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January 12, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेरे अपने शब्द

-मनोज कुमार  शब्दों की अपनी ताकत होती है और यही शब्द कभी फूल की तरह रिश्तों को महकाते हैं तो कभी शूल की तरह चुभते भी हैं. तथाकथित अंग्रेजी शिक्षा के मारे हम लोग अपने देशज बोली-बात को भुलकर उनकी नकल करने पर उतारू हैं. इस नकलीपन से हम नकली अंग्रेजियत को तो ओढ-बिछा रहे हैं लेकिन असली दुनिया से दूर होते जाते हैं. जब कभी मैं अपने आसपास छोटे बच्चों से आप संबोधन से बात करते सुनता हूं तो मितली सी आने लगती है. बच्चों से जब तक तु-रे से बात न करो, मिठास का रिश्ता बनता ही नहीं है. जवान होती बेटी अपनी अम्मां से कभी जब लडिय़ाने पर उतर आती है तो अम्मां तु ऐसा मत कर जैसे वाक्य उसके मुंह से झरने लगते हैं. यहीं पर आकर मां-बेटी का रिश्ता दोस्ती में बदल जाता है. बेटी मां से खुल जाती है और वह दोनों एक अच्छे दोस्त बन जाते हैं. बच्चों के साथ भी यही है. स्वयं को आप का संबोधन पाकर वे खुद होकर दूरी बना लेते हैं. गांव-कस्बों में आज भी बड़ों को तुम कह कर संबोधित किया जाता है तो इसके पीछे उनका मान गंवाना नहीं है बल्कि रिश्ते की मिठास को बढ़ाना है. 
हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि हमारे पास हर रिश्तों के लिये अल…