शनिवार, 23 अप्रैल 2022

खादी और गांधी पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो रहे हैं-रघु ठाकुर




भोपाल। ‘खादी केवल वस्त्र नहीं बल्कि वह अनेक आयामों से जुड़ा हुआ है. जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा है, वैसे वैसे खादी और गांधी अधिक प्रासंगिक होते जा रहे हैं. यह बात श्री रघु ठाकुर आज स्वराज भवन में शोध पत्रिका समागम द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में कही. उन्होंने कहा कि खादी की ताकत थी कि अंग्रेजों को नतमस्तक होना पड़ा. स्वाधीनता संग्राम में खादी की भूमिका विषय पर उनका कहना था कि खादी के उत्पादन एवं उपयोग को बढ़ावा देकर गांधीजी ने अंग्रेजों को आर्थिक नुकसान पहुंचाया था. इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश£ेषक श्री गिरिजाशंकर ने कहा कि आज बाजार में उत्पाद बेचते समय इस बात पर जोर दिया जाता है कि यह घर का बना है. अर्थात मशीनों के उत्पाद से किनारा किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि खादी और गांधी सदैव प्रासंगिक बने रहेंगे. इस अवसर पर इतिहास लेखक श्री घनश्याम सक्सेना ने अपने पुराने दिनों का स्मरण किया कि कैसे उनका खादी और गांधी से परिचय हुआ. उन्होंने खादी के अर्थशास्त्र को समझाते हुए अनेक किताबों का उल्लेख भी किया. संगोष्ठी में ‘समागम’ का खादी पर एकाग्र अंक का लोकार्पण अतिथि वक्ताओं ने किया।  

राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे सत्र में स्वदेशी विचार, खादी संस्कार पर रोजगार निर्माण के संपादक श्री पुष्पेन्द्रपाल सिंह ने कहा कि खादी का संबंध अर्थ, मानवता, पर्यावरण एवं आत्मनिर्भरता से जुड़ा हुआ है. उन्होंने कहा कि विषमता के खिलाफ खादी एक सूत्र की तरह गांधी जी हमें दे गए हैं. इस अवसर प्रो. दिवाकर शुक्ला ने खादी के संदर्भ में अपने बचपन को याद करते हुए कहा कि एक बार उन्हें गांधीजी पर निबंध लिखना था. इस बारे में अपने ताऊजी श्रीलाल शुक्ल से मदद चाही तो उन्होंने एक सवाल के साथ गांव वालों से चर्चा करने भेज दिया. इस बातचीत के निष्कर्ष से जो तैयार हुआ, वह स्वदेशी अवधारणा को पुष्ट करता है. कार्यक्रम का संचालन देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर की मीडिया विभाग की प्रमुख डॉ. सोनाली नरगुंदे ने किया. आभार प्रदर्शन संपादक मनोज कुमार ने किया.

शनिवार, 16 अप्रैल 2022

 खादी पर राष्ट्रीय संगोष्ठी 23 को आयोजित

भोपाल। आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर ‘स्वाधीनता संग्राम में खादी की भूमिका एवं ‘स्वदेशी विचार एवं खादी संस्कार पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन आगामी 23 अप्रेल, 2022 को स्वराज भवन सभागार में किया जा रहा है. इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दो दशक से निरंतर प्रकाशित शोध पत्रिका ‘समागम’ द्वारा किया जा रहा है. इस आयोजन में वक्ता के रूप में समाजवादी चिंतक श्री रघु ठाकुर, राजनीतिक विश्लेषक श्री गिरिजाशंकर, इतिहासकार श्री घनश्याम सक्सेना, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केजी सुरेश, टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री संतोष चौबे एवं रोजगार निर्माण के संपादक श्री पुष्पेन्द्रपाल सिंह होंगे ‘समागम’ के साथ पत्रकारिता विभाग, देवी अहिल्या विवि इंदौर एवं राजनीतिक विज्ञान विभाग, कला वरिष्ठ महाविद्यालय, औरंगाबाद का सहयोग है. इस मौके पर  खादी पर केन्द्रित ‘समागम’  का अंक ‘कहानी खादी की’ का लोकार्पण भी किया जाएगा. संपादक श्री मनोज कुमार ने बताया कि खादी को लेकर आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर संभवत: यह पहला विमर्श होगा.

सोमवार, 7 फ़रवरी 2022

शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक लताजी को समर्पित


 शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक लताजी को समर्पित

लताजी पर कुछ लिखना सूरज को दीया दिखाने जैसा है. एक आवाज जिन्हें हम सालों से गाते रहे हैं और सदियों तक गुनगुनाते रहेंगे. दुख इस बात का है कि शोध पत्रिका ‘समागम’ अपने 22वें वर्ष का प्रथम अंक सिनेमा पर केन्द्रित कर रहा था लेकिन लताजी को समर्पित करते हुए हम मर्माहत हैं. प्रकृति के आगे हम नतमस्तक हैं. एक पुष्प के रूप में लताजी के श्रीचरणों में शोध पत्रिका ‘समागम’ का अंक समर्पित है. 

  


रविवार, 6 फ़रवरी 2022

6 फरवरी, लता और प्रदीप यादों का सिलसिला

मनोज कुमार

संगीत के दुनिया के कवि प्रदीप और लताजी दो ऐसे सितारे हैं जो कभी अस्त नहीं होते हैं। 6 फरवरी भारतीय संगीत की दुनिया में बेमिसाल तारीख के रूप में याद किया जाएगा। यह तारीख 2022 के पहले अमर गीतकार प्रदीप के नाम पर था जो आज के दिन ही जन्मे थे तो यह तारीख हर साल मन को पीड़ा देती रहेगी कि इस दिन लताजी हमसे जुदा हुई थी। ‘ऐ मेरे वतन के लोगों.. जरा आंख में भर लो पानी...’ प्रदीप की अमर रचना थी तो लताजी की आवाज ने उसे चिरस्थायी बना दिया था। आज हमारे बीच ना प्रदीप रहे और ना लता जी लेकिन हर पल वे हमारे बीच बने रहेंगे। खैर, अब उन बातों का स्मरण करते हैं जिन्होंंने ‘लतिका’ से लता बनी।

लता मंगेशकर के बारे में इतना कुछ लिखा गया, बोला गया और सुना गया कि अब कुछ शेष नहीं रह जाता है। संगीत की दुनिया से इतर लताजी अपने पीछे जो अपनों के लिए अपनापन छोड़ गईं हैं, उन पर लिखना शेष है। लता जी का बचपन किन संकटों से गुजरा और कैसे उन्होंने यह मुकाम पाया, इसकी कहानी भी अनवरत लिखी गई है लेकिन लोगों को यह बात शायद याद में ना हो कि लता ने जिस शिद्दत के साथ अपनी हर सांस संगीत को समर्पित कर दिया था, उसी शिद्दत के साथ अपने जीवन का हर पल अपने परिवार को समर्पित कर दिया था। लताजी के स्वर को लेकर हम अभिमान से भर जाते हैं तो एक सबक वे हमें यह भी सिखाती हैं कि परिवार के लिए क्या कुछ करना पड़ता है। गायक संगीतकार पिता दीनानाथ मंगेश्कर के निधन के बाद घर की बड़ी होने के नाते उन पर पूरे परिवार की जवाबदारी थी। छोटी उम्र में उन्होंने इस जिम्मेदारी को अपने सिर पर लेकर पूरा करने में जीवन खपा दिया।

लता देश की आवाज थीं, यह सबको मालूम है लेकिन उनका सफर कितना कठिन था, यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा। कामयाब शख्स के गीत सभी गाते हैं लेकिन उनके संघर्षों की कहानी उनकी अपनी होती है। एक नामालूम सी गायिका के रास्ते में अनेक रोड़े आए। उनके आत्मविश्वास को डिगाने और हिलाने के लिए भी कोशिशें होती रही लेकिन लता चट्टान सी खड़ी रहीं। आरंभिक दिनों में नकराने और खारिज करने का दंश भी लता को झेलना पड़ा था लेकिन धुन की पक्की लता धुनी बनकर संगीत की दुनिया में अमर आवाज बन गईं और वे हमेशा देश की आवाज बनी रहेंगी।

साल 1929 के सितम्बर माह की 28 तारीख को गायक-संगीतकार के घर पैदा हुई बड़ी बेटी हेमा। हेमा से लता बन जाने की कहानी भी रोचक है। मराठी ड्रामा कंपनी के संचालक दीनानाथ मराठी नाटक ‘भाव बंधन’ में लतिका नामक किरदार से प्रभावित होकर हेमा का नाम बदलकर लता कर दिया। इसी लता को शायद अपने पिता से भय था और कहीं आत्मविश्वास की कमी के चलते वह पांच वर्ष तक अपने पिता के सामने गाने छिपती रही लेकिन एक दिन पिता के कानों में लता का मधुर स्वर मिसरी की तरह घुल गया। उन्होंने तय कर लिया कि कल से मैं लता को गायन सिखाऊंगा। कहते हैं कि लता सिर्फ दो दिनों के लिए स्कूल गईं लेकिन संगीत की सम्पूर्ण शिक्षा घर पर ही हुई। लता ने अपना पहला गाना 16 दिसम्बर, 1941 को रेडियो प्रोग्राम के लिए रिकार्ड किया। करीब 4 महीने बाद पिता का देहांत 24 अप्रेल, 1942 को हो गया। इसके साथ ही लता एकाएक बड़ी हो गईं। परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। साथ में तीन बहनें और एक भाई के साथ मां की जवाबदारी। हालांकि इस बीच उनके लिए रिश्ते आने लगे थे लेकिन कम उम्र में सयानी हो चुकी लता ने रिश्ते से इंकार कर दिया क्योंकि ऐसा नहीं करती तो परिवार की देखभाल कौन करता। फिर तो जिंदगी का पूरा सफर उन्होंने अकेले तय किया। घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए फिल्म में अभिनय करने लगी लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हो गया कि वे अभिनय के लिए नहीं बनी हैं। 

25 रुपये का मानदेय लताजी के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी थी जो उन्हेंं स्टेज पर गाने के एवज में पहली बार मिला था। मराठी फिल्म ‘पहली मंगलागौर’ में 13 वर्ष की उम्र में पहली दफा गाना गाया। जूझते हुए अपना मुकाम बनाते हुए लता के जीवन के 18वें वर्ष में एक नया मोड़ आता है जब गुलाम हैदर साहब उनकी आवाज से प्रभावित होकर शशधर मुखर्जी से मिलवाते हैं लेकिन मुखर्जी ने लता की आवाज को पतली कहकर खारिज कर दिया। यह और बात है कि हैदर साहब ने ‘मास्टरजी’ में लता को पहला ब्रेक दिया। यह भी सुख लता के हिस्से में आया जब शशधर मुखर्जी ने अपनी गलती मानकर अनारकली और जिद्दी जैसे फिल्मों में अवसर दिया। मास्टर गुलाम हैदर एक तरह से फिल्म इंडस्ट्री में लता के गॉडफादर बने। हैदर साहब ने सिखाया हिन्दी-उर्दू सीखो और हमेशा फील कर गाओ तो अनिल बिस्वास ने सांस कब लेना और कैसे छोडऩा है। 

यह बात आम है कि लता, दिलीप कुमार को अपना भाई मानती थी लेकिन इसके पहले का एक किस्सा। लोकल टे्रन में सफर करते हुए दिलाप कुमार ने लता से पूछा था कि मराठी हो क्या? इस बात से उन्हें ठेस पहुंची और वे एक मौलाना से बकायदा उर्दू की तालीम हासिल की। अपने उसूलों की पक्की लता द्विअर्थी गाना गाने से परहेज किया। अनेक मौके ऐसे आये जब गीतकार को गीत के बोल बदलने पड़े तो कई बार उन्होंने गाने से मना कर दिया। राजकपूर जैसे को फिल्म संगम का गाना ‘मैं का करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया’ गाने के लिए घंटों मिन्नत करनी पड़ी। हालांकि राजकपूर के आग्रह पर गाया तो सही लेकिन कहा कि इसे मैंने मन से नहीं गाया। 

लता की शोहरत उनके जान की दुश्मन बन गई थी। 33 वर्ष की उम्र में उन्हें धीमा जहर दिया गया लेकिन आत्मविश्वासी लता अपनों के सहारे उठ खड़ी हुईं। हालांकि यह झूठ फैलाया गया कि वे अभी कभी गाना नहीं गा पाएंगी लेकिन डॉक्टरों ने ऐसा कभी नहीं कहा था। लताजी ने खुद इस बात का खुलासा करते हुए कहा था कि यह कृत्य करने वाला कौन था, पता चल गया था लेकिन सबूत के अभाव में कोई कार्यवाही नहीं कर पाए। यह वह दौर था जब मजरूह सुल्तानपुरी लता का दिल बहलाने के लिए शाम को उनके पास जाकर कविता सुनाया करते थे। इस जानलेवा आफत से मुक्त होने के बाद लताजी ने पहला गाना रिकार्ड किया-‘कहीं दीप जले और कहीं दिल...’ 

हेमा से लता बन जाने वाली लता हमेशा से भारतीय सभ्यता और संस्कृति की संवाहक बनी रही। उन्होंने अपने जीवनकाल में हजारों गीत गाये लेकिन एकमात्र विज्ञापन किया। उनकी प्रतिष्ठा संगीत की देवी के रूप में रही। यह संयोग देखिये कि ज्ञान की देवी मां सरस्वती की आराधना कर इस फानी दुनिया को उन्होंने अलविदा कहा। लता गीत गाती थीं, उनका गीत पूरा जमाना गाएगा। कवि प्रदीप के गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को सुनकर पंडित जवाहरलाल नेहरू उठकर खड़े हो गए थे और उन्होंने लता से कहा था-तुमने मुझे रूला दिया। आज यही गीत राष्ट्र की धरोहर बन चुका है।

लता मंगेशकर भारत रत्न हैं और यह सम्मान देकर भारत स्वयं को गौरवांवित महसूस होता है। भौतिक रूप से हम भरे मन से लताजी को अलविदा कह रहे हैं लेकिन जब तक सूरज चांद रहेगा, लता तेरा नाम रहेगा जैसे शब्द भी छोटे लगते हैं लेकिन कयामत तक लता को भुल पाना नामुमकिन होगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)

  

  


शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

गांधी : सदा के लिए, सबके लिए

  मनोज कुमार    

        राष्ट्रपिता अथवा महात्मा को लेकर मत-भिन्नता हो सकती है लेकिन गांधी को लेकर सबके विचार समान ही होना चाहिए, यह माना जा सकता है. लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि राष्ट्रपिता अथवा महात्मा को लेकर सवाल उठाना गलत है. यह सवाल सहज ही उठता है कि एक तरफ गांधी को लेकर सहमति की चर्चा है तो दूसरी तरफ राष्ट्रपिता या महात्मा लेकर मत भिन्नता पर स्वीकृति? आखिर गांधी ही तो राष्ट्रपिता अथवा महात्मा हैं. यहीं पर विचार के मार्ग पृथक हो जाते हैं. राष्ट्रपिता अथवा महात्मा व्यक्ति के रूप में हैं किन्तु गांधी व्यक्ति नहीं विचार के रूप में हमारे बीच मौजूद हैं. गांधी विचार को भारत भूमि पर ही नहीं, समूचे संसार में स्वीकार किया गया है. वर्तमान समय में गांधी विचार पहले से ज्यादा सामयिक और व्यवहारिक हो गया है. लेकिन इसके साथ ही गांधी को लेकर मत-भिन्नता का ग्राफ भी बढ़ा है और यह अस्वाभाविक भी नहीं है. गांधी विचार और राष्ट्रपिता या महात्मा में सूत भर का फकत अंतर है. जो समझना चाहते हैं,  वे जानते हैं या जान जाएंगे कि हम किसके साथ हैं या किसके खिलाफ हैं. राष्ट्रपिता या महात्मा को लेकर मत-भिन्नता इस सवाल के साथ स्वाभाविक है कि उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा किस विधान के तहत दिया गया या कि वे महात्मा किस मायने में हो गए? मोहनदास करमचंद गांधी तो एक बैरिस्टर थे, फिर उनकी इतनी अहमियत क्यों? ऐसे अनेक सवाल हमारे आसपास हैं जिन्हें जवाब की प्रतीक्षा है. क्योंकि जिस आधार पर गांधी को राष्ट्रपिता कहा गया, उन्हें महात्मा कहा गया , उसकी वैधानिक स्वीकृति भले ही ना हो लेकिन लोक समाज की स्वीकृति साथ जरूर है. और इसी लोक स्वीकृति के साथ गांधी विचार कभी राष्ट्रपिता तो कभी महात्मा का संबोधन प्राप्त करते हैं. और शायद यही कारण है कि उनकी साद्र्धशती को हम पूरे उत्साह के साथ उत्सव की तरह मनाते हैं. 

लोक समाज की स्वीकृति के साथ ही किसी भी समाज का ताना-बाना बुना जाता है और खासतौर पर भारतीय समाज का ताना-बाना तो लोक समाज की स्वीकृति पर ही रचित है. हमारे समक्ष ऐसे कई पात्र हैं जिनका अस्तित्व नहीं है, वे निराकार हैं लेकिन लोक समाज की उन्हें स्वीकृति प्राप्त है और बिना किसी तर्क हम उन्हें सदियों से मान रहे हैं. संसार का कोई भी लोक समाज हिंसा, पाप, असत्य जैसे विषयों पर अपनी सहमति नहीं देता है. गांधी इन्हीं विषयों पर समाज का ध्यान आकृष्ट करते हैं. सबसे बड़ी बात होती है कि स्वयं की गलती सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना. गांधी ऐसा करते हैं और शायद इसलिए उनकी स्वीकारोक्ति गांधी विचार के रूप में लोक समाज अधिग्रहित करता है. स्वाधीनता के करीब सात दशक बाद हमारे प्रधानमंत्री स्वच्छ भारत अभियान आरंभ करते हैं तो वह रास्ता भी गांधी विचार से उपजा हुआ होता है. ऐसे कई प्रसंग हंै जब स्वयं गांधी ने पाखाना साफ कर स्वच्छता का संदेश दिया था. जब हमारे प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर भारत की चर्चा करते हैं तो यह रास्ता भी गांधी विचार से उपजा होता है. आत्मनिर्भर का रास्ता लघु उद्योग और ग्राम समाज से बनता है. ऐसे कई प्रसंग हैं जो बार-बार और हर बार हमें गांधी विचार की ओर लेकर जाते हैं. इन सब प्रसंग की चर्चा करते हैं तो सहज ही मन में भाव आता है कि गांधी सदा के लिए और सबके लिए हैं. वे लोक समाज के प्रतिनिधि रहे हैं और बने रहेंगे.

कुछ और ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विमर्श करना सामयिक प्रतीत होता है. किसी भी महापुरुष ने नहीं कहा कि उनके नाम के स्मारक बनाओ, सडक़, चौराहे बनाओ या ऐसे कोई प्रकल्प तैयार करो जिसमेंं उनकी छवि उकेरी जाती हो लेकिन हमने ऐसा किया क्योंकि लोक समाज का मानना है कि इससे एक संदेश जाता है कि ये कौन थे. इसे भी आप उचित मान लें तो आपने गांधी मार्ग का निर्माण किया लेकिन उसे सडक़ में बदल दिया और सडक़ की जो दुर्दशा होती है, वह कोई विमर्श नहीं मांगता है. गांधी मार्ग को छोडक़र हम सडक़ पर चल रहे हैं और सडक़ हमें अपनी गंतव्य के आसपास ही छोड़ देती है लेकिन गांधी मार्ग अपनाते तो हम जीवन के निश्चित लक्ष्य तक पहुंच सकते थे.  गांधी मार्ग सडक़ नहीं है, यह विचारों का सफर है जो आपके लक्ष्य को सुनिश्चित करता है. यह भी बेहद पीड़ादायक है कि किसी भी ग्रंथ का, विचारधारा का पठन-पाठन करने के पहले ही हम अपनी प्रतिक्रिया हवा में उछाल देते हैं. यह अधिकार तो किसी ने नहीं दिया कि आप सतही और तर्कहीन बातें करें और खासतौर पर लोक समाज में ऐसी प्रतिक्रियाओं के लिए कोई स्थान शेष नहीं हैं. स्वाधीन भारत में हमारे 70 साल का समय गुजर रहा है और स्वाधीनता संग्राम के समय बहुत कुछ अच्छा हुआ तो कुछेक प्रसंग दुखदायी भी होंगे लेकिन आज आवश्यकता इस बात की है कि हम लोक समाज में उन स्वर्णिम प्रसंग को लेकर जाएं जो नयी पीढ़ी के लिए प्रकाश का कार्य करे. हम एक नये भारत के निर्माण की चर्चा करते हैं तो स्वाभाविक है कि विचार भी नए होंं. गांधी के विचार इसलिए हमेशा सामयिक हैं कि उन्हें जिस खाने में रखना चाहेंगे, आकार ले लेगा. सत्य, अहिंसा, नैतिक मूल्य, आत्मनिर्भरता, महिला शिक्षा, किसान आदि इत्यादि ऐसे विषय हैं जो यक्ष प्रश्र की तरह हमारे समक्ष खड़े होकर जवाब मांग रहे हैं. यह समय बदलाव का है और बदलते समय में जो भी प्रासंगिक है, उसे लोक समाज को परिचित कराने की जवाबदारी हमारी है. गांधी का सबसे बड़ा अस्त्र दूसरों की गलतियों को माफ करना रहा है तो आज हम संकल्प लें कि आज से हम इस अस्त्र को अपने विकास के लिए उपयोग करेंगे क्योंकि दूसरों को माफी देने के लिए नैतिक साहस की जरूरत होती है और जब नैतिक साहस होगा तो अनेक समस्याओं का समाधान स्वयमेव हमें मिल जाएगा. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) 


बुधवार, 5 जनवरी 2022

फिर से ऑनलाइन हो जाने का वक्त

 फिर से ऑनलाइन हो जाने का वक्त

मनोज कुमार
कोरोना की पहल लहर को हमने बहुत हल्के में लिया था और दूसरी लहर के मुकाबले उसने उतना नुकसान नहीं किया था। दूसरी लहर को भी हमने पहली लहर की तरह हल्के में लिया और हम सब पर कयामत टूट पड़ी। तीसरी लहर सिर पर खड़ी है और रोज-ब-रोज बदलती जानकारियां भ्रमित कर रही हैं। इन सबके बावजूद इस अंदेशे से इंकार करना मुश्किल है कि कोरोना की यह तीसरी लहर हमें नुकसान पहुंचाये बिना ही गुजर जाएगी। बड़े-बुर्जुगों ने कहा भी है कि दुघर्टना से सर्तकता भली और यह समय कह रहा है कि हम सम्हल जाएं, सर्तक हो जाएं। निश्चित रूप से जब हमारी दिनचर्या बदलती है तो कई तरह की परेशानी आती है लेकिन जान है तो जहान है, इस बात का खयाल रखना होगा। सरकार और उसका तंत्र पहले की तरह अपना काम कर रहा है लेकिन हम सर्तक नहीं रहेंगे तो हमारी-आपकी या हमारे लोगों की जिंदगी पर ही खतरा आना है। दवा, इलाज, डॉक्टर, ऑक्सीजन तो तभी कारगर होंगे जब स्थिति नियंत्रण में होगी। जैसा कि दूसरी लहर में चौकचौबंद व्यवस्था धरी रह गई क्योंकि इंतजाम से ज्यादा बीमारों की संख्या हो गई थी। एक बार फिर हम सबको अपने स्तर पर चेत जाना है और स्थिति बिगडऩे लगे, इसके पहले नियंत्रण में लेेने में सहयोग करना होगा।
कोरोना का सबसे ज्यादा हमला भीड़ भरी जगह में होता है। ताजा जानकारी इस बात को पुख्ता करती है कि कोरोना का डेल्टा का चेहरा अब ओमिक्रॉन के नाम पर आ गया है जो आसपास गुजरने से दूसरे को बीमार कर सकता है। यह बेहद दुर्भाग्यजनक है कि एक बड़े संकट से गुजर जाने के बाद भी हम लापरवाह बने हुए हैं। चेहरे पर ना तो मॉस्क है और ना ही हम सेनेटाइजर का उपयोग कर रहे हैं। शारीरिक दूरी बनाये रखने में तो जैसे हमें किसी अज्ञात शक्ति ने रोक रखा है। लगभग दो साल के कोरोना के पीरियड में इस बात की सीख बार बार दी जा रही है कि यही तीन उपाय हैं जिससे हम अपने जीवन को आफत से बचा सकते हैं। बावजूद इसके हमारी जिद से कोरोना भागे या डरेगा, यह हमारी कल्पना हो सकती है लेकिन हम जिंदगी हार जाएंगे, इसकी आशंका बनी रहती है। समाज को चेताने के लिए सरकारी प्रयास हो रहे हैं लेकिन वैसे सख्ती और पाबंदी देखने को नहीं मिल रही है, जो कोरोना को फैलने से रोकने में कारगर हो।
बीते दो साल और शायद आगे आने वाले कुछ माह हम उत्सवहीन नहीं रह सकते हैं? क्या हम अपने आपको अपने घरों तक सिमट कर नहीं रह सकते हैं? क्या शिक्षण संस्थाओं को वापस ऑनलाइन मोड में नहीं लाया जा सकता है? क्या ऑफिसों को वर्कफ्रॉम होम नहीं किया जा सकता है? यह सबकुछ किया जा सकता है और किया जाना चाहिए क्योंकि हमारा जो सामाजिक ताना-बाना है, वह ऐसा नहीं है कि इन सब पाबंदियों के बिना हम बीमारी को रोक सकें. शिक्षण संस्थायें खुली रहेंगी तो निश्चित रूप से बच्चों के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग होगा और पब्लिक ट्रांसपोर्ट होने का अर्थ शारीरिक दूरी की समाप्ति। निजी एवं शासकीय दफ्तरों के सक्रिय रहने से वह तमाम आशंकायें सिर उठाने लगती हैं जिससे कोरोना के फैलाव को रोकना लगभग असंभव सा होता है। फाइलोंं का आदान-प्रदान, एक-दूसरे के सम्पर्क में आना लाजिमी है जिससे कब, कौन कोरोना के लपेटे में आ जाए, कहना मुश्किल होगा। लॉकडाउन एक बड़ा संकट खड़ा कर सकता है लेकिन वीकएंड लॉकडाउन कोरोना को रोकने का बेहतर उपाय हो सकता है। वैसे भी पांच दिनी कार्यदिवस है तो क्यों ना दो दिनों के लिए आवाजाही, सौदा-सुलह पर बंदिश लगा दी जाए। ऐसा किये जाने से इस बात की आश्वस्ति तो होगी कि कोरोना को आने से भले ही ना रोक सकें लेकिन उसके फैलाव को तो रोक सकते हैं।
शासन-प्रशासन को सख्ती के साथ शिक्षण संस्थाओं को ऑफलाइन मोड से ऑनलाइन मोड पर अनिवार्यत: लेकर आने पर ना केवल विचार करना चाहिए बल्कि इसे तत्काल प्रभाव से लागू किया जाना चाहिए। यह स्कूल और कॉलेज दोनों स्तर पर किया जाना चाहिए। इस प्रतिबंध के खिलाफ यह तर्क दिया जा सकता है कि इंटरनेट की सुविधा आड़े आती है तो इस बात की भी तसल्ली की जानी चाहिए कि जैसा बीता समय गुजर गया, वैसा ही कुछ और समय लेकिन कोरोना के फैलने से जो समस्या आएगी, उससे बचा जा सकेगा। वर्कफ्रॉम होम को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जिस आधुनिक समय के साथ हमकदम हो रहे हैं और जीवन का हर पक्ष अब टेक्रालॉजी फ्रेंडली हो रहा है तो इसे पूर्वाभ्यास मानकर हमें आत्मसात कर लेना चाहिए क्योंकि आने वाले समय में भारी-भरकम खर्चों को बचाने तथा तत्काल परिणाम देने वाली कार्यसंस्कृति के लिए जिंदगी ऑनलाइन हो जाएगी। अभी तो धडक़न की शर्त पर ऑनलाइन किये जाने की बात है तब आगे भविष्य में हम और ऑनलाइन साथ-साथ होंगे।
उत्सव के सारे उपक्रम को थाम देना चाहिए। जीवन शेष रहा तो हर दिन उत्सव होगा। अभी हम कठिन दौर से गुजर रहे हैं और इससे बाहर निकलने के लिए स्व-नियंत्रण और नियमन जरूरी हो जाता है। सब लोग समय पर और बिना किसी भय के साथ टीकाकरण करायें, इसकी जवाबदारी भी हम सब अपने अपने स्तर पर लें। बचाव का यह एक बड़ा उपाय है। यह कठिन समय गुजर जाएगा इसलिए डरने और डराने के बजाय सम्हलने और सम्हालने का वक्त है। सरकार पर आश्रित रहने के बजाय अपनी दिनचर्या और आदतों को बदल कर स्वास्थ्य सेवाओं को सहज और सुलभ बनायें। कोरोना एक सबक है कि हम जीवन को कितना आसान बना सकते हैं। चलों, एक बार फिर ऑनलाइन हो जाएं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

खादी और गांधी पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो रहे हैं-रघु ठाकुर

भोपाल। ‘खादी केवल वस्त्र नहीं बल्कि वह अनेक आयामों से जुड़ा हुआ है. जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा है, वैसे वैसे खादी और गांधी अधिक प्रासंगिक...