सोमवार, 7 अप्रैल 2014

तकली की याद में...


-मनोज कुमार
यादें हैं यादों का क्या! जाने कब और कैसे आ जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। जब सारी दुनिया सोशल साइट्स की दीवानी हो रही हैं तब मुझे बापू की तकली का अनायस स्मरण हो आया। आपको भी तकली की याद हो? आपने भी अपने स्कूली समय में पोनी से तकली के माध्यम से सूत कातना सीखा होगा। मैंने तो ऐसा खूब किया है। तकली की याद दरअसल अनायस नहीं आयी बल्कि बच्चों को संस्कार देने की गरज से तकली को याद करना पड़ा। जैसे गांधी व्यक्ति नहीं एक विचार हैं, वैसा ही उनकी तकली एक उपक्रम नहीं बल्कि विचार है जो न केवल मन को एकाग्र करती है बल्कि यह विशवास भी दिलाती है कि भारत की जमीन यहीं से शुरू होती है और आगे चलती जाती है। ग्लोबल विष्व का जो सपना दुुनिया देख रही है, उसमें भारत का गांव कहीं नहीं दिखता है। गांधी जी की बातें खूब हो रही है, पर गांधी विचार पर केवल फैषन के रूप में बात हो रही है। मेरा मन तब आहत हो जाता है जब मेरे आसपास की नयी पीढ़ी का संबोधन गांधीजी को लेकर लगभग अभद्र होता है। उनकी यह अभद्रता सोची-समझी नहीं है बल्कि संस्कारगत अभाव के कारण पनपी हुई है। नयी पीढ़ी के व्यवहार को जांचने पर पाया कि उनमें विचार का पौधा तो कभी लगाया ही नहीं गया। उन्हें दौड़ना सीखा दिया गया लेकिन जिंदगी जीना नहीं सिखाया गया और परिणामस्वरूप वे बिना मकसद भाग रहे हैं। उनका मकसद मोटी सैलरी वाली नौकरी, एक बड़ी कार और तिस पर कमाऊ बीवी ही पाना रह गया है। इसको पाने के बाद मां-बाप भी यूजएंडथ्रो की श्रेणी में आ जाते हैं। यह अस्वाभाविक नहीं है और इसके लिये स्वयं पालक जवाबदार हैं। उन्होंने अपने जीवन में जो सीखा, उसे अपनी बाद की पीढ़ियों में हस्तांतरित करने की कोई कोशि
श नहीं की और उल्टे कहा नयी पीढ़ी है....नये जमाने के साथ चलेगी।
नये जमाने की बात करते हैं तो एक डॉयलाग कि जमाना जितना भी बदल गया हो, बच्चे आज भी औरतें ही जनती हैं, सारी सोच बदल जाती है। लगता है कि क्या जमाने के साथ हमारी सोच भी छोटी होती चली जा रही है? क्या हम नयी चीजों को सीखने के साथ पुराने संस्कारों को भूलते चले जा रहे हैं? इन्हीं पुराने संस्कारों में बात होती है तकली की। तकली को मैं एक विचार के रूप में अपने साथ रखना चाहता हूं। तकली के रूप में इस विचार को नयी पीढ़ी के साथ बांटना चाहता हूं। एक ऐसा विचार जो न केवल संस्कार देता है बल्कि संयम भी सिखाता है। सरपट भागती जिंदगी में एकाएक सबकुछ पा लेने की चाहत को हवा देेने के बजाय आहिस्ता आहिस्ता पा लेने की सीख देती है तकली। तकली के रूप में यह विचार हमारे बीच से कैसे और कब गायब हो गया, अहसास ही नहीं हुआ। अब जबकि भौतिक रूप से तकली को संजोने की इच्छा जागृत हुई तो मैं अवाक था। तकली हमारे विचारों और यादों से ही नहीं, बाजार से भी लुप्त हो गई है। भोपाल से दिल्ली तक के बाजारों में ढूंढ़ने पर भी तकली नहीं मिली। तकली प्राप्त करने के अपने प्रयासों में सबसे पहले तो मुझे याद दिलाना पड़ा कि तकली होती क्या है। कुछ ने चरखा बता दिया लेकिन जब उनके स्कूल के दिनों की याद दिलायी तो उन्हें स्मरण हो आया। खैर, अब तक की कोशिश  में मैं नाकाम हूं लेकिन उम्मीद है कि तकली और तकली का विचार ओझल है लेकिन विस्मृति की स्थिति में नहीं। कोई ना कोई, एक दिन मुझे तकली और विचारों से मेरे मन को उजास से भर देगा। तब तक मैं तकली का रास्ता देखता हूं....   

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

लोकतंत्र, चुनाव और युद्व


-मनोज कुमार
मैं बचपन से एक शब्द का उत्तर पाने की जुगत में लगा हुआ हूं लेकिन उम्र के पचास पर पहुंचने वाला हूं, किसी ने न तो संतोषजनक जवाब दिया और न ही मेरे सवाल के इर्द-गिर्द कुछ ऐसा लिखा पढऩे को मिले, जिसमें मेरे सवाल का जवाब हो। बहरहाल, मेरा सवाल है कि चुनाव के साथ लडऩा ही क्यों लगाया जाता है, जैसे कि चुनाव लड़ा जाएगा, चुनाव लड़ेगा, प्रत्याशी मैदान में उतारा जाएगा आदि-इत्यादि। इसका अर्थ तो यह हुआ कि चुनाव को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा तो माना गया लेकिन चुनाव एक रूप में अपरोक्ष तौर पर युद्व है, इस बात से भी इंकार नहीं किया गया।  हालांकि मैं यह भी सुनता हुआ आया हूं कि युद्व और प्रेम में सब कुछ जायज होता है और इस बात को मान लें तो चुनाव के दरम्यान जो कुछ होता है, वह गलत नहीं है। यहां तक कि अनैतिक भी नहीं क्योंकि जब चुनाव का स्वरूप ही अपरोक्ष रूप से युद्व का है और यहां जो कुछ घटेगा या घटता है, वह गलत नहीं है। ‘आखिरी वार, अबकी बार’ जैसे नारे चुनाव नहीं, युद्व का अहसास करा रहे थे।

हाल ही में हमने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का अनुभव पाया है। एक पत्रकार के नाते चुनावों में होने वाली गतिविधियों पर नजर रहती है, भले ही मैं पॉलिटिकल रिर्पोटिंग में दखल न रखता हूं। इसे यूं भी कह सकते हैं कि एक जागरूक नागरिक के नाते चुनाव में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखना मेरा अधिकार और दायित्व दोनों ही है। इसके पहले के भी चुनाव की कुछ यादें संग हैं लेकिन इस बार के चुनाव में नेताओं की जुबान जरूरत से अधिक लम्बी हो गई थी। सत्ता में आने के लिये या सत्ता पाने के लिये अपनी अपनी उपलब्धियों को गिनाना, विपक्षी की कमजोरियों को मतदाताओं के सामने लाना तो अच्छी बात है लेकिन इस बार इन बातों के साथ साथ एक-दूसरे के पुरखों पर छींटे उछालना कुछ अखरने वाला था। आखिरी वार, अबकी बार वाला नारा तो इस बात का गवाही दे रहा था कि चुनाव लोकतंत्र को मजबूत करने वाली प्रक्रिया से कहीं अधिक युद्व की दस्तक दे रहा था। 

विधानसभा चुनावों की दस्तक के साथ शुरू हुआ शाब्दिक वार आम चुनाव के आने के साथ ही तेज हो चला है। पक्ष एवं विपक्ष एक-दूसरे की खामियों को इस तरह सामने ला रहे हैं जैसे वे एक-एक करके बीमारियां गिना रहे हैं। इसी आजाद भारत में एक समय वह भी था जब चुनाव प्रचार होता था लेकिन तब आखिरी वार, अबकी बार वाला नहीं बल्कि उन दिनों के भाषणों में, नारों में शालीनता होती थी। एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव होता था। यह वह भी दौर था जब चुनाव में पेडन्यूज की बीमारी नहीं लगी थी। खबरों को खरीदने और बेचने का सिलसिला आरंभ नहीं हुआ था। राजनेता अखबारों से भयभीत होते थे। उनमें खबरों को खरीदने का साहस नहीं होता था। राजनेता और पत्रकारों के बीच की वर्जनायें आपातकाल के दौरान टूटी और ऐसी टूटी कि पेडन्यूज का जादू सिर चढक़र बोल रहा है।

चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही हिस्सा होता और युद्ध जैसे शब्द उसके इर्द-गिर्द नहीं होते तो आज राजनैतिक सम्बोधन बना होता लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जैसे समाज के सभी क्षेत्रों में गिरावट आयी और नैतिकता विलोपित हो गई, नीति भी अनीति में परिवर्तित हो गयी, वैसा ही गिरावट राजनीति के क्षेत्र में आयी है। लिखने में भी अब कोई राजनैतिक नहीं लिखता बल्कि राजनीति संबोधन देता है। इस राजनैतिक शब्द में अनीति छिपा हुआ है क्योंकि चुनाव नैतिकता या नीति से नहीं हो रहा है बल्कि लड़ा जा रहा है और हर लड़ाई साम-दाम-दंड-भेद से ही जीती जाती है। मुझे नहीं मालूम कि चुनाव का कब और किस तरह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिये शुद्धिकरण होगा जब चुनाव युद्व की तरह नहीं, एक यज्ञ की तरह होगा जिसमें सबके लिये शांति और शुचिता का भाव होगा। इस दिन के आने तक अबकी बार, आखिरी वार को देखते, सुनते और पढ़ते रहिये।

शोध पत्रिका ‘समागम’ 14वें वर्ष में, समाज, संचार एवं सिनेमा पर केन्द्रित अंक जारी



भोपाल। सिनेमा एवं मीडिया पर केन्द्रित भोपाल से प्रकाशित मासिक शोध पत्रिका समागम अपने निरंतर प्रकाशन के 13 वर्ष पूर्ण कर 14वें वर्ष में प्रवेश कर गयी है। शोध पत्रिका समागम का नया अंक समाज, संचार एवं सिनेमा पर केन्द्रित है। संचार समाज का सेतु है तो सिनेमा समाज का प्रतिबिम्ब, इसी विषय को केन्द्र में रखकर समाज के विभिन्न आयामों पर अध्यापकों एवं शोधार्थियों के शोधपत्रों का प्रकाशन किया गया है। शोध पत्रिका समागम के सम्पादक श्री मनोज कुमार ने कहा कि बेहद सीमित संसाधनों में प्रतिमाह पत्रिका का प्रकाशन चुनौतीपूर्ण है किन्तु मीडिया के क्षेत्र में शोध परम्परा का अभाव दिखता है। समागम के माध्यम से कोशिश की जा रही है कि मीडिया में शोध को अधिकाधिक स्थान दिया जा सके। 

उल्लेखनीय है कि शोध पत्रिका समागम का प्रत्येक अंक विषय विशेष का अंक होता है। 2012 में जब भारतीय सिनेमा सौ वर्ष में प्रवेश कर गयी तब शोध पत्रिका समागम ने 100 पृष्ठों का विशेष अंक प्रकाशित किया था। इसके अलावा महात्मा गांधी, दलित पत्रकारिता, साहित्य पत्रकारिता के साथ ही 2013 के विधानसभा चुनावों पर विशेष अंक का प्रकाशन किया गया। 1952 से लेकर 2013 तक के चुनाव में मीडिया की भूमिका को रेखांकित किया गया है, साथ ही न्यूमीडिया के हस्तक्षेप को भी एक अलग दृष्टि से समझने की कोशिश की गई है। सम्पादक मनोज कुमार ने बताया कि शोध पत्रिका समागम के मार्च 2014 का अंक भारतीय रंगमंच पर केन्द्रित होगा। 

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

सम्पादक, मैनेजर और जवाबदारी


मनोज कुमार
      जब हम सब स्कूल में पढ़ते थे तो एक स्वाभाविक सी आदत होती थी कि हम अपनी गलती दूसरों पर ढोल दें. ऐसा करके हम कुछ समय के लिये डांट से बच जाते थे लेकिन इससे हमें ही नुकसान होता था. इस बात को कितने लोगों ने समझा और सीखा, मुझे नहीं मालूम लेकिन मुझे जल्द ही अपनी गलती का अहसास हो गया और कोशिश करके अपनी गलती अपने सिर लेने लगा. इससे मुझे दो फायदे हुये जिसमें पहला यह कि पोल खुल जाने पर बड़ी सजा का डर मन से खत्म हो गया और दूसरा अपनी गलती मान लेने पर आत्मविश्वास जागने लगा. आज जब उम्र के पचास के आसपास हूं तो यह मेरी शक्ति बन चुका है. खैर, इन दिनों इसी को संबद्ध करते हुये एक नये अनुभव से गुजर रहा हूं. अखबारों में छपने वाले लेख के आखिरी में सारी जवाबदारी लेखक पर थोपते हुये कि व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, इनसे समाचार पत्र का कोई लेना-देना नहीं है.

अखबारों में इन पंक्तियों ने मेरे बचपन की यादें ताजा कर दी हैं. ऊपर जो बातें मैंने लिखी, वह इन पंक्तियों से बहुत अलग नहीं है. अब मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि जब अखबारों में सम्पादक नाम की संस्था होती है और वह प्रकाशन के पूर्व लेखों के तथ्य और तर्क को अखबार की नीति की कसौटियों पर जांचता है और जांचने के बाद प्रकाशन के लिये सहमत होता है. ऐसी स्थिति में लेख में व्यक्त विचारों के प्रति अकेला लेखक कैसे जवाबदार हो सकता है? सम्पादक जिसने लेख को जांचा-परखा और अपनी रजामंदी की मुहर ठोंकी, वह इससे कैसे बरी हो सकता है. यदि ऐसा है तो सम्पादक संस्था की जरूरत ही नहीं है और शायद ऐसा हो रहा है इसलिये ही सम्पादक संस्था का हस हो रहा है. और यदि सम्पादक संस्था है तो वह पहले जवाबदार है कि उसने बिना जांचे-परखे और अखबार की नीतियों की कसौटी पर परखे बिना अपनी रजामंदी की मुहर कैसे लगा दी.

दुर्भाग्य से विचार लेखक के निजी हैं, इनसे समाचार पत्र का कोई लेना-देना नहीं है, जैसे जवाबदारी से बचने वाली पंक्तियों के खिलाफ लगभग सब लोग मौन हैं. स्वयं लेखक भी. मैंने इस संबंध में कई लोगों से बात की तो उनका कहना होता है कि इससे क्या फर्क पड़ता है? इसका अर्थ तो यह होता है कि जिस तरह सम्पादक की पंक्तियों का कोई असर नहीं होता है, उसी तरह लेख में व्यक्त विचार समाज को न तो दिशा देते हैं और न उद्वेलित करते हैं. लेखक लिखने की औपचारिकता पूरी कर रहा है और सम्पादक और अखबार खाली जगह को भरने की. ऐसे में जवाबदारी और जिम्मेदारी जैसे भारी-भरकम शब्द बहुत बौने से हो जाते हैं. पाठक अब पत्र लिखते नहीं हैं और जो पत्र प्रकाशित भी होते हैं, वे देश की बड़ी समस्याओं पर होते हैं. मुझे स्मरण हो आता है कि मेरे 30 वर्षों से ज्यादा की पत्रकारिता में दो-तीन अवसर ऐसे आये जब हमारे अखबार में छपे लेख और खबर पर पूरा शहर टूट पड़ा था. तथ्य और तर्क को लेकर पाठक का अपना पक्ष था. यहां तक कि वह पू्रफ की गलतियां भी झेल नहीं पाता था लेकिन तब भी किसी सम्पादक ने साहस नहीं किया कि वह लेख के आखिर में चिपका दे कि विचार लेखक के निजी हैं, इनसे समाचार पत्र का कोई लेना-देना नहीं है और वह अपने को बचा ले.

जहां तक मुझे पता है कि पीआरबी एक्ट में अनेक बंधन है और इसी बंधन के चलते समाचार पत्रों की प्रिंटलाईन में यह पंक्तियां भी जाती हैं कि समाचार चयन के लिये पीआरबी एक्ट के तहत जिम्मेदार. कायदे से तो यह जिम्मेदारी सम्पादक की होना चाहिये लेकिन वह यहां भी स्वयं को बचाते हुए स्थानीय सम्पादक या फिर समाचार सम्पादक को पीआरबी एक्ट के तहत चिपका देता है. जिस तेजी से सम्पादक अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं और बचने की छोटी-छोटी गलियां तलाश कर रहे हैं, यही कारण है कि सम्पादक संस्था की जो अहमियत थी, सम्मान था और गर्व हुआ करता था, अब गर्त में जा रहा है. सम्पादक संस्था के पास अब वक्त लेख को जांचने-परखने का नहीं है, वह तर्कपूर्ण वैचारिक बहस से स्वयं को दूर रखना चाहता है. उसका पूरा मन और समय इस जुगाड़ में गुजर जाता है कि किस तरह वह सत्ता और अखबार का संतुलन बनाये रखे क्योंकि प्रबंधन को भी सम्पादक नहीं मैनेजर चाहिये और एक मैनेजर के लिय शायद यही पंक्तियां उपयुक्त है कि विचार लेखक के निजी हैं, इनसे समाचार पत्र का कोई लेना-देना नहीं है. यह ठीक है लेकिन एक बात मन में बार बार उठती है, वह यह कि क्या यह जवाबदारी स्थानीय सम्पादक या समाचार सम्पादक नहीं उठा सकता कि वह लिख सके कि अखबार में प्रकाशित हर सामग्री के लिये अंतत: वही जवाबदार है. खैर, गैर-जवाबदारी के इस समय में जवाबदारी की अपेक्षा करना बेमानी ही नहीं, निरर्थक है.


रविवार, 8 दिसंबर 2013

विश्वास दरकने का साल 2013

मनोज कुमार

      कहते हैं कि 13 का अंक बुरा होता है। मैं ज्योतिष शास्त्र पर विश्वास नहीं करता, तो अविश्वास भी नहीं है। कभी 13 के फेर में नहीं पड़ा, लेकिन आज जब मैं मीमांसा कर रहा हूं, तो लगता है कि यह साल 2013 वास्तव में बुरा ही बुरा रहा। खासतौर पर यह साल समाज का भरोसा तोडऩे वाला साल साबित हुआ। पहले अन्ना हजारे के आंदोलन का बिना मकसद पाए खत्म हो जाना, फिर आसाराम की करतूतों पर से परदा उठना और आखिरी में मीडिया को अविश्वास के घेरे में लाकर तेजपाल का एक किशोरी के साथ कथित यौन व्यवहार करना। अब ज्योतिष दावे से कह सकते हैं कि 13 का अंक वास्तव में बुरा होता है। इस समय हम सब शर्मसार हैं। हमारी यह शर्मिंदगी हमारे अपने किए पर नहीं है, बल्कि हमारे भरोसे के लगातार दरक जाने से है। बहुत ज्यादा नहीं लगभग दो साल के अंतराल में हम इस बुरे दौर से गुजर रहे हैं। यह दौर अंग्रेजों के राज से भी बद्तर है। इन दो सालों के बीच विश्वास ठांठें मारता रहा और हमें लगने लगा कि भारत में, हमारे भारतीय समाज में एक ऐसा दिन आने वाला है, एक ऐसी सुबह होने वाली है, जब हम रोज-रोज के छले जाने वाले प्रपंच से खुद को बरी पा सकेंगे। तब हममें से किसी को इस बात का यकीन ही नहीं था कि जिस भरोसे की उम्मीद कर रहे हैं, जिस सुबह की आस हमारे दिल में है, दरअसल वैसा कुछ नहीं है। बल्कि आज जितना बुरा हम देख रहे हैं या कहें कि जिस कुशासन को झेलने के हम आदी हो चुके हैं, उससे भी बुरा समय हमारे घर-आंगन के दहलीज पर आ खड़ा हुआ है। हम जिस सुबह के इंतजार में हैं, वास्तव में वह सुबह नहीं,  बल्कि एक और काली रात की पटकथा लिखी जा रही है जिसे याद कर हम सिहर उठेंगे। बीते 12 महीने की एक के बाद एक, तीन कहानियों ने तो कुछ ऐसा ही बयान किया है सिहरा देने वाली घटनाएं, नैतिकता के पार जाती हदें और समाज का टूटता, दरकता विश्वास। 

हमारे बीच विश्वास कैसे दरक रहा है, इसकी बानगी देखनी है, तो बात शुरू करते हैं अन्ना हजारे के आंदोलन से। अन्ना वयोवृद्ध हैं। वे गांधीवादी नेता हैं। उनके  भीतर इस कुशासन को लेकर आग थी। वे व्यवस्था बदल देना चाहते थे। अपनी इसी सोच के साथ उन्होंने रिटायर आईपीएस किरण बेदी और आयकर विभाग में उच्च पद का अनुभव पा चुके अरविंद केजरीवाल को प्रमुख रूप से साथ लिया। और भी जवान उनके साथ थे। अलग-अलग पेशे और तासीर के लोग लेकिन सबकी मंशा थी एक स्वराज्य की। अन्ना ने अपनी उम्र की परवाह किए बिना अनशन पर बैठ गए। लम्बे समय गुजर जाने के बाद केन्द्र सरकार को सुध आई और गोलगप्पे वाले वायदे पर अन्ना का अनशन खत्म करा दिया। यह थोड़े दिनों का अनुभव रोमांचक रहा। जिन लोगों ने स्वाधीनता का संघर्ष नहीं देखा था, उनके लिए यह एक ट्रेलर था। आहिस्ता-आहिस्ता समय गुजरता गया। एक नई सुबह की आस लिए जो लोग आगे आए थे, सबके सपने अलग अलग होते गए। अन्ना की टीम बिखर गई। अन्ना किनारे कर दिए गए, तो किरण बेदी हाशिए पर चली गईं। अरविंद केजरीवाल ने जरूर मैदान थाम लिया, लेकिन उनका जनलोकपाल पीछे चला गया और वे लोकतांत्रिक रूप से जीत हासिल करने के लिए बाकायदा राजनीतिक पार्टी के रूप में दिखाई देने लगे।            
       अन्ना की टीम टूटने के साथ आम आदमी का भरोसा टूटने लगा। गांधीवादी विचारों के रूप में अन्ना उनके बीच आये थे लेकिन आंदोलन के टूट जाने से आम आदमी की आस को गहरा धक्का लगा। वे निराशा में डूब गए। आम आदमी का विश्वास टूट गया और कुशासन मुस्करा रहा था। उसे भरोसा था कि ये जो आग जली है, वह बहुत ताप देने वाली नहीं है। कुशासन का अनुभव ठीक था। हुआ भी यही। लोग वापस उसी रास्ते पर चलने लगे। उनका भरोसा टूट गया था। 
आम आदमी तो जैसे धोखा खाने के लिए ही जी रहा है। उसका भरोसा बार बार टूटता रहा है। वह छला जाता रहा है। इस बार छलिए के रूप में आसाराम का अवतरण हुआ। आध्यात्मिक संत के रूप में आसाराम पर आम आदमी की आस्था इतनी गहरी थी कि वह उसके पीछे का छिपा चेहरा देखना ही नहीं चाहता था। कदाचित उसे देखने ही नहीं दिया गया। अपने दु:ख से बेहाल आम आदमी को आसाराम अपने चुटीले अंदाज में राहत देता था। आम आदमी को आसाराम की बातों पर कितना भरोसा था, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन वह थोड़े देर के लिए अपनी पीड़ा भूल जाया करता था। आम आदमी जैसे कभी सत्ता से सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है, वैसा ही उसने कभी आसाराम के ऐश्वर्य के बारे में सवाल करने की हिमाकत नहीं कर सका। उसे भगवान का डर दिखाया जाता था। आम आदमी सरकार और ईश्वर दोनों से एक बराबर डरता है। इस डर मेें सच्चाई का तो कभी पता नहीं चला, लेकिन आसाराम संत से सरोकार की दुनिया में गहरे धंसते चले गए। धन और स्त्री उनके लिए महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। जिस तरह एक वानर ने रावण की लंका में आग लगाई थी, वैसा ही साहस एक बच्ची ने कर दिखाया। उसने आसाराम की संतई की जो कलई खोली, तो आसाराम के लिए एक के बाद एक कारागार के दरवाजे खुलते गए। यह ठीक है कानून इस धूर्त और ढोंगी को सजा देगा, लेकिन उस आम आदमी के भरोसे का क्या करोगे, जिसके बूते पर वह जीता रहा है। आम आदमी के भरोसा टूटने का यह दूसरा मामला था। आम आदमी करे तो क्या करे? 
         हिन्दुस्तान में आम आदमी का एक बड़ा हथियार होता है प्रेस और मीडिया। उसे पता है कि सरकार सुने ना सुने, अदालत सुने ना सुने, प्रेस और मीडिया ऐसी जगह है जहां उसकी सुनवाई फौरन हो जाती है। उसे यह भी भरोसा है कि प्रेस और मीडिया किसी के दबाव में नहीं आता है। और बात जब तहलका की हो, तरुण तेजपाल की हो तो मामला और चोखा हो जाता है। लेकिन यह क्या? जिस तरुण तेजपाल ने समाज में शुचिता लाने के लिए जाने क्या क्या जतन किए, आज वही अपना जतन नहीं कर पाया? अपनी जवानी पर काबू नहीं रख पाया? स्वयं का आत्मनियमन और संयम खो दिया। वह भी एक ऐसी लडक़ी के लिए जो उसकी बेटी के बराबर की थी। तरुण को क्या एक पल के लिए भी नहीं लगा कि उसके इस कुकर्मी चेहरे से उसका अपना तो नुकसान होगा ही, पूरे प्रेस और मीडिया भी अविश्वास के घेरे में आ जाएगी। हैरानी की बात यह है कि तेजपाल के चेहरे पर तब तक तेज बना रहा, जब तक कि वह पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ गया। हालांकि प्रेस और मीडिया पर समाज का इतना भरोसा है कि वह इसे तेजपाल का व्यक्तिगत मामला समझेगी, लेकिन जो हुआ, उसने आम आदमी का विश्वास तो तोड़ ही दिया है। 

अन्ना हजारे आंदोलन, आसाराम की करतूत और कुकर्मी तेजपाल से आम आदमी का विश्वास टूटा है लेकिन समाज जानता है कि इन लोगों के बेनकाब हो जाने से ही व्यवस्था चाक-चौबंद होती है। 2013 आम आदमी के भरोसे के टूटने के साल के रूप में जरूर याद किया जाएगा लेकिन यह टूटन आम आदमी को और भी मजबूत बनाएगी, ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए। यह वही भारत है, जिसने कभी आपातकाल भी देखा है। प्राकृतिक आपदाओं से तो आम आदमी का करीबी रिश्ता रहा है, लेकिन इन सबके बावजूद विकास के रास्ते पर आम आदमी के विश्वास के साथ धोखा नहीं हुआ। भारत ऋषि-मुनियों का देश है, जहां सत्य और अहिंसा का सबक सिखाया जाता रहा है। भगवान श्रीराम और महात्मा गांधी अमर हैं तो इसलिए कि उन्होंने सत्य बोला और सत्य को जिया, लेकिन यह भी सच है कि इसी धरती पर रावण और गोडसे भी पैदा हुए थे। इतिहास के पन्नों में आसाराम और तेजपाल का नाम कहीं खलनायक के रूप में दर्ज हो जाएगा, लेकिन सच के लिए लडऩे वाले अन्ना हजारे हमेशा हमेशा के लिए याद किए जाते रहेंगे।

       आज आम आदमी की नियति ही बन गई है, उसे बार-बार छला जाता है। इसके बाद भी वह अपने विश्वास पर कायम रहता है, केवल इस आस में की कभी न कभी तो वह सुबह जरुर आएगी, जब उसके सामने एक नया उजास होगा। इस उजास में वह स्वयं को अपनों के करीब रहकर खुश रहेगा। अपना बनकर रहेगा, अपनापे के साथ सांस लेगा। साल तो आते ही रहते हैं। हर वर्ष एक कैलेंडर की तरह आता है और ढेर सारी यादें देकर कूड़ेदान में चला जाता है। पर इतिहास पर नजर रखने वाले यह अच्छी तरह से जानते हैं कि कौन सा वर्ष किनके लिए सुखद रहा और किनके लिए दु:खद? दुआ करो कि जिस तरह से हमारे सामने से 2013 गुजरा, उस तरह से 2014 न गुजरे!