बुधवार, 27 अगस्त 2014

नीयत का सवाल

मनोज कुमार
आमतौर पर मेरे और पत्नी के बीच खबरों को लेकर कोई चर्चा नहीं होती है लेकिन बच्चों से जुड़ी खबरों पर बातचीत हो ही जाती है. कल भी ऐसा ही हुआ. केन्द्र सरकार द्वारा जघन्य अपराध करने वाले 16 साल के नाबालिग बच्चों को वयस्क अपराधियों की तरह मुकदमा चलाये जाने के फैसले पर हम दोनों में चर्चा होने लगी. मन ही मन मैं इस तरह के फैसले का स्वागत कर रहा था लेकिन पत्नी के मन को टटोलना भी चाहता था कि आखिर उसकी राय इस बारे में क्या है? मैं कुछ पूछता, इसके पहले ही वह फट पड़ीं। ऐसे फैसले तो पहले ही हो जाना चाहिये था। इन मामलों में उम्र नहीं, नीयत देखी जाती है और जब नीयत बिगड़ जाये तो क्या बालिग और क्या नाबालिग? सजा के हकदार सभी होते हैं और सजा मिलना भी चाहिये. पत्नी के गुस्से को देखकर पहली बार शांति का अहसास हुआ. जैसा मैं सोच रहा था, वैसा वह भी सोचती हैं, यह बात तसल्ली देने वाली थी। यह सच है कि अपराध, अपराध होता है और वह नाबालिग है इसलिये बख्श दिया जाये, यह तर्क नहीं, कुतर्क है। बड़ा सवाल यह है कि अपराध करते समय उसने अपने उम्र से बड़े अपराध करने की सोच ली तो सजा भी उसे उसकी सोच की मिलेगी। नीयत की मिलेगी। यहां उम्र का फैक्टर काम नहीं करता है, यहां बदनीयती का सवाल है। बलात्कार, हत्या और ऐसे ही अपराध करते समय तो दिमाग वयस्कों को भी मात दे जाता है और जब सजा की बारी आती है तो उम्र की दुहाई दी जाती है जो कि बिलकुल गलत है, अनुचित है।

संगीन जुर्म के लिये नाबालिग की उम्र को कम कर दी गई है लेकिन क्या इतने से ही सुधार आ जाएगा? नाबालिग ऐसे जुर्म से परे ही रहें, इस बात की व्यवस्था करने की जरूरत है और जब इस सवाल को लेकर हम चर्चा करते हैं और नैतिकता के तराजू पर नापते हैं तो पता चलता है कि अनैतिकतता का पलड़ा भारी हो चला है। भौतिक सुखों और विज्ञापनों ने बच्चों को समय से बड़ा कर दिया है। जिस उम्र में उन्हें भविष्य के सपने देखने चाहिये, वे जिंदगी के सपने देखने लगते हैं। भविष्य के सपने देखते तो वे अपने वाले समय में देश के निर्माता होते लेकिन वे जिंदगी के सपने देखते हैं जिसमें वैभवशाली जीवन हो, सुंदर पत्नी और महंगी कार तथा मोबाइल हो। इस सुंदर सी जिंदगी उन्हें तब हासिल हो सकती है जब वे भविष्य के सपने बुने और उसे सच करने के लिये मेहनत करें लेकिन उनके पास इतना वक्त नहीं है। वे जल्दबाजी में है। सबकुछ समय से पहले पा लेना चाहते हैं और इसी भागमभाग में उन्हें वैभवशाली जिंदगी पाने के लिये शॉर्टकर्ट दिखता है अपराध का रास्ता। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें इस बात का इल्म नहीं है कि वे जिस रास्ते पर चल रहे हैं, उन्हें जिंदगी नहीं, सजा मिलेगी लेकिन मन में नाबालिग हो जाने का मुगालता पाले वे तेजी से शॉर्टकर्ट के रास्ते पर चल पड़ते हैं। एक बात और यहां गौर करने लायक है कि ये शॉर्टकर्ट अपनाने वाले ज्यादतर बच्चे अमीर परिवारों से रिश्ता रखते हैं। उन्हें इस बात का भी भ्रम होता है कि उनके रईस बाप महंगे वकील कर उन्हें बचा ले जाएंगे। यह भी सच है कि उनके मन में भ्रम यूं ही नहीं बना हुआ है बल्कि उन्होंने अपने आसपास यह होते देखा है। बात साफ हो जाती है कि यहां उम्र नहीं, नीयत का मामला है।

सवाल यह भी है कि सरकार के इस फैसले से अपराधों में बच्चों की संलिप्तता कैसे खत्म होगी? इसके लिये जरूरी है कि सरकार टेलीविजन चैनलों के अपराधों की पृष्ठभूमि वाले कार्यक्रमों को बैन करे। एक चैनल तो लगभग पूरा समय ही अपराधों की पृष्ठभूमि वाले कार्यक्रम पर चल रहा है। क्राइम बेस्ड सीरियल से टेलीविजन चैनलों को भारी-भरकम कमाई होती है। इसकी टीआरपी सर्वाधिक होती है और इन कार्यक्रमों के अंत में संदेश दिया जाता है कि बुरे काम का बुरा नतीजा होता है लेकिन चैनलों को कौन समझाये कि 20-22 मिनट के कथाक्रम में आपने अपराध के उपक्रम से परिणाम तक पहुंचाने में जो विधि बताया है, वह लाखों और बल्कि करोड़ों कच्चे दिमाग में बस गया है कि बस, यही तरीका श्रेष्ठ है। किसे इतना वक्त है कि वह कथा के आखिरी में बुरे काम का बुरा नतीजा का संदेश सुने और उस पर अमल करे। अमल करने के लिये पहले ही आपने पूरा तरीका अपरोक्ष रूप से बता दिया है। ऐसे में अपराध रूकने के बजाय बढ़ रहे हैं, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है।

भगवान करे कि मैं गलत साबित होऊं लेकिन जो मैं समझ रहा हूं कि इन दिनों यानि निर्भया कांड के बाद से जैसे देश में बलात्कार के अपराधों का सिलसिला बढ़ गया है। इसके कारण में जाने के बाद जो कुछ तथ्य और तर्क सामने आते हंै, उसमें मीडिया एक बड़े कारण के रूप में आता है। जिस तरह पहले मैंने जिक्र किया कि क्राइम बेस्ड धारावाहिक अपराधों में किस तरह मददगार हो रहे हैं, उसी तरह खबरों की भी अपनी भूमिका है। दो खबरों का जिक्र करना चाहूंगा कि जिसमें एक हालिया खबर भोपाल से है। मां ने अपने बेटे को पुलिस के हवाले इसलिये कर दिया कि वह बेरोजगार था और उसे संदेह था कि चोरी के पैसों से वह मजे के दिन गुजार रहा है। बाद में पता चला कि वह मंदिर में चोरी करता था। मां के इस साहस को सलाम करना चाहिये और हर अखबार और हर चैनल की प्रमुख खबर होनी चाहिये थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी तरह कोई दो साल पहले एक ट्रेन को दुर्घटना से बचाने के लिये ड्रायवर स्वयं रेल इंजिन के सामने आकर ट्रेन को न केवल दुर्घटना से बचाया बल्कि अनेक लोगों की जान भी बची। उस रेल इंजन के ड्रायवर की मौत के बाद उसके परिजनों का क्या हुआ, यह जानने की फुर्सत मीडिया को नहीं है। ऐसे अनेक प्रकरण है जो समाज का मन बदलने की ताकत रखते हैं लेकिन मीडिया सकरात्मक खबरों से परे होता जा रहा है। सनसनी और टीआरपी देने वाली खबरों के चलते उसे सामाजिक सरोकार की चिंता ही नहीं है, इस सच से दिल्ली से देहात तक की पत्रकारिता करने वाला कोई भी शख्स इंकार नहीं कर सकेगा।

अपराधी बनाने के लिये उम्र 16 साल तय करने से ही समस्या का हल नहीं है और न ही यह राजनीति का मुद्दा है। इस मामले को दलगत राजनीति से परे ले जाकर समाज के मंच पर देखा जाना चाहिये। बच्चों के लिये काम कर रही संस्थाओं को भी प्रयास करना चाहिये कि बच्चे अपराध से विरक्त कैसे हों? टेलीविजन के पर्दे पर आने वाले विज्ञापनों पर तो जैसे नियंत्रण समाप्त हो चला है, ऐसा प्रतीत होता है। मुझे याद है कि कॉलेज के आरंभिक दिनों में पता चला था कि रजस्वला क्या होता है लेकिन आज पांच साल के बच्चे को पूरी खबर है। सेनटरी नेपकिन के विज्ञापन ने उन्हें सबक सिखा दिया है। इन दिनों इससे भी आगे बढक़र एक विज्ञापन आ रहा है जिसमें सैनेटरी नेपकीन पहनी मॉडल को जिस्मानी तौर पर घुमा-फिराकर दिखाया जा रहा है कि वह कितनी कम्फर्ट है लेकिन विज्ञापनप्रदाता यह भूल गया है कि समाज स्वयं को कम्र्फट फिल नहीं कर रहा है। इस बेहूदा विज्ञापन पर किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया क्योंकि ऐसा लगता है कि सबने इसे जिंदगी का हिस्सा मान लिया है।

मुझे लगता है कि संविधान में नाबालिग की जो व्याख्या की गई है, वह ऐेसे छोटे-मोटे अपराधों के लिये है कि किसी के बगीचे से आम तोड़ कर चोरी से खा लेना, किसी को गुस्से में पत्थर फेंक देना, किसी को मासूमियत के साथ परेशान करना। तब शायद कानून को भी उम्मीद नहीं थी कि जिन्हें वह नाबालिग कह कर व्याख्या कर रहा है, वह बालिगों से अधिक दुस्साही और अपराधी प्रवृत्ति का होगा। अब किसी नाबालिग के पास आम तोडऩे कर चोरी से खाने का वक्त नहीं, अब वह गुस्से में पानी का घड़ा नहीं तोड़ता है बल्कि चाकू से हमला करता है और मासूमियत को मोबाइल, टेलीविजन और इंटरनेट की नजर लग गयी है। इस नजर ने उम्र को पीछे धकेल दिया है और बचपन की आंखों में नीयत नहीं, बदनीयती बस चली है।

शनिवार, 23 अगस्त 2014

एक थी भाजपा, एक थी कांग्रेस!



-मनोज कुमार 

2014 के आम चुनाव के परिणाम के बाद भारत की दो बड़ी पार्टी क्रमश: भारतीय जनता पार्टी एवं कांग्रेस का अस्तित्व लगभग समाप्त की ओर है। केन्द्र में कहने को तो भारतीय जनता पार्टी की सरकार है लेकिन पूरा संसार गवाह है कि केन्द्र में भाजपा नहीं, नरेन्द्र मोदी की सरकार यह आम चुनाव भाजपा ने मोदी को आगे रखकर लड़ा और नारा दिया अबकी बार मोदी सरकार अर्थात भाजपा ने स्वयं के पैर खींच लिये। इसलिये अब लाख हल्ला मचाने के बाद भी सत्य यही है कि भाजपा नेपथ्य में चली गयी है और नरेन्द्र मोदी की सरकार है। भाजपा नरेन्द्र मोदी को सामने रखकर हल्ला मचा ले कि केन्द्र में उसकी सरकार है लेकिन कांग्र्रेस तो हाशिये पर पड़ी है। भाजपा के नेपथ्य में चले जाने की बात जितनी सच है, उतना ही सच कांग्रेस का हाशिये पर रहना है। कांग्रेस तो कह भी नहीं पा रही है कि कांग्रेस किसकी है। कांग्रेस के सामने अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष की स्थिति है और इस स्थिति से उबरने के लिये उसकेे पास कोई संकटमोचक नहीं है। इस आम चुनाव के बाद एक नारा अप्रत्यक्ष रूप से गूंज रहा है कि एक थी भाजपा, एक थी कांग्रेस। 

देश इस बात से प्रसन्न है कि तीन दशक बाद भारत की राजनीति गठबंधन सरकार से मुक्त हुई है। इस मामले में अप्रसन्नता का कोई सवाल नहीं है लेकिन रंज इस बात का रहा कि तीन दशक बाद जो बदलाव हुये, वह व्यक्तिवाद में बदल गया। भाजपा सरकार में आ जाती तो शिकायत कम होती लेकिन मोदी की सरकार का आना रंज का विषय है। दरअसल, मोदी सरकार का आना, उसी राजनीतिक इतिहास को दोहराना है जैसा कि कांग्रेस न आकर इंदिरा गांधी का आना था। मोदी और इंदिरा गांधी में भिन्नतायें आप देख सकते हैं तो उनमें अनेक समानतायें भी दिखेंगी। उनमें जो पहली समानता दिखती है, वह है दोनों का डॉयनामिक नेचर। इंदिरा गांधी कांग्रेस पर हावी रहीं और कांग्रेस के टूटने के बाद जो कांग्रेस बनी वह इंदिरा कांग्रेस थी लेकिन मोदी के साथ फिलवक्त मामला ऐसा नहीं है लेकिन मोदी भाजपा के नहीं हैं बल्कि मोदी की भाजपा है, जैसे जयघोष अप्रत्यक्ष रूप से गूंज रहा है। मोदी की कार्यप्रणाली को लेकर ऐसा दृश्य उपस्थित करने का प्रयास किया जा रहा है कि मानो वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गये देश के  प्रधानमंत्री न होकर कोई तानाशाह हैं। इसी तानाशाही की शिकार इंदिरा गांधी भी थीं और आपातकाल इसका उदाहरण है। इसमें दो राय नहीं कि नरेन्द्र मोदी को आगे करके भाजपा ने जो जीत के लिये रास्ता चुना था, उसी रास्ते में वह पीछे छूट गयी, जैसे इंदिरा गांधी आगे निकल गयी थीं और कांग्रेस पीछे छूट गयी थी। 

एक बड़ा सवाल यह है कि इंदिरा गांधी के जाने के बाद कांग्रेस में एकदम से रिक्तता आ गयी, क्या वही इतिहास भाजपा में भी दोहराया जायेगा। अटलविहारी वाजपेयी के बाद आडवानी के बाद भाजपा में यह स्थिति बन रही थी कि नरेन्द्र मोदी ने सम्हाल लिया। कांग्रेस में भी स्थिति लगभग ऐसी ही रही लेकिन कांग्रेस पर परिवादवाद का आरोप लगता रहा। इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी ने देश की सत्ता सम्हाली और शहीद हो गये तो गांधी परिवार से छायामुक्त नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री का पद सम्हाला। उनके पास बहुमत नहीं था लेकिन अनुभव के सहारे उन्होंने कार्यकाल पूरा किया। आपातकाल के बाद से 2014 के आम चुनाव के बाद से गैर-कांग्रेसी सरकारें बनी लेकिन उनका प्रभाव नहीं दिखा। यह सरकारें गठबंधन सरकारें थी जो स्वतंत्र रूप से फैसला लेने में सक्षम नहीं कही जा सकती थीं। खैर, इसके बाद 10 वर्षों तक कांग्रेस गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री रहे मनमोहनसिंह इस आरोप से मुक्त नहीं हो सके कि उनकी कार्यप्रणाली पर गांधी परिवार की छाया है। राहुल गांधी का मिजाज एक नौजवान के रूप में रही, वे अनुभवहीन थे सो कांग्रेस में वे सर्वमान्य विकल्प बनकर स्थापित नहीं हो पाये। 

कांग्रेस इस समय अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। केन्द्र में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता पाने के लिये उसे ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। आजादी के बाद से शायद यह पहला वक्त होगा कि देश की बागडोर सम्हालने वाली कांग्रेस पार्टी को विपक्ष के रूप में खड़ा होने का अवसर भी नहीं मिल रहा है। हालांकि इसके लिये उनके पास पर्याप्त संख्या में सांसदों का नहीं होना, एक तथ्यात्मक कमजोरी है। नरेन्द्र मोदी के स्थान पर भाजपा को कोई अन्य नेता यथा अटलविहारी वाजपेई या आडवाणी होते तो शायद कांग्रेस को विपक्ष का दर्जा मिल चुका होता लेकिन इस मामले में कोई रियायत देते नरेन्द्र मोदी नहीं दिखते हैं। कांग्रेस का संकट यहां तक ही नहीं है बल्कि कांग्रेसशासित राज्यों में जो घमासान मचा हुआ है, वह भी पार्टी के दिग्गजों की नींद उड़ा रहे हैं। निश्चित रूप से इसका लाभ नरेन्द्र मोदी के खाते में जा रहा है। वे कांग्रेस के घमासान को थमते देखना नहीं चाहते हैं क्योंकि आने वाले समय में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होना है, उसमें भी वे अपनी विजय देखना चाहते हैं। कोई संदेह राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन उनकी अपेक्षाओं के विपरीत न हो। ऐसी हालत में कांग्रेस के समक्ष अस्तित्व बचाने का संकट है लेकिन संकटमोचक के रूप में कोई नहीं दिख रहा है। 

भाजपा भी इस समय खामोशी की मुद्रा में है। लोकसभा में 273 से आगे बढक़र 282 सीटें जीतने वाले नरेन्द्र मोदी निर्विवाद प्रधानमंत्री हैं तो भाजपा में एकछत्र नेता भी। अब उन्होंने अपने पसंद से भाजपा का अध्यक्ष अपने विश्वस्त अमित शाह को भी बना दिया है। कोई कुछ भी कहे लेकिन नरेन्द्र मोदी में इंदिरा गांधी का अक्स दिख रहा है और वे जो चाहते हैं, जैसा चाहते हैं, वैसा ही भाजपा में हो रहा है और होता रहेगा क्योंकि केन्द्र में भाजपा नहीं, नरेन्द्र मोदी की सरकार है। भाजपाशासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी मोदी से भयभीत हैं। कभी केन्द्र की कांग्रेस गठबंधन सरकार को आंखें दिखाकर मनमाना राहत राशि बटोरने वाले राज्यों को मोदी का दो टूक जवाब मिल रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुये नरेन्द्र मोदी ने केन्द्र के सहायता मांगने के बजाय अपने संसाधनों से गुजरात को बेहतर बनाने की कोशिश और वे इसी का उदाहरण अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्रियों को भी दे रहे हैं। भाजपाशासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मुसीबत यह है कि वे मोदी के खिलाफ जा भी नहीं सकते हैं। ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो मोदी की दबंगता और उनके प्रभावों को दिखाती है। यहां फिर से भाजपा नेपथ्य में और मोदी मंच पर दिखते हैं। कांग्रेस इस समय जिस स्थिति में है, उससे उबरने में उसे शायद वक्त लगेगा। उबर पायेगी या नहीं, इसकी भी चिंता उनके अपने नेताओं की नहीं दिख रही है। सबकुछ ऐसा ही चलता रहा तो कहा जायेगा एक थी भाजपा, एक थी कांग्रेस। 

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

शोध पत्रिका समागम का अगस्त अंक जनक्रांति 2014 व्हाया सोशल मीडिया

आप सभी को स्वाधीनता पर्व की हार्दिक शुभकानाएं।

शोध पत्रिका समागम के अगस्त अंक का केंद्रीय विषय जनक्रांति 2014 व्हाया सोशल मीडिया है।  भारत में पहली क्रांति से हमें आज़ादी मिली। इसके बाद आपतकाल के बाद एक क्रांति हुई और अब सोशल मीडिया के जरिये जनक्रांति 2014 में हुई है जिसके परिणामस्वरूप देश में तीस वर्ष बाद किसी दल को पूर्ण बहुमत मिला है. गठबंधन सरकारों का सिलसिला समाप्त हुआ है. अन्ना हज़ारे से लेकर अब तक के बदलाव की मीमांषा करता समागम का नया अंक जारी कर दिया गया है. 

शोध पत्रिका समागम का अगला अंक हिंदी का महागीत : लता मंगेशकर पर है.

बुधवार, 30 जुलाई 2014

प्रेमचंद को पढ़ें ही नहीं, गढ़े भी


मनोज कुमार
हम लोग ईश्वर,अल्लाह, गुरूनानक और ईसा मसीह को खूब मानते हैं लेकिन उनका कहा कभी नहीं मानते हैं बिलकुल वैसे ही जैसे हम प्रेमचंद को पढक़र उनकी तारीफ करते अघाते नहीं लेकिन कभी उनके पात्रों को मदद करने की तरफ हमारे हाथ नहीं उठते हैं। प्रेमचंद पर बोलकर, लिखकर हम वाहवाही तो पा लेते हैं लेकिन कभी ऐसा कुछ नहीं करते कि उनका लिखा सार्थक हो सके। प्रेमचंद की जयंती पर विशेष आयोजन हो रहे हंै, उनका स्मरण किया जा रहा है। लाजिमी है कि उनके जन्म तारीख के आसपास ही ईद का पाक उत्सव भी मनाया जाता है। ईद को केन्द्र में रखकर गरीबी की एक ऐसी कथा प्रेमचंद ने ईदगाह शीर्षक से लिखी कि आज भी मन भर आता है। सवाल यह है कि दशक बीत जाने के बाद भी हर परिवार उसी उत्साह से ईद मना पा रहा है। शायद नहीं, इस बात का गवाह है ईद के दिन अपनी गरीबी से तंग आकर एक युवक ने मौत को गले लगा लिया। उसे इस बात का रंज था कि वह ईद पर अपने दो बच्चों के लिये नये कपड़े नहीं सिला पाया। उन्हें ईदी भी नहीं दे पाया होगा। एक पिता के लिये यह शायद सबसे ज्यादा मुश्किल की घड़ी होती है। मरने वाला संवेदनशील था और उसे अपनी बेबसी का मलाल था। वह चाहता तो दूसरों की तरह मजबूरी का रोना रोकर और कुछ दिन गुजार लेता लेकिन मरने वाले का जिंदगी से जिस्मानी नहीं, दिली रिश्ता था। वह अपने बच्चों को दुखी देखकर जी नहीं पाया। 

एक आम आदमी की तरह मैं उसके आत्महत्या की तरफदारी नहीं करूंगा लेकिन एक पिता के नाते उसके भीतर की तड़प को समझने की ताकत मुझमें है। शायद मैं भी कभी इस समय से गुजर चुका हूं लेकिन तब कोई काम मिल गया था और मेरी मदद हो गई थी। मैं थोड़ा बेशर्म किस्म का इंसान हूं इसलिये नजरें झुकाये जी लेता लेकिन मौत को गले नहीं लगाता। बस, उसमें और मुझमें यही फर्क था कि वक्त ने उसका साथ नहीं दिया और मेरा साथ दे दिया था। उसे तो दुनिया से फना हो जाना था, सो हो गया लेकिन क्या यह समाज उसके दर्द को समझ पायेगा? उसके रहते, उसकी बेबसी और मजबूरी के चलते उसके परिवार ने एक ईद नहीं मनायी लेकिन उसके जाने के बाद हर दिन बेवजह उपवास रखने की जो नौबत आ रही है, उसका क्या कीजियेगा?

हैरान इस बात को लेकर हूं कि एक मानवीय खबर को भीतर के पन्ने पर एक दुर्र्घटना के समाचार के रूप में छाप कर अपने दायित्वों की इतिश्री कर ली गई। इस पर कोई बात नहीं हुई। हां, बीजेपी नेता प्रभात झा ने कह दिया कि लाल गाल वाले टमाटर खाते हैं तो अखबारों की प्रमुख खबर तो बन ही गई, आमजन में चर्चा का विषय भी। क्या जो लोग आज और कल प्रेमचंद का स्मरण कर रहे होंगे, वे इस युवक के बारे में कोई बात करेंगे। ईदगाह के हामिद की बार बार चर्चा होगी कि कैसे ईदी के पैसों से उसने दादी की चिंता की लेकिन क्या कोई इस युवक की चर्चा करेगा कि कैसे उसे अपने बच्चों का दुख देखा नहीं गया और उसने मौत को गले लगा लिया। दरअसल, अब हमें ढोंग से उबर जाना चाहिये। हमेें मान लेना चाहिये कि मूर्तिपूजक बन कर रह गये हैं। हमें मूर्ति से वास्ता है, मूर्ति के बताये रास्ते हमारे लिये नहीं हैं।

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

छोटी ही रहना चाहती हूं...पापा


-मनोज कुमार 
अखबार पढ़ते हुये अचानक नजर पड़ी कि कुछ दिनों बाद फादर्स डे है। मन में जिज्ञासा आयी और लगा कि अपनी बिटिया से पूछूं कि वो इस फादर्स डे पर क्या करने वाली है। मैंने सहज भाव से पूछ ही लिया कि बेटा, थोड़े दिनों बाद फादर्स डे आने वाला है। तुम अपने फादर अर्थात मेरे लिये क्या करने वाली हो? वह मेरा सवाल सुनकर मुस्करायी और मेरे सामान्य ज्ञान को बढ़ाते हुये कहा कि हां, पापा मुझे पता है कि फादर्स डे आने वाला है। अच्छा आप बताओ कि आप मेरे लिये क्या करने वाले हो? मैंने कहा कि दिन तो मेरा है, फिर मैं क्यों तु हारे लिये कुछ करने लगा। तु हें मेरे लिये करना चाहिये? इसके बाद हम बाप-बेटी के बीच जो संवाद हुआ, वह एक दार्शनिक संवाद  जरूर था लेकिन डे मनाने वालों के लिये सीख भी है। बेटी ने कहा कि पहली बात तो यह कि मैं अभी आपकी इनकम पर अपना भविष्य बना रही हूं और जो कुछ भी करूंगी आपके जेब से निकाल कर ही करूंगी। ऐसे में आपके लिये कुछ करने का मतलब आपको खुश करने के बजाय दुखी करना होगा क्योंकि जितने पैसों से मैं आपके लिये उपहार खरीदूंगी, उतने में आप हमारी कुछ जरूरतें पूरी कर सकेंगे। तो इसका मतलब यह है कि जब तुम कमाने लगोगी तो फादर्स डे सेलिब्रेट करोगी। अपने पापा के लिये उपहार खरीदोगी? इस बार भी बिटिया का जवाब अलग ही था। नहीं पापा, मैं चाहे जितनी बड़ी हो जाऊं, जितना कमाने लगूं लेकिन कभी इतनी बड़ी न हो पाऊं कि अपने पापा को उपहार देने की मेरी हैसियत बने। जिस पापा ने अपनी नींद खोकर मेरी परिवरिश की, जिस पापा ने अपनी जरूरतों को कम कर मेरी जरूरतों को पूरा करने में पूरा समय और श्रम लगा दिया, जिस पापा ने मेरे सपनों को अपना सपना मानकर मुझे बड़ा किया, उस पापा को भला मैं क्या दे सकती हूं। और पापा ही क्यों, मम्मी, दादाजी, दादीजी सब तो मिलकर मुझे बनाने की कोशिश कर, फिर भला मैं कैसे आप लोगों के लियेे उपहार खरीदने की हिम त कर सकती हूं। 
बिटिया की बातों को सुनकर मेरी आंखें भर आयी। मुझे लगा कि मैंने जो कुछ किया, वह निरर्थक नहीं गया। बेटी के भीतर वह सबकुछ मैंने समाहित कर दिया, जो मुझे मेरे पिता से मिला था। मुझे लगा कि फादर्स डे पर इससे अच्छा कोई उपहार हो भी नहीं सकता है। जब मां-बाप अपने बच्चों से हारते  हैं तो सही मायने में विजेता होते हैं। हारते हुयेे माता-पिता को सही मायने में खुशी मिलती है क्योंकि बच्चों की जीत ही माता-पिता की असली जीत है। हमारे समाज में ये जो डे मनाने का रिवाज चल पड़ा है और यह रिवाज भारतीय नहीं बल्कि यूरोपियन देशों की देन है। भौतिक जरूरतों की चीजों में उनके रिश्ते बंधे होते हैं और वे हर रिश्तों को वस्तु से तौलते हैं लेकिन भारतीय मन भावनाओं की डोर से बंधा होता है। वस्तु हमारे लिये द्वितीयक है, प्रथम भावना होती है और आज मेरी बेटी ने जता दिया कि वह जमाने के साथ भाग रही है्र दौड़ रही है लेकिन अपनी संस्कृति और संस्कार को सहेजे हुये। अपनी भावनाओं के साथ, अपने परिजनों की भावनओं की कद्र करते हुये। वह बाजार जाकर कुछ सौ रुपयों के तोहफों से भावनाओं का व्यापार नहीं कर रही है। यह मेरे जैसे पिछड़ी सोच के बाप के लिये अनमोल उपहार है। 
भारतीय समाज में भी डे मनाने की पुरातन परमपरा है। हम लोग यूरोपियन की तरह जीवित लोगों के लिये डे का आयोजन नहीं करते हैं बल्कि उनके हमारे साथ नहीं रहने पर करते हैं। उनकी मृत्यु की तिथि पर उनके पसंद का भोजन गरीबों को खिलाया जाता है, वस्त्र इत्यादि गरीबों में वितरित किया जाकर उनकी आत्मा की प्रसन्नता के लिये करते हैं, इसे हम पितृपक्ष कहते हैं। जीते जी हम उन्हें भरपूर स मान देते हैं और मरणोपरांत भी उनका स्थान हमारे घर-परिवार के बीच में होता है। दुर्भाग्य से हम यूरोपियन संस्कृति के साथ चल पड़ हैं। सक्षम पिता या माता का डे तो मनाते हैं लेकिन वृद्ध होते माता-पिता को वृद्वाश्रम पहुंचाने में देर नहीं करते हैं। बाजार जिस तरह अनुपयोगी चीजों का सेल लगाता है या चलन से बाहर कर देता है, वही हालत यूरोपियन समाज में रिश्तों का है, भावनाओं का है। हम भी इसी रास्ते पर चल पड़े हैं। पालकों के पास धन है, साधन है, सक्षम हैं तो दिवस है और नहीं तो उनके लिये दिल तो क्या घर पर स्थान नहीं है। मेरी गुजारिश है उन बच्चों माता-पिता को बाजार की वस्तु बनाने के बजाय उन्हें अपना स्नेह दें। उनकी भावनाओं का खयाल रखें और एक दिन फादर्स डे, मदर्स डे के बजाय पूरे साल का हर दिन उनके लिये समर्पित करें। यही हमारी परम परा और संस्कृति है और यही भारतीय समाज की धरोहर भी। 

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

भाव भरी भूमि

-मनोज कुमार
एक साल पुरानी बात है. तब  23 जुलाई को अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की पुण्यभूमि पर जाने का मुझे अवसर मिला था. यह दिन मेरे लिये किसी उत्सव से कम नहीं था. कभी इस पुण्यभूमि को भाबरा के नाम से पुकारा जाता था किन्तु अब इस नगर की पहचान अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के रूप में है. मध्यप्रदेश शासन के आदिमजाति कल्याण विभाग के सहयोग से राज्य के आदिवासी बाहुल्य जिलों में सामुदायिक रेडियो केन्द्रों की स्थापना की पहली कड़ी में यहां दो वर्ष पहले रेडियो वन्या की स्थापना हुई. 23 जुलाई को रेडियो वन्या के दूसरी सालगिरह पर मैं बतौर रेडियो के राज्य समन्वयक के नाते पहुंचा था. मैं पहली दफा इस पुण्य धरा पर आया था. इस धरा पर अपना पहला कदम रखते ही जैसे मेरे भीतर एक कंपन सी हुई. कुछ ऐसा मन में लगा जिसे अभिव्यक्त कर पाना मुश्किल सा लग रहा है. एक अपराध बोध भी मेरे मन को घर कर गया था. भोपाल से जिस वाहन से हम चंद्रशेखर आजाद नगर पहुंचे थे, उसी वाहन में बैठकर मैं और मेरे कुछ साथी आजाद की कुटिया की तरफ रवाना हुये. कुछ पल बाद ही मेरे मन में आया कि मैं कोई अनैतिक काम कर रहा हूं. उस वीर की भूमि पर मैं कार में सवार होकर उसी तरह चल रहा हूं जिस तरह कभी अंग्रेज चला करते थे. मन ग्लानि से भर गया और तत्काल अपनी भूल सुधार कर वाहन से नीचे उतर गया. वाहन से नीचे उतरते ही जैसेे मन हल्का हो गया. क्षणिक रूप से भूल तो सुधार लिया लेकिन एक टीस मन में शायद ताउम्र बनी रहेगी.

बहरहाल, मेेरे रेडियो स्टेशन पर कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद लगभग हजार विद्यार्थियों की बड़ी रैली अमर शहीद चंद्रशेखर की जयकारा करते हुये निकली तो मन खुश हो गया. परम्परा को आगे बढ़ाते देखना है तो आपको चंद्रशेखर नगर जरूर आना होगा. वीर शहीद की कुटिया को सरकार की तरफ से सुंदर बना दिया गया है. इस कुटिया में मध्यप्रदेश स्वराज संस्थान संचालनालय की ओर उनकी पुरानी तस्वीरों का सुंदर संयोजन किया गया है. इस कुटिया में प्रवेश करने से पूर्व ही एक अम्मां मिलेंगी जो बिना किसी स्वार्थ कुटिया की रखवाली करती हैं, जैसे वे अपने देश को अंग्रेजों से बचा रही हों. इस कुटिया के भीतर वीर शहीद चंद्रशेखर आजाद की आदमकद प्रतिमा है जिसे देखते ही लगता है कि वे बोल पड़ेंगे हम आजाद थे, आजाद रहेेंगे. सब-कुछ किसी फिल्म की रील की तरह आंखों के सामने से गुजरती हुई प्रतीत होता है. जब मैं प्रतिमा निहार रहा था तभी एक लगभग 30-35 बरस का युवा अपनी छोटी सी बिटिया को लेकर कुटिया में आया और बिना समय गंवाये नन्हीं बच्ची को गोद में उठाकर उसे इतना ऊपर उठाया कि बिटिया शहीद का तिलक कर सके. उसने यही नहीं किया बल्कि बिटिया को शहीद के पैरों पर ढोक लगाने के लिये प्रेरित किया. नन्हीं सी बच्ची को शहीद और भगवान में अंतर नहीं मालूम हो लेकिन एक पिता के नाते उस युवक की जिम्मेदारी देखकर मन भाव से भर गया. 

एकाएक मन में आया कि काश, भारत आज भी गांवों का देश होता तो अभाव भले ही उसे घेरे होते किन्तु भाव तो नहीं मरते. बिलकुल जैसा कि मैंने चंद्रशेखर आजाद की नगरी में देखा. विकास के दौड़ में हम अपना गौरवशाली अतीत को विस्मृत कर रहे हैं लेकिन यह छोटा सा कस्बानुमा आज भी उस गौरवशाली इतिहास को परम्परा के रूप में आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित कर रहा है. परम्परा के संवर्धन एवं संरक्षण की यह कोशिश ही सही मायने में भारत की तस्वीर है. मैं यह बात बड़े गौरव के साथ कह सकता हूं कि देश का ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में जितना बड़ा योगदान दिया और इनके शहीदों को जिस तरह समाज ने सहेजा है, वह बिराला ही उदाहरण है. यह वही चीज है जिसे हम भारत की अस्मिता कहते हैं, यह वही चीज है जिससे भारत की दुनिया में पहचान है और शायद यही कारण है कि तमाम तरह की विसंगितयां, विश्व वक्रदृष्टि के बावजूद भारत बल से बलवान बना हुआ है.
दुख इस बात है कि विकास की अंधी दौड़ से अब चंद्रशेखर आजाद नगर भी नहीं बचा है. मकान, दुकान पसरते जा रहे हैं. वीर शहीद के नाम पर राजनीति अब आम हो रही है. हालांकि इसे यह सोच कर उबरा जा सकता है कि विकास होगा तो यह लालच बढ़ेगा और लालच बढ़ेगा तो विसंगतियांं आम होंगी लेकिन यह बात भी दिल को सुकून देेने वाली हैं कि चंद्रशेखर आजाद की नगरी में 23 जुलाई का दिन हर वर्ष दीपावली से भी बड़े उत्सव की तरह मनाया जाता है. अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद को मेरा कोटिश: प्रणाम.