का खुलासा हुआ. खबर के बाहर आने के बाद कानून क्या करता है और सरकार क्या करेगी, यह व्यवस्था का मामला है लेकिन पंचायतों को इस तरह दांव पर लगाया जा रहा है, यह बात तो साफ हो गई है जिस पर आप गर्व तो नहीं कर सकते हैं. सरपंच का चयन दया से नहीं बल्कि मतदाताओं के निर्णय से होता है और यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है. इस महिला सरपंच ने एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित किया है.
महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज का सुंदर सा सपना देखा था. तब शायद उनके मन में यह बात रही होगी कि गांव की सत्ता गांव के हाथों रहने से उसका समग्र विकास हो सकेगा लेकिन शायद उन्हें इस बात का अनुभव नहीं होगा कि एक दिन उनके सपनों को दांव पर लगाया जाएगा. बात थोड़ी जटिल है लेकिन समझ में भी ना आए, इतनी जटिल नहीं. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पंचायतीराज का ऐलान किया था. इस व्यवस्था में पूरे देश को जिम्मेदारी दी गई थी, उसमें मध्यप्रदेश भी शामिल था. मध्यप्रदेश में पंचायती राज का संचालन सफलतापूर्वक हो रहा था किन्तु समय आगे बढऩे के साथ पंचायतीराज व्यवस्था और सुंदर होने के बजाय कुरूप होता गया. चुनावी व्यवस्था ने पंचायतीराज व्यवस्था को जख्मी कर दिया. पहले तो गांव, फिर मोहल्ले और बाद के दिनों में घरों में तनातनी और विवाद की स्थिति उपजने लगी. पद और सत्ता की लालसा ने पंचायतीराज को दांव पर लगा दिया. देश के और प्रदेशों में भी पंचायतीराज व्यवस्था का यही हाल होगा, कहा नहीं जा सकता किन्तु मध्यप्रदेश को लेकर अनुभव कड़ुवे रहे हैं. इस कड़़ुवे अनुभव का यह ताजा उदाहरण है.
पूर्व में भी मध्यप्रदेश के अनेक पंचायतों में सरपंच पद पर बोली लगायी जाती रही है. साधन सम्पन्न और धनिक परिवारों द्वारा अनेक प्रकार से आर्थिक मदद कर सरपंच पद पर कब्जा करने की खबरों की पुष्टि हुई है. इधर पंचायत चुनाव को प्रभावी बनाने के लिए राज्य सरकार की योजना भी पंचायतीराज व्यवस्था को क्षति पहुंचा रही है. निर्विरोध निर्वाचन के लिए ईनाम दिए जाने की सरकार की योजना के चलते वास्तविक हकदार पीछे रह जाते हैं. निर्विरोध निर्वाचन को आधार बनाकर बाहुबली सरपंच पद पर कब्जा कर लेते हैं. राजधानी भोपाल के आसपास क्षेत्रों से लेकर प्रदेश के सुदूर अंचलों में ऐेसे कई मामले प्रकाश में आते रहे हैं. 
यह सब उदाहरण निराश करते हैं तो आशा की किरणें भी कम नहीं है. मध्यप्रदेश में खासतौर पर महिलाओं के जज्बे के आगे बाहुबली पानी भरते नजर आए हैं. इन महिलाओं ने कोई समझौता नहीं किया. सरकार द्वारा महिलाओं के लिए पंचायतों में आरक्षण का प्रावधान किए जाने से उनके हौसले और भी बढ़े हैं. बालाघाट की महिला सरपंच ने परवाह किए बिना गांव के बीचोंबीच बने शराब की दुकान को गांव की सीमा के बाहर कर दिया तो एक आदिवासी महिला सरपंच ने अपने बूते गांव में स्कूल में ऐसी व्यवस्था की कि वह स्वयं बच्चों के साथ पढऩे आने लगी. उसने अपने पद और मर्यादा का खयाल ही नहीं रखा अपितु दूसरे लोगों के लिए उदाहरण बन गयी. स्वच्छता, रोजगार और महिला अधिकारों के साथ बच्चों की शिक्षा, खासतौर पर बच्चियों की शिक्षा में भी महिला सरपंचों ने हौसले का परिचय दिया है. हालात यह है कि प्रदेश की कुछ पंचायतें तो ऐसी हैं जहां पूरी पंचायत पर महिलाओं का कब्जा और दबदबा है.
मध्यप्रदेश पंचायती राज के दोनों चेहरे समाज के सामने हैं. पंचायतीराज सत्ता नहीं बल्कि सहभागिता की व्यवस्था है। और इसे सत्ता समझ कर सत्ता के लाभ को पाने वालों की मंशा भी दिखती है और सहभागिता मानकर गांव के विकास के लिए प्रतिबद्ध पंचायतों की फेहरिस्त भी है. सवाल यह है कि महात्मा गांधी के सपनों के पंचायतीराज व्यवस्था को किस दिशा में आगे ले जाना है, इस पर मीमांसा करने की जरूरत होगी. राजस्थान में पंचायत चुनाव के लिए शैक्षिक योग्यता अगर शर्त है तो इस शर्त को लागू करने में दूसरे प्रदेशों को आगे आना होगा. यदि ऐसा नहीं किया गया तो अशिक्षा के बहाने पंचायतें दांव पर लगती रहेंगी.  

गुरुवार, 18 जून 2015

योग : भारत की आध्यात्मिक जीवन शैली

21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस  पर विशेष
-अनामिका
योग भारत में एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है। यह शब्द, प्रक्रिया और धारणा बौद्ध धर्म,जैन धर्म और हिंदू धर्म में ध्यान प्रक्रिया से संबंधित है। योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्रीलंका में भी स्वीकृति पाकर योग को विद्या के रूप में नहीं अलबत्ता जीवनशैली के रूप में अपना रहे हैं। यह भारत के लिए गर्व करने की बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों के चलते भारती की आध्यात्मिक जीवनशैली योग को संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता दी है। संयुक्त राष्ट्र की इस स्वीकृति के बाद योग पर उठने वाले कथित विवादों पर यंू ही विराम लग जाता है। 
समूचे संसार ने जीवन को सुखमय बनाने के लिए अनेक उपाय कर लिए हैं। यह सारे उपाय जीवन को सुखमय तो बनाते हैं किन्तु शारीरिक श्रम के अभाव एवं मानसिक तनाव से व्यक्ति का जीवन अनन्य बीमारियों से ग्रसित हो रहा है। इन संकटों से दवा क्षणिक मुक्ति का माध्यम है किन्तु योग क्रिया से मनुष्य के संकटों का स्थायी समाधान हो सकता है। भारत में आदिकाल से योग की परम्परा रही है। इसे आप भारतीय जीवनशैली की एक प्रक्रिया भी कह सकते हैं। आमतौर पर लोगों के लिए योग का अर्थ आसन और प्राणायाम होता है, जो शरीर को फिट रखने के लिए किए जाते हैं, लेकिन योग मात्र कुछ व्यायाम या चिकित्सा नहीं है. यह एकात्मता, अस्तित्व की एकता पर आधारित जीवन का एक तरीका है। योग शरीर-मन-बुद्धि का स्वयं के साथ, व्यक्ति का परिवार के साथ, परिवार का समाज के साथ, समाज का राष्ट्र के साथ और राष्ट्र का पूरी सृष्टि के साथ एकीकरण है।
योग का अर्थ युज्यते अनेन इति योग है, योग जुडऩे की एक प्रक्रिया है। योग वह दर्शन अभ्यास है, जिसके द्वारा आपको ज्ञात होता चलता है कि सब कुछ एक ही है। शरीर उस स्व का एक अस्थायी प्राकट्य है। वास्तविक आत्मा हमेशा अप्रभावित, आनंदित और अपरिवर्तनीय बनी रहती है। इसका अहसास करने के लिए, इस आनंदित आत्मा के साथ अपनी पहचान जोडऩे के लिए योग है। इसे बौद्धिक स्तर पर तो समझा जा सकता है, लेकिन इसका अनुभव करने के लिए लंबे और सतत अभ्यास की आवश्यकता होती है। योग का उल्लेख वेदों में भी किया गया है. ईश्वर के सबसे पहले प्रकट रूप हिरण्यगर्भ: ने विवस्वान को योग सिखाया और विवस्वान ने इसे मनु को सिखाया और फिर मनु से इसे कई योग्य पुरुषों और महिलाओं को सिखाया गया था। शैव परंपरा में बताया जाता है कि योग हमें भगवान शिव से मिला है। रामायण और महाभारत जैसे हमारे पुराणों में और इतिहासों में कई योगियों और योगिनियों का उल्लेख है। महर्षि पतंजलि ने अपने समय में योग के उपलब्ध ज्ञान को एकत्रित, संकलित और संपादित किया, जो उनके अपने अनुभव और योग की साधना पर आधारित है। भगवद्गीता में योग शब्द का कई बार प्रयोग हुआ है, कभी अकेले और कभी सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, संन्यास योग, कर्मयोग। वेदोत्तर काल में भक्तियोग और हठयोग नाम भी प्रचलित हो गए हैं। महात्मा गांधी ने अनासक्ति योग का व्यवहार किया है। पतंजलि योगदर्शन में क्रियायोग शब्द देखने में आता है। इन सब उद्धहरणों के बाद भी योग की परिभाषा करना कठिन काम है।
योग के शास्त्रीय स्वरूप, उसके दार्शनिक आधार, को सम्यक रूप से समझना बहुत सरल नहीं है। संसार को मिथ्या मानने वाला अद्वैतवादी भी निदिध्याह्न के नाम से उसका समर्थन करता है। अनीश्वरवादी सांख्य विद्वान भी उसका अनुमोदन करता है। बौद्ध ही नहीं, मुस्लिम सूफ़ी और ईसाई मिस्टिक भी किसी न किसी प्रकार अपने संप्रदाय की मान्यताओं और दार्शनिक सिद्धांतों के साथ उसका सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं। वैदिक संहिताओं के अंतर्गत तपस्वियों (तपस) के बारे में प्राचीन काल से वेदों में (900 से 500 बी सी ई) उल्लेख मिलता है, जब कि तापसिक साधनाओं का समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणियों में प्राप्त है। बुद्ध के पूर्व एवं प्राचीन ब्रह्मिनिक ग्रंथों में ध्यान के बारे मे कोई ठोस सबूत नहीं मिलता है।  हालांकि उपस्थित तथ्य बताते हैं कि सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रंथ में जिन ध्यान तकनीकों का वर्णन प्राप्त होता है, वे ध्यान की प्रथाओं और अवस्थाओं का वर्णन करते हैं जो बुद्ध से पहले अस्तित्व में थीं और साथ ही उन प्रथाओं का वर्णन करते हंै जो पहले बौद्ध धर्म के भीतर विकसित हुई।  
वर्तमान समय में अपनी व्यस्त जीवन शैली कारण लोग संतोष पाने के लिए योग करते हैं। योग से न व्यक्ति का तनाव दूर होता है बल्कि मन और मस्तिष्क को भी शांति मिलती है। योग स्वस्थ्य एवं तनावमुक्त जीवन के लिए बहुत ही लाभकारी है। योग न केवल हमारे दिमाग, मस्तिष्क को ही ताकत पहुंचाता है बल्कि हमारी आत्मा को भी शुद्ध करता है। आज बहुत से लोग मोटापे से परेशान हैं, उनके लिए योगा बहुत ही फायदेमंद है। योग के फायदे से आज सभी जानते हंै, जिस वजह से आज योग विदेशों में भी प्रसिद्ध है।
योग का लक्ष्य स्वास्थ्य में सुधार से लाकर मोक्ष प्राप्त करने तक है। जैन धर्म, अद्वैत वेदांत के मोनिस्ट संप्रदाय और शैव सम्रदाय के अन्तर में योग का लक्ष्य मोक्ष का रूप लेता है, जो सभी सांसारिक कष्ट एवं जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त करना है, उस क्षण में परम ब्रह्मण के साथ समरूपता का एक अहसास है। महाभारत में, योग का लक्ष्य ब्रह्मा के दुनिया में प्रवेश के रूप में वर्णित किया गया है, ब्रह्म के रूप में, अथवा आत्मन को अनुभव करते हुए जो सभी वस्तुओं में व्याप्त है। भक्ति संप्रदाय के वैष्णव धर्म में योग का अंतिम लक्ष्य स्वयं भगवन का सेवा करना या उनके प्रति भक्ति होना है, जहां लक्ष्य यह है की विष्णु के साथ एक शाश्वत रिश्ते का आनंद लेना।
उपरोक्त विवेचन से यह बात स्थापित होती है कि योग भारत में आदिकाल से है और यह एक जीवनशैली है। आज के समय में योग को जीवनशैली में शामिल किए जाने की अनिवार्यता है। मोदी सरकार ने यह पहल कर संदेश दिया है कि भारत की उन सभी प्राचीन एवं प्रामाणिक जीवनशैली को विश्व-समुदाय के मध्य पहुंचायेंगे जिससे भारत केवल कागज में नहीं बल्कि यर्थाथ में विश्व-गुरू बन सके। संयुक्त राष्ट्र की योग दिवस पर सहमति को इस दिशा का पहला कदम माना जाना चाहिए।

गुरुवार, 4 जून 2015

बापू कुछ मीठा हो जाये


प्रिय पाठकों,
महात्मा गांधी के जन्मदिवस के अवसर पर सन 2009 में अपने ब्लॉग में व्यंग लिखा था. तब मैंने आज विवादों में आई मेगी का विज्ञापन नहीं करने का अनुरोध महानायक अमिताभ बच्चन से  किया था. एक बार फिर आप के पढने के लिए पोस्ट कर रहा हु.
-मनोज कुमार
बापू इस बार आपको जन्मदिन में हम चरखा नहीं, वालमार्ट भेंट कर रहे हैं.गरीबी तो खतम नहीं कर पा रहे हैं, इसलिये  गरीबों को  खत्म करने का अचूक नुस्खा हमने इजाद कर लिया है. खुदरा बाजार में हम विदेशी पंूजी निवेश को अनुमति दे दी है. हमें ऐसा लगता है कि समस्या को ही नहीं, जड़ को खत्म कर देना चाहिए और आप जानते हैं कि समस्या गरीबी नहीं बल्कि गरीब है और हमारे इन फैसलों से समस्या की जड़ गरीब ही खत्म हो जाएगी. बुरा मत मानना, बिलकुल भी बुरा मत मानना. आपको तो पता ही होगा कि इस समय हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं और आप हैं कि बारमबार सन् सैंतालीस की रट लगाये हुए हैं कुटीर उद्योग, कुटीर उद्योग. एक आदमी चरखा लेकर बैठता है तो जाने कितने दिनों में अपने एक धोती का धागा जुटा पाता है. आप का काम तो चल जाता था  लेकिन हम क्या करें. समस्या यह भी नहीं है, समस्या है कि इन धागों से हमारी सूट और टाई नहीं बन पाती है और आपको यह तो मानना ही पड़ेगा कि इक्कसवीं सदी में जी रहे लोगों को धोती नहीं, सूट और टाई चाहिए वह भी फटाफट  . हमने गांव की ताजी
सब्जी खाने की आदत छोड दी है क्योंकि डीप फ्रीजर की सब्जी हम कई दिनों बाद खा सकते हैं. दरअसल आपके विचार हमेशा से ताजा रहे हैं लेकिन हम लोग बासी विचारों को ही आत्मसात करने के आदी हो रहे हैं. बासा खाएंगे तो बासा
सोचेंगे भी. इसमें गलत ही क्या है?
        बापू माफ करना लेकिन आपको आपके जन्मदिन पर बार बार यह बात याद दिलानी होगी कि हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं. जन्मदिन, वर्षगांठ बहुत घिसेपिटे और पुराने से शब्द हैं, हम तो बर्थडे और एनवरसरी मनाते हैं. अब यहां भी देखिये कि जो आप मितव्ययता की बात करते थे, उसे हम नहीं भूला पाये हैं इसलिये शादी की वर्षगांठ हो या मृत्यु ,  हम मितव्ययता के साथ एक ही शब्द का उपयोग करते है एनवरसरी. आप देख तो रहे होंगे कि हमारी बेटियां कितनी मितव्ययी हो गयी हैं. बहुत कम कपड़े पहनने लगी हैं. अब आप इस बात के लिये हमें दोष तो नहीं दे सकते हैं ना कि हमने आपकी मितव्ययता की सीख को जीवन में नहीं उतारा. सडक़ का नाम महात्मा गांधी रोड रख लिया और मितव्ययता की बात आयी तो इसे एम.जी. रोड कह दिया. यह एम.जी. रोड आपको हर शहर में मिल जाएगा. अभी तो यह शुरूआत है बापू, आगे आगे देखिये हम मितव्ययता के कैसे कैसे नमूने आपको दिखायेंगे.
        अब आप गुस्सा मत होना बापू क्योंकि हमारी सत्ता, सरकार और संस्थायें आपके नाम पर ही तो जिंदा है. आपकी मृत्यु से लेकर अब तक तो हमने आपके नाम की रट लगायी है. कांग्रेस कहती थी कि गांधी हमारे हैं लेकिन अब सब लोग कह रहे हैं कि गांधी हमारे हैं. ये आपके नाम की माया है कि सब लोग एकजुट हो गये हैं. आपकी किताब  हिन्द स्वराज पर बहस हो रही है, बात हो रही है और आपके नाम की सार्थकता ढूंढ़ी जा रही है. ये बात ठीक है कि गांधी को सब लोग मान रहे हैं लेकिन गांधी की बातों को मानने वाला कोई नहीं है लेकिन क्या गांधी को मानना, गांधी को नहीं मानना है. बापू आप समझ ही गये होंगेकि इक्कसवीं सदी के लोग किस तरह और कैसे कैसे सोच रखते हैं. अब आप ही समझायें कि हम ईश्वर, अल्लाह, नानक और मसीह को तो मानते हैं लेकिन उनका कहा कभी माना क्या? मानते तो भला आपके हिन्दुस्तान में जात-पात के नाम पर कोई फसाद हो सकता था. फसाद के बाद इन नामों की माला जप कर पाप काटने की कोशिश जरूर करते हैं.
बापू छोड़ो न इन बातों को, आज आपका जन्मदिन है. कुछ मीठा हो जाये. अब आप कहेंगे कि कबीर की वाणी सुन लो, इससे मीठा तो कुछ है ही नहीं. बापू फिर वही बातें, टेलीविजन के परदे पर चीख-चीख कर हमारे युग नायक अमिताभ कह रहे हैं कि चॉकलेट खाओ, अब तो वो मैगी भी खिलाने लगे हैं. बापू इन्हें थोड़ा समझाओ ना पैसा कमाने के लिये ये सब करना तो ठीक है लेकिन इससे बच्चों की सेहत बिगड़ रही है, उससे तो पैसा न कमाओ. मैं भी भला आपसे ये क्या बातें करने लगा. आपको तो पता ही नहीं होगा कि ये युग नायक कौन है और चॉकलेट मैगी क्या चीज होती है. खैर, बापू हमने शिकायत का एक भी मौका आपके लिये नहीं छोड़ा है. जानते हैं हमने क्या किया, हमने कुछ नहीं किया. सरकार ने कर डाला. अपने रिकार्ड में आपको उन्होंने कभी कहीं राष्ट्रपिता होने की बात से साफ इंकार कर दिया है. आप हमारे राष्ट्रपिता तो हैं नहीं, ये सरकार का रिकार्ड कहता है. बापू बुरा मत, मानना. कागज का क्या है, कागज
पर हमारे बापू की शख्सियत थोड़ी है, बापू तो हमारे दिल में रहते हैं लेकिन सरकार को आप जरूर बहादुर सिपाही कह सकते हैं. बापू माफ करना हम इक्कसवीं सदी के लोग अब चरखा पर नहीं, वालमार्ट पर जिंदा रहेंगे. इस बार आपके बर्थडे पर यह तोहफा आपको अच्छा लगे तो मुझे फोन जरूर करना. न बापू न..फोन नहीं, मोबाइल करना और इंटरनेट की सुविधा हो तो क्या बात है..

सोमवार, 25 मई 2015

ताक में पत्रकारिता, तकनीकी का दौर

मनोज कुमार
साल 1826, माह मई की 30 तारीख को ‘उदंत मार्तंड’ समाचार पत्र के प्रकाशन के साथ हिन्दी पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ था. पराधीन भारत को स्वराज्य दिलाने की गुरुत्तर जवाबदारी तब पत्रकारिता के कांधे पर थी. कहना न होगा कि हिन्दी पत्रकारिता ने न केवल अपनी जवाबदारी पूरी निष्ठा के साथ पूर्ण किया, अपितु भविष्य की हिन्दी पत्रकारिता के लिये एक नयी दुनिया रचने का कार्य किया. स्वाधीन भारत मेंं लोकतंत्र की गरिमा को बनाये रखने तथा सर्तक करने की जवाबदारी हिन्दी पत्रकारिता के कांधे पर थी. 1947 के बाद से हिन्दी पत्रकारिता ने अपनी इस जवाबदारी को निभाने का भरसक यत्न किया किन्तु समय गुजरने के साथ साथ पत्रकारिता पहले मिशन से प्रोफेशन हो गई और बाद के समय में पत्रकारिता ने मीडिया का रूप ले लिया. इस बदलाव के दौर में हिन्दी पत्रकारिता की भाषा गुम हो गई और पत्रकारिता की टेक्नालॉजी के स्थान पर टेक्नालॉजी की पत्रकारिता की जाने लगी. अर्थात पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों और मूल्यों को तज कर हम तकनीकी पत्रकारिता के दौर में पहुंच गये हैं. तकनीकी पत्रकारिता ने ही पत्रकारिता को मीडिया के स्वरूप में परिवर्तित कर दिया है और यही कारण है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर बार बार सवाल उठाये जाते हैं.
करीब करीब ढाई सौ साल पहले और 1947 के दौर की पत्रकारिता का इतिहास हिन्दी पत्रकारिता के लिये स्वर्णकाल था. इस कालखंड की पत्रकारिता का एकमात्र मिशन अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराना था और अपने प्रकाशनों के माध्यम से वे जनमत निर्माण का कार्य कर रहे थे. 1947 की स्वतंत्रता के बाद स्वाधीन भारत में पत्रकारिता ने एक नई करवट ली. पत्रकारिता, खासतौर पर हिन्दी पत्रकारिता के समक्ष एक नये भारत की रचना की जवाबदारी थी. तब पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया. पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाना कोई संवैधानिक विषय नहीं है बल्कि उसकी जवाबदारी के चलते माना गया कि पत्रकारिता का लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है. देश के समग्र विकास के लिये पंचवर्षीय योजनाओं का श्रीगणेश किया गया. इन योजनाओं के क्रियान्वयन पत्रकारिता ने पैनी नजर रखी और परिणामस्वरूप अनेक स्तर पर अनियमितताओं पर नियंत्रण पाया जा सका. साल 1947 के बाद से 1975 के पहले तक पत्रकारिता अपने स्वर्णकाल को खोकर रजतकाल में पहुंच चुका था. पत्रकारिता में गिरावट तो दिखने लगी थी लेकिन वह केवल छाया भर थी. साल 1975 में आपातकाल के समय से पत्रकारिता का वैभव गुम होता दिखा. हालांकि पत्रकारिता का वैभव गुमनाम नहीं हुआ था बल्कि अधिसंख्य पत्र मालिकों ने सरकार के समक्ष घुटने टेक दिये थे. पत्र मालिकों के गिरवी हो जाने से पत्र में काम करने वाले पत्रकारों की स्वतंत्रता पर भी नियंत्रण स्वाभाविक था. हालांकि हिन्दी पत्रकारिता इस बात के लिये गौरव का अनुभव कर सकती है कि इस बुरे समय में भी कुछ अखबारों ने अपने तेवर को बनाये रखा. यह भी सच है कि थोड़े ही सही, किन्तु इन अखबारों के तेवर से सरकार भीतर से भयभीत थी. दरअसल, यह पत्रकारिता के लिये संक्रमण काल था. एक तरफ बड़ी संख्या में पत्र मालिक सरकार के जीहुजूरी में लग गये थे तो कुछ अखबार विरोध में खड़े थे.
आपातकाल की समाप्ति के बाद भारत में पत्रकारिता का तेवर और तस्वीर एकदम से बदलने लगी. समाचार पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशनों की संख्या में निरंतर वृद्धि होने लगी. पत्रकारिता में गुणवत्ता का लोप होने लगा और संख्या बल बढ़ जाने से आहिस्ता आहिस्ता पत्रकारिता मिशन के स्थान पर प्रोफेशन बन गयी. पत्रकार प्रोफेशनल होने लगे और प्रकाशक उद्योगपति. अखबारों का सामाजिक सरोकार नेपथ्य में चला गया और अखबार एक उत्पाद बन कर रह गया. यह वही समय है जब ‘पीत पत्रकारिता’ अपने शबाब पर थी. किसी को महिमामंडित करना अथवा किसी की मानहानि करना, इस नये उद्योग को सुहाने लगा था. बदले में उसे मनमाफिक लाभ भी मिलता था. पत्रकार अब प्रोफेशनल हो चले थे, सो लेखनी की वह धार भी कम होती महसूस हो रही थी. पत्रकारिता उनके लिये नौकरी से ज्यादा कुछ नहीं था. सम्पादक नाम की संस्था को विलोपित किये जाने की साजिश भी इसी कालखंड में हुई थी. हिन्दी पत्रकारिता में न सम्पादक की कुर्सी बची और न पत्रकार. ऐसे दौर में ‘जनसत्ता’ का प्रकाशन एक शुभ संकेत था. मालवा की भूमि से आये पत्रकार प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’ का सम्पादकीय दायित्व सम्हाला और हिन्दी पत्रकारिता को एक नये उजास से भर दिया. गुमनाम सम्पादक संस्था को प्रभाषजी ने एक नयी पहचान दी और साथ में पत्रकारों को खबर ठोंकने की पूरी स्वाधीनता. 
‘जनसत्ता’ वर्तमान में भी अपने तेवर के साथ पाठकों के बीच उपस्थित है किन्तु शताब्दि परिवर्तन के साथ साथ हिन्दी पत्रकारिता का समूचा चरित्र परिवर्तित हो गया. पत्रकारिता का स्वरूप मीडिया में बदल चुका है तो पत्रकारिता की टेक्नालॉजी के स्थान पर टेक्नालॉजी की पत्रकारिता ने स्थान बनाया. पत्रकारिता तकनीकी रूप से समृद्ध हो गई किन्तु सामाजिक सरोकार पीछे छूट गये. कॉर्पोरेट कल्चर की इस पत्रकारिता में साहब के कुत्ते पहले पन्ने की खबर बनने लगे और रामदीन अपनी गरीबी में ही मर गया. इस दौर में एक नयी परिभाषा गढ़ी गई- जो दिखता है, वह बिकता है. पत्रकारिता कभी बिकाऊ थी नहीं, सो उसने रास्ता बदल लिया और मीडिया ने इस रिक्त स्थान पर कब्जा पा लिया. वह दिखने और बिकने की पत्रकारिता कर रहा है. तकनीकी रूप से सक्षम हो जाने के बाद तथ्यों की पड़ताल करने का वक्त नहीं है और समझ भी. ‘कट एंड पेस्ट’ की इस पत्रकारिता ने समूचे पत्रकारिता की परिभाषा बदल दी है. ढाई सौ साल की पत्रकारिता शनै:शनै: किस तरह रसातल में जा रही है, इसका उदाहरण है पेडन्यृज. कल जिसे हम पीत पत्रकारिता कहते थे, आज वह पेडन्यूज की श्रेणी में गिना जाने लगा है. बीते एक दशक में पेडन्यूज का मामला बेहद गर्माया हुआ है. कुछ मामले सामने भी आये हैं किन्तु किसी एक अखबार, पत्रिका या पत्रकार को सजा मिली हो, ऐसी खबर सुनने में मुझसे चूक हो गई है. हालांकि दो-एक राज्य में पेडन्यूज के आरोप में राजनेताओं पर कड़ी कार्यवाही की गई है.  

तकनीकी पत्रकारिता के इस वृहद स्वरूप के लिये बहुत हद तक मीडिया शिक्षा जवाबदार है. देश में पिछले बीस वर्षों में अनेक विश्वविद्यालय आरंभ हो गये हैं जहां मीडिया शिक्षा दी जाती है, पत्रकारिता नहीं. इन विश्वद्यिालयों से शिक्षा प्राप्त करने वाले युवा पत्रकारों की मंजिल अखबार के पन्ने नहीं होते हैं बल्कि टेलीविजन चैनल होते हैं. जिस चमक-धमक के फेर में वे टेलीविजन की नौकरी करने जाते हैं और जब सच का सामना होता है तो विश्वविद्यालय में पढ़े और पढ़ाये गये सारे अध्याय बेमानी लगते हैं. पत्रकारिता की जमीन कभी रेशम बिछी कालीन वाला रास्ता नहीं हो सकता है किन्तु मीडिया का रास्ता ही रेशमी कालीन से आरंभ होता है. इस रेशमी कालीन पर चलने के लिये अनेक किसम के उपाय करने होते हैं जिसे आप साम-दाम और दंड-भेद कह सकते हैं. ऐसा भी नहीं है कि इन विश्वविद्यालयों से निकले सभी विद्यार्थी नाकाम होते हैं. बहुत सारे ऐसे विद्यार्थी हैं जो रेशमी कालीन पर चलने लिये जो कुछ करना होता है, करते हैं और कामयाबी के शीर्ष पर बैठते हैं. थोड़ा तहकीकात करने की जरूरत होगी कि अल्पवय में ही वे करोड़ों के स्वामी बन गये हैं. इस तरह का  निर्लज्ज व्यवहार वाला पत्रकार कैसे हो सकता है? शायद यही कारण है कि इन एक नया शब्द इनके लिये गढ़ा गया है- ‘मीडिया कर्मी’. एक कर्मचारी से आप क्या उम्मीद करते हैं? उसका पूरा समय तो इसी गुणा-भाग में निकल जाता है कि वह अपना हित कैसे साधे? कैसे कामयाबी के शिखर तक पहुंचे? ऐसे में वह किसी रामदीन की पीड़ा को समझने की मुसीबत क्यों ले? वह उन खबरों को तव्वजो दे जो उसके संस्थान को अधिकाधिक लाभ दिला सके. मेरे पैंतीस वर्षों के पत्रकारिता जीवन में कभी मैंने ‘पत्रकार कर्मी’ शब्द नहीं सुना क्योंकि एक पत्रकार कभी कर्मचारी हो नहीं सकता. वह तो हमेशा से सामाजिक सरोकार, जनसरोकार से जुड़ा हुआ है. उसके लिये उसका निजी हित कुछ भी नहीं है. एक पत्रकार के लिये उसकी अपनी पीड़ा से किसी रामदीन की पीड़ा ज्यादा अहमियत वाली होती है. एक पत्रकार, किसान की तरह होता है. वह आरंभ से अंत तक कलम घिसते हुये मर जाता है. वह मालिक नहीं बन पाता है जो मालिक बन जाता है, वह पत्रकार नहीं होता है, इस बात पर कोई संशय नहीं होना चाहिये. 

इन दिनों इस बात को लेकर विलाप किया जा रहा है कि खबरों का कोई प्रभाव नहीं होता है. यह सच है कि खबरों का प्रभाव नहीं होता है और हो भी कैसे? जब आप खबर नहीं, सूचना दे रहे हैं. खबरों का अर्थ होता है किसी सूचना के तथ्यों तथा आंकड़ों का गहन परीक्षण एवं उसका विश£ेषण. आधी-अधूरी सूचना और पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर खबरों के प्रकाशन को समाज क्यों गंभीरता से ले? ‘स्टिंग ऑपरेशन’ के नाम पर जो गंदगी की जा रही है, उसे भारतीय समाज सहन नहीं कर पाता है. खोजी पत्रकारिता के नाम पर किसी को व्यक्तिगत रूप से लांछित करना पत्रकारिता की मर्यादा के खिलाफ है. खोजी पत्रकारिता ही करनी है तो पत्रकार अरूण शौरी की बोफोर्स रिपोर्ट को नजीर क्यों नहीं माना जाता? पत्रकार गिरिजाशंकर द्वारा  कैदी को दिये जाने वाली फांसी का आंखों देखा हाल कव्हर करने का विषय नयी पीढ़ी के लिये खोजी पत्रकारिता का विषय क्यों नहीं होता है? ‘ऑपरेशन चक्रव्यूह’ के तहत सांसदों का स्टिंग ऑपरेशन किया गया था. कुछ की सांसदी भी गयी थी. इस ऑपरेशन से कुछ सांसदों के स्टिंग कर उन्हें कटघरे में खड़ा किया गया, यह अनुचित नहीं है किन्तु क्या शेष सांसद एकदम पाक-साफ थे? सवाल के जवाब की प्रतीक्षा में खड़ा हूं. यह पत्रकारिता की मर्यादा के प्रतिकूल है कि हम कुछ लोगों पर तो अंगुलियां उठायें और शेष को अनदेखा कर दें. सभी को कटघरे में खड़ा करने का साहस जब आयेगा तब पत्रकारिता दुबारा अपना वैभव प्राप्त कर सकेगी.