शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

जल परम्परा और बाजार


मनोज कुमार
एक समय था जब आप सफर पर हैं तो पांच-दस गज की दूरी पर लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा आपकी खातिरदारी के लिए तैयार मिलेगा. पानी के घड़े के पास जाते हुए मन को वैसी ही शीतलता मिलती थी, जैसे उस घड़े का पानी लेकिन इस पाऊच की दुनिया में मन पहले ही कसैला हो जाता है. आज समय बदल गया है. जेब में दो-दो रुपये के सिक्के रखिये और किसी दुकानदार से पानी का पाऊच मांगिये. पानी का यह पाऊच आपकी प्यास तो थोड़ी देर के लिए शांत कर सकता है लेकिन मन को शीतलता नहीं दे सकता है. आखिर ऐसा क्या हुआ और क्यों हुआ कि हमने अपने आपसे इस घड़े को परे कर दिया है? पानी का यह घड़ा न तो पर्यावरण को प्रदूषित करता था और न ही शरीर को किसी तरह का नुकसान पहुंचाता था. देखते ही मन को भीतर ही भीतर जो खुशी मिलती थी, वह कहीं गुम हो गई है, उसी तरह जिस तरह लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा लगभग गुम हो गया है. 
इस घड़े का गुम होते जाना, सिर्फ एक घड़े का गुम हो जाना नहीं है बल्कि एक संस्कार का और परम्परा का गुम हो जाना है. जो लोग इस बात को तो हवा दे रहे हैं कि अबकी विश्व युद्ध पानी को लेकर होगा, क्या वे लोग इस घड़े को बचाने में अपना कोई योगदान दे रहे हैं? ऐसे लोग एक माहौल क्रियेट करते हैं और लोगों के मन में डर पैदा करते हैं. यह डर अकारण नहीं है बल्कि बाजार का दबाव उन्हें इस सुनियोजित साजिश का हिस्सा बनाता है. सवाल यह है कि अनुपम मिश्र की तरह आप तालाब आज भी खरे हैं कि तर्ज पर पानी की चिंता क्यों नहीं करते हैं? क्यों जलस्रोतों को बचाने की मुहिम में हिस्सेदार नहीं बनते हैं? मॉल और बड़ी बिल्डिंगों के नीचे कराहते हमारे जलस्रोत अपने को बचा लेने की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन हम उन्हें अनसुनी कर आगे बढ़ लेते हैं.
अभी सूरज की तपिश बढ़ी नहीं है लेकिन हौले-हौले उसकी गर्मी का अहसास होने लगा है और इसी अहसास के साथ पानी का संकट बढऩे लगा है. पानी का यह संकट लोगों के चेहरे से ‘पानी’ उतार रहा है. एक मटका पानी के लिए पिछले सालों में कई जानों पर बन आयी थी. पानी के लिए पानी-पानी होते लोगों का यह नया व्यवहार अब नया नहीं रहा. साहबों की गाडिय़ों की धुलाई में अनगित लीटर पानी का खर्च और निचली बस्तियों में रहने वाले एक गरीब के बर्तन से गायब होता पानी आज का सच है. पानी का कम होते जाना एक बड़ा संकट है किन्तु संकट इससे भी बड़ा यह है कि हम आज तक पानी के जतन के लिए जाग नहीं पाये हैं. लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा भारतीय समाज की जरूरत ही नहीं बल्कि संस्कार है. यहीं से यह संस्कार पानी के जतन की शिक्षा देता है. जरूरी है कि छोटे-छोटे प्रयासों से पानी को जीवन दें, लाल कपड़े में लिपटे पानी के घड़े को दिखने दें. ऐसा नहीं किया तो पानी के फेर में अब किसी के चेहरे पर ‘पानी’ नहीं रह जाएगा. तब कैसे कहेंगे पानीदार समाज?
भारत गांवों का देश रहा है और अभी भी भारत ग्रामीण परिवेश में ही जीता है। ग्रामीण परिवेश का सीधा सा अर्थ है एक बंधी-बंधायी परम्परा की जीवन शैली। इस परम्परागत जीवनशैली को करीब से देखेंगे तो आप यह जान पायेंगे कि वे शहरी जीवनशैली से कहीं अधिक समृद्ध हैं। वे बाजार के मोहताज नहीं हैं बल्कि वे अपनी परम्परा को बाजार से एकदम परे रखे हुये हैं और यही कारण है कि अनेक किस्म की समस्याओं के बावजूद उनका जीवन तनावपूर्ण नहीं है। जहां तक जल संरक्षण की चर्चा करते हैं तो सर्वाधिक जल स्रोत ग्रामीण क्षेत्रों में ही मिलेंगे। पानी उनके लिये उपयोग की वस्तु नहीं है बल्कि पानी उनके लिये जल-देवता है और वे उसका जीवन जीने के लिये उपयोग करते हैं न कि उसका दुरूपयोग। ग्रामीण परिवेश में जीने वाले अधिसंख्य लोग अपनी किसी उपलब्धि पर आयोजन में खर्च नहीं करते हैं बल्कि पानी के नये स्रोत बनाने के लिये करते हैं। पुराने जल स्रोतों के नाम देख्ेंगे तो आपको किसी न किसी पुराने परिवार के सदस्यों के नाम का उल्लेख मिलेगा। सेठानी घाट कहां है, यह आप से पूछा जाये तो आप हैरानी में पडऩे के बजाय नर्मदाजी के नाम का उल्लेख करेंगे क्योंकि यह सेठानी घाट प्रतीक है उस जलसंरक्षण की परम्परा का जहां बिटिया का ब्याह हो, घर में नया सदस्य आया हो या किसी ऐसे अवसर को परम्परा के साथ जोडक़र जलस्रोतों का निर्माण किया जाता रहा है। गांवों से निकलकर जब हम कस्बों की तरफ बढ़ते हैं तो यहां भी जल संरक्षण परम्परा का निर्वाह करते हुये लोग दिख जाते हैं। जिन पुरातन जल स्रोतों में गाद भर गयी है अथवा उसके जीर्णोद्धार की जरूरत होती है तो लोग स्वयमेव होकर श्रमदान करते हैं। इन श्रमदानियों में कस्बे का आम आदमी तो होता ही है अपितु बुद्धिजीवी वर्ग जिसमें शिक्षक, पत्रकार, समाजसेवी आदि-इत्यादि सभी का सहयोग मिलता है। यह है भारतीय जल संरक्षण की पुरातन परम्परा।

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

‘सेल्यूलॉयड मैन’ पीके नायर को याद करते हुए

जन्मदिन 6 अप्रेल पर विशेष

-मनोज कुमार
50 साल पहले  लगभग-लगभग 32-35 साल का एक युवा बनाना तो फिल्में था लेकिन उसकी रूचि सिनेमा के इतिहास को संजोने की हुई. एक बड़े सपने को लेकर छोटी सी कोशिश करने वाले परमेश कृष्णनन नायर ने अपने हौसले से एक ऐसे संग्रहालय गढ़ दिया जिसे आज हम नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया के नाम से जानते हैं. आज 6 अप्रेल है और नायर साहब आज हमारे साथ होते तो 82 साल पार कर चुके होते लेकिन पिछले मार्च महीने उनकी सांसों का हिसाब-किताब ईश्वर के खाते में हो गया. यह सच है कि नायर साहब आज हमारे साथ नहीं हैं लेकिन उन्होंने जो काम किया, वह कभी खत्म नहीं होगा. नायर साहब के जन्मदिन के बहाने उन्हें याद करना, उनके द्वारा किये गए कार्य को सलाम करना बनता है. आखिर बार-बार और हर बार ऐसे परमेश कृष्णनन नायर थोड़े ही हमारे बीच आते हैं. नायर साहब का जीवन एनएफएआई में फिल्मों के संरक्षण और संग्रहण के लिए समर्पित रहा। उन्होंने कई ऐतिहासिक भारतीय फिल्मों के संग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    
भारत में सिनेमा के जनक के रूप में दादा साहेब फाल्के की प्रतिष्ठा है. दादा साहेब ने व्यक्तिगत प्रयासों से भारत में सिनेमा की नींव रखी. उनके इस कार्य को लोग आगे बढ़ाते गए और कौडिय़ों से शुरू हुआ भारतीय सिनेमा आज करोड़ों का हो चुका है. भारतीय सिनेमा के बीते सौ साल के इतिहास में अनेक नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं, उनमें एक नाम पी.के. नायर का होगा. नायर उन लोगों में से एक थे जो आज की नहीं कल की सोचते थे और इसी सोच के साथ 1964 में स्वयं के प्रयासों से फिल्म संग्रहालय की बुनियाद रखी जिसे आज हम  नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया के नाम से जानते हैं. नायर एक कुशल निर्देशक भी थे और वे चाहते तो कई पॉपुलर फिल्म निर्माण कर लोकप्रियता हासिल कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. फिल्मों का निर्माण तो उनका शौक था, जिसे वे पूरा करते रहे लेकिन उनकी चिंता सिनेमा की उन भावी पीढिय़ों की थी जो जान सकें कि भारतीय सिनेमा का इतिहास क्या था और आज हम कैसे वहां तक पहुंचे. नायर का यह काम आज एक गाईड, एक मार्गदर्शक के रूप में काम कर रहा है.
भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले ही सिनेमा बनाने की शुरूआत हो चुकी थी. 1912 में भारत की पहली फिल्म ची राजा हरिशचन्द्र का निर्माण दादा साहेब फाल्के ने किया था. तकरीबन दस साल बाद  भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ का निर्माण कर लोगों को चौंका दिया था. समय गुजरने के साथ फिल्म निर्माण की तकनीक में इजाफा होता रहा. आज हम थ्री-डी और फोर-डी तकनीक की सिनेमा का निर्माण कर रहे हैं. यह वही समय था जब भारत में सिनेमा निर्माण कला से उद्योग में बदल रहा था. और यह वही समय था जब सरकार के पास सिनेमा के संरक्षण के लिए कोई बजट और रूचि नहीं थी. सरकार का तब तर्क था कि सिनेमा के अलावा भी देश के विकास में और भी काम हैं. सरकार का रवैया बस कुछ कुछ वैसा ही था कि जब किसी के घर वाले सुनें कि उनकी बच्चा सिनेमा में काम करने जा रहा है तो उपेक्षा के अलावा कुछ हाथ नहीं आता था. ऐसा सबकुछ नायर साहब के साथ भी हुआ। ऐेसे में 50 साल पहले एक युवा परमेश कृष्णनन नायर को एक ऐसे संग्रहालय बनाने की सूझी जहां भारतीय सिनेमा के आरंभ से इतिहास संजोया जाए. काम मुश्किल था लेकिन संकल्प के आगे कुछ भी मुश्किल नहीं होता है सो नायर के संकल्प के आगे सारी चुनौतियां बौनी हो गईं. नायर के प्रयासों के बाद सरकार भी जागी और सिनेमा के संरक्षण संवर्धन की दिशा में आगे आयी.    
तिरुवनंतपुरम में 1933 को जन्मे नायर की 1940 के दशक में पौराणिक धारावाहिकों के साथ उनके करियर की शुरुआत हुई। नायर ने अनंतसयनम और भक्त प्रहलाद जैसे तमिल धारावाहिकों में काम किया। एनएफएल के साथ नायर का कार्यकाल 1965 से सहायक क्यूरेटर के रूप में शुरू हुआ. नायर 1961 में शोध सहायक के रूप में भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान में नियुक्त हुए थे। उन्होंने यहां 1991 तक काम किया। 17 साल बाद 1982 में वह निर्देशक बने। उन्होंने सत्यजित रे, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, वी. शांताराम, राजकपूर और गुरुदत्त जैसे फिल्म निर्देशकों के साथ काम किया। 
एनएफएआई के निदेशक पद से सेवानिवृत्ति तक उन्होंने 12,000 फिल्मों का संग्रहण किया, जिसमें से 8,000 फिल्में भारतीय एवं बाकी विदेशी हैं।  परमेश कृष्णन नायर का जीवन एनएफएआई में फिल्मों के संरक्षण और संग्रहण के लिए समर्पित रहा। उन्होंने कई ऐतिहासिक भारतीय फिल्मों के संग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने दादासाहेब फाल्के की ‘राजा हरिश्चन्द्र’ और ‘कालिया मर्दन’, बॉम्बे टॉकीज की ‘जीवन नैया’, ‘बंधन’, ‘कंगन’, ‘अछूत कन्या’, ‘किस्मत’ और एस एस वासन की ‘चन्द्रलेखा’ व उदय शंकर की ‘कल्पना’ जैसी फिल्मों का संरक्षण एवं संग्रहण किया।
नायर साहब को जानने वाले बताते हैं कि रेल्वे स्टेशन की वजन तौलने वाली मशीन से निकलने वाली टिकट के पीछे फिल्मी सितारों की फोटो के लिए वे बार बार वजन कराते थे. यह जुनूनी बच्चा सिनेमा देखते बड़ा हुआ और अपनी आखिरी सांस तक सिनेमा को जीता रहा. विज्ञान में स्नातक रहे नायर साहब अपना लक्ष्य जानते थे और वे चकाचौंध में गुम हो जाने के बाद अपना लक्ष्य पाने निकल पड़े थे. सिनेमा के अपने आरंभिक दिनों में जिन हस्तियों का साथ और सहयोग मिला, नायर साहब उसमें रम सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्हें यह बात बार बार चुभती थी कि हम उन क्लासिक फिल्मों का दस्तावेजीकरण क्यों नहीं कर रहे हैं? आने वाली पीढ़ी को हम सिनेमा के नाम पर क्या देंगे? आदि-इत्यादि सवाल उनके मन में उठते रहे और इन्हीं सवालों से जज्बाती हुए नायर साहब ने वह अनुपम काम कर दिखाया जो उन्हें हमारे बीच हमेशा-हमेशा के लिए जिंदा रखेगी. 
नायर साहब पूरी जिंदगी खामोशी से अपना काम करते रहे और दबे पांव हम सबको छोड़ कर चले गए . भारतीय सिनेमा के संसार में मील के पत्थर के रूप में अपने पीछे अपनी पहचान छोड़ जाने वाले पी.के. नायर पर शिवेन्द्र सिंह डूंगरपुर ने नायर साहब के जीवन और काम को डाक्युमेंट्री फिल्म ‘सेल्यूलाइड मैन’ के जरिए सुरक्षित कर लिया है. दुर्र्भाग्यपूर्ण बात यह रही कि सिनेमा के इस मौन साधक के चले जाने को हमने मौन रहकर ही मान लिया. बात बात पर हंगामा करने वाला मीडिया भी भारतीय सिनेमा के इस महान शिल्पकार को भूल गया था. कहा जाता है कि सुंदर भविष्य निर्माण के लिए अपने अतीत को स्मरण में रखना होता है और यही बात नायर साहब के संदर्भ में स्मरण रखी जानी चाहिए. अस्तु, नायर साहब को उनके जन्मदिवस के अवसर पर स्मरण करते हुए उन्हें सलाम करते हैं और सेल्यूलॉयड मैन, सिनेमाई एनसाइक्लोपीडिया जैसे उपनामों से मशहूर नायर साहब हमारे बीच हमेशा वैसे ही बने रहेंगे जैसा कि सिनेमा का हर रील हमें हर बार ताजा कर देता है. 

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है


मनोज कुमार

इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो और खुद को बचा ले जाओ। इक्का-दुक्का अखबार और पत्रिकाओं को छोड़ दें तो लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में ‘‘टेग लाइन‘‘ होती है- ‘‘यह लेखक के निजी विचार हैं। सम्पादक की सहमति अनिवार्य नहीं।‘‘इस टेग लाइन से यह बात तो साफ हो जाती है कि जो कुछ भी छप रहा हैवह सम्पादक की सहमति के बिना है। लेकिन छप रहा है तो सहमति किसकी है लेखक अपने लिखे की जवाबदारी से बच नहीं सकता लेकिन प्रकाषन की जवाबदारी किसकी हैसम्पादक ने तो किनारा कर लिया और लेखक पर जवाबदारी डाल दी। ऐसे में यह प्रश्न उलझन भरा है और घूम-फिर कर बात का लब्बोलुआब इस बात पर है कि प्रकाशनों को अब सम्पादक की जरूरत ही नहीं है और जो परिस्थितियां हैं, वह इस बात की हामी भी है। इस ‘‘टेग लाइन‘‘ वाली पत्रकारिता से हम टेलीविजन की पत्रकारिता को सौफीसदी बरी करते हैं क्योंकि यहां सम्पादक नाम की कोई संस्था होती है या जरूरत होगी, इस पर चर्चा अलग से की जा सकेगी। यहां पर हम पत्रकारिता अर्थात मुद्रित माध्यमों के बारे में बात कर रहे हैं। अस्तु। 

भारतीय पत्रकारिता की आज की स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। जवबादारी से बचती पत्रकारिता भला किस तरह से अपनी सामाजिक जवाबदारी का निर्वहन कर पाएगी, सवाल यह भी है कि क्या समय अब गैर-जवाबदार पत्रकारिता का आ गया है। यह सवाल गैर-वाजिब नहीं है क्योंकि भारतीय पत्रकारिता ने पत्रकारिता का वह स्वर्णयुग भी देखा है जहां सम्पादक न केवल जवाबदार होता था बल्कि सम्पादक की सहमति के बिना एक पंक्ति का प्रकाशन असंभव सा था। भारतीय पत्रकारिता का इतिहास बताता है कि व्यवस्था के खिलाफ लिखने के कारण एक नहीं कई पत्रकारों को जेल तक जाना पड़ा लेकिन उन्होंने कभी भी जवाबदारी से खुद को मुक्त नहीं किया। उल्टे सम्पादक उपत कर सामने आता और कहता कि हां, इस लेख की मेरी जवाबदारी है और आज के सम्पादक का जवाब ही उल्टा है। मैं कुछ नहीं जानता, मेरा कोई वास्ता नहीं है।

आज की पत्रकारिता में सम्पादक की गौण होती या खत्म हो चुकी भूमिका पर चर्चा करते हैं तो भारतीय पत्रकारिता के उस गौरवशाली कालखंड की सहज ही स्मरण हो आता है जब सम्पादक के इर्द-गिर्द पत्रकारिता की आभा होती थी। हालांकि सम्पादक संस्था के लोप हो जाने को लेकर अर्से से चिंता की जा रही है। यह चिंता वाजिब है। एक समय होता था जब कोई अखबार या पत्रिका, अपने नाम से कम और सम्पादक के नाम पर जानी जाती थी। बेहतर होने पर सम्पादक की प्रतिभा पर चर्चा होती थी और गलतियां होने पर प्रताड़ना का अधिकारी भी सम्पादक ही होता था। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक नहीं अनेक सम्पादक हुए हैं जिन्होंने भारतीय पत्रकारिता को उजाला दिया। समय गुजरता रहा और आहिस्ता आहिस्ता सम्पादक संस्था का लोप होने लगा। प्रकाशन संस्थाओं ने मान लिया कि सम्पादक की जरूरत नहीं है। प्रकाशन संस्था का स्वामी स्वयं सम्पादक हो सकता है और अपने अधीनस्थों से कार्य करा सकता है। उन्हें यह भी लगने लगा था कि सम्पादक करता-वरता तो कुछ है नहीं, बस उसे ढोना होता है। ये लोग उस समय ज्यादा कष्ट महसूस करते थे जब सम्पादक उनके हस्तक्षेप को दरकिनार कर दिया करते थे। एक तरह से यह अहम का मामला था। 
स्वामी या सम्पादक के इस टकराव का परिणाम यह निकला कि सम्पादक किनारे कर दिए गये।

प्रकाषन संस्था के स्वामी के भीतर पहले सम्पादक को लेकर सम्मान का भाव होता था, वह आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने लगा। कई घटनाएं हैं जो इस बात का प्रमाण है जो यह बात साबित करती हैं कि सम्पादक के समक्ष स्वामी बौना हुआ करता था। स्वामी इस बात को जानता था कि सम्पादक ज्ञानी है और प्रकाशन एक सामाजिक जवाबदारी। इस नाते वह स्वयं के अहम पर न केवल नियंत्रण रखता था बल्कि अपने प्रकाशन के माध्यम से लोकप्रिय हो जाने का कोई लालच उसने नहीं पाला था। कहने के लिए तो लोग सन् 75 के आपातकाल के उन काले दिनों का स्मरण जरूर कर लेते हैं जब पत्रकारिता अपने कड़क मिजाज को भूल गई थी। सवाल यह है कि 40 साल गुजर जाने के बाद भी हम पत्रकारिता के आपातकालीन दिनों का स्मरण करेंगे या और गिरावट की तरफ जाएंगे. जहां तक मेरा अनुभव है और मेरी स्मरणशक्ति काम कर रही है तो मुझे लगता है कि सम्पादक संस्था को विलोपित करने का काम आपातकाल ने नहीं बल्कि प्रकाषन संस्था के स्वामी के निजी लालच ने किया है। उन्हें लगने लगा कि कागज को कोटा-सोटा तो खत्म हो गया है। सो आर्थिक लाभ तो घटा ही है बल्कि उसके भीतर स्टेटस का सपना पलने लगा। वह अपने सम्पादक से ज्यादा पूछ-परख चाहता है और चाहता है कि शासन-प्रशासन में उसका दखल बना रहे।

स्वामी के इस लालच के चलते सम्पादक संस्था को किनारे कर दिया गया और सम्पादक के स्थान पर प्रबंध सम्पादक ने पूरे प्रकाशन पर कब्जा कर लिया। एक प्रकाशन संस्था से शुरू हुई लालच की यह बीमारी धीरे-धीरे पूरी पत्रकारिता को अपने कब्जे में कर लिया। पत्र स्वामियों के इस लालच के कारण उन्होंने कम होशियार और उनकी हां में हां मिलाने वाले सम्पादक रखे जाने लगे। गंभीर और जवाबदार सम्पादकों ने इस परम्परा का विरोध किया लेकिन संख्याबल उन सम्पादकों की होती गई जो हां में हां मिलाने वालों में आगे रहे। सम्पादक संस्था की गुपचुप मौत के बाद पत्रकारिता का तेवर ही बदल गया। प्रबंध सम्पादक की कुर्सी पर बैठने वाले सम्पादक के सामने लक्ष्य पत्रकारिता नहीं बल्कि अर्थोपार्जन होता है सो वह पत्र स्वामी को बताता है कि फलां स्टोरी के प्रकाशन से कितना लाभ हो सकता है। स्वामी का एक ही लक्ष्य होता है अधिकाधिक लाभ कमाना। सम्पादक संस्था के खत्म होने और प्रबंध सम्पादक के इस नए चलन ने पेडन्यूज जैसी बीमारी को महामारी का रूप दे दिया।

कुछ भी कहिएयह ‘‘टेग लाइन' वाली पत्रकारिता है मजेदार। जिस अखबार में लेख छापा जा रहा हैउसका सम्पादक-स्वामी कहता है कि यह विचार लेखक के निजी हैं। इसका सीधा अर्थ होता है कि बड़ी ही गैर-जवाबादारी के साथ पत्र-पत्रिकाओं ने लेख को प्रकाशित कर दिया है। न तो प्रकाशन के पूर्व और न ही प्रकाशन के बाद लेख को पढ़ा गया। जब सम्पादक इस तरह की भूमिका में है तो सचमुच में उसकी कोई जरूरत नहीं है। जब एक सम्पादक किसी लेख अथवा प्रकाशन सामग्री को बिना पढ़े प्रकाषन की अनुमति दे सकता है और साथ में इसकी जवाबदारी लेखक के मत्थे चढ़ा देता है तो क्यों चाहिए हमें कोई सम्पादक, जब लेखक को अपने लिखे की जवाबदारी स्वयं ही कबूल करनी है तो सम्पादक क्या करेगा, इन सम्पादकों को कानून का ज्ञान नहीं होगा, यह बात उचित नहीं है लेकिन प्रबंध सम्पादक की हैसियत से वह इससे बचने का उपाय ढूंढ़ते हैं और इसी का तरीका ये ‘‘टेग लाइन वाली पत्रकारिता है। गैर-जवाबदारी के इस दौर में भारतीय पत्रकारिता जिम्मेदार सम्पादक की प्रतीक्षा में खड़ी है जो कहेगी कि छपे हुए एक आलेख नहीं अपितु एक-एक शब्द में सम्पादक की सहमति है और वह इसके प्रकाशन के लिए जवाबदार है। 

मंगलवार, 29 मार्च 2016

पहाड़ी कोरवा की जिंदगी में नई सुबह


-मनोज कुमार
यह शायद पहला मौका होगा जब पहाड़ी कोरवा आदिवासियों के जीवन में इतनी सारी खुशी उनके हिस्से में आयी है. अब से पहले तक उपेक्षा और तकलीफ के सहारे उनकी जिंदगी बसर हो रही थी. जंगलों पर निर्भर रहने वाले ये पहाड़ी कोरवा की चिंता करती तो हर सरकार दिखती लेकिन कागज पर और यह पहली पहली बार हुआ है जब कागज नहीं, बात नहीं बल्कि सच में उनके हक में कुछ दिखाया है तो राज्य की रमन सरकार ने. राज्य सरकार ने इन आदिवासियों की जिंदगी बदलने के लिए शिक्षा से रोजगार और कोठी में अनाज से लेकर स्वच्छता तक का ध्यान रखा है. अब कोई आदिवासी खुले में शौच के लिए नहीं जाता है और न ही किसी आदिवासी को जंगल में खाने की तलाश करने की जरूरत है. आदिवासी बच्चियों के लिए शिक्षा का रास्ता खुल गया है तो युवा आदिवासियों को रोजगार मिलने लगा है. 
बेहद ही गरीबी में पले बढ़े मंगल सिंह ने कभी सोचा भी नही था कि एक दिन वह खुद की मोटर साइकिल चलायेगा और तीर धनुष की जगह उसके हाथों में मोबाइल रहेगा। घर में कलर टीवी रखेगा और आराम से अपना जीवन बितायेगा। उसे तो लगता था कि बड़े होकर उसे भी हाथों में तीर कमान पकडक़र जंगल में चार,तेंदू तोडऩे, महुआ बीनने जाना पड़ेगा।  जब तक हाथ में कोई नौकरी नही थी,पहाड़ी कोरवा मंगल का दिन जंगलों में घूमते फिरते गुजरता था। लेकिन छत्तीसगढ़ शासन द्वारा पहाड़ी कोरवाओं सहित राज्य के विशेष पिछड़ी जनजाति पांचवीं और आठवीं पास युवकों को चतुर्थ श्रेणी पद पर शासकीय नौकरी देने की पहल ने  कोरबा जिले के अनेक पहाड़ी कोरवाओं की तस्वीर और तकदीर ही बदल दी। शासकीय सेवा में आने के साथ ही इनके जीवनयापन का तरीका तो बदला ही, जंगलों के आसपास रहने की वजह से अपना पूरा दिन जंगल में ही इधर उधर घूम-फिरकर  बिताने की मानसिकता भी बदल गई। शिक्षा एवं विकास की मुख्यधारा से दूर रहने की सदियों से बनी एक तरह की धारणा इनके दिमाग से दूर होने के साथ-साथ नौकरी ने इन्हें और आगे बढऩे के लिये प्रेरित किया। अब नौकरी मिलने के बाद आठवी पास पहाड़ी कोरवा मंगल सिंह खुद भी इस साल दसवी की परीक्षा दे रहा है और अपने सभी बच्चों को रोजाना स्कूल भेजता है। परिवार को भी खुशहाल रखता है।
कोरबा विकासखंड के वनांचल ग्राम आंछीमार में रहने वाले 15 सदस्यों दो पहाड़ी कोरवा भाईयों ने अपने परिवार के लिए तय किया भले ही कुछ कमरे न बन पाये,लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी शौचालय है। पहाड़ी कोरवा भाईयों ने लगभग 40 हजार रूपये खर्च कर अपने ही घर के पीछे शौचालय का निर्माण कराया। परिवार के सभी सदस्य अब इस शौचालय का उपयोग करते है। गांव में पहाड़ी कोरवा परिवार की इस सोच ने कुछ अन्य लोगों को भी सीख दी है। कुछ परिवार है जो स्वयं के पैसे से अपना घर संवारने के साथ ही शौचालय निर्माण भी करा रहे है। बहोरन सिंह ने बताया कि कुछ समय पष्चात भले ही सरकार की ओर से नि:शुल्क में शौचालय बन जाता,लेकिन हमने इंतजार नही किया। शौचालय के महत्व को जानने के बाद उसे भी आभास हुआ कि सचमुच शौचालय तो हर घर में बहुत जरूरी है। उसने अपने भाई से बात किया और दोनों ने शौचालय निर्माण में आने वाले खर्च को बराबर हिस्से में बांट कर काम शुरू कराया। आज घर परिवार के सभी सदस्य उस शौचालय का उपयोग करते है।
      पहाड़ी कोरवा परिवारों की जिंदगी गुलाबी गुलाबी हो गई है. अन्त्योदय गुलाबी राशन कार्ड ने इनकी जिंदगी के मायने ही बदल दिए हैं. एक समय वह भी था जब हर दिन खानाबदोश की तरह भोजन की तलाश में पहाड़ी कोरवा परिवारों को भटकना पड़ता था। आज वे आराम से अपने घरों में रहते हैं. आज इस गुलाबी राशन कार्ड से सभी पहाड़ी कोरवा परिवारों को एक रूपये की दर से प्रतिमाह 35 किलो चावल मिल जाता है। इससे घर के चूल्हे भी जल जाते हैं और भूखे पेट सोने की नौबत भी नहीं आती। शासन ने इनकी सुध ली। एक स्थान पर ही ठहराव के लिए आशियाना बनाकर दिया। शिक्षा से जोडऩे स्कूल खोले। आंगनबाड़ी खोला गया। अंधेरा दूर करने के लिए जहां तक संभव था सडक़, बिजली पहुंचाई गई और दुर्गम इलाकों में सौर उर्जा के माध्यम से इनके बसाहटों को रोशन किया गया। आर्थिक रूप से कमजोर कोरवाओं को बचत से जोडऩे एवं कम कीमत पर चावल उपलब्ध कराकर इनके आर्थिक बोझ को कम करने की दिशा में शासन द्वारा सभी कोरवा परिवारों का अन्त्योदय गुलाबी राशन कार्ड बनाया गया है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2012 अन्तर्गत प्रत्येक माह के 7 तारीख को चावल उत्सव के समय 1 रूपये की दर से 35 किलो चावल दिया जाता है। ग्राम छातासरई के पहाड़ी कोरवा पाकाराम ने बताया कि अभी भी अनेक कोरवा हैं जो जंगल जाते हैं। इंदिरा आवास बनाये जाने से अब निश्चित ठिकाना बन गया है, पहले तो बस भटकते रहते थे। उसने बताया कि वे हर माह उचित मूल्य की दुकान में एक रूपए चावल नि:शुल्क दिए जाने वाले अमृत नमक और कम कीमत पर मिलने वाले शक्कर, मिट्टी तेल, चना के पैकेट लेने नीचे आते हैं।
उच्च शिक्षा की राह में अग्रसर हुई पहाड़ी कोरवा छतकुंवर की उड़ान अब चाहे जहां पर थमे। लेकिन उसके इस कदम से कोरवा जनजातियों की उन बालक-बालिकाओं को भी आगे पढ़ाई करने की प्रेरणा मिलेगी जो पांचवीं,आठवीं पढऩे के बाद बीच में ही अपना स्कूल जाना छोड़ देते हंै। लंबे समय तक उच्च शिक्षा से दूर कोरवा समाज की इस बेटी ने 12वीं पास कर कालेज की दहलीज को छुआं है। छात्रा छतकुंवर ऐसे छात्रों के लिये एक मिसाल भी है। इनके पिता बहोरन सिंह ने सिर्फ कक्षा पांचवीं तक ही पढ़ाई किया है। इस गांव से स्कूल की दूरी 6 किलोमीटर और कालेज की दूरी 7 किलोमीटर है। पहाड़ी कोरवा छात्रा कु. छतकुंवर जब हाई स्कूल पहुंची तो मुख्यमंत्री सरस्वती साइकिल योजना के तहत उसे नि:शुल्क साइकिल मिली थी। उस साइकिल से बारहवीं तक की अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्रा छतकुंवर अब उसी साइकिल से कालेज भी जाने लगी है। आगे पढऩे और आगे बढऩे की ललक ने छात्रा को जहंा कालेज तक पहुंचाया वहीं सरस्वती साइकिल योजना से स्कूल में मिली नि:शुल्क साइकिल से कालेज का सपना भी पूरा हो रहा है।
यह बदलाव कागज पर नहीं है बल्कि सच का बदलाव है. मंगल हो या छतकुंवर, सबकी जिंदगी बदल रही है क्योंकि सरकार ने इनके प्रति अपनी सोच बदली तो जिंदगी बदल बदल सी गई है. पहाड़ी कोरवा समाज की जिंदगी में बदलाव एक समुदाय की जिंदगी में बदलाव नहीं बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में बदलाव की बयार है.

रविवार, 20 मार्च 2016

मेरी नई किताब "कम्युनिटी रेडियो"

नई दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक अख़बार "शुकवार" में मेरी नई किताब "कम्युनिटी रेडियो" की समीक्षा प्रकाशित हुई है. आभारी हु संजय जी का जिन्होंने खूबसूरत समीक्षा लिखी। शुक्रिया "शुकवार".

शनिवार, 12 मार्च 2016

तारीख बेमिसाल

 मार्च : पहली बोलती फिल्म आलम आरा के बरक्स

-मनोज कुमार
हर दिन गुजरने के साथ तारीख बदल जाती है. यह क्रम हमारे जीवन में नित्य चलता रहता है किन्तु कुछ तारीखें बेमिसाल होती हैं. बेमिसाल होने के कारण इन तारीखों को हम शिद्दत से याद करते हैं. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ऐसी कई तारीखें हैं जो हमें रोमांचित करती हैं तो आपातकाल की वह तारीख भी हमें भूलने नहीं देती कि किस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नकेल डाला गया था. इन सबसे इतर यहां पर हम उन बेमिसाल तारीखों का जिक्र कर रहे हैं जिन तारीखों ने हमारे सांस्कृतिक वैभव को लगातार उन्नत किया है. दादा साहेब फाल्के ने भारत में सिनेमा की शुरूआत कर एक नई विधा को जन्म दिया. आरंभिक दिनों में सिनेमा में काम करना बहुत अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था किन्तु सौ साल से अधिक समय गुजर जाने के बाद सिनेमा की समाज में स्वीकार्यता न केवल कला विधा के रूप में हुई बल्कि रोजगार की दृष्टि से भी इसे मंजूर किया गया.
दादा साहेब फाल्के ने सफर मूक सिनेमा से भारत में इसकी शुरूआत की थी लेकिन थोड़े समय में ही मूक सिनेमा को आवाज मिल गई. इस कड़ी में पहली बोलती फिल्म के रूप में भारतीय सिनेमा के इतिहास में ‘आलमआरा’ का नाम दर्ज हो गया. भारतीय सिनेमा के इतिहास में तारीख 14 मार्च बेमिसाल तारीख के रूप में दर्ज हो गई. साल कोई भी हो किन्तु 14 मार्च को हम कभी भूल नहीं पाएंगे. यह तारीख सिनेमा से वास्ता रखने वालों, सिनेमा के विद्यार्थियों और सिनेमा के शोधार्थियों के लिए खास मायने रखता है. सौ साल पहले जब भारत में सिनेमा का आरंभ हुआ था, तब किसी को इस बात का इल्म भी नहीं था कि समूचे संसार में सबसे ज्यादा फिल्म निर्माण करने वालों में भारत गिना जाएगा. आज फिल्म निर्माण की दृष्टि से सबसे आगे हैं. यह हमारे लिये गौरव की बात है. 
सौ साल से ज्यादा का सफर तय कर चुके भारतीय सिनेमा के विविध रंग हैं. विषयों को लेकर उसके पास अपार संभावनाएं हैं क्योंकि भारत की छवि अनेकता में एकता की है. बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले भारतीय फिल्मकार समय-काल के अनुरूप फिल्मों का निर्माण करते रहे हैं. भारत में सिनेमा आरंभिक दिनों में धार्मिक विषयों पर केन्द्रित रहा. विविधता भारतीय सिनेमा की खासियत है. लगभग हर दस साल में सिनेमा के विषयों में परिवर्तन होता रहा है. समय-काल के अनुरूप विषयों का चयन करना और समाज को सचेत करने का काम सिनेमा करता रहा है.
भारतीय सिनेमा के सामाजिक सरोकार का केनवास बहुत विस्तार लिए हुए है. इस बात से इंकार नहीं कि दिन प्रति दिन विकसित होते भारत में शिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी जड़मूल समस्या के रूप में विद्यमान है. जैसा कि हम पत्रकारिता में पढ़ते हैं कि पत्रकारिता के तीन मूल ध्येय हैं-1. शिक्षा, 2. सूचना तथा 3. मनोरंजन. सिनेमा भी इन तीन ध्येय को अपने समक्ष रखकर फिल्म का निर्माण करता है. स्मरण करना होगा कि पहले की फिल्मों में भारत की गरीबी और अशिक्षा के साथ बेरोजगारी का चित्रण हुआ करता था. भारतीय सिनेमा की माइलस्टोन फिल्म ‘मदर इंडिया’ में गरीबी का जितना मार्मिक ढंग से चित्रण हुआ है, वह अविस्मरणीय है. साथ ही गरीबी के साथ आत्मसम्मान के साथ जीना भारत की मिट्टी की खासियत है, इस बात का भी बखूबी चित्रण किया गया है. सायस या अनायस इस बात का भी चित्रण किया गया है कि अंग्रेज शोषकों के भारत से विदा हो जाने के बाद शोषण का सिलसिला खत्म नहीं हुआ बल्कि हमारे अपने लोग, अपनों का शोषण करते रहे. 
शोमेन पुकारे जाने वाले राजकपूर की फिल्मों में सामाजिक रूढिय़ों पर आघात किया जाता रहा है किन्तु कई बार राजकपूर विद्रोही भूमिका में भी दिखते हैं. गरीबी उनकी फिल्मों का विषय रहा है और इसी गरीबी के कारण वे विद्रोही भी हो जाते हैं. दृष्टव्य है उनका एक डॉयलाग- ‘जब रोटी मांगने से ना मिले तो छीन लो’. यही राजकपूर दस्यु के आत्मसमर्पण पर फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ का निर्माण करते हैं तो ‘प्रेमरोग’ में वे विधवा विवाह की पैरवी करते हैं. ‘मेरा नाम जोकर’ में वे जीवन के कई रंगों को इतनी सहज ढंग से व्यक्त करते हैं कि बरबस आंखें भीग जाती हैं. उनकी फिल्मों पर चर्चा के लिए पूरे खंड की आवश्यकता होगी किन्तु अभी चर्चा संक्षिप्त में ही.
भारतीय सिनेमा की विषय-वस्तु में साहित्य का पक्ष कभी कमजोर नहीं रहा. मुंशी प्रेमचंद की कहानियों पर फिल्म का निर्माण हुआ किन्तु वह लोकप्रिय नहीं हो सका. कथा सम्राट अपनी कृतियों में हस्तक्षेप नहीं चाहते हैं जबकि सिनेमा बिना हस्तक्षेप कार्य कर नहीं सकता है. प्रेमचंद के बाद के कई नामचीन साहित्यकारों की कृतियों पर फिल्मों का निर्माण हुआ और वे लोकप्रिय भी हुईं. हालांकि जिन साहित्यिक कृतियों पर फिल्मों का निर्माण हुआ, उनमें ज्यादतर बांग्ला साहित्य था. कुछ अंग्रेजी साहित्यकारों, नाट्यकृतियों के साथ ही मराठी, गुजराती और दक्षिण के साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनी किन्तु हिन्दी साहित्यिक कथाओं पर फिल्मों का निर्माण कम ही हुआ.
भारतीय सिनेमा के इतिहास में आलमआरा का उल्लेख पहली बोलती फिल्म को लेकर है तो आहिस्ता आहिस्ता भारतीय सिनेमा तकनीकि दृष्टि से समृद्ध होता चला गया. 70 के दशक तक हम सिनेमास्कोप में फिल्में देखते थे और यह भी हमारे लिए एक सुखद अनुभव था. रंगीन फिल्मों का निर्माण होने लगा था. साल 75 भारतीय सिनेमा के लिए एक और यादगार साल के रूप में जाना जाएगा. इस साल भारतीय सिनेमा ने तकनीक की दृष्टि से बड़ी छलांग लगाकर 70 एमएम स्क्रीन पर फिल्म दिखाने की शुरूआत की थी. साल 75 की अविस्मरणीय फिल्म ‘शोले’ थी. यानि एक तरफ हम 70 एमएम पर्दे पर आनंद ले रहे थे और दूसरी तरफ ड्रामा फिल्म शोले का आनंद.
इसके बाद तकनीक की दृष्टि से हम और मजबूत तथा समृद्ध होते चले गए. संभवत: 80 के दशक में पहली थ्रीडी फिल्म ‘छोटा चेतन’ पर्दे पर उतरी थी. भारतीय दर्शकों लिए यह रोमांच से भरी हुई फिल्म थी.  सिनेमा की टिकट के साथ कुछ अतिरिक्त पैसे लेकर थ्रीडी चश्मे दिये जाते थे और फिल्म देखते हुए हर दृश्य के साथ दर्शक अपने शरीर का मूवमेंट किया करता था.  छोटा चेतन के बाद इस तरह की फिल्मों का दौर ठहर गया. हालांकि तकनीकि दृष्टि से अनेक प्रयोग देखने को मिलते हैं.
नई सदी में भारतीय सिनेमा जब अपने जन्म के सौ साल पूरे कर रहा था, तब नए दौर का नया सिनेमा अपनी नयी पटकथा लिखने में व्यस्त था. सिनेमा की हर विधा मेें नयापन था. ‘दीवार’ फिल्म से एंग्रीमैन के रूप में अमिताभ सरीखा गुस्सैल नायक परदे पर उतर चुका था तो नई सदी में मदर इंडिया को छोडक़र खुद के फ्रिकमंद नायिका फैशन, कम्पनी और डर्टी पिक्चर में नए रूप में मौजूद थी. 
सिनेमा हॉल की सूरत भी बदलने लगी थी. मल्टीप्लेक्स के दौर में लोअर, अपर और बालकनी का कांसेप्ट पीछे छूट गया था. चार आने पैसे की टिकट वाली फिल्में अब दो और पांच सौ में देखने को उपलब्ध थी. अब न तो फिल्में रूकती थी और न दर्शकों को पसीने से सराबोर होना पड़ता था. लाईट बंद हो जाने पर पंखे के लिए शोर मचाने के साथ ही हर दृश्य पर सीटी बजाना और पैसे फेंकने का रिवाज भी लगभग खत्म हो चला था. नए दौर के इन सिनेमाहॉल में कोई दर्शक न तो गरीब था और न ही अमीर. मल्टीप्लेक्स सिनेमा हॉल समाजवाद की नयी परिभाषा गढ़ रही थीं. छोटा चेतन की याद दिलाती सिनेमा हॉल अब थ्रीड और फोरडी में बदल चुकी हैं. हालांकि छोटा चेतन का यह कोई मुकाबला नहीं कर सकती हैं क्योंकि वह पूरे समय की फिल्म थी और इनकी अवधि 20-22 मिनट के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाती हैं.
भारतीय सिनेमा के इस नए दौर में तकनीकि रूप से समृद्ध कई बड़ी फिल्मों का आगाज हुआ. रोबोट, कृश, धूम और इसके बाद बाहुबली जैसी फिल्में आयी. ये फिल्में कथानक के तौर पर शायद कमजोर हों लेकिन तकनीकि दृष्टि से बेहद सम्पन्न थीं. इस दौर में विषय को लेकर एक बड़ा परिवर्तन दिखा और अनिवासी भारतीय लोगों को लेकर फिल्में बनी. इस तरह की फिल्में एक तरह की फ्यूजन फिल्में थी जिसमें यूरोप और भारतीय संस्कृति को मिक्स कर बनायी गयी थी. अपने रिलीज के दौरान बेशक इन फिल्मों ने बिजनेस अच्छा किया लेकिन छाप छोडऩे में कामयाब नहीं हो पायीं. जिस तरह आज के दौर में भी हम मदर इंडिया, दो बीघा जमीन, सुजाता, दो आंखें बारह हाथ, कागज के फूल, बंदिनी, मुगले आजम, शतरंज के खिलाड़ी आदि-इत्यादि फिल्मों को मिसाल के तौर पर स्मरण करते हैं तब यह फिल्में कहीं नहीं ठहरती हैं.
1912-2016 के समय में परिवर्तन को परखते हैं तो पाने की खुशी कम नहीं है तो खोने का अफसोस भी है. बदलाव तो होना था लेकिन विश्व सिनेमा मंच पर हम बार बार बेदखल किए जाते हैं, यह रंज भरा है. यह इसलिए भी कि भारतीय सिनेमा समृद्ध होने के बाद भी ऑस्कर पाने की ललक में बैठा हुआ है. हम विषयगत फिल्मों का निर्माण करते हैं तथा भारतीय सिनेमा सामाजिक सरोकार की विधा है अत: हम अपने समाज की समस्याओं को उकेरते हैं और समाधान तलाशने की कोशिश करते हैं. कला की दृष्टि से यह फिल्में उत्कृष्ट होती हैं और ऑस्कर की लालच में हम जोर लगाते हैं. जिन अंग्रेजों ने सैकड़ों साल हम पर राज किया, उनकी देहरी में हम अपनी कला को सराहने और पुरस्कृत कराने की चाह में पंक्तिबद्ध रहते हैं और वे हैं कि हमारी कला को तो समझने का प्रयास नहीं करते अपितु हमारे देश की गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी को मजाक बनाते हैं. इसके कई उदाहरण हैं और कई बार हमें निराश होना पड़ा है. 14 मार्च को जब हम अपने गौरवशाली इतिहास का स्मरण कर रहे हैं तब हमें इस बात का भी संकल्प लेना चाहिए कि आगे जब हम भारतीय सिनेमा के डेढ़ सौ साल मना रहे होंगे तब भारतीय सिनेमा के पास एक ऐसा मंच हो जहां हॉलीवुड अपनी फिल्म लेकर हमारे पास कतारबद्ध हो और उसे लगे कि एक बार ही सही, दादा साहेब फाल्के अवार्ड उनकी फिल्मों को मिल जाए. सच मानिए, भारतीय सिनेमा ने अपने छोटे से सफर में जितनी ऊंचाई पायी है और वह ऐसा करने में कामयाब हो गया तो एक और बेमिसाल तारीख पर हम चर्चा कर सकेंगे.