शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

छोटी ही रहना चाहती हूं...पापा


-मनोज कुमार 
अखबार पढ़ते हुये अचानक नजर पड़ी कि कुछ दिनों बाद फादर्स डे है। मन में जिज्ञासा आयी और लगा कि अपनी बिटिया से पूछूं कि वो इस फादर्स डे पर क्या करने वाली है। मैंने सहज भाव से पूछ ही लिया कि बेटा, थोड़े दिनों बाद फादर्स डे आने वाला है। तुम अपने फादर अर्थात मेरे लिये क्या करने वाली हो? वह मेरा सवाल सुनकर मुस्करायी और मेरे सामान्य ज्ञान को बढ़ाते हुये कहा कि हां, पापा मुझे पता है कि फादर्स डे आने वाला है। अच्छा आप बताओ कि आप मेरे लिये क्या करने वाले हो? मैंने कहा कि दिन तो मेरा है, फिर मैं क्यों तु हारे लिये कुछ करने लगा। तु हें मेरे लिये करना चाहिये? इसके बाद हम बाप-बेटी के बीच जो संवाद हुआ, वह एक दार्शनिक संवाद  जरूर था लेकिन डे मनाने वालों के लिये सीख भी है। बेटी ने कहा कि पहली बात तो यह कि मैं अभी आपकी इनकम पर अपना भविष्य बना रही हूं और जो कुछ भी करूंगी आपके जेब से निकाल कर ही करूंगी। ऐसे में आपके लिये कुछ करने का मतलब आपको खुश करने के बजाय दुखी करना होगा क्योंकि जितने पैसों से मैं आपके लिये उपहार खरीदूंगी, उतने में आप हमारी कुछ जरूरतें पूरी कर सकेंगे। तो इसका मतलब यह है कि जब तुम कमाने लगोगी तो फादर्स डे सेलिब्रेट करोगी। अपने पापा के लिये उपहार खरीदोगी? इस बार भी बिटिया का जवाब अलग ही था। नहीं पापा, मैं चाहे जितनी बड़ी हो जाऊं, जितना कमाने लगूं लेकिन कभी इतनी बड़ी न हो पाऊं कि अपने पापा को उपहार देने की मेरी हैसियत बने। जिस पापा ने अपनी नींद खोकर मेरी परिवरिश की, जिस पापा ने अपनी जरूरतों को कम कर मेरी जरूरतों को पूरा करने में पूरा समय और श्रम लगा दिया, जिस पापा ने मेरे सपनों को अपना सपना मानकर मुझे बड़ा किया, उस पापा को भला मैं क्या दे सकती हूं। और पापा ही क्यों, मम्मी, दादाजी, दादीजी सब तो मिलकर मुझे बनाने की कोशिश कर, फिर भला मैं कैसे आप लोगों के लियेे उपहार खरीदने की हिम त कर सकती हूं। 
बिटिया की बातों को सुनकर मेरी आंखें भर आयी। मुझे लगा कि मैंने जो कुछ किया, वह निरर्थक नहीं गया। बेटी के भीतर वह सबकुछ मैंने समाहित कर दिया, जो मुझे मेरे पिता से मिला था। मुझे लगा कि फादर्स डे पर इससे अच्छा कोई उपहार हो भी नहीं सकता है। जब मां-बाप अपने बच्चों से हारते  हैं तो सही मायने में विजेता होते हैं। हारते हुयेे माता-पिता को सही मायने में खुशी मिलती है क्योंकि बच्चों की जीत ही माता-पिता की असली जीत है। हमारे समाज में ये जो डे मनाने का रिवाज चल पड़ा है और यह रिवाज भारतीय नहीं बल्कि यूरोपियन देशों की देन है। भौतिक जरूरतों की चीजों में उनके रिश्ते बंधे होते हैं और वे हर रिश्तों को वस्तु से तौलते हैं लेकिन भारतीय मन भावनाओं की डोर से बंधा होता है। वस्तु हमारे लिये द्वितीयक है, प्रथम भावना होती है और आज मेरी बेटी ने जता दिया कि वह जमाने के साथ भाग रही है्र दौड़ रही है लेकिन अपनी संस्कृति और संस्कार को सहेजे हुये। अपनी भावनाओं के साथ, अपने परिजनों की भावनओं की कद्र करते हुये। वह बाजार जाकर कुछ सौ रुपयों के तोहफों से भावनाओं का व्यापार नहीं कर रही है। यह मेरे जैसे पिछड़ी सोच के बाप के लिये अनमोल उपहार है। 
भारतीय समाज में भी डे मनाने की पुरातन परमपरा है। हम लोग यूरोपियन की तरह जीवित लोगों के लिये डे का आयोजन नहीं करते हैं बल्कि उनके हमारे साथ नहीं रहने पर करते हैं। उनकी मृत्यु की तिथि पर उनके पसंद का भोजन गरीबों को खिलाया जाता है, वस्त्र इत्यादि गरीबों में वितरित किया जाकर उनकी आत्मा की प्रसन्नता के लिये करते हैं, इसे हम पितृपक्ष कहते हैं। जीते जी हम उन्हें भरपूर स मान देते हैं और मरणोपरांत भी उनका स्थान हमारे घर-परिवार के बीच में होता है। दुर्भाग्य से हम यूरोपियन संस्कृति के साथ चल पड़ हैं। सक्षम पिता या माता का डे तो मनाते हैं लेकिन वृद्ध होते माता-पिता को वृद्वाश्रम पहुंचाने में देर नहीं करते हैं। बाजार जिस तरह अनुपयोगी चीजों का सेल लगाता है या चलन से बाहर कर देता है, वही हालत यूरोपियन समाज में रिश्तों का है, भावनाओं का है। हम भी इसी रास्ते पर चल पड़े हैं। पालकों के पास धन है, साधन है, सक्षम हैं तो दिवस है और नहीं तो उनके लिये दिल तो क्या घर पर स्थान नहीं है। मेरी गुजारिश है उन बच्चों माता-पिता को बाजार की वस्तु बनाने के बजाय उन्हें अपना स्नेह दें। उनकी भावनाओं का खयाल रखें और एक दिन फादर्स डे, मदर्स डे के बजाय पूरे साल का हर दिन उनके लिये समर्पित करें। यही हमारी परम परा और संस्कृति है और यही भारतीय समाज की धरोहर भी। 

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

भाव भरी भूमि

-मनोज कुमार
एक साल पुरानी बात है. तब  23 जुलाई को अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की पुण्यभूमि पर जाने का मुझे अवसर मिला था. यह दिन मेरे लिये किसी उत्सव से कम नहीं था. कभी इस पुण्यभूमि को भाबरा के नाम से पुकारा जाता था किन्तु अब इस नगर की पहचान अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के रूप में है. मध्यप्रदेश शासन के आदिमजाति कल्याण विभाग के सहयोग से राज्य के आदिवासी बाहुल्य जिलों में सामुदायिक रेडियो केन्द्रों की स्थापना की पहली कड़ी में यहां दो वर्ष पहले रेडियो वन्या की स्थापना हुई. 23 जुलाई को रेडियो वन्या के दूसरी सालगिरह पर मैं बतौर रेडियो के राज्य समन्वयक के नाते पहुंचा था. मैं पहली दफा इस पुण्य धरा पर आया था. इस धरा पर अपना पहला कदम रखते ही जैसे मेरे भीतर एक कंपन सी हुई. कुछ ऐसा मन में लगा जिसे अभिव्यक्त कर पाना मुश्किल सा लग रहा है. एक अपराध बोध भी मेरे मन को घर कर गया था. भोपाल से जिस वाहन से हम चंद्रशेखर आजाद नगर पहुंचे थे, उसी वाहन में बैठकर मैं और मेरे कुछ साथी आजाद की कुटिया की तरफ रवाना हुये. कुछ पल बाद ही मेरे मन में आया कि मैं कोई अनैतिक काम कर रहा हूं. उस वीर की भूमि पर मैं कार में सवार होकर उसी तरह चल रहा हूं जिस तरह कभी अंग्रेज चला करते थे. मन ग्लानि से भर गया और तत्काल अपनी भूल सुधार कर वाहन से नीचे उतर गया. वाहन से नीचे उतरते ही जैसेे मन हल्का हो गया. क्षणिक रूप से भूल तो सुधार लिया लेकिन एक टीस मन में शायद ताउम्र बनी रहेगी.

बहरहाल, मेेरे रेडियो स्टेशन पर कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद लगभग हजार विद्यार्थियों की बड़ी रैली अमर शहीद चंद्रशेखर की जयकारा करते हुये निकली तो मन खुश हो गया. परम्परा को आगे बढ़ाते देखना है तो आपको चंद्रशेखर नगर जरूर आना होगा. वीर शहीद की कुटिया को सरकार की तरफ से सुंदर बना दिया गया है. इस कुटिया में मध्यप्रदेश स्वराज संस्थान संचालनालय की ओर उनकी पुरानी तस्वीरों का सुंदर संयोजन किया गया है. इस कुटिया में प्रवेश करने से पूर्व ही एक अम्मां मिलेंगी जो बिना किसी स्वार्थ कुटिया की रखवाली करती हैं, जैसे वे अपने देश को अंग्रेजों से बचा रही हों. इस कुटिया के भीतर वीर शहीद चंद्रशेखर आजाद की आदमकद प्रतिमा है जिसे देखते ही लगता है कि वे बोल पड़ेंगे हम आजाद थे, आजाद रहेेंगे. सब-कुछ किसी फिल्म की रील की तरह आंखों के सामने से गुजरती हुई प्रतीत होता है. जब मैं प्रतिमा निहार रहा था तभी एक लगभग 30-35 बरस का युवा अपनी छोटी सी बिटिया को लेकर कुटिया में आया और बिना समय गंवाये नन्हीं बच्ची को गोद में उठाकर उसे इतना ऊपर उठाया कि बिटिया शहीद का तिलक कर सके. उसने यही नहीं किया बल्कि बिटिया को शहीद के पैरों पर ढोक लगाने के लिये प्रेरित किया. नन्हीं सी बच्ची को शहीद और भगवान में अंतर नहीं मालूम हो लेकिन एक पिता के नाते उस युवक की जिम्मेदारी देखकर मन भाव से भर गया. 

एकाएक मन में आया कि काश, भारत आज भी गांवों का देश होता तो अभाव भले ही उसे घेरे होते किन्तु भाव तो नहीं मरते. बिलकुल जैसा कि मैंने चंद्रशेखर आजाद की नगरी में देखा. विकास के दौड़ में हम अपना गौरवशाली अतीत को विस्मृत कर रहे हैं लेकिन यह छोटा सा कस्बानुमा आज भी उस गौरवशाली इतिहास को परम्परा के रूप में आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित कर रहा है. परम्परा के संवर्धन एवं संरक्षण की यह कोशिश ही सही मायने में भारत की तस्वीर है. मैं यह बात बड़े गौरव के साथ कह सकता हूं कि देश का ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में जितना बड़ा योगदान दिया और इनके शहीदों को जिस तरह समाज ने सहेजा है, वह बिराला ही उदाहरण है. यह वही चीज है जिसे हम भारत की अस्मिता कहते हैं, यह वही चीज है जिससे भारत की दुनिया में पहचान है और शायद यही कारण है कि तमाम तरह की विसंगितयां, विश्व वक्रदृष्टि के बावजूद भारत बल से बलवान बना हुआ है.
दुख इस बात है कि विकास की अंधी दौड़ से अब चंद्रशेखर आजाद नगर भी नहीं बचा है. मकान, दुकान पसरते जा रहे हैं. वीर शहीद के नाम पर राजनीति अब आम हो रही है. हालांकि इसे यह सोच कर उबरा जा सकता है कि विकास होगा तो यह लालच बढ़ेगा और लालच बढ़ेगा तो विसंगतियांं आम होंगी लेकिन यह बात भी दिल को सुकून देेने वाली हैं कि चंद्रशेखर आजाद की नगरी में 23 जुलाई का दिन हर वर्ष दीपावली से भी बड़े उत्सव की तरह मनाया जाता है. अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद को मेरा कोटिश: प्रणाम.

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

अविश्वास की आंखें


मनोज कुमार
अविश्वास की आंखें? जब मेरे दोस्त ने कहा तो सहसा मुझे यकिन ही नहीं हुआ। उल्टे मैं उससे सवाल करने लगा कि भाई झूठ के पांव नहीं होते हैं, यह तो सुना था। अविश्वास की आंखें, यह कौन सी नयी आफत है। इस पर दोस्त ने तपाक से कहा कि यह विकास की देन है। दूसरा सवाल और भी चौंकाने वाला था। समझ नहीं आ रहा था कि विकास की देन अविश्वास की आंखें? खैर, दोस्त तो अपनी पहेली छोडक़र चला गया था लेकिन एक पत्रकार एवं लेखक होने से भी ज्यादा एक बड़ी होती बिटिया के पापा की जिम्मेदारी ने इस पहेली के प्रति जिज्ञासा बढ़ा दी। मैं अपने आसपास तलाश करता रहा कि अचानक एक खबर ने मेरी चूलें हिला दी। दैनिक अखबार के किसी पन्नेद पर खबर छपी थी कि शहर के एक बड़े शॉपिंग मॉल में चोरी करते हुये दो युवक को कैमरे ने पकड़ा। 
शॉपिंग मॉल, चोरी, कैमरा और जब्ती। अब मुझे अविश्वास की आंखों का अर्थ समझ आने लगा। दोस्त ने जिसे विकास की देन कहा था वह अविश्वास की आंखों और कोई नहीं कैमरा ही था। विकास के परवान चढ़ते नये नये टेक्रालॉजी के बारे में लिखना अच्छा लगता है। लिखता भी हूं लेकिन बड़े  शॉपिंग मॉल में प्रवेश करते ही मैं एक मामूली आदमी हो जाता हूं। किसी ब्रांडेड स्टोर में प्रवेश करते ही डर सा लगने लगता है। सच कहूं तो अपनी औकात समझ आने लगती है। तिस पर कैमरे की लगातार घूरती आंखें। डर सा लगता है कि जाने अगले पल क्या हो। ऐसे में कई बार तो शॉपिंग मॉल में जाने का प्रोग्राम ही कैंसिल कर दिया जाता है। 
सच तो यह है कि मैं ठहरा निपट देहाती आदमी। जेब में दो पांच सौ रुपये आये तो खुद को शहंशाह समझ बैठता हूं। मेरी इस गफलत को मेरे मोहल्ले का परचून वाला हमेशा बनाये रखता है। वह मुझे कभी इस बात का अहसास ही नहीं होने देता कि मैं फक्कड़ किस्म का लगभग कंगाल हूं और मेरे हाथों में जो दो-पांच सौ रुपये हैं, उसकी कोई बखत नहीं। अपने भीतर ही भ्रम पाले मैं परचून की दुकान में पहुंचता हूं। यहां अविश्वास की आंख नहीं आयी है। दुकानदार से सौदा-सुलह किया और दो शिकायतें भी ठोंक दी। कुछ सुख-दुख की बातें भी कर ली और उधार अलग कर आया। लेकिन मध्यप्रदेश की राजधानी के बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल में ऐसी सुविधा कहां। उसके पास एक ही रिवाज है। माल देखो, पसंद आया तो बैग में डालो, पैसे दो, बिल लो और घर चलते बनो। मोहल्ले के परचून की दुकानदार की तरह न तो शिकायत सुनने का मौका, न बतियाने का कोई वक्त। उधार की बातें तो करो ही नहीं। और हां, परचून की दुकान की तरह कुछ भी उठाकर टेस्ट नहीं कर सकते। टेस्ट किया और बिल पेस्ट हुआ। हो सकता है कि इस टेस्ट के चक्कर में अविश्वास की आंखों में आप कैद हो जायें और कहीं से सायरन बजा और आप धर लिये जायें।
विकास की देन अविश्वास की आंखों का विस्तार शॉपिंग मॉल से आपके हमारे घरों तक आ गया है। अविश्वास इतना बढ़ गया है कि अब हम छिपे कैमरे से एक-दूसरे की निगरानी करने लगे हैं। कहने तो हम इसे सुरक्षा के लिये लगाये हुये कैमरा कहते हैं लेकिन सच तो यह है कि हम सब घोर अविश्वास के शिकार हैं। सच तो यह है कि हमारा अपने आप से विश्वास उठ गया है। कभी हमारे बुर्जुग कहते थे कि कई बार आंखों देखी भी सच नहीं हुआ करती थी लेकिन अविश्वास की आंखें बन चुका यह यंत्र जो दिखाता है, वही सच है। यह सच इतना बड़ा और पक्का है कि लगता है कि मैं वापस अपने गांव की तरफ लौट जाऊं। परचून की दुकान में खड़ा होकर गप्पें हांकू और घर पर बेफिक्र ी के साथ लौट सकूं लेकिन अब लौटना भी मुश्किल लग रहा है, ठीक उसी तरह जिस तरह से आपसी विश्वास कहीं गुम हो गया है।

शनिवार, 5 जुलाई 2014







आज ५ जुलाई २०१४ के प्रभात किरण, इंदौर अंक में प्रकाशित मेरा आर्टिकल 

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

जवाबदारी

सवाल जिम्मेदारी क


-मनोज कुमार
आज के बच्चे हम लोगों की तरह सवाल नहीं करते हैं. वे अपने सवालों के जवाब ढूंढऩे के लिये मां-बाप से पहले इंटरनेट का सहारा लेते हैं. मेरी 14 साल की बिटिया भी इन बच्चों से अलग नहीं है लेकिन मैंने अपने परिवार का जो ताना-बाना बुन रखा है, उसमें इंटरनेट को ज्यादा स्पेस नहीं मिल पाता है और वह अक्सर मुझसे ही सवाल करती है. यह सवाल थोड़ा मेरे लिये कठिन था लेकिन सोचने के लिये मजबूर कर गया. भारत रत्न सचिन तेंदुलकर को एक व्यवसायिक विज्ञापन करते देख उसने पूछ लिया कि पापा, ऐसे में तो इस प्रोडक्ट की सेल तो अधिक होगी क्योंकि इसका विज्ञापन सचिन कर रहे हैं. मैंने कहा, हां, यह संभव है तो अब उसका दूसरा सवाल था कि भारत रत्न होने के बाद भी सचिन क्या ऐसा विज्ञापन कर सकते हैं? यह सवाल गंभीर था. कुछ देर के लिये मैं भी सोच में पड़ गया. फिर बिटिया से कहा कि ऐसा नहीं किया जाना चाहिए. लेकिन क्यों? बिटिया के इस पूरक प्रश्र ने मुझे उलझा दिया. मैंने कहा कि सचिन जैसे लोग हमारे आदर्श होते हैं. वे जैसा करते हैं, समाज उसका अनुसरण करता है. यह ठीक है कि सचिन जिस प्रोडक्ट का विज्ञापन कर रहे हैं, वह गुणवत्तापूर्ण हो लेकिन इस बात की गारंटी स्वयं सचिन भी नहीं दे सकते हैं. ऐसे में उन्हें अब इस तरह के व्यवसायिक विज्ञापनों से स्वयं को परे रखना चाहिये. 

     बिटिया को मैं कितना समझा पाया या नहीं, मैं नहीं जानता लेकिन उसका यह सवाल पूरे समाज के लिये है. श्रीराम भगवान इसलिये कहलाये कि वे समाज के सवालों के सामने अपने व्यक्तिगत जीवन की भी परीक्षा ले ली तो महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता इसलिये कहा गया कि उनके कथ्य और कर्म में कोई अंतर नहीं था. वे सार्वजनिक जीवन में लोगों से अपेक्षा करने से पहले स्वयं उस पर अमल किया करते थे. आज सौ-डेढ़ सौ वर्ष बाद भी महात्मा गांधी पूरे संसार के लिये मिसाल बने हुये हैं. हजारों-लाखों साल बाद भी भगवान श्रीराम को हम आदर्श एवं चरित्रवान व्यक्तित्व के रूप में पहचानते हैं. यह ठीक है कि वह समय नहीं रहा लेकिन आदर्श व्यक्तित्व और उसके अनुगामी लोग तो हर काल और स्थिति में होते रहे हैं. सचिन महान क्रिकेटर हैं और उन्होंने अपनी प्रतिभा के बूते भारत को नयी पहचान दी. भारत ने भी उनकी प्रतिभा का सम्मान किया और उन्हें श्रेष्ठ सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया. अब सचिन की जवाबदारी है कि वह व्यवसायिकता से स्वयं को मुक्त करें और व्यवसायिक विज्ञापनों से स्वयं को परे कर लें. उनके इस एक फैसले से उनके प्रति लोगों का जो सम्मान का भाव है, वह और भी बढ़ेगा. ऐसा करना सचिन की मजबूरी नहीं बल्कि देश के प्रति जवाबदारी होगी क्योंकि सचिन के बारे में आज मेरी बिटिया ने सवाल किया है तो जाने कितने घरों में यह सवाल किये जा रहे होंगे.

    बहरहाल, भारत रत्न हो या पद्यविभूषण, पद्यश्री या अन्य कोई अलंकरण, यह सब सम्मान व्यक्ति की श्रेष्ठता के लिये दिये जाते हैं किन्तु यह सम्मान प्राप्त कर लेने के बाद सम्मानित व्यक्ति समाज के लिये रोल मॉडल बन जाता है. उसके कर्म और कथ्य से ऐेसी अपेक्षा की जाती है कि समाज उसका अनुसरण कर स्वयं को आदर्श बनाये. एक उदाहरण हमारे सामने सदी के नायक अमिताभ बच्चन का है. अमिताभ नायकत्व से बाहर निकल कर देश के अनेक परिवारों में बतौर बुर्जुग प्रवेश कर गये हैं. इन दिनों वे विनम्रता का जो एक नयी मिसाल समाज के सामने पेश कर रहे हैं, उससे उनके सम्मान में वृद्धि हो रही है. उन्हें भी इस बात का खयाल रखना चाहिये कि वे जिस तरफ चल पड़ेंगे, लाखों की संख्या में लोग उनके साथ हो लेंगे. संभव है कि किसी विज्ञापन से उन्हें लाखों का लाभ हो जाए लेकिन समाज का विश्वास दरकेगा तो उन्हें जो नुकसान होगा, उसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है. भरोसा समाज की सम्पत्ति है और इसी भरोसे को हम समाज का रोल मॉडल अर्थात आदर्श कहते हैं. स्मरण हो आता है कि अंग्रेजों से लड़ते समय महात्मा गांधी ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का अभियान चलाया तो देशभक्तों ने अपने अपने घरों से कपड़े निकाल कर आग के हवाले कर दिया. यह महात्मा गांधी के प्रति विश्वास था कि लोगों ने ऐसा किया. आज भी अपने आदर्श व्यक्तित्व के प्रति यह विश्वास बना हुआ है. जरूरी है कि सचिन हों या अमिताभ और भी वे सारे लोग जिन्हें समाज अपना आदर्श मानता है ये सब अपनी जवाबदारी समझें और समाज के भरोसे पर खरा उतरें ताकि सौ साल बाद भी लोग इनके कर्म और कथ्य का अनुसरण कर सकें. 


बुधवार, 25 जून 2014

सपनों से परे


मनोज कुमार

एक अबोध मन की कल्पना इस दुनिया की सबसे सुंदर रचना होती है। कभी किसी छोटे से बच्चे की निहारिये। वह सबसे बेखबर अपनी ही दुनिया में खोया होता है। जाने वह क्या देखता है। अनायास कभी वह मुस्करा देता है तो कभी भयभीत हो जाता है। कभी खुद से बात करने की कोशिश करता है तो कभी वह सोच की मुद्रा में पड़ जाता है। तब उन्हें यह नहीं पता होता था कि हाथी किस तरह का होता है या शेर कभी हमला भी कर सकता है। चिडिय़ों की चहचहाट उनका मन मोह लेती है तो बंदर का उलछकूद उसके लिये एक खेल होता था। सच से परे वह अपनी दुनिया खुद बुनता है। शायद इसलिये ही हमारे समाज में बच्चों के खेल खिलौनों का आविष्कार हुआ। बंदर से लेकर चिडिय़ा और गुड्डे गुडिय़ा ले कर घर-गृहस्थी के सामान बच्चों के खेल में शामिल होता था। नन्हें बच्चे का आहिस्ता आहिस्ता दुनिया से परिचय होता था। यह वह समय था जब मां बाप के पास भी समय होता था। वे अपने बच्चों को बढ़ता देखकर प्रसन्न होते थे। यह वही समय होता था जब मां लोरी सुनाकर बच्चों को थपथपा कर स्नेहपूर्वक नींद के आगोश में भेज देती थी। शायद इसी समय से शुरू होता था मां का स्कूल। इस स्कूल में मां का स्नेह तो था ही, संस्कार का सबक भी बच्चा यहीं से सीखता था। बड़ों का सम्मान करना, छोटों से प्यार। यह वही समय था जब गणेश चतुर्थी से मकर संक्रात, होली, दीवाली और दशहरा मनाने के कारणों से बच्चा संस्कारित होता था। वह रंगों का मतलब जानता था। पतंग की डोर से वह जीत की सीख लेता था। इस जीत की सीख में उसके पास संस्कार थे। वह जीतना चाहता था लेकिन किसी की पराजय उसका लक्ष्य नहीं होता था। 

स्वप्र लोक में बच्चों के विचरने के दिन अब गुम हो गये हैं।  अब न वह समय बचा और न सपने। अब बच्चे वयस्क पैदा होते हैं। मां बाप के पास वक्त नहीं है। अब उन्हें कोई नहीं सिखाता है कि ह से हाथी और ग से गणेश होता है। वे जानते हैं कि एलीफेंट किसे कहते हैं। बंदर मामा की कहानी उसे पता नहीं है लेकिन मंकी से वह बेखबर भी नहीं है। गणेश चतुर्थी पर ग्यारह दिनों तक पूजन करना उसे वैसा ही समय व्यर्थ करना लगता है जैसा कि घंटों मेहनत कर पतंग उड़ाना। दीवाली पर फूटने वाले फटाकों को वह पर्यावरण दूषित करना कहता है लेकिन एके-47 जैसे घातक हथियारों के मोहपाश में बंधा है। बंदूक उसे जीवन रक्षक लगता है। बच्चे का टेलीविजन के पर्दे पर उतरने वाले रंगों की तरह रंगा हुआ है लेकिन होली के रंगों से उसे एलर्जी है। इस समय का बच्चा इंटलीजेंट है। वह आइपेड से खेलता है और कॉमिक वाले सीरियल देखता है। उसे अब सपने नहीं आते। वह एनीमेटेड कैरेक्टर्स को देखकर उन्हें ही जीने लगता है। इन कैरेक्टर्स में भी विलेन उसका प्रिय पात्र होता है। बच्चे की बोलचाल और उसका व्यवहार खली की तरह होता है, दारासिंह की तरह नहीं। आज का बच्चा जल्दी में है। वह थोड़े समय में सबकुछ पा लेना चाहता है। जीत जाना उसका एकमात्र ध्येय है। पराजय उसे नापसंद है। वह दूसरों को पराजित होता देख आनंद से भर उठता है। एक खलनायक उसके भीतर पनप रहा है। 

यह इस समय का कडुवा सच है। मां-बाप धन कमाने की मशीन बन गये हैं। वे अपने बच्चों को शीर्ष पर देखने के लिये दीवानों की तरह पैसे कमाने में जुट गये हैं। उन्होंने अपने सपनों को भी मार दिया है। बच्चों को शीर्ष पर तो पहुंचाना चाहते हैं लेकिन वे इस बात से बेखबर हैं कि उनके बच्चे के पैरों के नीचे से जमीन खिसक रही है। उनके पास संस्कार नहीं हैं। एक संस्कारहीन बच्चा कामयाब तो हो सकता है लेकिन यह कामयाबी उसे इंसान नहीं बना पायेगी। मां-बाप के पास अब बच्चे को लोरी सुनाकर थपथपा कर सुलाने का वक्त नहीं है। बच्चे की जिद के आगे कान की नसों को फाड़ते बेसुरे गीत लगा देते हैं। बच्चा उसी में रम जाता है। उसका भविष्य भी इसी तरह बेसुरा हो रहा है। मां-बाप के पास बच्चों को सुनाने के लिये कहानी नहीं है। एकल परिवार के चलते दादा-दादी और नाना-नानी तो पहले ही गुम हो चुके हैं। 

अब बच्चों को खाने में दुध-भात नहीं दिया जाता बल्कि अब उनके खाने के लिये मैगी या ऐसा ही कोई फास्टफूड है। बच्चों की जरूरत का हर जवाब मां-बाप के पास पैसा है। पैसों से खरीदने की ताकत तो मां-बाप बच्चों को दे रहे हैं लेकिन जीने की ताकत जिस संस्कार से आता है, उससे खुद मां-बाप दूर हो रहे हैं। यह समय बेहद डराने वाला है। इस समय ने बच्चों के सपनों को गुमशुदा कर दिया है। वे कल्पना के बिना जी रहे हैं। उनमें जिज्ञासा नहीं बची है। बची है तो जीत लेने की होड़। जीत और हार के बीच धीमे-धीमे बड़े होते इन बच्चों को कौन वापस ले जाएगा उनके सपनों की दुनिया में, यह सवाल जवाब की प्रतीक्षा में है। कहते हैं सपनों का मर जाना सबसे बुरा होता है और हम इस बुरे समय के साक्षी बनने लिये कहीं मजबूर हैं तो कहीं हम खुद होकर बच्चों के सपनों का कत्ल कर रहे हैं।

रविवार, 18 मई 2014

संडे स्पेशल...

हिन्दी पत्रकारिता दिवस 30 मई पर


-मनोज कुमार
संडे स्पेशल शीर्षक देखकर आपके मन में गुदगुदी होना स्वाभाविक है। संडे यानि इतवार और स्पेशल मतलब खास यानि इतवार के दिन कुछ खास और इस खास से सीधा मतलब खाने से होता है लेकिन इन दिनों मीडिया में संडे स्पेशल का चलन शुरू हो गया है। संडे स्पेशल स्टोरी इस तरह प्रस्तुत की जाती है मानो पाठकों को खबर या रिपोर्ट पढऩे के लिये न देकर खाने के लिये कह रहे हों। हिन्दी पत्रकारिता के सवा दो सौ साल के सफर में हिन्दी और समृद्ध होने के बजाय कंगाल होती चली जा रही है। हर साल 30 मई को जब हम हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं तब हमारा सिर गर्व से ऊंचा नहीं होता है बल्कि हम अपनी करतूतों से स्वयं को छिपाने का भरसक यत्न करते हैं। हिन्दी के साथ जो ज्यादती हम लगातार कर रहे हैं, वह हमें आत्ममुग्ध तो कर ही नहीं सकता है। हिन्दी के साथ अंग्रेजी के घालमेल पर तर्क और कुतर्क दोनों हो सकते हैं लेकिन इस घालमेल पर तर्क कम और कुतर्क अधिक होगा। कुतर्क के रूप में यह बात रखी जाती है कि आज का पाठक हिन्दी नहीं समझता है और इससे आगे जाकर कहेगा कि स्कूल में पढऩे वाला बच्चा भी अंग्रेजी के अंक समझता है। उसे उनसठ कहा जाये तो उसके समझ से परे होगा लेकिन फिफ्टी नाइन कहा जाये तो वह समझ जाएगा। यह बात सही है लेकिन इसके लिये दोषी कौन है? बच्चा या हम और आप? अंग्रेजी शिक्षा पाये, इससे किसी को क्या एतराज हो सकता है लेकिन अपनी भाषा भूल जाए, यह तो एतराज की बात है ही। यहीं से हिन्दी की चुनौती शुरू होती है और हर दिन, हर पल हिन्दी के लिये चुनौती भरा होता है। 

मीडिया ने भाषा का मटियामेट किया है, इस बात से कौन इंकार कर सकता है। खासतौर पर इसके लिये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पूरी तरह दोषी है। यह माध्यम भाषा के नाम पर न केवल कंगाल है बल्कि दरिद्र भी। टेलीविजन के पर्दे पर जब रिपोर्ट की जाती है, साक्षात्कार होता है, परिचर्चा में समन्वयक की भूमिका निभा रहे उद्घोषक के उच्चारण को देखें तो सिर पीट लेने की इच्छा होती है। यह माध्यम स्वयं को हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान की पत्रकारिता से परे स्वयं को देखता है और वह अपने को विश्व ग्राम में पाता है। इंटरनेट के विस्तार के साथ ग्लोबल विलेज की अवधारणा प्रतिपादित की गई। अब यहां भी देखिये कि विश्व ग्राम अथवा ग्लोबल विलेज अर्थात गांव यहां भी केन्द्र में है। ऐसे में यह बात ध्यान में रखना होगा कि भारत गांवों का देश है और इस देश की भाषा अंग्रेजी हो नहीं सकती। विश्व ग्राम की कल्पना कर लें और उसका हिस्सा भी बन जायें लेकिन भारत ग्राम को भूल कर हम किसी भी कीमत पर विकास नहीं कर सकते हैं। 

मुद्रित माध्यम का अपना स्वर्णिम इतिहास है और हम गर्व कर सकते हैं कि भारत को स्वाधीनता दिलाने में इस माध्यम का सबसे अहम योगदान रहा लेकिन आज दुर्र्र्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हम अपने ही स्वर्णिम इतिहास से स्वयं को दूर कर रहे हैं। हमें अपनी भाषा-बोली की ताकत का अंदाज ही नहीं है और हम अंग्रेजियत का अंधानुकरण कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खिचड़ी भाषा का हम अनुसरण कर रहे हैं। मुझे तब इस बात का दुख ज्यादा होता है जब मैं पाता हूं कि अच्छे स्कॉलर भी हिन्दी से स्वयं को दूर रख रहे हैं। शोध पत्रिका समागम का सम्पादन करते हुये बार बार इस बात की पीड़ा होती है जब स्कॉलर मीडिया के आलेख में खबरों को परोसा जाना जैसे वाक्य का उपयोग करते हैं। क्या खबर कोई भोज्य पदार्थ है जिसे परोसा जा रहा है? इस तरह फलां समाचार पत्र निकलते हैं जैसे वाक्य भी स्कॉलर की समझ पर सवालिया निशान लगाते हैं। समाचार पत्र निकलता नहीं है बल्कि वह प्रकाशित होता है और खबरें परोसी नहीं जाती है बल्कि उसकी प्रस्तुति होती है। अंधानुकरण का आलम यह हो गया है कि सौ शब्दों के वाक्य में 40 से 50 शब्द अंग्रेजी के होते हैं जो न केवल खबर के प्रति रूचि को कम करते हैं बल्कि समाचार पत्र की गरिमा भी प्रभावित होती है।

पत्रकारिता में भाषा की शुद्धता पहली शर्त होती है। यह स्मरण रखा जाना चाहिये कि समाचार पत्र समाज के लिये एक नि:शुल्क पाठशाला होती है। समाचार पत्रों के माध्यम से हर उम्र वर्ग के लोग अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैं। मेरे हमउम्र अनेक लोग होंगे जो भिनसारे से समाचार पत्र आने की प्रतीक्षा करते थे और समाचार पत्र आते ही उसमें छपे शीर्षक को पढक़र सीखते थे। मैं तब से लेकर अब तक समाचार पत्रों को पढक़र अपने शब्द भंडार को समृद्ध कर रहा हूं लेकिन आज के समाचार पत्रों में जिस तरह की भाषा का उपयोग हो रहा है, वह सिखाने के बजाय जो आता है, उसे भी दूषित कर रही हैं। मैं इस बात को निरपेक्ष रूप से कह सकता हूं कि इस घालमेल के दौर में हिन्दी के लिये जनसत्ता हमारे बीच शेष रह गया है। प्रभाष जोशी जी ने जो भाषा और बोली के प्रति चेतना जागृत करने का अभियान चलाया, जो परम्परा डाली, आज उसके बूते हिन्दी पत्रकारिता में जनसत्ता का विशेष स्थान है। ऐसा नहीं है कि अन्य हिन्दी के समाचार पत्र भाषा के मामले में नकारा हो गये हैं लेकिन उनका अंग्रेजी प्रेम उनके लिये बाधक है, इस बात को मानना ही होगा। 

अपनी ही भाषा-बोली से परहेज करती हिन्दी पत्रकारिता के लिये पत्रकारिता की नवागत पीढ़ी दोषी नहीं है बल्कि यह दोष हिन्दी पत्रकारिता के उन मठाधीशों का है जिन्होंने अपनी जवाबदारी और जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया। इन मठाधीशों का भाव हमेशा से चलेगा का, रहा। वे स्वयं भाषा-बोली के मामले में दरिद्र रहे इसलिये भी हिन्दी पत्रकारिता आज अपनी ही भाषा-बोली से परहेज करती दिख रही है। यदि ऐसा नहीं होता तो अंग्रेजी के पत्रकार राजेन्द्र माथुर हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधा के रूप में याद नहीं किये जाते। सब जानते हैं कि हिन्दी पत्रकारिता के यशस्वी हस्ताक्षर राजेन्द्र माथुर अंग्रेजी के मझे हुये पत्रकार थे लेकिन उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को समृद्ध किया। श्री माथुर की पत्रकारिता का आरंभ एक हिन्दी दैनिक से होता है और वे जानते थे कि अपनी बात भारत की असंख्य जनता तक पहुंचाने का माध्यम केवल हिन्दी है और वे आम आदमी के पत्रकार और सम्पादक बनकर हिन्दी पत्रकारिता में स्थापित हुये।   

मैं इस बात से भी इत्तेफाक रखता हूं कि अंग्रेजी के जो शब्द चलन में आ गये हैं, उनका उपयोग किया जाना चाहिये। जैसे कि ट्रेन, सिगरेट, मोबाइल, कम्प्यूटर, कलेक्टर, कमिश्रर आदि-इत्यादि लेकिन संडे स्पेशल, इम्पेक्ट, सटरडे, वीकएंड, सिटी फ्रंं ट पेज जैसे शब्दों के उपयोग से परहेज किया जाना नितांत आवश्यक प्रतीत होता है। हिन्दी पत्रकारिता की भाषा को मटियामेट करने में बाजार एक बड़ा कारण है। जिस तरह से बाजार कहता है और हम उसके अनुगामी बन जाते हैं। दिवस शब्द हमारे शब्दकोश से गुम हो गया है, डे पर हमारी निर्भरता बढ़ गयी है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि हिन्दी डे और हिन्दी वीक मनाते हैं। हिन्दी मंथ भी चलन में है। भाषा की यह दुर्दशा हमारे लिये दुर्भाग्य की बात ही कही जाएगी। बाजार के हाथों में खेलती पत्रकारिता अब सरोकार नहीं, स्वार्थ की पत्रकारिता बनती जा रही है। पत्रकारिता से हटकर वह मीडिया बन गयी है। हिन्दी भाषा और बोली इतनी समृद्ध है कि इनके उपयोग से हम और भी धनवान हो जाते हैं। प्रभाष जी ने कृषक के स्थान पर किसान और गृह के स्थान पर घर जैसे सरल और मीठे शब्दों के उपयोग पर बल दिया था। ऐसे असंख्य शब्द हैं जिनके उपयोग से हिन्दी पत्रकारिता का वैभव बढ़ेगा लेकिन ऐसा नहीं किया गया और विदेशी भाषा का अंधानुकरण किया गया तो हम केवल हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाने की औपचारिकता पूर्ण करते रहेंगे।
(टिप्पणीकार मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका समागम के सम्पादक हैं)