सोमवार, 20 जून 2016

भारत का योग और गौरव का दिन 21 जून


मनोज कुमार
‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा...’ की पंक्तियां हर अवसर पर अपने आपको व्यक्त करती रही हंै और बीते साल 2014 में एक बार फिर पूरे संसार ने स्वीकार किया किया कि भारत विश्व विजयी है. दुनिया के कैलेंडर में 21 जून की तारीख हमेशा हमेशा के लिए अविस्मरणीय तारीख के रूप में अंकित हो चुका है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर यह वह तारीख है जिस दिन भारत की प्राचीन योग परम्परा को संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्वीकार किया और 21 जून की तारीख को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता दी. 21 जून पूरे कैलेंडर वर्ष का सबसे लम्बा दिन है। प्रकृति, सूर्य और उसका तेज इस दिन सबसे अधिक प्रभावी रहता है। इस दिन को किसी व्यक्ति विशेष को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि प्रकृति को ध्यान में रखकर चुना गया है। योग 5,000 साल पुरानी भारतीय शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक पद्धति है, जिसका लक्ष्य मानव शरीर और मस्तिष्क में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण से की थी जिसमें उन्होंने कहा था- ‘योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक हैं; मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है; विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन शैली में यह चेतना बनाकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता हैं। तो आयें एक अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को गोद लेने की दिशा में काम करते हैं।’
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल के पश्चात  21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किया गया। भारत के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है। 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों द्वारा 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। बेंगलुरू में 2011 में पहली बार दुनिया के अग्रणी योग गुरुओं ने मिलकर इस दिन ‘विश्व योग दिवस’ मनाने पर सहमति जताई थी। संयुक्त राष्ट्र में भारत के लिए पिछले सात सालों के दौरान यह इस तरह का दूसरा सम्मान है। इससे पहले यूपीए सरकार की पहल पर वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र ने महात्मा गाँधी के जन्मदिन यानि 2 अक्टूबर को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के तौर पर घोषित किया था।
योग परम्परा और शास्त्रों का विस्तृत इतिहास रहा है। जिस तरह राम के निशान इस भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह बिखरे पड़े है उसी तरह योगियों और तपस्वियों के निशान जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं में आज भी देखे जा सकते है। माना जाता है कि योग का जन्म भारत में ही हुआ। गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ (कर्मो में कुशलता को योग कहते हैं)। स्पष्ट है कि यह वाक्य योग की परिभाषा नहीं है। कुछ विद्वानों का यह मत है कि जीवात्मा और परमात्मा के मिल जाने को योग कहते हैं। बौद्धमतावलंबी भी योग शब्द का व्यवहार करते और योग का समर्थन करते हैं। यही बात सांख्यवादियों के लिए भी कही जा सकती है जो ईश्वर की सत्ता को असिद्ध मानते हैं। पंतजलि ने योगदर्शन में, जो परिभाषा दी है ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:’, चित्त की वृत्तियों के निरोध- पूर्णतया रुक जाने का नाम योग है। इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैं चित्तवृत्तियों के निरोध की अवस्था का नाम योग है या इस अवस्था को लाने के उपाय को योग कहते हैं। संक्षेप में आशय यह है कि योग के शास्त्रीय स्वरूप, उसके दार्शनिक आधार, को सम्यक् रूप से समझना बहुत सरल नहीं है। संसार को मिथ्या माननेवाला अद्वैतवादी भी निदिध्याह्न के नाम से उसका समर्थन करता है। अनीश्वरवादी सांख्य विद्वान भी उसका अनुमोदन करता है।
 हम यह बात समझ सकते हैं कि योग एक प्राचीन परम्परा है और भारत में जीवनशैली। इस बात को भी समझना होगा कि योग को हम जीवन में पुन: शामिल कर लेते हैं तो नैतिक मूल्यों में वृद्धि होगी। इस बात को मध्यप्रदेश सरकार ने एक बड़ी दृष्टि के साथ समझा और राज्य के समस्त पाठशालाओं के विद्यार्थियों के लिए नियमित रूप से योग की कक्षाएं लगाने की सहमति प्रदान की है। इसके पीछे सीधा सा तर्क यह है कि बच्चों को योग सिखाने से अनेक पीढिय़ों में योग विद्या चली जाएगी और उसके बाद की पीढिय़ां स्वयमेव इस योग विद्या को आगे बढ़ाती रहेंगी और योग विद्या के संरक्षण एवं संवर्धन में बेहतर प्रयास करेंगी। यह हमारे लिए गौरव की बात है कि भारत के प्रयासों से योग विद्या को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली है और यह बात एक बार फिर स्थापित हो गया है कि हमसा कोई और नहीं।

रविवार, 19 जून 2016

पापा मैं छोटी ही रहना चाहती हुँ

मेरे ब्लॉग पर यह पुराना लेख है. लगा की आज आप सब से शेयर करना चाहिए सो दुबारा।
-मनोज कुमार 

अखबार पढ़ते हुये अचानक नजर पड़ी कि कुछ दिनों बाद फादर्स डे है। मन में जिज्ञासा आयी और लगा कि अपनी बिटिया से पूछूं कि वो इस फादर्स डे पर क्या करने वाली है। मैंने सहज भाव से पूछ ही लिया कि बेटा, थोड़े दिनों बाद फादर्स डे आने वाला है। तुम अपने फादर अर्थात मेरे लिये क्या करने वाली हो? वह मेरा सवाल सुनकर मुस्करायी और मेरे सामान्य ज्ञान को बढ़ाते हुये कहा कि हां, पापा मुझे पता है कि फादर्स डे आने वाला है। अच्छा आप बताओ कि आप मेरे लिये क्या करने वाले हो? मैंने कहा कि दिन तो मेरा है, फिर मैं क्यों कुछ करने लगा। तु हें मेरे लिये करना चाहिये? इसके बाद हम बाप-बेटी के बीच जो संवाद हुआ, वह एक दार्शनिक संवाद  जरूर था लेकिन डे मनाने वालों के लिये सीख भी है। बेटी ने कहा कि पहली बात तो यह कि मैं अभी आपकी इनकम पर अपना भविष्य बना रही हूं और जो कुछ भी करूंगी आपके जेब से निकाल कर ही करूंगी। ऐसे में आपके लिये कुछ करने का मतलब आपको खुश करने के बजाय दुखी करना होगा क्योंकि जितने पैसों से मैं आपके लिये उपहार खरीदूंगी, उतने में आप हमारी कुछ जरूरतें पूरी कर सकेंगे। तो इसका मतलब यह है कि जब तुम कमाने लगोगी तो फादर्स डे सेलिब्रेट करोगी। अपने पापा के लिये उपहार खरीदोगी? इस बार भी बिटिया का जवाब अलग ही था। नहीं पापा, मैं चाहे जितनी बड़ी हो जाऊं, जितना कमाने लगूं लेकिन कभी इतनी बड़ी न हो पाऊं कि अपने पापा को उपहार देने की मेरी हैसियत बने। जिस पापा ने अपनी नींद खोकर मेरी परिवरिश की, जिस पापा ने अपनी जरूरतों को कम कर मेरी जरूरतों को पूरा करने में पूरा समय और श्रम लगा दिया, जिस पापा ने मेरे सपनों को अपना सपना मानकर मुझे बड़ा किया, उस पापा को भला मैं क्या दे सकती हूं। और पापा ही क्यों, मम्मी, दादाजी, दादीजी सब तो मिलकर मुझे बनाने की कोशिश कर, फिर भला मैं कैसे आप लोगों के लियेे उपहार खरीदने की हिम त कर सकती हूं। 
बिटिया की बातों को सुनकर मेरी आंखें भर आयी। मुझे लगा कि मैंने जो कुछ किया, वह निरर्थक नहीं गया। बेटी के भीतर वह सबकुछ मैंने समाहित कर दिया, जो मुझे मेरे पिता से मिला था। मुझे लगा कि फादर्स डे पर इससे अच्छा कोई उपहार हो भी नहीं सकता है। जब मां-बाप अपने बच्चों से हारते  हैं तो सही मायने में विजेता होते हैं। हारते हुयेे माता-पिता को सही मायने में खुशी मिलती है क्योंकि बच्चों की जीत ही माता-पिता की असली जीत है। हमारे समाज में ये जो डे मनाने का रिवाज चल पड़ा है और यह रिवाज भारतीय नहीं बल्कि यूरोपियन देशों की देन है। भौतिक जरूरतों की चीजों में उनके रिश्ते बंधे होते हैं और वे हर रिश्तों को वस्तु से तौलते हैं लेकिन भारतीय मन भावनाओं की डोर से बंधा होता है। वस्तु हमारे लिये द्वितीयक है, प्रथम भावना होती है और आज मेरी बेटी ने जता दिया कि वह जमाने के साथ भाग रही है्र दौड़ रही है लेकिन अपनी संस्कृति और संस्कार को सहेजे हुये। अपनी भावनाओं के साथ, अपने परिजनों की भावनओं की कद्र करते हुये। वह बाजार जाकर कुछ सौ रुपयों के तोहफों से भावनाओं का व्यापार नहीं कर रही है। यह मेरे जैसे पिछड़ी सोच के बाप के लिये अनमोल उपहार है। 

भारतीय समाज में भी डे मनाने की पुरातन परमपरा है। हम लोग यूरोपियन की तरह जीवित लोगों के लिये डे का आयोजन नहीं करते हैं बल्कि उनके हमारे साथ नहीं रहने पर करते हैं। उनकी मृत्यु की तिथि पर उनके पसंद का भोजन गरीबों को खिलाया जाता है, वस्त्र इत्यादि गरीबों में वितरित किया जाकर उनकी आत्मा की प्रसन्नता के लिये करते हैं, इसे हम पितृपक्ष कहते हैं। जीते जी हम उन्हें भरपूर स मान देते हैं और मरणोपरांत भी उनका स्थान हमारे घर-परिवार के बीच में होता है। दुर्भाग्य से हम यूरोपियन संस्कृति के साथ चल पड़ हैं। सक्षम पिता या माता का डे तो मनाते हैं लेकिन वृद्ध होते माता-पिता को वृद्वाश्रम पहुंचाने में देर नहीं करते हैं। बाजार जिस तरह अनुपयोगी चीजों का सेल लगाता है या चलन से बाहर कर देता है, वही हालत यूरोपियन समाज में रिश्तों का है, भावनाओं का है। हम भी इसी रास्ते पर चल पड़े हैं। पालकों के पास धन है, साधन है, सक्षम हैं तो दिवस है और नहीं तो उनके लिये दिल तो क्या घर पर स्थान नहीं है। मेरी गुजारिश है उन बच्चों माता-पिता को बाजार की वस्तु बनाने के बजाय उन्हें अपना स्नेह दें। उनकी भावनाओं का खयाल रखें और एक दिन फादर्स डे, मदर्स डे के बजाय पूरे साल का हर दिन उनके लिये समर्पित करें। यही हमारी परम परा और संस्कृति है और यही भारतीय समाज की धरोहर भी। 

गुरुवार, 16 जून 2016

एक कलम स्वच्छता के लिए













स्वच्छ  भारत अभियान को लेकर जनमानस में अभी भी असमंजस है. बहुतेरे लोगो, खासकर मीडिया के स्टूडेंट को यही पता नहीं है कि मोदी जी ने स्वच्छ  भारत अभियान की मियाद कौन सी तय की है. स्वच्छ  भारत अभियान का अर्थ केवल खुले में शौच से ही लगाया जा रहा है. इनके साथ ही स्वच्छ  भारत अभियान से जुड़े विभिन्न आयाम पर शोध पत्रिका "समागम" का यह अंक केंद्रित किया गया है. यह अंक आप वेबसाइट www.sabrangweb.com पर भी देख सकते हैं. 

मंगलवार, 7 जून 2016

हबीब तनवीर का लोक संसार


-अनामिका 
नाचा छत्तीसगढ़ की पारम्परिक प्रतिष्ठापूर्ण लोकविधा है। नाचा का संसार न केवल विविधताओं से परिपूर्ण है बल्कि इसमें सामाजिक जागरूकता का भाव भी है। छत्तीसगढ़ की लोक विधा नाचा को इस सदी के महान रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचाना और नाचा को विश्व रंगमंच पर प्रतिष्ठित किया। नाचा के साथ ही छत्तीसगढ़ की लोककलाओं को विका रंगमंच पर प्रतिष्ठित करने वाले इस सदी के महान रंगकर्मी हबीब तनवीर रायपुर से हैं। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ की लोककलाओं को विका रंगमंच में प्रतिष्ठित करने के लिये स्थानीय कलाकारों को अपनी टीम का हिस्सा बनाया। वे दुनिया की नब्ज जानते थे। रंगकर्म से उनका पुराना रिश्ता था। हबीब तनवीर और उनका नया थियेटर एक दूसरे के पूरक बन गये थे। उनका हर प्रदर्शन कालजयी बना। हबीब तनवीर केवल नाट्य संस्था संस्थापक नहीं थे, वे एक ऐसे व्यक्ति थे जो अनेक कला विधाओं के विशेषज्ञ और सृजनकर्ता भी थे। हबीब तनवीर व्यक्ति न रहकर एक अनन्य संस्था बन गए थे। नाट्य आलेख लेखक, कवि, संगीतकार, अभिनेता, गायक, निर्देशक और संचालक, और क्या नहीं, सभी कुछ, हबीब तनवीर थे। इस तरह छत्तीसगढ़ और हबीब तनवीर का रंगकर्म एक दूसरे के पर्याय बन गये, पहचान बन गये।  
हबीब तनवीर शुरू से अपनी जमीन से जुड़े हुए थे और इस जमीन में ही उन्होंने अपने जीवन के लक्ष्य-रंगमंच-के लिए नई भारतीय पहचान की खोज शुरू की। उन्होंने बंबई में च्आवामी थियेटरज् से नाटक के क्षेत्र में पहले कदम रखे। फिर वे दिल्ली चले गए। दिल्ली में उन्होंने हिन्दुस्तानी थियेटर की स्थापना की। इंग्लैण्ड में उन्होंने रंगमंच का प्रशिक्षण भी लिया। इस तरह रंगमंच के पश्चिमी मानदंडों का अनुभव प्राप्त कर छत्तीसगढ़ लौैटे और यहां उन्होंने राजनांदगांव में नाचा का स्वस्फूर्ति और सहज परंपरागत रूप में प्रस्तुत किए जा रहे हैं। नाचा का प्रदर्शन देखा। इस प्रदर्शन को देखने के बाद उन्होंने अपनी जमीन और अपनी हवा को संजोए रखते हुए नए सिरे से अपने रंगकर्म को आगे बढ़ाया। उन्होंने लोकरंग शैली के ओज और आनंद के तत्वों को इस तरह प्रस्तुत किया जिससे बारतीय रंगमंच की नई पहचान बननी शुरू हो गई। उन्होंने एक बार फिर च्नया थियेटरज् नाम से रंग संस्था शुरू की जा उन्होंने व्यक्तित्व का पर्याय बन गई।
नाचा के इतिहासकर जानते हैं कि नाचा मूलत:  रायपुर दुर्ग औऱ राजनांदगांव जिलों में ग्रामीण कलाकारों द्वारा आत्मरंजन के लिए प्रस्तुत किया जाता था। इसमें ग्राम विशेष में प्रचलित नृत्य, संगीत, हास्य और व्यंग्य के माध्यम से छोटी-छोटी कहानियां या घटनाएं प्रस्तुत की जाती थीव। कहावतों, मुहावरों, रीति-रिवाजों, धार्मिक और अन्य गीत इसमें शामिल  रहते और उनका अभिनय भी किया जाता। ये सारी बातें क्षेत्र के बाहर क्षेत्र विशेष की घटनाओं की प्रस्तुति दर्शक के समझ के बाहर होती। इस प्रस्तुति में कोई निर्धारित पटकथा या अपने आप में पूर्ण एक कहानी नहीं होती थी। उसमें उपर्युक्त सभी तत्व अनगढ़ मिश्रण के रूप में होते जिससे उसका हर अंश या हर अंक स्वतंत्र रचना होती। उसमें सामान्य नाटकों की भांति न आदि होता, और न अंत। इसलिए नाटक की प्रस्तुति में कोई क्लाइमेक्स या चरमबिन्दु नहीं होता। 
1973 में हबीब तनवीर ने नाचा पर कार्यशाला आयोजित की। इस समय तक नाचा में फिल्मी नाच और गानों का प्रवेश हो गया था। जिससे नाचा की मूल कला प्रदूषित हो रही थी। तनवीर ने यह प्रयास किया कि नाचा के मूल रूप को पुन: आविष्कृत किया जाए और इसे इस तरह प्रस्तुत किया जाय कि असंबद्ध क्षेत्र के दर्शक भी समझ सकें कि यह क्या कला है और इसमें क्या हो रहा है। दर्शन कला की शक्तिमत्ता और सृजनात्मकता को ग्रहण कर सकें, उससे आनंद प्राप्त कर सकें और उस आनंद को अपने जीवन अनुभव से जोड़ सकें। हबीब तनवीर ने नाचा कलाकारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को बरकरार रखने के लिए अपने निर्देशन को न्यूनतम कर दिया। उन्होंने कलाकारों को सृजनात्मक कार्य का अभ्यास कराया और विषय वस्तु से लेकर शैली के विकास तथा रंगमंच पर प्रस्तुत करने की सामूहिकता को प्रोत्साहित किया। नाचा का अभ्यास करते-करते उपजी पटकथा की वजह से नाचा किसी ग्राम विशेष की सीमित प्रस्तुति से उठकर विका रंगमंच का अभिमान्य प्रदर्शन बन गया। यहां यह गौर करने की बात है कि पटकथा तो वह खाखा था जिसके भीतर नाचा के कलाकार अपनी उन्मुक्त और अलौकिक कलात्मकता को लौकिक धरातल पर प्रस्तुत करते थे। तनवीर ने ग्रामीण और शहरी संस्कारों, लौकिक और अलौकिक चेतना तथा पूर्वी और पश्चिमी दृष्टियों को इस तरह मिला-जुला दिय कि उनका प्रदर्शन आधुनिक संस्कृति का प्रतिनिधि रंगमंच बन गया।
हबीब तनवीर के रंगकर्म को अनेक कोणों को देखा जा सकता है लेकिन जिस एक विशेषता के कारण वे अनन्य हैं वह है कि उन्होंने भारतीय रंगकर्म को विका रंगमंच पर स्थापित किया। इस उपलब्धि के लिए उन्होंने पूर्व और पश्चिम के रंगकर्म का विवेकपूर्ण समन्वय किया था। इस समन्वय से न केवल भारतीय रंगकर्म की आधुनिकता सामने आई वरन् पूरे  में रंगकर्म का अधुनातन रूप उभर कर आया। इस प्रक्रिया में स्वयं हबीब तनवीर विश्व के अग्रणी रंगकर्मी के रूप में अभिस्वीकृत हुए। हबीबजी ने नाट्य के ज्ञान और अनुशासन को ध्यान में रखकर, भारतीय लोक रंग शैली के आनंद और ओज, सहजता और उन्मुक्तता  को एक साथ समेटकर और पश्चिम के विधान को लक्ष्य करते हुए रंगकर्म की एक अलग पहचान बनाई। और इस पहचान में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सोपान था, नाचा से उनका तादात्म्य। लोक रंग को छत्तीसगढ़ के सुदूर ग्राम्य अंचल से उठाकर विश्व  रंगमंच पर प्रतिष्ठित कर दिया। 

शनिवार, 28 मई 2016

सम्मान एवं सहारे का सवाल

30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष
मनोज कुमार
एक बार फिर हम हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाने की तैयारी में हैं. स्मरण कर लेते हैं कि कैसे संकट भरे दिनों में भारत में हिन्दी पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ था तो आज यह विश£ेषण भी कर लेते हैं कि कैसे हम सम्मान को दरकिनार रखकर सहारे की पत्रकारिता कर रहे हैं. 1826 से लेकर 2016 तक के समूचे परिदृश्य की मीमांसा करते हैं तो सारी बातें साफ हो जाती हैं कि कहां से चले थे और कहां पहुंच गए हैं हम. इस पूरी यात्रा में पत्रकारिता मीडिया और पत्रकार मीडियाकर्मी बन गए. इन दो शब्दों को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि हम सम्मान की नहीं, सहारे की पत्रकारिता कर रहे हैं. जब हम सहारे की पत्रकारिता करेंगे तो इस बात का ध्यान रखना होगा कि सहारा देने वाले के हितों पर चोट तो करें लेकिन उसका हित करने में थोड़ा लचीला बर्ताव करें. मीडिया का यह व्यवहार आप दिल्ली से देहात तक की पत्रकारिता में देख सकते हैं.
शुचिता की चर्चा भी गाहे-बगाहे होती रहती है वह भी पत्रकारिता में. मीडिया में शुचिता और ईमानदारी की चर्चा तो शायद ही कभी हुई हो. इसका अर्थ यह है कि पत्रकारिता का स्वरूप भले ही मीडिया हो गया हो लेकिन आज भी भरोसा पत्रकारिता पर है. फिर ऐसा क्या हुआ कि पत्रकारिता का लोप होता चला जा रहा है? इस पर विवेचन की जरूरत है क्योंकि एक समय वह भी था जब पत्रकारिता में आने वाले साथियों को डिग्री-डिप्लोमा की जरूरत नहीं होती थी. जमीनी अनुभव और समाज की चिंता उनकी लेखनी का आधार होती थी. आज टेक्रालॉजी के इस दौर में डिग्री-डिप्लोमा का होना जरूरी है. पत्रकारिता कभी जीवनयापन का साधन नहीं रही लेकिन आज भी पत्रकारिता में नौकरी नहीं, मीडिया में नौकरी मिलती है जहां हम मीडिया कर्मी कहलाते हैं. एक सांसद महोदय को इस बात से ऐतराज है कि मीडियाकर्मियों को जितनी तनख्वाह मिलती है, वह सांसदों से अधिक है और इस आधार पर वे सांसदों का वेतन बढ़ाने की मांग करते हैं. मुझे याद नहीं कि आज से दस-बीस साल पहले तक कभी इस तरह की तुलना होती हो. हां, ऐेसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जब पत्रकारों ने ऐसी खैरात को लात मार दी है. और ऐसे लोगों की संख्या कम हुई है लेकिन आज भी खत्म नहीं. 
पत्रकारिता देश एवं समाज हित के लिए स्वस्र्फूत चिंतन है. पत्रकार के पास पहनने, ओढऩे-बिछाने और जीने के लिए पत्रकारिता ही होती है. उसकी भाषा समृद्ध होती है और जब वह लिखता है तो नश्तर की तरह लोगों के दिल में उतर जाती है. हालांकि मीडिया के इस बढ़ते युग में आज पेडन्यूज का आरोप लगता है तो बवाल मच जाता है. जांच बिठायी जाती है और निष्कर्ष वही ढाक के तीन पांत होता है. लेकिन कभी किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि इम्पेक्ट फीचर के नाम पर चार और छह पन्ने के विज्ञापन दिए जाते हैं जिसे अखबार सहर्ष प्रकाशित करते हैं. यह जानते हुए भी कि इसमें जो तथ्य और आंकड़े दिए गए हैं, वे बेबुनियाद हैं तथा बहुत हद तक काल्पनिक लेकिन हम इसकी पड़ताल नहीं करते हैं क्योंकि इन्हीं के सहारे प्रकाशन संभव हो पा रहा है. आधुनिक मशीनें और आगे निकल जाने की होड़ में खर्चों की पूर्ति करने का यही सहारा है. यह भी मान लिया जाए तो क्या इसके आगे विज्ञापनों के रूप में छपे तथ्यों की पड़ताल कर खबर नहीं छापना चाहिए? इस पर एक वरिष्ठ से चर्चा हुई तो ऐसा करने को उन्होंने नैतिकता के खिलाफ बताया. उनका तर्क था कि जिस चीज का आप मूल्य ले चुके हैं, उसकी पड़ताल नैतिक मूल्यों के खिलाफ होगा. मैं हैरान था कि सहारे की मीडिया के दौर में नैतिक मूल्यों की चिंता. संभव है कि उनकी बात वाजिब हो लेकिन इस बदलते दौर में हमें पत्रकारिता की भाषा, शैली एवं उसकी प्रस्तुति पर चिंतन कर लेना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को हम कुछ दे सकें और नहीं तो हर वर्ष हम यही बताते रहेंगे कि 30 मई को भारत का पहला हिन्दी समाचार पत्र का प्रकाशन हुआ था. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)  

बुधवार, 4 मई 2016

बाल विवाह : चुनौती और सफलता


-अनामिका
भारतीय समाज संस्कारों का समाज है. जन्म से लेकर मृत्यु तक सिलसिले से विधान हैं. यह सारे विधान वैज्ञानिक संबद्धता एवं मनोविज्ञान पर आधारित है. जैसे-जैसे हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे कामयाबी के साथ चुनौतियां हमारे समक्ष बड़ी से बड़ी होती जा रही हैं. यह एक सच है तो एक सच यह भी है कि इन संस्कारों में कई ऐसी रीति-रिवाज और परम्परा में कुछ ऐसी भी हैं जो समाज के समग्र विकास को रोकती हैं. इनमें से एक है बाल विवाह. वह एक समय था जब बाल विवाह की अनिवार्यता रही होगी लेकिन आज के समय में बाल विवाह लड़कियों के लिए जंजीर की तरह है. समय के साथ कदमताल करती लड़कियां अंतरिक्ष में जा रही हैं. सत्ता और शासन सम्हाल रही हैं. खेल और सिनेमा के मैदान में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. ऐसे में उन्हें बाल विवाह के बंधन में बांध देना अनुचित ही नहीं, गैर-कानूनी भी है. 
बाल विवाह का सबसे बड़ा दोष अशिक्षा है. विकास के तमाम दावे-प्रतिदावे के बाद भी हर वर्ष बड़ी संख्या में बाल विवाह होने की सूचना मिलती है. यह दुर्भाग्यजनक है और यह दुर्भाग्य केवल ग्रामीण समाज के हिस्से में नहीं है बल्कि शहरी समाज भी इस दुर्भाग्य का शिकार है. अशिक्षा के साथ संकीर्ण सोच भी इस दिशा में अपना काम करती है. भारतीय ग्रामीण समाज अशिक्षा के साथ ही आर्थिक संकटों से घिरे रहने के कारण वह कम उम्र में बिटिया का ब्याह कर जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहता है लेकिन शहरी समाज के पास सभी किस्म के स्रोत होने के बावजूद स्वयं को इस अभिशाप से मुक्त रखने की इच्छाशक्ति शेष नहीं है. कुतर्क यह भी दिया जाता है कि ब्याह के पहले लड़कियां असुरक्षित रहती हैं और ब्याह हो जाने से असमाजिक तत्वों से वह सुरक्षित रहती है. अब यह बात कौन समझाए कि भारत में महिलाओं के साथ रेप के जो आंकड़े आते हैं, उनमें ब्याहता औरतों की संख्या बड़ी होती है.
बाल विवाह समाप्त करने की बड़ी चुनौतियों के बीच सरकारों द्वारा लगातार किए जा रहे प्रयासों को सफलता भी मिली है. सफलता के प्रतिशत पर ना जाएं तो संभावनाओं के द्वार जरूर खुलते दिख रहे हैं. केन्द्र से लेकर राज्यों में सरकारों द्वारा बेटियों की शिक्षा, सशक्तिकरण और उनके लिए सुनहरे भविष्य को सुनिश्चित करते अनेक योजनओं का संचालन किया जा रहा है. बिगड़ते लिंगानुपात समाज के लिए चिंता का विषय है क्योंकि बाल विवाह के पूर्व अनेक बच्चियों को जनम से पूर्व या जन्म के तत्काल बाद मार दिया जाता था. शासकीय योजनाओं का लाभ मिलने के बाद समाज की सोच में परिवर्तन दिखने लगा है. माता-पिता अब बच्चियों को लेकर निश्चिंत होने लगे हैं. अपनी बेटियों की पढ़ाई पर उन्हें आर्थिक प्रबंध नहीं करना पड़ता है और ना ही उनके शादी-ब्याह की चिंता करनी होती है. इस तरह अनेक शासकीय योजनाओं बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ की सोच ने जनमानस को बदला है.
यह सच है कि शासकीय योजनाओं से जनमानस की सोच बदली है तो यह भी एक सच है कि शासकीय योजनाएं जरूरतमंदों तक पहुंव ही नहीं रही हैं. शासकीय तंत्र की कार्यवाही इतनी जटिल है कि जानते हुए भी कई बार आम आदमी इन योजनाओं का लाभ लेने से पीछे हट जाता है. कोई एक रास्ता ऐसा निकालना होगा कि बेटियों का हक उन तक सहज रूप से पहुंच सके. बिचौलियों की प्रथा पर सरकारों को नियंत्रण पाने की जरूरत होगी. उम्मीद की जा सकती है कि यह चुनौती बड़ी नहीं है और समय आने पर इसका समाधान भी हो पाएगा. सरकारों का सामाजिक दायित्व है कि वह आगे बढक़र समाज को रूढि़मुक्त करें और इसकी पहल जारी है. उम्मीदें अभी कायम हैं.
बाल विवाह की सबसे बड़ी चुनौती है लोगों में जागरूकता का अभाव. कम उम्र में बच्चों की शादी के दुष्परिणाम से समाज को अवगत कराने की जरूरत है. यह काम समाज का है और समाज के प्रबुद्ध लोगों को आगे आकर जगाना होगा. बाल विवाह एक अभिशाप ही नहीं है बल्कि बच्चों के मानसिक एवं शारीरिक विकास के लिए बाधक है. उनका समग्र विकास नहीं हो पाता है. स्वयंसेवी संस्थाओं को चाहिए कि वे एक दिन अक्षय तृतीया पर बाल विवाह रोकने की औपचारिकता पूर्ण ना करें बल्कि पूरे वर्ष बल्कि सतत रूप से इसे अभियान बनाकर चलाते रहें. ऐसी कोई समस्या नहीं, ऐसी कोई चुनौती नहीं जो हमारे साहसिक प्रयासों और पहल के सामने टिक सकें.

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

जल परम्परा और बाजार


मनोज कुमार
एक समय था जब आप सफर पर हैं तो पांच-दस गज की दूरी पर लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा आपकी खातिरदारी के लिए तैयार मिलेगा. पानी के घड़े के पास जाते हुए मन को वैसी ही शीतलता मिलती थी, जैसे उस घड़े का पानी लेकिन इस पाऊच की दुनिया में मन पहले ही कसैला हो जाता है. आज समय बदल गया है. जेब में दो-दो रुपये के सिक्के रखिये और किसी दुकानदार से पानी का पाऊच मांगिये. पानी का यह पाऊच आपकी प्यास तो थोड़ी देर के लिए शांत कर सकता है लेकिन मन को शीतलता नहीं दे सकता है. आखिर ऐसा क्या हुआ और क्यों हुआ कि हमने अपने आपसे इस घड़े को परे कर दिया है? पानी का यह घड़ा न तो पर्यावरण को प्रदूषित करता था और न ही शरीर को किसी तरह का नुकसान पहुंचाता था. देखते ही मन को भीतर ही भीतर जो खुशी मिलती थी, वह कहीं गुम हो गई है, उसी तरह जिस तरह लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा लगभग गुम हो गया है. 
इस घड़े का गुम होते जाना, सिर्फ एक घड़े का गुम हो जाना नहीं है बल्कि एक संस्कार का और परम्परा का गुम हो जाना है. जो लोग इस बात को तो हवा दे रहे हैं कि अबकी विश्व युद्ध पानी को लेकर होगा, क्या वे लोग इस घड़े को बचाने में अपना कोई योगदान दे रहे हैं? ऐसे लोग एक माहौल क्रियेट करते हैं और लोगों के मन में डर पैदा करते हैं. यह डर अकारण नहीं है बल्कि बाजार का दबाव उन्हें इस सुनियोजित साजिश का हिस्सा बनाता है. सवाल यह है कि अनुपम मिश्र की तरह आप तालाब आज भी खरे हैं कि तर्ज पर पानी की चिंता क्यों नहीं करते हैं? क्यों जलस्रोतों को बचाने की मुहिम में हिस्सेदार नहीं बनते हैं? मॉल और बड़ी बिल्डिंगों के नीचे कराहते हमारे जलस्रोत अपने को बचा लेने की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन हम उन्हें अनसुनी कर आगे बढ़ लेते हैं.
अभी सूरज की तपिश बढ़ी नहीं है लेकिन हौले-हौले उसकी गर्मी का अहसास होने लगा है और इसी अहसास के साथ पानी का संकट बढऩे लगा है. पानी का यह संकट लोगों के चेहरे से ‘पानी’ उतार रहा है. एक मटका पानी के लिए पिछले सालों में कई जानों पर बन आयी थी. पानी के लिए पानी-पानी होते लोगों का यह नया व्यवहार अब नया नहीं रहा. साहबों की गाडिय़ों की धुलाई में अनगित लीटर पानी का खर्च और निचली बस्तियों में रहने वाले एक गरीब के बर्तन से गायब होता पानी आज का सच है. पानी का कम होते जाना एक बड़ा संकट है किन्तु संकट इससे भी बड़ा यह है कि हम आज तक पानी के जतन के लिए जाग नहीं पाये हैं. लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा भारतीय समाज की जरूरत ही नहीं बल्कि संस्कार है. यहीं से यह संस्कार पानी के जतन की शिक्षा देता है. जरूरी है कि छोटे-छोटे प्रयासों से पानी को जीवन दें, लाल कपड़े में लिपटे पानी के घड़े को दिखने दें. ऐसा नहीं किया तो पानी के फेर में अब किसी के चेहरे पर ‘पानी’ नहीं रह जाएगा. तब कैसे कहेंगे पानीदार समाज?
भारत गांवों का देश रहा है और अभी भी भारत ग्रामीण परिवेश में ही जीता है। ग्रामीण परिवेश का सीधा सा अर्थ है एक बंधी-बंधायी परम्परा की जीवन शैली। इस परम्परागत जीवनशैली को करीब से देखेंगे तो आप यह जान पायेंगे कि वे शहरी जीवनशैली से कहीं अधिक समृद्ध हैं। वे बाजार के मोहताज नहीं हैं बल्कि वे अपनी परम्परा को बाजार से एकदम परे रखे हुये हैं और यही कारण है कि अनेक किस्म की समस्याओं के बावजूद उनका जीवन तनावपूर्ण नहीं है। जहां तक जल संरक्षण की चर्चा करते हैं तो सर्वाधिक जल स्रोत ग्रामीण क्षेत्रों में ही मिलेंगे। पानी उनके लिये उपयोग की वस्तु नहीं है बल्कि पानी उनके लिये जल-देवता है और वे उसका जीवन जीने के लिये उपयोग करते हैं न कि उसका दुरूपयोग। ग्रामीण परिवेश में जीने वाले अधिसंख्य लोग अपनी किसी उपलब्धि पर आयोजन में खर्च नहीं करते हैं बल्कि पानी के नये स्रोत बनाने के लिये करते हैं। पुराने जल स्रोतों के नाम देख्ेंगे तो आपको किसी न किसी पुराने परिवार के सदस्यों के नाम का उल्लेख मिलेगा। सेठानी घाट कहां है, यह आप से पूछा जाये तो आप हैरानी में पडऩे के बजाय नर्मदाजी के नाम का उल्लेख करेंगे क्योंकि यह सेठानी घाट प्रतीक है उस जलसंरक्षण की परम्परा का जहां बिटिया का ब्याह हो, घर में नया सदस्य आया हो या किसी ऐसे अवसर को परम्परा के साथ जोडक़र जलस्रोतों का निर्माण किया जाता रहा है। गांवों से निकलकर जब हम कस्बों की तरफ बढ़ते हैं तो यहां भी जल संरक्षण परम्परा का निर्वाह करते हुये लोग दिख जाते हैं। जिन पुरातन जल स्रोतों में गाद भर गयी है अथवा उसके जीर्णोद्धार की जरूरत होती है तो लोग स्वयमेव होकर श्रमदान करते हैं। इन श्रमदानियों में कस्बे का आम आदमी तो होता ही है अपितु बुद्धिजीवी वर्ग जिसमें शिक्षक, पत्रकार, समाजसेवी आदि-इत्यादि सभी का सहयोग मिलता है। यह है भारतीय जल संरक्षण की पुरातन परम्परा।