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बुद्ध चुनें या युद्ध?

-मनोज कुमार      एक बार फिर हम अधर्म पर धर्म की जीत का उत्सव मनाने की तैयारियों में जुट गए हैं. बुराईयों पर अच्छाई की जीत का पर्व सदियों से मनाते चले आए हैं लेकिन ऐसा क्या है कि ये बुराई कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है? मैं सोचता था कि कभी कोई साल ऐसा भी आएगा जब हम अच्छाईयों का पर्व मनाएंगे. विजय का पर्व होगा. किसी की पराजय की चर्चा तक नहीं करेंगे, पराजित करना तो दूर रहा लेकिन आखिर वह साल अब तक मेरे जीवन में नहीं आया है. इसके बावजूद मैं निराश नहीं हूं. हताश भी नहीं हूंं क्योंकि मुझे लगता है कि एक दिन वह साल भी आएगा जब हम अच्छाई का पर्व मना रहे होंगे. इस अवसर का दीप जला रहे होंगे. सवाल यह है कि सदियां गुजर जाने के बाद भी जब यह संभव नहीं हो पाया तो यह होगा कैसे? मुझे लगता है कि इसमें मुश्किल कुछ भी नहीं है. बस, थोड़ा सा दृष्टि और थोड़ी सी सोच बदलने की जरूरत है. अब तक हम जय बोलते आए हैं और बुराई को पराजित कर उत्सव में मगन हो गए हैं. क्यों ना हम किसी को पराजित करने के बजाय हम उस बुराई की जड़ को ढूंढऩे की कोशिश करें जिसकी वजह से हर बार वह पराजित तो होता है लेकिन अपनी बेलें कहीं छोड़ ज…

तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है

मनोज कुमार
     इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो और खुद को बचा ले जाओ। इक्का-दुक्का अखबार और पत्रिकाओं को छोड़ दें तो लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में ‘‘टेग लाइन‘‘होती है- ‘‘यह लेखक के निजी विचार हैं। सम्पादक की सहमति अनिवार्य नहीं।‘‘इस टेग लाइन से यह बात तो साफ हो जाती है कि जो कुछ भी छप रहा है, वह सम्पादक की सहमति के बिना है। लेकिन छप रहा है तो सहमति किसकी हैलेखक अपने लिखे की जवाबदारी से बच नहीं सकता लेकिन प्रकाषन की जवाबदारी किसकी है? सम्पादक ने तो किनारा कर लिया और लेखक पर जवाबदारी डाल दी। ऐसे में यह प्रश्न उलझन भरा है और घूम-फिर कर बात का लब्बोलुआब इस बात पर है कि प्रकाशनों को अब सम्पादक की जरूरत ही नहीं है और जो परिस्थितियां हैं,वह इस बात की हामी भी है। इस ‘‘टेग लाइन‘‘वाली पत्रकारिता से हम टेलीविजन की पत्रकारिता को सौफीसदी बरी करते हैं क्योंकि यहां सम्पादक नाम की कोई संस्था होती है य…

हिन्दी किसके लिए ?

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अंग्रेजी के मोहपाश से आखिर कब मुक्त होंगे?

-अनामिका एक के बाद एक वर्ष गुजरते जा रहे हैं और देखते ही देखते लगभग 70 वर्ष गुजर गए लेकिन भारतीय समाज अंग्रेजी के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पाया है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलाने की जितनी पुरजोर कोशिश की जा रही है, अंग्रेजी का वर्चस्व उतना ही बढ़ रहा है। कभी अंग्रेजों पर फ्रेंच ने राज किया था और अंग्रेजी भाषा को दरकिनार कर दिया था लेकिन फ्रेंच शासन से मुक्त होने के बाद अंग्रेजी को पूरी ताकत के साथ वापस उसका सम्मान दिलाया गया। किन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है कि जिन अंग्रेजों के हम अनुगामी बने हुए हैं, उनसे यह नहीं सीख पाये कि कैसे हम अपनी मातृभाषा, राष्ट्रभाषा हिन्दी को उसका सम्मानजनक स्थान दिलायें। यह तथ्य सर्वविदित है कि हिन्दी दुनिया में सर्वाधिक बोली जाती है, पढ़ाई जा रही है लेकिन भारत में अंग्रेजी का वर्चस्व इन उपलब्धियों पर पानी फेर देता है। इस बार 14 सितम्बर को फिर एक दिन, एक सप्ताह तथा एक माह का हिन्दी के नाम होगा और इसके बाद हम वापस अंग्रेजी की कक्षा में चले जाएंगे। हिन्दी भाषा को हमारी सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक चेतना, हमारी भारतीयता, हमारी सभ्यता, हमारा साहित्य,…

स्वरोजगार बनाम स्टार्टअप

मनोज कुमार लम्बे सफर के बाद जब आप अपनी मंजिल तक पहुंचने वाले होते हैं तब रेल्वे स्टेशन पर सहसा आपकी नजरें कुली को ढूंढने लगती थी. कोई कुली लपक कर आता और आपके बोझ को अपने कंधों पर उठाकर रेल्वे स्टेशन से बाहर छोड़ आता था. लेकिन अब ऐसा नहीं होता है. अब आप कुली को नहीं ढूंढते हैं और रेल्वे स्टेशन पर कुली भी आपको नहीं मिलता है. समय बदल गया है. चुपके से आप यात्री के साथ साथ स्वयं भी कुली बन गए हैं, यह खबर स्वयं को नहीं हो पायी है. जब आप सफर के लिए सूटकेस खरीदने जाते हैं तो और खासियतों के साथ दुकानदार आपको बताता है कि इस सूटकेस के  पहिए घुमावदार और मजबूत है. आपको सामान ले जाने में दिक्कत नहीं होगी. तब वह आपको अपरोक्ष रूप से बता देता है कि कुली के तौर पर आप अपना भार स्वयं उठाने के लिए तैयार हैं. हमें भी लगता है कि कोई सौ-पचास रुपये बचाकर हमने बड़ा काम कर लिया है लेकिन यह भूल जाते हैं कि ऐसा करके हमने एक आदमी का रोजगार छीन लिया है. हमारे बोझ को उठाकर हमें राहत देता था तो हमें मिलने वाली राहत से उसके घर का चूल्हा जलता था. हम बेखबर रहे और हमारी वजह से कई घरों के चूल्हे बुझने लगे. कुछ लोग शायद म…

यह जश्र आम आदमी के भरोसे का है

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मनोज कुमार किसी भी राज्य के समग्र विकास के लिए स्थायीत्व पहली शर्त होती है. सरकारों का चुन जाना और थोड़े समय में सत्ता में फेरबदल से विकास न केवल प्रभावित होता है बल्कि आम आदमी में निराशा का भाव भी उत्पन्न होता है. यही कारण है कि इस बार निर्वाचित सरकार को अगली बार निर्वाचित होने में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इस मामले में छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने आम आदमी को भरोसा दिलाया है कि राज्य के समग्र विकास के लिए स्थायी सरकार बनी रहेगी. रमन सरकार के 5000 दिनों का कार्यकाल पूर्ण होने को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए. साल 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य का दर्जा मिला और पहली बार बहुमत के आधार पर कांग्रेस ने अपनी सरकार बनायी. तीन वर्षों में कांग्रेस की सरकार के प्रदर्शन को, उसके विकास कार्यक्रमों को और कांग्रेस से उपजी निराशा ने भाजपा को अवसर दिया. भाजपा ने स्वच्छ छवि वाले केन्द्र में राज्यमंत्री रहे डॉ. रमनसिंह को राज्य की बागडोर सम्हालने की जिम्मेदारी सौंपी. मृदुभाषी, समन्वय के पक्षधर और राज्य के विकास के लिए स्वयं को झोंकने वाले डॉ. रमनसिंह ने छत्तीसगढ़…

अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ संस्थान में आवश्यकता

शीघ्र शुरू होने जा रहे अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ संस्थान (ANS) को अपनी हिंदी और अंग्रेजी भाषा की वेबसाइट्स हेतु ट्रेनी, सब-एडिटर, फोटो एडिटर, सोशल मीडिया एडिटर की आवश्यकता है। बता दें कि एएनएस की निकट भविष्य की यह योजना है कि देश के अग्रणी 15 भाषाओं में कई न्यूज़ पोर्टल शुरू किया जाए। फिलहाल हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं में न्यूज वेबसाइट तैयार है जिसके लिए संस्थान को तेज-तर्रार पत्रकारों की आवश्यकता है। ऐसे पत्रकार जिन्हें अपनी लेखनी पर भरोसा है, जिन्हें कंटेंट पर अच्छी पकड़ है,पत्रकारिता क्षेत्र में डिग्री के साथ-साथ अनुभव रहा है, ऐसे पत्रकारों को प्राथमिकतास्वरूप अवसर प्रदान किया जाएगा। पत्रकारिता में डिप्लोमा/ स्नातक / परास्नातक (या समकक्ष) की डिग्री रखने वाले उपयुक्त उम्मीदवार इसके लिए आवेदन कर सकते हैं । ज्ञात रहे उम्मीदवारों की हिन्दी टाइपिंग स्पीड ठीक हो और हिंदी से अंग्रेजी या अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद आसानी से कर लेते हों । ऐसे तो सामान्यत: २ वर्षों का अनुभव माँगा गया है, लेकिन जो नावांतुक पत्रकार हैं उन्हें उनके द्वारा लिखे हुए समाचार / लेख / ब्लॉग / पोस्ट का लिंक या उसकी प्रति माँगा ग…