शनिवार, 16 जुलाई 2016

छत्तीसगढ़ में स्त्री सशक्तिकरण की नई इबारत


अनामिका
मनुष्य ने समय-समय पर अपने साहस का परिचय दिया है. आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, वह हमारे साहस का ही परिणाम है. आदिमानव के रूप में हम कभी इस बात का यकिन ही नहीं कर सकते थे कि आसमान में हवाई जहाज उड़ा करेंगे लेकिन आज मनुष्य अपने सांसों से अधिक तेज गति से विकास कर रहा है. इसी साहस और संकल्प को देखना है तो छत्तीसगढ़ आना होगा. आदिवासी बहुल इस राज्य में प्रकृति का अनुपम वरदान है. एक सम्पन्न राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ की पृथक से पहचान है. बावजूद इसके लगभग चार दशकों से बढ़ती नक्सली हिंसा से जनजीवन बेहद प्रभावित हुआ है. इस हिंसा से आमतौर पर लोगों का मनोबल टूट जाता है लेकिन छत्तीसगढ़ का आदिवासी समाज का आत्मबल इतना मजबूत है कि उन्होंने अपने साहस से नक्सलियों को आईना दिखा दिया है और लगातार सफलता की ओर आगे बढ़ रहे हैं. आदिवासी समाज का यह आत्मविश्वास सरकार के साहस को आगे बढ़ाता है और सरकार विभिन्न योजनाएं चलाकर इनका हौसलाअफजाई करती हैं.
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में राज्य शासन द्वारा महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए संचालित विभिन्न योजनाओं का लाभ उठाकर इस जिले के महिलाएं अपने स्व-सहायता समूहों के माध्यम से धरातल पर आत्म निर्भरता का एक नया इतिहास रच रही हैं। नक्सल हिंसा और आतंक की गंभीर चुनौती के बावजूद छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में महिला सशक्तिकरण की भावना लगातार शक्तिशाली होकर उभरती जा रही है। नक्सल हिंसा पीडि़त जिलों के लिए राज्य शासन द्वारा संचालित एकीकृत विकास योजना के माध्यम से बीजापुर जिले की महिलाओं को भी विभिन्न रोजगार मूलक कुटीर उद्योग और व्यवसाय का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। 
बीजापुर में सशक्तिकरण की यह मशाल लगभग 6 साल पहले जलाई गई थी। कभी अगरबत्ती की काड़ी बनाने वाली महिलाएं आज सरकार के सहयोग से कामयाबी की जोत जला रही हैं। जिले के महिला समूहों को अगरबत्ती काड़ी, आइसक्रीम काड़ी, ईंट निर्माण और स्कूली बच्चों सहित पुलिस तथा होमगार्ड जवानों के लिए वर्दी बनाने का काम भी मिला है। जिले के लगभग पचास महिला स्व-सहायता समूहों की सैकड़ों महिलाओं ने अगरबत्ती की काड़ी बनाने का काम सीख लिया है, वही इनमें से चालीस समूहों की महिलाओं के द्वारा डेढ़ वर्ष में लगभग एक सौ क्विंटल (दस टन) अगरबत्ती काड़ी बनाकर वन विभाग के सहयोग से  पास के राज्यों को भेजा जा रहा है। गायत्री महिला स्व-सहायता समूह बीजापुर की सचिव श्रीमती जयमनी के अनुसार इससे इन समूहों को करीब चार लाख रुपए की आमदनी हुई है। इन महिला समूहों ने दस क्विंटल आइस्क्रीम काड़ी बनाकर भी 3378-2-291011लगभग चालीस हजार रूपए का आमदनी हासिल की है। ये महिलाएं घर-गृहस्थी और खेती-बाड़ी के काम के बाद अपने खाली समय का उपयोग घर पर अगरबत्ती काड़ी और आइस्क्रीम काड़ी बनाने के लिए कर रही हैं। 
इसी जिले के सभी चार विकासखंडों में 35 महिला स्व-सहायता समूहों की साढ़े तीन सौ महिलाएं भवन निर्माण के लिए जरूरी ईट उद्योग का संचालन कर रही हैं। इन समूहों के भ_ों में तैयार ईटों की इस्तेमाल जिला प्रशासन और जिला पंचायत द्वारा विभिन्न सरकारी भवनों, स्कूल और आश्रम शाला भवनों तथा आंगनबाड़ी भवनों सहित इंदिरा आवास योजना के मकानों के लिए भी किया जा रहा है। ग्राम नैमेड़ स्थित मां दंतेश्वरी महिला स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष श्रीमती जयमति ने बताया कि उनके समूह ने तो पिछले आठ महीने में इलाके में स्कूल भवन और आश्रम शाला भवन सहित शिक्षक आवास गृह निर्माण के लिए लगभग डेढ़ लाख ईटों की बिक्री कर करीब दो लाख रूपए की कमाई की है। उनका समूह गांव में ही इंदिरा आवास योजना के हितग्राहियों के मकान बनाने के लिए रियायती दर पर एक लाख ईटों का निर्माण कर रहा है।
इसी तारतम्य में जिले के महिलाएं अपने महिला स्व-सहायता समूहों में संगठित होकर सिलाई-बुनाई का काम भी सीख रही हैं। जिले में इनके लिए छह सिलाई प्रशिक्षण केन्द्र संचालित किए जा रहे हैं, इनमें चालीस महिला समूहों की चार सौ महिलाएं सिलाई-कढ़ाई का काम सीख कर स्कूली बच्चो के लिए वर्दी (गणवेश) सिलाई का काम भी कर रही हैं, इनमें से श्रीराम महिला स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष श्रीमती महादेई के अनुसार उनके समूह ने विगत दस महीने में स्कूली बच्चों की वर्दी सिलकर पांच लाख रूपए की कमाई का एक नया कीर्तिमान बनाया है। अब इस महिला समूह को जिला प्रशासन द्वारा स्वास्थ्य विभाग के पैरामेडिकल कर्मचारियों सहित पुलिस और होमगार्ड के जवानों के लिए भी वर्दी सिलने का काम सौंपा गया है। इससे उन्हें साल भर रोजगार मिलता रहेगा।  गंभीर नक्सली हिंसा से जूझते अंचलों में महिलाओं का यह उद्यम इस बात का संदेश देता है कि- कोई भी लक्ष्य मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं/ हारा वही, जो लड़ा नहीं। महिलाओं की यह कामयाबी से मुख्यमंत्री रमनसिंह का प्रसन्न होना स्वाभाविक है। उनका ही क्यों, महिलाओं के इस उद्यम ने छत्तीसगढ़ में स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में उजियारा फैलाया है जो आगे निकलकर पूरे समाज की महिलाओं को हौसला देती हैं।

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

पत्रकारिता और मीडिया एजुकेशन


मनोज कुमार
आपातकाल के पश्चात पत्रकारिता की सूरत और सीरत दोनों  में आमूलचूल बदलाव आया है और इस बदलाव के साथ ही यह कि पत्रकारिता मिशन है अथवा प्रोफेशन का सवाल यक्ष प्रश्र की तरह एक सवाल उठ खड़ा हुआ है. इस सवाल का भले ही कोई मुकम्मल जवाब किसी भी पक्ष से न आया हो लेकिन आहिस्ता आहिस्ता पत्रकारिता को मिशन से बदल कर प्रोफेशन कर दिया गया है और देखते ही देखते मीडिया एजुकेशन का ऐसा संजाल फैलाया गया जो केवल डिग्रियां देने का काम कर रही हैं. इस मीडिया एजुकेशन में पत्रकारिता का लोप हो गया है और पत्रकारिता हाशिये पर जाकर खड़ी हो गई है और मीडिया का वर्चस्व हो गया है.  हर वर्ष ज्यादा नहीं तो हजारों की संख्या में पूरे भारत वर्ष से मीडिया एजुकेशन प्राप्त कर विद्यार्थी पत्रकारिता करने आते हैं लेकिन उनके पास व्यवहारिक ज्ञान शून्य होता है और फिर वे बेरोजगारी के शिकार होकर कुंठित हो जाते हैं. इस स्थिति में एक तरफ युवा पत्रकारों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है तो दूसरी तरफ अनस्किल्ड पत्रकार शॉर्टकट के जरिए अपना फ्यूचर बनाने की कोशिश करते हैं जो पत्रकारिता को दूषित करती है.
मीडिया एजुकेशन के स्थान पर पत्रकारिता शिक्षा को प्राथमिकता दी जाती तो आज जो डिग्री बांटने के संस्थान बन गए हैं, वह तो नहीं बनते. इन संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को पत्रकारिता का कोई व्यवहारिक ज्ञान नहीं है. बहुत ज्यादा तो नहीं, तीन दशकों से लगातार एक ही परिभाषा पढ़ा रहे हैं. खबरें कैसे निकाली जाती है, स्रोत कैसे बनाये जाते हैं, फीचर और लेख में क्या फर्क है, सम्पादकीय लेखन का क्या महत्व है, जैसी बातें ज्यादतर मीडिया शिक्षकों को ज्ञात नहीं है. इसमें उनका भी दोष नहीं है क्योंकि वे भी इसी संस्थान से शिक्षित हैं और उन्हें इस बात का भान था कि वे पत्रकार नहीं बन सकते, सो शिक्षण में स्वयं को ढाल लिया. सवाल यह है कि मीडिया एजुकेशन के संस्थानों ने इन शिक्षकों को व्यवहारिक प्रशिक्षण देने की दिशा में कोई प्रयास क्यों नहीं किया? क्यों इन संस्थानों को महज डिग्री बांटने वाली संस्थाओं के रूप में आकार-प्रकार देकर खड़ा कर दिया? किताबी मीडिया एजुकेशन से पत्रकारिता का नुकसान हो रहा है, इसमें दो राय नहीं है लेकिन खराब होती चीजों को भी सुधारा जा सकता है लेकिन इसके लिए संकल्प-शक्ति की जरूरत होगी. प्रकाशन-प्रसारण संस्थान और मीडिया एजुकेशन संस्थानों के मध्य एक करार किया जाए जो इस बात के लिए प्रतिबद्ध हों कि वर्ष में एक बार तीन माह का व्यवहारिक प्रशिक्षण मीडिया एजुकेशन से संबद्ध शिक्षकों को दिया जाए और जमीनीतौर पर काम कर रहे पत्रकारों को इसी तरह तीन महीने का मीडिया अध्यापन का प्रशिक्षण अनिवार्य हो. इनमें से भी योग्यता के आधार पर सक्रिय पत्रकारों की सेवाएं मीडिया शिक्षक के तौर पर ली जाएं ताकि पत्रकारिता में आने वाले विद्यार्थियों का भविष्य सुनिश्वित हो सके. 
मीडिया शिक्षा वर्तमान समय की अनिवार्य जरूरत है लेकिन हम पत्रकारिता की टेक्रालॉजी सिखाने के बजाय टेक्रालॉजी की पत्रकारिता सीखा रहे हैं. पंडित माखनलाल चतुर्वेदी कहते हैं कि-‘पत्र संचालन की कला यूर्निवसिटी की पत्थर की तस्वीरों के बूते जीवित नहीं रह सकती, उसके लिए ह्दय की लगन ही आवश्यक है। इस कला का जीवन की सह्दयता, धीरज, लगन, बैचेनी और स्वाभिमान का स्वभाव-सिद्ध होना। शिक्षा और श्रम द्वारा विद्वता और बहुुश्रुतता को जीता जा सकता है, ऊपर लिखे स्वभाव-सिद्ध गुणों को नहीं।’ माखलाल चतुर्वेदी जी की इस बात को मीडिया एजुकेशन की संस्थाएं तथा प्रकाशन-प्रसारण संस्थाएं समझ सकें तो पत्रकारिता शिक्षा को लेकर कोई संशय नहीं रह जाएगा और नहीं समझ सकें तो कथाकार अशोक गुजराती की लिखी लाइनें मीडिया का सच बनकर साथ चलती रहेंगी-
राजा ने कहा रात है/ मंत्री ने कहा रात है/ 
सबने कहा रात है/ ये सुबह-सुबह की बात है. 

सोमवार, 20 जून 2016

भारत का योग और गौरव का दिन 21 जून


मनोज कुमार
‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा...’ की पंक्तियां हर अवसर पर अपने आपको व्यक्त करती रही हंै और बीते साल 2014 में एक बार फिर पूरे संसार ने स्वीकार किया किया कि भारत विश्व विजयी है. दुनिया के कैलेंडर में 21 जून की तारीख हमेशा हमेशा के लिए अविस्मरणीय तारीख के रूप में अंकित हो चुका है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर यह वह तारीख है जिस दिन भारत की प्राचीन योग परम्परा को संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्वीकार किया और 21 जून की तारीख को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता दी. 21 जून पूरे कैलेंडर वर्ष का सबसे लम्बा दिन है। प्रकृति, सूर्य और उसका तेज इस दिन सबसे अधिक प्रभावी रहता है। इस दिन को किसी व्यक्ति विशेष को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि प्रकृति को ध्यान में रखकर चुना गया है। योग 5,000 साल पुरानी भारतीय शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक पद्धति है, जिसका लक्ष्य मानव शरीर और मस्तिष्क में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण से की थी जिसमें उन्होंने कहा था- ‘योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक हैं; मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है; विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन शैली में यह चेतना बनाकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता हैं। तो आयें एक अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को गोद लेने की दिशा में काम करते हैं।’
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल के पश्चात  21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किया गया। भारत के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है। 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों द्वारा 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। बेंगलुरू में 2011 में पहली बार दुनिया के अग्रणी योग गुरुओं ने मिलकर इस दिन ‘विश्व योग दिवस’ मनाने पर सहमति जताई थी। संयुक्त राष्ट्र में भारत के लिए पिछले सात सालों के दौरान यह इस तरह का दूसरा सम्मान है। इससे पहले यूपीए सरकार की पहल पर वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र ने महात्मा गाँधी के जन्मदिन यानि 2 अक्टूबर को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के तौर पर घोषित किया था।
योग परम्परा और शास्त्रों का विस्तृत इतिहास रहा है। जिस तरह राम के निशान इस भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह बिखरे पड़े है उसी तरह योगियों और तपस्वियों के निशान जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं में आज भी देखे जा सकते है। माना जाता है कि योग का जन्म भारत में ही हुआ। गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ (कर्मो में कुशलता को योग कहते हैं)। स्पष्ट है कि यह वाक्य योग की परिभाषा नहीं है। कुछ विद्वानों का यह मत है कि जीवात्मा और परमात्मा के मिल जाने को योग कहते हैं। बौद्धमतावलंबी भी योग शब्द का व्यवहार करते और योग का समर्थन करते हैं। यही बात सांख्यवादियों के लिए भी कही जा सकती है जो ईश्वर की सत्ता को असिद्ध मानते हैं। पंतजलि ने योगदर्शन में, जो परिभाषा दी है ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:’, चित्त की वृत्तियों के निरोध- पूर्णतया रुक जाने का नाम योग है। इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैं चित्तवृत्तियों के निरोध की अवस्था का नाम योग है या इस अवस्था को लाने के उपाय को योग कहते हैं। संक्षेप में आशय यह है कि योग के शास्त्रीय स्वरूप, उसके दार्शनिक आधार, को सम्यक् रूप से समझना बहुत सरल नहीं है। संसार को मिथ्या माननेवाला अद्वैतवादी भी निदिध्याह्न के नाम से उसका समर्थन करता है। अनीश्वरवादी सांख्य विद्वान भी उसका अनुमोदन करता है।
 हम यह बात समझ सकते हैं कि योग एक प्राचीन परम्परा है और भारत में जीवनशैली। इस बात को भी समझना होगा कि योग को हम जीवन में पुन: शामिल कर लेते हैं तो नैतिक मूल्यों में वृद्धि होगी। इस बात को मध्यप्रदेश सरकार ने एक बड़ी दृष्टि के साथ समझा और राज्य के समस्त पाठशालाओं के विद्यार्थियों के लिए नियमित रूप से योग की कक्षाएं लगाने की सहमति प्रदान की है। इसके पीछे सीधा सा तर्क यह है कि बच्चों को योग सिखाने से अनेक पीढिय़ों में योग विद्या चली जाएगी और उसके बाद की पीढिय़ां स्वयमेव इस योग विद्या को आगे बढ़ाती रहेंगी और योग विद्या के संरक्षण एवं संवर्धन में बेहतर प्रयास करेंगी। यह हमारे लिए गौरव की बात है कि भारत के प्रयासों से योग विद्या को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली है और यह बात एक बार फिर स्थापित हो गया है कि हमसा कोई और नहीं।

रविवार, 19 जून 2016

पापा मैं छोटी ही रहना चाहती हुँ

मेरे ब्लॉग पर यह पुराना लेख है. लगा की आज आप सब से शेयर करना चाहिए सो दुबारा।
-मनोज कुमार 

अखबार पढ़ते हुये अचानक नजर पड़ी कि कुछ दिनों बाद फादर्स डे है। मन में जिज्ञासा आयी और लगा कि अपनी बिटिया से पूछूं कि वो इस फादर्स डे पर क्या करने वाली है। मैंने सहज भाव से पूछ ही लिया कि बेटा, थोड़े दिनों बाद फादर्स डे आने वाला है। तुम अपने फादर अर्थात मेरे लिये क्या करने वाली हो? वह मेरा सवाल सुनकर मुस्करायी और मेरे सामान्य ज्ञान को बढ़ाते हुये कहा कि हां, पापा मुझे पता है कि फादर्स डे आने वाला है। अच्छा आप बताओ कि आप मेरे लिये क्या करने वाले हो? मैंने कहा कि दिन तो मेरा है, फिर मैं क्यों कुछ करने लगा। तु हें मेरे लिये करना चाहिये? इसके बाद हम बाप-बेटी के बीच जो संवाद हुआ, वह एक दार्शनिक संवाद  जरूर था लेकिन डे मनाने वालों के लिये सीख भी है। बेटी ने कहा कि पहली बात तो यह कि मैं अभी आपकी इनकम पर अपना भविष्य बना रही हूं और जो कुछ भी करूंगी आपके जेब से निकाल कर ही करूंगी। ऐसे में आपके लिये कुछ करने का मतलब आपको खुश करने के बजाय दुखी करना होगा क्योंकि जितने पैसों से मैं आपके लिये उपहार खरीदूंगी, उतने में आप हमारी कुछ जरूरतें पूरी कर सकेंगे। तो इसका मतलब यह है कि जब तुम कमाने लगोगी तो फादर्स डे सेलिब्रेट करोगी। अपने पापा के लिये उपहार खरीदोगी? इस बार भी बिटिया का जवाब अलग ही था। नहीं पापा, मैं चाहे जितनी बड़ी हो जाऊं, जितना कमाने लगूं लेकिन कभी इतनी बड़ी न हो पाऊं कि अपने पापा को उपहार देने की मेरी हैसियत बने। जिस पापा ने अपनी नींद खोकर मेरी परिवरिश की, जिस पापा ने अपनी जरूरतों को कम कर मेरी जरूरतों को पूरा करने में पूरा समय और श्रम लगा दिया, जिस पापा ने मेरे सपनों को अपना सपना मानकर मुझे बड़ा किया, उस पापा को भला मैं क्या दे सकती हूं। और पापा ही क्यों, मम्मी, दादाजी, दादीजी सब तो मिलकर मुझे बनाने की कोशिश कर, फिर भला मैं कैसे आप लोगों के लियेे उपहार खरीदने की हिम त कर सकती हूं। 
बिटिया की बातों को सुनकर मेरी आंखें भर आयी। मुझे लगा कि मैंने जो कुछ किया, वह निरर्थक नहीं गया। बेटी के भीतर वह सबकुछ मैंने समाहित कर दिया, जो मुझे मेरे पिता से मिला था। मुझे लगा कि फादर्स डे पर इससे अच्छा कोई उपहार हो भी नहीं सकता है। जब मां-बाप अपने बच्चों से हारते  हैं तो सही मायने में विजेता होते हैं। हारते हुयेे माता-पिता को सही मायने में खुशी मिलती है क्योंकि बच्चों की जीत ही माता-पिता की असली जीत है। हमारे समाज में ये जो डे मनाने का रिवाज चल पड़ा है और यह रिवाज भारतीय नहीं बल्कि यूरोपियन देशों की देन है। भौतिक जरूरतों की चीजों में उनके रिश्ते बंधे होते हैं और वे हर रिश्तों को वस्तु से तौलते हैं लेकिन भारतीय मन भावनाओं की डोर से बंधा होता है। वस्तु हमारे लिये द्वितीयक है, प्रथम भावना होती है और आज मेरी बेटी ने जता दिया कि वह जमाने के साथ भाग रही है्र दौड़ रही है लेकिन अपनी संस्कृति और संस्कार को सहेजे हुये। अपनी भावनाओं के साथ, अपने परिजनों की भावनओं की कद्र करते हुये। वह बाजार जाकर कुछ सौ रुपयों के तोहफों से भावनाओं का व्यापार नहीं कर रही है। यह मेरे जैसे पिछड़ी सोच के बाप के लिये अनमोल उपहार है। 

भारतीय समाज में भी डे मनाने की पुरातन परमपरा है। हम लोग यूरोपियन की तरह जीवित लोगों के लिये डे का आयोजन नहीं करते हैं बल्कि उनके हमारे साथ नहीं रहने पर करते हैं। उनकी मृत्यु की तिथि पर उनके पसंद का भोजन गरीबों को खिलाया जाता है, वस्त्र इत्यादि गरीबों में वितरित किया जाकर उनकी आत्मा की प्रसन्नता के लिये करते हैं, इसे हम पितृपक्ष कहते हैं। जीते जी हम उन्हें भरपूर स मान देते हैं और मरणोपरांत भी उनका स्थान हमारे घर-परिवार के बीच में होता है। दुर्भाग्य से हम यूरोपियन संस्कृति के साथ चल पड़ हैं। सक्षम पिता या माता का डे तो मनाते हैं लेकिन वृद्ध होते माता-पिता को वृद्वाश्रम पहुंचाने में देर नहीं करते हैं। बाजार जिस तरह अनुपयोगी चीजों का सेल लगाता है या चलन से बाहर कर देता है, वही हालत यूरोपियन समाज में रिश्तों का है, भावनाओं का है। हम भी इसी रास्ते पर चल पड़े हैं। पालकों के पास धन है, साधन है, सक्षम हैं तो दिवस है और नहीं तो उनके लिये दिल तो क्या घर पर स्थान नहीं है। मेरी गुजारिश है उन बच्चों माता-पिता को बाजार की वस्तु बनाने के बजाय उन्हें अपना स्नेह दें। उनकी भावनाओं का खयाल रखें और एक दिन फादर्स डे, मदर्स डे के बजाय पूरे साल का हर दिन उनके लिये समर्पित करें। यही हमारी परम परा और संस्कृति है और यही भारतीय समाज की धरोहर भी। 

गुरुवार, 16 जून 2016

एक कलम स्वच्छता के लिए













स्वच्छ  भारत अभियान को लेकर जनमानस में अभी भी असमंजस है. बहुतेरे लोगो, खासकर मीडिया के स्टूडेंट को यही पता नहीं है कि मोदी जी ने स्वच्छ  भारत अभियान की मियाद कौन सी तय की है. स्वच्छ  भारत अभियान का अर्थ केवल खुले में शौच से ही लगाया जा रहा है. इनके साथ ही स्वच्छ  भारत अभियान से जुड़े विभिन्न आयाम पर शोध पत्रिका "समागम" का यह अंक केंद्रित किया गया है. यह अंक आप वेबसाइट www.sabrangweb.com पर भी देख सकते हैं. 

मंगलवार, 7 जून 2016

हबीब तनवीर का लोक संसार


-अनामिका 
नाचा छत्तीसगढ़ की पारम्परिक प्रतिष्ठापूर्ण लोकविधा है। नाचा का संसार न केवल विविधताओं से परिपूर्ण है बल्कि इसमें सामाजिक जागरूकता का भाव भी है। छत्तीसगढ़ की लोक विधा नाचा को इस सदी के महान रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचाना और नाचा को विश्व रंगमंच पर प्रतिष्ठित किया। नाचा के साथ ही छत्तीसगढ़ की लोककलाओं को विका रंगमंच पर प्रतिष्ठित करने वाले इस सदी के महान रंगकर्मी हबीब तनवीर रायपुर से हैं। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ की लोककलाओं को विका रंगमंच में प्रतिष्ठित करने के लिये स्थानीय कलाकारों को अपनी टीम का हिस्सा बनाया। वे दुनिया की नब्ज जानते थे। रंगकर्म से उनका पुराना रिश्ता था। हबीब तनवीर और उनका नया थियेटर एक दूसरे के पूरक बन गये थे। उनका हर प्रदर्शन कालजयी बना। हबीब तनवीर केवल नाट्य संस्था संस्थापक नहीं थे, वे एक ऐसे व्यक्ति थे जो अनेक कला विधाओं के विशेषज्ञ और सृजनकर्ता भी थे। हबीब तनवीर व्यक्ति न रहकर एक अनन्य संस्था बन गए थे। नाट्य आलेख लेखक, कवि, संगीतकार, अभिनेता, गायक, निर्देशक और संचालक, और क्या नहीं, सभी कुछ, हबीब तनवीर थे। इस तरह छत्तीसगढ़ और हबीब तनवीर का रंगकर्म एक दूसरे के पर्याय बन गये, पहचान बन गये।  
हबीब तनवीर शुरू से अपनी जमीन से जुड़े हुए थे और इस जमीन में ही उन्होंने अपने जीवन के लक्ष्य-रंगमंच-के लिए नई भारतीय पहचान की खोज शुरू की। उन्होंने बंबई में च्आवामी थियेटरज् से नाटक के क्षेत्र में पहले कदम रखे। फिर वे दिल्ली चले गए। दिल्ली में उन्होंने हिन्दुस्तानी थियेटर की स्थापना की। इंग्लैण्ड में उन्होंने रंगमंच का प्रशिक्षण भी लिया। इस तरह रंगमंच के पश्चिमी मानदंडों का अनुभव प्राप्त कर छत्तीसगढ़ लौैटे और यहां उन्होंने राजनांदगांव में नाचा का स्वस्फूर्ति और सहज परंपरागत रूप में प्रस्तुत किए जा रहे हैं। नाचा का प्रदर्शन देखा। इस प्रदर्शन को देखने के बाद उन्होंने अपनी जमीन और अपनी हवा को संजोए रखते हुए नए सिरे से अपने रंगकर्म को आगे बढ़ाया। उन्होंने लोकरंग शैली के ओज और आनंद के तत्वों को इस तरह प्रस्तुत किया जिससे बारतीय रंगमंच की नई पहचान बननी शुरू हो गई। उन्होंने एक बार फिर च्नया थियेटरज् नाम से रंग संस्था शुरू की जा उन्होंने व्यक्तित्व का पर्याय बन गई।
नाचा के इतिहासकर जानते हैं कि नाचा मूलत:  रायपुर दुर्ग औऱ राजनांदगांव जिलों में ग्रामीण कलाकारों द्वारा आत्मरंजन के लिए प्रस्तुत किया जाता था। इसमें ग्राम विशेष में प्रचलित नृत्य, संगीत, हास्य और व्यंग्य के माध्यम से छोटी-छोटी कहानियां या घटनाएं प्रस्तुत की जाती थीव। कहावतों, मुहावरों, रीति-रिवाजों, धार्मिक और अन्य गीत इसमें शामिल  रहते और उनका अभिनय भी किया जाता। ये सारी बातें क्षेत्र के बाहर क्षेत्र विशेष की घटनाओं की प्रस्तुति दर्शक के समझ के बाहर होती। इस प्रस्तुति में कोई निर्धारित पटकथा या अपने आप में पूर्ण एक कहानी नहीं होती थी। उसमें उपर्युक्त सभी तत्व अनगढ़ मिश्रण के रूप में होते जिससे उसका हर अंश या हर अंक स्वतंत्र रचना होती। उसमें सामान्य नाटकों की भांति न आदि होता, और न अंत। इसलिए नाटक की प्रस्तुति में कोई क्लाइमेक्स या चरमबिन्दु नहीं होता। 
1973 में हबीब तनवीर ने नाचा पर कार्यशाला आयोजित की। इस समय तक नाचा में फिल्मी नाच और गानों का प्रवेश हो गया था। जिससे नाचा की मूल कला प्रदूषित हो रही थी। तनवीर ने यह प्रयास किया कि नाचा के मूल रूप को पुन: आविष्कृत किया जाए और इसे इस तरह प्रस्तुत किया जाय कि असंबद्ध क्षेत्र के दर्शक भी समझ सकें कि यह क्या कला है और इसमें क्या हो रहा है। दर्शन कला की शक्तिमत्ता और सृजनात्मकता को ग्रहण कर सकें, उससे आनंद प्राप्त कर सकें और उस आनंद को अपने जीवन अनुभव से जोड़ सकें। हबीब तनवीर ने नाचा कलाकारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को बरकरार रखने के लिए अपने निर्देशन को न्यूनतम कर दिया। उन्होंने कलाकारों को सृजनात्मक कार्य का अभ्यास कराया और विषय वस्तु से लेकर शैली के विकास तथा रंगमंच पर प्रस्तुत करने की सामूहिकता को प्रोत्साहित किया। नाचा का अभ्यास करते-करते उपजी पटकथा की वजह से नाचा किसी ग्राम विशेष की सीमित प्रस्तुति से उठकर विका रंगमंच का अभिमान्य प्रदर्शन बन गया। यहां यह गौर करने की बात है कि पटकथा तो वह खाखा था जिसके भीतर नाचा के कलाकार अपनी उन्मुक्त और अलौकिक कलात्मकता को लौकिक धरातल पर प्रस्तुत करते थे। तनवीर ने ग्रामीण और शहरी संस्कारों, लौकिक और अलौकिक चेतना तथा पूर्वी और पश्चिमी दृष्टियों को इस तरह मिला-जुला दिय कि उनका प्रदर्शन आधुनिक संस्कृति का प्रतिनिधि रंगमंच बन गया।
हबीब तनवीर के रंगकर्म को अनेक कोणों को देखा जा सकता है लेकिन जिस एक विशेषता के कारण वे अनन्य हैं वह है कि उन्होंने भारतीय रंगकर्म को विका रंगमंच पर स्थापित किया। इस उपलब्धि के लिए उन्होंने पूर्व और पश्चिम के रंगकर्म का विवेकपूर्ण समन्वय किया था। इस समन्वय से न केवल भारतीय रंगकर्म की आधुनिकता सामने आई वरन् पूरे  में रंगकर्म का अधुनातन रूप उभर कर आया। इस प्रक्रिया में स्वयं हबीब तनवीर विश्व के अग्रणी रंगकर्मी के रूप में अभिस्वीकृत हुए। हबीबजी ने नाट्य के ज्ञान और अनुशासन को ध्यान में रखकर, भारतीय लोक रंग शैली के आनंद और ओज, सहजता और उन्मुक्तता  को एक साथ समेटकर और पश्चिम के विधान को लक्ष्य करते हुए रंगकर्म की एक अलग पहचान बनाई। और इस पहचान में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सोपान था, नाचा से उनका तादात्म्य। लोक रंग को छत्तीसगढ़ के सुदूर ग्राम्य अंचल से उठाकर विश्व  रंगमंच पर प्रतिष्ठित कर दिया।