गुरुवार, 5 मार्च 2015

एक धर्म की बिटिया


मनोज कुमार
    बिटिया हो जाना ही किसी बेटी का धर्म है. बिटिया का एक ही धर्म होता है बिटिया हो जाना. बिटिया का विभिन्न धर्म नहीं होता, उसकी कोई जात या वर्ग भी नहीं होता, वह एक मायने में अमीर या गरीब भी नहीं होती है. बिटिया, सिर्फ और सिर्फ बिटिया ही होती है. हिन्दू परिवारों में पैदा हुई बेटियों को भी पराया होना होता है तो मुस्लिम, सिक्ख और इसाई परिवार भी इसी परम्परा का निर्वाह करते हैं. बेटियों को लेकर इनमें से किसी का भी धर्म और वर्ग का चरित्र अलग नहीं है. बिटिया को लेकर सबकी दृष्टि एक सी है और वह दृष्टि है बिटिया पराया धन है. यहां तक कि बिटिया को लेकर आलीशान कोठी में रहने वाले धन्ना सेठ जो सोचता है, वही सोच एक आम आदमी के मन की भी होती है. संसार के निर्माण के साथ ही बेटी चीख रही है, चिल्ला रही है कि वह एक वस्तु नहीं है. वह धन भी नहीं है और न ही सम्पत्ति लेकिन परम्परा के खूंटे से बंधी बिटिया एक सोची-समझी साजिश के तहत पराया धन बना दी गई. 
   अभी रेल का सफर करते समय इस बात का अनुभव हुआ कि बिटिया का कोई धर्म नहीं होता है. मैंने 14 घंटे के सफर में इस बात की तलाश करता रहा कि किसी एक बिटिया का तो धर्म पता चल सके लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. बिटिया को पराये घर जाना है तो उसे घर का हर काम सीखना होगा, भाई और पिता को खिलाने के बाद खाना ही उसका धर्म है. पिता और भाई के खाने के बाद बचा हुआ वह खाना खाती है और कई बार तो उनके हिस्से के बचे और बासी खाना बिटिया के नसीब में आता है. पीहर से सीखा और ससुराल में यह उसकी नियती बन जाती है. परदे में रहना, चुप रहना और दूसरों की खुशी में हंसना-मुस्कराने वाली बिटिया सुघड़ है, संस्कारी है. इस संस्कारी और एक धर्म का निर्वाह करने वाली बिटिया का जज्बात दहेज के लिये जला देने वालों के लिये कोई मोल नहीं रखता है, यह भी दिल दुखा देने वाली बात है कि एक बलात्कारी बिटिया का धर्म नहीं पूछता. उसके लिये उसका शरीर ही धर्म होता है. हां, इतना जरूर होता है कि सियासी फायदे के लिये कभी-कभार बलात्कार की शिकार बिटिया की जाती चिन्हित की जाती है. यह चिनहारी भी उस लाभ के लिये कि यह दिखाया जा सके कि दुष्कर्म की शिकार बिटिया भी किसी धर्म से आती है. संसार भर में बिटिया के लिये एक ही धर्म है कि उसका बिटिया हो जाना.
    बिटिया को पराया कहने पर मुझे आपत्ति है लेकिन उसे धन कहने पर थोड़ी कम आपत्ति क्योंकि बिटिया का तो कोई मोल है लेकिन बेटों का क्या करें? बेटों का तो अपना धर्म है, वह अमीर भी है और गरीब भी. उसके साथ वर्ग और वह जाति के जंजाल में भी उलझा हुआ है. हिन्दू धर्म के लिये बेटा होने का अर्थ घर का चिराग है तो मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई भी इसी तरह सोचते हैं. बेटा उनके वंश को बढ़ाता है इसलिये वह पराया नहीं होता है लेकिन उसे कभी पराया न सही, स्वयं के घर का धन भी कहला नहीं पाया. बेटा न तो पराया होता है और न कभी धन बन पाया. ऐसा क्यों नहीं होता, इस पर भी जब मैंने सोचा तो लगा कि बेटे की हैसियत दिखती तो बड़ी है लेकिन हकीकत में उसकी औकात दो कौड़ी की होती है. जीवन भर वह पराये धन की खाता है. इस बारे में हमारे एक मित्रवत रिश्तेदार भाई अवधेश कहते हंै कि आप तो अधिकतम 25 साल में बरी हो जाएंगे, शायद इससे ज्यादा एक या दो वर्ष में. बिटिया का हाथ पीला करेंगे और निश्चिंत हो जाएंगे लेकिन हमारे लिये तो बेटा जीवन भर की घंटी की बना हुआ है. पहले पालो, शिक्षा दिलाओ, फिर नौकरी की चिंता करो और बाद में बेटे का ब्याह करो. थोड़े साल बाद मां-बाप पराये हो जाते हैं. मां-बाप समाज के नियमों के चलते बिटिया को पराया कर देते हैं और बेटा मां-बाप को अपने लिये पराया कर देता है. 
   तमाम विकास की बातों, महिलाओं की हिस्सेदारी की बाते और जाने क्या क्या जतन किये गये लेकिन जब परिणाम जांचा गया तो पाया कि जतन तो बिटिया के नाम पर था लेकिन फैसला बेटे के पक्ष में हो गया. न तो इन 14 घंटों के सफर में मैं बिटिया का धर्म तलाश कर पाया और न इस पचास साल की उम्र में बिटिया को उसकी पहचान दिला पाया. जो लोग इसे पढ़ रहे होंगे तो उनसे मेरा आग्रह यही होगा कि जब समय मिले तो बिटिया के हक की तलाश करें, मदद करें और हो सके तो बिटियाओं के लिये उनका अपना धर्म तलाश कर सकें जहां वे स्वतंत्र हों, उनकी अपनी पहचान हो. 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

साक्षरता और परम्परा के मेल से बचेगा पानी


       -मनोज कुमार

रीब तीन दशकों से जल संकट को लेकर विश्वव्यापी बहस छिड़ चुकी है। यहां तक कहा जा रहा है कि अगला विश्व युद्ध पानी के मुद्दे पर लड़ा जायेगा। स्थिति की गंभीरता को नकारा नहीं जा सकता है। इस दिशा में राज्य सरकार अपने अपने स्तर पर पहल कर रही हैं और जल संरक्षण की दिशा में नागरिकों को जागरूक बनाया जा रहा है। जल संरक्षण की दिशा में उपाय बरतने वाले प्रदेशों अपनी अपनी काल और स्थितियों के अनुरूप जतन कर रही हैं। इस श्रृंखला में हाल ही में केन्द्र सरकार ने जल साक्षरता अभियान चलाने की घोषणा की गई है। केन्द्र सरकार की घोषणा को उनके पहले घोषणा समग्र स्वच्छता से जोडक़र देखा जाना चाहिये। केन्द्र सरकार मूलभूत समस्याओं की तरफ नागरिकों की भागीदारी चाहती है तो इसका स्वागत किया जाना अनुचित नहीं होगा। किंतु केन्द्र सरकार जल साक्षरता अभियान कैस चलायेगी, उसका स्वरूप क्या होगा और क्या नागरिक सरकार के इन प्रयासों में अपनी भागीदारी पूरा करेगी। सवाल अनेक हैं लेकिन इसके पहले हमें उन मुद्दों पर जाकर पड़ताल करनी होगी कि केन्द्र सरकार के जल साक्षरता अभियान को पूर्ण करने में क्या दिक्कतें हैं।
भारत गांवों का देश रहा है और अभी भी भारत ग्रामीण परिवेश में ही जीता है। ग्रामीण परिवेश का सीधा सा अर्थ है एक बंधी-बंधायी परम्परा की जीवन शैली। इस परम्परागत जीवनशैली को करीब से देखेंगे तो आप यह जान पायेंगे कि वे शहरी जीवनशैली से कहीं अधिक समृद्ध हैं। वे बाजार के मोहताज नहीं हैं बल्कि वे अपनी परम्परा को बाजार से एकदम परे रखे हुये हैं और यही कारण है कि अनेक किस्म की समस्याओं के बावजूद उनका जीवन तनावपूर्ण नहीं है। जहां तक जल संरक्षण की चर्चा करते हैं तो सर्वाधिक जल स्रोत ग्रामीण क्षेत्रों में ही मिलेंगे। पानी उनके लिये उपयोग की वस्तु नहीं है बल्कि पानी उनके लिये जल-देवता है और वे उसका जीवन जीने के लिये उपयोग करते हैं न कि उसका दुरूपयोग। ग्रामीण परिवेश में जीने वाले अधिसंख्य लोग अपनी किसी उपलब्धि पर आयोजन में खर्च नहीं करते हैं बल्कि पानी के नये स्रोत बनाने के लिये करते हैं। पुराने जल स्रोतों के नाम देख्ेंगे तो आपको किसी न किसी पुराने परिवार के सदस्यों के नाम का उल्लेख मिलेगा। सेठानी घाट कहां है, यह आप से पूछा जाये तो आप हैरानी में पडऩे के बजाय नर्मदाजी के नाम का उल्लेख करेंगे क्योंकि यह सेठानी घाट प्रतीक है उस जलसंरक्षण की परम्परा का जहां बिटिया का ब्याह हो, घर में नया सदस्य आया हो या किसी ऐसे अवसर को परम्परा के साथ जोडक़र जलस्रोतों का निर्माण किया जाता रहा है। गांवों से निकलकर जब हम कस्बों की तरफ बढ़ते हैं तो यहां भी जल संरक्षण परम्परा का निर्वाह करते हुये लोग दिख जाते हैं। जिन पुरातन जल स्रोतों में गाद भर गयी है अथवा उसके जीर्णोद्धार की जरूरत होती है तो लोग स्वयमेव होकर श्रमदान करते हैं। इन श्रमदानियों में कस्बे का आम आदमी तो होता ही है अपितु बुद्धिजीवी वर्ग जिसमें शिक्षक, पत्रकार, समाजसेवी आदि-इत्यादि सभी का सहयोग मिलता है। यह है भारतीय जल संरक्षण की पुरातन परम्परा।
दलते समय के साथ इस परम्परा को घात लगा है। ग्रामीण एवं कस्बाई जिंदगी में तो परम्परा अभी टूटी नहीं है लेकिन शहरों में समस्या सबसे ज्यादा बढ़ी है। इसका सबसे बड़ा कारण है आबादी का लगातार बढऩा और इस आबादी के लिये मकान के इंतजाम करना पहली शर्त होता है और इसी शर्त पर विकास की बलिवेदी पर जलस्रोत बलिदान होते हैं। पहले पहल तो यह जरूरत होती है और बाद के समय में यह जरूरत लालच में बदल जाती है और बढ़ते लालच के कारण शहरों में जलस्रोतों की कमी सबसे बड़े संकट का कारण बनी हुई है। जल संरक्षण परम्परा का न तो शहरों में चलन बच गया है और न ही जल के प्रति उनमें जागरूकता का भाव है। केन्द्र सरकार की जल साक्षरता अभियान की सबसे अधिक आवश्यकता शहरी नागरिकों को है।  लोगों में जागरुकता नहीं आती, तब तक इस लक्ष्य को किसी भी अधिनियम अथवा कानून से सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। जल से जीवन का प्रारंभ है तो जीवन के महाप्रलय के बाद अंत भी जल ही है। जीवन मरण और भरण-पोषण का आधार जल ही है और यह समझ किसी कानून के डंडे से नहीं आकर स्वयंस्र्फूत प्रयासों से आयेगी। हालांकि केन्द्र सरकार के मंत्री स्वयं मानते हैं कि जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए लोक जागरुकता सबसे ज्यादा जरूरी है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि आज केन्द्र सरकार जल साक्षरता की चर्चा कर रही है और आने वाले दिनों में उसे अभियान के रूप में भी चलाया जायेगा लेकिन इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि राज्य सरकारों ने जल संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक करने का काम काफी समय से करते चली आ रही है। इसी क्रम में रहवासियों के लिये अपने अपने घरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग कम्लसरी कर दिया गया है। अभी इस पर सौफीसदी अमल नहीं हुआ है लेकिन असर दिखने लगा है। 
ल संकट के विषय पर चर्चा करते हैं तो अक्सर स्वच्छ एवं अस्वच्छ का मुद्दा भी उठता है। इस संदर्भ में एक नजर वर्तमान  विश्व का 70 प्रतिशत भू-भाग जल से आपूरित है, जिसमें पीने योग्य जल मात्र 3 प्रतिशत ही है। मीठे जल का 52 प्रतिशत झीलों और तालाबों का 38 प्रतिशत, मृदनाम 8 प्रतिशत, वाष्प 1 प्रतिशत, नदियों और 1 प्रतिशत वनस्पतियों में निहित है। इसमें भारत की स्थिति देखें तो आजादी के बाद से लगातार हमारी मीठे जल को लेकर जरूरत कई गुना बढ़ चुकी है। सन् 1947 में देश में मीठे जल की उपलब्धता 6 हजार घन मीटर थी, वह वक्त के साथ इतनी तेजी से घटी है कि आगामी 10 वर्षों में इसके 16 हजार घन मीटर हो जाने की संभावना जाताई जा रही है। भारत विज्ञान की तमाम सफलताओं के बाद भी अभी तक वर्षा जल का मात्र 15 प्रतिशत ही उपयोग कर पा रहा है, शेष बहकर नदियों के माध्यम से समुद्र में चला जाता है, जबकि आगामी वर्षों में देश में जल की माँग 50 प्रतिशत और बढ़ जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है। 
केन्द्र की सरकार जल साक्षरता की आरंभ करने की बात कर रही है तो उसे पर्यावरण संरक्षण की ओर भी समाज को जागरूक करना होगा। जिस तेजी से वनों का नाश हो रहा है, इसे भी जलसंकट के लिये दोषी माना जा सकता है। जलसंरक्षण के साथ साथ प्रत्येक घरों अथवा कॉलोनियों में वृक्षारोपण पर जोर देना होगा। अक्सर देखा गया है कि बड़े ही उत्साह के साथ अभियान का श्रीगणेश तो कर दिया जाता है लेकिन थोड़े से समय गुजरने के बाद अभियान ठंडा पड़ जाता है। ऐसे में एक रोडमेप बनाकर राज्य सरकारों को सौंप दिया जाये जो इसके क्रियान्वयन के लिये जवाबदार होंगे। इस कार्य को पूर्ण करनेे लिये आवश्यक बजट जारी करने में भी राज्यों का सहयोग पहली शर्त होगी। केन्द्र सरकार का महती अभियान जल साक्षरता के साथ साथ ही जल संरक्षण की भारतीय परम्परा को भी जोडऩा होगा, तभी इस अभियान की सफलता सुनिश्चित हो सकेगी।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

भारत भवन : याद रह गयी तेरी कहानी


-मनोज कुमार

13 फरवरी 1982 का दिन और आज तैंतीस बरस बाद 13 फरवरी 2015 का दिन। यह तारीख बार बार और हर बार आयेगी लेकिन भारत भवन का वह गौरव कभी आयेगा, इस पर सवाल अनेक हैं। यह सवाल विमर्श मांगता है किन्तु  विमर्श की तमाम संभावनायें पीछे छूट गयी हैं। इतनी पीछे कि अब भारत भवन के गौरव को पाने के लिये शायद एक और भारत भवन की रचना की पृष्ठभूमि तैयार करने की जरूरत दिखती है। यह जरूरत पूरी करने की कोशिश हुई भी तो इसके बावजूद शर्तिया यह कह पाना मुश्किल सा है कि भारत भवन की विश्व-व्यापी कला-घर की पहचान लौट पायेगी। एक अंतर्राष्ट्रीय पहचान वाले इस कला घर की यह दुर्दशा स्वयं से हुई या इसके लिये बकायदा पटकथा लिखी गयी थी, इस पर कोई प्रामाणिक टिप्पणी करना तो मुश्किल सा है लेकिन आज भारत भवन हाशिये पर है, इस बात शीशे की तरह साफ है। तैंतीस बरस का यह कला घर अब एक मामूली आयोजन स्थल में बदल गया है। बिलकुल वैसे ही जैसे भोपाल के दूसरे आयोजन स्थल हैं। भारत भवन के आयोजन की फेहरिस्त लम्बी हो सकती है लेकिन गुणवत्ता पर अब चर्चा नहीं होती है क्योंकि आयोजन अब स्थानीय स्तर के हो रहे हैं। भारत भवन के मंच से संसार भर के कलासाधकों का जो समागम होता था, उस पर पूर्ण न सही, अल्पविराम तो लग चुका है। 
भोपाल का यह वही भारत भवन है जिस पर दिल्ली भी रश्क करता था। दिल्ली के दिल में भी हूक सी उठती थी कि हाय, यह भारत भवन हमारा क्यों न हुआ। भारत भवन की दुर्दशा को देखकर दिल्ली अब रोता भी होगा कि एक कला घर की कैसे असमय मौत हो सकती है किन्तु सच तो यही है। भारत भवन की साख दिन-ब-दिन गिरती गयी है। साख इतनी गिर गयी कि भारत भवन हाशिये पर चला गया। बीते वर्षों में भारत भवन को हाशिये पर ले जाने के लिये एक सुनियोजित एजेंडा तय किया गया। बिना किसी ध्वनि के भारत भवन के बरक्स नयी संस्थाओं की नींव रखी जाने लगी। इसे मध्यप्रदेश में संस्कृति के विस्तार का हिस्सा बताया गया किन्तु वास्तविकता यह थी कि इस तरह भारत भारत भवन को हाशिये पर ढकेलने की कोशिश को परिणाम तक पहुंचाया गया। भारत भवन के विभिन्न प्रकल्पों में एक रंगमंडल है जहां न केवल नाटकों का मंचन होता है बल्कि यह पूर्णरूपेण तथा पूर्णकालिक नाट्यशाला है। रंगमंडल को सक्रिय तथा समूद्ध बनाने के स्थान पर मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय की स्थापना कर दी गई। रंगमंडल और मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के कार्यों में बुनियादी रूप से कोई बड़ा अंतर नहीं दिखता है। सिवाय इसके कि मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय युवा रंगकर्मियों को डिग्री बांटने लगा। क्या इसका जिम्मा रंगमंडल को देकर उसे समृद्ध और जवाबदार बनाने की पहल नहीं हो सकती थी? हो सकती थी लेकिन सवाल यह है कि वह दृष्टि कहां से लायें जो दृष्टि भारत भवन की रचना करने वालों के पास थी। भारत भवन के दूसरे प्रकल्प भी इसी तरह दरकिनार कर दिये गये। अनेेक आयोजनों का दोहराव साफ देखा जा सकता है। 
भारत भवन कभी राज्य सरकार की प्राथमिकता में था लेकिन दो दशक से ज्यादा समय हो गया है जब सरकारों के लिये भारत भवन कोई बहुत मायने नहीं रखता है। राज्य का संस्कृति विभाग इसका जिम्मा सम्हाले हुये है। वह जो एजेंडा तय करता है, सरकार की मुहर लग जाती है। आयोजनों की औपचारिकता पूरी कर दी जाती है और फिर एक नये आयोजन की तैयारियां आरंभ हो जाती हैं। अब जब भारत भवन के हालात पर चर्चा कर रहे हैं तो यह जान लेना भी जरूरी हो जाता है कि अनदेखा किये जाने वाले इस कला-घर में आयोजन की जरूरत क्यों है तो इसका जवाब साफ है कि विभाग के पास एक बड़ा बजट होता है और बजट को खर्च करने के लिये आयोजन की जरूरत होती है। यदि यह न हो तो आयोजन की औपचारिकता पूरी करने की भी जरूरत नहीं रहेगी। जिस भारत भवन के मंच के लिये शौकिया रंगकर्मी लड़ते थे, अब उन्हें यह आसानी से मिलने लगा है। लडक़र मंच पाने के बाद जो नाट्य मंचन होता था या दूसरे आयोजन होते थे तो एक सुखद तपन का अहसास होता था। अब वह तपन, वह सुख नहीं मिलता है। सब कुछ एक प्रशासनिक ढंाचे में बंधा और सहेजा हुआ। कई बार तो अहसास होता है कि कलाकार भी बंधे-बंधाये से हैं। अखबारों में आयोजन को इसलिये भी स्थान मिल जाता है कि उनके पन्नों में कला संस्कृति के कव्हरेज के लिये स्पेस होता है। स्मरण रहे कि खबर और सूचना तक भारत भवन के आयोजनों का उल्लेख होता है, आयोजनों पर विमर्श नहीं। कला समीक्षकों और इसमें रूचि रखने वालों के मध्य जो चर्चा का एक दौर चला करता था, अब वह भी थमने सा लगा है।
यूं तो भारत भवन को आप विश्वस्तरीय कला घर का दर्जा देते हैं किन्तु भारत भवन मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग का एक हिस्सा है। एक ऐसा हिस्सा जिसने अपने निर्माण और स्थापना के साथ ही उपलब्धियों का शीर्ष पाया और समय के साथ फर्श पर भी आ गया है। भारत भवन का वह स्वर्णिमकाल भी था जब उसके आयोजनों को लेकर, आमंत्रित रचनाधर्मियों को लेकर बकायदा विरोध दर्ज होता था। इस तरह के विरोध से भारत भवन और निखर निखर जाता था। स्मरण करेंं संस्कृति सचिव के तौर पर अशोक वाजपेयी के उस बयान का जिसमें उन्होंने कहा था कि मरने वालों के साथ मरा नहीं जाता है और इस बयान के साथ जहरीली गैस से बरबाद होते भोपाल में उन्होंने एशिया कविता सम्मेलन का आयोजन करा लिया था। वाजपेयी कितने सही थे या गलत, यह चर्चा का दूसरा विषय होगा लेकिन क्या इसके बाद किसी में हिम्मत थी कि वह इस बेबाकी के साथ आयोजन को अंजाम दे सकें। भारत भवन के उस स्वर्णिम काल का स्मरण करना सुखद लगता था जब भारत भवन को खड़ा करने में स्वामीनाथन और ब.व. कारंत जैसे लोगों का योगदान रहा। भारत के शीर्ष के रचनाधर्मियों का समागम निरंतर होता रहा। अपनी प्रतिबद्धताओं के लिये मशहूर लोग आते और बहस-मुबाहिसे का लम्बा दौर चलता। तब की सांस्कृतिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ के लिये भारत भवन का विवाद कव्हरस्टोरी बनता। भारत भवन बीते वर्षों में अपनी यह छाप खो चुका है।
योजनों का लम्बा दौर चला है और इस नये दौर में अंतर प्रादेशिक आयोजनों की नयी श्रृंखला भी आरंभ हुई है। पहले बिहार, अब राजस्थान और आने वाले दिनों में अन्य प्रदेशों की कला-संस्कृति का प्रदर्शन भारत भवन में हुआ और होगा। इस नये किस्म के प्रयासों की सराहना की जानी चाहिये। किन्तु एक सवाल यह भी है कि क्या जिन प्रदेशों को हम मंच दे रहे हैं, उन प्रदेशों में भारत के ह्दयप्रदेश ‘मध्यप्रदेश’ को कहीं स्थान दिया गया। संस्कृति के पहरूओं ने इस दिशा में कोई कोशिश की या हम दूसरों के ही ढोल बजाते रहेंगे? संस्कृति विभाग के आला अफसर तो समय समय पर बदलते रहे किन्तु दूसरी और तीसरी पंक्ति में वर्षों से जमे लोगों के कारण भी भारत भवन का नुकसान हुआ। यह आरोप मिथ्या नहीं है बल्कि सच है कि एक बड़े आदिवासी भूभाग वाले मध्यप्रदेश में विविध कलाओं के कलाकारों को स्थाना भारत भवन के निर्माण से स्थापना के समय तक मिला था, अब वह भी गुम हैं। 
क ईंट गारा ढोने वाली भूरीबाई भारत भवन में ईंट जोडऩे आयी थी और उसकी कलारूचि ने ही उसे मध्यप्रदेश शासन का शीर्ष सम्मान दिलाया। इसके बाद इन कलाकारों के लिये भारत भवन में कितना स्थान बचा है, यह कहने की जरूरत नहीं। इसके पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय इन्हीं वर्गो के लिये स्थापित किया गया है। सवाल यह है कि इन कलाकारों को मुख्यधारा से अलग करने की कोशिश कोशिश ने आकार ले लिया है? यंू भी मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय राज्य के जनजातीय विभाग का है न कि संस्कृति विभाग का। हम इस विवाद में भी नहीं पडऩा चाहते अपितु हमारी चर्चा के केन्द्र में भारत भवन है और हम चाहते हैं कि इन कलाकारों को भारत भवन का मंच मिले। संस्कृति की मुख्यधारा में इनका हस्तक्षेप हो ताकि भारत भवन का गौरव वापस आ सके। लोग चमत्कृत हो सकें और कह सकें कि यह मेरा मध्यप्रदेश है, यह मेरा भोपाल है और यह मेरा कलाघर भारत भवन है। 

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

अपेक्षा और अनुभव


-मनोज कुमार
न दिनों मोबाइल पर आने वाले संदेश को गौर से पढ़ा जाये तो उनमें दर्शन का भाव होता है. गौर फरमायेंगे. एक संदेश आया कि आपकी सुबह अपेक्षा के साथ होती है और शाम एक नये अनुभव के साथ. बड़ा अच्छा लगा और इस दर्शन संदेश को सोचते हुये अखबार के पन्ने पलटने लगा तो वाकई यह संदेश मुझे व्यवहारिक लगा. मेरा मध्यप्रदेश देश के दूसरे राज्यों की तरह चुनावी बुखार से तप रहा है. दिसम्बर 13 में पहले विधानसभा चुनाव, फिर लोकसभा के चुनाव और इसके बाद स्थानीय निकाय एवं पंचायतों के चुनाव. इस चुनाव में किसकी जीत हुई, कौन जीतता है और इसके क्या परिणाम होंगे, इसकी जवाबदारी राजनीतिक प्रेक्षकों के भरोसे छोड़ देते हैं. एक पत्रकार की नजर से जब मैंने इन चुनाव को देखना शुरू किया तो दंग रह गया कि यह चुनाव परम्परागत नहीं हैं. समय के साथ सोच बदलती दिख रही है और उस वर्ग में बदलती दिख रही है जिनके हाथों में न केवल घर की कमान होती है बल्कि अब वे सत्ता की भागीदार भी होने चली हैं. मध्यप्रदेश में महिलाओं के लिये सीटें आरक्षित कर दी गई हैं, इस लिहाज से भी उनकी भागीदारी बढ़ती दिख रही है. यह शुभ संकेत है लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि उनकी सोच में निरंतर बदलाव आ रहा है. चुनाव के मैदान में उतरने वाली ये महिलायें सडक़, बिजली और पानी की बात नहीं करती हैं. इस बारे में उनका कहना है कि हमें मतदाता चुनता इसलिये ही है कि हम इन बुनियादी समस्याओं का रास्ता ढूंढ़ें और उन्हें राहत दें. इन महिलाओं की नजर में महिला शिक्षा, शौचालय, नशे के खिलाफ काम करना बड़ा मुद़दा बन गया है. इन मुद्दों को लेकर महिलायें न केवल सजग हैं बल्कि संजीदा भी. उनकी संजीदगी देखना है तो आपको पंचायतों में जाना होगा. उन छोटी जगहों पर जाना होगा जहां कि महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत लगभग न्यून है लेकिन उनकी जागरूकता देश की राजधानी में राज करने वाले किसी भी नेता से अधिक है.
स बारे में राजधानी भोपाल से लगे फंदा विकासखंड और ऐसे ही कुछ स्थानों में घूमने के बाद यह जानने का अवसर मिला. लगा कि दुनिया बदल रही है. हम इंटरनेट पर बैठकर भले ही ग्लोबल विलेज की कामना करें किन्तु भारत गांव की आत्मा है और इस सच को जानने का अवसर भी मिला. एक ऐसी ही महिला उम्मीदवार से जब पूछा गया कि उनके लिये चुनाव के मुद्दे क्या हैं तो तपाक से बोली पहले तो इन नशेडिय़ों को ठीक करूंगी और इसके बाद जिन बच्चियों के लिये स्कूल नहीं है, उसकी व्यवस्था करूंगी. मेरे लिये घर-घर में शौचालय बनाना भी एक बड़ा काम होगा क्योंकि हमारी बहनों की अस्मत खतरे में रहती है और हमें शर्म भी आती है. यह पूछे जाने पर पानी, बिजली और सडक़ आपके चुनाव का मुद्दा क्यों नहीं है तो उनका सीधा सा जवाब था- जब काम नहीं करना हो और भुलावो में रखना हो तो बार बार इसे मुद्दा बनाओ. कोलार के पास सटे गांव में भी खड़ी आदिवासी महिला पंच प्रत्याशी सुखमनी के लिये भी पानी बिजली और सडक़ कोई मुद्दा नहीं था अपितु यह रोजमर्रा की जरूरत है और इसे पूरा करना  किसी भी पंचायत का काम है. इस बदलती सोच की थाह लेने के लिये जब हमने शहरी इलाकों में बात की तो लगा कि शहर आज भी पानी, बिजली और सडक़ की समस्याओं से ही दो-चार हो रहा है. बच्चियों के लिये शहरों में पर्याप्त स्कूल और कॉलेज हैं जबकि शहरी इलाकों में शौचालय की कोई दिक्कत नहीं है. नशे को भी ये शहरी महिला प्रत्याशी बहुत बड़ा विषय नहीं मानती हैं. 
स बदलती सोच और ठहरी सोच के फासले पर कोई दूसरी कक्षा तक पढ़ी बुधियारिन की बात चुभती हुई महसूस होती है. जब उनसे पूछा गया कि आप लोगों के लिये स्त्री शिक्षा, नशे के खिलाफ लामबंदी और शौचालय मुद्दा है तो शहरी महिला प्रत्याशियों के लिये ये बड़े मुद्दे क्यों नहीं हैं? सवाल सुनकर वह मुस्करायी और धीरे से कहा इसलिये तो परधानमंत्री जी स्मार्ट शहरों की बात कर रहे हैं. हम गांव वाले तो पहले से स्मार्ट हैं. इस अपढ़ सी महिला की बात सुनकर मैं भौंचक था. वह समाज में बदलाव के लिये अपनी सोच में तो बदलाव ला रही है बल्कि उसे दीन-दुनिया की भी खबर है और उसका यह दंश देता कमेंट कई तरफ सोचने के लिये मजबूर करता है. इस घटना से मुझे याद आ रहा है कि साक्षरता मिशन का एक दल बैतूल जिले के एक गांव में गया और उन्हें पढऩे के लिये प्रेरित करने लगा. इनमें से एक मजदूर से मासूमियत से पूछा कि उसे जितना गड्डा खोदने का काम दिया जाता है, वह पूरी ईमानदारी से करता है? सवाल के जवाब में ना तो था नहीं. अब उसका दूसरा सवाल था कि गड़बड़ी कौन करता है, वही पढ़े-लिखे लोग ना? इस सवाल का जवाब  हां और ना दोनों में नहीं था. जवाब था तो चुप रह जाना. हमारी चुप्पी को हमारी मजबूरी समझ कर वह मजदूर भी हमारी तरफ देख रहा था और हम सचमुच बेबस थे. 
मोबाइल पर आया संदेश ठीक कहता है कि हर दिन की समाप्ति एक अनुभव के साथ होती है. शायद आप भी मेरी बातों से सहमत होंगे. 

शनिवार, 10 जनवरी 2015

अनुभव का रिश्ता


मनोज कुमार
मूचा सामाजिक ताना-बाना रिश्तों से ही बना और गुंथा हुआ है. ऐसा लगता है कि समाज के जन्म के साथ ही रिश्ते टूटने को लेकर बिसूरने का सिलसिला शुरू हो गया होगा. यह बिसूरन समय गुजरने के साथ कुछ ज्यादा ही सुनने को मिल रहा है. मन में इन विचारों को लेकर जब अपने दोस्त से बात की तो वह भी रिश्तों के टूटन से दुखी नजर आया. औरों की तरह उसके पास भी यही जवाब था कि समय बुरा आ गया है. क्या करें, कुछ नहीं कर सकते हैं. यह मेरा दोस्त अजीज है और मैं उसका यह जवाब सुनकर स्तब्ध रह गया. सब यही कहेंगे तो अच्छा समय आयेगा कब? क्या राजनीति के अच्छे दिनों वाले झूठे राग से समय बदल जायेगा? शायद नहीं. दरअसल, हर अच्छे समय के लिये अच्छे प्रयासों की जरूरत होती है. अंग्रेजों की दासता से हम कभी मुक्त नहीं हो पाते लेकिन महात्मा गांधी ने शुद्ध मन से प्रयास किया और हम स्वाधीन हैं. गांधीजी और उनके साथ के लोग कहते कि क्या कर सकते हैं तो शायद आज भी हम पराधीन ही होते. बहरहाल, रिश्तों और समय की बदलने की बात को लेकर मैं नाउम्मीद नहीं हूं. थोड़े सोच और समझ के साथ दोनों को बदला जा सकता है. यह इसलिये भी संभव है कि आप अपनी जरूरतों के अनुरूप नई तकनीक का इस्तेमाल करना सीख सकते हैं तो रिश्तों को नया स्वरूप देने के लिये अपनी जरूरत क्यों नहीं बनाते.
रिश्तों में टूटन सबसे ज्यादा बुर्जुग लोगों के साथ देखने में आती है और इसका इलाज हमने वृद्धाश्रम के रूप में ढूंढ़ लिया है. वास्तव में रिश्ते दो तरह के माने गये हैं. पहला खून का रिश्ता और दूसरा दिल का रिश्ता. इससे आगे समझने की कोई कोशिश हुई ही नहीं. एक तीसरे किस्म के रिश्ते से रिश्तों को नये ढंग से परिभाषित किया जा सकेगा, इसे मैं अनुभव का रिश्ता कहता हूं. जो लोग अपनी उम्र जी चुके हैं और एक तरह से हमारे जीवन में उनकी कोई उपयोगिता नहीं है, क्या उनसे हम अनुभव का रिश्ता नहीं बना सकते हैं. ऐसे बुर्जुग जिन्होंने अपने जीवन में कई बड़े काम किये लेकिन रिटायरमेंट के साथ वे बेकार हो गये. हमने भी मान लिया कि रिटायरमेंट के बाद आदमी अनुपयोगी हो जाता है. शायद शारीरिक तौर पर वह पहले जैसा काम न कर सके किन्तु बुद्धि के स्तर पर तो आदमी सशक्त होता ही है. ऐसे लोगों को शिक्षा के क्षेत्र में उपयोग में लाया जा सकता है. कोई लेखा का काम जानता हो तो किसी की मैनेजमेंट स्कील बेहतर हो, कोई गणित में महारत हो तो किसी के पास विज्ञान की समझ हो, और तो और जीवन विज्ञान में भी उनका पक्का दखल हो सकता है. क्यों न हम अपने बच्चों को महंगे कोचिंग में भेजने के बजाय इन अनुभवी लोगों का उपयोग करें. 
म्र के इस पड़ाव में इन्हें धन नहीं, सम्मान की जरूरत होती है. और जब उनके अनुभवों को एक मंच मिलेगा तो ये लोग वृद्धाश्रम से मुक्त होकर बेकार के बजाय उपयोगी हो जायेंगे. कुछेक घरों में इन बुर्जुगों को इसी तरह का सम्मान मिल रहा है. अनुभवों का जो हम लाभ प्राप्त करेंगे, उससे समाज में अनुभव का एक नया रिश्ता बनेगा और समय भी बदल जायेगा. हम यूरोपियन संस्कृति से मुक्त होकर अपने बड़ों को सम्मान देने की पुरानी रीत को नये रूप में ढाल सकेंगे. एक बार आप अपने घर, परिवार, मोहल्ले में अनुभव का रिश्ता बनाने की शुरूआत कर देखिये तो सही, कैसे आप के घर की बगिया में कोई मुरझाया फूल नहीं बल्कि घना छायादार बरगद का पेड़ होगा जो न केवल आपको छांह देगा बल्कि मन को भी प्रसन्न रखेगा. 

रविवार, 28 दिसंबर 2014

मीडिया का मजा लेते फ़िल्मकार


मनोज कुमार
गांव-देहात में एक पुरानी कहावत है गरीब की लुगाई, गांव भर की भौजाई. शायद हमारे मीडिया का भी यही हाल हो चुका है. मीडिया गरीब की लुगाई भले ही न हो लेकिन गांव भर की भौजाई तो बन ही चुकी है और इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है. मीडिया का जितना उपयोग बल्कि इसे दुरूपयोग कहें तो ज्यादा बेहतर है, हमारे देश में सब लोग अपने अपने स्तर पर कर रहे हैं, वह एक मिसाल है. आमिर खान की लगभग अर्थहीन फिल्म पीके में जिस तरह मीडिया का उपयोग किया गया है, वह इसी बात की तरफ इशारा करती है. पीके के पहले एक और फिल्म आयी थी और उसके चर्चे भी खूब हुये. आप भूल रहे हैं? उस फिल्म के नाम का पहला अक्षर भी पी से था अर्थात पीपलीलाईव. दोनों फिल्मों का खासतौर पर उल्लेख करना जरूरी पड़ता है क्योंकि दोनों फिल्में एक पत्रकार होने के नाते मुझे जख्म देती हैं. यह बात और साथियों के साथ भी होगी लेकिन वे कह नहीं रहे हैं या कहना नहीं चाहते हैं. खैर, मैं अपनी बात कहता हूं. पीपली लाईव में मीडिया को इस तरह समाज के सामने प्रस्तुत किया गया था कि मानो मीडिया का सच्चाई से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा. इतनी अतिशयोक्ति के साथ फिल्म बनायी गयी थी कि मन खट्टा हो जाता है. बावजूद मीडिया का दिल देखिये, इस फिल्म को उसने सिर-आंखों बिठाया और उसे लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया. अब एक और फिल्म हमारे सामने है पीके. इसमें मीडिया का सकरात्मक चेहरा तो दिखाने की कोशिश नहीं की गई है लेकिन अनजाने में वह सकरात्मक हो गया है. मीडिया के कारण जनमानस बदलता है और एक संशय, एक गलतफहमी दूर होती है. वाह रे फिल्म निर्माताओं तुम्हारी तो जय हो. राजनीति में जिस तरह मीडिया का उपयोग किया जाता है, वह किसी से छिपा नहीं है. मन की खबरें छपी तो मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया बन जाता है और मन की न छपे तो मीडिया पर जिस तरह के आक्षेप लगाये जाते हैं, वह शर्मनाक है. खैर, इस समय बात फिल्म की कर रहा हूं.
वाल यह है कि जिस पीपलीलाईव में मीडिया टीआरपी बटोरने के लिये सबकुछ दांव पर लगा देता है वही मीडिया पीके में सच्चाई का साथ देने के लिये स्वयं को आगे करता है. यह उलटबांसी मुझ जैसे कम अनुभव वाले पत्रकार के समझ नहीं आया. पीपली लाईव और पीके बनाने वालों को याद भी नहीं होगा कि इसी देश में एक फिल्म बनी थी न्यू देहली टाइम्स. इस फिल्म को बनाने वाले आसमान से नहीं उतरे थे. इन्हीं में से कोई था और उसे पता था कि ग्लैमरस दिखने वाले मीडिया के भीतर कितना अंधियारा है. एक पत्रकार बड़ी मेहनत से खबर लाता है और अखबार मालिक-राजनेता के गठजोड़ से खबर रोक दी जाती है. खबर क्या मरती है, पत्रकार मर जाता है. न्यू देहली टाइम्स के पत्रकार की तरह तो नहीं लेकिन कुछ मिलते-जुलते हादसे का शिकार मैं भी अपनी पत्रकारिता के शुरूआती दिनों में हुआ हूं. इस पीड़ा को बखूबी समझ सकता हूं. जब मेरे अखबार मालिक के दोस्त के खिलाफ लिखा तो वह हिस्सा ही छपने से रोक दिया गया. यह भी सच है कि तब वह पत्रकारिता का जमाना था और आज यह मीडिया का जमाना है लेकिन सच तो यही है कि आज भी स्थिति इससे अलग नहीं है. दोस्ती निभायी जा रही है, अपना नफा-नुकसान देखा जा रहा है, टीआरपी न गिरे, अखबार-पत्रिका का सेल न घटे और इस गुणा-भाग से आज भी मीडिया जख्मी है. 
पीपली लाईव बनाने वाले या पीके बनाकर करोड़ों कमाने वालों को भी अपनी ही पड़ी है. वे भी कौन सा समाज का भला कर रहे हैं, यह सवाल भी उठना चाहिये. पीपली लाईव के कलाकार आज किस स्थिति में है, किसी को खबर है? खबर हो भी क्यों? मीडिया तो गांव भर की भौजाई है. चाहे जैसे उसका इस्तेमाल करो. दुख तो इस बात का है कि मीडिया को भी अपने इस्तेमाल हो जाने का दुख नहीं है क्योंकि आखिरकार मीडिया समाज का चौथा स्तंभ है और वह अपनी जवाबदारी स्वार्थहीन होकर निभाता है. वह समाज की चिंता करता है और करता रहेगा. मीडिया के इस बड़ेपन, बड़े दिल को सलाम करता हूं और अपने आपको सौभाग्यशाली मानता हूं कि इस मीडिया का मैं हिस्सा हूं. भले ही कण भर.