शनिवार, 20 सितंबर 2014

जिम्मेदारी की स्लेट


मनोज कुमार
कोई छह या सात बरस की होगी पिंकी। इस समय वह तीसरी दर्जे में पढ़ रही है। सुबह तेजी से काम निपटा कर भागकर स्कूल जाना और लौट कर घर का काम निपटाना। बाद में ट्यूशन पढऩे जाना और फिर रात में घर का काम निपटाना। पिंकी स्लेट में लिखती तो अक्षर है और उसे सीखने की कोशिश भी करती है लेकिन उसकी स्लेट पर जो इबारत लिखी हुई है उसे जिम्मेदारी कहते हैं। जिस उमर में उसे दूसरे बच्चों की तरह खेलना और मौज करना चाहिये था, उस उमर में वह जिम्मेदारी निभा रही है। छोटे-छोटे हाथों से अपने भाइयों के लिये खाना पकाना और उन्हें खिलाकर तृप्त हो जाना कि भाई भूखे नहीं हैं। उसके भाई शारीरिक रूप से कमजोर नहीं है। इसी मोहल्ले में गोलगप्पे का व्यवसाय करते हैं लेकिन पिंकी से उनकी अपेक्षायें होती हैं। अपेक्षा केवल पिंकी द्वारा भोजन पकाने की नहीं है बल्कि गोलगप्पे बनाने में मदद करे, यह भी वे चाहते हैं। पिंकी को यह सब करते हुये किसी से कोई शिकायत नहीं है और वह शिकायत का अर्थ भी नहीं जानती होगी बल्कि उसके लिये तो यही रोजमर्रा की जिंदगी है। 
पिंकी खुश रहती है। नाखुश रहने की भी कोई वजह नहीं है। नाखुश तो तब होती जब उसे पता होता कि जो काम कर रही है, उसके हिस्से का नहीं है। वह तो अनचाहे में इसे अपनी जिम्मेदारी और अधिक व्यवहारिक होकर कहें तो गरीब परिवार का धर्म निभा रही है। उसे किसी ने यह बात भी कभी किसी ने सिखाया नहीं होगा कि जिस स्लेट पर वह लिखती है, उसे जिंदगी बनाना सिखाती है। उसे तो स्लेट और लिखने का मतलब इतना ही मालूम है कि वह कुछ सीख कर, कुछ समझ कर इतना जान ले कि बनिया हिसाब में कोई गड़बड़ ना करे। पिंकी के सपने, उसकी दुनिया, उसकी खुशी, उसका दुख इन सबके बीच मे विचरता रहता है। बेखौफ और बिना शिकायत।
पिंकी को इस बात का भले ही पता नहीं होगा कि जिस स्लेट पर वह शब्द गढ़ रही है, वह जिम्मेदारी की है लेकिन वह नम्बरों के दौड़ में आगे निकल जाना चाहती है। वह अनजाने में दुनिया जीतने निकल पड़ी है। वह हर विषय में अच्छे नम्बर लाना चाहती है। साथ में पढ़ रहे बच्चों के सामने वह किसी भी तरह से खुद को कम होता नहीं देखना चाहती। छोटे से बदन में थकान कितनी होती है या तनाव कितना होता होगा, इससे भी पिंकी बेखबर है। रात होते होते वह ऊंघने लगती है क्योंकि सुबह जिम्मेदारी की कोरी स्लेट उसके सामने होती है जिसमें रोटी बनाना, कपड़े धोना, सूखे कपड़ों को तह कर रखना लिखा हुआ है तो स्कूल जाने से पहले खुद को संवारना भी नहीं भूलती है। जिम्मेदार होती पिंकी भाइयों से पूछ लेती कि किसी को कुछ चाहिये तो नहीं। एक तरह से वह बेफ्रिक हो जाना चाहती है। 
पिंकी स्लेट पर जिम्मेदारी की इबारत जरूर लिखी हुई है लेकिन उसके सपने जिंदा है। वह भी दूसरे बच्चों की तरह नयी फ्राक पहनकर चांद को मुठ्ठी में कर लेना चाहती है। वह बारिश की पानी में भीगना चाहती है, गुनगुना चाहती है। वह चाहकर भी मजे मजे में एक पत्थर हवा में नहीं उछाल पाती क्योंकि उसे पता है कि इस पत्थर ने किसी का नुकसान कर दिया तो हर्जाना भरने की ताकत नहीं। उसे शायद पता नहीं कि कैसे उसके बचपन के सपने टूट रहे हैं लेकिन अहसास किसी उसके भीतर पल रहा है। गुस्सा आये तो सूरज से भी आंखें चार करने की ताकत रखती है पिंकी। पिंकी को बढ़ते, पढ़ते देखते हुये सहसा लगता है कि एक तरफ जहां सुविधाभोगी बच्चे अक्षर ज्ञान कर रहे हैं। कई क्लास पढ़ जाने के बाद भी उनकी स्लेट पर लिखी इबारत कोई सूरत नहीं बना पाती है। पिंकी शायद बीच में स्कूल छोड़ दे लेकिन जिम्मेदारी के स्लेट में लिखी इबारत ने जो अनुभव उसे दिये हैं, उसका कोई सानी नहीं है। वह विद्यार्थी होकर भी शिक्षक बन गयी है। जिंदगी की शिक्षक। 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

एक और गांधी की दस्तक


-मनोज कुमार
हाल ही के उप-चुनाव के परिणाम से जहां कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की सांसें लौट आयी है, वहीं भाजपा में मंथन का दौर शुरू हो गया है. सौ दिन में ही ऐसे परिणाम की अपेक्षा किसी को नहीं थी लेकिन जो हुआ, वह सच है और इससे मुकरना बचकाना होगा. अब सवाल यह है कि उपचुनाव का यह परिणाम क्यों हुआ? क्या इस उपचुनाव में भाजपा अकेले मैदान में थी और उनका सबसे प्रभावी और दमदार चेहरा नरेन्द्र मोदी गायब थे या फिर अमित शाह के भाजपा की कमान सम्हालने के बाद यह परिणाम आया है? कुछ भी हो सकता है लेकिन एक बात तय है कि इस परिणाम ने यह बता दिया कि सौ दिन पहले जिस नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा, माफ करना नरेन्द्र मोदी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी, वह सौ दिन में काफूर होते नजर आ रही है। इस उपचुनाव में भाजपा ने कहीं नारा नहीं दिया इस बार मोदी सरकार. सरकार तो बन गयी थी, विधायक या सांसद के लिये भाजपा ने नहीं कहा कि मोदी की सफलता के कारण इन्हें जीताओ। इन परिणामों से यह बात तो तय हो गई कि जब भाजपा मैदान में होगी तो उसके लिये जीत का रास्ता निष्कंटक नहीं होगा लेकिन मोदी जैसे चेहरे को लेकर और इससे आगे कहें कि उनके भरोसे रहकर चुनाव लड़ेगी तो सौ दिन पुराना इतिहास दोहराया जाएगा. हालांकि एक पुरानी कहावत है काठ की हांडी एक बार ही चढ़ती है और यह परिणाम इस बात के संकेत हैं.

खैर, इस चुनाव परिणाम ने अबकी बार, मोदी सरकार कहने वालों को सजग कर दिया है क्योंकि यह आगाज अंजाम तक पहुंचा सकता है. निकट भविष्य में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव में परिणाम उलटफेर वाले हो सकते हैं। उपचुनाव के परिणाम यह भी तय करेंगे कि आने वाले विधानसभा चुनाव में मोदी का चेहरा काम करेगा या भाजपा स्वयं मैदान में होगी. भाजपा में आत्ममंथन का दौर शुरू हो गया है और एक तरह से वे मोदीयुग से लौटने की तरफ है. हालांकि भाजपा की कमान सम्हाले अमित शाह ने कह दिया है उपचुनाव परिणाम से निराश होने की जरूरत नहीं है. विधानसभा चुनाव में जीत पक्की है. इसे एक ख्वाब भी कह सकते हैं. हालांकि इस परिणाम से भाजपा की पराजय दिखती जरूर है लेकिन दूरगामी फायदे का सौदा हो सकता है. आत्ममंथन के बाद भाजपा पराजय के कारणों की मीमांसा करेगी और अपनी स्थिति सुधारने का उसे जो मौका मिला है, उसका लाभ लेगी.

ऐतिहासिक पराजय से सदमें में कांग्रेस के लिये यह परिणाम एक तरह से संजीवनी का काम करते हैं. गुजरात में दो सीट और राजस्थान में तीन सीट की जीत बड़ी नहीं है लेकिन संबल  देने के लिये काफी है. कांग्रेसियों सहित जो लोग सोनिया-राहुल को कोसने में आगे निकल रहे थे, अब उनके सुर बदल जाएंगे. राजनीति का यह पुराना रोग है इसलिये इसमें अंचभे की कोई बात नहीं. हां, इस जीत को कांग्रेस सबक की तरह ले और आगामी विधानसभा चुनावों में अपनी जीत पक्की करने की कोशिश करे तो कम से कम दो-चार राज्यों के सहारे कांग्रेस का पांच वर्ष का वनवास कट सकता है.

समाजवादी पार्टी ने उत्तरप्रदेश में जो जीत दर्ज की है, वह अर्थवान है. जिस तरह से उत्तरप्रदेश, अपराध प्रदेश में बदल रहा था. इसके बावजूद इतनी बड़ी जीत भाजपा के लिये किसी सदमे से कम नहीं हैं. इस परिणाम ने एक और गांधी की आवाज तेज कर दी है. मेनका गांधी की ममता उमड़ रही है और वे अपने बेटेे को शीर्ष पर देखना चाहती हैं. पहले भी उन्होंने वरूण को उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बनाने की बात कह चुकी हैं और अब इस परिणाम के बरक्स वे वरूण के दावे को पुख्ता बताने से नहीं चूक रही हैं. इससे अब देश को दो गांधी मिल जाएंगे. पहले राहुल गांधी तो जनता के सामने हैं ही, अब वरूण गांधी भी एक बड़े पद के दावेदार होंगे. मेनका की ख्वाहिश मुलायम के लिये राहत का विषय हो सकती है क्योंकि जिस तरह मेनका तेवर दिखा रही हैं, उससे समाजवादी पार्टी का नुकसान कम से कम होता जाएगा. बात साफ है कि इससे नुकसान भाजपा का ही होना है क्योंकि जिन दिग्गजों की नजरें बरसों से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है, वे वरूण को कैसे आगे बढऩे दे सकते हैं.

इन उप चुनाव के परिणाम ने मीडिया की एक और सूरत दिखा दी है. कुछ पत्रकार अभी मोदी फोबिया से बाहर नहीं आ पाये हैं. एक टेलीविजन चैनल में एक बड़े पत्रकार ने कहा कि मोदी के आने के बाद बढ़ती महंगाई को मीडिया ने बढ़-चढ़ कर दिखाया था लेकिन जब कीमतें घटीं तो खबरें नदारद थी. इस वजह से जनता में संदेश अच्छा नहीं गया और चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. शायद ये पत्रकार महोदय कभी अपने घर के लिये आलू, प्याज और टमाटर खरीदने नहीं जाते हैं. दस रुपये किलो बिकने वाला आलू 40 रुपये और 15 रुपये किलो बिकने वाला टमाटर 80 रुपये हो गया और कीमत गिरी भी तो आलू 25 के भाव और टमाटर चालीस के. अगर महंगाई पर यही नियंत्रण है तो फिर क्या कहना. इससे यह भी मान लेना चाहिये कि जिस तरह लोकसभा में मतदाताओं ने महंगाई से त्रस्त आकर 272 की जरूरत को पूरा कर 282 सीटें दिला दी तो अब महंगाई की तरह गिरेंगे तो यही चुनाव परिणाम आएगा. बहरहाल, इस उपचुनाव परिणामों से यह बात साफ हो गई है कि भाजपा एक राजनीतिक दल है और वह जब भी होगी, टक्कर कांटें की होगी लेकिन मोदी जैसा चेहरा उतारेगी तो कुछ राहत पा सकती है. भाजपा को तो कहना चाहिए बार बार, हर बार मोदी सरकार.   

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

हिन्दी के लिये रुदन


-मनोज कुमार
हिन्दी के प्रति निष्ठा जताने वालों के लिये हर साल सितम्बर की 14 तारीख रुदन का दिन होता है। इस एक दिनी विलाप के लिये वे पूरे वर्ष भीतर ही भीतर तैयारी करते हैं लेकिन अनुभव हुआ है कि सालाना तैयारी हिन्दी में न होकर लगभग घृणा की जाने वाली भाषा अंग्रेजी में होती है। हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने की कोशिश स्वाधीनता के पूर्व से हो रही है और हर एक कोशिश के साथ अंग्रेजी भाषा का विस्तार होता गया। स्वाधीनता के पूर्व और बाद के आरंभिक वर्षों में हिन्दी माध्यम के हजारों शालायें थी लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में हर गांव और गली में महात्मा गांधी विद्यालय के स्थान पर पब्लिक स्कूल आरंभ हो चुका है। ऐसे में हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कैसे और कितनी हिन्दी सिखा पायेंगे, एक सोचनीय सवाल है। अंग्रेजी भाषा में शिक्षा देने वाली शालाओं को हतोत्साहित क्यों नहीं कर रहे हैं? क्यों हम अपनी हिन्दी भाषा में शिक्षा देेने वाली शालाओं की दशा सुधारने की दिशा में कोशिश नहीे करते? शिक्षा ही संस्कृति की बुनियाद है और भाषा इसके लिये माध्यम। हमने अपनी बुनियाद और माध्यम दोनो को ही कमजोर कर दिया है। फिर रुदन किस बात का? जो है, ठीक है।
अब थोड़ी बात, समाज को शिक्षित करने का एक बड़ा माध्यम पत्रकारिता पर। पत्रकारिता ने स्वयं में अंग्रेजी का एक शब्द गढ़ लिया है मीडिया। मीडिया शब्द के अर्थ पर यहां चर्चा करना अनुचित लगता है लेकिन इससे यह बात तो साफ हो जाती है कि वह भी हिन्दी के प्रति बहुत रूचिवान नहीं रहा। हालांकि बाजार के लिये उसने हिन्दी भाषा को चुना है और अंग्रेजी के प्रकाशन हो या प्रसारण, उन्हें हिन्दी में आना पड़ा है। उसने अपनी जरूरत तो समझ ली लेकिन अंग्रेजी का मोह नहीं छोड़ पाया, सो वह ठेठ हिन्दी में न आकर हिंग्लिश में हिन्दीभाषियों पर कब्जा करने लगा। साठ और सत्तर के दशक में जन्मी पीढ़ी की अक्षर ज्ञान के लिये प्रथम पाठशाला अखबार के पन्ने होते थे लेकिन अब इन पन्नों से सीखने का अर्थ स्वयं को उलझन में डालना है। भाषा का जो बंटाधार इन दिनों तथाकथित पत्रकारिता वाले मीडिया में हो रहा है, वह अक्षम्य है। किसी ने बंधन नहीं डाला है कि प्रकाशन-प्रसारण हिन्दी में करें लेकिन लालच में हिन्दी में आना मजबूरी थी और इस मजबूरी में भी हिन्दी पट्टी को उसने मजबूर कर दिया कि वे हिन्दी नहीं, अंग्रेजी भी नहीं, हिंग्लिश पढ़ें। एक ऐसी भाषा के शिकार हो जायें जो न आपको घर का रखेगी न घाट का।
हैरानी की बात है कि जब हम कहते हैं कि पत्रकारिता, माफ करेंगे, मीडिया, जब कहती है कि वह व्यवसायिक हो चली तो उसे इस बात को समझ लेना चाहिये कि हर व्यवसाय अपने गुण-धर्म का पालन करता है लेकिन मीडिया तो इसमें भी असफल होता दिखता है। क्या हम उससे यह सवाल कर सकते हैं कि हिन्दी के प्रकाशन-प्रसारण में तो बेधडक़ अंग्रेजी शब्दों का उपयोग होता है तो क्या अंग्रेजी के प्रकाशन-प्रसारण में हिन्दी के लिये भी मन क्या इतना ही उदार होता है? जवाब हां में तो हो नहीं सकता। अब हम सबको मान लेना चाहिये कि हम हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने के लिये रुदन करते रहेंगे लेकिन कर कुछ नहीं पायेंगे। सच में हिन्दी के प्रति आपके मन में सम्मान है तो संकल्प लें कि हम अंग्रेजी स्कूलों को हतोत्साहित करेंगे। जब यह संकल्प अभियान में बदल जायेगा तो कोई ताकत नहीं कि हिन्दी को भारत क्या, संसार की भाषा बनने से रोक सके।  

बुधवार, 27 अगस्त 2014

नीयत का सवाल

मनोज कुमार
आमतौर पर मेरे और पत्नी के बीच खबरों को लेकर कोई चर्चा नहीं होती है लेकिन बच्चों से जुड़ी खबरों पर बातचीत हो ही जाती है. कल भी ऐसा ही हुआ. केन्द्र सरकार द्वारा जघन्य अपराध करने वाले 16 साल के नाबालिग बच्चों को वयस्क अपराधियों की तरह मुकदमा चलाये जाने के फैसले पर हम दोनों में चर्चा होने लगी. मन ही मन मैं इस तरह के फैसले का स्वागत कर रहा था लेकिन पत्नी के मन को टटोलना भी चाहता था कि आखिर उसकी राय इस बारे में क्या है? मैं कुछ पूछता, इसके पहले ही वह फट पड़ीं। ऐसे फैसले तो पहले ही हो जाना चाहिये था। इन मामलों में उम्र नहीं, नीयत देखी जाती है और जब नीयत बिगड़ जाये तो क्या बालिग और क्या नाबालिग? सजा के हकदार सभी होते हैं और सजा मिलना भी चाहिये. पत्नी के गुस्से को देखकर पहली बार शांति का अहसास हुआ. जैसा मैं सोच रहा था, वैसा वह भी सोचती हैं, यह बात तसल्ली देने वाली थी। यह सच है कि अपराध, अपराध होता है और वह नाबालिग है इसलिये बख्श दिया जाये, यह तर्क नहीं, कुतर्क है। बड़ा सवाल यह है कि अपराध करते समय उसने अपने उम्र से बड़े अपराध करने की सोच ली तो सजा भी उसे उसकी सोच की मिलेगी। नीयत की मिलेगी। यहां उम्र का फैक्टर काम नहीं करता है, यहां बदनीयती का सवाल है। बलात्कार, हत्या और ऐसे ही अपराध करते समय तो दिमाग वयस्कों को भी मात दे जाता है और जब सजा की बारी आती है तो उम्र की दुहाई दी जाती है जो कि बिलकुल गलत है, अनुचित है।

संगीन जुर्म के लिये नाबालिग की उम्र को कम कर दी गई है लेकिन क्या इतने से ही सुधार आ जाएगा? नाबालिग ऐसे जुर्म से परे ही रहें, इस बात की व्यवस्था करने की जरूरत है और जब इस सवाल को लेकर हम चर्चा करते हैं और नैतिकता के तराजू पर नापते हैं तो पता चलता है कि अनैतिकतता का पलड़ा भारी हो चला है। भौतिक सुखों और विज्ञापनों ने बच्चों को समय से बड़ा कर दिया है। जिस उम्र में उन्हें भविष्य के सपने देखने चाहिये, वे जिंदगी के सपने देखने लगते हैं। भविष्य के सपने देखते तो वे अपने वाले समय में देश के निर्माता होते लेकिन वे जिंदगी के सपने देखते हैं जिसमें वैभवशाली जीवन हो, सुंदर पत्नी और महंगी कार तथा मोबाइल हो। इस सुंदर सी जिंदगी उन्हें तब हासिल हो सकती है जब वे भविष्य के सपने बुने और उसे सच करने के लिये मेहनत करें लेकिन उनके पास इतना वक्त नहीं है। वे जल्दबाजी में है। सबकुछ समय से पहले पा लेना चाहते हैं और इसी भागमभाग में उन्हें वैभवशाली जिंदगी पाने के लिये शॉर्टकर्ट दिखता है अपराध का रास्ता। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें इस बात का इल्म नहीं है कि वे जिस रास्ते पर चल रहे हैं, उन्हें जिंदगी नहीं, सजा मिलेगी लेकिन मन में नाबालिग हो जाने का मुगालता पाले वे तेजी से शॉर्टकर्ट के रास्ते पर चल पड़ते हैं। एक बात और यहां गौर करने लायक है कि ये शॉर्टकर्ट अपनाने वाले ज्यादतर बच्चे अमीर परिवारों से रिश्ता रखते हैं। उन्हें इस बात का भी भ्रम होता है कि उनके रईस बाप महंगे वकील कर उन्हें बचा ले जाएंगे। यह भी सच है कि उनके मन में भ्रम यूं ही नहीं बना हुआ है बल्कि उन्होंने अपने आसपास यह होते देखा है। बात साफ हो जाती है कि यहां उम्र नहीं, नीयत का मामला है।

सवाल यह भी है कि सरकार के इस फैसले से अपराधों में बच्चों की संलिप्तता कैसे खत्म होगी? इसके लिये जरूरी है कि सरकार टेलीविजन चैनलों के अपराधों की पृष्ठभूमि वाले कार्यक्रमों को बैन करे। एक चैनल तो लगभग पूरा समय ही अपराधों की पृष्ठभूमि वाले कार्यक्रम पर चल रहा है। क्राइम बेस्ड सीरियल से टेलीविजन चैनलों को भारी-भरकम कमाई होती है। इसकी टीआरपी सर्वाधिक होती है और इन कार्यक्रमों के अंत में संदेश दिया जाता है कि बुरे काम का बुरा नतीजा होता है लेकिन चैनलों को कौन समझाये कि 20-22 मिनट के कथाक्रम में आपने अपराध के उपक्रम से परिणाम तक पहुंचाने में जो विधि बताया है, वह लाखों और बल्कि करोड़ों कच्चे दिमाग में बस गया है कि बस, यही तरीका श्रेष्ठ है। किसे इतना वक्त है कि वह कथा के आखिरी में बुरे काम का बुरा नतीजा का संदेश सुने और उस पर अमल करे। अमल करने के लिये पहले ही आपने पूरा तरीका अपरोक्ष रूप से बता दिया है। ऐसे में अपराध रूकने के बजाय बढ़ रहे हैं, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है।

भगवान करे कि मैं गलत साबित होऊं लेकिन जो मैं समझ रहा हूं कि इन दिनों यानि निर्भया कांड के बाद से जैसे देश में बलात्कार के अपराधों का सिलसिला बढ़ गया है। इसके कारण में जाने के बाद जो कुछ तथ्य और तर्क सामने आते हंै, उसमें मीडिया एक बड़े कारण के रूप में आता है। जिस तरह पहले मैंने जिक्र किया कि क्राइम बेस्ड धारावाहिक अपराधों में किस तरह मददगार हो रहे हैं, उसी तरह खबरों की भी अपनी भूमिका है। दो खबरों का जिक्र करना चाहूंगा कि जिसमें एक हालिया खबर भोपाल से है। मां ने अपने बेटे को पुलिस के हवाले इसलिये कर दिया कि वह बेरोजगार था और उसे संदेह था कि चोरी के पैसों से वह मजे के दिन गुजार रहा है। बाद में पता चला कि वह मंदिर में चोरी करता था। मां के इस साहस को सलाम करना चाहिये और हर अखबार और हर चैनल की प्रमुख खबर होनी चाहिये थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी तरह कोई दो साल पहले एक ट्रेन को दुर्घटना से बचाने के लिये ड्रायवर स्वयं रेल इंजिन के सामने आकर ट्रेन को न केवल दुर्घटना से बचाया बल्कि अनेक लोगों की जान भी बची। उस रेल इंजन के ड्रायवर की मौत के बाद उसके परिजनों का क्या हुआ, यह जानने की फुर्सत मीडिया को नहीं है। ऐसे अनेक प्रकरण है जो समाज का मन बदलने की ताकत रखते हैं लेकिन मीडिया सकरात्मक खबरों से परे होता जा रहा है। सनसनी और टीआरपी देने वाली खबरों के चलते उसे सामाजिक सरोकार की चिंता ही नहीं है, इस सच से दिल्ली से देहात तक की पत्रकारिता करने वाला कोई भी शख्स इंकार नहीं कर सकेगा।

अपराधी बनाने के लिये उम्र 16 साल तय करने से ही समस्या का हल नहीं है और न ही यह राजनीति का मुद्दा है। इस मामले को दलगत राजनीति से परे ले जाकर समाज के मंच पर देखा जाना चाहिये। बच्चों के लिये काम कर रही संस्थाओं को भी प्रयास करना चाहिये कि बच्चे अपराध से विरक्त कैसे हों? टेलीविजन के पर्दे पर आने वाले विज्ञापनों पर तो जैसे नियंत्रण समाप्त हो चला है, ऐसा प्रतीत होता है। मुझे याद है कि कॉलेज के आरंभिक दिनों में पता चला था कि रजस्वला क्या होता है लेकिन आज पांच साल के बच्चे को पूरी खबर है। सेनटरी नेपकिन के विज्ञापन ने उन्हें सबक सिखा दिया है। इन दिनों इससे भी आगे बढक़र एक विज्ञापन आ रहा है जिसमें सैनेटरी नेपकीन पहनी मॉडल को जिस्मानी तौर पर घुमा-फिराकर दिखाया जा रहा है कि वह कितनी कम्फर्ट है लेकिन विज्ञापनप्रदाता यह भूल गया है कि समाज स्वयं को कम्र्फट फिल नहीं कर रहा है। इस बेहूदा विज्ञापन पर किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया क्योंकि ऐसा लगता है कि सबने इसे जिंदगी का हिस्सा मान लिया है।

मुझे लगता है कि संविधान में नाबालिग की जो व्याख्या की गई है, वह ऐेसे छोटे-मोटे अपराधों के लिये है कि किसी के बगीचे से आम तोड़ कर चोरी से खा लेना, किसी को गुस्से में पत्थर फेंक देना, किसी को मासूमियत के साथ परेशान करना। तब शायद कानून को भी उम्मीद नहीं थी कि जिन्हें वह नाबालिग कह कर व्याख्या कर रहा है, वह बालिगों से अधिक दुस्साही और अपराधी प्रवृत्ति का होगा। अब किसी नाबालिग के पास आम तोडऩे कर चोरी से खाने का वक्त नहीं, अब वह गुस्से में पानी का घड़ा नहीं तोड़ता है बल्कि चाकू से हमला करता है और मासूमियत को मोबाइल, टेलीविजन और इंटरनेट की नजर लग गयी है। इस नजर ने उम्र को पीछे धकेल दिया है और बचपन की आंखों में नीयत नहीं, बदनीयती बस चली है।

शनिवार, 23 अगस्त 2014

एक थी भाजपा, एक थी कांग्रेस!



-मनोज कुमार 

2014 के आम चुनाव के परिणाम के बाद भारत की दो बड़ी पार्टी क्रमश: भारतीय जनता पार्टी एवं कांग्रेस का अस्तित्व लगभग समाप्त की ओर है। केन्द्र में कहने को तो भारतीय जनता पार्टी की सरकार है लेकिन पूरा संसार गवाह है कि केन्द्र में भाजपा नहीं, नरेन्द्र मोदी की सरकार यह आम चुनाव भाजपा ने मोदी को आगे रखकर लड़ा और नारा दिया अबकी बार मोदी सरकार अर्थात भाजपा ने स्वयं के पैर खींच लिये। इसलिये अब लाख हल्ला मचाने के बाद भी सत्य यही है कि भाजपा नेपथ्य में चली गयी है और नरेन्द्र मोदी की सरकार है। भाजपा नरेन्द्र मोदी को सामने रखकर हल्ला मचा ले कि केन्द्र में उसकी सरकार है लेकिन कांग्र्रेस तो हाशिये पर पड़ी है। भाजपा के नेपथ्य में चले जाने की बात जितनी सच है, उतना ही सच कांग्रेस का हाशिये पर रहना है। कांग्रेस तो कह भी नहीं पा रही है कि कांग्रेस किसकी है। कांग्रेस के सामने अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष की स्थिति है और इस स्थिति से उबरने के लिये उसकेे पास कोई संकटमोचक नहीं है। इस आम चुनाव के बाद एक नारा अप्रत्यक्ष रूप से गूंज रहा है कि एक थी भाजपा, एक थी कांग्रेस। 

देश इस बात से प्रसन्न है कि तीन दशक बाद भारत की राजनीति गठबंधन सरकार से मुक्त हुई है। इस मामले में अप्रसन्नता का कोई सवाल नहीं है लेकिन रंज इस बात का रहा कि तीन दशक बाद जो बदलाव हुये, वह व्यक्तिवाद में बदल गया। भाजपा सरकार में आ जाती तो शिकायत कम होती लेकिन मोदी की सरकार का आना रंज का विषय है। दरअसल, मोदी सरकार का आना, उसी राजनीतिक इतिहास को दोहराना है जैसा कि कांग्रेस न आकर इंदिरा गांधी का आना था। मोदी और इंदिरा गांधी में भिन्नतायें आप देख सकते हैं तो उनमें अनेक समानतायें भी दिखेंगी। उनमें जो पहली समानता दिखती है, वह है दोनों का डॉयनामिक नेचर। इंदिरा गांधी कांग्रेस पर हावी रहीं और कांग्रेस के टूटने के बाद जो कांग्रेस बनी वह इंदिरा कांग्रेस थी लेकिन मोदी के साथ फिलवक्त मामला ऐसा नहीं है लेकिन मोदी भाजपा के नहीं हैं बल्कि मोदी की भाजपा है, जैसे जयघोष अप्रत्यक्ष रूप से गूंज रहा है। मोदी की कार्यप्रणाली को लेकर ऐसा दृश्य उपस्थित करने का प्रयास किया जा रहा है कि मानो वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गये देश के  प्रधानमंत्री न होकर कोई तानाशाह हैं। इसी तानाशाही की शिकार इंदिरा गांधी भी थीं और आपातकाल इसका उदाहरण है। इसमें दो राय नहीं कि नरेन्द्र मोदी को आगे करके भाजपा ने जो जीत के लिये रास्ता चुना था, उसी रास्ते में वह पीछे छूट गयी, जैसे इंदिरा गांधी आगे निकल गयी थीं और कांग्रेस पीछे छूट गयी थी। 

एक बड़ा सवाल यह है कि इंदिरा गांधी के जाने के बाद कांग्रेस में एकदम से रिक्तता आ गयी, क्या वही इतिहास भाजपा में भी दोहराया जायेगा। अटलविहारी वाजपेयी के बाद आडवानी के बाद भाजपा में यह स्थिति बन रही थी कि नरेन्द्र मोदी ने सम्हाल लिया। कांग्रेस में भी स्थिति लगभग ऐसी ही रही लेकिन कांग्रेस पर परिवादवाद का आरोप लगता रहा। इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी ने देश की सत्ता सम्हाली और शहीद हो गये तो गांधी परिवार से छायामुक्त नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री का पद सम्हाला। उनके पास बहुमत नहीं था लेकिन अनुभव के सहारे उन्होंने कार्यकाल पूरा किया। आपातकाल के बाद से 2014 के आम चुनाव के बाद से गैर-कांग्रेसी सरकारें बनी लेकिन उनका प्रभाव नहीं दिखा। यह सरकारें गठबंधन सरकारें थी जो स्वतंत्र रूप से फैसला लेने में सक्षम नहीं कही जा सकती थीं। खैर, इसके बाद 10 वर्षों तक कांग्रेस गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री रहे मनमोहनसिंह इस आरोप से मुक्त नहीं हो सके कि उनकी कार्यप्रणाली पर गांधी परिवार की छाया है। राहुल गांधी का मिजाज एक नौजवान के रूप में रही, वे अनुभवहीन थे सो कांग्रेस में वे सर्वमान्य विकल्प बनकर स्थापित नहीं हो पाये। 

कांग्रेस इस समय अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। केन्द्र में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता पाने के लिये उसे ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। आजादी के बाद से शायद यह पहला वक्त होगा कि देश की बागडोर सम्हालने वाली कांग्रेस पार्टी को विपक्ष के रूप में खड़ा होने का अवसर भी नहीं मिल रहा है। हालांकि इसके लिये उनके पास पर्याप्त संख्या में सांसदों का नहीं होना, एक तथ्यात्मक कमजोरी है। नरेन्द्र मोदी के स्थान पर भाजपा को कोई अन्य नेता यथा अटलविहारी वाजपेई या आडवाणी होते तो शायद कांग्रेस को विपक्ष का दर्जा मिल चुका होता लेकिन इस मामले में कोई रियायत देते नरेन्द्र मोदी नहीं दिखते हैं। कांग्रेस का संकट यहां तक ही नहीं है बल्कि कांग्रेसशासित राज्यों में जो घमासान मचा हुआ है, वह भी पार्टी के दिग्गजों की नींद उड़ा रहे हैं। निश्चित रूप से इसका लाभ नरेन्द्र मोदी के खाते में जा रहा है। वे कांग्रेस के घमासान को थमते देखना नहीं चाहते हैं क्योंकि आने वाले समय में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होना है, उसमें भी वे अपनी विजय देखना चाहते हैं। कोई संदेह राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन उनकी अपेक्षाओं के विपरीत न हो। ऐसी हालत में कांग्रेस के समक्ष अस्तित्व बचाने का संकट है लेकिन संकटमोचक के रूप में कोई नहीं दिख रहा है। 

भाजपा भी इस समय खामोशी की मुद्रा में है। लोकसभा में 273 से आगे बढक़र 282 सीटें जीतने वाले नरेन्द्र मोदी निर्विवाद प्रधानमंत्री हैं तो भाजपा में एकछत्र नेता भी। अब उन्होंने अपने पसंद से भाजपा का अध्यक्ष अपने विश्वस्त अमित शाह को भी बना दिया है। कोई कुछ भी कहे लेकिन नरेन्द्र मोदी में इंदिरा गांधी का अक्स दिख रहा है और वे जो चाहते हैं, जैसा चाहते हैं, वैसा ही भाजपा में हो रहा है और होता रहेगा क्योंकि केन्द्र में भाजपा नहीं, नरेन्द्र मोदी की सरकार है। भाजपाशासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी मोदी से भयभीत हैं। कभी केन्द्र की कांग्रेस गठबंधन सरकार को आंखें दिखाकर मनमाना राहत राशि बटोरने वाले राज्यों को मोदी का दो टूक जवाब मिल रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुये नरेन्द्र मोदी ने केन्द्र के सहायता मांगने के बजाय अपने संसाधनों से गुजरात को बेहतर बनाने की कोशिश और वे इसी का उदाहरण अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्रियों को भी दे रहे हैं। भाजपाशासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मुसीबत यह है कि वे मोदी के खिलाफ जा भी नहीं सकते हैं। ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो मोदी की दबंगता और उनके प्रभावों को दिखाती है। यहां फिर से भाजपा नेपथ्य में और मोदी मंच पर दिखते हैं। कांग्रेस इस समय जिस स्थिति में है, उससे उबरने में उसे शायद वक्त लगेगा। उबर पायेगी या नहीं, इसकी भी चिंता उनके अपने नेताओं की नहीं दिख रही है। सबकुछ ऐसा ही चलता रहा तो कहा जायेगा एक थी भाजपा, एक थी कांग्रेस। 

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

शोध पत्रिका समागम का अगस्त अंक जनक्रांति 2014 व्हाया सोशल मीडिया

आप सभी को स्वाधीनता पर्व की हार्दिक शुभकानाएं।

शोध पत्रिका समागम के अगस्त अंक का केंद्रीय विषय जनक्रांति 2014 व्हाया सोशल मीडिया है।  भारत में पहली क्रांति से हमें आज़ादी मिली। इसके बाद आपतकाल के बाद एक क्रांति हुई और अब सोशल मीडिया के जरिये जनक्रांति 2014 में हुई है जिसके परिणामस्वरूप देश में तीस वर्ष बाद किसी दल को पूर्ण बहुमत मिला है. गठबंधन सरकारों का सिलसिला समाप्त हुआ है. अन्ना हज़ारे से लेकर अब तक के बदलाव की मीमांषा करता समागम का नया अंक जारी कर दिया गया है. 

शोध पत्रिका समागम का अगला अंक हिंदी का महागीत : लता मंगेशकर पर है.