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हदों से परे होता समाज

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मनोज कुमार 
मेरे एक बुर्जुग मार्गदर्शक मित्र हैं। वे भोपाल की तेजी से बढ़ रही एक कॉलोनी में रहते हैं। उन्होंने मुझसे शिकायत की कि उनके घर के आसपास एक प्रभावशाली व्यक्ति ने अपने घर का दायरा सड़क तक बढ़ा लिया है। उनका यह बढ़ा हुआ दायरा वैधानिक है या अवैधानिक, किसी को नहीं मालूम। बात आयी और गयी। मेरे मन के भीतर यह बात सालती रही। हालांकि इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है कि बढ़ा हुआ दायरा वैधानिक है या वैधानिक किन्तु इस बात से फर्क जरूर पड़ता है कि इस सीमा को लांघने से एक व्यवस्था छिन्न-भिन्न होती है। सीमा यानि अपनी हद लांघने से हमारे जीवन में विविध किस्म की समस्याओं का जन्म होता है। अपनी हद में नहीं रहने वाले लोग ही समाज के लिये समस्या हैं। हद लांघने की बात को जरा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे तो पूरी तस्वीर सामने आ जाएगी।
एक पिता अपने बेटे से इसलिये परेशा है कि वह उनकी अवज्ञा कर रहा है अर्थात हद लांघ रहा है। एक शिक्षक की तकलीफ यही है कि विद्यार्थी उदंड होते जा रहे हैं और गुरूजनों की अवज्ञा कर रहे हैं। यहां भी मामला हद लांघने की है। एक सास अपनी बहू की अवज्ञा से परेशान है। एक अधिकारी अपने क…