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मीडिया की जवाबदारी इससे आगे भी हो

मीडिया की जवाबदारी इससे आगे भी हो
मनोज कुमार

फूड कानून के विरोध में मध्यप्रदेश में सभी किस्म के खाद्य सामग्री के विक्रेताओं ने तीन दिन विरोधस्वरूप अपनी दुकानें बंद रखीं। इन तीन दिनों में मामूली तनातनी के अलावा कहीं से कोई बड़े हादसे की खबर नहीं आना इस बात का संकेत था कि लोग समझ रहे थे कि इस कानून का अर्थ क्या है। किस तरह मल्टीनेशनल कम्पनियों को बढ़ावा देने और बाजार उनके अनुरूप उनके हवाले करने की साजिश की जा रही है। इस तीन दिनी हड़ताल में अनेक छोटे व्यापारियों के घर में चूल्हा भी नहीं जला लेकिन वे इसके बावजूद हड़ताल से टस से मस नहीं हुए। मीडिया ने खाद्य व्यापारियों के हड़ताल में जाने से पहले और जाने के बाद तक के तीन दिनों में पूरा कव्हरेज दिया। आम आदमी को होने वाली खान-पान की दिक्कतों से लेकर छोटे व्यवसायियों के घरों में चूल्हा नहीं जलने तक की खबर दी गई। इन सबके बावजूद मीडिया इस पूरे मामले में अपनी भूमिका का निर्वहन करने के बजाय खबरें छापने और दिखाने की खानापूर्ति करती रही।
इस मसले पर यह सवाल उठता है कि मीडिया की भूमिका ऐसे जनहित के मामलों में क्या होना चाहिए? मीडिया की जवाबदारी क्या है? क्य…