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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल

मनोज कुमार  मानव समाज ने स्वयं को अनुशासित रखने के लिये अधिकार और दायित्व शब्द का निर्माण किया है किन्तु यही दो शब्द वह अपनी सुविधा से उपयोग करता है. पुरुष प्रधान समाज की बात होती है तो अधिकार शब्द प्राथमिक हो जाता है और जब स्त्री की बात होती है तो दायित्व उसके लिये प्रथम. शायद समाज के निर्माण के साथ ही हम स्त्री को दायित्व का पाठ पढ़ाते आ रहे हैं और यही स्त्री जब अधिकार की बात करती है तो हमें नहीं सुहाता है लेकिन हम इतने दोगले हैं कि खुलकर इस बात का विरोध भी नहीं करते हैं. बल्कि इससे बचने का  रास्ता ढूंढ़ निकाल लेते हैं. कदाचित विश्व महिला दिवस का मनाया जाना इसी दोगलेपन का एक अंश है. ऐसा एक दिवस पुरुषों ने अपने लिये क्यों नहीं सोचा या साल के पूरे 365 दिन स्त्रियों के लिये क्यों नहीं दिया जाता? बातें कड़ुवी हैं और शायद एक बड़ा वर्ग इन बातों से असहमत हो लेकिन सच से आप कब तक मुंह छिपाते रहेंगे? यह भी हैरान कर देने वाली बात है कि एक तरफ तो स्त्री को महिमामंडित करते हुये इतनी रचनायें लिखी जाती हैं कि सचमुच में भ्रम होने लगता है कि जितना सम्मान हम स्त्री को देते हैं, वह सम्मान दुनिया में कह…