रविवार, 7 फ़रवरी 2016

सुधीर तैलंग को याद करते हुए..


मनोज कुमार  
सुधीर तुम तो कमजोर निकले यार.. इत्ती जल्दी डर गए.. अरे भई कीकू के साथ जो हुआ.. वह तुम्हारे साथ नहीं हो सकता था.. ये बात ठीक है कि अब हम लोग तुम्हारी कूची के काले-सफेद रंग से डरने लगे हैं.. डरावना तो तब और भी हो जाता है जब तुम रंगों और दो-एक लाइन में इतना कह देते हो कि सब लोग हमाम में खड़े नजर आते हैं.. ये ठीक है सुधीर हम लोग तुम से डरते थे लेकिन तुम हमसे डर कर चले गए.. डरने के लिए तो कीकू भी डर गया था.. अब वह किसी की नकल उतारने में क्या.. खुद की नकल करने में भी डर रहा होगा.. कीकू की हालत से तुम इतने घबरा गए.. तुम्हारी कूची के रंग तो पुराने है.. तेवर शायद इससे और ज्यादा पुराना.. सुधीर तुम इस तरह चले जाओगे तो इनकी तो मौजा ही मौजा हो जाएगी.. ये तुम्हें हारते देखना चाहते थे.. और तुम हार गए.. सच तो यह है कि तुम हारे नहीं हो.. सुधीर हारने वालों में नहीं है.. हार कर भी जीत जाने वाले का नाम सुधीर है.. तुम्हारी कूची से अब आग नहीं निकलेगी.. यह भी सच है.. तो यह भी सच है कि जो कुछ उगल गए हो.. उसे ये कैसे निगल पाएंगे.. इनकी गले की फांस बने रहोगे.. यह फांस ही सुधीर की पहचान है.. जो सुधीर को गटक सके.. अभी वह गला नहीं बना.. जो सुधीर को पचा सके.. वह गैस की दवा नहीं बनी.. जो सुधीर को भुला सके.. वह गोली नहीं बनी.. हां.. हां.. इतना जरूर है सुधीर.. तुम चले जाने के बाद भी इनके लिए बिजूका बन कर राजनीति के खेत में खड़े रहोगे.. इनकी मनमानी की फसल को बढऩे नहीं दोगे.. सुधीर का यह बिजूका.. समाज के पहरेदार की तरह हमेशा हमारे साथ रहेगा..वह पहरेदार जो आवाज नहीं लगाता है जागते रहो.. लेकिन कहता है.. सोना नहीं है.. खोना नहीं है.. सो गए तो खो दोगे.. और खो दोगे तो.. अपनी अगली पीढ़ी को क्या जवाब दोगे.. सुधीर का बिजूका समाज को सोने नहीं देता है.. वह अपने रंग और शब्दों से समाज की नींद को भगाता है.. नीम बेहोशी में डूबते समाज को चिकोटी लेकर जगाता है.. जो भाव समझे वह मुस्करा देता है.. जो न समझे.. वह आगबबूला हो जाता है.. सुधीर के इस पंच या उस पंच का क्या कहें.. सुधीर न कभी हारा है न कभी हारेगा.. वो तो लक्ष्मण अकेला हो गया था.. इसलिए सुधीर चला गया उसके पास.. लक्ष्मण का संदेशा आया था.. एक बरस बीत गया.. मजे में हूं यहां.. मेरी कूची से डरते नहीं.. लालू की तरह लेते हैं मजा.. तुम भी आ आजो.. हम दोनों मिलकर रचेंगे एक नया संसार.. कूची और शब्दों से कर देंगे व्यवस्था को छलनी छलनी.. जो बिगड़ रहे हैं वह संभल जाएंगे.. थोड़ा गुस्सा करेंगे.. फिर पास बिठायेंगे.. लक्ष्मण और सुधीर की जोड़ी.. फिर एक आड़ी-तिरछी रेखाओं में कॉमन मैन के मन में हमेशा हमेशा के लिए बस जाएंगे..सुधीर खूब याद आवोगे।

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

तारीख, तीस जनवरी

महात्मा गांधी -माखनलाल चतुर्वेदी की पुण्य तिथि पर विशेष 
-मनोज कुमार
तारीख, तीस जनवरी। साल भले ही अलग अलग हों किन्तु भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण तारीख है। इस दिन शांति एवं अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की नृशंस हत्या कर दी गई थी और इसी तारीख पर दादा माखनलाल ने अंतिम सांस ली थी। गांधीजी और माखनलाल जी का हमारे बीच में नहीं रहना ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई शायद कभी न हो पाये। यह सुखकर है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में जो आदर्श स्थापित किया, भारत को एक नयी दृष्टि दी और देश के प्रति लोगों में जो ऊर्जा का संचार किया, वह उनकी उपस्थिति दर्ज कराती रहेगी। 
भारत वर्ष हमेशा इस बात के लिए हमारे उन पुरखों का कर्जदार रहेगा जिन्होंने हमें पराधीनता से मुक्त कराया। समय-समय पर हम उन सबका स्मरण इसलिए करते हैं ताकि नयी पीढ़ी को इस बात का ज्ञान रहे कि हमारे पुरखों के पास अदम्य साहस था, दृष्टि थी और आत्मविश्वास। साथ में था देशभक्ति का एक ऐसा गुण जो हर भारतीय के लिए कल भी जरूरी था और आज भी है और जब तक यह धरती है, जरूरत बनी रहेगी। छोटी-छोटी बातों को लेकर, सम्प्रदाय और सीमा को लेकर जो बहस और अनबन बनी रहती हैं, वह शायद भारत की प्रकृति नहीं है और हम सब भारत की प्रकृति के प्रतिकूल आचरण कर रहे हैं। इन्हीं सब बातों को एक नई दृष्टि से देखने और समझने के लिए अपने पुरखों का स्मरण करना जरूरी हो जाता है।
यूं तो भारत 15 अगस्त 1947 को ही अंग्रेजी राज्य से मुक्त हो गया था लेकिन सच तो यह है कि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी हम मानसिक दासता के शिकार हैं। हमारी मन की खिड़कियों को हम खोल नहीं पाये हैं। आज भी हमारा व्यवहार और सोच का जो ढंग है, वह 16वीं, 17वीं शताब्दी के समय से भी ज्यादा सकीर्ण दिखता है। कहने के लिए हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के पहरूये हैं लेकिन हम जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, वह हमारी लोकतांत्रिक परम्पराओं को आघात पहुंचाते हुए दिखता है। महात्मा गांधी का सत्याग्रह का सीधा अर्थ था सत्य के प्रति आग्रह लेकिन हम इस सत्याग्रह से दूर हो चुके हैं। सत्य के प्रति हमारा आग्रह का कोई भाव बचा ही नहीं बल्कि असत्य के प्रति हमारा अनुराग बढ़ा है। हमारा यही विचार और यही व्यवहार नवागत पीढ़ी को हस्तांतरित हो रहा है जिसमें खुलेपन की जगह उच्चश्रृंखलता का भाव दिखता है। इसका उदाहरण कुछ साल पहले तब देखने को मिला जब पहली बार एक छोटी बच्ची ने सूचना के अधिकार के जरिए सवाल पूछा था कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा किस कानून के तहत दिया गया? यह सवाल चौंकाने वाला नहीं बल्कि पूरे देश को शर्मसार करने वाला था। आजादी का मतलब उच्चश्रृंखलता नहीं और आज हमारे देश में आजादी का अर्थ यही लगाया जा रहा है। 
यह समय कठिन होता जा रहा है। संचार के साधनों में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ विचार प्रवाहमान हुए हैं लेकिन ज्यादतर समय अनियंत्रित होकर। अखबारों से आरंभ हुई पत्रकारिता रेडियो और इसके बाद टेलीविजन से होते हुए संचार के नए साधनों तक पहुंची जिसे सोशल मीडिया पुकारा गया। पत्रकारिता नेपथ्य में पहुंच गई और मीडिया ने पूरा कब्जा कर लिया। गांधीजी ने स्वाधीनता आंदोलन के लिए पत्रकारिता को माध्यम बनाया था और अन्य दिग्गजों के साथ  मध्यप्रदेश माटीकुल के सुपुत्र पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने भी कर्मवीर के माध्यम से समाज को जागृत किया। दादा के नाम सुविख्यात माखनलाल की अनेक अमर कालजयी कविताएं हैं जो आज भी मन को उत्साहित करती हैं।
बापू और दादा माखनलाल देशभक्त होने के साथ कलम के सिपाही भी थे। अपनी इस कला का उन्होंने पराधीन भारत को जागृत करने के लिए भरपूर उपयोग किया। इन दोनों महानुभावों की पत्रकारिता पर नजर डाली जाए तो हम पाएंगे कि सीमित संसाधनों में की गई उनकी पत्रकारिता के समक्ष हम अपनी अंगुली भर उपस्थिति दर्ज कराने में नाकामयाब हैं। उनके विचार और उनकी दृष्टि उच्च और व्यापक थी, संकीर्णता रत्तीभर नहीं थी और लेखन में रंज का कोई स्थान नहीं था। देश के बैरियों के लिए उनकी कलम आग उगलती थी लेकिन शब्दों पर संयम और नियंत्रण था। वे रौ में बहकर नहीं लिखते थे बल्कि जोश में लिखते थे। 
तारीख, 30 जनवरी के बहाने जब हम इनका स्मरण कर रहे हैं तो इस बहाने आज की पत्रकारिता पर दो बातें कर लेना गैर-जरूरी नहीं होगा। एक तो यह कि जब हम आज बात कर रहे हैं तब पत्रकारिता शब्द विलोपित हो चुका है और मीडिया की चर्चा कर रहे हैं। दुर्भाग्य की बात है कि जैसे-जैसे मीडिया का विस्तार हो रहा है, हम संसाधनों में तो धनी और सम्पन्न हो रहे हैं किन्तु विचारों की दृष्टि से कुछ कमजोर। इससे भी आगे हैरानी की बात यह है कि जिन लोगों ने वर्षों पत्रकारिता को जिया और समाज में पत्रकारिता के कारण अपना स्थान बनाया, वे भी पत्रकारिता में आयी गिरावट या क्षरण का रोना रोते दिखते हैं। जिनके कंधों पर समाज की जवाबदारी हो और वही रोता-बिसूरता दिखे तो समाज किससे अपेक्षा खत्म नहीं हो जाएगी? जिस देश में महात्मा की पत्रकारिता अंग्रेजों को देश छोडऩे के लिए मजबूर कर देती है, उस देश में पत्रकारिता के लिए विलाप कोई अच्छी बात नहीं है। मेरी व्यक्तिगत समझ कहती है कि पत्रकारिता से हम हैं तो हमें अपना घर खुद ठीक करने की पहल करनी होगी। पत्रकारिता की नयी पीढ़ी अगर पत्रकारिता की शर्तों पर खरी नहीं उतर रही है तो हमें प्रशिक्षण के लिए स्वयं को प्रस्तुत करना होगा। आखिरकार जिस पत्रकारिता ने हमें सबकुछ दिया, उसे बनाये रखने के लिए कौन पहल करेगा? दादा माखनलाल लिखते हैं कि धनिकों के हाथों में न तो पत्र सुरक्षित रहता है और न पत्रकारिता। ऐसे में हम सबको तारीख 30 जनवरी को इस मायने में सार्थक बना देना चाहिए जब हम अभियान के तौर पर न सही, अपने अपने स्तर पर महात्मा, पराडक़र, विद्यार्थी, सप्रे, दादा माखनलाल आदि-इत्यादि के बनाये रास्ते पर चलने के लिए नयी पीढ़ी को प्रेरित करने का संकल्प लें। 
विलाप पत्रकारिता की शुचिता का कोई मार्ग नहीं है और न ही समाज और देश की बेहतरी इससे हो सकती है। पोल-खोल की पत्रकारिता के इतर सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता भारतीय समाज की आवश्यकता है। अरबों की जनसंख्या वाले देश में करोड़ों के पास साफ पीने का पानी नहीं, इलाज की सुविधा नहीं, शिक्षा के नाम पर केवल लीपापोती और ऐसी अनन्य समस्याओं से दो-चार होते इस देश को कोई दिशा दे सकता है तो वह पत्रकारिता है और पत्रकारिता स्वयं विलाप करे, यह उचित नहीं है।  पत्रकारिता नये दौर में है, उसके समक्ष नई जिम्मेदारियां हैं और वह आधुनिक संसाधनों से लैस है। ऐसे में हम सब मिलकर पत्रकारिता को वह स्वरूप दें जिसमें उसकी सामाजिक सरोकार, जवाबदारी और पत्रकारिता का धर्म निभ सके।

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

एक थी माँ मदर इंडिया


मनोज कुमार
माँ हाड़-माँस से बनी कोई जीव नहीं है. वह वस्तु भी नहीं है. माँ न केवल एक परिवार, एक समाज की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की संरचना की बुनियाद है. भारतीय संस्कृति में माँ का दर्जा हमेशा से उच्च रहा है. शायद यही कारण है कि एक स्त्री जब माँ बनती है तो उसका सम्मान, उसका ओहदा और उसके प्रति लोगों का भाव स्नेह से भर उठता है. माँ त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में हम सब में विद्यमान हैं. छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा व्यक्ति भी आज कामयाब है तो वह माँ के कारण. हमने इसलिए माँ को प्रथम पाठशाला भी कहा है. भारतीय संस्कृति में बच्चे को जन्म देने वाली माँ नहीं है अपितु जो धरती हमारा बोझ उठाती है, उसे भी हम माँ कहते हैं. सदियों से निर्झर बहती नदियों को भी हमने माँ का दर्जा दिया है. अन्न को केवल खाद्य वस्तु नहीं मानकर, माँ के समान माना है और अन्न के अपमान को माँ का अपमान कहा है. यह तो मेरी समझ की छोटी और अनगढ़ परिभाषा माँ के लिए है. माँ शब्द का केनवास बहुत बड़ा है. बावजूद इसके इन दिनों माँ के खिलाफ चुपके से जो जाल बुना जा रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं बल्कि शर्मनाक है.
आप टेलीविजन के हाईप्रोफाइल वाले सीरियल्स देखते हैं और आप इसी मानसिकता के हैं तो शायद आपको मेरी बात समझ ना आए लेकिन आपमें संवेदना है, आप माँ को समझते हैं तो जो टेलीविजन के परदे पर टीआरपी बटोरने और अधिकाधिक पैसा कमाने के लालच में जो दिखाया जा रहा है, जो लिखा जा रहा है और जो लोग अभिनय कर रहे हैं, उनके प्रति आपके दिल में घृणा होना चाहिए. मेरे पास समय नहीं होता है लेकिन समाज के बारे में लिखने के लिए इन सबको देखना मजबूरी होता है. बहुत सारी ऐसी चीजें दिखायी जाती हैं जिनका वास्तविक जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं होता है. यहां तक तो बात ठीक है लेकिन इन दिनों एक के बाद एक धारावाहिकों में माँ को लेकर जिस तरह का चित्रण हो रहा है, वह समाज के लिए ठीक नहीं है.
माँ के प्रति बच्चों के मन में नफरत के जो दृश्य अनावश्यक रूप से दिखाकर टीआरपी बटोरने का खेल चल रहा है, वह आपत्तिजनक है. यह भी सच है कि जीवन में कई बार ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जब गलतफहमी के चलते आपस में कुछ दूरियां बन जाती है लेकिन समय इसका इलाज करता है और रिश्तों की खटास अल्प समय के लिए होती है. इसे आप जीवन के खट्टे-मीठे पल की तरह देख सकते हैं लेकिन इसे ही अतिरंजित कर भावनाओं से खिलवाड़ करने की इजाजत दिया जाना अनैतिक है. समय बदल रहा है, सोच में बदलाव आया है लेकिन माँ के प्रति नफरत का भाव कभी देखने को नहीं मिला. यह सवाल बहुत गहरे तक मन को जख्मी कर जाता है कि आखिर हमारे विकास का यही पैमाना है कि हम रिश्तों को बेच दें? लोकप्रियता के लिए माँ को वस्तु की तरह उपयोग करें? मैं इन फूहड़ और बेशर्म विषयों के धारावाहिकों को देखने वाला अकेला शख्स नहीं हूं बल्कि मेरे साथ करोड़ों लोग हैं और उनमें एक बड़ी संख्या उन लोगों की है जो समाज की पहरेदारी का झंडा उठाये घूमते हैं. क्या उन्हें माँ का यह नया चित्रण उद्धेलित नहीं करता है? अफसोस तो इस बात का है कि नारी की अस्मिता को लेकर लडऩे वाले संगठन भी इस मामले में खामोश हैं.हम उसी समाज में रहते हैं जहां भारतीय सिनेमा के सौ साल के इतिहास में ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्म दुबारा न बन सकी. हम बार बार मक्सिम गोर्की की ‘माँ’ का पढ़ते हैं और हर बार हमें माँ के बारे में एक नयी तस्वीर, एक नई दृष्टि मिलती है. आज वो सिनेमा, वो साहित्य कहां गुम हो गया है? 
यह सारा दृष्टांत इसलिए कि टेलीविजन के परदे पर जो दिखाया जा रहा है, वह भावी पीढ़ी का मानस बनाता है. हमने गोर्की की माँ पढ़ी, हमने मदर इंडिया देखा, हमने अपनी माँ को भूखा रहकर अपना निवाला हमें खिलाता देखा है. हम अखबार की नौकरी से रात-बिरात आते तो सबसे पहले माँ की आवाज आती-देर हो गई बेटा, चल खाना गरम कर देती हूं. आज जो टेलीविजन के परदे पर चित्रित किया जा रहा है, वह बच्चों के मानस में माँ के प्रति अनास्था का भाव उत्पन्न करता है. इस दुर्भाग्य के साथ सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि लगभग सभी धारावाहिकों में माँ के खिलाफ बेटियों को भडक़ाया जा रहा है, उनके मन मेें माँ के प्रति वितृष्णा उत्पन्न की जा रही है. बेटों को इससे परे रखा गया है. ऐसा क्यों? इस सवाल का जवाब अभी अनुत्तरित है. लेकिन सच यही है कि हम बाजार के दबाव में साल में एक बार ‘मदर्स डे’ मनाने की औपचारिकता कर लें तो वह वैसा ही है जैसा कि भारतीय परम्परा में मृत माँ के लिए श्राद्ध का आयोजन करना. हम भारतीय तो माँ के गुजर जाने के बाद यह उपक्रम करते हैं किन्तु यूरोपियन सभ्यता ने जिंदा रहते में यह उपक्रम करना सीखा दिया है. 
समाज के बिगाडऩे में कई कारक हैं तो टेलीविजन के इन फूहड़ और भावी पीढ़ी को पथभ्रष्ट करने वाले कार्यक्रम सबसे आगे हैं. ऐसे कार्यक्रमों से बच्चों के मानस बिगड़ जाने की बात से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है. अभी भी वक्त है कि हम अपने अपने घरों को बचा लें. इसका एक जरिया बेहतर संवाद हो सकता है. ऐसे कार्यक्रमों पर हम संवाद करें और मन का मैल साफ करने की कोशिश करें क्योंकि सदियों से माँ ममता एवं करूणा की मूरत रही है और रहेगी. एक छोटी सी कहानी स्मरण में आता है- एक कू्रर बेटे ने कुल्हाड़ी से माँ की हत्या कर दी. खून से लथपथ माँ के कटे शीश से आवाज आयी-‘बेटा चोट तो नहीं लगी’. ऐसे मेें इन विदू्रपताओं के बीच संभावनाओं की डोर लिए बैठा हूं कि माँ के प्रति कभी हम नहीं बदल पाएंगे. 

रविवार, 17 जनवरी 2016

मन की बंद खिडक़ी


मनोज कुमार
मेरी सवालिया बेटी के आज एक और सवाल ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. उसका मासूम सा सवाल था कि क्या चाय पीने से दिल की दूरियां खत्म हो जाती है? सवाल गहरा था और एकाएक जवाब देना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल था लेकिन मेरा संकट यह था कि तत्काल जवाब नहीं दिया तो उसके मन में जाने कौन सा संदेह घर कर जाए और अपने आगे के दिनों में वह समाज में वैसा ही बर्ताव करने लगे, जैसा कि टेलीविजन के विज्ञापन को देखने के बाद उसके मन में आया था. बात शुरू हुई थी टेलीविजन के पर्दे पर प्रसारित हो रहे एक चायपत्ती कम्पनी के विज्ञापन से.चाय में मिठास होती है और लेकिन इस विज्ञापन की शुरूआत कडुवाहट से होती है. विज्ञापन के आरंभ में पुरुष अपनी पड़ोसी स्त्री के घर चाय पीने से पहले इसलिए इंकार कर देता है कि वह उनके सम्प्रदाय की नहीं है. इस तरह विद्वेष से विज्ञापन की शुरूआत होती है. हालांकि पत्नी के आग्रह पर वह लगभग बेबसी में उस स्त्री के  घर चाय पीने चला जाता है लेकिन मन उसका अभी भी साफ नहीं है.चाय का पहला प्याला पीने के बाद उसका मन खुश हो जाता है और वह उसी स्त्री से एक और चाय के प्याले का आग्रह करता है जिसके प्रति कुछ पल पहले उसके मन में दुराग्र था. यहीं पर मेरी बिटिया का सवाल था कि पापा एक प्याली चाय से यह साम्प्रदायिक विद्वेष खत्म हो जाता है? 

बिटिया का सवाल कठिन था. इस विज्ञापन को देखते हुए मैं भी कई बार विचलित हुआ था लेकिन एक भारतीय कि तरह चलो, चलता है, कहकर टालता रहा और आज यही टालना मेरे लिए यक्ष प्रश्र बनकर खड़ा था. पत्रकार होने के नाते तत्काल में बिटिया का समर्थन करते हुए कहा कि चाय पीने से सामाजिक विद्वेष दूर होते तो आज हम इस सवाल पर बात ही नहीं करते. ऐसा विज्ञापन बनाकर कम्पनी की आय में कहीं इजाफा हो रहा होगा लेकिन समाज में जो कडुवाहट आ रही है, उसका अंदाजा शायद इस कम्पनी को नहीं है. कुछ गोलमोल कर मैंने उसका समाधान करने का प्रयास किया लेकिन मेरा मन खदबदाने लगा. लगा कि यह सवाल हजारों और लाखों लोगों के मन को मथ रहा होगा. कोई सवाल का जवाब पाने के लिए जुटा होगा तो कोई इस विद्वेष के समर्थन में खड़ा होगा. इस चायपत्ती की कम्पनी ने भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि पर जो बट्टा लगाया है, उसकी भरपाई कैसे होगी. दुर्भाग्य है कि यह चायपत्ती  बनाने वाली कम्पनी अपने विज्ञापन में पहले सामाजिक विद्वेष स्टेबलिश करती है और बाद में यह जताती है कि उस कम्पनी की एक प्याली चाय कैसे साम्प्रदायिक सद्भाव का रास्ता बनाती है. यह विज्ञापन न केवल शर्मनाक है बल्कि देश के धर्मनिरपेक्ष छवि पर आघात करती है. इस विज्ञापन बिलकुल वैसा ही है जैसा कि आपकी प्रतिष्ठा के विपरीत जब कोई कुछ बोले तो जिस तरह दिमाग पर चोट करती है. 
इस तरह की स्थिति और सवाल से लगभग हर बार मैं प्रताडऩा से गुजरता रहा हंू. जिस तरह मेरा विरोध चायपत्ती के इस विज्ञापन से उसी तरह का सख्त विरोध उन खबरों से है जिसमें बार बार बताया जाता है कि अमुक मुस्लिम हिन्दू धर्म का अनुरागी है अथवा अमुक हिन्दु दरगाह पर जाकर इबादत करता है. ऐसी खबरें खासतौर पर उत्सव के समय आती है. निश्चित रूप से इन खबरों का मकसद लोगों के मन को साफ कर एक-दूसरे के धर्म के प्रति सम्मान बनाये रखने की है लेकिन अनजाने में ही यह खबर हमें एक-दूसरे के बीच दूरी उत्पन्न करती है. यह देश भारत है और हर व्यक्ति को इस बात की आजादी है कि वह अपने विश्वास के अनुकूल किसी भी धर्म को माने, पूूजे, इबादत करे और सद्भाव के साथ जिये. इससे इतर मेरा एक सवाल यह भी है कि धर्म, सम्प्रदाय के लिए लीक से हटकर आ रही खबरें ही खबरें हैं? क्या आजादी के 70 साल बाद भी हम ऐसे बेतुके सवालोंं और खबरों से घिरे रहेंगे? क्या हमारा मन आज भी 16वीं-18वीं शताब्दी में जी रहा होगा? क्या हम कबीर, गांधी, अटल, कलाम की नसीहतें भूल जाएंगे? क्या हम सुभाष, पटेल और भगतसिंह की बातों को विस्मृत कर देंगे? क्या हम पराडकर, विद्यार्थी की खींची लकीरों का अनुसरण नहीं करेंगे?
चायपत्ती के  इस  बकवास विज्ञापन पर तत्काल रोक लगे, इस बात की मांग करनी चाहिए. इस बात के लिए हमारे मन की खिडक़ी खुलनी चाहिए कि विकास हमारा एजेंडा हो. हम इस बात के लिए जोर दें कि स्त्री शिक्षा के लिए फुले ने जो रास्ता दिखाया, उस पर चलकर महिलाओं को सशक्त बनायें. मन की बंद खिड़कियों को खोलकर हम एक और सिर्फ एक धर्म की बात करें और वह धर्म मानवता का धर्म है. यही धर्म हमें जिंदा रखेगा और यही धर्म हमारी पहचान होगी.
मोबा. 09300469918

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015


आपके स्नेह एवं सहयोग से शोध पत्रिका ‘समागम’ ने वर्ष 2000 में जो यात्रा आरंभ की थी, वह सफलतापूर्वक जारी है. जनवरी 2016 में ‘समागम’ का यह अंक विशेष संदर्भ के साथ प्रकाशित किया गया है. 30 जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है और इसी तारीख पर दादा माखनलाल चतुर्वेदी की भी. संभवत: एक तारीख पर दो महामना को साथ रखकर नए संदर्भ में देखने की कोशिश अब तक नहीं हुई है. शोध पत्रिका ‘समागम’ एक विनम्र कोशिश कर रहा है. आवरण पृष्ठ आपके अवलोकनार्थ पोस्ट कर रहा हूं. फरवरी 2016 में शोध पत्रिका ‘समागम’ का नया वर्ष आरंभ होगा. फरवरी का अंक शोध पत्रिका ‘समागम’ का विशेषांक होगा जिसमें सिंहस्थ 2016 को नयी दृष्टि से समझने की चेष्टा की गई है यथा कि सिंहस्थ भारतीय जीवनशैली है जिसे नयी पीढ़ी में किस प्रकार हस्तांतरित किया जाए, सोशल मीडिया के विस्तार के साथ मीडिया की नई टेक्रनालॉॅजी के इस दौर में ऐसे पारम्परिक आयोजनों को किस तरह समझा जाए, जिन लोगों ने चार-पांच या अधिक सिंहस्थ को देखा है, उनके अनुभव, मूल्यहीनता के दौर में सिंहस्थ के बहाने नैतिक मूल्यों की चिंता आदि-इत्यादि को विषय के केन्द्र में रखकर अंक का संयोजन किया जा रहा है। साथ में एक दुर्लभ अवसर है छत्तीसगढ़ के राजिम कुंभ का. यह विशिष्ट अवसर है जब मध्यप्रदेश में सिंहस्थ और छत्तीसगढ़ में राजिम कुंभ. राजिम कुंभ को भी जीव चेतना के संकल्प के रूप में देखते हुए सामग्री का संकलन किया जा रहा है. शोध पत्रिका ‘समागम’ के बारे में आपकी सहभागिता हमारा साहस है, संबल है और सफर को आगे बढ़ाने का सिलसिला.
नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ.

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

छत्तीसगढ़ के डाक्टर साहब रमनसिंह

-मनोज कुमार
छत्तीसगढ़ राज्य और डॉ. रमनसिंह एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। छत्तीसगढ़ राज्य की जब भी बात होगी, डॉ. रमनसिंह के बिना अधूरी होगी। एक नये राज्य की सत्ता की डोर 12 सालों से सम्हालने वाले डॉ. रमनसिंह ने छत्तीसगढ़ को एक नया स्वरूप दिया है। पिछड़े और अविकसित राज्य की छाप को खत्म कर विकसित और संसाधनों से भरपूर राज्य की परिभाषा गढ़ी है और पूरी दुनिया के सामने छत्तीसगढ़ को लेकर एक नई इमेज क्रियेट की है। यह वही डॉक्टर साहब हैं जो कभी बीमार लोगों की नब्ज पकड़ कर उनकी बीमारी दूर करते थे लेकिन आज उनके ही हाथों में आज छत्तीसगढ़ की नब्ज है. वे राज्य की बीमारी को भी जानते हैं और उसमें छिपी संभावनाओं को भी और बीमारी का इलाज भी उनके पास है इसलिये छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉक्टर रमनसिंह एक ऐसे व्यक्ति का नाम है जो मुखिया बनकर छत्तीसगढ़ राज्य को विकास की तरफ ले जाने की दिशा में अग्रसर हैं.
सन् दो हजार में जब छत्तीसगढ़ स्वतंत्र राज्य की हैसियत से भारत के नक्शे पर आया तब किसी ने यकिन नहीं किया था कि राज्य की चमक इस तरह बिखरेगी लेकिन ऐसा हुआ. आरंभ के तीन वर्ष जरूर छत्तीसगढ़ के लिये गुमनामी के रहे लेकिन बाद के वर्षों में विकास की जो गूंज हुई, उसे पूरी दुनिया देख रही है.  डाक्टर रमनसिंह ने जब छत्तीसगढ़ राज्य की बागडोर अपने हाथों में ली, तब शायद किसी को यह विश्वास ही नहीं था कि एक ऐसा शांत व्यक्तित्व का धनी राज्य को विकास की चहुमुंखी आभा से आलोकित कर देगा. लोगों का यह सोचना अकारण नहीं था. दूसरे राजनेताओं की तरह डाक्टर रमनसिंह की खनक नहीं थी बल्कि आम आदमी के लिये तो लगभग नया चेहरा था लेकिन दुर्ग संभाग के लोगों का पुराना परिचय उनसे था. मुख्यमंत्री बन जाने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपना संकल्प दोहराया कि राज्य में कोई भूखा नहीं सोयेगा. अपने इस संकल्प की पूर्ति के लिये समाज के आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति तक सस्ते में अनाज पहुंचने लगा.  इसी के साथ पहुंचने लगी मुख्यमंत्री की ख्याति. आरंभिक दिनों में विपक्षियों के लिये सस्ता चावल महज शिगूफा था लेकिन आहिस्ता आहिस्ता इस संकल्प का प्रभाव सामने आने लगा और सरकार तथा आम आदमी के बीच विश्वास का रिश्ता बनता चला गया.
मुख्यमंत्री के रूप में डाक्टर रमनसिंह ने छत्तीसगढ़ राज्य की नब्ज अपने हाथों में ले ली थी. बीमार और पिछड़े राज्य को उन्होंने आहिस्ता आहिस्ता ठीक करना शुरू किया. अपने आठ वर्ष के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ को पिछड़े और बीमार राज्य से बाहर ला निकाला. आज छत्तीसगढ़ देश दुनिया के साथ दौडऩे के लिये तैयार है. लोकहितैषी मुख्यमंत्री के रूप में डॉक्टर रमनसिंह का जोर था वनवासी परिवारों की तरफ जिनके हिस्से में उपेक्षा और गुमनामी था. ये लोग छत्तीसगढ़ की पहचान है किन्तु स्वयं अपनी पहचान के लिये दशकों से तरसते रहे हैं. रमनसिंह ने इन्हें इनकी पहचान दिलायी और राज्य को गर्व. अलग अलग योजनाओं के माध्यम से इन्हें नये सिरे से जीने का अवसर मिला तो इनके बच्चों को ऊंची शिक्षा का. हर किस्म की परीक्षाओं में बच्चों ने ऐसी काबिलियत दिखायी कि छत्तीसगढ़ तो क्या पूरा देश अंचभित रह गया. यह सूरत बदलने की जो सर्जरी डाक्टर साहब ने वनवासी समाज के लिये की, वैसा ही कुछ कुछ समाज के किसानों, महिलाओं, मजदूरों और अन्य वर्गों के लिये किया. मुख्यमंत्री और सरकार के बीच आम आदमी की दूरी को पाट दिया गया. जनदर्शन के बहाने सरकार और मुख्यमंत्री गांव गांव जाने लगे, लोगों से बातें करते और उनकी सुनते. समस्याओंं का निपटारा स्थान पर ही कर देते और जो नहीं हो पाता। 
राज्य की दो करोड़ 55 लाख जनता अब भीख और भूख से लगभग पूरी तरह मुक्त हो चुकी है. छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली देश के लिये नजीर बन चुकी है. सर्वोच्च न्यायालय ने  एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार से यह पूछा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सुचारू संचालन के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा किए गए कम्प्यूटरीकरण को पूरे देश में एक मॉडल के रूप में क्यों नहीं अपनाया जाना चाहिए? छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दूसरे राज्यों ने भी अपने यहांं अमल में लाया है. हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, हर किसान को न्यूनतम ब्याज पर खेती के लिए ऋण सुविधा और उसकी मेहनत का पूरा दाम, हर घर को बिजली, हर परिवार को अनाज, हर बच्चे को स्कूल के साथ नि:शुल्क पाठयपुस्तक, हर मरीज को इलाज की अच्छी से अच्छी सुविधा देकर दशकों से उपेक्षित राज्य के नागरिकों को अपने राज्य होने का गौरव दिलाया. महिला शक्ति को एक नयी पहचान मिली और टोनही के नाम पर महिलाओं की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ करने वालों को दंड देने की नीयत से कानून पारित किया गया लिहाजा राज्य में अब ऐसे मामलों में कमी देखी गयी है.
स्पष्ट नीति, साफ नीयत, संवेदनशील दृष्टिकोण और गतिशील नेतृत्व से ही किसी भी राज्य अथवा देश को विकास की राह पर कदम दर कदम कामयाबी मिलती है। मुख्यमंत्री डाक्टर रमनसिंह ने राज्य में सर्वधर्म समभााव का पूरा पूरा खयाल रखा. यही नहीं, राज्य के इतिहास पुरूषों को भी पूरा सम्मान दिया. इसकी मिसाल महान समाज सुधारक गुरू बाबा घासीदास की जन्मस्थली और तपोभूमि गिरौदपुरी में ऐतिहासिक कुतुबमीनार से भी ऊंचा जैतखाम का निर्माण कराया जा रहा है. कुतुबमीनार से भी ऊंचा यह जैतखाम गुरू बाबा घासीदास के सत्य और अहिंसा के संदेश को दूर-दूर तक पहुंचाएगा। 
प्रदेश के पूर्वोत्तर इलाके में रेल कॉरिडोर निर्माण के उनके प्रस्ताव को रेल मंत्रालय ने हाथों-हाथ लेकर अपनी हरी झंडी दे दी है। यह रेल कॉरिडोर छत्तीसगढ़ में यात्री सेवाओं के विस्तार के साथ-साथ माल-परिवहन की दृष्टि से भी काफी उपयोगी होगा। छत्तीसगढ़ में उद्योग-धंधों को विस्तार मिले, इस दृष्टि से संसार भर के निवेशकों को राज्य में नये उद्योग लगाने के लिये आमंत्रित किया. निवेशकों ने छत्तीसगढ़ सरकार की कोशिशों की तारीफ की और निवेश को उत्सुक दिखे. राज्य सरकार चाहती है कि प्रदेश में नये उद्योग आयें लेकिन वे यह भी नहीं चाहती कि कोई भी निवेशक राज्य की प्राकृतिक संपदा को क्षति पहुंचाये. पर्यावरण की सुरक्षा के वादें के साथ निवेश की संभावना टटोलने वाला संभवत: छत्तीसगढ़ पहला राज्य होगा. एक स्वप्रदृष्टा मुख्यमंत्री के हाथों छत्तीसगढ़ सुघर आकार ले रहा है. 

रविवार, 6 दिसंबर 2015

सहिष्णुता-असहिष्णुता का विलाप


मनोज कुमार
 सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का यह मुद्दा उन लोगों का है जिनके पेट भरे हुए हैं। जो दिन-प्रतिदिन टेलीविजन के पर्दे पर या अखबार और पत्रिकाओं के पन्ने पर पक्ष लेते हैं दिखते हैं अथवा देश और सरकार को कोसते हैं। ये वही आमिर खान हैं जिन्होंने कभी भोपाल में कहा था कि उनकी मां उनसे कहती हैं कि बेटा, चार पैसा कमा ले। बेचारे गरीब आमिर को इस बार उनकी पत्नी कहती हैं कि देश असहिष्णु हो चला है, चलो देश छोड़ देते हैं। आमिर अपनी निजी बातें सार्वजनिक मंच से शेयर करते हैं. आमिर का यह विलाप देश की चिंता में नहीं है, यह अपने गिरते हुए फिल्मी बाजार को सम्हालने की कोशिश हैं। देश आमिर से पूछना चाहता है कि आमिर तुम स्टार नहीं होते तो यह बातें किस सार्वजनिक मंच से कहने का अवसर मिलता? कौन तुम्हें बोलने का मौका देता और मिल भी जाता तो कौन सुनता? चलो, आमिर कुछ देर के लिए मान भी लेते हैं कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे से तुम जख्मी हो और पत्नी की बात देशवासियों को अपना परिवार मानकर उनसे शेयर कर रहे हो। अब सवाल यह है कि देश में लगभग हर राज्य में किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो क्या एक देशभक्त आमिर का कर्तव्य नहीं है कि वह किसानों के बीच जाए और उनके दर्द बांटे, देशवासियों से किसानों की पीड़ा शेयर करे और उनकी मदद के लिए कोई उपाय तलाशे। यह शायद तुम नहीं करोगे. तुम अपनी ड्यूटी और राईट्स भूल जाते हो क्योंकि किसानों की पीड़ा हरने का काम तो सरकार और तंत्र का है, एक सेलिबे्रटी का तो है नहीं।  
आमिर एक बात और बता दूं। मेरे और मुझ जैसे लाखों लोग इस देश में होंगे जिनके घरों में मां, पत्नी, बहन, भाभी, चाची और मौसी के साथ साथ बच्चे भी कई मुद्दों पर बात करते हैं लेकिन इनके दिमाग में गलती से देश तो क्या शहर छोडऩे का ख्याल भी नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि जहां हम सब लोग रहते हैं, वहां परेशानी नहीं है लेकिन परेशानी से भागने के बजाय हम उस समस्या का हल ढूंढऩा जानते हैं। हमें अपना राइट्स भी पता है और ड्यूटी भी क्योंकि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। हम अपनी निजी बातें सार्वजनिक रूप से शेयर कर अपना और समाज का मजाक नहीं बनाते हैं।  आमिर ध्यान रखो, यह भारत है और भारत देश कभी सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का विलाप नहीं करता है। इस देश ने 1947 से लेकर 2015 के इस दौर तक अनेक बदलाव देखे हैं लेकिन कभी किसी ने देश छोडऩे की बात नहीं की।  इस देश का आम आदमी देश तो दूर, अपना शहर और अपना मोहल्ला  तक नहीं छोड़ना चाहता है. पुश्तैनी मकान की परम्परा इस बात को साबित करती है.  
आमिर के इस विलाप को हवा देते हुए एक दूसरा सेलिब्रिटी शाहरूख खान इस बयान के खिलाफ अपना बयान दे डालता है। इसका चरित्र भी आमिर से अलग नहीं है। उम्रदराज होते इन अभिनेताओं को पता है कि जल्द ही बाजार इन्हें खारिज करने जा रहा है तब यह इस तरह की बातें बोल कर खुद का मार्केट बनाये रखने की जुगत में लग जाते हैं। सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता इनके लिए कोई मुद्दा नहीं है। इनका मुद्दा है करोड़ों की लागत से बनी फिल्में पीटे नहीं और करोड़ों कमा ले जाएं। शाहरूख जो सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता की बात कर रहे हैं, वो याद कर लें कि खेल के मैदान में कितने सहिष्णु रहे हैं ?  दरअसल इनका काम है लोगों का मनोरंजन करना, वही करें और देश की चिंता छोड़ दे. चिंता करना भी है तो एक भारतीय बनकर करें, हीरो बनकर नहीं.    
अनुपम खेर को भी आप इस लाइन से बाहर नहीं कर सकते हैं क्योंकि इस फिल्मी बाजार का वो भी हिस्सा है। वो भी चाहता है कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे के बहाने कुछ नाम पक्का कर लिया जाए तो कभी न कभी राजदरबार में प्रवेश का अवसर मिले। यह और बात है कि वो मीडिया से बात करते समय इससे सहजता से ना कर जाते हे. बावजूद अचानक से वे संवेदनशील हो जाते हैं और उन्हें अपनी ड्यूटी और राईट्स दोनों समझ आने लगता है. सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता पर जुलूस-जलसा निकालने लगते हैं. जिन कश्मीरी पंडितो की पीड़ा का वे इजहार कर रहे है, दुख जता रहे है, क्या कभी उनके बारे में कभी कुछ किया? कभी उनके हक़ के लिए लड़ाई लड़ी? शायद नहीं। केवल टेलीविज़न के परदे पर ही उनका दुख दिखता है. काश! सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता से बाहर आकर देशवासियों के पक्ष में अनुपम खड़े हो पाते। हम उम्मीद कर रहे है कि "सारांश " का वह बूढ़ा बाप परदे से बाहर आकर अपने चरित्र को साकार करेगा।
सेलिब्रेटियों की सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता पर चिंता महज मगरमच्छ के आंसू हैं। मेरी सहमति उनसे भी है जो लगातार चीख-चीख कर असहिष्णुता का विलाप कर रहे है. एक आम आदमी का लगातार मंहगाई से टूटने को क्या कहेंगे? अपराधों से जो डरा हुआ है, उसकी चिंता कौन करेगा? आप सब बुद्दिजीवी हैं, आप  सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता को समझते है लेकिन मेरे जैसा आम आदमी इन बातों को बहुत नहीं समझता है. मेरा मानना है कि आप सब हमारे बीच आये,  सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के बारे में हमें बताये। आम आदमी जानना चाहेगा कि मंहगाई, बेरोजगारी, अपराध, असुरक्षा से बड़ा असहिष्णुता का कोन सा मुद्दा है। उसकी रूचि यह भी जानने में होगी कि जो लोग असहिष्णुता के मुद्दे पर मोर्चे पर है, क्या उन लोगो को आम आदमी के मुद्दे पर सड़क पर नहीं आना चाहिए?  भूखा पेट केवल रोटी ना मिलने पर असहिष्णु होता है, भरा पेट इस बात को क्या जाने और समझे। यह वो  लोग है जिन्होंने कभी रेल की जनरल बोगी  में सफर नहीं किया और ना ही सरकारी अस्पताल में इलाज कराया। इन्हे तो इस बात का भी इल्म नहीं कि सरकारी स्कूल बच्चों को पढ़ाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं.   
दुर्भाग्य की बात है कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का विलाप करने वाले लोगों ने अपने ही एक और हीरा जैसा कलाकार नाना पाटेकर से कुछ नहीं सीखा? नाना महाराष्ट्र के किसानों के बीच गये और अखबार या टेलीविजन में खुद को स्टार बताने के बजाय उनके बीच जाकर अपनी हैसियत से ज्यादा मदद कर आये। ऐसे और भी लोग है, जो सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता को लेकर बेकरार नहीं हैं बल्कि अपनी जवाबदारी समझ कर मदद में जुटे हुए है.  क्या दिल पर हाथ रखकर सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे पर देश को बदनाम करने वाले आमिर, अनुपम और शाहरूख बता सकते हैं कि ऐसा कोई पराक्रम उन्होंने कभी किया हो? शायद नहीं।
माफ करना मेरे वो दोस्त, जिनकी मोहब्बत आमिर, अनुपम और शाहरूख से होगी, उन्हें यह बात नागवार गुजरे लेकिन मुझे पता है कि आप मेरी बातों से सहमत ना हों लेकिन असहमति की गुंजाईश ही मैंने कहां छोड़ी है। सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का प्राथमिक तौर पर  मुद्दा बेमानी लगता है क्योंकि जिस देश में दाल के भाव 2सौ रुपये किलो बिक रहा हो, प्याज और आलू खरीदने की आम आदमी की ताकत जवाब दे रही हो, वहां सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का मुद्दा केवल सियासी और बौद्धिक जुगाली है। एकबारगी यह मान भी लिया जाए कि सरकार का व्यवहार असहिष्णु है तो उसके खिलाफ आवाज उठनी चाहिए लेकिन इसके पहले आम आदमी को उसकी हैसियत जीने का हक नहीं मिलना चाहिए?  यह देश भारत है जिसने अंग्रेजों को भगा कर दम लिया, उसके लिये असहिष्णुता कोई बडा मुद्दा नहीं है. यह भी नहीं भूलना चाहिये कि इसी देश ने आपतकाल को सिरे से खारिज कर दिया था. जो लोग असहिष्णु है, उन्हें चुनाव में जनता बाहर का दरवाज़ा दिखा देती है.