जनजातीय संग्रहालय मध्यप्रदेश की पहचान एवं शान



संस्कृति मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा से सुनील मिश्र की बातचीत

मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग ने प्रदेश में निवासरत जनजातियों की संस्कृति, उनके रहन-सहन पहनावे खेती-किसानी की पद्धति और उनके आध्यात्मिक लोक से नगरीय जीवन का परिचय कराने के उद्देश्य से की है। जनजातियों के जीवन से नगरीय सभ्यता को बहुत कुछ अभी सीखना बाकी है। हजारों वर्षों से जनजातियाँ थोड़े से संसाधनों में जीवन को रसपूर्ण जीती रही हैं। हमने अपने नगरीय जीवन में भौतिक संसाधनों को इतना अधिक एकत्र कर लिया है कि हमारे घरों में खुद के रहने के लिए जगह कम हो गई है। हमारे समाज में चारों ओर अजीब तरह की विद्रूपताएँ फैली हुई हैं। पूरा समाज एक तरह की गलाकाट प्रतियोगिता में संलिप्त है। इससे हमें यह तो समझना ही होगा कि संसाधनों का जीवन को रसपूर्ण बनाने में कोई विशेष योगदान नहीं है। हमारा सौभाग्य था कि हमें संस्कृति जैसा महकमा मिला। जनजातीय समुदायों और उनकी संस्कृति को नजदीक से देखने का अवसर मिला। मुझे ऐसा लगता है कि संग्रहालय जिन उद्देश्यों से बनाया गया है, आने वाले समय में उसकी सार्थकता नगरीय समाज में हमें देखने को मिलेगी।

शिल्प निर्माण के संसाधन
जनजातीय जीवन अपने परिवेश में उपलब्ध संसाधनों से ही अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करता है। मिट्टी, घास, बाँस, लकड़ी, रस्सी, लोहा, पुआल और इसी तरह की बहुत सी ऐसी सामग्रियाँ हैं, जिनसे वह अपने कला-कौशल को भी प्रदर्शित करता है। संग्रहालय में भी उन्हीं वस्तुओं का इस्तेमाल किया गया है जो क्षेत्रीयता में इन समुदायों द्वारा उपयोग की जाती हैं।

शिल्प संग्रहण से स्रोत
मध्यप्रदेश में निवासरत सभी जनजातीय समुदायों से उनके जीवन से जुड़े उपयोग के सभी सामान प्रदेश के सभी पचास जिलों से संग्रहीत किये गये हैं। जनजातीय अध्येताओं, विशेषज्ञों, सर्वेक्षणकर्ताओं की हमनें एक टीम गठित की जिसने प्रदेश के सभी जिलों में जाकर वहाँ से सामग्रियाँ संग्रहीत की हैं।
जनजातीय परम्पराएं
संग्रहालय में जनजातीय मौखिक परम्पराओं के बहुविध शिल्पों को मुख्यतयः प्रदर्शित किया जा रहा है। जनजातियों का पूरा जीवन ही एक न एक परम्परा से आबद्ध होता है। देशज ज्ञान पद्धतियाँ पारस्थितिक जीवन के सभी प्रश्नों और समाधानों से सम्पुष्ट होती हैं। अलग से किसी पद्धति या निर्देशन की आवश्यकता जनजातियों को नहीं होती। उनकी अपनी सामाजिक और आध्यात्मिक मान्यताएँ हैं, जिसके प्रति समाज का प्रत्येक व्यक्ति उत्तरदायी है। कोई भी व्यक्ति उन मान्यताओं को उल्लंघन नहीं कर सकता है। यह अलिखित आचरण किसी भी नैतिक समाज से कहीं अधिक कारगर है। संग्रहालय में प्रदर्शित अलग-अलग कला बिम्ब जनजातीय समृद्ध परम्परा का प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं।

अतिथि राज्य की दीर्घा
यह सही है कि संग्रहालय में एक दीर्घा अतिथि राज्यों के जनजातीय वैभव को प्रदर्शित करने के लिए बनाई गई है। पहली बार हम यहाँ अभी हाल ही में अलग हुए छत्तीसगढ़ राज्य के जनजातीय वैभव को प्रदर्शित कर रहे हैं। एक दीर्घा अतिथि राज्यों पर केन्द्रित करने के पीछे यह उद्देश्य है कि हम दो-चार वर्ष में इसमें अलग-अलग राज्यों की जनजातीय संस्कृति को प्रदर्शित करते रहेंगे। एक समय ऐसा हो सकेगा कि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में पूरे भारत के जनजातीय वैविध्य को इस तरह से हम संग्रहीत कर पायेंगे और उनके व्यवस्थित प्रदर्शन का प्रबंधन भी कर सकेंगे। वैसे भी राज्य राजनैतिक विभाजन के परिणाम हैं। सांस्कृतिक एकात्मकता का इससे कोई लेना-देना नहीं है। सांस्कृतिक रूप से सभी जनजातियों में एक स्तर पर समरूपता देखने को मिलती है। इस तथ्य को हम तभी प्रमाणिक बना सकते हैं जब एक ही स्थान पर हम उसके समरूप को देख सकें।

शिल्प निर्माण जनजातीय कलाकारों की भूमिका
मध्यप्रदेश में निवासरत 41 जनजातीय समूहों में से प्रमुख रूप से उन जनजातियों को आमंत्रित कर शिल्प रचने का दायित्व दिया गया था जिनसे सांस्कृतिक विविधता का आभास होता है। कोल, बैगा, भारिया, सहरिया, कोरकू, भील और गोण्ड जनजातियों तथा इनकी उपजातियों के अलग-अलग माध्यमों में काम करने वाले शिल्पी आमंत्रित किये गये। संग्रहालय में ही रहकर इन कलाकारों ने अपनी ही परम्पराओं को रचने का उद्यम किया है।

संग्रहालय स्थापना में मुख्यमंत्री का प्रोत्साहन
माननीय मुख्यमंत्री जी का यह स्पष्ट मानना रहा है कि विकास सिर्फ भौतिक समृद्धि ही नहीं है। जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं कि प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री ने सभी आयुवर्गों के लिए कोई न कोई एक योजना सफलतापूर्वक क्रियान्वित की है, जिसके परिणाम और सुफल से आप सभी परिचित हैं। इस बात पर अधिक कुछ कहने का यह मंच नहीं है। बावजूद इसके माननीय मुख्यमंत्री जी की उदारता का ही यह परिणाम है कि यह संग्रहालय स्थापित हुआ है। मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक समृद्धि को एक ही जगह पर देखने-समझने और अनुभूत करने वाले जिज्ञासु पर्यटकों, जनजातीय जीवन में उत्सुक अध्येताओं, विशेषज्ञों और शोधार्थियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में काम करेगा, ऐसी आशा है।

संग्रहालय के संदर्भ में जनजातीय कलाकारों का सोच
जनजातीय जीवन और उनके सौन्दर्यबोध को अभिव्यक्त करने के केन्द्र के रूप में संग्रहालय बनाये जाने का दायित्व जब हमारे विभाग को दिया गया, तब ही इसकी चुनौती का आभास हो गया था। भोपाल में जनजातियों का संग्रहालय बनाना वह भी तब जब एक ओर मानवीय उद्विकास को अभिव्यक्त करता मानव संग्रहालय और दूसरी ओर कला वैशिष्ट के केन्द्र के रूप में स्थापित भारत भवन स्थित हों। इन दोनों ही संस्थानों में जनजातियों के बहुविध शिल्प अपनी तरह से प्रदर्शित हैं। हमने राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञों की एक कोर कमेटी बनाई, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े विशेषज्ञों को रखा गया, उनसे चर्चायें की गईं। शुरुआती दौर में ही हमने विशेषज्ञों के सामने यह चुनौती प्रस्तुत कर दी थी कि हमारे जनजातीय जीवन के प्रदर्शन में कोई स्थिरता न आये, जिससे प्रवहमान परम्परा को किसी तरह की क्षति हो। विशेषज्ञों ने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुये एक ऐसा केन्द्र सृजित किया है, जिसमें उनका परिवेश और उससे जुड़ी जीवन की चुनौतियाँ यथानुकूल प्रस्तुत करने की कोशिश की है।
प्रदेश भर से अलग-अलग समुदायों के जनजातीय कलाकारों को बुलाया गया, उन्हें बिना किसी भी प्रकार का निर्देश दिये हुये अपने ही जीवन और उपयोग की वस्तुओं को रचने का आग्रह किया गया और इन कलाकारों ने पूरी निष्ठा और सरलता के साथ उसे कर दिखाया। मेरे अनुभव में जनजातीय कलाकारों से बात करने पर यह आया कि वे विचार में कम व्यवहार में अधिक हैं। मुझे ऐसा लगा कि संस्कृति विभाग का यह उद्यम उन्हें भी पसन्द आया है।

संग्रहालय की गतिविधियां

प्रायः यह आम अवधारणा है कि संग्रहालयों में सभ्यताओं, स्मृतियों का अवशेष प्रदर्शित किया जाता है। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय लुप्तप्राय या मृतप्राय वस्तुओं के प्रदर्शन का केन्द्र न होकर जीवन के व्यवहार की सामग्रियों के प्रदर्शन का केन्द्र है। जीवन्तता ही इस संग्रहालय की अभिनवता है। इसी अनूठेपन को बचाने के लिए हमारी यह कोशिश होगी कि दीर्घाओं में प्रदर्शित प्रत्येक शिल्प दैनन्दिन व्यवहार में भी रहें। इसके लिए प्रत्येक दीर्घा में विषय के अनुकूल एक न एक परिवार हमेशा यहाँ विद्यमान रहेगा। अपने जीवन जीने की कला से नगरीयजनों को भी सम्पृक्त करेगा। यहाँ निर्मित घर या अन्य रूपाकार रोज लिपाई-छपाई-पुताई-रंगाई-धुलाई-पुछाई आदि की मांग करते हैं। यह सब भी प्रदर्शन का हिस्सा होगा।
जनजातियाँ आकार में छोटी तथा सीमित संख्या में वस्तुओं का उपयोग करती हैं। यह उनके जीवन और उनकी परम्परा का हिस्सा है। हमारे नगरीय जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा अब जबकि छोटे आकार के घरों में निवास करने को मजबूर हुआ है, उसे और जो हर तरह की बाजारू वस्तुओं से घिरा हुआ है, उसे भी आकार में छोटी वस्तुओं की जरूरत आन पड़ी है। ऐसे में जनजातीय तकनीक और समकालीन जरूरतों अनुसार बहुविध शिल्पों एवं वस्तुओं के रचने के केन्द्र के रूप में भी इस संग्रहालय को उपयोग होगा। वर्षभर अलग-अलग माध्यमों की कार्यशालाएँ यहाँ चलती रहेंगी। इस तरह का हम प्रयास कर रहे हैं।

निजी अनुभव
संग्रहालय का लोकार्पण 06 जून, 2013 को भारत के माननीय राष्ट्रपति महोदय कर रहे हैं। मध्यप्रदेश की जन आकांक्षा भी यही थी कि अपनी तरह के अकेले और अनूठे इस जनजातीय संग्रहालय के अवलोकन से मध्यप्रदेश की जनजातीय सांस्कृतिक समृद्धि के साक्षी माननीय राष्ट्रपति महोदय हों।
जैसा कि मैंने आपसे पहले भी निवेदन किया है कि इस संग्रहालय की स्थापना का सारा श्रेय मध्यप्रदेश की जनजातियों को ही है। संस्कृति मंत्री होने के नाते मैं बार-बार संग्रहालय को बनते हुये देखने के लिये गया हूँ। वहाँ काम कर रहे कलाकारों से बात भी हुई है। उनका उत्साह देखकर मुझे हमेशा ऐसा लगा कि यह संग्रहालय जैसे उनका घर हो और वे पूरी आत्मीयता और निष्ठा के साथ अपने काम को तल्लीनता से करते हुये दिखे।
जनजातीय समाज की रंग कल्पना और शिल्प सर्जना के क्षेत्र की व्यापकता पर
वैसे तो इस प्रश्न का उत्तर कलाकारों के पास है। मेरी भूमिका एक दर्शक से अधिक नहीं है। हाँ, यह जरूर है कि मुझे एक ही विभाग में दस वर्षों से काम का अवसर प्राप्त हुआ है। इन वर्षों में कर्मियों और कलाकारों से एक व्यक्तिगत पहचान निर्मित हुई है। जाहिर है इससे मुझे अधिक लाभ हुआ है। जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ हमारे आस-पास जिन चीजों की कमी होती है, उसे हम कृत्रिम रूप से पूरा करते हैं। जनजातीय रंग कल्पना के मूल में यही तथ्य काम करता हुआ दिखता है। जनजातीय कलाएँ प्रकृति के प्रति धन्यता को प्रकट करती हैं। सम्भवतः यही कारण है कि सर्जना का क्षेत्र बहुत विस्तीर्ण और व्यापक है। रचना भी इसी आयाम में देखी जानी चाहिये।

अध्येताओं, शोधार्थी, विद्यार्थियों और जनसामान्य के लिए
जनजातीय जीवन्तता की प्रवहमानता को हमने सिर्फ संग्रहालय से गुजारा है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि इस संग्रहालय का प्रत्येक रूपाकार जनजातियों ने स्वयं अपनी परम्परा और मान्यता के तहत स्थापित किया है। हमने इस संग्रहालय के माध्यम से समकालीन भाषा और स्थिति में प्रदर्शित भर किया है। वे लोग जो सम्पूर्ण मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को अनुभूत करना चाहते हैं, वे एक ही स्थान पर इसको देख और अपनी जिज्ञासाओं को शान्त कर सकेंगे। मेरा मानना है कि सही अर्थों में किसी सभ्यता को समझने के लिए उसका समकालीन भाष्य होना चाहिये। हमारी शैक्षणिक पद्धतियाँ हमें बहुविध जानकारियों के लिए समृद्ध बनाती हैं। संज्ञान की अनुभूति के लिए हमें परम्पराओं की सन्निधि में जाना ही पड़ता है। इन अर्थों में यह संग्रहालय उत्सुकों के काम का होगा, ऐसी आशा है।
जनजातीय आख्यानों, मिथकों, परम्पराओं के चुनाव के पीछे परिकल्पना
मैंने आपको पहले भी बताया है कि राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञों की एक समिति हमने गठित की थी। इसके साथ ही वाचिक पक्षों पर गहन अध्ययन और सर्वेक्षण का काम करने वाले विशेषज्ञों को भी हमनें जोड़े रखा। हमारी विभागीय संस्था पहले से ही वाचिक साहित्य परम्पराओं पर काम कर रही थी। जनजातीय आख्यानों के संकलन और अनुवाद पहले से ही हमने प्रकाशित किये हुये हैं। वह सभी विभागीय अनुभव इस संग्रहालय की स्थापना में काम आया। दीर्घाओं के विषय निर्धारण से यह स्पष्ट हो गया था कि किस कथा का उपयोग कहाँ किया जाना है और यह भी कि कौन सी कथा रूप ग्रहण करने में समर्थ है। कथाओं के चयन में यह बारीक बात जरूर ध्यान में रही कि पारम्परिकता को किसी भी स्थिति में क्षति नहीं पहुँचनी चाहिये। कथाओं का शिल्पांकन होना एक तरह से परम्परा के विस्तार की तरह से देखा जाना चाहिये।

जिज्ञासुओं के लिए प्रावधान
संग्रहालय में प्रदर्शित सभी प्रादर्शों के बारे में हिन्दी और अंग्रेजी में जानकारी पर्यटकों, दर्शकों के लिए उपलब्ध रहेगी। हमारी योजना आने वाले समय में ऑडियो-गाइड-टचस्क्रीन आदि आधुनिक तरीकों से जनपदीय-जनजातीय-हिन्दी-अंग्रेजी भाषाओं में दृश्य-श्रव्य माध्यम में उपलब्ध कराने की रहेगी। हम यह भी प्रयास करेंगे कि जनजातीय जीवन की दैनन्दिन गतिविधियों के वर्ष चक्र पर आधारित फिल्में निर्मित की जायें जिनका प्रदर्शन संग्रहालय में सुनिश्चित हो। जनजातीय जीवन में हो रहे परिवर्तन के आकलन में भी इस तरह के दस्तावेजीकरण बहुत महत्वपूर्ण होंगे।
संग्रहालय में प्रदर्शित सभी प्रादर्शों के बारे में चाक्षुष वर्णन तो होंगे ही, हमारी यह भी कोशिश होगी कि प्रदर्शित शिल्प के बहाने उसके आत्यंतिक अर्थ को अभिव्यक्त किया जाये। लक्ष्य स्पष्ट है कि जनजातीय चैतन्य को साक्षर लोगों के मध्य सम्मानजनक दर्जा प्राप्त हो।
जनजातीय समुदाय की कलाभिव्यक्ति के मानक अथवा समकालीनता 
जनजातियों की कलाभिव्यक्ति का आधार परम्परा है। रचनाधर्मिता तो समकालीन होगी, परम्परा की सन्निधि से कलाभिव्यक्ति से आशय है कि एक स्मृति का संसार रचना में काम करता है। चूंकि रचनाधर्मिता में स्मृति काम करती है, इसलिए प्रयोग के लिए जगह तो है किन्तु, परम्परा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा जनजातीय समुदाय से आने वाले किसी कलाकार के द्वारा किया जाता है, तो वह सामुदायिक रचना नहीं मानी जाती।

शहरी और आदिवासी समाजों से संवाद के संदर्भ में
हमने पहले भी इसके बारे में आपको बताया है कि इस संग्रहालय की स्थापना के मूल विचार ही नगरीय और जनजातीय समाजों के बीच निर्मित खांई को पाटने के उद्देश्य से किया गया है। मेरा मानना है कि जीवन के आत्यंतिक अनुभव के सार को भौतिक रूप से जीने वाला जनजातीय समाज सिर्फ जीवन की बात करने नगरीय समाज से किस रूप में कम समृद्ध है। इसको प्रायोगिक रूप से इस संग्रहालय के माध्यम से दिखाना और समझाना है। एक बार यह समझ यदि पैदा हो जाये कि कम से कम वस्तुओं में जीवन के आनन्द का अनुभव किया जा सकता है, तो शायद वस्तुओं की दौड़ में लगे नागर समाज को कुछ क्षण के लिए ही सही ठहराव की अनुभूति दिलाने में मदद करेगा।

आयोजनधर्मी छवि से अलग कार्य 
जीवन, नर्तन और मौन दोनों की ही मांग करता है। ठीक वैसा ही एक विभाग के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिये। प्रदर्शन और संस्कृतियों के दस्तावेजीकरण दोनों ही संस्कृति विभाग के दायित्व हैं। मुझे प्रसन्नता है कि विभाग इन दोनों ही आयामों में सक्रिय है। महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य दोनों ही क्षेत्रों में सम्पादित किये हैं। प्रसंगवश हम आपको बताना चाहेंगे कि हमारे विभाग ने उज्जैन, ग्वालियर और जबलपुर में बहुउद्देश्यीय सांस्कृतिक संकुल, ग्वालियर में राजा मानसिंह कला केन्द्र का निर्माण, भोपाल में राज्य नाट्य विद्यालय तथा सांची में बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना और तीर्थ एवं मेला प्राधिकरण का गठन अभी हाल ही में किया गया है। बहुआयामी कला, संस्कृति और परम्परा के अध्ययन, प्रदर्शन, संरक्षण और सम्मान की दिशा में विभाग ने कार्य किया है और निरंतरता में जारी भी है। इन प्रयासों से संस्कृति विभाग ने राज्य में एक बेहतर माहौल बनाया है। निश्चय ही इससे गौरव का अनुभव होता है।

संग्रहालय में प्रदर्शित प्रादर्शों की प्रतिकृतियों के विक्रय की योजना
जैसा कि देश और दुनिया के संग्रहालयों में सोवीनियर शॉप हैं। वैसा ही प्रावधान यहाँ भी हमने किया है। जनजातीय विभिन्न पारम्परिक शिल्पों के अलावा यह संग्रहालय शिल्पों के समकालीन उपयोग को लेकर कुछ प्रयोगधर्मी कार्य भी करेगा। इससे नगरीय समुदायों के उपयोग के लिए शिल्पों की एक ओर जहाँ निर्मिति और खपत होगी, वहीं जनजातियों के लिए रोजगार के स्थायी अवसर भी प्राप्त होंगे। जब तक सुनिश्चित बाजार का प्रबंधन नहीं हो, तब तक परम्परा के कलारूपों के संरक्षण की बात सार्थक नहीं होगी।

दृश्य श्रव्य रिकार्डिंग और अन्य तकनीकी पहलू
जीवन के बहुविध प्रवाह को इस संग्रहालय के माध्यम से प्रदर्शित किया जाना सुनिश्चित किया गया है। जाहिर है, इस लक्ष्य को पूरी तरह से रूपायित नहीं किया जा सकता। जीवन के बहुविध ऐसे पक्ष हैं, जिन्हें आधुनिक माध्यमों में दस्तावेजीकृत कर ही दूसरों के लिए प्रदर्शित किया जा सकता है। जनजातीय जीवन को समग्रता में देखने-समझने में जितना उपयोगी उनका रूपगत संसार है, उससे कहीं अधिक अभौतिक जीवन है, जिसे अभिव्यक्त करने के लिए दृश्य-श्रव्य माध्यमों के बगैर नहीं बताया जा सकता। हमने इसी लक्ष्य से संग्रहालय में एक आधुनिक ऑडियो-वीडियो स्टूडियो की स्थापना भी की है। आने वाले समय में हम प्रदेश की प्रमुख जनजातियों के पूरे वर्षचक्र में घटने वाली घटनाओं, स्थितियों का दस्तावेजीकरण करेंगे और उन्हें इस संग्रहालय के माध्यम से प्रदर्शित भी करेंगे।

संग्रहालय के प्रति निजी अनुभव
अनुभव, जिसे हम अपने पूर्वजों, समाज, परिवेश, भूगोल, रोजमर्रा की चुनौती, हास-परिहास से सीखते हैं। जाहिर है, यह सब भाषा में नहीं होता। इसका अधिकांश मौखिक है, जिसे हम देखते हुये सीखते हैं। यही आचरण हम अपने आने वाली पीढ़ी से भी करते हैं। संग्रहालय के संदर्भ में देशज ज्ञान से हमारा यही आशय है कि जनजातीय जीवन का अनुभूत ज्ञान यहाँ रूपायित और प्रदर्शित हो। साक्षर समाज भी अनुभूत ज्ञान से अपना तादात्म्य स्थापित करे।
हमारी ज्ञान परम्परा में एक आश्रम का प्रावधान ही वानप्रस्थ के रूप में किया गया है। इसके बाद के आश्रम को ज्ञान परम्परा ने संन्यास आश्रम के नाम से अभिहीत किया है। स्पष्ट है संन्यास के लिए वानप्रस्थी होना अनिवार्य है। यह सारा प्रबंधन लोक समाज ने किया था। जो वन में पहले से ही निवासरत है, उसे ज्ञान के लिये कहाँ जाना है, जनजातीय संग्रहालय को बनते हुये देखने से हमें ऐसा हमेशा महसूस हुआ है कि जनजातीय जीवन और उसमें सामग्रियों की सीमित उपस्थिति उनके वानप्रस्थी और संन्यस्थ होने का प्रमाण है।
प्रसंगवश एक बात और कहना चाहूँगा, वह भी संग्रहालय को बनते हुए देखने से ही अनुभूत हुई है। वह यह कि जनजातियों के कला-रूपाकारों में आवृत्तियाँ अनिवार्य रूप से विन्यस्त हैं। एक ही आकार, आकृति और रूप को बार-बार एक ही कृति में रचा हुआ हमें देखने को मिलता है। पुनरावृत्ति मन के स्वभाव के विपरीत का आचरण है। मन हमेशा नये की खोज में उत्सुक है। एक क्षण भी किये का दोहराव नहीं करना चाहता। धरती के सभी धर्मों की गहरी देशणाओं और आचरणों में यही तो अनुस्यूत है, जिससे मन की गति को ठहराव मिले। मुझे यह हमेशा लगता है कि ज्ञान का यदि व्यवहारिक रूप देखना है, तो जनजातियों की कलाओं में उसकी प्रमाणिकता को अनुभव किया जा सकता है।

भविष्य में संग्रहालय के विस्तार की योजना
मध्यप्रदेश में निवासरत जनजातियों के जीवन, मौखिक साहित्य, कला परम्परा और उनकी मान्यताओं के बहुविध शिल्प स्वरूपों के प्रदर्शन के साथ ही यह भी योजना है कि जनजातीय बोलियों और बोलियों से निर्मित संस्कृति और उसके साहित्य का व्यापक प्रचार-प्रसार और स्वीकार बने, इसके लिए सामुदायिक रेडियो और जनजातीय चैनल की स्थापना की जायेगी। 
यह संग्रहालय जनजातीय जीवन्तता को अभिव्यक्त करने का एक अन्तर्राष्ट्रीय मंच बने। स्मृति अवशेष को संग्रहीत कर प्रदर्शित करने की संग्रहालय की मर्यादा से परे यह संस्थान अपनी जगह बनाये। जनजातीय संस्कृति, उनके देशज ज्ञान और सौन्दर्यबोध का व्यापक प्रचार-प्रसार और नागरिकजनों में स्वीकार बने, यहीं आकांक्षा है।

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