सोमवार, 21 अगस्त 2017

यह जश्र आम आदमी के भरोसे का है


मनोज कुमार
किसी भी राज्य के समग्र विकास के लिए स्थायीत्व पहली शर्त होती है. सरकारों का चुन जाना और थोड़े समय में सत्ता में फेरबदल से विकास न केवल प्रभावित होता है बल्कि आम आदमी में निराशा का भाव भी उत्पन्न होता है. यही कारण है कि इस बार निर्वाचित सरकार को अगली बार निर्वाचित होने में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इस मामले में छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने आम आदमी को भरोसा दिलाया है कि राज्य के समग्र विकास के लिए स्थायी सरकार बनी रहेगी. रमन सरकार के 5000 दिनों का कार्यकाल पूर्ण होने को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए. साल 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य का दर्जा मिला और पहली बार बहुमत के आधार पर कांग्रेस ने अपनी सरकार बनायी. तीन वर्षों में कांग्रेस की सरकार के प्रदर्शन को, उसके विकास कार्यक्रमों को और कांग्रेस से उपजी निराशा ने भाजपा को अवसर दिया. भाजपा ने स्वच्छ छवि वाले केन्द्र में राज्यमंत्री रहे डॉ. रमनसिंह को राज्य की बागडोर सम्हालने की जिम्मेदारी सौंपी. मृदुभाषी, समन्वय के पक्षधर और राज्य के विकास के लिए स्वयं को झोंकने वाले डॉ. रमनसिंह ने छत्तीसगढ़ को विकास के ऐसे रास्ते पर लेकर निकले कि एक आदिवासी राज्य आज देश के विकसित प्रदेशों की गिनती में आ गया है. राज्य की अपनी धरोहर को उन्होंने विश्वमंच पर पहचान दिलायी. शिक्षा, स्वास्थ्य, सडक़, पानी, बिजली और रोजगार के अनेक अवसर के लिए उन्होंने रास्ते खोले. कुछ राज्य की जरूरतों के अनुरूप योजनाओं का श्रीगणेश किया जो कुछ केन्द्र समर्थित लोककल्याणकारी योजनाओं को व्यवहारिक रूप से अमल में लाकर छत्तीसगढ़ के विकास को नया आयाम दिया. 
साल 2003 के बाद से डॉ. रमनसिंह छत्तीसगढ़ की जनता के दिल में ऐसे बसे कि लगातार तीन बार उनकी सरकार को जनादेश मिला. आज जब वे अपनी सरकार के 5 हजार दिन का जश्र मना रहे हैं तो यह रमन सरकार का जश्र नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ राज्य का जश्र है, उस मतदाता का जश्र है जिन्होंने सरकार पर भरोसा किया और सरकार ने उनके भरोसे को बनाये रखा. एकाएक यकीन करना मुश्किल सा हो जाता है कि लगातार कोई इतने लम्बे समय तक बहुमत के साथ रह सकता है? असंभव को संभव करना मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह को आता है. आखिरकार वे डाक्टर जो ठहरे. वे नब्ज पकड़ कर बीमारी जान लेते हैं और दवा करना भी उन्हें आता है. कवर्धा के डॉ. रमनसिंह ने मुख्यमंत्री के रूप में सरगुजा से लेकर बस्तर तक ऐसी ऐसी दवा का इंतजाम किया है जिसकी कल्पना आम आदमी ने नहीं की थी. मिसाल के तौर पर जिस नमक के लिए सदियों से आदिवासी लूटे जाते रहे हैं, उन्हें महज 25 पैसे में नमक देकर लूट से बचा लिया. एक किलो नमक के बदले महंगी चिंरौजी देने वाले आदिवासियों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलने लगा. नक्सलियों की तथाकथा से आज पूरा देश वाकिफ है लेकिन पीडि़त परिवारों की बच्चों की शिक्षा का ऐसा मुकम्मल इंतजाम रमन सरकार ने किया कि वे देश के नामचीन कॉलेजों में गौरव करने वाले अंकों से परीक्षा पास करने लायक बन गए हैं. कोई इंजीनियर बन रहा है तो कोई डॉक्टर, किसी ने कौशल उन्नयन में कारीगरी सीख कर स्वयं का रोजगार पैदा कर लिया तो महतारी-बहनों को आत्मनिर्भर बनने के इतने अवसर मिले कि लोगों को सोचना पड़ रहा है कि इससे बेहतर और कौन सी सरकार होगी. 
लाइवलीहुड कॉलेज मुख्यमंत्री कौशल उन्नयन योजना का एक उपक्रम है। राज्य के सभी 27 जिलों में लाइवलीहुड कॉलेज की स्थापना की गई है और इन कॉलेजों में राज्य के युवाओं को नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है। मोटेतौर पर अब तक एक लाख से अधिक युवाओं को विभिन्न कार्यों का प्रशिक्षण दिया गया है। प्रशिक्षण उपरांत कुछेक ने राज्य के उद्योगों में नौकरी प्राप्त कर ली है तो अनेक ऐसे हैं जिन्होंने स्वयं का उद्यम स्थापित कर जीवोकोपार्जन कर रहे हैं। लाइवलीहुड कॉलेज में ट्रेनिंग प्राप्त करने वालों में लडक़े और लड़कियां दोनों हैं। लाइवलीहुड कॉलेज का यह कांसेप्ट वास्तव में रोजगार की दिशा खोलने के लिए अनूठा है। 
रमन सरकार ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है. आर्थिक रूप से उन्हें संबल बनाने के अनेक प्रयास तो किया ही गया है बल्कि मानसिक रूप से भी उन्हें पक्का बनाया गया है. इसका एक उदाहरण उर्मिला राज्य के एक छोटे से कस्बानुमा नगर देवभोग की एक बहुत ही गरीब मध्यम परिवार की बेटी उर्मिला सोनवाने है. पिता ने अपनी जमीन बेचकर उर्मिला की शादी के लिये प्रबंध किया था. उर्मिला स्वयं राज्य शासन में एक  शासकीय कर्मचारी के तौर पर कार्य करती है. उर्मिला एक पिता की मजबूरी को समझती थी और वह अपने पिता के अरमानों को पूरा करना चाहती थी लेकिन वह अपनी जिंदगी को भी नरक नहीं बनने देना चाहती थी. अपने फैसले के बाद वह कहती है- कुछ खोकर भविष्य बचाया जा सकता है तो यह करना चाहिये. पिता की जमीन बिक गयी, यह सही है लेकिन मेरा भविष्य सुरक्षित हो गया. उर्मिला के इस फैसले से समाज का सन्नाटे में आ जाना कोई अनपेक्षित नहीं था लेकिन बदलाव की शुरूआत जो उर्मिला ने की है, उसकी गूंज देवभोग जैसे छोटे से हिस्से में ही नहीं बल्कि पूरे देश में होने लगी है. 
मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह अपनी आलोचना से विचलित नहीं होते हैं बल्कि वे अपने आलोचकों से संवाद कर अपनी गलतियों को ठीक करने की कोशिश करते हैं. यही कारण है कि मीडिया का साथ उन्हें हमेशा मिलता रहा है और मीडिया भी उन पर भरोसा बनाये रखा है. रमन सरकार ने एक रुपये किलो चावल देकर क्रांति का बिगुल फूंक दिया. उन्होंने सत्ता सम्हालते ही राज्य की जनता से वायदा किया था कि कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सोएगा. अपने वचन की पूर्ति के लिए उन्होंने कई योजनाओं का श्रीगणेश किया. रोजगार के अभाव में पलायन सबसे बड़ी चुनौती थी सो उन्होंने एक रुपये किलो चावल देने की महत्वाकांक्षी योजना का आरंभ किया। साथ में तेल और नमक जैसी जरूरत की दूसरी चीजों को भी रियायती दर पर देना आरंभ किया। अपनी इस योजना को लेकर वे विरोधियों के निशाने पर भी रहे। डॉ. रमनसिंह की यह योजना थोड़े ही समय में लोकप्रियता की बुलंदी को छूने लगी। काम के अभाव में पलायन करने वाले छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और मजदूर पलायन से तौबा करने लगे। अनाज का वितरण में धांधली न हो, इसकी पुख्ता व्यवस्था उन्होंने की और इसका परिणाम यह निकला कि छत्तीसगढ़ के पीडीएस प्रणाली की सुप्रीम कोर्ट ने सराहना की।  उनके इन प्रयासों का सुफल यह मिला कि हर वर्ष बड़ी संख्या में काम की तलाश में पलायन करने वाले भाई-बहिनों को अब घर से बाहर भटकना बंद हो गया. सस्ते में अनाज, तेल और नमक के साथ साल भर रोजगार की व्यवस्था ने पलायन को ही पलायन करने पर मजबूर कर दिया. ऐसे लोग जो तीज-त्योहार पर अपनों से दूर रहते थे, परदेस में अत्याचार सहते थे लेकिन उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था, ऐसे में रमन सरकार से मिली मदद ने उनकी घरवापसी करा दी. आज वे अपनों के साथ प्रसन्न हैं.
रमन सरकार आम आदमी की सरकार बन गई थी। रमन सरकार राज्य की जनता को रोजगार और बेहतर जिंदगी देने के लिए ही प्रयासरत नहीं थी बल्कि उसकी कोशिश थी कि छत्तीसगढ़ की जीवनशैली, परम्परा एवं संस्कृति को न केवल संरक्षित किया जाए बल्कि उसे विस्तार भी दिया जाए। इस कड़ी में रमन सरकार ने राजिम कुंभ को विधान रूप धार्मिक गुरुओं की सहमति से मान्यता दिलाने का प्रयास किया। आज राजिम कुंभ छत्तीसगढ़ का प्रतिष्ठा आयोजन बन चुका है।  इस तरह इन 5 हजार दिनों में हर दिन एक ऐसे फैसले का रहा है जो छत्तीसगढ़ के विकास को नया आयाम देता है. ये दिन और बढ़ेंगे और विकास की नई इबारत लिखता दिखेगा मोर सुघ्घर छत्तीसगढ़.

रविवार, 20 अगस्त 2017

अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ संस्थान में आवश्यकता


शीघ्र शुरू होने जा रहे अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ संस्थान (ANS) को अपनी हिंदी और अंग्रेजी भाषा की वेबसाइट्स हेतु ट्रेनी, सब-एडिटर, फोटो एडिटर, सोशल मीडिया एडिटर की आवश्यकता है। बता दें कि एएनएस की निकट भविष्य की यह योजना है कि देश के अग्रणी 15 भाषाओं में कई न्यूज़ पोर्टल शुरू किया जाए। फिलहाल हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं में न्यूज वेबसाइट तैयार है जिसके लिए संस्थान को तेज-तर्रार पत्रकारों की आवश्यकता है। ऐसे पत्रकार जिन्हें अपनी लेखनी पर भरोसा है, जिन्हें कंटेंट पर अच्छी पकड़ है,पत्रकारिता क्षेत्र में डिग्री के साथ-साथ अनुभव रहा है, ऐसे पत्रकारों को प्राथमिकतास्वरूप अवसर प्रदान किया जाएगा।
पत्रकारिता में डिप्लोमा/ स्नातक / परास्नातक (या समकक्ष) की डिग्री रखने वाले उपयुक्त उम्मीदवार इसके लिए आवेदन कर सकते हैं । ज्ञात रहे उम्मीदवारों की हिन्दी टाइपिंग स्पीड ठीक हो और हिंदी से अंग्रेजी या अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद आसानी से कर लेते हों । ऐसे तो सामान्यत: २ वर्षों का अनुभव माँगा गया है, लेकिन जो नावांतुक पत्रकार हैं उन्हें उनके द्वारा लिखे हुए समाचार / लेख / ब्लॉग / पोस्ट का लिंक या उसकी प्रति माँगा गया है।
चयनित अभ्यर्थियों को फोन के माध्यम से सूचित कर साक्षात्कार के लिए 24.08.2017 को दोपहर 02:30 बजे ANS के ऑफिस ”R-559, अपर ग्राउंड फ्लोर, न्यू राजेंद्र नगर, मोती महल के समीप, फायर स्टेशन, शंकर रोड, नई दिल्ली-100060” पते पर बुलाया जाएगा।
अमरेन्द्र जी से मिली सूचना

शनिवार, 19 अगस्त 2017

तत्काल आवेदन करें



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सोमवार, 14 अगस्त 2017

मुफ्तखोरी से मुक्ति का संकल्प लेने का वक्त

मनोज कुमार
हर बार की तरह एक बार फिर हम स्वाधीनता पर्व मनाने जा रहे हैं. हर बार की तरह हम सबकी जुबान पर शिकायत होगी कि आजादी के 70 सालों के बाद भी हम विकास नहीं कर पाये. कुछ लोगों की शिकायतों का दौर यह होता है कि इससे अच्छा तो अंग्रेजों का शासन था. यह समझ पाना मुश्किल है कि क्या इन 70 सालों में भारत ने विकास नहीं किया? क्या विश्व मंच पर भारत की उपस्थिति नहीं दिखती है? क्या भारत ने स्वयं को महाशक्ति के रूप में स्थापित करने में सफलता प्राप्त नहीं की है? इन सवालों का जवाब हां में होगा तो फिर विकास का पैमाना क्या हो? सन् 1947 से लेकर 2017 तक का जब हम आंकलन करते हैं तो पाते हैं कि ऐसा कोई सेक्टर नहीं है जहां भारत ने कामयाबी के झंडे नहीं फहराया हो लेकिन भारतीय मानसिकता हमेशा से शिकायत की रही है और हम तकियाकलाम की तरह विकास नहीं होने की बात को कहते रहे हैं. यह शिकायत की मानसिकता हमारी ऐसी बन चुकी है कि हम अपने देश पर अभिमान कर नहीं पाते हैं. हम अपने देश की खूबियों को भी लोगों के सामने नहीं रख पाते हैं. दरअसल, भारत जैसे महादेश में लोगों ने अपने अपने टापू सरीखे घर और मन बना लिए हैं, जहां वे स्वयं को कैद रखते हैं. वे बाहर की दुनिया से कटे हुए हैं और उन्हें लगता है कि बाकि दुनिया विकास के आसमां छू रही है और भारत को अभी बहुत कुछ करना बाकी है.
इस शिकायतनामा को आप खारिज नहीं कर सकते हैं क्योंकि विकास सतत प्रक्रिया है और जितना हुआ या हो रहा है, उससे आगे की उम्मीद बनी रहती है. इस स्वाधीनता पर्व पर हमें नागरिक जिम्मेदारी के साथ आगे आना होगा. अपने आपसे यह वायदा करना होगा कि देश के विकास के लिए पहले वह अपने आसपास का विकास करेंगे. इसके लिए सबसे पहली और जरूरी शर्त है कि हम स्वयं को आत्मनिर्भर बनायें. शिकायतों की बात करें तो हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि इन 70 सालों में हम पराश्रित रहे हैं. हमारी निर्भरता हर बात पर सरकार पर रही है. हम उम्मीद करते हैं कि हमारी हर जरूरत सरकार पूरा करेगी. फिर वह बुनियादी जरूरतें यथा सडक़, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और रोजगार दिलाने का काम सरकार का है. मुसीबत टूटने पर सरकार को कोसने में हम पीछे नहीं हटेंगे. 
लेकिन क्या कभी हमने अपने अपने स्तर पर सोचा है कि इस देश के प्रति, भारत की माटी के प्रति हमारा अपना भी कोई दायित्व है? कोई कर्तव्य है? शायद नहीं. हमने तो केवल और केवल अधिकारों की बात की है. हमारी इस कमजोरी को राजनीतिक दलों ने बखूबी भांप लिया है और यही कारण है कि राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र में ऐसे वायदे किए जाते हैं, जिसे पूरा करने का अर्थ नागरिकों को निकम्मा बनाना है. बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुए हैं. लगभग दो दशक से लोकतांत्रिक और चुनी हुई सरकारों ने आम आदमी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के बजाय उनकी निजी जरूरतों को पूरा करने में अपना ध्यान लगा दिया है. रोजगार के अवसर उत्पन्न करना सरकार का काम है लेकिन लगभग मुफ्त की कीमत में खाद्यान्न उपलब्ध कराना सरकार का काम नहीें है लेकिन सरकारें ऐसा कर रही हैं. बच्चे के पैदा होने से लेकर उसकी शादी-ब्याह तक की जिम्मेदारी सरकार ने ओढ़ ली है. यह काम सरकार का नहीं है. सरकार का काम है कि समाज को बेहतर शिक्षा, रोजगार के बेपनाह अवसर, अच्छी सडक़ें, बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था और अपराधमुक्त समाज की संरचना करना है तो यह सारे काम पीछे छूटकर अन्नप्रासन्न संस्कार से लेकर तीर्थदर्शन तक की जवाबदारी सरकार सम्हाल रही है.
राजनीतिक दलों ने वोटबैंक पक्का करने के लिए स्वयं को समाज की बुनियादी ढांचा दुरूस्त करने से खुद को दूर कर लोकलुभावन की योजनाओं को अमल में लाने की पहल की है. आम आदमी को लगता है कि सरकार उसके लिए चिंतित है लेकिन सच तो इसके खिलाफ है क्योंकि हमारी दैनंदिनी जरूरतों के लिए हमें स्वयं को मेहनत करना चाहिए तो हमें वह सब करने की जरूरत नहीं है. राजनीतिक दलों की इस मेहरबानी से समाज की समरसता टूट रही है. इसी समाज के एक बड़े वर्ग को राहत देने की बेवजह कोशिशों से एक दूसरे वर्ग में निराशा उत्पन्न हो रही है. इस स्थिति के लिए वोटबैंक पकाऊ राजनीतिक दल जवाबदार हो सकते हैं लेकिन इसके लिए आम आदमी में पनपता लालच पहले जवाबदार है. 
केन्द्र की मोदी सरकार ने जब सब्सिडी खत्म करने की कड़ी पहल की तो लोगों को शिकायत हो गई लेकिन इसकी बड़ी जरूरत है. उच्च या निम्र आय वर्ग के व्यक्ति के लिए रोजगार के अधिकतम अवसर उत्पन्न करना सरकार का काम है लेकिन सुविधाओं की पूरी कीमत चुकाना नागरिक दायित्व है. ऐसे में मोदी सरकार से शिकायत क्यों? होना तो यह चाहिए कि मोदी सरकार पहले चरण में अपने दल के शासित राज्यों में नियम लागू कर दे कि इस तरह के लोकलुभावन योजनाओं का कोई लाभ नहीं दिया जाएगा. इसके स्थान पर रोजगार के नए अवसर उत्पन्न किए जाएंगे और हर हाथ को अधिकतम काम दिए जाएं जिससे वह आर्थिक रूप से सक्षम हो. इससे ना केवल सरकार पर आश्रित रहने का भाव खत्म होगा बल्कि हर आदमी के भीतर अपने देश को लेकर स्वाभिमान जागेगा. क्योंकि सच यह है कि मेहनत की कमाई ही हर आदमी के भीतर उसके सम्मान को जागृत करती है.
स्वाधीनता पर्व के इस पावन पर्व पर हमें संकल्प लेना होगा कि चुनाव के समय लोक-लुभावन घोषणाओं के फेर में हम सब नहीं आएंगे. बल्कि जो राजनीतिक दल ऐसा करेगा, उसका बॉयकाट करेंगे क्योंकि सरकारों का काम बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का है ना कि आम आदमी की निजी जरूरतों को पूरा कर निकम्मा बनाने का. जिस दिन हम इस मुफ्तखोरी से स्वयं को मुक्त कर लेंगे, आप यकीन रखिए आजादी का सही अर्थों में हम आनंद उठा पाएंगे. कल तक हम अंग्रेजों के गुलाम थे, आज मुफ्तखोरी ने हमारी आजादी छीन ली है.

शनिवार, 22 जुलाई 2017

"हंस" के नवीन अंक में शोध पत्रिका "समागम"




सुपरिचित कथा साहित्य की पत्रिका "हंस" के नवीन अंक में चम्पारण सत्याग्रह पर केंद्रित शोध पत्रिका "समागम" 
की चर्चा की गई है. सम्पादक एवं समीक्षक श्री दिनेश कुमार का धन्यवाद।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

भरोसे का वज़न करता समाज


मनोज कुमार
इन दिनों भरोसा तराजू पर है. उसका सौदा-सुलह हो रहा है. तराजू पर रखकर उसका वजन नापा जा रहा है. भरोस कम है या ज्यादा, इस पर विमर्श चल रहा है. यह सच है कि तराजू का काम है तौलना और उसके पलड़े पर जो भी रखोगे, वह तौल कर बता देगा लेकिन तराजू के पलड़े पर रखी चीज का मोल क्या होगा, यह आपको तय करना है. अब सवाल यह है कि क्या सभी चीजों को तराजू पर तौलने के लिए रखा जा सकता है? क्या भावनाओं का कोई मोल होता है? क्या आप मन की बात को तराजू पर तौल कर बता सकते हैं? शायद नहीं. इनका ना तो कोई मोल होता है और ना ही कोई तौल. तराजू पर रखने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है. भावना, विचार और इससे आगे विश्वास. यह सभी चीजें शाश्वत है. इनका कोई मोल नहीं है. कोई तोल नहीं है. इन सबका अस्तित्व है या नहीं है. यह कम या ज्यादा भी नहीं हो सकता है. भावना किसी के प्रति आपकी अच्छी या बुरी हो सकती है लेकिन कम या ज्यादा कैसे होगी? विचार आपके सकरात्मक हो सकते हैं किन्तु कम या ज्यादा वाले विचार कैसे होंगे. ऐसा ही एक शाश्चत शब्द है भरोसा. आप किसी व्यक्ति पर आपको भरोसा होगा तो पूर्ण होगा और नहीं होगा तो शून्य होगा. किसी पर आप भरोसा करते भी नहीं हैं और कहते हैं कि उस पर मेरा भरोसा कम हो गया? जब भरोसा ही नहीं रहा तो कम या ज्यादा का प्रश्न कहां से उत्पन्न होता है? भरोसा या तो होगा या नहीं होगा और होगा तो पूरा होगा और नहीं होगा तो शून्य के स्तर पर होगा. 
इन दिनों समाज में पत्रकारिता की विश्वसनीयता चर्चा में है. आमतौर पर पत्रकारिता अथवा मीडिया के लिए टिप्पणी की जाती है कि अब उसकी विश्वसनीयता घट गई है. इस वाक्य को संजीदा होकर समझने की कोशिश करेंगे तो आपको समझ आएगा कि मीडिया पर अविश्वास करते हुए भी कहा जा रहा है कि भरोसा घटा है, समाप्त नहीं हुआ है. दरअसल, मीडिया पर समाज का विश्वास कभी खत्म नहीं होता है क्योंकि समाज के चौथे स्तंभ की मान्यता प्राप्त इस संस्था की पहली जिम्मेदारी सामाजिक सरोकार की होती है. सत्ता, शासन और अदालत तक आम आदमी की तकलीफ को ले जाना और अवगत कराना मीडिया की जवाबदारी है. जब मीडिया अपनी जवाबदारी से पीछे नहीं हटता है तो समाज का उस पर भरोसा घट नहीं सकता है. हां, मीडिया पर समाज का भरोसा समाप्त हो सकता है. शून्य के स्तर पर जा सकता है, वह तब जब मीडिया अपनी जवाबदारी को भूल जाए. मीडिया पर समाज के भरोसे को किसी तराजू में नहीं तौल सकते हैं क्योंकि भरोसे का कोई मोल नहीं है. भरोसा अनमोल होता है.
इस समय हम सोशल मीडिया के भरोसे बेपनाह अपने विचार जाहिर कर रहे हैं. अभी सोशल मीडिया के एक साथी ने अपनी बात शेयर की कि लेखकों को पीआर करने से बचना चाहिए क्योंकि इससे एकाग्रता भंग होती है. इस बात में बहुत ज्यादा दम नहीं है क्योंकि जब आप लेखक होते हैं तो आपको सिर्फ वही सूझता है, वही दिखता है और वही लिखते हैं जो आपके मन को विचलित करती हैं. आपका लिखा किसी के भरोसे को बढ़ाता होगा तो किसी के भरोसे को तोड़ता भी होगा लेकिन यह अलग बात है. इस महादेश में अपनी बात पहुंचाने के लिए पीआर करना जरूरी है और इससे बचना मुश्किल सा है. हालांकि इसका समाधान भी है कि आप अपनी सहूलियत और जरूरत के मुताबिक पीआर कर सकते हैं. यहां तो पीआर को तराजू पर तौला जा सकता है और कीमत के स्थान पर इस बात का आंकलन कर सकते हैं कि कब और कितना पीआर कैसे और कितना लाभदायी होगा लेकिन लेखन में जो बात होगी, वह भरोसे की होगी. इसे आप तराजू पर नहीं तौल सकते हैं.
अक्सर साथियों से बात होती है तब वह भी भरोसे के शाश्वत सत्य की अनदेखी कर जाते हैं. मीडिया के बड़े-बड़े मंचों पर दिग्गज पत्रकार भी इस बात को भूल जाते हैं कि भरोस शाश्वत सत्य है और जो शाश्वत है, उसे पाया जा सकता है या खोया जा सकता है. खोकर अपने पास नहीं रखा जा सकता और ना ही पाकर उसे खोने का स्वांग किया जा सकता है. भरोसा टूटने का अर्थ रिश्तों पर पूर्णविराम लगना है और भरोसा पाने का अर्थ रिश्तों और गहराई को नापना है. भावना, विचार और भरोसा अमूर्त हैं. इसका कोई मोल नहीं. यह एक तरह से पानी की तरह है जो रहेगा आपके साथ और टूटा तो भांप बनकर आसमान में विलीन हो जाएगा. यकीन मानिए भरोसा बने रहने के लिए या टूटने के लिए. आपका चाल, चरित्र और व्यवहार पर निर्भर करता है कि आप भरोसे के लायक हैं या नहीं लेकिन आप पर कम या ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता है. भरोसा अपने आपमें पूर्ण है, उसे तराजू में तौलने की जरूरत नहीं है.            ( फोटो साभार गूगल  )

शुक्रवार, 23 जून 2017

एक नदी का उल्लास से भर जाना

-अनामिका
मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी मां स्वरूपा नर्मदा नदी उल्लास से भर गई होगी। यह स्वाभाविक भी है। मां अपने बेटों से क्या चाहती है? अपनों से दुलार और दुलार में जब पूरा समाज सेवा के लिए खड़ा हो जाए तो मां नर्मदा का पुलकित होना, उल्लास से भर जाना सहज और स्वाभाविक है। दुनिया में पहली बार किसी नदी को प्रदूषित होने से पहले बचाने का उपक्रम किया गया। कहने को तो इस दिशा में सरकार ने पहल की लेकिन सरकार के साथ जनमानस ने नर्मदा सेवा यात्रा को एक आंदोलन का स्वरूप दे दिया। चारों ओर से गूंज उठने लगी कि मां नर्मदा की सेवा का संकल्प लिया है। उसे प्रदूषित नहीं होने देंगे। यह अपने आपमें अंचभित कर देने वाला आयोजन था जो भारतीय समाज की जीवनशैली को एक नया स्वरूप देता है। एक नई पहचान मिलती है कि कैसे हम अपने जीवन के अनिवार्य तत्वों को बचा सकते हैं। स्मरण हो आता है कि हमारे ही देश भारत में किसी राज्य सरकार ने नदी का सौदा-सुलह कर लिया था और हम मध्यप्रदेशवासी किसी कीमत पर ऐसा नहीं कर सकते हैं। नमामी नर्मदा सेवा यात्रा इसका जीवंत प्रमाण है।
भारतीय संस्$कृति में जीवन के लिए पांच तत्वों को माना गया है जिसमें जल एक तत्व है। इसलिए जल के बिना जीवन की कल्पना करना डरावना सा है। इसी के चलते हमारे पुरखों ने जल संरक्षण की दिशा में जो अनुपम कार्य किए हैं, वह हमारे लिए उदाहरण के रूप में मौजूद हैं लेकिन हमने समय के साथ नदी-तालाबों के संरक्षण के बजाय दोहन करने पर जोर दिया है। आज यही कारण है कि दुनिया भर में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। अब हम जाग रहे हैं लेकिन अब सम्हलने में एक सदी का वक्त लग जाएगा, इस बात में भी कोई संदेह नहीं। इस कठिन समय में जनचेतना जागृत करनेे के लिए मध्यप्रदेश में नमामि देवी नर्मदे-नर्मदा सेवा यात्रा-2016 एक सुखद संकेत है। निश्चित रूप से हम आज कोशिश करेंगे और इस कोशिश को हमारी नई पीढ़ी आगे बढ़ाने आएगी, यह उम्मीद की जानी चाहिए। 
नर्मदा नदी का उद्गम मध्यप्रदेश के अमरकटंक से होता है। नर्मदा नदी 16 जिले और 51 विकासखण्ड से होती हुई 1077 किलोमीटर का मार्ग तय करती है। नर्मदा एक नदी मात्र नहीं है बल्कि यह हमारी संस्कृति है। इसलिए हम नमामि देवी नर्मदे-नर्मदा कहकर पुकारते हैं। समय के साथ मां नर्मदा का हमने दोहन किया, उसके संरक्षण की दिशा में हम अचेत रहे और आज मां नर्मदा का आंचल आहिस्ता-आहिस्ता सिकुड़ता चला जा रहा है और हालात यही रहे तो इस बात में कोई संदेह नहीं कि आने वाले समय में मां नर्मदा केवल इतिहास के पन्नों पर रह जाए। इस चुनौती से निपटने के लिए नमामि देवी नर्मदे, नर्मदा सेवा यात्रा आरंभ किया गया है। यह दुनिया का सबसे बड़ा नदी संरक्षण अभियान है, जिसमें समाज की भागीदारी सुनिश्चित की गई थी। 144 दिनों तक निरंतर इस यात्रा के जरिये जन-समुदाय को नर्मदा नदी के संरक्षण की जरूरत और वानस्पतिक आच्छादन, साफ-सफाई, मिट्टी एवं जल-संरक्षण, प्रदूषण की रोकथाम आदि के बारे में जागरूक करने की सार्थक कोशिश की गई।
मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्र नर्मदा सेवा यात्रा के बारे में कहते हैं कि-‘आज जब पूरे विश्व में पर्यावरण की बात हो रही है तब मुख्यमंत्री श्री चौहान का यह मानना एक सामयिक चिंतन ही है कि मध्यप्रदेश की नर्मदा मैया को पर्यावरणीय संकटों से उबारना बहुत आवश्यक है। गत दशकों में निरंतर वन कम होने से नर्मदा मैया की धार भी प्रभावित हुई है। जिस नदी ने हमें जल, विद्युत, कृषि, उद्यानिकी की सौगात दी है, उसे हम प्रदूषित करने में पीछे नहीं रहे। यह एक तरह का मनुष्य का अपराधिक कृत्य माना जाएगा कि हमारी नदियाँ लगातार प्रदूषित होती गई हैं। अब वह समय आ गया है जब पुरानी त्रुटियों के लिए पश्चाताप करते हुए नदियों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए वातावरण बनाया जाए और मिलकर कार्य किया जाए। नर्मदा तट के पास स्थित गांव में स्वच्छ शौचालय बनेंगे, नगरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की व्यवस्था होगी, घाटों पर पूजन कुण्ड, मुक्ति धाम और महिलाओं के चेंजिंग रूम भी बनेंगे। महत्वपूर्ण बात यह है कि यात्रा के दौरान दोनो तटों पर एक-एक किलोमीटर तक फलदार, छायादार पौधे लगाए जाएंगे। इसकी शुरूआत हो चुकी है। स्वच्छता, जैविक खेती, नशामुक्ति और पर्यावरण संरक्षण के संयुक्त अभियान के रूप में यह यात्रा हमारे सामने है। समाज और सरकार के सामूहिक संकल्प से नर्मदा की पवित्रता का संरक्षण अवश्य सफल होगा।’
नर्मदा सेवा यात्रा का उद्देश्य टिकाऊ एवं पर्यावरण हितैषी कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिये जन-जागृति, प्रदूषण के विभिन्न कारकों की पहचान और रोकथाम, जल-भरण क्षेत्र में जल-संग्रहण के लिये जन-जागरूकता, नदी की पारिस्थितिकी में सुधार के लिये गतिविधियों का चिन्हांकन और उनके क्रियान्वयन में स्थानीय जन-समुदाय की जिम्मेदारी तय करना, मिट्टी के कटाव को रोकने के लिये पौधे लगाना आदि है।
ज्ञात रहे कि नर्मदा नदी देश की प्राचीनतम नदियों में से है, जिसका पौराणिक महत्व भी गंगा नदी के समान माना जाता है। नर्मदा अनूपपुर जिले के अमरकंटक की पहाडिय़ों से निकलकर मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर करीब 1310 किलोमीटर का प्रवाह-पथ तय कर गुजरात के भरूच के आगे खम्भात की खाड़ी में विलीन हो जाती है। मध्यप्रदेश में नर्मदा का प्रवाह क्षेत्र अमरकंटक (जिला अनूपपुर) से सोण्डवा (जिला अलीराजपुर) तक 1077 किलोमीटर है, जो नर्मदा की कुल लम्बाई का 82.24 प्रतिशत है।
यही नहीं, नर्मदा अपनी सहायक नदियों सहित प्रदेश के बहुत बड़े क्षेत्र में सिंचाई और पेयजल का बारहमासी स्रोत है। नदी का कृषि, पर्यटन और उद्योगों के विकास में अति महत्वपूर्ण योगदान है। इसके तटीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली मुख्य फसलें धान, गन्ना, दाल, तिलहन, आलू, गेहूँ, कपास आदि हैं। नर्मदा तट पर ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्यटन-स्थल हैं, जो देश-प्रदेश, विदेश के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। नर्मदा नदी का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, साहित्यिक रूप से काफी महत्व है। नमामि देवी नर्मदे-नर्मदा सेवा यात्रा-2016 का संदेश केवल  नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए नहीं है अपितु देशभर की नदियों को बचाने और संवारने की पहल है। मध्यप्रदेश से उठी यह आवाज कल देश भर के लिए होगी और पूरी दुनिया मध्यप्रदेश के इस अतुलनीय प्रयास में सहभागी होगी, यह उम्मीद की जानी चाहिए।

यह जश्र आम आदमी के भरोसे का है

मनोज कुमार किसी भी राज्य के समग्र विकास के लिए स्थायीत्व पहली शर्त होती है. सरकारों का चुन जाना और थोड़े समय में सत्ता में फेरबदल स...