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नैतिक शिक्षा के पैरोकार महात्मा गांधी

गांधी पुण्यतिथि पर विशेष
मैं कभी झूठ नहीं बोलता, यह वाक्य लगभग हर आदमी कहता है लेकिन जब स्वयं की गलती मानने का वक्त होता है तो वह केवल और केवल झूठ का सहारा लेता है। यह  बनी-बनायी बात नहीं है अपितु जीवन का एक कड़ुवा सत्य है। ऐसा क्यों हुआ या हो रहा है? इसके पीछे कारण तलाश करेंगे तो हमें ज्ञात होगा कि नैतिक शिक्षा के गुम हो जाने के साथ ही समाज में संकट सर्वव्यापी हो गया है। ऐसे में हमें महात्मा गांधी का स्मरण करना सबसे जरूरी लगता है। वे भी हमारी तरह हाड़-मांस के व्यक्ति थे। उन्होंने अपने जीवन में अनेक गलतियां की लेकिन अपनी गलतियों को समझा और पूरे साहस के साथ समाज के समक्ष ‘सत्य के प्रयोग’ शीर्षक से रखा। आज वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन बापू और महात्मा के रूप में मौजूद हैं। उनकी आत्मकथा नैतिक शिक्षा की पाठशाला है। एक ऐसी पाठशाला जो जीवन का सीख देती है। नैतिकता के उच्च मानदंड को पूर्ण करती हुई एक मनुष्य बनने का साहस और संकल्प का भाव उत्पन्न करती है। मनुष्य में मनुष्यता का आत्मबल जगाती है।  आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं। हमारे भीतर सहिष्णुता का जिस तेजी से हस हो रहा है और कदाचित जीवन मूल्यों …