मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

शोध पत्रिका ‘समागम’ का जनवरी अंक महात्मा गांधी पर केन्द्रित, प्रकाशन के 14वां वर्ष पूरे हुये


भोपाल।  शोध पत्रिका ‘समागम’ जनवरी 2015 में अपने प्रकाशन का 14 वर्ष पूरे करने जा रही है। वर्ष 2014 का अंक एक गांधी के महात्मा हो जाने विषय पर केन्द्रित है। भोपाल से मासिक कालखंड में प्रकाशित हो रही द्विभाषी शोध पत्रिका ‘समागम’ का केन्द्रीय विषय मीडिया एवं सिनेमा है किन्तु मानव जीवन का हर पहलू मीडिया एवं सिनेमा से प्रभावित है अत: इससे जुड़े अन्य विषयों के शोधपत्रों का प्रकाशन भी किया जाता है। शोध पत्रिका ‘समागम’ का हर अंक विशेषांक होता है। 14 वर्षों के प्रकाशन की निरंतर श्रृंखला में प्रतिवर्ष जनवरी एवं अक्टूबर में महात्मा गांधी पर अंक प्रकाशन होता रहा है। अब तक के विशेष अंकों में लता मंगेशकर, दलित पत्रकारिता, रेडियो पत्रकारिता, न्यू मीडिया, पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर के साथ ही पत्रकारिता के स्तंभ पराडक़र, माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे, भवानीप्रसाद मिश्र पर प्रकाशित किया गया है। राज्य विधानसभा चुनाव एवं आमचुनाव पर भी विशेष अंकों का संयोजन किया गया है। इस आशय की जानकारी शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक एवं वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार ने दी।
शोध पत्रिका ‘समागम’ का 15वें वर्ष का पहला अंक का विषय ‘मीडिया की सामाजिक जवाबदारी’ पर है। समाज के विभिन्न प्रकल्प यथा शिक्षा, अर्थ, राजनीति, ग्राम्य जीवन, साहित्य, संस्कृति, परम्परा, महिला एवं बच्चे के साथ ही बदलते परिवेश में मीडिया की भूमिका को चिंहित करते हुये तैयार किया जा रहा है। इसी तरह अप्रेल 2014 का अंक पत्रकार मार्क टुली पर केन्द्रित होगा। शोध पत्रिका ‘समागम’ विगत तीन वर्षों से लगातार वार्षिंकांक के रूप में वर्ष भर में प्रकाशित श्रेष्ठ शोध आलेखों की एक पुस्तक का प्रकाशन भी करता है। अब तक मीडिया एवं समाज, भारतीय सिनेमा के सौ साल तथा समाज, संचार एवं सिनेमा शीर्षक से क्रमश: पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है। इस वर्ष मीडिया समग्र शीर्षक से किताब का प्रकाशन किया जा रहा है। 
शोध पत्रिका ‘समागम’ व्यक्तिगत प्रयासों का मंच है।  इस पत्रिका को देश के श्रेष्ठ एवं प्रतिष्ठित विशेषज्ञों का निरंतर मार्गदर्शन प्राप्त होता है। मीडिया के विभिन्न मंचों से भी शोध पत्रिका को सहयोग मिलता रहा है। शोध पत्रिका ‘समागम’ श्रेष्ठ शोध आलेखों का प्रकाशन हेतु स्वागत करता है।
शोध आलेख भेजने हेतु सम्पर्क किया जा सकता है सम्पादक शोध पत्रिका ‘समागम’ 3, जूनियर एमआयजी, द्वितीय तल, अंकुर कॉलोनी, शिवाजीनगर, भोपाल-16 मो. 09300469918 ई-मेल है k.manojnews@gmail.com

रविवार, 14 दिसंबर 2014

रायपुर साहित्य महोत्सव : एक अविस्मरणीय आयोजन के तीन दिन


-मनोज कुमार
जाते हुये साल 2014 के लिये छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर में स्थापित पुरखौती मुक्तांगन अविस्मरणीय यादें छोड़ गया। ऐसी यादें जिसकी कसक अगले आयोजन की प्रतीक्षा में बनी रहेगी। राज्य सरकार की पहल पर छत्तीसगढ़ मुक्तांगन में देशभर के सुप्रतिष्ठित रचनाधर्मियों का समागम का हुआ। अपनी अपनी विधा के दक्ष रचनाधर्मियों ने एक ऐसे रचना संसार को अभिव्यक्ति दी जहां विचारों में विभिन्नता थी, असहमतियां भी थी लेकिन इसके बीच एक नयेे विचार का जन्म हुआ जो छत्तीसगढ़ की रचनाधर्मिता को और भी समृद्ध करेगी। शायद इसलिये ही इस अविस्मरणीय साहित्य समागम के उद्घघाटन में मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह कहते हैं कि विचारों में भिन्नता हो सकती है, लेकिन वैचारिक विभिन्नताओं में ही नये विचारों के अंकुर खिलते हैं. हमें नये विचारों का हमेशा स्वागत करना चाहिए, सबके विचारों को और असहमति अथवा विरोध को भी सुनना चाहिए। मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह का यह वक्तव्य महज रस्मी वक्तव्य नहीं है बल्कि इसके गहरे अर्थ हैं और अर्थ इस संदर्भ में कि छत्तीसगढ़ एक खुलेमन का राज्य है जहां वैचारिक विभिन्नता को और असहमतियों को सम्मान के साथ स्वीकार किया जाता है। मुख्यमंत्री का यह वक्तव्य छत्तीसगढ़ की उस परम्परा का निर्वाह करती है जिससे छत्तीसगढ़ की पहचान रही है।
छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक एवं साहित्य केनवास हमेशा से विशाल रहा है। स्वाधीनता पूर्व और स्वाधीनता के पश्चात इस केनवास पर हर कालखंड में नये हस्ताक्षरों से समाज का परिचय हुआ है। यह वही हस्ताक्षर हैं जो छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक एवं साहित्य की पुरातन परम्परा को समृद्ध करती रही है। छत्तीसगढ़ देश के अन्य राज्यों से अपनी संस्कृति, परम्परा और जीवनशैली के मायनों में अलग दिखता है। एक वनवासी बहुल राज्य होने के नाते इस राज्य की अपनी प्राथमिकतायें बहुत दूसरी है लेकिन यह बात गर्व की है कि हमने अपना मन छोटा नहीं किया और देश के सभी वर्गों के, सभी रचनाधर्म के लोगों को एक मंच पर एकत्र किया। मुक्तांगन के इस आयोजन में एक ही दृष्टि ही थी रचना कर्म में उपलब्धि। न कोई वाद और न कोई परिवाद। यह आयोजन मील का पत्थर साबित होता है।
छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक एवं साहित्य विशाल केनवास की चर्चा करते हैं तो सहज ही छत्तीसगढ़ की महान साहित्यिक-सांस्कृतिक विभूतियों का स्मरण हो आता है और यह असामयिक भी नहीं है। ऐसे विभूतियों की श्रृंखला काफी लम्बी है किन्तु जिन्हें स्मरण होता है उनमें राजा चक्रधर सिंह, पंडित मुकुटधर पाण्डेय, लोचनप्रसाद पांडेय, माधवराव सप्रे, गजानंन माधव मुक्तिबोध, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, पंडित सुन्दरलाल शर्मा, श्यामलाल चतुर्वेदी, लाला जगदलपुरी, हरि ठाकुर, गनपत साव, शंकर शेष, सत्यदेव दुबे, श्रीकांत वर्मा  जैेसे थोड़े से नाम हैं। हमें स्मरण करना होगा कि यह छत्तीसगढ़ की माटी का यह ओज ही था कि विवेकानंद जी दो वर्ष के लिये यहां ठहरे तो महात्मा गांधी ने भी स्वाधीनता संग्राम के समय छत्तीसगढ़ आये। इतिहास के पन्नों पर देश की आजादी के लिये मिटने वालों की सूची भी बड़ी है लेकिन शहीद वीर नारायणसिंह और गुंडाधूर को भला कौन भुला सकता है।
छत्तीसगढ़ का यही सांस्कृतिक एवं साहित्य केनवास मुक्तांगन में जीवंत हो उठा है। राज्य के संस्कृति विभाग ने सुनियोजित ढंग से मुक्तांगन का विकास किया है। गजानन माधव मुक्तिबोध मंडप पर निदा फाजली से चर्चा हो रही थी तो पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मंडप में छत्तीसगढ़ के दिवगंत साहित्यकारों का पुण्य स्मरण किया गया। इसी मंडप पर कविता सुनी-सुनायी गयी। छत्तीसगढ़ के लोकसाहित्य की चर्चा का केन्द्र रहा यह मंडप तो सत्ता, साहित्य एवं संस्कृति पर विमर्श का साक्षी भी यही मंडप बना। मुकुटधर पांडेय मंडप में बस्तर की बोलियां और साहित्य चर्चा के केन्द्र में रहा तो छत्तीसगढ़ी सिनेमा और लोकरंग पर विस्तार से विमर्श कर एक नयी दुनिया तलाशी गयी। इसी मंडप पर रचनाकार और उनके रचनात्मक अनुभव साझा किया गया तो रंगमंच की चुनौतियों को भी खंगालने की कोशिश की गई। हबीब तनवीर मंडप पर छत्तीसगढ़ का इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति पर विचार किया गया तो इसी मंडप में फोटोग्राफी की कार्यशाला आयोजित की गई।
हबीब तनवीर के रंगलोक पर गजानन माधव मुक्तिबोध मंडप पर व्यापक विमर्श हुआ। इसके बाद कवि अशोक वाजपेयी ने अपनी कविताओं का रचना पाठ किया। इसी मंडप में लोकतंत्र और साहित्य पर बातचीत हुई तो बातचीत का यह क्रम जारी रहा। सिनेमा और रंगमंच के सितारों से चर्चा हुई। इस मंडप का एक और विशेष विषय था भक्ति काव्य : समकालीन पाठ की तलाश। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मंडप में उपन्यास और नया जीवन यथार्थ पर चर्चा के लिये ख्यातनाम उपन्यासकार जुटे। चर्चा के इस क्रम को आगे बढ़ाया गया साहित्य और कलाओं की अंतर्निभरता तथा साहित्य की बीसवीं सदी विषय को केन्द्र में रखकर। भारतीय भाषायें और भारतीयता विषय से गुजरते हुये यह मंडप नये दौर में पत्रकारिता पर केन्द्रित हो गया था। इस मंडप में छत्तीसगढ़ का नया परिवेश: सहूलियतें और चुनौतियों पर चर्चा कर निष्कर्ष पर पहुंचने की सार्थक कोशिश की गई।  मुकुटधर पांडेय मंडप में छत्तीसगढ़ के आधुनिक साहित्य में नया भावबोध, छत्तीसगढ़ का रंगमंच, छत्तीसगढ़ी की लोककथाओं का कथा-कथन, साहित्य ेमें लोकप्रियता की खोज, काव्यपाठ एवं साहित्य और सिनेमा पर सार्थक बातचीत की गई। जीवन के सबसे अहम पक्ष कार्टून विधा पर हबीब तनवीर मंडप में कार्यशाला का आयोजन किया गया।  
 गजानन माधव मुक्तिबोध मंडप में अंतिम दिन की शुरूआत बदलते परिवेश में हिन्दी कहानी विषय पर चर्चा से शुरू हुई। काव्यपाठ के बाद साहित्य में शुचिता विषय पर चिंता और चिंतन किया गया। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मंडप में बातचीत का सिलसिला सत्यमेव जयते की टीम से शुरू हुई। कथाकथन के बाद असहमतियों के बीच साहित्य पर सार्थक विमर्श हुआ। सरगुजा अंचल के लोकसाहित्य पर बात करने के बाद चर्चा के केन्द्र में नये दौर की पत्रकारिता ने प्रवेश पाया। इस चर्चा में पत्रकारिता के बदलते मानदंड और वर्तमान परिवेश की जरूरतों पर चर्चा की गई।
मुकुटधर पांडेय मंडप सिनेमा की चर्चा का केन्द्र बना। बचपन, टीवी, सिनेमा और किताबों पर चर्चा करते हुये आज का सिनेमा और गीत रचना पर सार्थक बातचीत ने एक नया आयाम दिया। नये दौर की मीडिया जिसे आभासी संसार का संबोधन दिया गया है, इस पर भी व्यापक बात हुई। आभासी संसार में शब्द सर्जना विषय केन्द्र में था। इसी मंडप में छत्तीसगढ़ के लोकसंगीत और इसके बाद छत्तीसगढ़ की लोककलाओं पर गहन विमर्श किया गया।  हबीब तनवीर मंडप में हिन्दी सिनेमा के गीतकार पर चर्चा के बाद सृजनात्मक लेखन पर कार्यशाला का आयोजन किया गया।
सृजनधर्मिता के लगभग सभी पक्षों पर विमर्श हुआ। पारम्परिक कला-साहित्य से लेकर आधुनिक कला-साहित्य चर्चा के केन्द्र बिन्दु थे तो नये दौर की पत्रकारिता और न्यू मीडिया को भी चर्चा के केन्द्र में रखा गया। उल्लेखनीय बात यह रही कि कार्टून विधा को भी इस आयोजन का हिस्सा बनाया गया जिसकी सराहना करना अनुचित नहीं है। 14 साल पहले जब छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ था तब इस केनवास के और बड़े हो जाने की उम्मीद जागी थी लेकिन सबकुछ एक साथ हो पाना संभव नहीं था। जिस तरह 14 वर्ष के वनवास के बाद भगवान राम का आगमन हुआ। लगभग यही कालखंड छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक एवं साहित्य केनवास को नये रंग से भरने का समय चुना गया होगा। निश्चित रूप से यह एक बेहतर आयोजन की शुरूआत है। इस तीन दिवसीय आयोजन को मात्र एक शुरूआत माना जाना चाहिये क्योंकि आने वाले समय में यह साहित्यिक आयोजन और विस्तार पायेगा। इस आयोजन ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक एवं साहित्यिक परम्परा को और भी समृद्ध किया है।

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

विकास के पथ पर अग्रसर छत्तीसगढ़


-अनामिका
कोई यकीन ही नहीं कर सकता कि यह वही छत्तीसगढ़ है जहां के लोग कभी विकास के लिये तरसते थे।  किसी को इस बात का यकिन दिलाना भी आसान नहीं है कि यही वह छत्तीसगढ़ है जिसने महज डेढ़ दशक के सफर में चौतरफा विकास किया है। विकास भी ऐसा जो लोकलुभावन न होकर छत्तीसगढ़ की जमीन को मजबूत करता दिखता है। एक नवम्बर सन् 2000 में जब समय करवट ले रहा था तब छत्तीसगढ़ का भाग्योदय हुआ था। साढ़े तीन दशक से अधिक समय से स्वतंत्र अस्तित्व की मांग करते छत्तीसगढ़ के लिये तारीख वरदान साबित हुआ। हालांकि छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने के बाद भी कुछ विश्वास और असमंजस की स्थिति खत्म नहींं हुई थी। इस अविश्वास को तब बल मिला जब तीन वर्ष गुजर जाने के बाद भी छत्तीसगढ़ के विकास का ब्लूप्रिंट तैयार नही हो सका था। कुछेक को स्वतंत्र राज्य बन जाने का अफसोस था लेकिन 2003 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने सत्ता सम्हाली और छत्तीसगढ़ के विकास का ब्लू प्रिंट सामने आया तो अविश्वास का धुंध छंट गया। लोगों में हिम्मत बंधी और सरकार को जनसमर्थन मिला। इस जनसमर्थन का परिणाम यह निकला कि आज छत्तीसगढ़ अपने चौतरफा विकास के कारण देश के नक्शे में अलग से पहचान बनाने में कामयाब हुआ है।
छत्तीसगढ़ पर प्रकृति की मेहरबानी रही है। हर तरह की खनिज सम्पदा छत्तीसगढ़ के आंचल में है और मेहतनकश लोगों की यह धरती अपने विकास का रास्ता स्वयं बनाती चलती है। भूख, गरीबी, अशिक्षा और शोषण के शिकार लोगों को उनके खेवनहार के रूप में मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह की सरपरस्ती मिली। समय के साथ छत्तीसगढ़ ने विकास की पीेंगे भरी तो पलायन जैसे शब्दों से खुद को मुक्त कर लिया। मुख्यमंत्री डा. रमनसिंह ने सभी को भोजन का अधिकार देने की घोषणा की थी और एक ऐसे खाद्यान्न वितरण व्यवस्था बनायी कि लोगों को आसानी से अन्न मिलने लगा। एक रुपये किलो चांवल ने गरीब जनता की कायापलट कर दी। यही नहीं, हर हाथ को काम देकर उन्हें आर्थिक विपन्नता से मुक्त कराया। सरकार के प्रयासों का सुफल यह रहा कि पेट के खातिर दर-बदर भटकते लोगों ने अपनी ही जमीन को अपनी मंजिल बना लिया। आज छत्तीसगढ़ में पलायन बीते जमाने की बात हो गई है। छत्तीसगढ़ सचमुच में धान का कटोरा बन चुका है।  मानव जीवन के लिए तीन मूलभूत आवश्यकताओं-रोटी, कपड़ा और मकान में रोटी अर्थात भोजन सबसे ऊपर है। छत्तीसगढ़ अपनी जनता को भोजन का कानूनी अधिकार देने वाला देश का पहला राज्य है। यहां खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा कानून सितम्बर 2013 से लागू है। कानून के तहत प्रदेश की लगभग 91 प्रतिशत आबादी को इसके के दायरे में लिया गया है। छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है, जिसने दिसम्बर 2012 में विधानसभा में शीतकालीन सत्र में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम पारित कर प्रदेश के नागरिकों को भोजन का कानूनी अधिकार दिया है। 
अंत्योदय कार्ड के लिए छत्तीसगढ़ की विशेष पिछड़ी जनजातियों-बैगा, बिरहोर, पहाड़ी कोरवा, कमार और अबूझमाडिय़ा के सभी परिवारों, ऐसे परिवार जिनके मुखिया एकल महिला है अथवा नि:शक्त है अथवा गंभीर और लाईलाज बीमारी जैसे-एड्स, सिकलसेल एनीमिया, कैंसर, टी.बी. आदि रोग से पीडि़त है, ऐसे परिवार जिनके मुखिया वृद्ध और निराश्रित है तथा ऐसे परिवार जिनके मुखिया विमुक्त बंधुआ मजदूर हैं, को अंत्योदय में शामिल किया गया है। राज्य के सभी भूमिहीन मजदूर परिवार, पांच एकड़ तक के भूमिस्वामी सीमांत और लघु किसान परिवार, असंगठित क्षेत्र के श्रमिक जैसे-नाई, मोची, बढ़ई, धोबी, रिक्शा-ढेला चलाने वालों के परिवार, भवन निर्माण कार्य में संलग्न रेजा-कुली, मिस्त्री आदि श्रमिकों के सभी परिवारों को प्राथमिकता वाले समूह में शामिल किया गया है। इस प्रकार प्रदेश की लगभग 91 प्रतिशत आबादी को खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा कानून का लाभ मिल रहा है। यह भी उल्लेखनीय होगा कि केन्द्र सरकार ने भी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 बनाया है, जो राज्य में जनवरी 2014 से लागू है। केन्द्र के कानून में छत्तीसगढ़ के 78.43 प्रतिशत आबादी (दो करोड़ जनसंख्या) को रियायती दर पर अनाज के लिए पात्र माना गया है, जबकि छत्तीसगढ़ के खाद्य सुरक्षा कानून में 91 प्रतिशत आबादी (दो करोड़ 32 लाख जनसंख्या) को लाभ देने का प्रावधान किया गया है।
किसानी को लाभ का व्यवसाय बनाने की दिशा में अनेक कदम उठाये गये हैं जिसमें कृषक जीवन ज्योति योजना के अंतर्गत किसानों को पांच हार्स पावर तक के सिंचाई पम्पों के लिए 100 रूपए प्रति हार्स पावर, प्रति माह फ्लेट दर पर भुुगतान की सुविधा दी गई है। यही नहीं, किसान भाई-बहनों को खरीफ विपणन वर्ष 2012-13 में धान पर एक वर्ष में लगभग 11 हजार करोड़ रुपये मिले हैं। लगभग 2 हजार करोड़ रूपए तो बोनस के रूप में दिए गए हैं। हर साल धान का बोनस देने का निर्णय लिया गया है। विगत 9 वर्षों में किसान भाइयों से 4 करोड़ 24 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा और बोनस को मिलाकर लगभग 43 हजार करोड़ रुपये का भुगतान। किसानों को सस्ते दर पर ऋण सुविधायें अलग से दी गई हैं।
छत्तीसगढ़ देश में इकलौता राज्य है जहां बिजली कोई कमी नहीं है। अकूत बिजली उत्पादन करने वाले छत्तीसगढ़ का कोना कोना रोशनी से जगमगा रहा है तो देश के दूसरे राज्यों का अंधेरा मिटाने में छत्तीसगढ़ का सहयोग बड़ा है। छत्तीसगढ़ की बिजली देश के विभिन्न राज्यों के साथ देश की सीमाओं के बाहर स्थित पड़ोसी देश नेपाल में भी उजियारा बिखेर रही है। पावर ट्रेडिंग कार्पोरेशन के माध्यम से नेपाल छत्तीसगढ़ से तीस मेगावाट बिजली ले रहा है। मध्यप्रदेश को तीन सौ मेगावाट बिजली दी जा रही है। वहीं केरल भी छत्तीसगढ़ से एक सौ मेगावाट बिजली ले रहा है।  तेलंगाना राज्य छत्तीसगढ़ से एक हजार मेगावाट बिजली खरीदने का इच्छुक है।  नया राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ राज्य बिजली कंपनी के उत्पादन संयंत्रों की क्षमता में जहां 1064.70 मेगावाट की बढ़ोतरी हुई है। वहीं एक अनुमान के मुताबिक छत्तीसगढ़ के निजी बिजली घरों में अगले 3-4 महीनों में करीब चार हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन शुरू होगा। निजी कंपनियों और राज्य शासन तथा छत्तीसगढ़ पावर कंपनी के मध्य हुए एम.ओ.यू. की शर्तों के अनुसार ये निजी कंपनियां अपनी बिजली उत्पादन क्षमता की साढ़े सात प्रतिशत बिजली लागत मूल्य पर छत्तीसगढ़ पावर कंपनी को देंगी और कुल उत्पादन क्षमता की तीस प्रतिशत बिजली पर पहला अधिकार छत्तीसगढ़ सरकार का होगा। निजी बिजली घरों में उत्पादन शुरू होने का लाभ छत्तीसगढ़ सहित देश के दूसरे राज्यों को भी मिलेगा।
सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग में देश का अग्रणी राज्य-छत्तीसगढ़ में देश की सबसे बड़ी ओपन सोर्स पर आधारित सूचना प्रौद्योगिकी परियोजना चॉईस क्रियान्वित की जा रही है। चॉईस देश की पहली परियोजना है, जिसके तहत आम जनता को चॉईस सेंटर के माध्यम से नागरिक सेवाएं प्रदान की जा रही है। छत्तीसगढ़ ई-प्रोक्योरमेंट लागू करने वाला देश का दूसरा राज्य है।  राज्य सरकार के विभिन्न योजनाओं का लाभ यथा समर्थन मूल्य पर धान खरीदी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली आदि प्रमुख है। सूचना प्रौद्योगिकी की पहुंच गांव-गांव तक सुनिश्चित करने के लिए स्टेट वाइड एरिया नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। राज्य के 3800 सरकारी कार्यालय नेटवर्क से जुड़े। इन सारी योजनाओं का लाभ अब आम नागरिकों को मिलने लगा है।
बुजुर्गों के लिये मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना वरदान साबित हुई है। राज्य के गरीबी रेखा श्रेणी के 60 वर्ष तथा उससे अधिक उम्र के 20 हजार बुजुर्गों को प्रथम चरण में 20 हजार बुजुर्गों को सरकारी खर्च पर तीर्थयात्रा में भेजने का लक्ष्य है। योजना के तहत राज्य में 60 वर्ष तथा उससे अधिक उम्र के शारीरिक रूप से सक्षम वरिष्ठ नागरिकों को उनके जीवन काल में एक बार प्रदेश के बाहर स्थित सोलह तीर्थ समूहों में से एक या एक से अधिक तीर्थों की सामूहिक यात्रा शासकीय सहायता से करायी जाएगी। इनमें अस्सी प्रतिशत नागरिक बी.पी.एल. अंत्योदय और मुख्यमंत्री खाद्यान्न सहायता योजना के हितग्राही होंगे। शेष बीस प्रतिशत हितग्राही गरीबी रेखा के ऊपर के ऐसे वरिष्ठ नागरिक होंगे, जो आयकर दाता नहीं हो। योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों से 75 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों से 25 प्रतिशत हितग्राहियों का चयन किया जाएगा। 
कुपोषण देश की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है लेकिन छत्तीसगढ़ में यह नियंत्रण में है। राज्य शासन के महिला एवं बाल विकास विभाग के साथ राज्य के महिला समूहों और महिलाओं की सक्रियता तथा जागरूकता का ही परिणाम है कि  छत्तीसगढ़ में वजन त्यौहार के आंकड़ों के अनुसार बच्चों में कुपोषण का स्तर घटकर अब 38 प्रतिशत ही रह गया,जबकि वर्ष 2005-06 में यहां लगभग 52 प्रतिशत बच्चे कुपोषित थे। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए राज्य में महिलाओं का कार्यस्थल पर लैगिंक उत्पीडऩ (निवारण प्रतिशेध और प्रतितोश) अधिनियम 2013, लैगिक अपराधों से बच्चों के संरक्षण के कानून, घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण कानून और छत्तीसगढ़ टोनही प्रताडऩा निवारण अधिनियम-2005 लागू है। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ पहला राज्य है जहां महिला एवं बाल विकास विभाग में महिलाओं को प्राथमिकता से नियुक्त किया गया है। 
इस तरह छत्तीसगढ़ राज्य लगातार विकास के पथ पर आगे ही आगे बढ़ता जा रहा है।  शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की पहल से आदिवासी बच्चों ने पूरी दुनिया को अपनी प्रतिभा से चमत्कृत कर दिखाया है। राज्य के पर्यटन क्षेत्र अब देश को ही नहीं, दुनिया को लुभाने लगे हैं। पर्यटकों की रूचि को देखते हुये राज्य शासन अधिकाधिक सुविधायें दे रही हैं। पूरी दुनिया में छत्तीसगढ़ अब एक पिछड़ा और बीमारू राज्य नहीं बल्कि विकसित और नवाचार वाला राज्य बन चुका है।

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

शिवराजसिंह का जादू चल गया

-मनोज कुमार
पहले विधानसभा चुनाव और बाद में लोकसभा चुनाव में करिश्माई जीत के सूत्रधार शिवराजसिंह चौहान के बारे में जो लोग यह मानस बना रहे थे कि नगरीय निकाय के चुनाव में उनका जादू नहीं चलेगा, उन सबका भ्रम टूट गया। शिवराजसिंह चौहान ने एक बार साबित कर दिखाया कि वे ही मध्यप्रदेश के एकमात्र नेता हैं जिनका जादू प्रदेश की जनता पर एक दशक से सिर चढक़र बोल रहा है और बोलता रहेगा। नगरीय निकाय के चुनाव परिणाम से यह बात तो साफ हो गयी और आगे भी किसी किस्म का संशय शेष नहीं रहेगा। शिवराजसिंह चौहान जिस तरह आम आदमी पर छाये हुये हैं तो वह कोई करिश्मा नहीं बल्कि उनकी आम आदमी की बेहतरी की दिशा में किये गये प्रयास हैं। सरकार की वो योजनायें हैं जो आम आदमी को सीधा लाभ पहुंचा रही हैं। उनका आम आदमी से सीधा संवाद भी उनकी कामयाबी का एक बड़ा कारण है तो आम आदमी उन्हें अपना मुख्यमंत्री इसलिये मानता है कि वे प्रपंच-प्रचार से दूर आज भी एक आम आदमी की जिंदगी जीते हैं। ऐसे ही कारणों से परायों और अपनों की कोशिशों की लाख कोशिशों के बावजूद उनकी लोकप्रियता में कमी नहीं आ पायी है। नगरीय निकाय में भाजपा की जीत इस बात का ताजा उदाहरण है।
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान सादे और सरल प्रकृति के व्यक्ति हैं। मुख्यमंत्री बन जाने के पहले सांसद और विधायक के रूप में उन्होंने जो अपनी छवि बनायी थी, वह मुख्यमंत्री बन जाने के बाद चटकी नहीं बल्कि और उसमें इजाफा हुआ। वे पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने मुख्यमंत्री आवास का दरवाजा आमजन के लिये खोल दिया। खुले दिल से उनका स्वागत किया और यह जता दिया कि वे उनके अपने हैं। मुख्यमंत्री होने के नाते उनके अपने एजेंडे में कभी कोई गफलत नहीं रही। वे हमेशा से यह चाहते रहे हैं कि महिलाओं के सशक्त हो जाने से ही समाज सशक्त होता है। इस सोच के साथ उन्होंने अपने लगभग दस वर्ष के कार्यकाल में अनेक योजनाओं का सूत्रपात किया। एक अनुभव यह भी हुआ कि पूर्ववर्ती सरकारों में जिस तरह योजनायें कागज में कैद हो जाती थीं, शिवराज सरकार में ऐसा नहीं हुआ। सभी योजनाओं का क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर हुआ और आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति को इसका लाभ मिला। यह इसलिये भी संभव हुआ कि स्वयं मुख्यमंत्री ने इन योजनाओं के क्रियान्वयन को परखा और समय समय पर इसमें संशोधन सुधार के प्रयास किये। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के इन प्रयासों का सुफल यह रहा कि मध्यप्रदेश की स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में सक्र्रिय योजनाओं को देश के अनेक राज्यों ने अपने यहां लागू किया।
देहात से दिल्ली तक मध्यप्रदेश की योजनाओं की आवाज सुनायी देने लगी है। आम आदमी के ब्रांड एम्बेसडर के रूप में शिवराजसिंह की पहचान बन गयी है। शिवराजसिंह चौहान आम आदमी की भांति जिंदगी जीते हैं। एक मुख्यमंत्री की व्यस्तता अपनी जगह होती है लेकिन इससे परे वे अपने परिवार के साथ आम आदमी की तरह बाजार जाते हैं। खरीददारी करते हैं और उत्साह के साथ गणपति की पूजा भी करते हैं और मकर संक्राति का पतंग भी उड़ाते हैं। शिवराजसिंह एक मुख्यमंत्री के नाते सर्वधर्म समभाव के पक्षधर रहे हैं और इस नाते वे मुख्यमंत्री निवास के आंगन में समय समय पर विभिन्न धर्मों के उत्सव का आयोजन भी करते हैं। कभी किसी धर्म से परहेज नहीं किया। बड़े दिल वाले की तरह एक ऐसी कार्यसंस्कृति की परम्परा डाली कि आने वाले हर मुख्यमंत्री को इस रास्ते पर चल कर ही स्वयं को कामयाब बनाना होगा। लोगों से मिलने वे मुख्यमंत्री आवास में बुलाते रहे तो वे लोगों तक पहुंचते भी रहे। केवल चुनावी समय में उनका दौरा नहीं हुआ बल्कि वे समय मिलने पर लोगों के बीच पहुंचते रहे। उनकी यह सादगी लोगों के मन में छाप छोड़ गयी। 
गांव-गांव में लोगों को लगने लगा कि ऐसा मुख्यमंत्री दूजा नहीं मिलेगा, सो हर चुनाव में उनकी पसंद शिवराजसिंह चौहान की भाजपा बन गयी। हालिया नगरीय निकाय चुनाव परिणाम इस बात की गवाही देते हैं। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जो रिकार्ड जीत हासिल किया, वह भी इतिहास है तो लोकसभा चुनाव में जीत का यह सिलसिला टूटा नहीं। टूटा तो वह भ्रम जो लोगों ने अनायस बना लिया था कि शिवराजसिंह का जादू खत्म होने चला है। यह भ्रम विपक्ष में बैठे लोगों में ही नहीं था बल्कि उनके अपनों ने भी यह भ्रम पाल लिया था। इस भ्रम की वजह थी जो अब तक महसूस किया गया। आमतौर पर एक समय गुजर जाने के बाद जो एक लगाव होता है, लोकप्रियता होती है, वह खत्म होने लगता है लेकिन शिवराजसिंह चौहान को समझने में भ्रम पालने वालों ने भूल कर दी। शिवराजसिंह मुख्यमंत्री के रूप में लोकप्रिय नहीं थे और न ही उनका जादू उनके मुख्यमंत्री होने के कारण चल रहा था। वे एक आम आदमी के प्रतिनिधि के रूप में लोकप्रिय थे और एक सेवक के रूप में उनका जादू चल रहा था। अपने दस साल के लम्बे कार्यकाल में इस जादू को टूटने नहीं दिया। वे जैसे थे, वैसे ही बने रहे और आहिस्ता आहिस्ता उनका जादू विरोधियों पर भी चलने लगा। जिन पर यह जादू चला, वे उनके संग हो लिये।
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह की खासियत यह है कि वे अपनी लाईन बड़ी करने के लिये दूसरों की लाईन मिटाते नहीं हैं बल्कि वे स्वयं इतनी बड़ी लाईन खींच देते हैं कि दूसरों की लाईन स्वयमेव छोटी हो जाती है। अपने लम्बे कार्यकाल में शिवराजसिंह चौहान के समक्ष अनेक किस्म की चुनौतियां रहीं। वे चुनौतियों से निपटने में स्वयं को सक्षम बनाते रहे और हर चुनौती को कामयाबी में बदल कर इतिहास रचते रहे। यह कहना गलत होगा कि शिवराजसिंह चौहान चिरकाल तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे लेकिन यह कहना उचित होगा कि अभी उनका कोई विकल्प नहीं है। शिवराजसिंह चौहान के कार्यकाल पर मीमांसा की जाएगी तो समीक्षा नहीं, शोध होगा कि आखिरकार उनके निर्णयों का ऐसा क्या आधार था कि वे लगातार जन-जन के मन में बसे रहे। मध्यप्रदेश के स्थापना के बाद अनेक स्तंभकारी मुख्यमंत्री हुये जिनकी चर्चा हमेशा होती है और शिवराजसिंह इसी पीढ़ी में शुमार होने वालों में एक होंगे।

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

एक त्रासदी का खबरनामा

-मनोज कुमार
तीस बरस का समय कम नहीं होता है। भोपाल के बरक्स देखें तो यह कल की ही बात लगती है। 2-3 दिसम्बर की वह रात और रात की तरह गुजर जाती किन्तु ऐसा हो न सका। यह तारीख न केवल भोपाल के इतिहास में बल्कि दुनिया की भीषणतम त्रासदियों में शुमार हो गया है। यह कोई मामूली दुर्घटना नहीं थी बल्कि यह त्रासदी थी। एक ऐसी त्रासदी जिसका दुख, जिसकी पीड़ा और इससे उपजी अगिनत तकलीफें हर पल इस बात का स्मरण कराती रहेंगी कि साल 1984 की वह 2-3 दिसम्बर की आधी रात कितनी भयावह थी।
1984 से लेकर साल दर साल गुजरते गये। 1984 से 2014 तक की गिनती करें तो पूरे तीस बरस इस त्रासदी के पूरे हो चुके हैं। समय गुजर जाने के बाद पीड़ा और बढ़ती गयी। इसे एक किस्म का नासूर भी कह सकते हैं। नासूर इस मायने में कि इसका कोई मुकम्मल इलाज नहीं हो पाया या इस दिशा में कोई मुकम्मल कोशिशें नहीं हुई। इस पूरे तीस बरस में इस बात पर जोर दिया गया कि त्रासदी के लिये हमसे से कौन कसूरवार था? किसने यूनियन कार्बाइड के कर्ताधर्ता वारेन एंडरसन को भोपाल से दिल्ली और दिल्ली से उन्हें अपने देश भागने में मदद की? हम इस बात में उलझे रहे कि कसूरवार किसे ठहराया जाये लेकिन इस बात की हमने परवाह नहीं की जो लोग बेगुनाह थे, जिनकी जिंदगी में जहर घुली हवा ने तबाही मचा दी थी, जिनके सपने तो दूर, जिंदगी नरक बन गयी थी। 
भोपाल गैस त्रासदी के नाम से कुख्यात हो चुके दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी के इन तीस सालों को देखें और समझने का यत्न करें तो सरकारों और राजनीतिक दलों के लिये 2-3 दिसम्बर की तारीख रस्मी रह गयी है और मीडिया के लिये यह त्रासदी  महज एक खबरनामा बन कर रह गयी है।  2-3 दिसम्बर की आधी रात का सच यह है कि अनगिनत बेगुनाहों को अकाल मौत के मुंह में समा जाना है तो 30 बरस का सच भी यही है। यह वही त्रासदी है जो राजनीतिक दलों के लिये खासा मायने रखती थी। हर बरस 3 दिसम्बर को सर्वधर्म सभा का आयोजन हुआ करता था। संवेदनाओं की गंगा बह निकलती थी। न्याय और हक दिलाने की बातें होती थी। इन तीस बरसों के हर चुनाव में गैस पीडि़त एक मुद्दा हुआ करते थे। जैसे जैसे साल गुजरता गया, गैस पीडि़त हाशिये पर जाते गये। चुनावी एजेंडे में अब गैस पीडि़त और गैस त्रासदी, त्रासदी न होकर महज एक दुर्घटना जैसी रह गयी थी। 
अब रस्मी संवेदनायें होती हैं और अगले ही दिन जिंदगी पटरी पर आ जाती है। तीन दिसम्बर को जिस त्रासदी के दुख में भोपाली अवकाश मनाते हैं, उस दिन बाजार में रौनक कम नहीं होती है। सिनेमा घरों में न तो कोई शो बंद होता है और ना ही कोई आयोजन। दुख और पीड़ा उस परिवार की न तो पहले कम थी और न शायद जिंदगी के आखिरी सांस तक कम होगी क्योंकि जिन्होंने अपनों को खोया है, वे ही अपनों की दर्द समझ सकते हैं। ऐसे लोगों की तादात आज भी कम नहीं है जो जिंदा लाश बनकर अपनी मौत का इंतजार कर रहे हैं। यह मंजर बेहद डरावना और भयावह है। यह एक ऐसा सच है जो उस तारीख की आधी रात का था तो आज सुबह के उजाले में अपने सवालों के जवाब पाने के लिये खड़ा है।
कहने वाले तो कह सकते हैं कि आखिरी कब तक इस त्रासदी पर आंसू बहायेेंगे? यह कड़ुवी बयानबाजी से परहेज करने वाले कल भी थे और आज भी रहेंगे। याद करना होगा उस समय के हमारे संस्कृति सचिव महोदय आइएएस अधिकारी अशोक वाजपेयी को। वाजपेयी को याद करना इसलिये भी जरूरी है कि जिस तरह त्रासदी का यह दर्द जीवन में कभी नहीं भूलेगा, उसी तरह नश्तर की तरह चुभते उनके वह शब्द भी हवा में कभी विस्मृत नहीं हो पायेंगेे जब उन्होंने कहा था कि-‘मरने वालों के साथ मरा नहीं जाता है’। वाजपेयी एक संवेदनशील संस्कृति के संवाहक के रूप में हमारे साथ हैं लेकिन तब एक निष्ठुर प्रशासक के रूप में उन्होंने यह बयान देकर कराहते भोपाल में विश्व कविता समारोह का आयोजन सम्पन्न करा लिया था। वाजपेयी जब यह बात कह रहे थे, तब इस बात का अंदाज समाज को नहीं रहा होगा कि आने वाले समय में विश्व की यह भीषणतम त्रासदी महज एक खबरनामा बन कर रह जायेगी। इस खबरनामा की शुरूआत अशोक वाजेपयी ने की थी और आज हम इस खबरनामा को महसूस कर रहे हैं।
इन तीस सालों में अनेक किताबें बाजार में आ गयीं। लेखकों, रचनाकारों ने अपनी-अपनी रचना-धर्मिता का धर्म पूरा किया। अपने अपने स्तर पर त्रासदी को जांचने का प्रयास किया। किसी लेखक के केन्द्र में संवेदना थी तो कोई इसके दुष्परिणामों को जांच रहा था। कोई लेखक, लेखकीय सीमा से परे जाकर एक जासूस की तरह त्रासदी के लिये दोषियों को तलाश कर रहा था। गैस त्रासदी पर कुछेक छोटी प्रभावी फिल्में भी बनी और एक फीचर फिल्म भी परदे पर आ गयी। रचनाधर्मिता का यह पक्ष उजला-उजला सा है लेकिन सवाल  है कि इस रचनाकर्म से किसकी नींद खुली और कौन पीडि़तों के पक्ष में खड़ा हुआ? यह सवाल भी जवाब की प्रतीक्षा में खड़ा ही रह जायेगा।
एक त्रासदी का खबरनामा से ज्यादा कुछ दिखायी नहीं देता और न ही महसूस किया जा सकता है। इस बात को और भी संजीदा ढंग से जांचना है तो यूनियन कार्बाइड के मुखिया वॉरेन एंडरसन की मौत की खबर एक सूचना की तरह प्रस्तुत की गयी। क्या एंडरसन की मौत से इस पूरे प्रकरण पर कोई गंभीर प्रभाव नहीं पड़ेगा? क्या इस बात पर मीडिया के मंच पर विमर्श नहीं होना चाहिये था? क्या एंडरसन की मौत एक आम आदमी की मौत थी? ऐसे अनेक सवाल हैं जो इस बात को स्थापित करते हैं कि विश्व की भीषणतम त्रासदी महज एक खबरनामा ही बन कर रह गयी है और यही सच है। भोपाल गैस त्रासदी के कई पहलु हैं जो समाज को आज भी झकझोर रहे हैं। इससे जुड़ा आर्थिक पक्ष तो है ही, सामाजिक जिम्मेदारी का पक्ष भी है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इस सिलसिले में अपना निजी अनुभव शेयर करना सामयिक लगता है। 
इस त्रासदी की तीसरी बरसी थी। एक अखबारनवीस होने के नाते ह्यूमन स्टोरी की तलाश में जेपी नगर गया था। यहां मुलाकात होती है लगभग 11-12 वर्ष की उम्र के सुनील राजपूत से। सुनील की एक छोटी बहन और एक छोटे भाई को छोडक़र पूरा परिवार इस त्रासदी में अकाल मारा गया था। राहत के नाम पर मिले अकूत पैसों ने सुनील को बेपरवाह बना दिया था। हालांकि बाद के सालों में उसमें सुधार दिखा और इन पैसों से अपने  छोटे भाई और बहन की जिम्मेदारी पूरी की किन्तु स्वयं मानसिक रूप से बीमार हो चुका था। सुनील की मृत्यु के कुछ समय पहले मेरी मुलाकात संभावना ट्रस्ट में हुयी थी जहां सुनील रहता था और उसका इलाज चल रहा था। सुनील एक उदाहरण मात्र है। ऐसे अनेक परिवार होंगे जो खबरों से दूर अपना दर्द अपने साथ समेटे जी रहे हैं।  त्रासदी के आरंभिक कुछ वर्ष छोड़ दिये जायें तो आमतौर पर 30 नवम्बर से 4 दिसम्बर तक अखबारों के पन्नों और टेलीविजन के परदे पर गैस त्रासदी से जुड़े मुद्दे पर विमर्श होता है। 
सवाल यह है कि जिस त्रासदी को हम विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी मान चुके हैं, जिस त्रासदी के शिकार लोगों को 30 बरस गुजर जाने के बाद भी न्याय और हक नहीं मिला है, जिस भोपाल की खुशियों को इस त्रासदी ने निगल लिया है, क्या इसे महज चंद दिनों के लिये हम खबरनामा बनने दें? शायद यह बात किसी को गंवारा नहीं होगी और न ही कोई इस तरह की पैरोकारी करेगा। यह त्रासदी महज एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं बल्कि विकासशील समाज के समक्ष एक चुनौती है जिसे सामाजिक जवाबदारी के साथ ही पूरा किया जा सकेगा।  यह सवाल भी मौजूं है कि एक तरफ तो हम अभी भी भोपाल गैस त्रासदी से उबर नहीं पाये हैं और दूसरी तरफ उद्योगों का अम्बार लगाने के लिये बेताब हैं। औद्योगिकीकरण के लिये पूरा देश बेताब है और हर राज्य इन उद्योगों के लिये रेडकॉर्पेट बिछा रहा है। क्या हमने भोपाल गैस त्रासदी से कुछ सीखा है या इसे यूं ही हम भुला दे रहे हैं।
इन तीस साला सफर में एक बात का और अनुभव हुआ है। जिस वेदना के साथ हम इस त्रासदी का उल्लेख करते हैं, वह वेदना आज भी आम आदमी के भीतर है। वह उस त्रासदी की याद कर सिहर उठता है लेकिन वह लोग संवेदनहीन हो चुके हैं जो इस कालखंड में कमान सम्हाले हुये थे।  फौरीतौर पर बयान देने के लिये अशोक वाजपेयी को इतिहास नहीं भुला पायेगा तो तत्कालीन भोपाल कलेक्टर मोतीसिंह की बातों को भुला पाना मुश्किल होगा जब गैस त्रासदी से जुड़े सवालों के जवाब में वे कहते हैं-छोड़ो इन बातों को, आओ, बनारस की बातें करें। 
एक कहता है कि मरने वालों के साथ मरा नहीं जाता है, दूसरे को बनारस की याद आती है। सोच की यह दृष्टि हो तो गैस त्रासदी एक खबरनामा से अधिक रह भी नहीं जाती है। यह हमारे लिये दुर्भाग्य की बात है कि हम एक ऐसे समय में, एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां परपीड़ा हमें सालती नहीं है। हम संवेदनहीन होते जा रहे हैं। अखबारों में छपने वाली खबरें हमें झकझोरती नहीं हैं और ऐसे में भोपाल त्रासदी, खबरनामा ही बन कर रह जाये तो शिकायत किससे और कैसी?

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

बाल पत्रकारिता : संभावना एवं चुनौतियां

-मनोज कुमार

बीते 5 सितम्बर 2014, शिक्षक दिवस के दिन जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बच्चों से रूबरू हो रहे थे तब उनके समक्ष देशभर से हजारों की संख्या में जिज्ञासु बच्चे सामने थे। अपनी समझ और कुछ झिझक के साथ सवाल कर रहे थे। इन्हीं हजारों बच्चों में छत्तीसगढ़ दंतेवाड़ा से एक बच्ची ने आदिवासी बहुल इलाके में उच्चशिक्षा उपलब्ध कराने संबंधी सवाल पूछा। यह सवाल उसके अपने और अपने आसपास के बच्चों के हित के लिये हो सकता है लेकिन यह सवाल बताता है कि ऐसे ही बच्चे पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर हैं। एक पत्रकार का दायित्व होता है कि वह समाज के बारे में सोचे और सरकार को अपनी सोच के केन्द्र में खड़ा करे। इस स्कूली छात्रा ने यह कर दिखाया जब उसके सवाल सेे प्रधानमंत्रीजी न केवल संजीदा हुये बल्कि इसे देश का सवाल माना। यह सवाल एक विद्यार्थी का था लेकिन उसके सवाल पूछने का अंदाज और भीतर का आत्मविश्वास बताता है कि यह आग पत्रकारिता के लिये जरूरी है।
वर्तमान समय में हम पत्रकारिता की कितनी ही आलोचना कर लें। कितना ही उसे भला-बुरा कह लें और उसे अपने ध्येय से हटता हुआ साबित करें लेकिन दंतेवाड़ा की छात्रा ने अपने एक सवाल से कई सवालों का जवाब दे दिया है। उच्चशिक्षा की चिंता करते हुये सवाल करने का अर्थ ही है अपने ध्येय पर डटे रहना। इससे भी बड़ी बात है कि सरकार को अपने ध्येय से अवगत कराना और इस दिशा में कार्यवाही करने के लिये बाध्य करना। हम नहीं जानते कि प्रधानमंत्री से सवाल करने वाली यह आदिवासी छात्रा भविष्य में अपने कॅरियर को किस दिशा में ले जायेगी लेकिन इतना तय है कि उसने यह बता दिया कि अभी नहीं सही, लेकिन गर्भ में ऐसे पत्रकार पल रहे हैं जो समाज के हित में कुछ कर गुजरने की ताकत रखते हैं।
पत्रकारिता पर लगते आक्षेप कई बार मन को दुखी कर जाते हैं लेकिन पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर इस बात की आश्वस्ति होते हैं कि आज भले ही कुछ पीड़ादायक हो लेकिन आने वाला कल सुंदर और बेहतर है। मध्यप्रदेश सहित देश के अनेक हिस्सों में पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर अपनी प्रतिभा से समाज को परिचित करा रहे हैं। अभी वे उडऩा सीख रहे हैं। जब वे उड़ान भरने लायक हो जायेंगे तो दुनिया उनके हुनर की कायल हो जायेगी। अलग अलग हिस्सों में, अलग अलग लोगों से चर्चा करने पर यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि पत्रकारिता के ये नये हस्ताक्षर नगरों और महानगरों में तैयार नहीं हो रहे हैं बल्कि ये माटी की सोंधी खुश्बू के साथ गांव में तैयार हो रहे हैं। इन्हें पत्रकारिता की तालीम नहीं दी जाती है बल्कि ये लोग अपने भीतर समाज को बदलने की जो आग जलाये बैठे हैं, वही इनकी पत्रकारिता की तालीम है।
पत्रकारिता के बारे में साफ है कि यह किसी स्कूली महाविद्यालयीन शिक्षा से नहीं आती है बल्कि इसके लिये अनुभव की जरूरत होती है। पत्रकारिता के इन नये हस्ताक्षर के पास अनुभव की थाती नहीं है लेकिन जो जीवन इन्होंने जिया है अथवा जी रहे हैं, वह इनके अनुभव का पहला पाठ है। स्कूल भवन की कमी हो, पानी या सडक़ का अभाव हो, अस्पताल की कमी और गरीबी की मार से इनकी कलम आग उगलने को बेताब रहती है। पत्रकारिता के ये नये हस्ताक्षर जज्बाती हैं। बेहद सच्चे और साफ दिल से इनकी कलम आग उगल रही है।
भविष्य के ये अनचीन्हें नायक भारतीय पत्रकारिता का चेहरा बदल देंगे, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। अभी ये पत्रकारिता की टेक्रालॉजी से बाबस्ता नहीं हुये हैं और न ही इन्हें मीडिया का अर्थ मालूम है। देहात की पत्रकारिता की आत्मा अमर है तो इन्हीं हस्ताक्षरों से। इनकी पत्रकारिता गांव की सरहद तक होती है लेकिन इनके शब्द की गूंज प्रदेश और देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंचती है। अभी पत्रकारिता में जिन नये हस्ताक्षर उदित हो रहे हैं, उन्हें किसी किस्म का प्रशिक्षण नहीं दिया जा रहा है बल्कि उन्हें स्वतंत्रता है कि वे अपने मन की लिखें। जो दिखे, जो महसूस करें और जिस तर्क और तथ्य से वे सहमत हों, वह लिखें। लिखने की यह आजादी उनके भीतर उत्साह पैदा करती है।
समूचे देश में पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर की संख्या वर्तमान में सौ-पचास नहीं बल्कि हजारों की संख्या में है। मध्यप्रदेश में तो आदिवासी विद्यार्थियों ने पत्रकारिता की राह चुनी है और उनमें भी बड़ी संख्या लड़कियों की है। यह सूचना, यह आंकड़ें विश्वास जगाते हैं कि जितनी आलोचना पत्रकारिता की इन दिनों हो रही है, उतने ही गर्व करने वाले दिन आने वाले हैं।
पत्रकारिता की पहली शर्त होती है जिज्ञासा। जो व्यक्ति जितना ज्यादा जिज्ञासु होगा, वह उतने ही सवाल करेगा और जो जितना सवाल करेगा, वह समस्या का समाधान तलाश कर पायेगा। इस पैमाने पर प्रधानमंत्री से सवाल करती दंतेवाड़ा की आदिवासी छात्रा में खरी उतरती है। हालांकि यह छात्रा अकेली नहीं थी। साथ में अनेक विद्यार्थी थे जो प्रधानमंत्री से सवाल कर रहे थे किन्तु इस आदिवासी छात्रा के सवाल पर स्वयं प्रधानमंत्री ने गौर किया, इसलिये यह छात्रा दूसरों से अलग दिखती है।
किसी खबर को तलाश करने, उससे गढऩे और विस्तार देने के लिये पांच तत्व बताये गये हैं। पत्रकारिता के इन नये हस्ताक्षरों को शायद इस बात का ज्ञान न हो लेकिन वे पत्रकारिता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करते दिखते हैं। पत्रकारिता में अलग दिखने और करने की एक और शर्त होती है कि आपका होमवर्क कम्पलीट हो अर्थात जिस विषय के बारे में आप जानना चाहते हैं, उसकी आवश्यकता और उसके प्रतिफल से भी आपका अवगत रहना चाहिये। आदिवासी क्षेत्रों में उच्च शिक्षा का सवाल उठाती छात्रा इस बात से वाकिफ थी और किसी भी पूरक सवाल का जवाब उसके पास था। छात्रा का यह सवाल अचानक नहीं था बल्कि उसने होमवर्क किया था। उसे स्वयं को आगे चलकर उच्चशिक्षा की आवश्यकता है और यह आवश्यकता उसकी अकेले की नहीं बल्कि पूरे आदिवासी क्षेत्र की है। इस प्रकार प्राथमिक रूप से वह एक प्रतिनिधि के रूप में खड़ी दिखती है। पत्रकार समाज का प्रतिनिधि होता है। पैरोकार होता है जो समाज में व्याप्त समस्याओं, कुरीतियों और नवाचार के लिये प्रतिबद्ध होता है। सबसे खास बात यह होती है कि उसका यह कार्य निरपेक्ष और स्वार्थविहिन होता है।
मध्यप्रदेश के होशंगाबाद संभाग में सोहागपुर नाम की तहसील है। सोहागपुर पान के बरेज के लिये ख्यात है। यहां पर वरिष्ठ साहित्यकार डाक्टर गोपालनारायण आवटे रहते हैं। डॉ. आवटे विगत लम्बे समय से बच्चों के साथ काम कर रहे हैं। उनसे बात होती है तो वे अपने साथ काम कर रहे बच्चों को लेकर बेहद उत्साहित होते हैं। वे बताते हैं कि उनके साथ काम कर रहे तीन सौ से भी अधिक संख्या में बाल पत्रकार काम कर रहे हैं जिसमें बच्चियों की संख्या अधिक है। इन बाल पत्रकारों में तो कई ऐसे हैं जो कानूनन वयस्क होने की कगार पर हैं। पत्रकारिता में नये हस्ताक्षर आयें और पूरे उत्साह के साथ वे काम करते रहें, यह कोशिश डा. आप्टे कर रहे हैं। इन बाल पत्रकारों को मंच देेने के लिये वे एक मासिक समाचार पत्र का प्रकाशन भी करते हैं जिसकी जवाबदारी पत्रकारिता के नये हस्ताक्षरों के कंधे पर है।
डॉ. आप्टे पत्रकारिता के इन नये हस्ताक्षरों के स्कील डेवलप करने के लिये समय समय पर कार्यशाला का आयोजन करते हैं। इस कार्यशाला में पूरे प्रदेश के चिंहित पत्रकार एवं अध्यापक पढ़ाने आते हैं। वे कुछ नामचीन संस्थाओं के साथ भी बाल पत्रकारिता के लिये काम करते रहे हैं लेकिन उनका अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा। डॉ. आप्टे कहते हैं कि मैं बच्चों को पत्रकार बना रहा हूं, मजदूर नहीं। इसलिये किसी के आदेश पर, उनकी मर्जी से वे जहां चाहे, शॉर्ट नोटिस पर पहुंच जाऊं, यह संभव नहीं। उन्होंने इन नामचीन संस्थाओं से स्वयं को अलग कर लिया है।
डा. आप्टे का यह अनुभव इस बात का प्रमाण है कि संभावनाओं से लबरेज पत्रकारिता के इन नये हस्ताक्षरों की यह ताजगी कहीं मुरझा न जाये, इस बात की चिंता भी करनी होगी। भोपाल से दिल्ली तक पत्रकारिता का झंडा उठाये वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ पत्रकारों को पत्रकारिता के इन नये हस्ताक्षरों की चिंता करनी होगी। ये नये हस्ताक्षर अभी पत्रकारिता का ककहरा सीख रहे हैं इसलिये जरूरी है कि आगे भी ये पत्रकारिता करें न कि मीडिया के दलदल में फंस जायें।
एक पत्रकार की दुनिया पूरा समाज होता है जिसकी अपेक्षा और आवाज वह होता है। पत्रकार एक ऐसा मंच होता है जहां आम आदमी अपनी पीड़ा और तकलीफ लेकर बिना किसी औपचारिकता के वह पहुंच जाता है। पीडि़त व्यक्ति को न तो कोई फीस देनी होती है और न मिलने का समय पहले से तय करना होता है। पत्रकार पीडि़त की बात सुनता और समझता है तथा वह उन सबसे से सवाल करने पहुंच जाता है। तथ्य और तर्क के साथ वह खबर की शक्ल में समस्या को समाज के समक्ष रखता है।
पत्रकार के प्रयासों से पीडि़त को राहत मिल जाती है और उसका विश्वास पत्रकारिता पर बढ़ जाता है। पत्रकारिता की यही पूंजी है और पत्रकार का यही सुख कि वह एक व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कराहट देख सका। यह जज्बा आप बाल पत्रकारों में महसूस कर सकते हैं। वे समाज की आवाज उठा रहे हैं। वे पीडि़तों की आवाज बने हुये हैं।
बाल पत्रकारिता की बात करते हैं। पत्रकारिता में नये हस्ताक्षर पर चर्चा करते हैं तो कई किस्म के खतरे डराते हैं कि कहीं ये आवाज खो न जाये। कोई पत्रकार मीडियाकर्मी हो सकता है या हो रहा है, यह सुनकर हैरानी होती है। मीडियाकर्मी शब्द अपशकुन नहीं है लेकिन इससे यह बात भी स्थापित हो जाती है कि वह पत्रकार नहीं है और उसका समाज के प्रति कोई उत्तरदायित्व भी नहीं है। वह एक प्रोफेशनल है जो रोजगार की गरज से मीडिया से संबद्ध है और उसकी चिंता अपने इर्द-गिर्द सिमटी हुई होती है। बाल पत्रकारों के लिये प्रशिक्षण-कार्यशाला एक जरूरत है लेकिन कई बार लगता है कि यह प्रशिक्षण-कार्यशाला उन्हें मशीनी बना देगा। पत्रकारिता सही अर्थों में मन के भीतर बदलाव की एक आग है। इस आग को आप न तो जला सकते हैं और न बुझा सकते हैं इसलिये कहा गया है कि आप पत्रकार को तराश तो सकते हैं लेकिन पत्रकार स्वयं से बनता है, उसे बनाया नहीं जा सकता है। गांव और कस्बों की धूल से सने ये पत्रकार जब भोपाल और दिल्ली की सडक़ों पर चलेंगे तो कुछ गुमनाम हो जायेंगे तो कुछ मीडियाकर्मी भी बन जायेंगे। जिस जनसरोकार की पत्रकारिता वे करते रहे हैं, अब वे मीडिया की आवाज बन जायेंगे जिनके पास हर वक्त निर्देश होगा कि यह लिखो या नहीं लिखो, यह दिखाओ या यह नहीं दिखाओ। अर्थात समझौता महानगरीय पत्रकारिता जिसे हम मीडिया कहते हैं, पहला सबक होगा। पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर को पत्रकारिता की मुख्य धारा में लाना आवश्यक है लेकिन इससे भी बड़ी आवश्यकता इन प्रतिभाओं को बचाकर रखने की है। इन प्रतिभाओं को बचाने की जवाबदारी महानगरीय पत्रकारिता के महापुरूषों को ही पहल करनी होगी। यह बात सुखद है कि चुनौतियों और संघर्ष के बीच भी पत्रकारिता के नये हस्ताक्षर आ रहे हंै जो इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता की आत्मा गांव और कस्बों में आज भी जीवित है।

गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

बचपन बचाने वाले शांतिदूत कैलाश सत्यार्थी को नोबल


-मनोज कुमार
  बचपन बचाने की जिम्मेदारी उठाने का साहस दिखाने वाले कैलाश सत्यार्थी को नोबल दिये जाने का ऐलान किया जा चुका है। कैलाश सत्यार्थी ने बचपन बचाओ आंदोलन आरंभ किया तो उनके मन में एक टीस थी कि कैसे बचपन को बचाया जाये? कैसे बच्चों की मोहक मुस्कान उन्हें लौटायी जाये। काम कठिन है लेकिन सत्यार्थी जैसे लोगों के लिये असंभव भी नहीं और यही कारण है कि साढ़े तीन दशक से अधिक समय से वे बचपन बचाओ अभियान में जुटे हुये हैं। सत्यार्थी की चिंता केवल भारत के बचपन की नहीं है बल्कि उनकी चिंता इस दुनिया के तमाम बच्चों की है और यही कारण है कि सत्यार्थी के बताये और बनाये रास्ते पर पूरी दुनिया के लोग चल पड़े हैं। सत्यार्थी चले तो अकेेले थे लेकिन आज उनके साथ इतने लोग हैं कि गिनती कम पड़ जाये। सत्यार्थी को नोबल दिये जाने का ऐलान शायद इसलिये नहीं हुआ क्योंकि वे एक ऐसे मिशन पर हैं जो समाज को बचाने के लिये जरूरी है बल्कि लगता है कि यह नोबल उनके साहस के लिये दिया जा रहा है। 
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से चलकर देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंचने वाली रेललाईन के बीच स्थित है विदिशा रेल्वे स्टेशन। विदिशा समा्रट अशोक की ससुराल है और वे पूरी दुनिया में शांति के दूत के रूप में पहिचाने गये। इसी विदिशा शहर से इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल करने वाले कुशाग्र एवं अपने मिशन के प्रति अडिग बने रहने वाले कैलाश नारायण शर्मा चाहते तो अपने साथ डिग्री लिये राजधानी दिल्ली की ट्रेन पकड़ लेते और किसी भी बड़ी कम्पनी में, बड़े ओहदे पर, मोटी तनख्वाह में मजे से जिंदगी बसर कर सकते थे लेकिन शिक्षा प्राप्त कर ऐसा करने की उनकी ख्वाहिश कभी नहीं रही। वे समाज में बेहतरी के लिये शिक्षा हासिल कर रहे थे और वे कुछ ऐसा करना चाहते थे कि समाज का विकृत चेहरा ठीक हो सके। अपने स्कूली समय से उनके मन में भीख मांगते बच्चों को लेकर टीस उठती थी। वे बच्चों का ऐसा जीवन देखकर विचलित हो उठते थे। उन्हें बार बार यह लगता था कि एक तरफ तो हम यह कहते अघाते नहीं कि बच्चे देश का भविष्य है और देश के भविष्य बच्चों के हाथों में कटोरा हो, यह उन्हें मंजूर नहीं था। वे बच्चों को सम्मान का जीवन देने का इरादा रखते थे। अपने अभियान का श्रीगणेश उन्होंने अपने शहर विदिशा से आरंभ कर दिया था। 
        कैलाश नारायण शर्मा से कैलाश सत्यार्थी बने सत्यार्थी एक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुये थे। चार भाईयों में सबसे छोटे और सबसे ज्यादा संवेदनशील सत्यार्थी एक आदमी की तरह जीने के बजाय वे कुछ करगुजरने के लिये प्रतिबद्व थे। गांधीजी उनकी प्रेरणा थे। वे गांधी के रास्ते पर चलकर अहिंसा के मार्ग से समस्या का हल ढूंढऩे का प्रयास करते थे। बचपन बचाओ आंदोलन आरंभ करने के पहले उन्होंने विदिशा में गांधीजी की प्रतिमा के समक्ष अछूतों से भोजन बनवाया और अपने होने का अहसास दिलाया। सत्यार्थी का बचपन बचाओ आंदोलन देश-दुनिया में नाम और धन कमाने के लिये नहीं था बल्कि यह कांटों भरा रास्ता था जिस पर चलना एक चुनौती थी। अनेक बार उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन सत्यार्थी सत्य के बूते पर हमेशा जीत हासिल करते रहे। इस दुर्गम राह पर चलने का साहस उन्हें गांधीजी से मिली। बिना डिगे, बिना हिले वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे। 
अपने स्वयं के स्कूली दिनों में सत्यार्थी जब भीख मांगते बच्चों को अपने हिस्से का खाना खिला देते या उन्हें किताब-कॉपियां और दूसरी जरूरतें पूरी करते तो परिजनों से उन्हें शाबासी की जगह पर सजा मिलती। एक बार तो उन्हें काफी समय तक धूप में खड़े रहना पड़ा। यह और बात है कि बाद के दिनों में परिजनों ने भी सत्यार्थी के प्रयासों में साथ दिया। हालांकि यह सजा, सत्यार्थी के इरादों को और पक्का बनाती।  लगभग 35 वर्ष पूर्व सत्यार्थी ने बचपन बचाओ आंदोलन नामक संस्था का गठन कानूनी तौर पर किया। भारत वर्ष में बच्चों के शोषण के खिलाफ यह पहला सिविल सोसायटी अभियान था। उन्होंने बच्चों को बचाने की गुजारिश के साथ पक्के कानून की मांग करते हुये 1993 में बिहार से दिल्ली, अगले वर्ष 1994 में कन्याकुमारी से दिल्ली तक की यात्रा करने के बाद 95 में कोलकाता से काठमांडू तक की यात्रा पूरी की। 2001 में सत्यार्थी ने कन्याकुमारी से कश्मीर होते हुये 20 राज्यों से गुजरते हुये 15 हजार किलोमीटर की जनयात्रा की। इसी कड़ी में 2007 में बाल व्यापार विरोधी दक्षिण एशियाई यात्रा एक प्रमुख पड़ाव है। 
        बचपन बचाने और बच्चों को सम्मानजनक जिंदगी के लिये सत्यार्थी शिक्षा को ही एकमात्र रास्ता मानते हैं। उन्हीं के प्रयासों का सुफल बच्चों को यह मिला कि संविधान में शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की पहल हुई। सत्यार्थी अपने अनुभवों से बताते हैं कि वर्तमान में अकेले भारत में 5 करोड़ बाल मजदूर हैं जिनसे 1.2 लाख करोड़ कालाधन उद्योगपति एवं दीगर लोग कमा रहे हैं। सत्यार्थी बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से न केवल बचपन बचाने का प्रयास कर रहे हैं बल्कि उनके एजेंडे में बच्चों की सुरक्षा एवं पुर्नवास भी शामिल है। इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करनेे लिये बाल मित्र ग्राम योजना भी संचालित की जा रही है। देश के 11 राज्यों के अब तक 356 गांव बाल मित्र ग्राम बन चुके हैं। बाल मित्र ग्राम उन गांवों को कहा जाता है जहां सौफीसदी बालश्रम समाप्त हो चुका हो। ऐसे गांवों में बच्चे स्कूल जा रहे हैं तथा समय समय पर पंचायत में अपनी बात रखने का अधिकार प्राप्त कर चुके हैं। सत्यार्थी के प्रयासों से अब तक भारत में ही 80 हजार से अधिक बच्चों को बालश्रम से मुक्ति दिलायी जा चुकी है। 
         सत्यार्थी ने अपने इस तीन दशकों के सफर में अनेक खट्टे-मीठे अनुभव हासिल किये हंै। वे इस बात से हमेशा खुश रहते हैं कि उनके इस आंदोलन को उनके अपने परिवार का सहयोग प्राप्त है। उनकी जीवनसंगिनी सुमैधा कैलाश के लिये सत्यार्थी को नोबल मिलना कोई बड़ी बात नहीं है। वे सत्यार्थी की इस बात से सहमति जताती हैं कि यह सम्मान गांधीजी को मिलता तो ज्यादा प्रसन्नता होती। नोबल ऐलान के बाद सत्यार्थी ने कहा था कि वे गांधीजी के देहावसान के बाद पैदा हुये थे और यह सम्मान के सच्चे हकदार गांधीजी थे और यह सम्मान उन्हें मिलता तो प्रसन्नता और अधिक होती। 
            श्रीमती सुमैधा कैलाश बताती हैं कि जब हमने पहली दफा एक बच्चे को बचा कर घर लाये तो उसने घर में सोने से मना कर दिया क्योंकि तब हम दोनों अखबार बिछाकर सोते थे। वे कहती हैं कि सत्यार्थी को अपने काम के दरम्यान ऐसे अनेक कड़ुवे अनुभवों से गुजरना पड़ा है लेकिन वे हिम्मती हैं। वे सकरात्मक सोच रखते हैं और अपने अभियान को सफल होते देखना चाहते हैं। वे यह भी कहती हैं कि ऐसे अनेक बच्चे हैं जिनकी जिंदगी संवर गयी है और वे बेहतर जिंदगी जी रहे हैं। विदिशा के किराने की दुकान चलाने वाले बंशीलाल साहू को लगभग 35 सालों से सत्यार्थी तीन सौ रुपये देते आ रहे हैं। सत्यार्थी जब भी विदिशा आते हैं, वे साहू को तीन सौ रुपये देना नहीं भूलते। रुपये देने के साथ साहू को ताकीद यह होती है कि गरीब बच्चे को पैसा नहीं होने पर इन्हीं पैसों से चॉकलेट दे देना। सत्यार्थी सत्य के साथ सादगी से जीने की प्रेरणा गांधीजी से पाते हैं और यही कारण है कि सत्यार्थी के लिये नोबल का मिलना, उनके कार्य को और भी जिम्मेदार बनाता है। 
हम हैं हिन्दुस्तानी..
यह हम हिन्दुस्तानियों की फितरत है कि जहां भी जाते हैं अपना झंडा गाड़ देते हैं। गांधीजी के सम्मान में फिरंगियों ने कई बार अपने कानून बदले हंै, इतिहास इस बात का गवाह है तो इस समय में भी फिरंगी भारतीयों को सम्मान देने में कभी पीछे नहीं रहे। इस सिलसिले में सन् 2009 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उस वाकये का जिक्र करना जरूरी है जब कैलाश सत्यार्थी को अलग से मान दिया गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह मुख्य अधिवेशन बाल अधिकारों पर केन्द्रित था। नियमानुसार इस अधिवेशन को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ही संबोधित करते हैं लेकिन परम्परा को तोड़ते हुये कैलाश सत्यार्थी को बोलने का अवसर दिया गया। सत्यार्थी को इन वर्षों में ब्रिटेन, जर्मनी, इटली आदि-इत्यादि देशों की संसदों की विशेष बैठकों को संबोधित करने का सम्मान मिल चुका है। 
कैलाश सत्यार्थी को मिले अब तक के सम्मान :
1. 1984 में जर्मनी का द आचेनेर इंटरनेशनल पीस अवार्ड।
2. 1985 में अमेरिका का द ट्रमपेटेर अवार्ड।
3. 1985 में अमेरिका का रॉबर्ट एफ कैनेडी ह्यूमन राईट अवार्ड।
4. 1999 में जर्मनी का फ्राइड्रीव इबर्ट स्टीफटंग अवार्ड।
5. 2002 में वैलेनबर्ग मेडल, यूर्निवसिटी ऑफ मिशिगन।
6. 2006 में अमेरिका का फ्रीडम अवार्ड।
7. 2007 में मेडल ऑफ द इटालियन सेनाटे।
8. 2008 में स्पेन का अलफांसो कोमिन इंटरनेशनल अवार्ड।
9. 2009 में अमेरिका का डेफेंडर ऑफ डेमोक्रेसी अवार्ड।
कुछ बातें मलाला के बारे में भी :
17 साल की मलाला नोबल पुरस्कार पाने वाली दुनिया की सबसे कम उम्र की हैं। पाकिस्तान की स्वात घाटी में 12 जुलाई 1997 को जन्मी मलाला बच्चियों की शिक्षा के लिये साहस दिखाने के लिये चर्चा में आयीं। 2007 में तालिबानियों ने स्वात पर कब्जा कर लिया और लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी लगा दी तो मलाला न केवल स्वयं छिपकर स्कूल जा रही थीं बल्कि अन्य बच्चियों को भी प्रेरणा दे रही थीं। यही नहीं, उन्होंने दो साल बाद 2009 में बीबीसी के लिये ब्लॉग लिखना भी शुरू कर दिया था। इससे गुस्साये तालिबानियों ने मलाला और उसके पिता को मारने की धमकी दी थी। हौसलामंद मलाला पर तालिबानियों की धमकी बेअसर रही। गुस्साये तालिबानियों ने 9 अक्टूबर 2012 के दिन स्कूल से लौटती मलाला के सिर पर गोली मार दी। साहसी मलाला मौत से लडक़र वापस आ गयी। लंदन में इलाज चला और दुरूस्त होकर वापस पढ़ाई में जुट गयी। मलाला को उनके साहस के लिये 2014 का नोबल दिये जाने का ऐलान हुआ है और इसी के साथ वे दुनियां की सबसे कम उम्र की नोबल विजेता बन गयी हैं।