उत्सव


लोकपर्व बस्तर दशहरा
-मनोज कुमार
बस्तर दषहरा हिन्दुस्तान के प्रमुख तीन दषहरा पर्वों में एक है। छह सौ साल पुराना दषहरा पर्व लोकसमाज का आयोजन है। दुनिया में अपनी तरह के इस इकलौते लोकपर्व पूरी दुनियां में विख्यात है। यह व्यक्ति विशेष की जागीरदारी नहीं बल्कि सामूहिक धार्मिक और सामाजिक भावना को अभिव्यक्त करने का माध्यम है। राजतंत्र ने बस्तर दशहरा को पोषित किया और लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक धरोहर की तरह सहेजा जा रहा है। बस्तर दशहरा की भव्यता को देखने और इसका आनंद लेने के लिए दुनिया भर से हजारों की संख्या में सैलानी आते हैं। बस्तर यूं भी पर्यटकों के लिए स्वर्ग रहा है और बस्तर दशहरा इसमें श्रीवृद्धि करता रहा है। समय की मार ने भी इस बहुरंगी आयोजन की चमक खोने नहीं दी। परम्परा और संस्कृति का अद्भुत् मिलन पर्व दशहरा बस्तर की विशिष्ट पहचान है। सैलानियों के लिए बस्तर दशहरा कौतूहल और नवीनता लिए हुए है तो स्थानीय निवासियों के लिए प्रतिष्ठा से कम नहीं। विश्व में ताजमहल अपने अद्भुत कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है तो बस्तर दशहरा का सैकड़ों वर्ष पुराना इतिहास उसके वैभव में चारा चांद लगाता है। पर्यटकों के लिए मनोहारी बस्तर दशहरा अपनी विविधताओं के लिए हमेंशा से आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है वहीं बस्तर की सांस्कृतिक परम्परा इसकी जीवंतता का प्रमाण है। राजतंत्र मंे सन् 1408 में बस्तर दशहरा का श्रीगणेश हुआ था। पर्यटन के नए अवसर के रूप में बस्तर दशहरा को रेखांकित किया गया। लगभग ढाई महीने अर्थात् 75 दिनों तक मनाया जाने वाला बस्तर दशहरा दुनियां में मनाये जाने वाले पर्वों में सबसे लम्बा पर्व है। बस्तर दशहरा विविध किस्म के 12 रस्मों को लेकर मनाया जाता है। हरियाली अमावस्या के दिन बस्तर दशहरा का श्रीगणेश होता है जो दशहरा मनाये जाने के चार-पांच दिनों तक चलता रहता है। बारह रस्म मनाये जाने की प्रथा है उसमें पाठा यात्रा और स्तंभारोपण पहली रस्म है। दो माह पूर्व अमावस के दिन दशहरा रथ के निमित्त जंगल से लकड़ी का लट्ठा लाकर सिंह द्वार के पास रख देते हैं और परम्परानुसार उसकी पूजा की जाती है। पाठा यात्रा के बाद भादो शुक्लल पक्ष तेरस के दिन जगदलपुर स्थित सीरासार में स्तंभारोहण की प्रथा पूरी की जाती हैं। इस रस्म में लकड़ी के दो शुभ स्तंभ पर्व के नाम से स्थाति किया जाता है। बस्तर दशहरा पर्व एकल न होकर सामूहिक भावना का पर्व है सो रथ के लिए लकड़ी लाने के लिए अगरवारा, कचोरपाटी, और रायकेटा परगनों के विभिन्न गांव निश्चित किए गए हैं। इसी तरह झाड़ उमरगांव और बेड़ा उमरगांव के बढ़ई तथा लुहार रथ का निर्माण करते हैं। जबकि रथ खींचने के लिए करंगी, सोनाबाल और केशरपाल के ग्रामीण रस्सी बनाते हैं। बस्तर दशहरे के काछन गाड़ी का दायित्व अंचल के हरिजन कुटुम्ब निभाता आ रहा है। छह सौ वर्षों से अधिक पुराने बस्तर दषहरा को लेकर अनेक किवदंतियां हैं तो कई रोचक तथ्य भी। बस्तर दषहरा दषहरे की तिथि से ढाई माह पहले ही आरंभ हो जाता है। बस्तर दशहरा वास्तव में आज जिस स्वरूप में है, वह अपने आरंभिक काल में नहीं था। चमकोट राजवंशीयकाल के राजा पुरुषोत्तम राज्य के बड़े डोंगर से पैदल चलकर जगन्नाथपुरी जाने के लिए निकले। नियमानुसार भगवान जगन्नाथजी का स्मरण करते हुए दण्डवत करते जाना पड़ता था। इसके लिए भी डगों का क्रम पहले सह तय था। यह एक कष्टप्रद यात्रा थी। लेकिन देवभक्त राजा पुरुषोत्तम ने एकाग्र होकर यात्रा की। भगवान जगन्नाथ राजा की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें रथपति होने का आशीर्वाद दिया। इसी के साथ आरंभ हुआ बस्तर दशहरा में रथ का उपयोग। लगभग छह सौ साल पहले राजा पुरुषोत्तम देव दिया गया। बस्तर दशहरा का अनुपम उपहार छत्तीसगढ़ की पहचान बन गया। बस्तर का दशहरा का सबसे महत्वपूर्ण रस्म काछिल गादी है। काछिन गादी का अर्थ होता है काछिन देवी की गद्दी जो कांटों की होती है। कांटेदार झूले की गद्दी पर आसीन होकर जीवन में कंटकजयी होने का संदेश सांकेतिक हुआ करती है। अश्विनी मास की अमावस्या के दिन काछिन गादी का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। परम्परा के अनुसार प्रतिवर्ष माहरा जाति की एक नाबालिग बालिका पर काछिन देवी आरूढ़ होती है। काछिन देवी आने पर लड़की को एक कांटेदार झूले पर लिटा कर सिरहा उसे झुलाता है। पूजा-अर्चना के बाद दशहरा मनाने की स्वीकृति मिल जाती है और पर्व का शुभारंभ हो जाता है। काछिन देवी बस्तर में मिरगान, चंडार और तिकड़ा अनुसूचित जनजातियों की ईष्टदेवी मानी जाती हैं। इसी क्रम में रैला पूजा होती है। मिरगान जाति के इस पूजन में महिलाएं मिरगानी बोली में लोकगाथा प्रस्तुत करती है। नवरात्र जोग बिठाई की परम्परा बहुत पुरानी है। कभी कोई हल्का ग्रामीण दशहरा पर्व में बाधा न आ पाए, इस कामना के साथ योग साधना में बैठ गया था और तब से यह परम्परा चली आ रही है। जो अन्य रस्में दशहरा पर्व से जुड़ी हैं उामें परिक्रमा फूल रथ की, निशा जात्रा, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी, मुरिया दरबार आदि हैं। मुरिया दरबार की विशिष्ठ परम्परा रही है। मुरिया संबोघन सामूहिक होने के कारण ही अश्विनी शुल्क 12 को प्रतिवर्ष आयोजित होने वालंे बस्तर दशहरे के इस अंतिम और महत्वपूर्ण कार्यक्रम को मुरिया दरबार के नाम से जाना जाता है। मुरिया दरबार में शहरी तथा ग्रामीण दोनों वर्गों ंके प्रतिनिधि अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। पुरातन परम्परा के अनुसार इस दरबार में पहले राजा और प्रजा के बीच जरूरी मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान होता हुआ करता था और उसके निराकरण के मार्ग निकाले जाते थे। दरबार में नौकरशाही के मनमानी के विरूद्व शिकायतें दर्ज करायी जाती थी। इन शिकायतांे पर अविलम्ब फैसला कर न्याय दिलाया जाता था। मुरिया दरबार उन दिनों एक तंत्रीय व्यवस्था के अंतर्गत प्रजातांत्रिक व्यवस्था को गरिमा प्रदान किया जाता था। छै साल पुरानी परम्परा का निर्वहन आज भी सतत रूप से हो रहा है। समय के साथ इस व्यवस्था में परिवर्तन हुआ है और राजा के स्थान पर प्रशासनिक अधिकारी बैठते हैं लेकिन एक पुरानी निष्पक्ष न्याय प्रणाली के प्रमाण आज भी समाज के लिए प्रादर्श बना हुआ है। काछिन जात्रा बस्तर दशहरा का एक महत्वपूर्ण रस्म है। दशहरा निर्विघ्न सम्पन्न होने की खुशी में काछिन जात्रा तथा दशहरे में आमंत्रित देव-देवियों के सम्मान में विदा से पूर्व कुटुम्ब जात्रा के शिष्टाचारमूलक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पथरागुड़ा जाने के रास्तें पर एक पुराना काछिन मंडप आज भी स्थापित है वहां पहुंच कर काछिन देवी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित किया जाता है। बस्तर का गंगा मुंडा तालाब वर्षेां बाद भी अपनी पुरानी गरिमा के साथ कुटुम जात्रा के आयोजन की प्रतीक्षा में खड़ा रहता है। परम्परागत रूप से पूजा कर पशुओं की बलि दी जाती है। इस विदाई कार्यक्रम को ओहाड़ी संबोधन दिया गया है। परम्परा, संस्कार और संस्कृति का अदभुत मिलन का नाम है बस्तर दशहरा और इस ऐतिहासिक पर्व की शान आज छह सौ साल बाद भी कायम है। इन वर्षोंं में स्थितियां बदलती गईं। कई उतार चढ़ाव बस्तर ने देखे। राजतंत्र से लोकतंत्र के इस सफर में बस्तर दशहरा के उत्साह में कभी कमी नहीं आयी। वास्तव में बस्तर दशहरा आदिम जीवन का महज एक उत्सव नहीं बल्कि संकल्प है और इसे वे प्रण-प्राण से पूरा करते हैं। दरअसल दशहरा मात्र एक उत्सव नहीं बल्कि जनजीवन का वह जीवंत अवसर होता है जहां जिस्म तो कई दिखते हैं लेकिन आत्मा एक होती है और इस मिलन को देखने देश-दुनिया के लोगा इकट्ठे होते हैं, बस्तर दशहरा की निराली शान।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण

मीडिया का बाजारवाद

रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का अंक रेडियो पर