सोमवार, 25 मई 2015

ताक में पत्रकारिता, तकनीकी का दौर

मनोज कुमार
साल 1826, माह मई की 30 तारीख को ‘उदंत मार्तंड’ समाचार पत्र के प्रकाशन के साथ हिन्दी पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ था. पराधीन भारत को स्वराज्य दिलाने की गुरुत्तर जवाबदारी तब पत्रकारिता के कांधे पर थी. कहना न होगा कि हिन्दी पत्रकारिता ने न केवल अपनी जवाबदारी पूरी निष्ठा के साथ पूर्ण किया, अपितु भविष्य की हिन्दी पत्रकारिता के लिये एक नयी दुनिया रचने का कार्य किया. स्वाधीन भारत मेंं लोकतंत्र की गरिमा को बनाये रखने तथा सर्तक करने की जवाबदारी हिन्दी पत्रकारिता के कांधे पर थी. 1947 के बाद से हिन्दी पत्रकारिता ने अपनी इस जवाबदारी को निभाने का भरसक यत्न किया किन्तु समय गुजरने के साथ साथ पत्रकारिता पहले मिशन से प्रोफेशन हो गई और बाद के समय में पत्रकारिता ने मीडिया का रूप ले लिया. इस बदलाव के दौर में हिन्दी पत्रकारिता की भाषा गुम हो गई और पत्रकारिता की टेक्नालॉजी के स्थान पर टेक्नालॉजी की पत्रकारिता की जाने लगी. अर्थात पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों और मूल्यों को तज कर हम तकनीकी पत्रकारिता के दौर में पहुंच गये हैं. तकनीकी पत्रकारिता ने ही पत्रकारिता को मीडिया के स्वरूप में परिवर्तित कर दिया है और यही कारण है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर बार बार सवाल उठाये जाते हैं.
करीब करीब ढाई सौ साल पहले और 1947 के दौर की पत्रकारिता का इतिहास हिन्दी पत्रकारिता के लिये स्वर्णकाल था. इस कालखंड की पत्रकारिता का एकमात्र मिशन अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराना था और अपने प्रकाशनों के माध्यम से वे जनमत निर्माण का कार्य कर रहे थे. 1947 की स्वतंत्रता के बाद स्वाधीन भारत में पत्रकारिता ने एक नई करवट ली. पत्रकारिता, खासतौर पर हिन्दी पत्रकारिता के समक्ष एक नये भारत की रचना की जवाबदारी थी. तब पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया. पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाना कोई संवैधानिक विषय नहीं है बल्कि उसकी जवाबदारी के चलते माना गया कि पत्रकारिता का लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है. देश के समग्र विकास के लिये पंचवर्षीय योजनाओं का श्रीगणेश किया गया. इन योजनाओं के क्रियान्वयन पत्रकारिता ने पैनी नजर रखी और परिणामस्वरूप अनेक स्तर पर अनियमितताओं पर नियंत्रण पाया जा सका. साल 1947 के बाद से 1975 के पहले तक पत्रकारिता अपने स्वर्णकाल को खोकर रजतकाल में पहुंच चुका था. पत्रकारिता में गिरावट तो दिखने लगी थी लेकिन वह केवल छाया भर थी. साल 1975 में आपातकाल के समय से पत्रकारिता का वैभव गुम होता दिखा. हालांकि पत्रकारिता का वैभव गुमनाम नहीं हुआ था बल्कि अधिसंख्य पत्र मालिकों ने सरकार के समक्ष घुटने टेक दिये थे. पत्र मालिकों के गिरवी हो जाने से पत्र में काम करने वाले पत्रकारों की स्वतंत्रता पर भी नियंत्रण स्वाभाविक था. हालांकि हिन्दी पत्रकारिता इस बात के लिये गौरव का अनुभव कर सकती है कि इस बुरे समय में भी कुछ अखबारों ने अपने तेवर को बनाये रखा. यह भी सच है कि थोड़े ही सही, किन्तु इन अखबारों के तेवर से सरकार भीतर से भयभीत थी. दरअसल, यह पत्रकारिता के लिये संक्रमण काल था. एक तरफ बड़ी संख्या में पत्र मालिक सरकार के जीहुजूरी में लग गये थे तो कुछ अखबार विरोध में खड़े थे.
आपातकाल की समाप्ति के बाद भारत में पत्रकारिता का तेवर और तस्वीर एकदम से बदलने लगी. समाचार पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशनों की संख्या में निरंतर वृद्धि होने लगी. पत्रकारिता में गुणवत्ता का लोप होने लगा और संख्या बल बढ़ जाने से आहिस्ता आहिस्ता पत्रकारिता मिशन के स्थान पर प्रोफेशन बन गयी. पत्रकार प्रोफेशनल होने लगे और प्रकाशक उद्योगपति. अखबारों का सामाजिक सरोकार नेपथ्य में चला गया और अखबार एक उत्पाद बन कर रह गया. यह वही समय है जब ‘पीत पत्रकारिता’ अपने शबाब पर थी. किसी को महिमामंडित करना अथवा किसी की मानहानि करना, इस नये उद्योग को सुहाने लगा था. बदले में उसे मनमाफिक लाभ भी मिलता था. पत्रकार अब प्रोफेशनल हो चले थे, सो लेखनी की वह धार भी कम होती महसूस हो रही थी. पत्रकारिता उनके लिये नौकरी से ज्यादा कुछ नहीं था. सम्पादक नाम की संस्था को विलोपित किये जाने की साजिश भी इसी कालखंड में हुई थी. हिन्दी पत्रकारिता में न सम्पादक की कुर्सी बची और न पत्रकार. ऐसे दौर में ‘जनसत्ता’ का प्रकाशन एक शुभ संकेत था. मालवा की भूमि से आये पत्रकार प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’ का सम्पादकीय दायित्व सम्हाला और हिन्दी पत्रकारिता को एक नये उजास से भर दिया. गुमनाम सम्पादक संस्था को प्रभाषजी ने एक नयी पहचान दी और साथ में पत्रकारों को खबर ठोंकने की पूरी स्वाधीनता. 
‘जनसत्ता’ वर्तमान में भी अपने तेवर के साथ पाठकों के बीच उपस्थित है किन्तु शताब्दि परिवर्तन के साथ साथ हिन्दी पत्रकारिता का समूचा चरित्र परिवर्तित हो गया. पत्रकारिता का स्वरूप मीडिया में बदल चुका है तो पत्रकारिता की टेक्नालॉजी के स्थान पर टेक्नालॉजी की पत्रकारिता ने स्थान बनाया. पत्रकारिता तकनीकी रूप से समृद्ध हो गई किन्तु सामाजिक सरोकार पीछे छूट गये. कॉर्पोरेट कल्चर की इस पत्रकारिता में साहब के कुत्ते पहले पन्ने की खबर बनने लगे और रामदीन अपनी गरीबी में ही मर गया. इस दौर में एक नयी परिभाषा गढ़ी गई- जो दिखता है, वह बिकता है. पत्रकारिता कभी बिकाऊ थी नहीं, सो उसने रास्ता बदल लिया और मीडिया ने इस रिक्त स्थान पर कब्जा पा लिया. वह दिखने और बिकने की पत्रकारिता कर रहा है. तकनीकी रूप से सक्षम हो जाने के बाद तथ्यों की पड़ताल करने का वक्त नहीं है और समझ भी. ‘कट एंड पेस्ट’ की इस पत्रकारिता ने समूचे पत्रकारिता की परिभाषा बदल दी है. ढाई सौ साल की पत्रकारिता शनै:शनै: किस तरह रसातल में जा रही है, इसका उदाहरण है पेडन्यृज. कल जिसे हम पीत पत्रकारिता कहते थे, आज वह पेडन्यूज की श्रेणी में गिना जाने लगा है. बीते एक दशक में पेडन्यूज का मामला बेहद गर्माया हुआ है. कुछ मामले सामने भी आये हैं किन्तु किसी एक अखबार, पत्रिका या पत्रकार को सजा मिली हो, ऐसी खबर सुनने में मुझसे चूक हो गई है. हालांकि दो-एक राज्य में पेडन्यूज के आरोप में राजनेताओं पर कड़ी कार्यवाही की गई है.  

तकनीकी पत्रकारिता के इस वृहद स्वरूप के लिये बहुत हद तक मीडिया शिक्षा जवाबदार है. देश में पिछले बीस वर्षों में अनेक विश्वविद्यालय आरंभ हो गये हैं जहां मीडिया शिक्षा दी जाती है, पत्रकारिता नहीं. इन विश्वद्यिालयों से शिक्षा प्राप्त करने वाले युवा पत्रकारों की मंजिल अखबार के पन्ने नहीं होते हैं बल्कि टेलीविजन चैनल होते हैं. जिस चमक-धमक के फेर में वे टेलीविजन की नौकरी करने जाते हैं और जब सच का सामना होता है तो विश्वविद्यालय में पढ़े और पढ़ाये गये सारे अध्याय बेमानी लगते हैं. पत्रकारिता की जमीन कभी रेशम बिछी कालीन वाला रास्ता नहीं हो सकता है किन्तु मीडिया का रास्ता ही रेशमी कालीन से आरंभ होता है. इस रेशमी कालीन पर चलने के लिये अनेक किसम के उपाय करने होते हैं जिसे आप साम-दाम और दंड-भेद कह सकते हैं. ऐसा भी नहीं है कि इन विश्वविद्यालयों से निकले सभी विद्यार्थी नाकाम होते हैं. बहुत सारे ऐसे विद्यार्थी हैं जो रेशमी कालीन पर चलने लिये जो कुछ करना होता है, करते हैं और कामयाबी के शीर्ष पर बैठते हैं. थोड़ा तहकीकात करने की जरूरत होगी कि अल्पवय में ही वे करोड़ों के स्वामी बन गये हैं. इस तरह का  निर्लज्ज व्यवहार वाला पत्रकार कैसे हो सकता है? शायद यही कारण है कि इन एक नया शब्द इनके लिये गढ़ा गया है- ‘मीडिया कर्मी’. एक कर्मचारी से आप क्या उम्मीद करते हैं? उसका पूरा समय तो इसी गुणा-भाग में निकल जाता है कि वह अपना हित कैसे साधे? कैसे कामयाबी के शिखर तक पहुंचे? ऐसे में वह किसी रामदीन की पीड़ा को समझने की मुसीबत क्यों ले? वह उन खबरों को तव्वजो दे जो उसके संस्थान को अधिकाधिक लाभ दिला सके. मेरे पैंतीस वर्षों के पत्रकारिता जीवन में कभी मैंने ‘पत्रकार कर्मी’ शब्द नहीं सुना क्योंकि एक पत्रकार कभी कर्मचारी हो नहीं सकता. वह तो हमेशा से सामाजिक सरोकार, जनसरोकार से जुड़ा हुआ है. उसके लिये उसका निजी हित कुछ भी नहीं है. एक पत्रकार के लिये उसकी अपनी पीड़ा से किसी रामदीन की पीड़ा ज्यादा अहमियत वाली होती है. एक पत्रकार, किसान की तरह होता है. वह आरंभ से अंत तक कलम घिसते हुये मर जाता है. वह मालिक नहीं बन पाता है जो मालिक बन जाता है, वह पत्रकार नहीं होता है, इस बात पर कोई संशय नहीं होना चाहिये. 

इन दिनों इस बात को लेकर विलाप किया जा रहा है कि खबरों का कोई प्रभाव नहीं होता है. यह सच है कि खबरों का प्रभाव नहीं होता है और हो भी कैसे? जब आप खबर नहीं, सूचना दे रहे हैं. खबरों का अर्थ होता है किसी सूचना के तथ्यों तथा आंकड़ों का गहन परीक्षण एवं उसका विश£ेषण. आधी-अधूरी सूचना और पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर खबरों के प्रकाशन को समाज क्यों गंभीरता से ले? ‘स्टिंग ऑपरेशन’ के नाम पर जो गंदगी की जा रही है, उसे भारतीय समाज सहन नहीं कर पाता है. खोजी पत्रकारिता के नाम पर किसी को व्यक्तिगत रूप से लांछित करना पत्रकारिता की मर्यादा के खिलाफ है. खोजी पत्रकारिता ही करनी है तो पत्रकार अरूण शौरी की बोफोर्स रिपोर्ट को नजीर क्यों नहीं माना जाता? पत्रकार गिरिजाशंकर द्वारा  कैदी को दिये जाने वाली फांसी का आंखों देखा हाल कव्हर करने का विषय नयी पीढ़ी के लिये खोजी पत्रकारिता का विषय क्यों नहीं होता है? ‘ऑपरेशन चक्रव्यूह’ के तहत सांसदों का स्टिंग ऑपरेशन किया गया था. कुछ की सांसदी भी गयी थी. इस ऑपरेशन से कुछ सांसदों के स्टिंग कर उन्हें कटघरे में खड़ा किया गया, यह अनुचित नहीं है किन्तु क्या शेष सांसद एकदम पाक-साफ थे? सवाल के जवाब की प्रतीक्षा में खड़ा हूं. यह पत्रकारिता की मर्यादा के प्रतिकूल है कि हम कुछ लोगों पर तो अंगुलियां उठायें और शेष को अनदेखा कर दें. सभी को कटघरे में खड़ा करने का साहस जब आयेगा तब पत्रकारिता दुबारा अपना वैभव प्राप्त कर सकेगी.

शुक्रवार, 22 मई 2015

उर्मिला बनी बदलाव की सबब


-मनोज कुमार
शादी का मंडप बना हुआ था. गीत-संगीत में सब मगन थे. उर्मिला भी दूसरी युवतियों की तरह सपने बुन रही थी. एक सुखी और आनंदमयी जिंदगी के लिये. कुछ ही घंटों बाद उर्मिला अपनी नयी जिंदगी की शुरूआत करने जाने वाली थी. इन शेष बचे घंटों ने उर्मिला की जिंदगी में तूफान ला खड़ा किया. जिस व्यक्ति के साथ पूरी जिंदगी बिताने के सपने बुन रही थी, उन सपनों से सेकंड में बाहर आकर उर्मिला ने शादी तोडऩे का ऐलान कर दिया. घर, परिवार, बराती, दुल्हा और मेहमान सब आवाक. उर्मिला ने इस ब्याह के लिये अपनी रजामंदी दी थी लेकिन उसे इस बात की खबर नहीं थी कि जिसे वह अपना जीवनसाथी बनाने जा रही है, वह नशे का आदी है. और यहां तक कि शादी के पवित्र मंडप में भी वह स्वयं को नशे से दूर नहीं कर पाया. उर्मिला को यह बात खल गयी और उसने शादी से इंकार कर दिया. उर्मिला के फैसले से सन्नाटा खिंच जाना स्वाभाविक था. कुछ समझाने बुझाने का दौर भी चला लेकिन उर्मिला अपने फैसले पर अडिग रही. लोगों को भी लगा कि उर्मिला का फैसला उचित है और वे उर्मिला के साथ खड़े हो गये. नशे में धुत्त दुल्हे को बैरंग वापस लौटना पड़ा. यह घटना है इसी साल 21 अप्रेल की. यह वही दिन था जब समूचा भारतीय समाज अक्षय तृतीया का उत्सव मना रहा होता है. इस साल का यह दिन इतिहास बन गया और उर्मिला एक ऐसी रोल मॉडल जिसके फैसले को नजीर मानकर युवतियों ने ऐसी शादी के खिलाफ स्वयं को खड़ा किया.
उर्मिला सोनवाने छत्तीसगढ़ राज्य के एक छोटे से कस्बानुमा नगर देवभोग की एक बहुत ही गरीब मध्यम परिवार की बेटी है. पिता ने अपनी जमीन बेचकर उर्मिला की शादी के लिये प्रबंध किया था. उर्मिला स्वयं राज्य शासन में एक  शासकीय कर्मचारी के तौर पर कार्य करती है. उर्मिला एक पिता की मजबूरी को समझती थी और वह अपने पिता के अरमानों को पूरा करना चाहती थी लेकिन वह अपनी जिंदगी को भी नरक नहीं बनने देना चाहती थी. अपने फैसले के बाद वह कहती है- कुछ खोकर भविष्य बचाया जा सकता है तो यह करना चाहिये. पिता की जमीन बिक गयी, यह सही है लेकिन मेरा भविष्य सुरक्षित हो गया. उर्मिला के इस फैसले से समाज का सन्नाटे में आ जाना कोई अनपेक्षित नहीं था लेकिन बदलाव की शुरूआत जो उर्मिला ने की है, उसकी गूंज देवभोग जैसे छोटे से हिस्से में ही नहीं बल्कि पूरे देश में होने लगी है. उर्मिला के इस साहसिक फैसले ने उन युवतियों को भी हौसला दिया है जो जानते और समझते हुये भी परिवार के दबाव में नशे का विरोध नहीं कर पाती थीं. आज वे भी ऐसे फैसले लेने के लिये आगे आ रही हैं. छत्तीसगढ़ के अनेक नगर और गांव में युवतियों ने अपना फैसला सुना दिया है कि शराबी दुल्हे से वे किसी भी कीमत पर ब्याह नहीं करेंगी.
छत्तीसगढ़ राज्य आदिवासी बाहुल्य राज्य है और शराब का नशा करना कभी इनकी जीवनशैली थी तो अब फैशन के रूप में यह जहर पूरे समाज को निगल रहा है. एक सच यह है तो दूसरा सच यह भी कि यह वही राज्य है जहां शराब के खिलाफ महिलाओं ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है. धुर आदिवासी जिला जशपुर में आज से तीन दशक पहले महिलाओं ने शराब के खिलाफ जो मोर्चा खोला था तो पुरूषों ने शराब से तौबा कर ली थी. इसी तरह अविभाजित मध्यप्रदेश में वर्तमान छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 40 किलोमीटर दूर स्थित भानसोज में शराब के खिलाफ महिलाओं ने 364 दिनों की लम्बी लड़ाई लड़ी थी और सरकार को हार मानकर शराब दुकान का लायसेंस निरस्त करना पड़ा था. बाद में शराब के खिलाफ इस आंदोलन पर पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय में पीएचडी की गई. शराब के खिलाफ छत्तीसगढ़ में महिलाओं ने दशकों से मोर्चा खोल रखा है और उर्मिला इस आवाज को आगे बढ़ाते हुये रोल मॉडल बन गयी हैं.
उर्मिला सोनवाने के इस साहसिक फैसले ने पूरे भारतीय समाज की दशा और दिशा बदल दी है. उर्मिला ने तो नशेड़ी दुल्हे को ठुकराया तो मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में एक युवती ने सलीके से बात नहीं करने पर ही शादी से इंकार कर दिया. मुख्यमंत्री सामूहिक योजना में शादी करने पहुंची युवती ने देखा कि उसका होने वाला पति अपने दोस्तों के साथ सरेआम गाली-गलौच से बात कर रहा है. गंदे-गंदे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है. युवती को अपने होने वाले पति का यह व्यवहार नागवार गुजरा. उसने सोचा कि आज शादी के मंडप में उसकी यह हालत है तो शादी के बाद वह उसके साथ भी ऐसी ही बदसलूकी करेगा. भविष्य की चिंता करते हुये युवती ने अपना रिश्ता तोड़ दिया. 
बदलते समय में बदलाव की यह बयार एक नये समाज के निर्माण का संकेत देती हैं. एक ऐसे समाज की जहां पुरूषों को अपनी मानसिकता बदलना होगी. सरकार और समाज को भी इस दिशा में उर्मिला, तुलेश्वरी और धनेश्वरी जैसी युवतियों के साथ खड़ा होकर नशे के खिलाफ संदेश देना होगा. बदलाव की यह बयार शुरू हो चुकी है।(

रविवार, 17 मई 2015

दोस्तों,
शोध पत्रिका "समागम" का मई 2015 का अंक सौपते हुए प्रसन्नता हो रही है. दुख इस बात का है कि हर बार एक नया वेतन आयोग आता है और हम सबको उम्मीद होती है कि अब की बार, वेतन भरमार होगी लेकिन ऐसा नहीं होता है. एक कोशिश है हमारी पीड़ा को आवाज़ देने की. अंक आपको कैसा लगा, ज़रूर बताएंगे।
संपादक

बुधवार, 6 मई 2015

सब्सिडी के त्यागी


मनोज कुमार
            नेताओं के बारे में कहा जाता है कि वे अपने प्रचार के लिये कोई भी अवसर नहीं खोते हैं. पिछले कुछ महीनों से यह देखा जा रहा है कि जो भी नेता, मंत्री, विधायक या अन्य पदों पर विराजे लोग गैस सब्सिडी छोड़ रहे हैं, इस पर बकायदा अखबारों के लिये खबर जारी की जाती है. हालांकि वे इस बहाने अपने नेता नरेन्द्र मोदी तक तो बात पहुंचाना चाहते ही हैं कि उनके आदेश का पालन किया गया है और आम आदमी के बीच अपनी छवि भी बनाना चाहते हैं. सवाल यह है कि एक नेता के गैस सब्सिडी छोड़ दिया जाना खबर है या अब तक उसकेे द्वारा गैस सब्सिडी का लाभ लिया जाना? क्या इस पर कोई विमर्श नहीं होना चाहिये कि मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनते और वे अपने नेताओं को सब्सिडी छोडऩे के लिये निर्देश नहीं देते तो क्या उनका जमीर स्वयं होकर नहीं जागता? क्या उन्हें नहीं लगता कि भारी-भरकम मानदेय के साथ ही अनेक किस्म की सरकारी सुविधाओं से लैस होने के बाद भी वे सब्सिडी का लाभ उठाना अनुचित था? 
           सब्सिडी के मुद्दे पर एक सवाल यह भी उठता है कि एक के बाद एक नेता सब्सिडी छोडऩे का ऐलान कर रहे हैं. क्यों एक साथ समूचे लोग सब्सिडी छोडऩे का संकल्प नहीं लेते हैं? क्यों प्रधानमंत्री को ऐसी छोटी-छोटी बातों के लिये पहल करनी पड़ रही है? क्यों जनता के जनप्रतिनिधि जनता के लिये मिसाल नहीं बनते हैं? ऐसे हजार क्यों हैं, जिसे जवाब का इंतजार है लेकिन जवाब नहीं मिलता है. एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या केवल गैस सब्सिडी ही छोड़ देने से देश की अर्थव्यवस्था को लाभ होगा, आम गरीब आदमी को लाभ होगा? शायद नहीं, ऐसे दर्जनों विषय हैं जिन पर प्रधानमंत्री को नहीं, स्वयं राजनेताओं को सोचना होगा. इससे पहले उन्हें सस्ती लोकप्रियता के लिये ऐसी खबरें जारी करने से स्वयं को रोकना होगा. अपने अधीनस्थ पीआरओ को निर्देश देना होगा कि वे इस तरह के निजी हित की खबरों को न जारी करें और न ही प्रकाशन-प्रसारण में अपनी समय व शक्ति का उपयोग करें. पीआरओ तो मंत्री-नेता को खुश करने के लिये ऐसा करते हैं और करते रहेंगे क्योंकि उन्हें तनख्वाह ही इसी बात की मिलती है लेकिन मंत्री-नेता स्व-विवेक से तय करें कि कौन सी खबर से उनकी इमेज बनती है और कौन सी खबर उनकी इमेज की सेहत खराब करती है. पीआरओ तो अपना काम करते हैं. अखबार वालों पर भी तरस आता है कि वे ऐसी मामूली और गैर-जरूरी खबरों को न केवल प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं बल्कि संबंधित नेता-मंत्री की तस्वीर लगाना भी नहीं भूलते हैं. इसके लिये अखबार के सम्पादक और रिपोर्टर दोनों की जवाबदेही बनती है. यह भी सच है कि इस तरह की खबरों को अनदेखा करने का साहस सम्पादक और रिपोर्टर कई बार चाहने के बावजूद नहीं दिखा पाते हैं क्योंकि उनके अखबार का हित जुड़ा होता है और पत्र स्वामी का दबाव बना होता है.  
           इस मामले में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को संजीदा होने की जरूरत है. उन्हें अपने नेताओं को ताकीद करना होगा कि सब्सिडी छोडऩे जैसा मामला जनहित का नहीं, बल्कि स्वयं के नैतिकता का है तो नैतिक आधार पर ऐसी खबरों को अखबारों में जारी नहीं किया जाये और न ही इसे प्रचारित किया जाये. अपितु एक कदम आगे बढ़ते हुये अपने क्षेत्राधिकार के अधिकार सम्पन्न और आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों को भी सब्सिडी छोडऩे के लिये प्रेरित करें ताकि सब मिलकर इस मुफ्तखोरी की आदत से मुक्ति पा सकें. होना यह चाहिये कि जिन नेताओं ने अब तक सब्सिडी का लाभ लिया है, उनसे इसके बदले मुआवजा वसूला जाना चाहिये. ऐसा किया गया तो आम आदमी में संदेश जाएगा कि हां, अब राजनीति नैतिक हो रही है. मोदीजी ने एक बेहतर पहल की है तो इस पहल को प्रपोगंंडा न बनाया जाये बल्कि समाजहित में इसे आगे बढ़ाने की पहल की जाये. एक भगीरथ प्रयास किया जाये और प्रयास को भगीरथ ही बनें रहने दें.

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

उम्मीद के मजदूर


मनोज कुमार
    एक मई की तारीख कितने लोगों को याद है? बस, उन चंद लोगों के स्मरण में एक मई शेष रह गया है जो आज भी इस उम्मीद में जी रहे हैं कि एक दिन तो हमारा भी आएगा. वे यह भी जानते हैं कि वह दिन कभी नहीं आएगा लेकिन उम्मीद का क्या करें? उम्मीद है कि टूटती नहीं और हकीकत में उम्मीद कभी बदलती नहीं. एक वह दौर था जब सरकार की ज्यादती के खिलाफ, अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने मजदूर सडक़ों पर चले आते थे. सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध करते हुये लाठी और गोली खाकर भी पीछे नहीं हटते लेकिन दुर्भाग्य देखिये. कैलेंडर पर जैसे-जैसे तारीख आगे बढ़ती गयी, मजदूर आंदोलन वैसे वैसे पीछे होता गया. अब तो मजदूर संगठनों की स्थिति निराशाजनक है. यह निराशा मजदूर संगठनों की सक्रियता की कमी की वजह से नहीं बल्कि कार्पोरेट कल्चर ने निराशाजनक स्थिति उत्पन्न की है.  मजदूर एकता जिंदाबाद के नारे सुने मुझे तो मुद्दत हो गये हैं. आपने शायद कभी सुना हो तो मुझेे खबर नहीं. भारत सहित समूचे विश्व के परिदृश्य को निहारें तो सहज ही ज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी कि मजदूर नाम का यह शख्स कहीं गुम हो गया है. 
    कार्पोरेट सेक्टर के दौर में मजदूर यूनियन गुमशुदा हो गये हैं. एक के बाद एक संस्थानों का निजीकरण किया जा रहा है. निजी संस्थाओं को मजदूरों की जरूरत नहीं होती है. दस मजदूरों का काम एक मशीन करने लगी है. कार्पोरेट सेक्टर को मजदूर नहीं गुलाम चाहिये. मजदूर कभी गुलाम नहीं हो सकता है. मशीन गुलाम होती है और गुलाम का कर्तव्य होता है आदेश का पालन करना. मशीन कभी आवाज नहीं उठाती है.  लगातार बढ़ती यंत्र व्यवस्था ने समूचे सामाजिक जीवन का ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर दिया है. हमारी जरूरतों के उत्पादों के निर्माण में यंत्रों के उपयोग से समय की बचत हो रही है, गुणवत्ता भी शायद ज्यादा होगी लेकिन जीवंतता नदारद है. एक मजदूर के बुने गये कपड़ों में उसकी सांसों की गर्मी सहज रूप से महसूस की जा सकती है. उसके द्वारा बुने गये धागों में मजदूर की धडक़न को महसूस किया जा सकता है. एक मशीन के उत्पाद में कोई जीवंतता नहीं होती है. इन उत्पादों से मनुष्य की बाहरी आवश्यकताओं की पूर्ति तो हो रही है किन्तु मन के भीतर संतोष का अभाव महसूस किया जा सकता है. 
     इस यंत्र व्यवस्था ने न केवल मजदूरों का हक छीना बल्कि लघु उद्योगों को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया है. हर तरफ यंत्र ने ऐसा कब्जा जमाया है कि आम आदमी स्वयं का गुलाम होकर रह गया है. रेल्वे स्टेशनों पर आपको कुलियों की फौज देखने को नहीं मिलेगी क्योंकि इस यांत्रिक व्यवस्था ने हर मुसाफिर को कुली बना दिया है. भारी-भरकम सूटकेस में लगे पहियों को खींचते हुये वह पैसा बचाने में लगा है. सूटकेस में लगे पहिये कुलियों को चिढ़ा रहे हैं और शायद कह रहे हैं ले, अब हो गई तेरी छुट्टी. छुट्टी कुली के रोजगार की ही नहीं हुई है बल्कि उसके चौके-चूल्हे की भी हो गई है. मजदूरी नहीं मिलेगी तो चूल्हा जलेगा कैसे? ऐसे कई काम-धंधे हैं जिन्होंने कामगारों के हाथों को बेकार और बेबस किया है. सत्ता और शासकों की नींद उड़ा देने वाली आवाज आहिस्ता आहिस्ता मंद पडऩे लगी है. यंत्रों ने जैसे मजदूरों की शेर जैसी दहाड़ को अपने भीतर कैद कर लिया है. शायद यही कारण है कि मजदूर दिवस की ताप से अब समाज गर्माता नहीं है. सोशल मीडिया में भी मई दिवस की आवाज सुनाई नहीं देती है. अखबार के पन्नों पर कहीं कोई खबर बन जाये तो बड़ी बात, टेलीविजन के पर्दे पर भी मजदूर दिवस एक औपचारिक आयोजन की तरह होता है. हैरान नहीं होना चाहिये कि आपका बच्चा कहीं आपसे यह सवाल कभी कर बैठे-यह मजदूर क्या होता है? नयी पीढ़ी को तो यह भी नहीं पता कि एक मई क्या होता है?  इस विषम स्थिति के बावजूद मजदूर उम्मीद से है. उसे इस बात का इल्म है कि दुनिया बदल रही है. इस बदलती दुनिया में मजदूर की परिभाषा भी बदल गई है लेकिन मजदूर और किसान कभी नाउम्मीद नहीं होते. उनकी दुनिया बदल जाएगी, इस उम्मीद के साथ वे जीते हैं. वे मौका आने पर कह भी देते हैं कि - ‘हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे/इक गांव नहीं, इक खेत नहीं, सारी की सारी दुनिया मांगेंगे. उम्मीद से जीते मजदूर और मजदूर दिवस को मेरा लाल सलाम. 

रविवार, 26 अप्रैल 2015

एक रिपोर्टर के रोमांचक अनुभव का दस्तावेज है किताब ‘ऑंखों देखी फॉंसी’


भोपाल। किताब ‘ऑंखों देखी फॉंसी’ एक रिपोर्टर के रोमांचक अनुभव का दस्तावेज है. किसी पत्रकार के लिये यह अनुभव बिरला है तो संभवत: हिन्दी पत्रकारिता में यह दुर्लभ रिपोर्टिंग. लगभग पैंतीस वर्ष बाद एक दुर्लभ रिपोर्टिंग जब किताब के रूप में पाठकों के हाथ में आती है तो पीढिय़ों का अंतर आ चुका होता है. बावजूद इसके रोमांच उतना ही बना हुआ होता है जितना कि पैंतीस साल पहले. एक रिपोर्टर के रोमांचक अनुभव का दस्तावेज के रूप में प्रकाशित किताब ‘ऑंखों देखी फॉंसी’ हिन्दी पत्रकारिता को समृद्ध बनाती है. देश के ख्यातनाम पत्रकार एवं राजनीतिक विश£ेषक के रूप में स्थापित श्री गिरिजाशंकर की बहुप्रतीक्षित किताब का विमोचन भोपाल में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने 25 अप्रेल 2015 को एक आत्मीय आयोजन में किया. इस अवसर पर कार्यक्रम में वरिष्ठ सम्पादक श्री श्रवण गर्ग भी उपस्थित थे.
किताब लोकापर्ण समारोह में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने कहा कि उनके लिये यह चौंकाने वाली सूचना थी कि फांसी की आंखों देखा हाल कव्हरेज किया गया हो. वे अपने उद्बबोधन में कहते हैं कि किताब को पढऩे के बाद लगा कि समाज के लिये बेहद जरूरी किताब है. वे कहते हैं कि फांसी के मानवीय पहलुओं को लेखक ने बड़ी गंभीरता से उठाया है. उनका कहना था कि गिरिजा भइया जितने सहज और सरल हैं और उतने ही संकोची भी बल्कि वे भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं जो थोड़े में संतोष कर लेते हैं. 
किताब लोकापर्ण समारोह की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ सम्पादक श्री श्रवण गर्ग ने कहा कि-यह किताब रिपोर्टिंग का अद्भुत उदाहरण है. एक 25 बरस के नौजवान पत्रकार की यह रिपोर्टिंग हिन्दी पत्रकारिता के लिये नजीर है. उन्होंने किताब में उल्लेखित कुछ अंश को पढक़र सुनाया तथा कहा कि आज तो हर अपराध पर फांसी दिये जाने की मांग की जाती है. फांसी कभी दुर्लभ घटना हुआ करती थी लेकिन आज वह सार्वजनिक हो चुका है. उन्होंने दिल्ली में किसान गजेन्द्रसिंह द्वारा लगाये जाने वाले फांसी के संदर्भ में अपनी बात कही.
किताब लोकार्पण समारोह में लेखक श्री गिरिजाशंकर ने अपने अनुभव उपस्थित मेहमानों के साथ साझा करते हुये कहा कि यह किताब कोई शोध नहीं है और न कोई बड़ी किताब, लाईव कव्हरेज एवं अनुभवों को पुस्तक के रूप में लिखा गया है. श्री गिरिजाशंकर कहते हैं कि 25 बरस की उम्र में जब मुझे फांसी का लाइव कव्हरेज करने का अवसर मिला था, तब यह इल्म नहीं था कि कौन सा दुर्लभ काम करने जा रहे हैं. अखबार में फांसी का लाइव कव्हरेज प्रकाशित हो जाने के बाद जब देशभर में यह रिपोर्टिंग चर्चा का विषय बनी तब अहसास हुआ कि यह रिपोर्टिंग साधारण नहीं थी. 
फांसी की रिपोर्टिंग की यह दुर्लभ घटना हिन्दी पत्रकारिता के लिये स्वर्णकाल है. उल्लेखनीय है कि वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर के सेंट्रल जेल में वर्ष 1978 में बैजू नामक अपराधी को चार हत्याओं के लिये फांसी की सजा दी गई थी.

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

21 अप्रेल अक्षय तृतीया पर विशेष


रूढिय़ों से मुक्त करेंगी हमारी बेटियां 
-मनोज कुमार
भारतीय उत्सव एवं तीज-त्योहारों में एक प्रमुख और शुभ दिन यूं तो अक्षय तृतीया को माना गया है किन्तु यह दिन भारतीय समाज के लिये कलंक का दिन भी होता है जब सैकड़ों की संख्या में दुधमुंहे बच्चों को शादी के बंधन में बांध दिया जाता है. समय परिवर्तन के साथ सोच में बदलाव की अपेक्षा किया जाना सहज और सरल है लेकिन व्यवहार रूप में यह कठिन भी. बाल विवाह नियंत्रण के लिये कानून है लेकिन कानून से समाज में कोई खौफ उत्पन्न हुआ हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता है. बीते एक दशक में समाज की सोच में परिवर्तन दिखने लगा है तो यह बदलाव राज्य सरकारों द्वारा महिलाओं के हित में क्रियान्वित की जा रही वह विविध योजनायें हैं. यह योजनायें महिलाओं में शिक्षा से लेकर रोजगार तक के अवसर दे रही हैं. इसके पहले समाज के समक्ष बेटियों के लिये ऐसा कोई ठोस विकल्प नहीं था, सो बाल विवाह कर जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना ही एक रास्ता था लेकिन अब पूरे देश में बेटियों के लिये आसमान खुला है. वे जहां तक चाहें, उड़ सकती हैं, खिलखिला सकती हैं. शादी की बेडिय़ां टूटने लगी हैं. 
भारतीय समाज में बाल विवाह एक पुरातन रूढि़वादी परम्परा रही है. दुर्भाग्यजनक बात तो यह है कि बदलते समय के साथ हम अपनी मानसिकता नहीं बदल पा रहे थे. दुनियादारी से अबूझ बच्चों को शादी के बंधन में बांध कर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते थे. यह दृष्टि खासतौर पर बेटियों के लिये थी क्योंकि सयानी बेटी के लिये दहेज एक भीषण संकट होता था. महिला शिक्षा का प्रतिशत तो शर्मनाक था. कहने के लिये हम आजाद भारत के नागरिक हैं किन्तु स्त्रियों के साथ जो कुछ होता था, वह शर्मनाक है. हमारा यह भी आशय नहीं है कि सारी दुनिया बदल गयी है लेकिन बदलाव की आहट से रूढि़वादी परम्परा के खिलाफ एक उम्मीद की किरण जागी है. बहुत समय नहीं हुुआ है. कोई एक और अधिकतम डेढ़ दशक का समय है जब समाज की सोच बदलने के लिये सरकारों ने लोकतांत्रिक ढंग से एक बेहतर शुरूआत की है. महिला सशक्तिकरण की बातें करते युग गुजर गया लेकिन महिला सशक्तिकरण की कोई मुकम्मल तस्वीर नहीं बन पायी थी. आज स्थिति एकदम उलट है.
राज्य सरकारों ने सुनियोजित ढंग से बेटियों की सुरक्षा, विकास और आत्मविश्वास के लिये योजनाओं का श्रीगणेश किया. बेटियों को आगे बढऩे के लिये शिक्षा पहली शर्त थी और इसके लिये सारे उपाय किये गये. स्कूल तो पहले ही थे लेकिन फीस, कॉपी-किताब और गणवेश के लिये मां-बाप के पास धन नहीं था. घर से स्कूल की दूरी इतनी होती थी कि पालक बेटियों को पढ़ाना नहीं चाहते थे. सरकारों ने समस्या को देखा और इन समस्याओं को चुटकियों में हल कर दिया. शिक्षा नि:शुल्क हो गई. कॉपी-किताब और गणवेश सरकार के खाते से मिलने लगी और स्कूल आने-जाने के लिये सायकल भी मुहय्या करा दी गई. स्कूल के बाद कॉलेज की शिक्षा का प्रबंध भी सरकार ने कर दिया. शिक्षा ने बेटियों के मन में आत्मविश्वास उत्पन्न किया और वे देखते ही देखते सशक्त होती चली गयीं. पाठशाला से परदेस तक शिक्षा हासिल करने का रास्ता सरकार ने बेटियों के लिये सुगम कर दिया है. सरकार ने शिक्षित बेटियों के साथ साथ उन महिलाओं के लिये नये नये रोजगार के अवसर उत्पन्न किये जिसके चलते वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गयीं. गांव-गांव में फैली स्व-सहायता समूह से जुड़ी महिलायें न केवल आय अर्जित कर रही हैं बल्कि समाज के विकास में वे अपनी समझ का लोहा भी मनवा रही हैं. पंचायतों में उनकी सक्रिय भागीदारी से विकास का नया ककहरा लिखा जा रहा है. 
शासन की विभिन्न लोककल्याणकारी योजनाओं के निरंतर क्रियाशील रहने से अनेक रूढि़वदी परम्पराओं पर नियंत्रण पाने में आसानी होने लगी है. रूढि़वादी परम्पराओं में से एक बाल विवाह विकासशील समाज के लिये चुनौती था. इससे निपटने के लिये सरकार ने जहां बेटियों को स्वयं के स्तर पर सक्षम हो जाने के अवसर दिये, वहीं उन्होंने पालकों को शासन की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से आश्वतस्त किया कि बेटियों के ब्याह की चिंता ना करें. शासन का यह आश्वासन कागजी नहीं था. बेटियों के जन्म लेने से लेकर शिक्षा और उनके ब्याह की जिम्मेदारी सरकार ने स्वयं ले ली थी. बेटियों को जन्म के साथ ही आर्थिक सुरक्षा प्रदान की गई जो 18 बरस की होते होते लखपति बन जाती हैं. बेटियों की शादी के लिये आर्थिक मदद के साथ ही गृहस्थी के सामान का बंदोबस्त कर दिया जिससे पालक बेफ्रिक हो गये. 
शासन की इन योजनाओं ने समाज का मन बदला है. डेढ़ दशक पहले के बाल विवाह के आंकड़ों को देखें और आज तो यह बात साफ हो जाती है कि लोगों का मानस बदल रहा है. यह कहना भी बेमानी होगी कि शासन की योजना के कारण समूचे समाज का मानस बदल चुका है लेकिन बदलाव के लिये कदम बढ़ चुके हैं. यह बदलाव नहीं है बल्कि बदलाव की बयार है जो आने वाले समय में पूरा परिदृश्य बदल कर रख देगी. यह बदलाव लाने का उपक्रम शासन की योजनाओं से हुआ हो लेकिन बदलाव का सबब बनेंगी आज शिक्षा हासिल करती बेटियां. आज सशक्त होती बेटियां, आज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती बेटियां. आज की बेटियां, कल का भविष्य हैं और यही एक नये भारत का निर्माण करेंगी जहां बाल विवाह, दहेज और छुआछूत जैसे सामाजिक कोढ़ से मुक्त होगा हमारा समाज.