संदेश

साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता के एक सूर्य का अस्त होना

मनोज कुमार
मन आज व्याकुल है। ऐसा लग रहा है कि एक बुर्जुग का साया मेरे सिर से उठ गया है। मेरे जीवन में दो लोग हैं। एक दादा बैरागी और एक मेरे घर से जिनका नाम इस वक्त नहीं लेना चाहूंगा। दोनों की विशेषता यह है कि उनसे मेरा संवाद नहीं होता है लेकिन वे मेरे साथ खड़े होते हैं। उनका होना ही मेरी ताकत है। दादा के जाने के बाद यह ताकत आधी हो गई है। दादा तो गाहे-बगाहे सलाह देते थे, डांट देते थे लेकिन अनकही ढंग से मेरी हौसलाअफजाई करते हैं। खैर, दादा के अचानक देवलोकगमन की खबर ने मुझे स्तब्ध कर दिया। मैं अवाक था और लगभग नि:शब्द। अभी महीने भर पहले की तो बात है। ‘समागम’ का अंंक रेडियो पर केन्द्रित किया था। हर आलेख पर वे अपनी टिप्पणी से मुझे अवगत कराते रहे और बधाई देते रहे। कहते थे कि ऐसे समय में जब पत्रिकाओं की शताधिक संख्या है, उसमें श्रम करके जो प्रकाशन कर रहे हो, वह अतुलनीय है। मुझसे वे फोन पर जो बोलते थे, सो तो है। वे अपने अनन्य मित्रों और पत्रकार साथियों को भी ‘समागम’ पढऩे के लिए प्रेरित किया करते थे। मई महीने की बात है, साल याद नहीं। इंदौर के प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. सरोज कुमार का मुझे फोन आया…

#पीआर बोले तो #सोसायटी की #हार्टबीट है

पीआर बोले तो  सोसायटी की हार्टबीट है  मनोज कुमार अंग्रेजी के पब्लिक रिलेशन को जब आप अलग अलग कर समझने की कोशिश करते हैं तो पब्लिक अर्थात जन और रिलेशन अर्थात सम्पर्क होता है जिसे हिन्दी में जनसम्पर्क कहते हैं. रिलेशन अर्थात संबंधों के बिना समाज का तानाबाना नहीं बुना जा सकता है और इस दृष्टि से पब्लिक रिलेशन का केनवास इतना बड़ा है कि लगभग सभी विधा उसके आसपास या उसमें समाहित होती हैं. पब्लिक रिलेशन को लेकर भारत में आम धारणा है कि यह एक किस्म का सरकारी का काम होता है या सरकारी नौकरी पाने का एक जरिया होता है. कुछ लोग पब्लिक रिलेशन को जर्नलिज्म से अलग कर देखते हैं. वास्तविकता यह है कि वह भारत की सोसायटी हो या दुनिया के किसी देश की सोसायटी, इन्हें जीवंत रखने के लिए जर्नलिज्म जितना जरूरी है, उतना ही पब्लिक रिलेशन. हमारा मानना है कि सोसायटी एक नदी है और पब्लिक रिलेशन तथा जर्नलिज्म इस नदी के दो पाट हैं. दोनों साथ साथ चलते हैं लेकिन आपस में कभी मिल नहीं पाने की सच्चाई जितनी है, उतनी ही सच्चाई यह है कि नदी के अविरल बहने के लिए दो पाटों का होना जरूरी है. ठीक उसी तरह सोसायटी की जीवंतता के लिए पीआर और…

अक्षय तृतीया : जीवन की सीख देेते पर्व

अनामिका
भारतीय समाज की संस्कृति एवं सभ्यता हजारों सालों से अक्षय रही है. पर्व एवं उत्सव भारतीय समाज की आवश्यकताओं और उनमें ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बनाये गए हैं. लोगों में अपनी संस्कृति एवं साहित्य के प्रति अनुराग बना रहे, इस दृष्टि से भी कोशिश हुई है। इन्हीं में से एक है अक्षय तृतीया. अक्षय तृतीया का अनेक महत्व है. अपने नाम के अनुरूप कभी क्षय अर्थात नष्ट ना होने वाली संस्कृति. भारतीय समाज में माना गया है कि अक्षय तृतीया के दिन कोई भी शुभ कार्य बिना मुहूर्त किया जा सकता है. अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं। नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उदघाटन का कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्…

मैं ककहरा सीख रहा था, वो प्रिंसीपल थे..

समय अपनी रफ्त्तार से गुजरता चला जाता है... एक पुरानी यादें शेयर कर रहा हूँ  मैं ककहरा सीख रहा था, वो प्रिंसीपल थे.. मनोज कुमार        मैं उन दिनों पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा था. और कहना ना होगा कि रमेशजी इस स्कूल के प्रिंसीपल हो चले थे. यह बात आजकल की नहीं बल्कि 30 बरस पुरानी है. बात है साल 87 की. मई के आखिरी हफ्ते के दिन थे. मैं रायपुर से भोपाल पीटीआई एवं देशबन्धु के संयुक्त तत्वावधान में हो रहे हिन्दी पत्रकारिता प्रशिक्षण कार्यशाला में हिस्सेदारी करने के लिए भोपाल आया था. यह वह समय था जब भोपाल कहने भर से यहां आने की ललक जाग उठती थी. भोपाल तब मध्यप्रदेश के साथ साथ छत्तीसगढ़ की भी राजधानी थी. आज जो भौगोलिक बंटवारा दोनों राज्यों के बीच हुआ है, तब दोनों में एका था. ऐसे में रायपुर एक कस्बे की तरह था और राजधानी हमारे लिए सपने की नगरी. खैर, रमेशजी आरंभ से मेहमाननवाज थे. सो इस पत्रकारिता प्रशिक्षण में हिस्सेदारी करने आए मुझ जैसे नये-नवेले के साथ वरिष्ठों को उन्होंने रात में भोजन पर आमंत्रित किया. रमेशजी से मेरी यह पहली मुलाकात थी. कुछ बातें हुई लेकिन ऐसी आत्मीयता नहीं बनी कि मैं उनका मुरीद …

हर परिवार में वॉटर बजट बने

हर परिवार में वॉटर बजट बने अनामिका हर वर्ष की तरह एक बार फिर हम जल दिवस मनाने जा रहे हैं. निश्चित रूप से ऐसे दिवस हमारे लिए प्रेरणा का काम करते हैं. जल का हमारे जीवन में बहुत महत्व है. जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है और जिस तरह का संकट अब पूरी दुनिया के सामने उपस्थित हो रहा है, वह भयानक है. जल संरक्षण की दिशा में व्यापक जनजागरूकता के प्रयास किए जा रहे हैं. जल है तो कल है कि इस सोच को केवल कागज तक रखने के बजाय जीवन में उतारने का समय आ गया है. यह अच्छी बात है कि प्रतिवर्ष हम जलदिवस मनाकर जल संरक्षण की दिशा में सक्रिय हो जाते हैं लेकिन क्या एक दिन का यह उत्सव हमारे लिए प्रेरणा का काम करता है या आगे पाठ पीछे सपाट की कहावत को सच करता है? निश्चित रूप से 22 मार्च को मनाया जाने वाला विश्व जल दिवस अर्थपूर्ण है लेकिन यह दिवस ना होकर पूरे 365 दिनों की जागरूकता का हो तो इसके सुपरिणाम हमारे सामने होंगे. जल संरक्षण की दिशा में समाज के प्रत्येक सदस्य को जागरूक होना जरूरी है. सबसे अहम बात यह है कि हर परिवार में वॉटर बजट का प्रावधान हो. जिस तरह हम घर के खर्च को समायोजित करने के लिए बजट …

जश्र मनाइए शिवराज के जन्मदिन का

-मनोज कुमार साल की किसी न किसी तारीख, किसी न किसी व्यक्ति के लिए खास दिन होता है. यहदिन उसके जन्म का दिन होता है और सच पूछें तो एक तरह से बीते साल की कामयाबी के आंकलन का होता है. ऐसे में जब हम व्यक्ति नहीं, मुखिया, वह भी राज्य के मुख्यमंत्री की बात करते हैं तो ऐसी तारीख, ऐसा दिन महत्वपूर्ण ही नहीं होता है बल्कि इतिहास के पन्नों की तारीख होती है. हर साल कैलेंडर के पन्ने पर 5 मार्च एक ऐसी ही तारीख है. 5 मार्च की यह तारीख बेहद खास है और खास बस इसलिए कि इस दिन कामयाब राजनीति शख्यित शिवराजसिंह चौहान का जन्मदिन होता है. यह दिन उनकी कामयाबी, उनके आगे और आगे बढ़ते रहने का दिन होता है क्योंकि स्वयं शिवराजसिंह चौहान, उनके परिजन और उनके शुभचिंतक चाहते हैं कि उनका यह दिन यशस्वी हो, जीवन का हर वर्ष अहम दिन हो. बहुतों के लिए यह दिन मुख्यमंत्री का जन्मदिन हो सकता है लेकिन यकिन मानिए यह सौफीसदी व्यक्तिगत रूप से शिवराजसिंह चौहान का जन्मदिन है. वे शिवराजसिंह जिसके तेवर और तबीयत में सत्ता का ओज नहीं है, वे शिवराज जिनके लिए 13 साल का समय मुख्यमंत्री रूप में होना एक जवाबदारी है, वे शिवराजसिंह चौहान जिसके ल…

रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का अंक रेडियो पर

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भोपाल से प्रकाशित रिसर्च जर्नल ‘समागम’ ने अपने निरंतर प्रकाशन के 17वां वर्ष पूर्ण कर लिया है.  18वें वर्ष का पहला अंक रेडियो पर केन्द्रित है. रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का यह अंक कैसा लगा, आपकी प्रतिक्रिया चाहेंगे.  हमसे जुडऩे के लिए आप हमें ई-मेल samagam2016@gmail.com कर सकते हैं.  मानक शोध पत्र/लेख आमंत्रित हैं. सम्पादक मनोज कुमार