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शनिवार, 12 मई 2012

एक दिन की मां !


-मनोज कुमार
बहुत सालों से और बहुत बार मां की एक कहानी सुनता आ रहा हूं। मां और उसका एक बेटा था। गरीब और विपन्न। पिता का साया उठ गया था। बेटे की चिंता करती मां को रात रात भर नींद नहीं आती थी। खुद भूखे रहकर बेटे को खाना खिलाती। दिन गुजरते गये। बेटा निकम्मा और आवारा हो गया था। मां को चिंता लगी रहती कि उसके मर जाने के बाद क्या होगा। दिन मां अपने निकम्मे और नाकारा बेटे को दुनियादारी समझाने बैठी तो बेटे को गुस्सा आ गया। गुस्से में फरसे से मां की गर्दन उड़ा दी। कटी गर्दन से आवाज आयी, बेटे तुम्हें चोट तो नहीं लगी? मां की यह सूरत हम भारत के हर गांव और घर में पाते हैं। इस दुलारी मां को बाजार ने प्रोडक्ट बना दिया है मदर्स डे के रूप में। जो मां अपनी कोख में नौ महीने हमें रखे और अंगुली पकड़कर दुनियादारी के लायक बनाये, उस मां के लिये हमारे पास बस एक दिन! सुन कर और सोचकर मन जख्मी हो जाता है। इस निगोड़े बाजार ने न केवल मां के लिये एक दिन तय किया है बल्कि हर रिश्तों के लिये उसके पास एक एक दिन है। बाजार चाहता है कि साल के तीन सौ पैंसठ दिन, दिन न रहकर उत्सव बन जाएं। इन उत्सवी दिनों के बहाने बाजार चल पड़े। करोड़ों का सौदा-सुलह हो। जिसे उपहार मिले उसका मन खिल जाए और जिसे न मिले वह कलह मचा डाले। देने वाले को गरूर हो कि वह कितना महंगा तोहाफा दे सकता है और पाने वाला निहाल कि उसे कितना प्यार किया जाता है। जो उपहार न खरीद पाये, वह खुद को निकम्मा समझे और जिसे तोहफा न मिले, वह अपने आपको दुर्भाग्यशाली। 
सच तो यह है कि उपहार पाने वाला, देने वाला, नहीं पाने वाला और न दे सकने की औकात रखने वाले का रहबर है तो बाजार। बाजार कहता है कि साल के तीन सौ चौंसठ दिन मरती मां को दवा न दो, तीर्थ पर न ले जाओ, उसके पास बैठकर उसकी गोदी में सिर रखकर आराम करने का तुम वक्त न निकाल सको लेकिन मंहगा उपहार देकर यह जरूर जताओ कि बेटा कितना बड़ा सौदागर बन गया है। यही हाल बाकि दिनों के लिये करो। बाजार ने लोगों को ऐसा मोह लिया है कि अब रिश्ता, रिश्ता न होकर वस्तु हो गया है। विनिमय बन गया है। कमाऊ पत्नी अधिक पाने की लालसा में पति को महंगे उपहार देती है तो गृहिणी अपने को प्रूफ करती दिखती है कि उसके उपहार में कितनी चिंता छिपी हुई है। भाई, बहन, मां-बाप अब रिश्ते नहीं, वस्तु हैं और वस्तुओं का विनिमय करना बाजार ने बेहतर ढंग से सिखा दिया है।
बाजार की जकड़ इतनी मजबूत है कि आप छूट नहीं सकते। जहां तक मुझे याद है मेरी मां जीते जी श्राद्ध पक्ष में पंचाग में तिथि देखा करती थी। मेरे पूछने पर बताती थी कि जो हमारा साथ छोड़ गये हैं, उसके लिये श्राद्ध पक्ष में एक एक दिन तय होता है। इस दिन उनके पसंद का खाना बनता है और मंदिरों में दान करने के साथ पक्षियों को भी खिलाया जाता है। विश्वास यह रहता है कि यह खाना मृतात्मा तक पहुंचता है। आज मां नहीं है, भाभी यह रस्म निभा रही है। कल भी मुझे पता नहीं था कि जो खाना मृतक की पसंद के अनुरूप बनता है, वह उसे मिलता है कि नहीं, आज भी मुझे यकिन नहीं है। इतना जरूर है कि यह एक दिन अपनों को याद करने का होता है। बाजार भी कहता है कि अपनों को एक दिन याद करो। दोनों के याद करने में एक फर्क है तो यह कि बाजार कहता है कि जिंदा व्यक्ति को बरस के हर दिन नहीं, एक दिन याद करो और भूल जाओ और हमारी परम्परा कहती है साल में एक दिन याद करो लेकिन दिल से करो। रिश्तों को समझो और उसका मान करना जानो। बाजार कहता है डे के आगे डेथ है और इसके बाद है भूल जाने की परम्परा किन्तु दिवस की परम्परा हमसे कहती है दिवस का अर्थ है रिश्तों को कभी न भूलने की परम्परा। 

रविवार, 13 जून 2010

अपनी बात

रिश्तांे को ढोने से तो अच्छा ही होगा...
तलाक शब्द किसी भी भारतीय स्त्री की मन और उसकी अस्मिता को तार तार कर देता है। एक भारतीय स्त्री चाहे कितनी भी तकलीफ में क्यों न हो, वह आखिरी सूरत तक तलाक से दूर रहना चाहती है। वह अपना मान और प्रतिष्ठा एक परिवार में ही देखती है और इसके बाद उसकी चिंता के केन्द्रबिन्दु में उसके बच्चे होते हैं। वह मन से भले ही तलाक लेने की ख्वाहिश रखती हो लेकिन उसे व्यवहार रूप् में तब्दील नहीं कर पाती है। पति जितना भी निकम्मा और नालायक हो लेकिन स्त्री के लिये बच्चे उसकी पूंजी होते हैं। एक स्त्री जानती है कि तलाक के बाद यह निर्मम पुरूष किसी और स्त्री को अपने भोग के लिये ले आयेगा। आने वाली दूसरी स्त्री मन से कम, मतलब से ज्यादा आती है और उसके लिये किसी और के बच्चे को पालने की न तो कोई मंशा होती है और न लगाव। यहां तक कि जिसके साथ और जिसके लिये वह आयी है, उससे भी उसका संबंध केवल देह तक होता है और बाकि समय वह उन सुविधाओं का अधिकाधिक लाभ उठाना चाहती है जिससे अब तक वह वंचित रही है। कहने का अर्थ यह कि अक्सर दूसरी शादी भावना कम, मजबूरी ज्यादा होती है और यह मजबूरी एकाएक भौतिक लाभ प्राप्ति की ओर ले जाती है। इन स्थितियांे से बचने के लिये कोई भी भारतीय स्त्री तलाक के लिये राजी नहीं होती है। स्त्रियों की दशा पर एक लम्बे समय तक अध्ययन करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि पति की ज्यादती की शिकार केवल हाउस वाइफ ही नहीं होती है बल्कि उनकी स्थिति भी दयनीय होती है जो कामकाजी होती हैं। यहां पर आकर तलाक के लिये हालात बदल जाते हैं। कामकाजी स्त्री आर्थिक रूप से मजबूत होने के कारण तलाक की पहल कर पाती है जबकि घरेलू स्त्री आर्थिक असुरक्षा, पीहर की चिंता और कहीं उसकी छोटी बहनें हों तो उसके ब्याह की चिंता में वह रोज डूबती-मरती रहती है। स्थिति जब काबू से बाहर हो जाये तब उसे इस स्थिति पर पहुंचना पड़ता है जिसे तलाक कहते वर्तमान में स्त्री का चेहरा बदल रहा है। वह अब स्वतंत्र व स्वाधीन जीवन जीना चाहती है और इसके लिये उसे तलाक की जरूरत होती है।
तलाक को लेकर भारतीय मन अभी भी संकुचित दृष्टि रखता है। काननू में भी अनेक किस्म की दिक्कतें हैं और इसके चलते तलाक पाना आसान नहीं होता है। वास्तव में अभी जो कारण बताये गये हैं, वे तलाक की बुनियाद के पहले कारण हैं जैसा कि पत्नी-पति का आपस में नहीं निभना। सहज रूप् से दोनों को अलग होने में अनेक किस्म की दिक्कतें हैं और इन दिक्कतों से उबरने का सहज उपाय है एक दूसरे पर लांछन लगाना। कई बार इसकी हदें पार हो जाती हैं। समय के साथ अब तलाक लेने के इच्छुक दम्पत्तियों की संख्या में वृद्वि होने लगी है और जरूरी है कि तलाक की प्रक्रिया का सरलीकरण किया जाए। वास्तव में यह मानवाधिकार का मामला माना जाना चाहिए। हालांकि भारत इस मामले में सकरात्मक दृष्टिकोण रखता है और आखिरी तक कोशिश करता है कि दोनों के मन बदल जाएं और वे एक हो कर रहें लेकिन जब ऐसा संभव नहीं होता है तब तलाक ही एकमात्र रास्ता बच जाता है। यूं भी रिश्तों को ढोने और घुट घुट कर मरने के बजाय स्वतंत्र जीवन जीने का हक दिया जाना ही स्त्री के लिये श्रेयस्कर होगा।

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...