मंगलवार, 24 मार्च 2015

गांधी की टेक


मनोज कुमार
         भारतीय समाज में पिता की मौजूदगी जितनी जरूरी होती है, शायद उनका नहीं रहना उन्हें और भी जरूरी बना देता है. ऐसे ही हैं हमारे बापू. बापू अर्थात महात्मा गांधी. आज बापू को हमसे बिछड़े बरसों-बरस गुज़र गये लेकिन जैसे जैसे समय गुजरता गया, उनकी जरूरत हमें और ज्यादा महसूस होने लगी. एक आम आदमी के लिये बापू आदर्श की प्रतिमूर्ति बने हुये हैं तो राजनीतिक दल वर्षों से उन्हें अपने अपने लाभ के लिये, अपनी अपनी तरह से उपयोग करते दिखे हैं. अब तो गांधी के नाम की टेक पर सब नाम कमा लेना चाहते हैं. मुझे स्मरण हो आता है कि कोई पांच साल पहले कोई पांचवीं कक्षा की विद्यार्थी ने सूचना के अधिकार के तहत जानना चाहा था कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा किस कानून के तहत दिया गया? बच्ची का यह सवाल चौंकाने वाला था लेकिन तब खबर नहीं थी कि उसने अपने एक बेहूदा सवाल से पूरे समाज को गांधी की एक ऐसी टेक दे दी है जिसे सहारा बनाकर नाम कमाया जा सकता है अथवा विवादों में आकर स्वयं को चर्चा में रखा जा सकता है. 
गांधी की टेक लेकर जस्टिज मार्केण्ड काटजू ने गांधीजी के बारे में जो कुछ कहा, वह चर्चा के योग्य नहीं है. यह इसलिये नहीं कि उनकी बातों में कितनी थाह है अथवा नहीं बल्कि इसलिये जिस बापू के देश में काटजूजी ने अपने उम्र के सर्वाधिक वर्ष गुजार दिये, उस देश में, इतने वर्षों बाद गांधीजी पर टिप्पणी करने की समझ और साहस कहां से आयी? उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि गांधीजी ने क्या कहा, क्या किया और उसके क्या मायने निकले. सच तो यह है कि बाबा काटजू इस उम्र में आकर स्वयं को खबरों में बनाये रखने की जो मन ही मन एक लिप्सा पाले हुये हैं, उसकी परिणिती में यह अनमोल वचन बोलने के लिये उन्हें उनके मन ने मन मजबूर किया था. किसी को इस बात से आपत्ति हो सकती है कि काटजू जी को मैंने बाबा क्यों कहा, और शायद वह बच्ची मुझसे यह सवाल कर सकती है कि किस कानून के तहत आपने काटजूजी को बाबा संबोधन दिया तो मेरा एक ही जवाब होगा कि उम्रदराज व्यक्ति के लिये दादा, बाबा या चाचा संबोधन हमारी भारतीय संस्कृति है. हम अंग्रेजों की तरह एक शब्द अंकल नहीं जानते हैं बल्कि रिश्तों का ताना-बाना हमारी संस्कृति है.
हरहाल, मैं गांधी के टेक की बात कर रहा था. आप इतिहास उठा कर देख लीजिये कि कोई भी नेता और राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जिसने गांधी का अपने पक्ष में उपयोग नहीं किया. वर्तमान केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी की बात ही गांधी से शुरू होती है और गांधी पर ही समाप्त होती है. सच यह है कि उनका दल गांधी के खिलाफ भले ही न हो लेकिन गांधी के पक्ष में खड़ा नहीं दिखा. ऐेसे में मोदीजी का गांधीप्रेम, केवल प्रेम नहीं बल्कि राजनीति है. मोदीजी का भला सा तर्क यह हो सकता है कि गांधीजी का रिश्ता गुजरात से था और वे भी गुजरात के हैं तो गांधीजी पर उनका पहला हक है. इसे खारिज नहीं किया जाना चाहिये क्योंकि मोदी जी आज प्रधानमंत्री हैं तो वे एक आम भारतीय भी हैं  मोदीजी गांधी के पक्ष में खड़े दिखते हैं तो काटजू जी और उनके जैसे अनेक लोग हैं जो गांधीजी में खोट ढूंढ़ते दिखते हैं, इनके बारे में क्या कहेंगे?
         बात गांधीजी के पक्ष में हो या विपक्ष में, लोग और नेता उनकी खोट ढूंढ़ें या उनका गुणगान करें, बात तो तय है कि सब लोग येन-केन प्रकारेण गांधी का टेका लगाकर आगे बढ़ जाना चाहते हैं. गांधीजी हर कालखंड में सामयिक रहे हैं और रहेंगे, ऐसा मेरे जैसे लोगों का मानना है. मेरे जैसे मतलब, दस पांच नहीं बल्कि करोड़ों की संख्या में, वह भी देश में नहीं, परदेस में भी. कोई भी व्यक्ति परिपूर्ण नहीं होता और स्वयं गांधीजी ने अपने बारे में यह बात कही है. जिन लोगों को गांधीजी से परहेज है अथवा उनमें खोट निकाल कर चर्चा करना चाहते हैं तो उन लोगों को सत्य के प्रयोग पढ़ लेना चाहिये. एक ऐसी आत्मकथा जिसमें आत्मप्रवंचना नहीं बल्कि स्वयं की आलोचना है और पाश्चाताप भी. गांधी पर सवाल करने से पहले गांधीजी जैसा स्वयं के भीतर ताकत पैदा करें और अपनी कमियों को न केवल सार्वजनिक रूप से स्वीकार करें बल्कि पाश्चाताप करने का साहस भी पैदा करें. गांधी टेक के सहारे सुर्खिया बनने की यह पुरातन परम्परा है और आगे भी जारी रहेगी. हां, मैं इसमें एक लाभ यह देखता हूं कि जो हमारी नयी पीढ़ी गांधी परम्परा से दूर है, वह इसी बहाने कुछ संवाद करती है और यह जानने के लिये शायद कुछ अध्ययन भी. क्या इसके लिये मोदी, काटजू जैसे अनन्य लोगों का हमें आभारी नहीं होना चाहिये?

मंगलवार, 10 मार्च 2015

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल


मनोज कुमार 
मानव समाज ने स्वयं को अनुशासित रखने के लिये अधिकार और दायित्व शब्द का निर्माण किया है किन्तु यही दो शब्द वह अपनी सुविधा से उपयोग करता है. पुरुष प्रधान समाज की बात होती है तो अधिकार शब्द प्राथमिक हो जाता है और जब स्त्री की बात होती है तो दायित्व उसके लिये प्रथम. शायद समाज के निर्माण के साथ ही हम स्त्री को दायित्व का पाठ पढ़ाते आ रहे हैं और यही स्त्री जब अधिकार की बात करती है तो हमें नहीं सुहाता है लेकिन हम इतने दोगले हैं कि खुलकर इस बात का विरोध भी नहीं करते हैं. बल्कि इससे बचने का  रास्ता ढूंढ़ निकाल लेते हैं. कदाचित विश्व महिला दिवस का मनाया जाना इसी दोगलेपन का एक अंश है. ऐसा एक दिवस पुरुषों ने अपने लिये क्यों नहीं सोचा या साल के पूरे 365 दिन स्त्रियों के लिये क्यों नहीं दिया जाता? बातें कड़ुवी हैं और शायद एक बड़ा वर्ग इन बातों से असहमत हो लेकिन सच से आप कब तक मुंह छिपाते रहेंगे?
यह भी हैरान कर देने वाली बात है कि एक तरफ तो स्त्री को महिमामंडित करते हुये इतनी रचनायें लिखी जाती हैं कि सचमुच में भ्रम होने लगता है कि जितना सम्मान हम स्त्री को देते हैं, वह सम्मान दुनिया में कहीं स्त्री को कहीं नहीं मिलता है लेकिन जब हम पीठ पीछे देखते हैं तो जो कुछ स्त्रियों के साथ घट रहा है, वह शर्मनाक है. दुर्दांत किस्म के निर्भया के मामले को लेकर हमारा समाज जिस तरह से आंदोलित हुआ, वह आज का सच है. इतने बड़े हादसे के बाद भी समाज आंदोलित नहीं होता तो यह दुखद था किन्तु लगता नहीं कि इस आंदोलन ने समाज के भीतर भय उत्पन्न किया है. एक निर्भया के बाद यह सिलसिला थमा नहीं है जो भारतीय समाज के लिये कलंक है.
इस संदर्भ में यह बात भी हैरानी में डाल देने वाली है कि डाक्यूमेंट्री ‘इंडियाज डॉटर’के प्रसारण पर रोक लगाने की पुरजोर कोशिश की जाती है लेकिन यह कोशिश नहीं दिखती नहीं है कि ‘इंडियाज डॉटर’ जैसी डाक्यूमेंट्री का निर्माण ही क्यों हो? निर्भया प्रकरण स्वतंत्र भारत के माथे पर दाग है तो स्मरण किया जाना चाहिये कि इसी भारत में माया त्यागी प्रकरण भी हुआ है. ह्यमून ट्रैफिङ्क्षकग की खबरें लगातार आती रही हैं. स्मरण करें हिन्दी फिल्म न्यू देहली टाइम्स को जिसका आधार ही था आदिवासी महिलाओं के विक्रय का. इस खबर को आधार बनाकर मीडिया एवं राजनीतिक के घिनौने चेहरे को बेनकाब किया गया. हमारा बस यही मानना है कि पुरानी शर्मनाक घटनाओं से सबक लिया जाता तो शायद कोई निर्भया प्रकरण नहीं होता और न ही किसी को ‘इंडियाज डॉटर’ बनाने की जरूर होती.     
स्त्री समाज की जब हम चर्चा करते हैं तो उनके अभिव्यक्ति के स्वाभाविक स्वतंत्रता की बात आती है. यहां का परिदृश्य भी निराशाजनक है. मीडिया में स्त्री स्वतंत्रता एवं सहभागिता शून्य सी है. जो महिलायें किसी तरह से मीडिया में सक्रिय हैं, उन्हें सुनियोजित ढंग से निर्णायक पदों से परे रखा गया है. यही नहीं, अपनी प्रतिभा के बूते पर स्थान बनाने की कोशिशों में जुटीं इन महिला पत्रकार साथियों को इतना प्रताडि़त किया जाता है कि उनके समक्ष पत्रकारिता छोड़ जाने का विकल्प होता है या स्वयं को समाप्त कर लेने का एकमात्र रास्ता. इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पर मीडिया में चर्चा नहीं होती है. पिछले समय में एक नहीं, अनेक घटनायें सामने आयी हैं. ऐसे में स्त्री की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात बेमानी हो जाती है.
कोई दो साल पहले एक सर्वे में बात साफ हुई थी कि मीडिया में महिलाओं की उपस्थिति नहीं के बराबर है. दुनिया भर की आवाज उठाने वाले मीडिया में ही स्त्रियों की आवाज घुट रही है तो मीडिया में नारी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महज एक नारा बन कर रह जाता है. 

गुरुवार, 5 मार्च 2015

एक धर्म की बिटिया


मनोज कुमार
    बिटिया हो जाना ही किसी बेटी का धर्म है. बिटिया का एक ही धर्म होता है बिटिया हो जाना. बिटिया का विभिन्न धर्म नहीं होता, उसकी कोई जात या वर्ग भी नहीं होता, वह एक मायने में अमीर या गरीब भी नहीं होती है. बिटिया, सिर्फ और सिर्फ बिटिया ही होती है. हिन्दू परिवारों में पैदा हुई बेटियों को भी पराया होना होता है तो मुस्लिम, सिक्ख और इसाई परिवार भी इसी परम्परा का निर्वाह करते हैं. बेटियों को लेकर इनमें से किसी का भी धर्म और वर्ग का चरित्र अलग नहीं है. बिटिया को लेकर सबकी दृष्टि एक सी है और वह दृष्टि है बिटिया पराया धन है. यहां तक कि बिटिया को लेकर आलीशान कोठी में रहने वाले धन्ना सेठ जो सोचता है, वही सोच एक आम आदमी के मन की भी होती है. संसार के निर्माण के साथ ही बेटी चीख रही है, चिल्ला रही है कि वह एक वस्तु नहीं है. वह धन भी नहीं है और न ही सम्पत्ति लेकिन परम्परा के खूंटे से बंधी बिटिया एक सोची-समझी साजिश के तहत पराया धन बना दी गई. 
   अभी रेल का सफर करते समय इस बात का अनुभव हुआ कि बिटिया का कोई धर्म नहीं होता है. मैंने 14 घंटे के सफर में इस बात की तलाश करता रहा कि किसी एक बिटिया का तो धर्म पता चल सके लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. बिटिया को पराये घर जाना है तो उसे घर का हर काम सीखना होगा, भाई और पिता को खिलाने के बाद खाना ही उसका धर्म है. पिता और भाई के खाने के बाद बचा हुआ वह खाना खाती है और कई बार तो उनके हिस्से के बचे और बासी खाना बिटिया के नसीब में आता है. पीहर से सीखा और ससुराल में यह उसकी नियती बन जाती है. परदे में रहना, चुप रहना और दूसरों की खुशी में हंसना-मुस्कराने वाली बिटिया सुघड़ है, संस्कारी है. इस संस्कारी और एक धर्म का निर्वाह करने वाली बिटिया का जज्बात दहेज के लिये जला देने वालों के लिये कोई मोल नहीं रखता है, यह भी दिल दुखा देने वाली बात है कि एक बलात्कारी बिटिया का धर्म नहीं पूछता. उसके लिये उसका शरीर ही धर्म होता है. हां, इतना जरूर होता है कि सियासी फायदे के लिये कभी-कभार बलात्कार की शिकार बिटिया की जाती चिन्हित की जाती है. यह चिनहारी भी उस लाभ के लिये कि यह दिखाया जा सके कि दुष्कर्म की शिकार बिटिया भी किसी धर्म से आती है. संसार भर में बिटिया के लिये एक ही धर्म है कि उसका बिटिया हो जाना.
    बिटिया को पराया कहने पर मुझे आपत्ति है लेकिन उसे धन कहने पर थोड़ी कम आपत्ति क्योंकि बिटिया का तो कोई मोल है लेकिन बेटों का क्या करें? बेटों का तो अपना धर्म है, वह अमीर भी है और गरीब भी. उसके साथ वर्ग और वह जाति के जंजाल में भी उलझा हुआ है. हिन्दू धर्म के लिये बेटा होने का अर्थ घर का चिराग है तो मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई भी इसी तरह सोचते हैं. बेटा उनके वंश को बढ़ाता है इसलिये वह पराया नहीं होता है लेकिन उसे कभी पराया न सही, स्वयं के घर का धन भी कहला नहीं पाया. बेटा न तो पराया होता है और न कभी धन बन पाया. ऐसा क्यों नहीं होता, इस पर भी जब मैंने सोचा तो लगा कि बेटे की हैसियत दिखती तो बड़ी है लेकिन हकीकत में उसकी औकात दो कौड़ी की होती है. जीवन भर वह पराये धन की खाता है. इस बारे में हमारे एक मित्रवत रिश्तेदार भाई अवधेश कहते हंै कि आप तो अधिकतम 25 साल में बरी हो जाएंगे, शायद इससे ज्यादा एक या दो वर्ष में. बिटिया का हाथ पीला करेंगे और निश्चिंत हो जाएंगे लेकिन हमारे लिये तो बेटा जीवन भर की घंटी की बना हुआ है. पहले पालो, शिक्षा दिलाओ, फिर नौकरी की चिंता करो और बाद में बेटे का ब्याह करो. थोड़े साल बाद मां-बाप पराये हो जाते हैं. मां-बाप समाज के नियमों के चलते बिटिया को पराया कर देते हैं और बेटा मां-बाप को अपने लिये पराया कर देता है. 
   तमाम विकास की बातों, महिलाओं की हिस्सेदारी की बाते और जाने क्या क्या जतन किये गये लेकिन जब परिणाम जांचा गया तो पाया कि जतन तो बिटिया के नाम पर था लेकिन फैसला बेटे के पक्ष में हो गया. न तो इन 14 घंटों के सफर में मैं बिटिया का धर्म तलाश कर पाया और न इस पचास साल की उम्र में बिटिया को उसकी पहचान दिला पाया. जो लोग इसे पढ़ रहे होंगे तो उनसे मेरा आग्रह यही होगा कि जब समय मिले तो बिटिया के हक की तलाश करें, मदद करें और हो सके तो बिटियाओं के लिये उनका अपना धर्म तलाश कर सकें जहां वे स्वतंत्र हों, उनकी अपनी पहचान हो. 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

साक्षरता और परम्परा के मेल से बचेगा पानी


       -मनोज कुमार

रीब तीन दशकों से जल संकट को लेकर विश्वव्यापी बहस छिड़ चुकी है। यहां तक कहा जा रहा है कि अगला विश्व युद्ध पानी के मुद्दे पर लड़ा जायेगा। स्थिति की गंभीरता को नकारा नहीं जा सकता है। इस दिशा में राज्य सरकार अपने अपने स्तर पर पहल कर रही हैं और जल संरक्षण की दिशा में नागरिकों को जागरूक बनाया जा रहा है। जल संरक्षण की दिशा में उपाय बरतने वाले प्रदेशों अपनी अपनी काल और स्थितियों के अनुरूप जतन कर रही हैं। इस श्रृंखला में हाल ही में केन्द्र सरकार ने जल साक्षरता अभियान चलाने की घोषणा की गई है। केन्द्र सरकार की घोषणा को उनके पहले घोषणा समग्र स्वच्छता से जोडक़र देखा जाना चाहिये। केन्द्र सरकार मूलभूत समस्याओं की तरफ नागरिकों की भागीदारी चाहती है तो इसका स्वागत किया जाना अनुचित नहीं होगा। किंतु केन्द्र सरकार जल साक्षरता अभियान कैस चलायेगी, उसका स्वरूप क्या होगा और क्या नागरिक सरकार के इन प्रयासों में अपनी भागीदारी पूरा करेगी। सवाल अनेक हैं लेकिन इसके पहले हमें उन मुद्दों पर जाकर पड़ताल करनी होगी कि केन्द्र सरकार के जल साक्षरता अभियान को पूर्ण करने में क्या दिक्कतें हैं।
भारत गांवों का देश रहा है और अभी भी भारत ग्रामीण परिवेश में ही जीता है। ग्रामीण परिवेश का सीधा सा अर्थ है एक बंधी-बंधायी परम्परा की जीवन शैली। इस परम्परागत जीवनशैली को करीब से देखेंगे तो आप यह जान पायेंगे कि वे शहरी जीवनशैली से कहीं अधिक समृद्ध हैं। वे बाजार के मोहताज नहीं हैं बल्कि वे अपनी परम्परा को बाजार से एकदम परे रखे हुये हैं और यही कारण है कि अनेक किस्म की समस्याओं के बावजूद उनका जीवन तनावपूर्ण नहीं है। जहां तक जल संरक्षण की चर्चा करते हैं तो सर्वाधिक जल स्रोत ग्रामीण क्षेत्रों में ही मिलेंगे। पानी उनके लिये उपयोग की वस्तु नहीं है बल्कि पानी उनके लिये जल-देवता है और वे उसका जीवन जीने के लिये उपयोग करते हैं न कि उसका दुरूपयोग। ग्रामीण परिवेश में जीने वाले अधिसंख्य लोग अपनी किसी उपलब्धि पर आयोजन में खर्च नहीं करते हैं बल्कि पानी के नये स्रोत बनाने के लिये करते हैं। पुराने जल स्रोतों के नाम देख्ेंगे तो आपको किसी न किसी पुराने परिवार के सदस्यों के नाम का उल्लेख मिलेगा। सेठानी घाट कहां है, यह आप से पूछा जाये तो आप हैरानी में पडऩे के बजाय नर्मदाजी के नाम का उल्लेख करेंगे क्योंकि यह सेठानी घाट प्रतीक है उस जलसंरक्षण की परम्परा का जहां बिटिया का ब्याह हो, घर में नया सदस्य आया हो या किसी ऐसे अवसर को परम्परा के साथ जोडक़र जलस्रोतों का निर्माण किया जाता रहा है। गांवों से निकलकर जब हम कस्बों की तरफ बढ़ते हैं तो यहां भी जल संरक्षण परम्परा का निर्वाह करते हुये लोग दिख जाते हैं। जिन पुरातन जल स्रोतों में गाद भर गयी है अथवा उसके जीर्णोद्धार की जरूरत होती है तो लोग स्वयमेव होकर श्रमदान करते हैं। इन श्रमदानियों में कस्बे का आम आदमी तो होता ही है अपितु बुद्धिजीवी वर्ग जिसमें शिक्षक, पत्रकार, समाजसेवी आदि-इत्यादि सभी का सहयोग मिलता है। यह है भारतीय जल संरक्षण की पुरातन परम्परा।
दलते समय के साथ इस परम्परा को घात लगा है। ग्रामीण एवं कस्बाई जिंदगी में तो परम्परा अभी टूटी नहीं है लेकिन शहरों में समस्या सबसे ज्यादा बढ़ी है। इसका सबसे बड़ा कारण है आबादी का लगातार बढऩा और इस आबादी के लिये मकान के इंतजाम करना पहली शर्त होता है और इसी शर्त पर विकास की बलिवेदी पर जलस्रोत बलिदान होते हैं। पहले पहल तो यह जरूरत होती है और बाद के समय में यह जरूरत लालच में बदल जाती है और बढ़ते लालच के कारण शहरों में जलस्रोतों की कमी सबसे बड़े संकट का कारण बनी हुई है। जल संरक्षण परम्परा का न तो शहरों में चलन बच गया है और न ही जल के प्रति उनमें जागरूकता का भाव है। केन्द्र सरकार की जल साक्षरता अभियान की सबसे अधिक आवश्यकता शहरी नागरिकों को है।  लोगों में जागरुकता नहीं आती, तब तक इस लक्ष्य को किसी भी अधिनियम अथवा कानून से सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। जल से जीवन का प्रारंभ है तो जीवन के महाप्रलय के बाद अंत भी जल ही है। जीवन मरण और भरण-पोषण का आधार जल ही है और यह समझ किसी कानून के डंडे से नहीं आकर स्वयंस्र्फूत प्रयासों से आयेगी। हालांकि केन्द्र सरकार के मंत्री स्वयं मानते हैं कि जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए लोक जागरुकता सबसे ज्यादा जरूरी है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि आज केन्द्र सरकार जल साक्षरता की चर्चा कर रही है और आने वाले दिनों में उसे अभियान के रूप में भी चलाया जायेगा लेकिन इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि राज्य सरकारों ने जल संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक करने का काम काफी समय से करते चली आ रही है। इसी क्रम में रहवासियों के लिये अपने अपने घरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग कम्लसरी कर दिया गया है। अभी इस पर सौफीसदी अमल नहीं हुआ है लेकिन असर दिखने लगा है। 
ल संकट के विषय पर चर्चा करते हैं तो अक्सर स्वच्छ एवं अस्वच्छ का मुद्दा भी उठता है। इस संदर्भ में एक नजर वर्तमान  विश्व का 70 प्रतिशत भू-भाग जल से आपूरित है, जिसमें पीने योग्य जल मात्र 3 प्रतिशत ही है। मीठे जल का 52 प्रतिशत झीलों और तालाबों का 38 प्रतिशत, मृदनाम 8 प्रतिशत, वाष्प 1 प्रतिशत, नदियों और 1 प्रतिशत वनस्पतियों में निहित है। इसमें भारत की स्थिति देखें तो आजादी के बाद से लगातार हमारी मीठे जल को लेकर जरूरत कई गुना बढ़ चुकी है। सन् 1947 में देश में मीठे जल की उपलब्धता 6 हजार घन मीटर थी, वह वक्त के साथ इतनी तेजी से घटी है कि आगामी 10 वर्षों में इसके 16 हजार घन मीटर हो जाने की संभावना जाताई जा रही है। भारत विज्ञान की तमाम सफलताओं के बाद भी अभी तक वर्षा जल का मात्र 15 प्रतिशत ही उपयोग कर पा रहा है, शेष बहकर नदियों के माध्यम से समुद्र में चला जाता है, जबकि आगामी वर्षों में देश में जल की माँग 50 प्रतिशत और बढ़ जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है। 
केन्द्र की सरकार जल साक्षरता की आरंभ करने की बात कर रही है तो उसे पर्यावरण संरक्षण की ओर भी समाज को जागरूक करना होगा। जिस तेजी से वनों का नाश हो रहा है, इसे भी जलसंकट के लिये दोषी माना जा सकता है। जलसंरक्षण के साथ साथ प्रत्येक घरों अथवा कॉलोनियों में वृक्षारोपण पर जोर देना होगा। अक्सर देखा गया है कि बड़े ही उत्साह के साथ अभियान का श्रीगणेश तो कर दिया जाता है लेकिन थोड़े से समय गुजरने के बाद अभियान ठंडा पड़ जाता है। ऐसे में एक रोडमेप बनाकर राज्य सरकारों को सौंप दिया जाये जो इसके क्रियान्वयन के लिये जवाबदार होंगे। इस कार्य को पूर्ण करनेे लिये आवश्यक बजट जारी करने में भी राज्यों का सहयोग पहली शर्त होगी। केन्द्र सरकार का महती अभियान जल साक्षरता के साथ साथ ही जल संरक्षण की भारतीय परम्परा को भी जोडऩा होगा, तभी इस अभियान की सफलता सुनिश्चित हो सकेगी।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

भारत भवन : याद रह गयी तेरी कहानी


-मनोज कुमार

13 फरवरी 1982 का दिन और आज तैंतीस बरस बाद 13 फरवरी 2015 का दिन। यह तारीख बार बार और हर बार आयेगी लेकिन भारत भवन का वह गौरव कभी आयेगा, इस पर सवाल अनेक हैं। यह सवाल विमर्श मांगता है किन्तु  विमर्श की तमाम संभावनायें पीछे छूट गयी हैं। इतनी पीछे कि अब भारत भवन के गौरव को पाने के लिये शायद एक और भारत भवन की रचना की पृष्ठभूमि तैयार करने की जरूरत दिखती है। यह जरूरत पूरी करने की कोशिश हुई भी तो इसके बावजूद शर्तिया यह कह पाना मुश्किल सा है कि भारत भवन की विश्व-व्यापी कला-घर की पहचान लौट पायेगी। एक अंतर्राष्ट्रीय पहचान वाले इस कला घर की यह दुर्दशा स्वयं से हुई या इसके लिये बकायदा पटकथा लिखी गयी थी, इस पर कोई प्रामाणिक टिप्पणी करना तो मुश्किल सा है लेकिन आज भारत भवन हाशिये पर है, इस बात शीशे की तरह साफ है। तैंतीस बरस का यह कला घर अब एक मामूली आयोजन स्थल में बदल गया है। बिलकुल वैसे ही जैसे भोपाल के दूसरे आयोजन स्थल हैं। भारत भवन के आयोजन की फेहरिस्त लम्बी हो सकती है लेकिन गुणवत्ता पर अब चर्चा नहीं होती है क्योंकि आयोजन अब स्थानीय स्तर के हो रहे हैं। भारत भवन के मंच से संसार भर के कलासाधकों का जो समागम होता था, उस पर पूर्ण न सही, अल्पविराम तो लग चुका है। 
भोपाल का यह वही भारत भवन है जिस पर दिल्ली भी रश्क करता था। दिल्ली के दिल में भी हूक सी उठती थी कि हाय, यह भारत भवन हमारा क्यों न हुआ। भारत भवन की दुर्दशा को देखकर दिल्ली अब रोता भी होगा कि एक कला घर की कैसे असमय मौत हो सकती है किन्तु सच तो यही है। भारत भवन की साख दिन-ब-दिन गिरती गयी है। साख इतनी गिर गयी कि भारत भवन हाशिये पर चला गया। बीते वर्षों में भारत भवन को हाशिये पर ले जाने के लिये एक सुनियोजित एजेंडा तय किया गया। बिना किसी ध्वनि के भारत भवन के बरक्स नयी संस्थाओं की नींव रखी जाने लगी। इसे मध्यप्रदेश में संस्कृति के विस्तार का हिस्सा बताया गया किन्तु वास्तविकता यह थी कि इस तरह भारत भारत भवन को हाशिये पर ढकेलने की कोशिश को परिणाम तक पहुंचाया गया। भारत भवन के विभिन्न प्रकल्पों में एक रंगमंडल है जहां न केवल नाटकों का मंचन होता है बल्कि यह पूर्णरूपेण तथा पूर्णकालिक नाट्यशाला है। रंगमंडल को सक्रिय तथा समूद्ध बनाने के स्थान पर मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय की स्थापना कर दी गई। रंगमंडल और मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के कार्यों में बुनियादी रूप से कोई बड़ा अंतर नहीं दिखता है। सिवाय इसके कि मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय युवा रंगकर्मियों को डिग्री बांटने लगा। क्या इसका जिम्मा रंगमंडल को देकर उसे समृद्ध और जवाबदार बनाने की पहल नहीं हो सकती थी? हो सकती थी लेकिन सवाल यह है कि वह दृष्टि कहां से लायें जो दृष्टि भारत भवन की रचना करने वालों के पास थी। भारत भवन के दूसरे प्रकल्प भी इसी तरह दरकिनार कर दिये गये। अनेेक आयोजनों का दोहराव साफ देखा जा सकता है। 
भारत भवन कभी राज्य सरकार की प्राथमिकता में था लेकिन दो दशक से ज्यादा समय हो गया है जब सरकारों के लिये भारत भवन कोई बहुत मायने नहीं रखता है। राज्य का संस्कृति विभाग इसका जिम्मा सम्हाले हुये है। वह जो एजेंडा तय करता है, सरकार की मुहर लग जाती है। आयोजनों की औपचारिकता पूरी कर दी जाती है और फिर एक नये आयोजन की तैयारियां आरंभ हो जाती हैं। अब जब भारत भवन के हालात पर चर्चा कर रहे हैं तो यह जान लेना भी जरूरी हो जाता है कि अनदेखा किये जाने वाले इस कला-घर में आयोजन की जरूरत क्यों है तो इसका जवाब साफ है कि विभाग के पास एक बड़ा बजट होता है और बजट को खर्च करने के लिये आयोजन की जरूरत होती है। यदि यह न हो तो आयोजन की औपचारिकता पूरी करने की भी जरूरत नहीं रहेगी। जिस भारत भवन के मंच के लिये शौकिया रंगकर्मी लड़ते थे, अब उन्हें यह आसानी से मिलने लगा है। लडक़र मंच पाने के बाद जो नाट्य मंचन होता था या दूसरे आयोजन होते थे तो एक सुखद तपन का अहसास होता था। अब वह तपन, वह सुख नहीं मिलता है। सब कुछ एक प्रशासनिक ढंाचे में बंधा और सहेजा हुआ। कई बार तो अहसास होता है कि कलाकार भी बंधे-बंधाये से हैं। अखबारों में आयोजन को इसलिये भी स्थान मिल जाता है कि उनके पन्नों में कला संस्कृति के कव्हरेज के लिये स्पेस होता है। स्मरण रहे कि खबर और सूचना तक भारत भवन के आयोजनों का उल्लेख होता है, आयोजनों पर विमर्श नहीं। कला समीक्षकों और इसमें रूचि रखने वालों के मध्य जो चर्चा का एक दौर चला करता था, अब वह भी थमने सा लगा है।
यूं तो भारत भवन को आप विश्वस्तरीय कला घर का दर्जा देते हैं किन्तु भारत भवन मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग का एक हिस्सा है। एक ऐसा हिस्सा जिसने अपने निर्माण और स्थापना के साथ ही उपलब्धियों का शीर्ष पाया और समय के साथ फर्श पर भी आ गया है। भारत भवन का वह स्वर्णिमकाल भी था जब उसके आयोजनों को लेकर, आमंत्रित रचनाधर्मियों को लेकर बकायदा विरोध दर्ज होता था। इस तरह के विरोध से भारत भवन और निखर निखर जाता था। स्मरण करेंं संस्कृति सचिव के तौर पर अशोक वाजपेयी के उस बयान का जिसमें उन्होंने कहा था कि मरने वालों के साथ मरा नहीं जाता है और इस बयान के साथ जहरीली गैस से बरबाद होते भोपाल में उन्होंने एशिया कविता सम्मेलन का आयोजन करा लिया था। वाजपेयी कितने सही थे या गलत, यह चर्चा का दूसरा विषय होगा लेकिन क्या इसके बाद किसी में हिम्मत थी कि वह इस बेबाकी के साथ आयोजन को अंजाम दे सकें। भारत भवन के उस स्वर्णिम काल का स्मरण करना सुखद लगता था जब भारत भवन को खड़ा करने में स्वामीनाथन और ब.व. कारंत जैसे लोगों का योगदान रहा। भारत के शीर्ष के रचनाधर्मियों का समागम निरंतर होता रहा। अपनी प्रतिबद्धताओं के लिये मशहूर लोग आते और बहस-मुबाहिसे का लम्बा दौर चलता। तब की सांस्कृतिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ के लिये भारत भवन का विवाद कव्हरस्टोरी बनता। भारत भवन बीते वर्षों में अपनी यह छाप खो चुका है।
योजनों का लम्बा दौर चला है और इस नये दौर में अंतर प्रादेशिक आयोजनों की नयी श्रृंखला भी आरंभ हुई है। पहले बिहार, अब राजस्थान और आने वाले दिनों में अन्य प्रदेशों की कला-संस्कृति का प्रदर्शन भारत भवन में हुआ और होगा। इस नये किस्म के प्रयासों की सराहना की जानी चाहिये। किन्तु एक सवाल यह भी है कि क्या जिन प्रदेशों को हम मंच दे रहे हैं, उन प्रदेशों में भारत के ह्दयप्रदेश ‘मध्यप्रदेश’ को कहीं स्थान दिया गया। संस्कृति के पहरूओं ने इस दिशा में कोई कोशिश की या हम दूसरों के ही ढोल बजाते रहेंगे? संस्कृति विभाग के आला अफसर तो समय समय पर बदलते रहे किन्तु दूसरी और तीसरी पंक्ति में वर्षों से जमे लोगों के कारण भी भारत भवन का नुकसान हुआ। यह आरोप मिथ्या नहीं है बल्कि सच है कि एक बड़े आदिवासी भूभाग वाले मध्यप्रदेश में विविध कलाओं के कलाकारों को स्थाना भारत भवन के निर्माण से स्थापना के समय तक मिला था, अब वह भी गुम हैं। 
क ईंट गारा ढोने वाली भूरीबाई भारत भवन में ईंट जोडऩे आयी थी और उसकी कलारूचि ने ही उसे मध्यप्रदेश शासन का शीर्ष सम्मान दिलाया। इसके बाद इन कलाकारों के लिये भारत भवन में कितना स्थान बचा है, यह कहने की जरूरत नहीं। इसके पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय इन्हीं वर्गो के लिये स्थापित किया गया है। सवाल यह है कि इन कलाकारों को मुख्यधारा से अलग करने की कोशिश कोशिश ने आकार ले लिया है? यंू भी मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय राज्य के जनजातीय विभाग का है न कि संस्कृति विभाग का। हम इस विवाद में भी नहीं पडऩा चाहते अपितु हमारी चर्चा के केन्द्र में भारत भवन है और हम चाहते हैं कि इन कलाकारों को भारत भवन का मंच मिले। संस्कृति की मुख्यधारा में इनका हस्तक्षेप हो ताकि भारत भवन का गौरव वापस आ सके। लोग चमत्कृत हो सकें और कह सकें कि यह मेरा मध्यप्रदेश है, यह मेरा भोपाल है और यह मेरा कलाघर भारत भवन है। 

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

अपेक्षा और अनुभव


-मनोज कुमार
न दिनों मोबाइल पर आने वाले संदेश को गौर से पढ़ा जाये तो उनमें दर्शन का भाव होता है. गौर फरमायेंगे. एक संदेश आया कि आपकी सुबह अपेक्षा के साथ होती है और शाम एक नये अनुभव के साथ. बड़ा अच्छा लगा और इस दर्शन संदेश को सोचते हुये अखबार के पन्ने पलटने लगा तो वाकई यह संदेश मुझे व्यवहारिक लगा. मेरा मध्यप्रदेश देश के दूसरे राज्यों की तरह चुनावी बुखार से तप रहा है. दिसम्बर 13 में पहले विधानसभा चुनाव, फिर लोकसभा के चुनाव और इसके बाद स्थानीय निकाय एवं पंचायतों के चुनाव. इस चुनाव में किसकी जीत हुई, कौन जीतता है और इसके क्या परिणाम होंगे, इसकी जवाबदारी राजनीतिक प्रेक्षकों के भरोसे छोड़ देते हैं. एक पत्रकार की नजर से जब मैंने इन चुनाव को देखना शुरू किया तो दंग रह गया कि यह चुनाव परम्परागत नहीं हैं. समय के साथ सोच बदलती दिख रही है और उस वर्ग में बदलती दिख रही है जिनके हाथों में न केवल घर की कमान होती है बल्कि अब वे सत्ता की भागीदार भी होने चली हैं. मध्यप्रदेश में महिलाओं के लिये सीटें आरक्षित कर दी गई हैं, इस लिहाज से भी उनकी भागीदारी बढ़ती दिख रही है. यह शुभ संकेत है लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि उनकी सोच में निरंतर बदलाव आ रहा है. चुनाव के मैदान में उतरने वाली ये महिलायें सडक़, बिजली और पानी की बात नहीं करती हैं. इस बारे में उनका कहना है कि हमें मतदाता चुनता इसलिये ही है कि हम इन बुनियादी समस्याओं का रास्ता ढूंढ़ें और उन्हें राहत दें. इन महिलाओं की नजर में महिला शिक्षा, शौचालय, नशे के खिलाफ काम करना बड़ा मुद़दा बन गया है. इन मुद्दों को लेकर महिलायें न केवल सजग हैं बल्कि संजीदा भी. उनकी संजीदगी देखना है तो आपको पंचायतों में जाना होगा. उन छोटी जगहों पर जाना होगा जहां कि महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत लगभग न्यून है लेकिन उनकी जागरूकता देश की राजधानी में राज करने वाले किसी भी नेता से अधिक है.
स बारे में राजधानी भोपाल से लगे फंदा विकासखंड और ऐसे ही कुछ स्थानों में घूमने के बाद यह जानने का अवसर मिला. लगा कि दुनिया बदल रही है. हम इंटरनेट पर बैठकर भले ही ग्लोबल विलेज की कामना करें किन्तु भारत गांव की आत्मा है और इस सच को जानने का अवसर भी मिला. एक ऐसी ही महिला उम्मीदवार से जब पूछा गया कि उनके लिये चुनाव के मुद्दे क्या हैं तो तपाक से बोली पहले तो इन नशेडिय़ों को ठीक करूंगी और इसके बाद जिन बच्चियों के लिये स्कूल नहीं है, उसकी व्यवस्था करूंगी. मेरे लिये घर-घर में शौचालय बनाना भी एक बड़ा काम होगा क्योंकि हमारी बहनों की अस्मत खतरे में रहती है और हमें शर्म भी आती है. यह पूछे जाने पर पानी, बिजली और सडक़ आपके चुनाव का मुद्दा क्यों नहीं है तो उनका सीधा सा जवाब था- जब काम नहीं करना हो और भुलावो में रखना हो तो बार बार इसे मुद्दा बनाओ. कोलार के पास सटे गांव में भी खड़ी आदिवासी महिला पंच प्रत्याशी सुखमनी के लिये भी पानी बिजली और सडक़ कोई मुद्दा नहीं था अपितु यह रोजमर्रा की जरूरत है और इसे पूरा करना  किसी भी पंचायत का काम है. इस बदलती सोच की थाह लेने के लिये जब हमने शहरी इलाकों में बात की तो लगा कि शहर आज भी पानी, बिजली और सडक़ की समस्याओं से ही दो-चार हो रहा है. बच्चियों के लिये शहरों में पर्याप्त स्कूल और कॉलेज हैं जबकि शहरी इलाकों में शौचालय की कोई दिक्कत नहीं है. नशे को भी ये शहरी महिला प्रत्याशी बहुत बड़ा विषय नहीं मानती हैं. 
स बदलती सोच और ठहरी सोच के फासले पर कोई दूसरी कक्षा तक पढ़ी बुधियारिन की बात चुभती हुई महसूस होती है. जब उनसे पूछा गया कि आप लोगों के लिये स्त्री शिक्षा, नशे के खिलाफ लामबंदी और शौचालय मुद्दा है तो शहरी महिला प्रत्याशियों के लिये ये बड़े मुद्दे क्यों नहीं हैं? सवाल सुनकर वह मुस्करायी और धीरे से कहा इसलिये तो परधानमंत्री जी स्मार्ट शहरों की बात कर रहे हैं. हम गांव वाले तो पहले से स्मार्ट हैं. इस अपढ़ सी महिला की बात सुनकर मैं भौंचक था. वह समाज में बदलाव के लिये अपनी सोच में तो बदलाव ला रही है बल्कि उसे दीन-दुनिया की भी खबर है और उसका यह दंश देता कमेंट कई तरफ सोचने के लिये मजबूर करता है. इस घटना से मुझे याद आ रहा है कि साक्षरता मिशन का एक दल बैतूल जिले के एक गांव में गया और उन्हें पढऩे के लिये प्रेरित करने लगा. इनमें से एक मजदूर से मासूमियत से पूछा कि उसे जितना गड्डा खोदने का काम दिया जाता है, वह पूरी ईमानदारी से करता है? सवाल के जवाब में ना तो था नहीं. अब उसका दूसरा सवाल था कि गड़बड़ी कौन करता है, वही पढ़े-लिखे लोग ना? इस सवाल का जवाब  हां और ना दोनों में नहीं था. जवाब था तो चुप रह जाना. हमारी चुप्पी को हमारी मजबूरी समझ कर वह मजदूर भी हमारी तरफ देख रहा था और हम सचमुच बेबस थे. 
मोबाइल पर आया संदेश ठीक कहता है कि हर दिन की समाप्ति एक अनुभव के साथ होती है. शायद आप भी मेरी बातों से सहमत होंगे. 

शनिवार, 10 जनवरी 2015

अनुभव का रिश्ता


मनोज कुमार
मूचा सामाजिक ताना-बाना रिश्तों से ही बना और गुंथा हुआ है. ऐसा लगता है कि समाज के जन्म के साथ ही रिश्ते टूटने को लेकर बिसूरने का सिलसिला शुरू हो गया होगा. यह बिसूरन समय गुजरने के साथ कुछ ज्यादा ही सुनने को मिल रहा है. मन में इन विचारों को लेकर जब अपने दोस्त से बात की तो वह भी रिश्तों के टूटन से दुखी नजर आया. औरों की तरह उसके पास भी यही जवाब था कि समय बुरा आ गया है. क्या करें, कुछ नहीं कर सकते हैं. यह मेरा दोस्त अजीज है और मैं उसका यह जवाब सुनकर स्तब्ध रह गया. सब यही कहेंगे तो अच्छा समय आयेगा कब? क्या राजनीति के अच्छे दिनों वाले झूठे राग से समय बदल जायेगा? शायद नहीं. दरअसल, हर अच्छे समय के लिये अच्छे प्रयासों की जरूरत होती है. अंग्रेजों की दासता से हम कभी मुक्त नहीं हो पाते लेकिन महात्मा गांधी ने शुद्ध मन से प्रयास किया और हम स्वाधीन हैं. गांधीजी और उनके साथ के लोग कहते कि क्या कर सकते हैं तो शायद आज भी हम पराधीन ही होते. बहरहाल, रिश्तों और समय की बदलने की बात को लेकर मैं नाउम्मीद नहीं हूं. थोड़े सोच और समझ के साथ दोनों को बदला जा सकता है. यह इसलिये भी संभव है कि आप अपनी जरूरतों के अनुरूप नई तकनीक का इस्तेमाल करना सीख सकते हैं तो रिश्तों को नया स्वरूप देने के लिये अपनी जरूरत क्यों नहीं बनाते.
रिश्तों में टूटन सबसे ज्यादा बुर्जुग लोगों के साथ देखने में आती है और इसका इलाज हमने वृद्धाश्रम के रूप में ढूंढ़ लिया है. वास्तव में रिश्ते दो तरह के माने गये हैं. पहला खून का रिश्ता और दूसरा दिल का रिश्ता. इससे आगे समझने की कोई कोशिश हुई ही नहीं. एक तीसरे किस्म के रिश्ते से रिश्तों को नये ढंग से परिभाषित किया जा सकेगा, इसे मैं अनुभव का रिश्ता कहता हूं. जो लोग अपनी उम्र जी चुके हैं और एक तरह से हमारे जीवन में उनकी कोई उपयोगिता नहीं है, क्या उनसे हम अनुभव का रिश्ता नहीं बना सकते हैं. ऐसे बुर्जुग जिन्होंने अपने जीवन में कई बड़े काम किये लेकिन रिटायरमेंट के साथ वे बेकार हो गये. हमने भी मान लिया कि रिटायरमेंट के बाद आदमी अनुपयोगी हो जाता है. शायद शारीरिक तौर पर वह पहले जैसा काम न कर सके किन्तु बुद्धि के स्तर पर तो आदमी सशक्त होता ही है. ऐसे लोगों को शिक्षा के क्षेत्र में उपयोग में लाया जा सकता है. कोई लेखा का काम जानता हो तो किसी की मैनेजमेंट स्कील बेहतर हो, कोई गणित में महारत हो तो किसी के पास विज्ञान की समझ हो, और तो और जीवन विज्ञान में भी उनका पक्का दखल हो सकता है. क्यों न हम अपने बच्चों को महंगे कोचिंग में भेजने के बजाय इन अनुभवी लोगों का उपयोग करें. 
म्र के इस पड़ाव में इन्हें धन नहीं, सम्मान की जरूरत होती है. और जब उनके अनुभवों को एक मंच मिलेगा तो ये लोग वृद्धाश्रम से मुक्त होकर बेकार के बजाय उपयोगी हो जायेंगे. कुछेक घरों में इन बुर्जुगों को इसी तरह का सम्मान मिल रहा है. अनुभवों का जो हम लाभ प्राप्त करेंगे, उससे समाज में अनुभव का एक नया रिश्ता बनेगा और समय भी बदल जायेगा. हम यूरोपियन संस्कृति से मुक्त होकर अपने बड़ों को सम्मान देने की पुरानी रीत को नये रूप में ढाल सकेंगे. एक बार आप अपने घर, परिवार, मोहल्ले में अनुभव का रिश्ता बनाने की शुरूआत कर देखिये तो सही, कैसे आप के घर की बगिया में कोई मुरझाया फूल नहीं बल्कि घना छायादार बरगद का पेड़ होगा जो न केवल आपको छांह देगा बल्कि मन को भी प्रसन्न रखेगा.