गुरुवार, 27 अगस्त 2015

शोध पत्रिका "समागम" का नया अंक














शोध पत्रिका "समागम" का नया अंक हिंदी पर केंद्रित है. हिंदी के विविध पक्षों पर सारगर्भित लेखो के साथ शोध आलेख भी है. इस अंक का संपादन हिंदी की सुपरिचित साहित्यकार डॉ उर्मिला शिरीष ने किया है. भोपाल से प्रकाशित इस पत्र्रिका के संपादक मनोज कुमार है. 

बुधवार, 26 अगस्त 2015

लाइवलीहुड कॉलेज अर्थात कौशल उन्नयन

-मनोज कुमार
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से निकल कर धुर नक्सली जिला कांकेर के रास्ते में लाइवलीहुड कॉलेज का नाम लिखा पढ़ा तो एकबारगी समझ में ही नहीं आया कि यह कौन सा कॉलेज है और किस प्रकार की पढ़ाई होती है। कार अपनी र$फ्तार से चल रही थी और मन में जिज्ञासा उससे कहीं अधिक गति से। मैं जल्द से जल्द लाइवलीहुड कॉलेज के बारे में जान लेना चाहता था। तभी कार एक होटल के करीब रूकी। साथ के लोगों का ध्यान खाने-पीने में था तो मैं किसी ऐसे व्यक्ति को तलाश कर रहा था जो मुझे लाइवलीहुड कॉलेज के बारे में बता सके। इतने में देखा कि दो युवक लाइवलीहुड कॉलेज के बारे में बात कर रहे हैं। मेरी जिज्ञासा को शांत करने का इससे बेहतर अवसर नहीं मिल सकता था। मैं उन युवको के करीब गया और उनसे इस कॉलेज के बारे में पूछा तो उन्होंने तपाक से कहा-शायद आप हमारे छत्तीसगढ़ के नहीें हैं? मैंने हां में सिर हिलाया तो उन्होंने बताया कि इस लाइवलीहुड कॉलेज ने युवाओं की जिंदगी में रोमांचक बदलाव लाया है। 8-10वीं पास युवाओं से लेकर एमए,एमकाम युवाओं को इस कॉलेज में उनकी रूचि के अनुरूप विभिन्न ट्रेड में प्रशिक्षण दिया जाता है। अभी तक प्रशिक्षण के अभाव में रोजगार नहीं मिल पाता था लेकिन अब मुश्किल आसान हो गई है। अब हमारे पास रोजगार है और हम स्वयं के उद्यमी भी हैं।
युवकों से चर्चा के बाद यह तो पता चल गया कि लाइवलीहुड कॉलेज, औपचारिक शिक्षा देने वाले कॉलेजों से अलग है किन्तु इसके बारे में जब विस्तार से जानने का मौका मिला तो लगा कि छत्तीसगढ़ ने विकास के रास्ते बनाना खुद सीख लिया है। लाइवलीहुड कॉलेज मुख्यमंत्री कौशल उन्नयन योजना का एक उपक्रम है। राज्य के सभी 27 जिलों में लाइवलीहुड कॉलेज की स्थापना की गई है और इन कॉलेजों में राज्य के युवाओं को नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है। मोटेतौर पर अब तक एक लाख से अधिक युवाओं को विभिन्न कार्यों का प्रशिक्षण दिया गया है। प्रशिक्षण उपरांत कुछेक ने राज्य के उद्योगों में नौकरी प्राप्त कर ली है तो अनेक ऐसे हैं जिन्होंने स्वयं का उद्यम स्थापित कर जीवोकोपार्जन कर रहे हैं। लाइवलीहुड कॉलेज में ट्रेनिंग प्राप्त करने वालों में लडक़े और लड़कियां दोनों हैं। लाइवलीहुड कॉलेज का यह कांसेप्ट वास्तव में रोजगार की दिशा खोलने के लिए अनूठा है। 
जब उद्देश्य बड़ा हो और इरादा मजबूत हो, तो कोई भी लक्ष्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। कांकेर का केशरी इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है। कल तक रेलगाड़ी में सफर करना उसके लिए सपना था, आज वही केसरी दूसरे राज्य में जाकर अपने कौशल के बूते 10-12 हजार रुपये महीना कमा रहा है। केशरी अकेला नहीं है बल्कि 70 युवाओं को अत्याधुनिक मशीनों पर प्लास्टिक टंकी, टेबल, कुर्सी, मोबाईल व अन्य प्लास्टिक से बनने वाले उत्पादों के निर्माण का प्रशिक्षण दिया गया। छह महीने के प्रशिक्षण में वे अपने अपने कामों में इतना दक्ष हो गए कि तुरत-फुरत में हरियाणा की कम्पनी ने अपने पास बुला लिया।
इसी तरह लाइवलीवुड कालेज से प्रषिक्षण प्राप्त कर स्वरोजगार को अपनाने वाले कटघोरा विकासखण्ड के ग्राम डोंगरी का कृष्णादास महंत, विकासखंड करतला के ग्राम तरदा का नोहरलाल पटेल,विकासखंड पोड़ी उपरोड़ा के ग्राम लालपुर का राजू सिंह को भी किसी बड़े उद्योग में काम मिलने का इंतजार है लेकिन अभी भी वे बेरोजगार नहीं है। इलेक्ट्रिक कामों में प्रशिक्षण प्राप्त कर  विद्युत सुधार कार्य से महीने में 5 से 8 हजार रूपये की आमदनी कर रहे हैं। लोमेष कश्यप ने बताया कि प्रशिक्षण के बाद स्वयं का  लाइट डेकारेशन का प्रतिष्ठान स्थापित कर 7 सात हजार रूपये तक कमाई कर लेता है।  भानु प्रताप लाइवलीवुड कालेज में एक माह का प्रशिक्षण लेकर विद्युत उपकरण सुधारने,वायरिंग का कार्य सीखा है। आज खुद हाउस वायरिंग का ठेका लेकर कार्य करता है। इस कार्य से 7 से 8 हजार रूपये कमाई कर लेता है। 
हुनर है तो कदर है की भावना को लाइवलीहुड कालेज में चरितार्थ किया है। हुनरमंद युवा अब प्रशिक्षण प्राप्त कर आत्मनिर्भरता की राह में आगे बढ़ रहे हैं। प्रशिक्षण के अभाव में जहां पहले काम के लिए भटकना पड़ता था। वहीं अब प्रशिक्षित होकर मनचाहा रोजगार प्राप्त करने में कामयाब हो रहे हैं। काम के अभाव में उसे नाउम्मीदी एवं हताशा की परछाईया से पीछे छुड़ाने में सफलता मिल रही है। यह कहना है भिलाई स्थित लाइवलीहुड कालेज में प्रशिक्षण ले रहे कुमारी अनिता मित्रा  ने बताया कि वह बारहवी पास है और वह काम की तलाश में कई प्रतिष्ठानों के पास गई किन्तु उसे अप्रशिक्षित एवं अनुभव के अभाव में काम पर नहीं रखा गया। उन्होंने कौशल उन्नयन अंतर्गत अस्पताल प्रबंधन का कोर्स कर अब कोण्डागांव के प्राइवेट अस्पताल में काम कर रही है। वेतन भी अच्छा मिल रहा है और उस पैसे से वह अपने छोटे भाई की पढ़ाई का खर्च उठाने के साथ ही परिवार की जरूरत का खर्च भी वहन कर ले रही है। लाईवलीहुड कॉलेज जांजगीर में सिलाई-कढ़ाई का नि:शुल्क प्रशिक्षण प्राप्त कर रही 60 महिलाएं भी गणवेश सिलाई का कार्य कर रहीं है। चार माह के प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को नि:शुल्क यूनीफार्म, प्रतिदिन नि:शुल्क स्वल्पाहार प्रदान किया जा रहा है। श्रीमती सरिता महंत ने बताया कि सिलाई प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद वह स्वयं का सिलाई सेंटर खोलेंगी । इसी तरह कु. राधिका सूर्यवंशी ने का कहना है कि अब वो किसी पर आश्रित नही रहेंगी बल्कि स्वयं के साथ ही दूसरे लोगों को भी रोजगार दे सकेंगी। नैला की कुमारी प्रभा ने बताया कि सिलाई सिखाने वाली निजी संस्थाओं की फीस अधिक होनें के कारण उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी। लाईवलीहुड कालेज में नि:शुल्क आवसीय प्रशिक्षण की सुविधा मिलने से उनकी यह इच्छा पूरी हो गई है। 

ये लोग महज एक बानगी हैं लाईवलीहुड कॉलेज की सफलता के। पूरे राज्य में, हर जिले में और अब तहसील और विकासखंड स्तर तक लाईवलीहुड कॉलेज की चर्चा होने लगी है। राज्य सरकार युवाओं को स्वयं में आत्मनिर्भर बनाना चाहती है और केन्द्र सरकार की मंशा के अनुरूप कौशल उन्नयन का यह रास्ता एक नयी सुबह का संकेत करती है। छत्तीसगढ़ राज्य की इस नयी पहल लाईवलीहुड कॉलेज की प्रक्रिया को समझने के लिए दूसरे राज्यों के मंत्री-अधिकारी आए और वे इस कौशल उन्नयन के नए मॉडल को अपने राज्य में भी आरंभ करना चाहते हैं। नक्सली समस्या से जूझते छत्तीसगढ़ के लिए लाईवलीहुड कॉलेज एक आशा की किरण है जो स्वयं में आत्मनिर्भर बनाता है।

बुधवार, 19 अगस्त 2015

नए मिजाज का शहर

मनोज कुमार
यायावरी के अपने मजे होते हैं और मजे के साथ साथ कुछ अनुभव भी. मेरा यकीन यायावरी पत्रकारिता में रहा है. यायावरी का अर्थ गांव गांव, देश देश घूूमना मात्र नहीं है बल्कि यायावरी अपने शहर में भी की जा सकती है. मेरा अपना भोपाल शहर. ठंडे मिजाज का शहर, हमदर्द शहर. एक मस्ती और रवानगी जिस शहर के तासीर में हो, उस शहर में जीने का मजा ही कुछ और होता है. बड़े तालाब में हिल्लोरे मारती लहरें किसी को दीवाना बनाने के लिए काफी है तो संगीत की सुर-लहरियों में खो जाने के लिए इसी तालाब के थोड़े करीब से बसा कला गृह भारत भवन रोज ब रोज आपको बुलाता है. सुस्त शहर की फब्तियां भी इस शहर पर लोग दागते रहे हैं. जिन्हें पटियों पर बैठकर शतरंज खेलने का सउर ना हो, वह क्या जाने इस सुस्ती की मस्ती. यह वही पटिया है जहां भोपाल की गलियों से लेकर अमेरिका तक की चरचा भोपाली कर डालते हैं. पटिये की राजनीति ने किन किन को बुलंदियों तक पहुंचा दिया, इसकी खबर तो इतिहास ही रखता है. मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इससे किसी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है, परंतु चिंता सब रखते हैं कि इस बार मुख्यमंत्री की गद्दी पर कौन बैठेगा. मुख्यमंत्री की दौड़ में आगे-पीछे होते नेताओं को भी खबर नहीं होती है लेकिन पटियेबाजों को उनका पूरा इतिहास मालूम होता है. ऐसा है मेरा भोपाल.
मेरे भोपाल की बुनावट और बसाहट नवाबों ने की थी. वक्त के साथ नवाब फना हो गए. नवाब भले ही ना रहे लेकिन नवाबी तासीर भोपाल को दे गए. मेरा शहर भोपाल कभी जल्दबाजी में नहीं रहता है. सुकून की जिंदगी जीता है और भाईचारे के साथ यहां के लोग बसर करते हैं. गंगा-जमुनी संस्कृति इस शहर की तहजीब और पहचान है. पर ये क्या..मेरे भोपाल को किसी की नजर लग गयी है..वह भी महानगर बनने को बेताब नजर आने लगा है..भोपाल की तासीर बदलने लगी है..सुकून का मेरा भोपाल अब हड़बड़ी में रहता है..कभी घंटों की फिकर ना करने वाले भोपाली अब सेकंड का हिसाब रखने लगे हैं. खीर, सेंवई, घेवर और मीठे समोसे के साथ पोहे-जलेबी का स्वाद अब मुंह से उतरने लगा है. पिज्जा और बर्गर का चस्का भोपाल को लग गया है..मोटरसायकलों पर बैठे युवा को सेकंड में पिज्जा-बर्गर पहुंचाना है. यह जल्दबाजी महानगर की तासीर है. मेरा शहर भोपाल भी इस तरफ चल पड़ा है. को खां..कहने वाले भी अब गुमनाम हो रहे हैं..हाय, हलो के चलन ने भोपालियों को मेट्रो सिटी का सिटीजन बना दिया है, लगभग रेंगते हुए भटसुअर सडक़ से बाहर हो गए हैं..तेज रफ्तार से दौड़ती महंगी बसों ने इन खाली हुए सडक़ों पर कब्जा जमा लिया है. हवाओं से बात करते ये मोटरों ने भोपाल की सुस्ती को हवा कर दिया है.
पच्चीस-तीस बरस पहले जब मैं भोपाल आया था. तब यह शहर दो हिस्सों में बंटा था. पुराना भोपाल और नया भोपाल. बैरागढ़ की पहचान भोपाल के उपनगर के तौर पर था तो सही, लेकिन उसे भी पुराने भोपाल का हिस्सा मान लिया जाता था. नए भोपाल के पास नम्बरों के मोहल्ले थे. मसलन, दो नम्बर स्टाप से शुरू होते हुए पांच, छह, साढ़े छह, सात, दस, ग्यारह और बारह नम्बर तक था. अब भोपाल पसर रहा है. एक समय था भोपाल के एक छोर से दूसरे छोर जाने में ज्यादा से ज्यादा घंटे का वक्त लगता था, अब भोपाल के एक छोर से दूसरे छोर पहुंचने के लिए आपको लगभग आधा दिन का वक्त लग जाएगा. जयप्रकाश अस्पताल से बागमुगालिया जाना चाहें तो कम से कम दो घंटे का वक्त लगेगा. कई बार बढ़ती भीड़ के कारण यह समय और भी अधिक हो सकता है. ऐसा ही दूसरे और फैल गए इलाकों के लिए भी है. 
मेट्रो सिटी की इस नयी सूरत ने मेरे भोपाल के मायने ही बदल दिए हैं. कभी अपने जर्दा, पर्दा और मर्दा के लिए मशहूर भोपाल की जरदोजी दुनिया में ख्यात थी लेकिन एंडरसन ने ऐसे घाव दिए कि अब भोपाल गैस त्रासदी के लिए अपनी साख रखता है. तीस बरस पहले रिसी गैस से जो घाव मिले, वह आज भी रिस रहे हैं और जाने आगे कब तक रिसता रहेगा, कोई कह नहीं सकता. दुनिया भर से लोग मरहम लगाने के नाम पर आते हैं और जख्म कुरेद कर चले जाते हैं. यह हकीकत है, इससे आप इंकार नहीं कर सकते. इंकार तो इस बात से भी आप नहीं कर सकते कि इस गैस ने जिनके घर उजाड़े, वे तो दुबारा बस नहीं पाये लेकिन इस उजड़े हुए घरों की मिट्टी ने कई नए इमारतों की बुनियाद डाल दी. इस सच से उस दौर के आफिसर इत्तेफाक रखते हैं और बड़े मजे में फरमाते हैं-चलो, कुछ बातें करते हैं बनारस की. भूल जाइए उस गैस त्रासदी को. इस बयान से भी मेरा शहर तपता नहीं है. उसे खबर है कि जख्म देने वाले वही हैं तो उनसे दवा की क्या उम्मीद करें. 
मेरा भोपाल महानगर बन रहा है तो उसकी तासीर भी महानगर की होनी चाहिए. कभी पर्दानशी शहर कहलाने वाले मेरे भोपाल में अब पर्दा के लिए कोई जगह नहीं बची है, ऐसा लगने लगा है. खासतौर पर नए शहर के युवाओं का मिजाज तो यही बयान करता है. झील के आसपास कहीं एक-दूसरे के आगोश में गिरफ्त युवक-युवतियां तो कहीं मर्यादा को तार तार करते होठों का सरेराह रसपान करते युवा. जिस्मानी भूख अब कमरे से बाहर निकल कर सडक़ों पर दिख रही है. कुछ कहना बेकार और बेमतलब होगा क्योंकि ये नए मिजाज का शहर है. इस जवानी को और ताप देने के लिए कुछ और करने की जरूरत होती है. नशा न हो तो नशेमन की बात भी अधूरी रह जाती है. मेरे भोपाल में शराब का चलन नया नहीं है लेकिन इन दिनों नई रीत चल पड़ी है..हैरान हूं इस बात से कि देखते ही देखते शराबों की दुकानों की तादाद एकदम से बढ़ गई. हैरानी तो इस बात की है कि जिन्हें बेचने के लिए मुकम्मल ठिकाना नहीं मिला तो टेंट लगाकर अपना ठिकाना तय कर लिया..किसी ने चार पहिया गाड़ी को ही इसका पता बता दिया..जिस्म की नुमाईश और शराब के नए-नए ठिकाने.. और क्या चाहिए एक मेट्रोसिटी को..
अदब के मेरे शहर भोपाल में अभी रौनक बाकी है..झीलों का जिक्र होता है तो मेरे भोपाल का नाम छूटता नहीं और हरियाली की बात आती है तो मेरा भोपाल किसी से कमतर नहीं..विकास के इस दौड़ में भी मेरे भोपाल की हरियाली ने भी दम तोड़ा है लेकिन मरा नहीं है..लोगों में अपने शहर को लेकर जज्बा कायम है. बड़ी झील की सफाई का मसला सामने आया तो क्या अमीर और क्या गरीब..सब जुट गए थे श्रमदान के लिए.. देखते ही देखते बड़ी झील की तस्वीर बदल डाली..गाद ने झील को सिमटने के लिए मजबूर किया था तो भोपालियों के जज्बे ने गाद को बाहर का रास्ता दिखा दिया..लहरों से खेलना हो तो भोपाल की बड़ी झील में जरूर आएं..हर गम..हर दर्द..यकीनन आप भूल जाएंगे..मीठी यादें साथ लेकर जाएंगे..मेरा भोपाल बदल रहा है..लेकिन उम्मीद बदली नहीं है..आज भी बदलाव के इस दौर में भोपाली बटुआ से खूबसूरत कोई तोहफा नहीं होता है..इस खूबसूरत शहर को भले ही हम नए मिजाज के शहर के तौर पर देखने की कोशिश करें लेकिन देखना होगा आपको उसी झीरी से जहां कभी भोपाल था और हमेशा रहेगा..

बुधवार, 5 अगस्त 2015

राजेन्द्र माथुर की गैरहाजिरी के 25 साल

जन्मदिन 8 अगस्त पर विशेष

-मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार 
किसी व्यक्ति के नहीं रहने पर आमतौर पर महसूस किया जाता है कि वो होते तो यह होता, वो होते तो यह नहीं होता और यही खालीपन राजेन्द्र माथुर के जाने के बाद लग रहा है। यूं तो 8 अगस्त को राजेन्द्र माथुर का जन्मदिवस है किन्तु उनके नहीं रहने के पच्चीस बरस की रिक्तता आज भी हिन्दी पत्रकारिता में शिद्दत से महसूस की जाती है। राजेन्द्र माथुर ने हिन्दी पत्रकारिता को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया, वह हौसला फिर देखने में नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि उनके बाद हिन्दी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने में किसी ने कमी रखी लेकिन हिन्दी पत्रकारिता में एक सम्पादक की जो भूमिका उन्होंने गढ़ी, उसका सानी दूसरा कोई नहीं मिलता है। राजेन्द्र माथुर के हिस्से में यह कामयाबी इसलिए भी आती है कि वे अंग्रेजी के विद्वान थे और जिस काल-परिस्थिति में थे, आसानी से अंग्रेजी पत्रकारिता में अपना स्थान बना सकते थे लेकिन हिन्दी के प्रति उनकी समर्पण भावना ने हिन्दी पत्रकारिता को इस सदी का श्रेष्ठ सम्पादक दिया। इस दुनिया से फना हो जाने के 25 बरस बाद भी राजेन्द्र माथुर दीपक की तरह हिन्दी पत्रकारिता की हर पीढ़ी को रोशनी देने का काम कर रहे हैं।
राजेन्द्र माथुर की ख्याति हिन्दी के यशस्वी पत्रकार के रूप में रही है। शायद यही कारण है कि हिन्दी पत्रकारिता की चर्चा हो और राजेन्द्र माथुर का उल्लेख न हो, यह शायद कभी नहीं होने वाला है। राजेन्द्र माथुर अपने जीवनकाल में हिन्दी पत्रकारिता के लिये जितना जरूरी थे, अब हमारे साथ नहीं रहने के बाद और भी जरूरी हो गये हैं। स्वाधीन भारत में हिन्दी पत्रकारिता के बरक्स राजेन्द्र माथुर की उपस्थिति हिन्दी की श्रेष्ठ पत्रकारिता को गौरव प्रदान करता है। पराधीन भारत में जिनके हाथों में हिन्दी पत्रकारिता की कमान थी उनमें महात्मा गांधी से लेकर पंडित माखनलाल चतुर्वेदी थे। इन महामनाओं के प्रयासों के कारण ही भारत वर्ष अंग्रेजों की दासता से मुक्त हो सका। इस मुक्ति में हिन्दी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत वर्ष के स्वाधीन हो जाने के बाद एकाएक अंग्रेजी ने ऐसी धाक जमायी कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजियत की छाया से भारतीय समाज मुक्त नहीं हो पाया था। स्वाधीनता के बाद ऐसे में हिन्दी पत्रकारिता पर संकट स्वाभाविक था किन्तु इस संकट के दौर में मध्यप्रदेश ने एक बार फिर अपनी भूमिका निभाई और मालवा अंचल से राजेन्द्र माथुर नाम के एक ऐसे नौजवान को कॉलम राइटर के रूप में स्थापित किया जिसने बाद के वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता को नई ऊंचाई दी बल्कि यह कहना भी गैरवाजिब नहीं होगा कि अंग्रेजी पत्रकारिता भी उनसे रश्क करने लगी थी। यह गैरअस्वाभाविक भी नहीं था क्योंकि अखबारों की प्रकाशन सामग्री से लेकर प्रसार संख्या की द्ष्टि से हिन्दी के प्रकाशन लगातार विस्तार पा रहे थे। सीमित संचार सुविधायें और आवागमन की भी बहुत बड़ी सुविधा न होने के बावजूद हिन्दी प्रकाशनों की प्रसार संख्या लाखों तक पहुंच रही थी। अंग्रेजी पत्रकारिता इस हालात से रश्क भी कर रही थी और भय भी खा रही थी क्योंकि अंग्रेजी पत्रकारिता के पास एक खासवर्ग था जबकि हिन्दी के प्रकाशन आम आदमी की आवाज बन चुके थे। हिन्दी पत्रकारिता की इस कामयाबी का सेहरा किसी एक व्यक्ति के सिर बंधता है तो वह हैं राजेन्द्र माथुर। 
बेशक राजेन्द्र माथुर अंग्रेजी के ज्ञाता थे, जानकार थे लेकिन उनका रिश्ता मालवा की माटी से था, मध्यप्रदेश से था और वे अवाम की जरूरत और आवाज को समझते थे लिहाजा हिन्दी पत्रकारिता के रूप और स्वरूप को आम आदमी की जरूरत के लिहाज से ढाला। उनके प्रयासों से हिन्दी पत्रकारिता ने जो ऊंचाई पायी थी, उसका उल्लेख किये बिना हिन्दी पत्रकारिता की चर्चा अधूरी रह जाती है। राजेन्द्र माथुर के बाद की हिन्दी पत्रकारिता की चर्चा करते हैं तो गर्व का भाव तो कतई नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि राजेन्द्र माथुर के बाद हिन्दी पत्रकारिता की श्रेष्ठता को कायम रखने में सम्पादकों का योगदान नहीं रहा लेकिन सम्पादकों ने पाठकों के भीतर अखबार के जज्बे को कायम नहीं रख पाये। उन्हें एक खबर की ताकत का अहसास कराने के बजाय प्रबंधन की लोक-लुभावन खबरों की तरफ पाठकों को धकेल दिया। अधिक लाभ कमाने की लालच ने अखबारों को प्रॉडक्ट बना दिया। सम्पादक मुंहबायें खड़े रहे, इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता है। हालांकि इस संकट के दौर में प्रभाष जोशी जैसे एकाध सम्पादक भी थे जिन्होंने ऐसा करने में साथ नहीं दिया और जनसत्ता जैसा अवाम का अखबार पाठकों के साथ खड़ा रहा।
ज्यादतर अखबारों बल्कि यूं कहें कि हिन्दी के प्रकाशन फैशन, सिनेमा, कुकिंग और इमेज गढऩे वाली पत्रकारिता करते रहे। इनका पाठक वर्ग भी अलग किस्म का था और इन विषयों के पत्रकार भी अलहदा। सामाजिक सरोकार की खबरें अखबारों से गायब थीं क्योंकि ये खबरें राजस्व नहीं देती हैं। इसी के साथ हिन्दी पत्रकारिता में पनपा पेडन्यूज का रोग। पत्रकारिता के स्वाभिमान को दांव पर रखकर की जाने वाली बिकी हुई पत्रकारिता। यह स्थिति समाज को झकझोरने वाली थी लेकिन जिन लोगों को राजेन्द्र माथुर का स्मरण है और जो लोग जानते हैं कि जिलेवार अखबारों के संस्करणों का आरंभ राजेन्द्र माथुर ने किया था, वे राहत महसूस कर सकते हैं कि इस बुरे समय में भी उनके द्वारा बोये गये बीज मरे नहीं बल्कि आहिस्ता आहिस्ता अपना प्रभाव बनाये रखे। अपने अस्तित्व को कायम रखा और इसे आप आंचलिक पत्रकारिता के रूप में महसूस कर सकते हैं, देख और समझ सकते हैं। 
हिन्दी के स्वनाम-धन्य अखबार जब लाखों और करोड़ों पाठक होने का दावा ठोंक रहे हों। जब उनके दावे का आधार एबीसी की रिपोर्ट हो और तब उनके पास चार ऐसी खबरें भी न हो जो अखबार को अलग से प्रतिष्ठित करती दिखती हों तब राजेन्द्र माथुर का स्मरण स्वाभाविक है। राजेन्द्र माथुर भविष्यवक्ता नहीं थे लेकिन समय की नब्ज पर उनकी पकड़ थी। शायद उन्होंने आज की स्थिति को कल ही समझ लिया था और जिलेवार संस्करण के प्रकाशन की योजना को मूर्तरूप दिया था। उनकी इस पहल ने हिन्दी पत्रकारिता को अकाल मौत से बचा लिया। राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर पर हिन्दी पत्रकारिता की दुर्दशा पर विलाप किया जा रहा हो या बताया जा रहा हो कि यह अखबार बदले जमाने का अखबार है किन्तु सच यही है कि जिस तरह महात्मा गांधी की पत्रकारिता क्षेत्रीय अखबारों में जीवित है उसी तरह हिन्दी पत्रकारिता को बचाने में राजेन्द्र माथुर की सोच और सपना इन्हीं क्षेत्रीय अखबारों में है।
हिन्दी पत्रकारिता को बहुत शिद्दत से सोचना होगा, उनके शीर्षस्थ सम्पादकों को सोचना होगा कि वे हिन्दी पत्रकारिता को किस दिशा में ले जा रहे हैं? पत्रकारिता के ध्वजवाहकों द्वारा तय दिशा और दृष्टि से हिन्दी पत्रकारिता भटक गई है। हां, आधुनिक टेक्रालॉजी का भरपूर उपयोग हो रहा है और सम्पादक मोहक तस्वीरों के साथ मौजूद हैं। आज के पत्रकार राजेन्द्र माथुर थोड़े ही हंै जिनकी तस्वीर भी ढूंढ़े से ना मिले। यकिन नहीं होगा, किन्तु सच यही है कि जब आप हिन्दी के यशस्वी सम्पादक राजेन्द्र माथुर की तस्वीर ढूंढऩे जाएंगे तो दुर्लभ किस्म की एक ही तस्वीर हाथ लगेगी लेकिन उनका लिखा पढऩा चाहेंगे तो एक उम्र की जरूरत होगी। 

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

यूं छू लिया आसमां

-अनामिका
कहते हैं कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती और ऐसी कोशिश करने वाले और आसमां छू लेने वालों से मुलाकात करनी है तो आपको छत्तीसगढ़ राज्य के उन गांवों में जाना होगा जिन गांवों के बारे में आज भी लोगों को ठीक से मालूम नहीं होता यदि उनके गांव की बिटिया अपने हौसलों के बूते खुद के साथ गांव का नाम रोशन नहीं किया होता। छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों और उनके सहयोग से स्वयं सहायता समूह की सफलताओं की अनेक कथाएं हैं लेकिन अब इससे आगे निकल कर उन लड़कियों ने मिसाल बनायी है जिस पर चलने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी लेकिन ऐसा हुआ है। शारीरिक रूप से अक्षम मानी जाने वाली लड़कियों के लिए बैशाखी उनका सहारा नहीं रही तो लगन ने ऐसे बेटियों को देश के नक्शे पर उभरने का अवसर दिया है। महिला सहभागिता और उनके आर्थिक समृद्धि-सशक्तिकरण के लिए किये जा रहे प्रयासों की अनकथ कथाएं और महिलाओं के लिए पे्ररणा का कार्य करती हैं।
राजधानी रायपुर से महज 25-30 किलोमीटर की दूरी पर बसा है धरसींवा विकासखंड और इसी विकास खंड का एक छोटा सा गांव है गिरौद। गिरौद दूसरे गांव की तरह कभी था लेकिन आज उसकी पहचान तारामती की सफलता के कारण अलग से चिंहित है। किसी राहगीर से पूछिए कि गिरौद कहां है तो शायद वह बता नहीं पाए लेकिन तारामती वाले गिरोद का पता वह झट से बता देगा। सवाल उठता है कि तारामती है कौन? कोई नेता, सामाजिक कार्यकर्ता या क्या जिसके नाम से गांव की पहचान बन गयी? जीहां, तारामती इनमें से कोई नहीं है। यह नाम है उस हौसलामंद युवती का जिनके आत्मविश्वास ने उन्हें और उनके गांव को नयी पहचान दी है। विशेष नि:शक्तता से पीडि़त तारामती का परिवार पिता की आमदनी पर पल रहा था। उनके पिता की आय से तारामती की कॉलेज की पढ़ाई भी चल रही थी लेकिन एक अनहोनी हो गई। पिता की अकाल मृत्यु से संकट का पहाड़ खड़ा हो गया। तारामती के कॉलेज की पढ़ाई तो दूर, रोजमर्रा के खर्चे के लिए खींचतान मचने लगी। तारामती के मन में था कि वह अपने परिवार को आर्थिक मदद करे। इसके लिए वह डाटा एंट्री ऑपरेटर बनना चाहती थी लेकिन यह ट्रेनिंग पाना उसके लिए मुसीबत भरा था। बिना फीस चुकाये कहां और कैसे ट्रेनिंग करे? यह बात अपनी जगह ठीक थी तो यह बात भी सच है कि जहां चाह है, वहां राह है। 
तारामती की हिम्मत और जज्बे के आगे सारी मुसीबतें छोटी साबित हुई हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना ने तारामती के सपने को साकार करने में मदद दी। खुद तारामती बताती हैं कि हुआ यो कि संासद महोदय ने गिरौद गांव को आदर्श ग्राम बनाने हेतु चयन किया। इसलिये हमारा गांव पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना हेतु चिन्हांकित किया गया। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन अंतर्गत पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना की जानकारी मुझे मिली। थोड़ी कोशिश के बाद इस योजना के तहत मुझे कस्टमर केयर एक्जीक्यूटिव का 03 माह का नि:शुल्क प्रशिक्षण ओरियन एडूयेक्ट प्राईवेट लिमिटेड,रायपुर से प्राप्त करने का अवसर मिला। प्रशिक्षण के दौरान, प्रशिक्षण सामग्री, यूनिफार्म, बैग इत्यादि नि:शुल्क प्राप्त हुआ इसके साथ ही घर से प्रशिक्षण केन्द्र तक आने-जाने हेतु 100 रूपये प्रति दिन प्राप्त हुये।उन्हें प्रशिक्षण उपरांत ओरियन एडूयेक्ट प्राईवेट लिमिटेड, रायपुर में बैक ऑफिस एक्जीक्यूटिव का काम मिला। उन्होंने बताया कि आज वे अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपने सारे काम अच्छे से कर रही हैं। उनका वेतन 6 हजार रू. प्रतिमाह है। आर्थिक रूप से सक्षम होने के कारण अब वे अपने परिवार की भी मदद कर रही हैं। वे इस योजना के लिए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और शासन को धन्यवाद देते नहीं थकती हैं।
नि:शक्ता को पीछे छोडक़र अपने पैरों पर खड़े होने वाली गिरौद की तारामती जैसी ही रोचक कहानी है कि मायासिंह सिरदार की। कोरबा जिले की 22 साल की माया के पिता पुन्नीराम सिदार घर पर ही छोटा सा किराना दुकान चलाते हैं। इसके अलावा परिवार की आर्थिक जरूरतों की पूर्ति के लिए खेतों में भी काम करते हैं। हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी वह बच्चों की उच्चशिक्षा का बोझ नहीं उठा पा रहे थे। ऐसे में माया ने 12 कक्षा के बाद पारिवारिक आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। तारामती की तरह माया ने भी हौसला नहीं छोड़ा और अपने सहपाठियों से उसे जानकारी मिल की मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के तहत  हूनरमंद लोगों के लिए नि:शुल्क कोर्स चलाए जा रहे हैं। इसके लिए उसने अपने नजदीकी वेदान्त आई. एल. एंड एफ.एस स्किल्स स्कूल में सम्पर्क किया और हास्पिटालिटी कोर्स के लिए अपना नाम दर्ज कराया । राज्य सरकार की इस योजना में माया ने 45 दिनों के प्रशिक्षण के दौरान होटल में होने वाली सभी जरूरी बातें तथा स्वयं के व्यक्तित्व विकास के बारे में कई तरीके सीखें । जैसे-मेहमानों का स्वागत करना, उनसे बातें करना,खाना-परोसना आदि। 
माया की औपचारिक शिक्षा भले ही 12वीं कक्षा तक थी लेकिन कौशल उससे कहीं आगे की। राजधानी रायपुर स्थित एक होटल में 7 हजार की नौकरी भी की लेकिन उसकी उड़ान की तो यह शुरूआत थी। माया अब नए अवसरों की तलाश में थी। जल्द ही माया को गुजरात के पोरबंदर के होटल लॉड्स ईको इन में होस्टेस के पद पर काम करने का अवसर मिल गया। आज वह हर माह 12,500 का वेतन पा रही है। अपनी खुद की कमाई से उसने आगे पढ़ाई जारी रखते हुए स्नातक की डिग्री हासिल की और अब माया एम.बी.ए. भी करना चाहती है।  माया बताती है कि जिंदगी में कई बार इंसान को कुछ कड़े फैसले सिर्फ इसलिए लेने चाहिए ताकि वे अपनी जीवन शैली में एक बड़ा बदलाव ला सके। तारामती हो या माया, इनके बुलंद हौसलों ने इन्हें नयी जमीन दी है। सरकार की योजनाएं इनके लिए महज माध्यम बना है लेकिन इनके जज्बे ने इन्हें उड़ान भरने का मौका दिया है।

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

मीडिया नहीं, उद्योग की शिक्षा

मनोज कुमार 
     पत्रकारिता बीते जमाने की बात हो गई है, अब दौर मीडिया है इसलिए पत्रकारों के स्थान पर मीडिया कर्मियों का निर्माण किया जा रहा है. यूं भी मीडिया को उद्योग का दर्जा दिए जाने की मांग अर्से से चली आ रही है. कागज में कानूनन भले ही मीडिया को उद्योग का दर्जा नहीं दिया गया हो लेकिन व्यवहार में उसकी कार्यशैली एक उद्योग की भांति ही है. मीडिया पहले अपने लाभ को देखता है और इसे बचे शेष हिस्से में वह समाज का शुभ देखने की कोशिश करता है. इसमें मीडिया हाऊसों का दोष नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि कोई भी उद्योग शुभ की बात अपने लाभ प्राप्ति के बाद ही सोचता है और यह मीडिया उद्योग यही कर रहा है. इसी से जुड़ा प्रश्र है मीडिया शिक्षा का. मीडिया का चाल-चलन जब एक उद्योग के स्वरूप का है तो उसे काम करने वाले भी उसी नेचर के ही चाहिए होंगे, यह बात मान लेना चाहिए.
मीडिया शिक्षा संस्थानों की संख्या दिन-प्रति-दिन बढ़ रही है तो इसके पीछे क्या कारण होंगे? इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है और यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि लगभग तीन दशक पहले जब मीडिया शिक्षा नहीं थी तो पत्रकार किस दुनिया से आते थे? इन सवालों में ही जवाब छिपा हुआ है क्योंकि पत्रकार बनाया नहीं जा सकता है बल्कि वे अपने जन्म से ही पत्रकार होते थे और जो कमियां रह जाती थी, वह जमीनी अनुभव उन्हें पक्का कर देती थी. इसलिए कभी पत्रकार कर्मी जैसा शब्द चलन में नहीं आया किन्तु जब मीडिया की बात करते हैं तो इसके पीछे संस्थानों को मेहनत करनी होती है और उन्हें कॉरपोरेट कल्चर सिखाया जाता है. लिखने-पढऩे की योग्यता बहुत मायने नहीं रखती है किन्तु सलीकेदार कपड़े पहनना, अंग्रेजी में बोलना और संस्थान के प्रति स्वयं से बढक़र समर्पित होना. उन्हें यह भी सिखाया जाता है कि वे कॉरपोरेट जर्नलिस्ट हैं और समाज के गरीब, पिछड़े और अत्याचार के शिकार लोगों पर तब खबर लिखी जाए, जब अखबार या टेलीविजन चैनल की लोकप्रियता में कमी आने लगे. वरना लाइफस्टाइल, खाना-खजाना, कार, मोबाइल और ऐसे मंहगे उत्पादों के बारे में ही बात करते रहना जिससे विज्ञापनों से होने वाली आय में कमी ना हो. मीडिया शिक्षा को इस तरह डिजाइन किया गया है जहां हिन्दी को सर्वोच्च स्थान देने की बात तो कही जा रही है लेकिन अंग्रेजी का पल्लू पकडऩा मजबूरी बना दी गई है. 
ऐसा भी नहीं है कि मीडिया में आने वाली नई पीढ़ी के भीतर आग नहीं है या वह सामाजिक सरोकार से बाबस्ता नहीं रखती हैं किन्तु तीन वर्ष की शिक्षा के दरम्यान उनका मानस कॉरपोरेट का बना दिया जाता है. सपनों की दुनिया में उन्हें इस तरह धकेल दिया जाता है कि वे पत्रकारिता की चुनौतियों का सामना करने का साहस नहीं कर पाते हैं और सुविधाओं की मीडिया का लाल कॉरपेट उन्हें भाने लगता है. बंद शीशे वाली बड़ी गाडिय़ों में, महंगे मोबाइल सेट्स पर सोशल मीडिया से जुडक़र वे एक खासवर्ग की पसंद हो जाते हैं. विचारधारा का कोई स्थान नहीं होता है और तर्क के स्थान पर कुतर्क उनका अंतिम औजार होता है. मीडिया शिक्षा की यह कमजोरी नहीं बल्कि मीडिया उद्योग की यह नसीहत है. 
एक थे प्रभाष जोशी जिन्हें शायद हमारे समय के आखिरी सम्पादक के तौर पर चिंहित किया गया है, उनके नक्शेकदम पर चलने वाले लोग थोड़े से बचे हैं तो पत्रकारिता से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की दुनिया में पहला कदम रखने वाले एसपी सिंह को कौन भुला सकता है? ये दोनों महारथी पत्रकारिता के ऐसे मिसाल हैं जो आधुनिक समय में अपनी पहचान बनायी और नयी पीढ़ी के लिए सीख. प्रभाषजी के बताये रास्ते पर चलकर साल में बड़ी संख्या में पत्रकार खबरों के लिए शहीद होते हैं तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसपी सिंह के रास्ते में चलने वाले पत्रकारों की कमी नहीं. असल पत्रकारिता शिक्षा जमीनी है और मीडिया तो उद्योग की शिक्षा है जहां अंग्रेजी की प्रेतछाया हमेशा अपनी मौजूदगी का अहसास कराती रहेगी।