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रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का अंक रेडियो पर

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भोपाल से प्रकाशित रिसर्च जर्नल ‘समागम’ ने अपने निरंतर प्रकाशन के 17वां वर्ष पूर्ण कर लिया है.  18वें वर्ष का पहला अंक रेडियो पर केन्द्रित है. रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का यह अंक कैसा लगा, आपकी प्रतिक्रिया चाहेंगे.  हमसे जुडऩे के लिए आप हमें ई-मेल samagam2016@gmail.com कर सकते हैं.  मानक शोध पत्र/लेख आमंत्रित हैं. सम्पादक मनोज कुमार

ग्राम स्वराज का अर्थ आत्मबल का होना

-मनोज कुमार महात्मा गांधी का मानना था कि अगर गांव नष्ट हो जाए, तो हिन्दुस्तान भी नष्ट हो जायेगा। दुनिया में उसका अपना मिशन ही खत्म हो जायेगा। अपना जीवन-लक्ष्य ही नहीं बचेगा। हमारे गांवों की सेवा करने से ही सच्चे स्वराज्य की स्थापना होगी। बाकी सभी कोशिशें निरर्थक सिद्ध होगी। गांव उतने ही पुराने हैं, जितना पुराना यह भारत है। शहर जैसे आज हैं, वे विदेशी आधिपत्य का फल है। जब यह विदेशी आधिपत्य मिट जायेगा, जब शहरों को गांवों के मातहत रहना पड़ेगा। आज शहर गांवों की सारी दौलत खींच लेते हैं। इससे गांवों का नाश हो रहा है। अगर हमें स्वाराज्य की रचना अहिंसा के आधार पर करनी है, तो गांवों को उनका उचित स्थान देना ही होगा। ग्राम स्वराज को लेकर उनकी चिंता रही है। 25 साल पहले हमने गांधी के सपनों को सच करते हुए पंचायती राज लागू कर दिया है लेकिन गांधी की कल्पना का ग्राम स्वराज अभी भी प्रतीक्षा में है। गांधीजी चाहते थे कि ग्राम स्वराज का अर्थ आत्मबल से परिपूर्ण होना है। स्वयं के उपभोग के लिए स्वयं का उत्पादन, शिक्षा और आर्थिक सम्पन्नता. इससे भी आगे चलकर वे ग्राम की सत्ता ग्रामीणों के हाथों सौंपे जाने के पक्…

टीआरपी की ख़बरों का मीडिया

मनोज कुमार जब समाज की तरफ से आवाज आती है कि मीडिया से विश्वास कम हो रहा है या कि मीडिया अविश्वसनीय हो चली है तो सच मानिए ऐसा लगता कि किसी ने नश्चत चुभो दिया है. एक प्रतिबद्ध पत्रकार के नाते मीडिया की विश्वसनीयता पर ऐसे सवाल मुझ जैसे हजारों लोगों को परेशान करते होंगे, हो रहे होंगे. लेकिन सच तो यह है कि वाकई में स्थिति वही है जो आवाज हमारे कानों में गर्म शीशे की तरह उडेली जा रही है. हम खुद होकर अपने आपको अविश्वसनीय बनाने के लिए तैयार कर रहे हैं. हमारी पत्रकारिता का चाल, चेहरा और चरित्र टीआरपी पर आ कर रूक गया है. हम सिर्फ और सिर्फ अधिकाधिक राजस्व पर नजरें गड़ाये बैठे हैं. शायद हम सरोकार की पत्रकारिता से पीछा छुड़ाकर सस्ती लोकप्रियता की पत्रकारिता कर रहे हैं. हमें जन से जुड़ी जनसरोकार की पत्रकारिता परेशान करती है जबकि हम उन खबरों को तवज्जो देने में आगे निकल गए हैं जो दर्शकों, पाठकों और श्रोताओं को कभी गुदगुदाती है तो कभी डराती है. कभी उनके भीतर बागी हो जाने का भाव भी भर जाती है तो कभी वह लालच में डूब जाने के लिए बेताब हो जाता है. उसे वह जिंदगी दिखाई जाती है जो सिर्फ टेलीविजन के परदे पर य…

भारतीय राजनीति के महामना अटल विहारी वाजपेयी

भारतीय राजनीति के महामना अटल विहारी वाजपेयी -अनामिका भारतीय राजनीति में कई महामना हुए जिन्होंने भारत को नई दिशा और दृष्टि प्रदान की। आधुनिक भारत में भी महान राजनेताओं की लम्बी श्रृंखला है जिन्होंने न केवल भारतीय राजनीति को एक अलग पहचान दी बल्कि वे मील के पत्थर साबित हुए। इन महान नेताओं की चर्चा करते समय अपने समय के अटल विहारी वाजपेयी का उल्लेख सबसे पहले आता है। भारत के राजनीतिक इतिहास में उन महान् नेताओं की श्रृंखलाओं में जन्मे हमारे देश के महत्वपूर्ण कर्णधार श्री अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्होंने भारतवर्ष के राजनैतिक इतिहास में एक नए युग का प्रारंभ कर भारत में नव-परिवर्तन की लहर प्रवाहित कर दी। अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म ग्वालियर में 25 दिसम्बर 1924 को हुआ था। भारतीय राजनीति में यह तारीख अमिट है। सच कहा जाए तो आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी का जो पूरे देश में उजास फैल रहा है, वह अटलजी के प्रयासों और उनकी प्रतिबद्धता के कारण माना जा सकता है। अटल बिहारी वाजपेयी बचपन से ही चंचल और कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा को अपनी जीवनशैली में उतारने वाले अटल बिहारी वा…

नरेन्द्रनाथ से स्वामी विवेकानंद हो जाना

-मनोज कुमार दुनियाभर की युवा शक्ति को दिशा देने वाले स्वामी विवेकानंद का सानिध्य अविभाजित मध्यप्रदेश को प्राप्त हुआ था. यह वह कालखंड था जब स्वामी विवेकानंद, स्वामी विवेकानंद ना होकर नरेन्द्रनाथ दत्त थे. इतिहास के पन्ने पर दर्ज कई तथ्य और स्मरण इस बात को पुख्ता करते हैं कि किशोरवय के नरेन्द्रनाथ दत्त से स्वामी विवेकानंद बन जाने का जो सफर शुरू हुआ था, उसमें अविभाजित मध्यप्रदेश की आबोहवा का पूरा पूरा प्रभाव था. स्वामी विवेकानंद जी के शिकागो में दिए गए विश्व प्रसिद्ध भाषण के सवा सौ साल पूरे हो चुके हैं. इन सवा सालों में लगातार उनको सुना जा रहा है, गुना जा रहा है. अद्वितीय, अप्रतिम भाषण की बुनियाद में कहीं न कहीं उस अविभाजित मध्यप्रदेश की झलक मिलती है जिसमें उनके किशोरवय के लगभग डेढ़ वर्ष गुजारे थे.    वर्तमान में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ इस बात का गौरव अनुभव करता है कि स्वामी विवेकानंद ने यहां डेढ़ वर्ष से अधिक का समय व्यतीत किया. हालांकि जिस कालखंड में उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय व्यतीत किये तब वे स्वामी विवेकानंद नहीं थे बल्कि किशोरवय के नरेन्द्रनाथ दत्त थे जो अपने परिवार के साथ…

रिसर्च जर्नल ‘समागम’ 18वें वर्ष में

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भोपाल। रिसर्च जर्नल ‘समागम’ ने अपने निरंतर प्रकाशन के 17 वर्ष पूर्ण कर लिया है. 17वें साल का आखिरी अंक जनवरी-2018 का महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज एवं विवेकानंदजी के शिकागो भाषण के सवा सौ साल पूर्ण होने पर केन्द्रित है. फरवरी 2018 में ‘समागम’ रेडियो पर केन्द्रित होगा और यह अंक 18वें वर्ष का प्रथम अंक होगा. इस आशय की जानकारी सम्पादक मनोज कुमार ने दी है. समाज, मीडिया एवं सिनेमा के अंतर्संबंध पर केन्द्रित मासिक रिसर्च जर्नल ‘समागम’ को यूजीसी ने अपनी स्वीकृति प्रदान की है. रिसर्च जर्नल ‘समागम’ को यूजीसी ने मीडिया केेटेगिरी में शामिल किया है. ‘समागम’ का हर अंक विषय विशेष पर केन्द्रित होता है. ‘समागम’ के परामर्श मंडल में विद्वतजनों का सहयोग है तथा शोधार्थियों एवं शिक्षकों का निरंतर सहयोग मिलता रहा है. देश की प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका इंडिया टुडे, हंस एवं अन्य प्रमुख प्रकाशनों ने ‘समागम’ को सराहा है. हिन्दी सिनेमा के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर ‘समागम’ ने लगातार दो अंक का प्रकाशन किया जिसमें भाषायी सिनेमा पर शोध पत्रों का प्रकाशन किया गया. ‘समागम’ 18वें वर्ष में संचार के प्रमुख माध्यम रे…

एक अपराजित योद्धा : शिवराजसिंह चौहान

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12 साल का कीर्तिमान बनाने वाले मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री  -मनोज कुमार 
     कैलेण्डर के पन्नों पर 29 नवम्बर की तारीख हर साल आती है लेकिन 2017 में यह तारीख मध्यप्रदेश के इतिहास की तारीख के रूप में दर्ज हो गई है. यह तारीख उस अपरोजय योद्धा के नाम दर्ज हो गई है जिसे हम शिवराजसिंह चौहान के नाम से जानते हैं. 61 साल के मध्यप्रदेश में लगातार 12 वर्षों तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान ने कीर्तिमान कायम किया है. यह सच है कि इन 61 सालों में ज्यादतर समय कांग्रेस सत्ता में रही लेकिन सिवाय दिग्विजयसिंह के कोई दूसरा कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं हुआ जिसने लगातार 10 साल तक मध्यप्रदेश की सत्ता सम्हाली हो. दिग्विजयसिंह के रिकार्ड को ध्वस्त कर शिवराजसिंह ने मध्यप्रदेश के इतिहास में अपना नाम लिख दिया है. इसमें सबसे अहम बात यह है कि 12 सालों में शिवराजसिंह चौहान, शिवराजसिंह बने रहे, मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहचान बहुत कम रही. यही कारण है कि वे प्रदेश के बच्चों के मामा कहलाए और देशभर में मध्यप्रदेश का नाम रोशन हुआ.      शिवराजसिंह चौहान की पहचान एक मुख्यमंत्री के रूप में है और…