मनोज कुमार
रिश्तों में घुलती कड़वाहट और एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू समाज का डरावना चेहरा हम रोज़-ब-रोज़ देख रहे हैं. कहीं अपने गैर-कानूनी रिश्तेे के लिए पति को मारकर ड्रम में भर देने का मामला हो या पति के फोन पर बात करने से रोकने पर कॉफी में ज़हर देने का. इधर पति भी कम जल्लाद नहीं है और इनके किस्से तो पुराने हो चुके हैं या पत्नी को काट कर गाड़ देना या फिर टुकड़े कर फ्रिज में भर देने की वारदात हम नहीं भूले हैं. तंदूर कांड तो याद में होगा ही और आज भी ऐसी घटनाएँ लगातार जारी है. पति-पत्नी ही क्यों, किसी बेटा माँ की जान ले रहा है तो कहीं माँ बेटे की जान ले रही है. पिता असुरक्षित है तो घर के बच्चे भी डर के साये में जीवन बसर कर रहे हैं. ऐसी ख़बरें ना केवल हमें चौंकाती हैं बल्कि डराती भी हैं. सवाल यह है कि हमारा समाज इतना असहिष्णु कैसे हो गया? हिंसा की इस प्रवृत्ति ने तमाम किस्म के नैतिक मूल्यों को ताक पर रख दिया है. आधुनिक जमाने के साथ चलने की हरसत ने रिश्तों को बेमानी कर दिया है. आखिऱ हम किस समाज का निर्माण कर रहे हैं? कई बार इस बात पर भरोसा नहीं होता कि हम क्या सचमुच उस गाँधी के देश में हैं जहाँ अहिंसक ढंग से अंग्रेेजी शासन को बेदख़ल कर दिया गया. उस गाँधी के विचारों को हम दरकिनार कर रहे हैं जिसे आदर्श मान कर पूरा विश्व उनके रास्ते पर चलने को तैयार है. गाँधी विचारों को दरकिनार करने का एक सुनियोजित चाल चला जा रहा है। लेकिन इस घटाघोप अँधेरे में रोशनी की एक किरण अभी भी टिमटिमा रही है. आज भी बड़े तादाद मे ऐसे लोग हैं जो अहिंसक ढंग से फैसले लेकर जीवन को कलह से मुक्त कर रहे हैं. वे असहिष्णु भी नहीं हैं और ना ही उनका मन कलुषित है. ऐसे लोग मिसाल कायम करते हैं. पिछले दिनों दो ऐसी ही ख़बर ने इस बिगड़ते दौर में संबल के रूप में सामने आया है. एक $खबर उस मजदूर की कहानी से जुड़ा हुआ है जिसका फैसला गाँधी विचारों से सम्पन्न दिखता है. बिगड़ते और डरे हुए समाज के लिए यह आश्वस्ति भी है. पूरा मामला दिलचस्प ही नहीं, प्रेेरणादायक है. जिस मजदूर की हम चर्चा कर रहे हैं, उसके फैसले को जानकर लगता है कि उम्मीद की किरण शेष है. मसला यह है कि वह मजदूर अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ आनंद से जीवन बसर कर रहा था. एक तूफान आहिस्ता से उसके परिवार में आ गया. उसकी पत्नी का प्रेेम किसी अन्य व्यक्ति से हो गया. इस बात की $खबर जब उसे लगी तो उसने तैश नहीं खाया. मन में हिंसक विचार लाकर पत्नी या उसके प्रेमी को मारने की कोई साजिश नहीं रची बल्कि उसने दोनों के समक्ष उनकी शादी का प्रस्ताव रखा. प्ऱस्ताव ही नहीं रखा बल्कि स्वेच्छा से उनकी शादी करा दी. उस मजदूर का बड़प्पन देखिये कि उसने इस नवदम्पत्ति को आश्चस्त किया कि वह बच्चों को पाल लेगा. यह फैसला इस बात की तस्दीक करता है कि अपनी गैर-मौजूदगी के बाद भी गाँधी आज भी भारतीय मन में रचे-बसे हैं. इस सिलसिले में एक अन्य ख़बर भी हमारे लिए सुखद है. उस वृद्ध नवदम्पत्ति का उल्लेख करना भी सुखद और लाजिमी लगता है. यह कहानी भी रोचक है. यह वृद्ध दम्पत्ति आज 80 बरस के हैं और 64 साल पहले प्रेेम विवाह कर लिया था. तब परिवार और समाज ने इसे स्वीकार नहीं किया. समय अपनी गति से चलता रहा. परिवार फैलता गया. दोनों वृद्ध दादा-दादी और नाना-नानी बन गए. 64 साल बाद उनके बच्चों ने तय किया और 80 बरस की उम में वृद्ध दम्पत्ति का पूरे रीति-रिवाज से शादी करवा दी. यह खबर हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि जब मामूली बात में परिवार टूट रहे हैं. लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन रहे हैं तब परिवार की यह एकजुटता उम्मीद की लालटेन की तरह हमारे बीच कहीं टंगा हुआ है. यह उन लोगों के लिए भी नज़ीर है जो अपने ही स्वार्थों में लिप्त होकर परिवार की अहमियत भूल जाते हैं. उस वृद्ध दम्पत्ति का 80 बरस की उम्र में ब्याह होना कोई मायने नहीं रखता है लेकिन इसके पीछे जो ‘मैं’ की जगह ‘हम’ की भावना को ज़ाहिर करता है, वह अर्थपूर्ण है. यह ख़बर भी गाँधी विचारों को विस्तार देता है. ख्यातलब्ध गाँधीवादी विचारक अरविंद मोहन अपने लेख का जब शीर्षक देते हैं कि ‘गाँधी की चिंता मत करिए’ तब मन में यह सवाल बरबस उठता है कि समय गाँधी की चिंता करने का नहीं है अपितु उन पर चिंतन करने का है. असहिष्णु और हिंसक होते समाज और समय में गाँधी विचारों को एक स्पेस देने का है. इस बात से इंकार किया जाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है कि गाँधी और गाँधी विचार समय की आँधी में ढह जाएँगे. उन्हें आप जितना गिराना, मिटाना चाहेंगे, वे उतनी ही शक्ति के साथ उठ खड़े होंगे और पहले से ज्यादा प्रभावी रूप से. कोई मजदूर और कोई परिवार भी गाँधी के रास्ते पर चलकर लालटेन की तरह संदेश देते दिखेगा और हम स्वागत करेंगे. यह संदेश उन लोगों के लिए भी है जो रिश्तों में खटास घोल रहे हैं. हम उम्मीद से हैं कि यह असहिष्णुता और अहिंसक मन एक दिन निर्मल होकर रहेगा.
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें