बातचीत

नौटंकी के स्वरूप में कोई बदलाव नहीं- मधु अग्रवाल
थिएट्रिकल कम्पनी की डायरेक्टर मधु अग्रवाल से मनोज कुमार की बातचीत

लोक कलाओं का संसार अद्वितीय है। भारत के प्रत्येक राज्य की अपनी लोक संस्कृति और कलायें हैं। यह कला और संस्कृति किसी भी राज्य की विशिष्ठ पहचान होती है। लोक कला और संस्कृति ही सही अर्थाें में किसी राज्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। आम बोलचाल की भाषा में कहा जाए कि लोककला और संस्कृति किसी राज्य की ब्रांड एम्बेसडर होती हैं, तो कुछ अनुचित नहीं होगा। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में समय समय पर इन लोकलाओं और संस्कृतियों का संगम समागम होता रहा है। मध्यप्रदेश संस्कृति संचालनालय के निमंत्रण पर देश के हर राज्यों की लोककला और संस्कृति का यहां समागम होता रहा है। पिछले दिनों उत्तरप्रदेश की प्रतिष्ठित प्रतिनिधि लोकनाट्य का तीन दिवसीय समारोह नौटंकी का आयोजन हुआ। नौटंकी उत्तरप्रदेश की पुरातन लोकनाट्य परम्परा है। समय के साथ दूसरी लोककलाओं की तरह नौटंकी की लोकप्रियता में कमी आयी है किन्तु व्यक्तिगत प्रयासों के चलते नौटंकी का स्वरूप आज भी कायम है। उत्तरप्रदेश के नौटंकी दल के सर्वेसर्वा स्वर्गीय त्रिमोहनलाल के साथ बारह बरस की उम्र में नौटंकी को एक नयी पहचान देने वाली गुलाबबाई ने थिएट्रिकल कम्पनी की स्थापना की। नौटंकी विधा में उनके विशिष्ट योगदान के लिये पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी सम्मान नईदिल्ली व उत्तरप्रदेश का, यश भारती सम्मान प्रदान किया गया। नौटंकी इस प्रथम महिला कलाकार की विरासत को उनकी बेटी मधु अग्रवाल सहेज रही हैं। नौटंकी प्रदर्शन के लिये भोपाल आयीं मधु अग्रवाल ने बातचीत में नौटंकी कला की कुछ बारकियां बतायीं तो यह भी कहा कि समय के साथ इस विधा में भी कदाचित परिवर्तन की जरूरत है। नौटंकी के वर्तमान स्वरूप एवं भविष्य पर थिएट्रिकल कम्पनी की डायरेक्टर मधु अग्रवाल से मनोज कुमार की बातचीत के मुख्य अंश –
सवाल- नौटंकी के बारे में बतायें?जवाब- नौटंकी उत्तरप्रदेश की एक लोकप्रिय एवं परम्परागत लोकनाट्य है। इस विधा में अभिनय एवं गायिकी की श्रेष्ठ प्रस्तुति देखने को मिलती है। नौटंकी के माध्यम से सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ अलख जगाने की कोशिश होती है तो बहुत ही हल्के फुल्के ढंग से नौटंकी तिलस्म व स्वप्नलोक में दर्शकों को ले जाती है।सवाल- नौटंकी की कानपुर शैली क्या है?जवाब- उत्तरप्रदेश के अलग अलग हिस्सों में नौटंकी का अलग अलग स्वरूप देखने को मिलेगा। कानपुर के अलावा अन्य हिस्सों में नौटंकी में गायन को प्रधानता दी जाती है जबकि कानपुर शैली में अभिनय की प्रधानता है। वाद्ययंत्र वही हैं और हर स्थान पर नौटंकी की प्रस्तुति में इसका उपयोग होता है।सवाल- तीस के दशक में नौटंकी का जो स्वरूप था और आज दो हजार दस में नौटंकी के स्वरूप में क्या परिवर्तन आया है और आप इसे किस प्रकार देखती हैं?जवाब- मुझे नहीं लगता है कि कोई खास बदलाव इन सालों में हुआ है। नौटंकी की जो परम्परा चली आ रही थी, आज भी वो कायम है। नौटंकी एक लोकविधा है और लोक जमीन से जुड़ कर ही अपने अस्तित्व को बचा पाता है।सवाल- तो क्या यह मान लिया जाए कि नौटंकी का परम्परागतस्वरूप जस का तस कायम है और उसमें वही रवानगी कायम है?जवाब- हां, बिलकुल है किन्तु इसके साथ ही मैं यह भी बताना चाहूंगी कि नयी पीढ़ी के लोग इस विधा से अपने आपको जोड़ नहीं पा रहे हैं। नये कलाकारों के नहीं आने से नौटंकी के स्वरूप में थोड़ा बहुत तो फर्क आना स्वाभाविक है। एक समय था जब नौटंकी रात रात भर चलती थी लेकिन आज बदलते समय में लोगों के पास वक्त नहीं है और वक्त की कमी के कारण नौटंकी के प्रति लोगों में लगाव कम होता दिख रहा है। नौटंकी ही क्यों, हर लोककलाओं के साथ यह हो रहा है तो इस दौर में भला नौटंकी कैसे अछूती रह सकती थी।सवाल- समस्या आप जानती हैं तो इसके हल के लिये भी आपने कुछ सोचा होगा। ऐसा क्या करने जा रही हैं जिससे नौटंकी से दूर होते कलाकार और दर्शक वापस नौटंकी की ओर लौट सकें?जवाब- आपका कहना ठीक है। आज जमाना ग्लैमर का है और नौटंकी में इस बात की खास कमी है। ठेठ देसीपन से नौटंकी का भला नहीं होना है। कहीं कहीं पर नौटंकी में ग्लैमर का पुट मिलने लगा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नौटंकी से दूर होते लोगों को बांधने में ग्लैमर कहीं काम आ जाए।सवाल- आपको कहीं नहीं लगता कि नौटंकी की लोकप्रियता में कमी के और भी कुछ कारण हैं?जवाब- निश्वित रूप से। फूहड आयोजनों ने नौटंकी की लोकप्रियता को, उसकी गरिमा को और उसकी प्रतिष्ठा को आंच पहुंचाया है। वे लोग नौटंकी कर रहे हैं जिन्हें इसका पूरा ज्ञान नहीं है। नौटंकी महज एक प्रदर्शनकारी कला नहीं है बल्कि इससे बढ़कर वह एक लोकसाधना है। नौटंकी मेरे लिये मां की तरह है। सवाल- गुलाबबाई ने फिल्मों में नौटंकी की प्रस्तुतियां दी। आज के संदर्भ में आप क्या महसूस करती हैं।जवाब- मेरी मां गुलाबबाई नौटंकी की पहली महिला कलाकार थीं। उन्होंने नौटंकी को एक नयी प्रतिष्ठा दिलायी। उनके काम को मैं आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही हूं। उन्होंने फिल्म तारामती, लैला मजनूं तथा मुझे जीने दो में अभिनय किया। तब और आज में बहुत फर्क आ गया है। आज की फिल्मों में नौटंकी का गलत स्वरूप प्रस्तुत किया जा रहा है। मैं इससे बहुत दुखी हूं।सवाल- नौटंकी के प्रति सरकारी पहल को कितना प्रभावकारी मानती हैं?जवाब- नौटंकी के प्रति उत्तरप्रदेश का रवैया पूरी तरह उदासीन है। इस परम्परागत लोकनाट्य के संरक्षण और संवर्धन के लिये सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। कलाकारों को भी किसी प्रकार का संरक्षण सरकार से नहीं मिल रहा है जिसके कारण नवोदित पीढ़ी का नौटंकी के प्रति रूझान ही नहीं बचा है। सवाल- भोपाल आकर कैसा महसूस कर रही हैं?जवाब- मध्यप्रदेश संस्कृति संचालनालय के आमंत्रण पाकर मैं बेहद खुश हूं। यहां आकर लगा कि वास्तव में लोककलाओं और संस्कृति के संरक्षण के लिये सरकार न केवल चिंतित हैं बल्कि काम भी कर रही है। यहां आना मेंरे लिये सुखद रहा। अनुशासित और रूचिकर दर्शकों का साथ ने मेरे उत्साह को और भी बढ़ाया है।

टिप्पणियाँ

  1. मनोज भैया ,
    बढिया कविता है ...चलो इसी बहाने आपको तलाश ही लिया .
    संजीव शर्मा

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