मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

21 अप्रेल अक्षय तृतीया पर विशेष


रूढिय़ों से मुक्त करेंगी हमारी बेटियां 
-मनोज कुमार
भारतीय उत्सव एवं तीज-त्योहारों में एक प्रमुख और शुभ दिन यूं तो अक्षय तृतीया को माना गया है किन्तु यह दिन भारतीय समाज के लिये कलंक का दिन भी होता है जब सैकड़ों की संख्या में दुधमुंहे बच्चों को शादी के बंधन में बांध दिया जाता है. समय परिवर्तन के साथ सोच में बदलाव की अपेक्षा किया जाना सहज और सरल है लेकिन व्यवहार रूप में यह कठिन भी. बाल विवाह नियंत्रण के लिये कानून है लेकिन कानून से समाज में कोई खौफ उत्पन्न हुआ हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता है. बीते एक दशक में समाज की सोच में परिवर्तन दिखने लगा है तो यह बदलाव राज्य सरकारों द्वारा महिलाओं के हित में क्रियान्वित की जा रही वह विविध योजनायें हैं. यह योजनायें महिलाओं में शिक्षा से लेकर रोजगार तक के अवसर दे रही हैं. इसके पहले समाज के समक्ष बेटियों के लिये ऐसा कोई ठोस विकल्प नहीं था, सो बाल विवाह कर जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना ही एक रास्ता था लेकिन अब पूरे देश में बेटियों के लिये आसमान खुला है. वे जहां तक चाहें, उड़ सकती हैं, खिलखिला सकती हैं. शादी की बेडिय़ां टूटने लगी हैं. 
भारतीय समाज में बाल विवाह एक पुरातन रूढि़वादी परम्परा रही है. दुर्भाग्यजनक बात तो यह है कि बदलते समय के साथ हम अपनी मानसिकता नहीं बदल पा रहे थे. दुनियादारी से अबूझ बच्चों को शादी के बंधन में बांध कर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते थे. यह दृष्टि खासतौर पर बेटियों के लिये थी क्योंकि सयानी बेटी के लिये दहेज एक भीषण संकट होता था. महिला शिक्षा का प्रतिशत तो शर्मनाक था. कहने के लिये हम आजाद भारत के नागरिक हैं किन्तु स्त्रियों के साथ जो कुछ होता था, वह शर्मनाक है. हमारा यह भी आशय नहीं है कि सारी दुनिया बदल गयी है लेकिन बदलाव की आहट से रूढि़वादी परम्परा के खिलाफ एक उम्मीद की किरण जागी है. बहुत समय नहीं हुुआ है. कोई एक और अधिकतम डेढ़ दशक का समय है जब समाज की सोच बदलने के लिये सरकारों ने लोकतांत्रिक ढंग से एक बेहतर शुरूआत की है. महिला सशक्तिकरण की बातें करते युग गुजर गया लेकिन महिला सशक्तिकरण की कोई मुकम्मल तस्वीर नहीं बन पायी थी. आज स्थिति एकदम उलट है.
राज्य सरकारों ने सुनियोजित ढंग से बेटियों की सुरक्षा, विकास और आत्मविश्वास के लिये योजनाओं का श्रीगणेश किया. बेटियों को आगे बढऩे के लिये शिक्षा पहली शर्त थी और इसके लिये सारे उपाय किये गये. स्कूल तो पहले ही थे लेकिन फीस, कॉपी-किताब और गणवेश के लिये मां-बाप के पास धन नहीं था. घर से स्कूल की दूरी इतनी होती थी कि पालक बेटियों को पढ़ाना नहीं चाहते थे. सरकारों ने समस्या को देखा और इन समस्याओं को चुटकियों में हल कर दिया. शिक्षा नि:शुल्क हो गई. कॉपी-किताब और गणवेश सरकार के खाते से मिलने लगी और स्कूल आने-जाने के लिये सायकल भी मुहय्या करा दी गई. स्कूल के बाद कॉलेज की शिक्षा का प्रबंध भी सरकार ने कर दिया. शिक्षा ने बेटियों के मन में आत्मविश्वास उत्पन्न किया और वे देखते ही देखते सशक्त होती चली गयीं. पाठशाला से परदेस तक शिक्षा हासिल करने का रास्ता सरकार ने बेटियों के लिये सुगम कर दिया है. सरकार ने शिक्षित बेटियों के साथ साथ उन महिलाओं के लिये नये नये रोजगार के अवसर उत्पन्न किये जिसके चलते वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गयीं. गांव-गांव में फैली स्व-सहायता समूह से जुड़ी महिलायें न केवल आय अर्जित कर रही हैं बल्कि समाज के विकास में वे अपनी समझ का लोहा भी मनवा रही हैं. पंचायतों में उनकी सक्रिय भागीदारी से विकास का नया ककहरा लिखा जा रहा है. 
शासन की विभिन्न लोककल्याणकारी योजनाओं के निरंतर क्रियाशील रहने से अनेक रूढि़वदी परम्पराओं पर नियंत्रण पाने में आसानी होने लगी है. रूढि़वादी परम्पराओं में से एक बाल विवाह विकासशील समाज के लिये चुनौती था. इससे निपटने के लिये सरकार ने जहां बेटियों को स्वयं के स्तर पर सक्षम हो जाने के अवसर दिये, वहीं उन्होंने पालकों को शासन की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से आश्वतस्त किया कि बेटियों के ब्याह की चिंता ना करें. शासन का यह आश्वासन कागजी नहीं था. बेटियों के जन्म लेने से लेकर शिक्षा और उनके ब्याह की जिम्मेदारी सरकार ने स्वयं ले ली थी. बेटियों को जन्म के साथ ही आर्थिक सुरक्षा प्रदान की गई जो 18 बरस की होते होते लखपति बन जाती हैं. बेटियों की शादी के लिये आर्थिक मदद के साथ ही गृहस्थी के सामान का बंदोबस्त कर दिया जिससे पालक बेफ्रिक हो गये. 
शासन की इन योजनाओं ने समाज का मन बदला है. डेढ़ दशक पहले के बाल विवाह के आंकड़ों को देखें और आज तो यह बात साफ हो जाती है कि लोगों का मानस बदल रहा है. यह कहना भी बेमानी होगी कि शासन की योजना के कारण समूचे समाज का मानस बदल चुका है लेकिन बदलाव के लिये कदम बढ़ चुके हैं. यह बदलाव नहीं है बल्कि बदलाव की बयार है जो आने वाले समय में पूरा परिदृश्य बदल कर रख देगी. यह बदलाव लाने का उपक्रम शासन की योजनाओं से हुआ हो लेकिन बदलाव का सबब बनेंगी आज शिक्षा हासिल करती बेटियां. आज सशक्त होती बेटियां, आज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती बेटियां. आज की बेटियां, कल का भविष्य हैं और यही एक नये भारत का निर्माण करेंगी जहां बाल विवाह, दहेज और छुआछूत जैसे सामाजिक कोढ़ से मुक्त होगा हमारा समाज.

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

संघर्ष की प्रतिमूर्ति बाबा साहेब आम्बेडकर


-अनामिका
    डॉ. भीमराव आम्बेडकर की प्रतिष्ठा भारतीय समाज में देश के कानून निर्माता के रूप में है. भारत रत्न से अलंकृत डॉ. भीमराव अम्बेडकर का अथक योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता. वे हम सब के लिये प्रेरणास्रोत के रूप में युगों-युग तक उपस्थित रहेंगे. उनके विचार, उनकी जीवनशैली और उनके काम करने का तरीका हमेशा हमें उत्साहित करता रहेगा. बाबा साहेब धनी नहीं थे और न ही किसी उच्चकुलीन वर्ग में जन्म लिया था. वे अपने जन्म के साथ ही चुनौतियों को साथ लेकर इस दुनिया में आये थे लेकिन इस कुछ कर गुरजने की जीजिविषा ने उन्हें दुनिया में वह मुकाम दिया कि भारत वर्ष का उनका आजन्म ऋणी हो गया.  बाबा साहेब आज भले ही हमारे बीच में उपस्थित नहीं हैं लेकिन उन्होंने एक सफल जीवन जीने का जो मंत्र दिया, एक रास्ता बनाया, उस पर चलकर हम एक नये भारत के लिये रास्ता बना सकते हैं. यह रास्ता ऐसा होगा जहां न तो कोई जात-पात होगा और न ही अमीरी-गरीबी की खाई होगी. समतामूलक समाज का जो स्वप्र बाबा साहेब ने देखा था और उस स्वप्र को पूरा करने के लिये उन्होंने जिस भारतीय संविधान की रचना की थी, वह रास्ता हमें अपनी मंजिल की तरफ ले जायेगा. 
14 अप्रेल 1891 का वह शुभ दिन जब देश की यह भूमि कृतार्थ हो गयी क्योंकि इस दिन एक ऐसे बालक ने जन्म लिया था, जिसने अपने कार्यों से इतिहास लिख दिया. यह वह समय था छुआ-छूत का मसला शीर्ष पर था और ऐसे में बाबा साहेब जैसे लोगों को आगे बढऩा बेहद कठिन था लेकिन कभी ‘कभी हार नहीं मानूगां’ के संकल्प के साथ उन्होंने सारे कंटक भरे रास्ते को सुगम बना लिया. कहते हैं, जहाँ चाह है वहाँ राह है। प्रगतिशील विचारक एवं पूर्णरूप से मानवतावादी बङौदा के महाराज सयाजी गायकवाङ़ ने भीमराव जी को उच्च शिक्षा हेतु तीन साल तक छात्रवृत्ति प्रदान की, किन्तु उनकी शर्त थी की अमेरिका से वापस आने पर दस वर्ष तक बङौदा राज्य की सेवा करनी होगी। भीमराव ने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से पहले एम. ए. तथा बाद में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की। ‘भारत का राष्ट्रीय लाभ’  विषय पर उनके इस शोध के कारण उनकी बहुत प्रशंसा हुई। उनकी छात्रवृत्ति एक वर्ष के लिये और बढ़ा दी गई। चार वर्ष पूर्ण होने पर जब भारत वापस आये तो बङौदा में उन्हे उच्च पद दिया गया किन्तु कुछ सामाजिक विडंबना की वजह से एवं आवासीय समस्या के कारण उन्हें नौकरी छोङक़र बम्बई जाना पङ़ा। 
बम्बई में सीडेनहम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए किन्तु कुछ संकीर्ण विचारधारा के कारण वहाँ भी परेशानियों का सामना करना पङ़ा। इन सबके बावजूद आत्मबल के धनी भीमराव आगे बढ़ते रहे। उनका दृढ़ विश्वास था कि मन के हारे, हार है, मन के जीते जीत। 1919 में वे पुन: लंदन चले गये। अपने अथक परिश्रम से एम.एस.सी., डी.एस.सी. तथा बैरिस्ट्री की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे। 1923 में बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत शुरु की अनेक कठनाईयों के बावजूद अपने कार्य में निरंतर आगे बढते रहे। एक मुकदमे में उन्होने अपने ठोस तर्कों से अभियुक्त को फांसी की सजा से मुक्त करा दिया था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। इसके पश्चात बाबा साहेब की प्रसिद्धि में चार चाँद लग गया।
डॉ. आंबेडकर की लोकतंत्र में गहरी आस्था थी।  उनकी दृष्टि में राज्य एक मानव निर्मित संस्था है। इसका सबसे बङा कार्य ‘समाज की आंतरिक अव्यवस्था और बाह्य अतिक्रमण से रक्षा करना है।’ परन्तु वे राज्य को निरपेक्ष शक्ति नही मानते थे। उनके अनुसार- ‘किसी भी राज्य ने एक ऐसे अकेले समाज का रूप धारण नहीं किया जिसमें सब कुछ आ जाय या राज्य ही प्रत्येक विचार एवं क्रिया का स्रोत हो।’ अपने कठिन संर्घष और कठोर परिश्रम से उन्होंने प्रगति की ऊंचाइयों को स्पर्श किया था। अपने गुणों के कारण ही संविधान रचना में, संविधान सभा द्वारा गठित सभी समितियों में 29 अगस्त, 1947 को ‘प्रारूप-समिति’ जो कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण समिति थी, उसके अध्यक्ष पद के लिये बाबा साहेब को चुना गया।  संविधान सभा में सदस्यों द्वारा उठायी गयी आपत्तियों, शंकाओं एवं जिज्ञासाओं का निराकरण बङ़ी ही कुशलता से किया गया। उनके व्यक्तित्व और चिन्तन का संविधान के स्वरूप पर गहरा प्रभाव पङ़ा। उनके प्रभाव के कारण ही संविधान में समाज के पद-दलित वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के उत्थान के लिये विभिन्न संवैधानिक व्यवस्थाओं और प्रावधानों का निरुपण किया ; परिणामस्वरूप भारतीय संविधान सामाजिक न्याय का एक महान दस्तावेज बन गया।
मधुमेह रोग से पीडि़त बाबा साहेब ने अपनी अंतिम पांडुलिपि ‘बुद्ध और उनके धम्म’ को पूरा करने के तीन दिन बाद 6 दिसंबर 1956 को अपना शरीर त्याग दिया.  बाबा साहब कहते थे कि -मैं  ऐसे  धर्म  को  मानता  हूँ  जो  स्वतंत्रता , समानता, और  भाईचारा  सिखाये.  अगर  धर्म  को  लोगो  के  भले  के  लिए  आवशयक  मान  लिया  जायेगा तो  और  किसी  मानक  का  मतलब  नहीं  होगा. उन्होंने जो कहा, उसका निर्वाह जीवन भर किया. आज भले ही बाबा हमारे बीच नहीं हैं लेकिन एक आदर्श समाज की रचना करने का जो पथ वे आलौकित कर गये हैं, वे भारत को नित विकास के पथ पर आगे बढ़ाते रहेंगे. डॉ. भीमराव आम्बेडकर का जन्म भारत की जिस धरा पर हुआ, वह आगे चलकर मध्यप्रदेश कहलाया. मध्यप्रदेश को देश का ह्दयप्रदेश भी कहा जा सकता है और उस ह्दयप्रदेश में बाबा साहेब जैसे महान व्यक्ति का जन्म हुआ तो ह्दयप्रदेश, मध्यप्रदेश स्वयं को गौरवांवित महसूस कर सकता है और करना भी चाहिये. बाबा साहेब का जन्मस्थल महू आज एक नगर नहीं बल्कि तीर्थनगरी है और हर वर्ष करोड़ों लोग आत्मबल प्राप्त करने के लिये इस तीर्थस्थल में आते हैं.

रविवार, 12 अप्रैल 2015

प्याऊ का उद्घाटन उत्सव


मनोज कुमार
अखबार रोज एक न एक रोचक खबर अपने साथ लाती है. यह खबर जितनी रोचक होती है, उससे कहीं ज्यादा सोचने पर विवश करती है और लगता है कि हम कहां जा रहे हैं? आज एक ऐसी ही खबर पर नजर पड़ी. खबर में लिखा था कि राज्य के एक बड़े मंत्री प्याऊ का उद्घाटन करेंगे. खबर पढक़र चेहरे पर बरबस मुस्कान तैर गयी. समझ में नहीं आया कि इस खबर को रोचक खबर की श्रेणी में रखूं या विचार करने की. पहली नजर में तो यह खबर रोचक थी लेकिन इससे कहीं आगे विचार की. प्याऊ का शुरू होना हमारे लिये कोई उत्सव या जश्र नहीं है और न ही कोई शोशेबाजी. अपितु प्याऊ एक परम्परा है, भारतीय संस्कृति का अंग है एवं जीवन दर्शन है. मानव के प्रति मानव समाज की चिंता का सबब प्याऊ है. यह एक संकल्प भी है मानव समाज का लेकिन आज के दौर में संकल्प और संस्कृति ने उत्सव का स्थान ले लिया है. जिस तरह खबर में मंत्रीजी द्वारा प्याऊ के उदघाटन करने की सूचना दी गई है तो निश्चित रूप से मंत्रीजी लाव-लश्कर के साथ उद्घाटन के लिये पहुंचेंगे. इस लाव-लश्कर पर जो खर्च होगा और प्याऊ की स्थापना पर जो खर्च होगा, उसका फरक जमीन और आसमान की दूरी जितना ही होगा.
विचार करने की बात यह है कि कोई दस-पांच हजार की लागत में प्यास बुझाने के लिये प्याऊ की स्थापना हो जाएगी लेकिन उद्घाटन उत्सव पर जो खर्च होगा, वह कम से कम प्याऊ की लागत से चार गुना अधिक ही होगा. तो क्या किसी ने इस बात का जतन नहीं किया कि एक प्याऊ के उद्घाटन से मंत्रीजी की तस्वीरें तो अखबारों में छप जायेगी. उनके पीआओ महोदय इस कार्य को सदी का महान कार्य भी बता देंगे लेकिन क्या एक प्याऊ से सब दूर चल रहे मुसाफिरों की प्यास बुझाने का कोई इंतजाम हो पायेगा? शायद नहीं. बेहतर होता कि मंत्रीजी इस प्याऊ उद्घाटन उत्सव पर होने वाले खर्च को बचाकर शहर के दूसरे हिस्सों में प्याऊ की स्थापना कराने का उपक्रम करते तो मंत्रीजी का नाम और भी बड़ा होता. ऐसा जतन पीआरओ नहीं करेगा क्योंकि ऐसा करने से अखबारों में फोटो कैसे छपेगी? मुसाफिरों की प्यास नहीं, फोटो छपने की प्यास बड़ी है, सो जतन ऐसा किया जाये कि फीता काटते मंत्रीजी ही दिखें.
यह हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि एक तरफ तो हम अपनी संस्कृति का ऐसा गुणगान करते हैं कि लगता है कि हमसा कोई दूजा नहीं लेकिन दूसरी तरफ अपनी परम्परा और संस्कृति को उत्सव में बदल कर उसे बाजार की वस्तु बना देते हैं. प्याऊ हमारी भारतीय संस्कृति और समाज का अभिन्न अंग रहा है. गर्मी के आरंभ होते ही मटके को लाल कपड़े में लपेटकर राहगीरों की प्यास बुझाने का प्रबंध करने की पुरातन परम्परा रही है. समय के साथ बदलाव आया और प्याऊ आहिस्ता आहिस्ता नदारद होने लगे. पानी की बोतलें और पाउच बाजार में आ गये. बदलाव का यह दौर इतना क्रूर हो गया कि दुकानदारों ने अपनी अपनी दुकानों से पीने के पानी का सारा प्रबंध ही समाप्त कर दिया. ऐसे में प्याऊ एक कल्पना की वस्तु शेष रह गयी है. एक वह भी समय था जब घर पर ब्याह होने या नवजात शिशु के आने की खुशी में तालाब और कुंओं का निर्माण किया जाता है और आज एक समय यह भी है जब मॉल और मकान बनाने के लिये तालाब और कुंओं को खत्म किया जा रहा है. ऐसे में दरअसल, आज जरूरत है कि हम सब मिलकर उस परम्परा और जीवनशैली को समृद्ध करें जिसमें भारतीय संस्कृति का गौरव दिखता है. हम सब मिलकर इस बात का संकल्प लें कि हर मोड़ पर लाल कपड़े में लिपटा हुआ पानी से लबालब घड़ा हमारा स्वागत करें. प्यास तो बुझे ही, मन भी तरोताजा हो जाये. 

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

कलाम, गांधी और आम्बेडकर


मनोज कुमार
           आज की पीढ़ी के लिये कलाम साहब एक आदर्श व्यक्तित्व हैं. मिसाइलमैन कलाम साहब बच्चों से मिलते रहे हैं. उनमें सपने जगाते रहे हैं. उनका सब लोग अनुसरण करना चाहते हैं. ऐसा करना भी सही है. पिछले दो दशकों में जवानी की दहलीज पर खड़े युवाओं के समक्ष कलाम साहब से बेहतर कोई नहीं है. वे गांधी को भी जानते हैं और डॉ. भीमराव आंबेडकर का स्मरण भी उन्हें हैं. बहुतों ने किताबों में उनके बारे में, उनकी बातों को पढ़ा है लेकिन कलाम साहब उनके लिये एक अलग मायने रखते हैं. कलाम साहब की खासियत यह नहीं है कि वे एक कामयाब वैज्ञानिक हैं या फिर वे भारत के राष्ट्रपति रह चुके हैं. उनकी खासियत है जिंदगी के वह फलसफे बच्चों और युवा पीढ़ी को बताना जिसकी उन्हें दरकार है. वे कहते हैं कि सपने ऐसे देखो, जो आपकी नींद उड़ा दे. यह वाक्य जीवन का फलसफा है और जिसने इसे अपने जीवन में उतार लिया, वे कामयाब हो गये. 
लाम साहब राजनेता नहीं हैं और उन्होंने राजनीति में अपना उपयोग भी नहीं होने दिया. किसी भी राजनीतिक दल ने उन्हें अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाने का खतरा मोल नहीं लिया लेकिन जब आप गांधी की बात करते हैं, जब आप डॉ. आम्बेडकर की बात करते हैं और जब आप लोहिया की बात करते हैं, तो ये किसी न किसी दल के लिये ब्रांड एम्बेसडर के रूप में युवा पीढ़ी के समक्ष मौजूद हैं. बात यहां तक होती तो भी अनदेखा किया जा सकता था लेकिन बात बढक़र राजनीतिक लाभ के लिये इनके उपयोग तक आ पहुंची है. एक छोटी बच्ची यह पूछने का दुस्साहस करती है कि गांधीजी को किस कानून के तहत राष्ट्रपिता का दर्जा दिया गया तो सरकार खामोश हो जाती है. यह ठीक है कि उन्हें किसी कानून के तहत राष्ट्रपिता का दर्जा नहीं दिया गया लेकिन क्या इसके लिये कोई कानूनी प्रक्र्रिया पूरी नहीं की जानी चाहिये? ऐसा नहीं किया जायेगा क्योंकि हमारे ये महापुरूष राजनीतिक उपयोग की वस्तु बन गये हैं. 
कांग्रेस गांधी के रास्ते पर चलने का दावा करती है तो बहुजन समाज पार्टी के लिये बाबा साहब हैं तो समाजवादी लोहिया के नाम की माला जप रहे हैं. भाजपा के पास श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे नेता हैं. इन महापुरूषों की जन्म और निधन के तारीख पर, इनके बताये रास्ते पर चलने का संकल्प लेते हैं और अगले दिन इन राजनीतिक दलों का चरित्र क्या होता है, इस बारे में कुछ सोचना, लिखना और कहना बेमानी है. जब तक ये दल अपने अपने लिये महापुरूषों को अपना ब्रांड एम्बेसडर के तौर पर उपयोग कर रहे थे, तब तो बात ठीक थी लेकिन अब इससे आगे निकल गये हैं. महात्मा गांधी इन दिनों मोदी सरकार के लिये ब्रांड एम्बेसडर है और वे उन्हें आगे रखकर देश में स्वच्छता अभियान चला रहे हैं और परदेस में गांधीजी के रास्ते पर चलकर राज करने की बात कर रहे हैं. लोहियाजी की क्या नीति थी, क्या नियम थे, इस बारे में कोई समाजवादी बात नहीं करना चाहता है, कुछ कुछ ऐसी स्थिति बाबा साहब और मुखर्जी को लेकर भी है. 
       ऐसा क्यों है? यह सवाल जब मैंने अपने आपसे किया था तो जवाब मुकम्मल भले ही न हो लेकिन करीब तक ले गया. अध्ययन एवं संवाद की कमी. हमने जब इन महापुरूषों को पढ़ा नहीं, इनके विचारों पर संवाद ही नहीं किया तो इनकी प्रासंगिकता जन्म और मृत्यु की तारीख तक ही रह जाती है. अण्णा जब लोकपाल की मांग को लेकर युवाओं को उद्वेलित करते हैं तो यह आवेग किसी उद्देश्य को लेकर नहीं था बल्कि एक हवा थी. ठीक वैसे ही जैसे विधानसभा और लोकसभा चुनाव के समय पूरे देश ने महसूस किया. यह सवाल बहुत समय से अनुत्तरित है कि अण्णा ने जो कदम उठाया वह तो उचित था लेकिन क्या लोकपाल के बारे में युवाओं को शिक्षित किया गया? शायद नहीं. ऐसे में यूथ के लिये कलाम साहब एक ऐसे शख्सियत के रूप में उपस्थित होते हैं जो सपने नहीं बेचते, जो युवाओं को किसी अभियान में नहीं झोंकते. उन्हें सच से अवगत कराते हैं और जीने का तरीका बताते हैं. वक्त अभी शेष है. हमारे महापुरूषों को युवाओं का आदर्श बनाना है तो अध्ययन एवं संवाद का उपक्रम शुरू करना होगा. देश की स्वतंत्रता के लिये अहिंसा कितना बड़ा हथियार बना, पूंजीपतियों के खिलाफ लोहियाजी का दर्शन क्या था, दलितों और पिछड़े वर्गों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिये बाबा साहेब ने क्या क्या जतन किये, इसका ब्यौरा युवापीढ़ी को अनरवत देते रहना होगा. यह आज समय की जरूरत है.

रविवार, 29 मार्च 2015

10 हज़ारी बनाने के लिए आभार

दोस्तों ,
बड़ा मन था कि  जिस तरह अप्रैल माह में नया खाता खुलता है, उसी तरह मेरे ब्लॉग देखने - पढ़ने वालो की संख्या 10 हज़ार हो जाए।  आज आंकड़ा पूरा हो गया. आप सभी का आभार एवं धन्यवाद
मनोज कुमार 

मंगलवार, 24 मार्च 2015

गांधी की टेक


मनोज कुमार
         भारतीय समाज में पिता की मौजूदगी जितनी जरूरी होती है, शायद उनका नहीं रहना उन्हें और भी जरूरी बना देता है. ऐसे ही हैं हमारे बापू. बापू अर्थात महात्मा गांधी. आज बापू को हमसे बिछड़े बरसों-बरस गुज़र गये लेकिन जैसे जैसे समय गुजरता गया, उनकी जरूरत हमें और ज्यादा महसूस होने लगी. एक आम आदमी के लिये बापू आदर्श की प्रतिमूर्ति बने हुये हैं तो राजनीतिक दल वर्षों से उन्हें अपने अपने लाभ के लिये, अपनी अपनी तरह से उपयोग करते दिखे हैं. अब तो गांधी के नाम की टेक पर सब नाम कमा लेना चाहते हैं. मुझे स्मरण हो आता है कि कोई पांच साल पहले कोई पांचवीं कक्षा की विद्यार्थी ने सूचना के अधिकार के तहत जानना चाहा था कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा किस कानून के तहत दिया गया? बच्ची का यह सवाल चौंकाने वाला था लेकिन तब खबर नहीं थी कि उसने अपने एक बेहूदा सवाल से पूरे समाज को गांधी की एक ऐसी टेक दे दी है जिसे सहारा बनाकर नाम कमाया जा सकता है अथवा विवादों में आकर स्वयं को चर्चा में रखा जा सकता है. 
गांधी की टेक लेकर जस्टिज मार्केण्ड काटजू ने गांधीजी के बारे में जो कुछ कहा, वह चर्चा के योग्य नहीं है. यह इसलिये नहीं कि उनकी बातों में कितनी थाह है अथवा नहीं बल्कि इसलिये जिस बापू के देश में काटजूजी ने अपने उम्र के सर्वाधिक वर्ष गुजार दिये, उस देश में, इतने वर्षों बाद गांधीजी पर टिप्पणी करने की समझ और साहस कहां से आयी? उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि गांधीजी ने क्या कहा, क्या किया और उसके क्या मायने निकले. सच तो यह है कि बाबा काटजू इस उम्र में आकर स्वयं को खबरों में बनाये रखने की जो मन ही मन एक लिप्सा पाले हुये हैं, उसकी परिणिती में यह अनमोल वचन बोलने के लिये उन्हें उनके मन ने मन मजबूर किया था. किसी को इस बात से आपत्ति हो सकती है कि काटजू जी को मैंने बाबा क्यों कहा, और शायद वह बच्ची मुझसे यह सवाल कर सकती है कि किस कानून के तहत आपने काटजूजी को बाबा संबोधन दिया तो मेरा एक ही जवाब होगा कि उम्रदराज व्यक्ति के लिये दादा, बाबा या चाचा संबोधन हमारी भारतीय संस्कृति है. हम अंग्रेजों की तरह एक शब्द अंकल नहीं जानते हैं बल्कि रिश्तों का ताना-बाना हमारी संस्कृति है.
हरहाल, मैं गांधी के टेक की बात कर रहा था. आप इतिहास उठा कर देख लीजिये कि कोई भी नेता और राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जिसने गांधी का अपने पक्ष में उपयोग नहीं किया. वर्तमान केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी की बात ही गांधी से शुरू होती है और गांधी पर ही समाप्त होती है. सच यह है कि उनका दल गांधी के खिलाफ भले ही न हो लेकिन गांधी के पक्ष में खड़ा नहीं दिखा. ऐेसे में मोदीजी का गांधीप्रेम, केवल प्रेम नहीं बल्कि राजनीति है. मोदीजी का भला सा तर्क यह हो सकता है कि गांधीजी का रिश्ता गुजरात से था और वे भी गुजरात के हैं तो गांधीजी पर उनका पहला हक है. इसे खारिज नहीं किया जाना चाहिये क्योंकि मोदी जी आज प्रधानमंत्री हैं तो वे एक आम भारतीय भी हैं  मोदीजी गांधी के पक्ष में खड़े दिखते हैं तो काटजू जी और उनके जैसे अनेक लोग हैं जो गांधीजी में खोट ढूंढ़ते दिखते हैं, इनके बारे में क्या कहेंगे?
         बात गांधीजी के पक्ष में हो या विपक्ष में, लोग और नेता उनकी खोट ढूंढ़ें या उनका गुणगान करें, बात तो तय है कि सब लोग येन-केन प्रकारेण गांधी का टेका लगाकर आगे बढ़ जाना चाहते हैं. गांधीजी हर कालखंड में सामयिक रहे हैं और रहेंगे, ऐसा मेरे जैसे लोगों का मानना है. मेरे जैसे मतलब, दस पांच नहीं बल्कि करोड़ों की संख्या में, वह भी देश में नहीं, परदेस में भी. कोई भी व्यक्ति परिपूर्ण नहीं होता और स्वयं गांधीजी ने अपने बारे में यह बात कही है. जिन लोगों को गांधीजी से परहेज है अथवा उनमें खोट निकाल कर चर्चा करना चाहते हैं तो उन लोगों को सत्य के प्रयोग पढ़ लेना चाहिये. एक ऐसी आत्मकथा जिसमें आत्मप्रवंचना नहीं बल्कि स्वयं की आलोचना है और पाश्चाताप भी. गांधी पर सवाल करने से पहले गांधीजी जैसा स्वयं के भीतर ताकत पैदा करें और अपनी कमियों को न केवल सार्वजनिक रूप से स्वीकार करें बल्कि पाश्चाताप करने का साहस भी पैदा करें. गांधी टेक के सहारे सुर्खिया बनने की यह पुरातन परम्परा है और आगे भी जारी रहेगी. हां, मैं इसमें एक लाभ यह देखता हूं कि जो हमारी नयी पीढ़ी गांधी परम्परा से दूर है, वह इसी बहाने कुछ संवाद करती है और यह जानने के लिये शायद कुछ अध्ययन भी. क्या इसके लिये मोदी, काटजू जैसे अनन्य लोगों का हमें आभारी नहीं होना चाहिये?