संदेश

एक अपराजित योद्धा : शिवराजसिंह चौहान

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12 साल का कीर्तिमान बनाने वाले मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री  -मनोज कुमार 
     कैलेण्डर के पन्नों पर 29 नवम्बर की तारीख हर साल आती है लेकिन 2017 में यह तारीख मध्यप्रदेश के इतिहास की तारीख के रूप में दर्ज हो गई है. यह तारीख उस अपरोजय योद्धा के नाम दर्ज हो गई है जिसे हम शिवराजसिंह चौहान के नाम से जानते हैं. 61 साल के मध्यप्रदेश में लगातार 12 वर्षों तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान ने कीर्तिमान कायम किया है. यह सच है कि इन 61 सालों में ज्यादतर समय कांग्रेस सत्ता में रही लेकिन सिवाय दिग्विजयसिंह के कोई दूसरा कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं हुआ जिसने लगातार 10 साल तक मध्यप्रदेश की सत्ता सम्हाली हो. दिग्विजयसिंह के रिकार्ड को ध्वस्त कर शिवराजसिंह ने मध्यप्रदेश के इतिहास में अपना नाम लिख दिया है. इसमें सबसे अहम बात यह है कि 12 सालों में शिवराजसिंह चौहान, शिवराजसिंह बने रहे, मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहचान बहुत कम रही. यही कारण है कि वे प्रदेश के बच्चों के मामा कहलाए और देशभर में मध्यप्रदेश का नाम रोशन हुआ.      शिवराजसिंह चौहान की पहचान एक मुख्यमंत्री के रूप में है और…

कवि मुक्तिबोध की जन्मशती

-मनोज कुमार साहित्य समाज में किसी कवि की जन्मशती मनाया जाना अपने आपमें महत्वपूर्ण है और जब बात मुक्तिबोध की हो तो वह और भी जरूरी हो जाता है। मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनीतिक चेतना से समृद्ध स्वातंत्रोत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व के रूप में स्थापित मुक्तिबोध अपने समय के एक ऐसे कवि हुए हैं जिनकी उम्र बहुत छोटी रही लेकिन उनकी कविता सदियों के लिए अमर हो गई। मध्यप्रदेश में जन्मे और छत्तीसगढ़ के होकर रह जाने वाले मुक्तिबोध की पहचान राजनांदगांव से है। हालांकि मुक्तिबोध किसी एक शहर या प्रदेश के नहीं बल्कि समूची दुनिया के कवि हैं और उनकी समय से बात करती कविताओं का यह शताब्दि वर्ष है। गजानन माधव ‘‘मुक्तिबोध’’ (13 नवंबर 1917 -11 सितंबर 1964) हिन्दी साहित्य की स्वातंत्र्योत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व थे।  वर्ष 2017 हिन्दी के अपने समय के जुझारू कवि मुक्तिबोध का जन्मषती वर्ष है। हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले मुक्तिबोध कहानीकार भी थे और समीक्षक भी। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है। मुक्तिबो…

सालगिरह का उल्लास

1 नवम्बर मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस विशेष 
मनोज कुमार एक और साल जश्र का, उत्साह का, विकास का और सद्भाव का. यह बहुत कम दफे ही होता है कि एक ही तारीख पर दो लोग सेलिब्रेशन कर रहे हों लेकिन ऐसा होता आ रहा है और एक-दो नहीं बल्कि 17 सालों से जो अनवरत चलता रहेगा. 17 साल पहले एक नवम्बर को मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना हुई थी. 61 साल पहले यह वही तारीख है जिस दिन नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ था. छत्तीसगढ़ अलग हो जाने से मध्यप्रदेश एक बार फिर से नए मध्यप्रदेश बन चुका है क्योंकि भौगोलिक रूप से मध्यप्रदेश का पुर्नसंयोजन किया गया. जो प्रदेश कभी एक हुआ करते थे, आज भौगोलिक रूप से अलग होकर भी एक हैं दिल से. 17 सालों में दोनों राज्यों के मध्य सौहाद्र्रता बनी हुई है और आपस में कभी कोई गर्माहट की नौबत नहीं आयी. शायद यही कारण है कि मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में डॉ. रमनसिंह की सरकार डेढ़ दशक के स्थायित्व वाली सरकार बन गई है. सीमित संसाधन, चुनौतियां अपार और संभावनाओं का द्वार खोलते मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़. मध्यप्रदेश देश का ह्दयप्रदेश कहलाता है. अपने निर्माण के साथ ही…

बुद्ध चुनें या युद्ध?

-मनोज कुमार      एक बार फिर हम अधर्म पर धर्म की जीत का उत्सव मनाने की तैयारियों में जुट गए हैं. बुराईयों पर अच्छाई की जीत का पर्व सदियों से मनाते चले आए हैं लेकिन ऐसा क्या है कि ये बुराई कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है? मैं सोचता था कि कभी कोई साल ऐसा भी आएगा जब हम अच्छाईयों का पर्व मनाएंगे. विजय का पर्व होगा. किसी की पराजय की चर्चा तक नहीं करेंगे, पराजित करना तो दूर रहा लेकिन आखिर वह साल अब तक मेरे जीवन में नहीं आया है. इसके बावजूद मैं निराश नहीं हूं. हताश भी नहीं हूंं क्योंकि मुझे लगता है कि एक दिन वह साल भी आएगा जब हम अच्छाई का पर्व मना रहे होंगे. इस अवसर का दीप जला रहे होंगे. सवाल यह है कि सदियां गुजर जाने के बाद भी जब यह संभव नहीं हो पाया तो यह होगा कैसे? मुझे लगता है कि इसमें मुश्किल कुछ भी नहीं है. बस, थोड़ा सा दृष्टि और थोड़ी सी सोच बदलने की जरूरत है. अब तक हम जय बोलते आए हैं और बुराई को पराजित कर उत्सव में मगन हो गए हैं. क्यों ना हम किसी को पराजित करने के बजाय हम उस बुराई की जड़ को ढूंढऩे की कोशिश करें जिसकी वजह से हर बार वह पराजित तो होता है लेकिन अपनी बेलें कहीं छोड़ ज…

तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है

मनोज कुमार
     इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो और खुद को बचा ले जाओ। इक्का-दुक्का अखबार और पत्रिकाओं को छोड़ दें तो लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में ‘‘टेग लाइन‘‘होती है- ‘‘यह लेखक के निजी विचार हैं। सम्पादक की सहमति अनिवार्य नहीं।‘‘इस टेग लाइन से यह बात तो साफ हो जाती है कि जो कुछ भी छप रहा है, वह सम्पादक की सहमति के बिना है। लेकिन छप रहा है तो सहमति किसकी हैलेखक अपने लिखे की जवाबदारी से बच नहीं सकता लेकिन प्रकाषन की जवाबदारी किसकी है? सम्पादक ने तो किनारा कर लिया और लेखक पर जवाबदारी डाल दी। ऐसे में यह प्रश्न उलझन भरा है और घूम-फिर कर बात का लब्बोलुआब इस बात पर है कि प्रकाशनों को अब सम्पादक की जरूरत ही नहीं है और जो परिस्थितियां हैं,वह इस बात की हामी भी है। इस ‘‘टेग लाइन‘‘वाली पत्रकारिता से हम टेलीविजन की पत्रकारिता को सौफीसदी बरी करते हैं क्योंकि यहां सम्पादक नाम की कोई संस्था होती है य…

हिन्दी किसके लिए ?

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अंग्रेजी के मोहपाश से आखिर कब मुक्त होंगे?

-अनामिका एक के बाद एक वर्ष गुजरते जा रहे हैं और देखते ही देखते लगभग 70 वर्ष गुजर गए लेकिन भारतीय समाज अंग्रेजी के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पाया है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलाने की जितनी पुरजोर कोशिश की जा रही है, अंग्रेजी का वर्चस्व उतना ही बढ़ रहा है। कभी अंग्रेजों पर फ्रेंच ने राज किया था और अंग्रेजी भाषा को दरकिनार कर दिया था लेकिन फ्रेंच शासन से मुक्त होने के बाद अंग्रेजी को पूरी ताकत के साथ वापस उसका सम्मान दिलाया गया। किन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है कि जिन अंग्रेजों के हम अनुगामी बने हुए हैं, उनसे यह नहीं सीख पाये कि कैसे हम अपनी मातृभाषा, राष्ट्रभाषा हिन्दी को उसका सम्मानजनक स्थान दिलायें। यह तथ्य सर्वविदित है कि हिन्दी दुनिया में सर्वाधिक बोली जाती है, पढ़ाई जा रही है लेकिन भारत में अंग्रेजी का वर्चस्व इन उपलब्धियों पर पानी फेर देता है। इस बार 14 सितम्बर को फिर एक दिन, एक सप्ताह तथा एक माह का हिन्दी के नाम होगा और इसके बाद हम वापस अंग्रेजी की कक्षा में चले जाएंगे। हिन्दी भाषा को हमारी सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक चेतना, हमारी भारतीयता, हमारी सभ्यता, हमारा साहित्य,…