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September 21, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेरे दोस्त दरख्त माफ करना...

मनोज कुमार
वे मेरे दोस्त थे. रोज सुबह घर से दफ्तर जाते समय वे मुझे हंसी के साथ विदा करते. देर षाम जब मैं घर लौट रहा होता तो लगता कि वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं. मेरे और उनके बीच एक रिष्ता कायम हो गया था. ये ठीक है कि वे बोल नहीं सकते थे तो यह भी सच है कि मैं भी उनसे अपनी बात नही कह सकता था लेकिन बोले से अधिक प्रभावी अबोला होता था. हमारी दोस्ती को कई साल गुजर गये थे. इस बीच मैंने लगभग नौकरी का इरादा त्याग दिया था. यह वह समय था जब न तो मेरे आने का वक्त होता था और न जाने का लेकिन क्योंकर षाम को उनके पास से गुजरना मन को अच्छा लगता था. अचानक कहीं से बुलावा आया और न चाहते हुए भी मैं नौकरी का हिस्सा बन गया. इस नौकरी से मेरा मन जितना खुष नहीं था, षायद मेरे ये दोस्त खुष थे. रोज मिलने और एक दूसरे को देखकर मुस्कराने का सिलसिला लम्बे समय से चल रहा था। यह रिष्ता अनाम थ. आज सुबह मैंने उन्हें हलो कहा था और वे मुस्करा कर मुझे रोज की तरह विदा किया. तब षायद मुझे पता नहीं था कि रोज की तरह जब मैं षाम को घर लौटूंगा तो उसी रास्ते से लेकिन मेरे दोस्त मुझसे बिछड़ गये होंगे। कोई मुस्काराता हुआ आज मेरा स्वागत…