मंगलवार, 6 जनवरी 2026

हाथ बाद में सेंक लेना भिया, इंदौर तो बचा लो



प्रो. मनोज कुमार
इंदौर इस समय दुखी है, परेशान है. अपने बच्चों और साथियों के अकाल मौत से उसके माथे पर सिकन दिख रही है. वह बेबस है. सिस्टम ने उसे कलंकित कर दिया है. साफ पीने का पानी भी उस इंदौर के लोगों को नसीब ना हो, यह देख-सुन कर लोकमाता अहिल्या भी कांप उठी होगी. कल तक इंदौर स्वच्छतम शहर होने पर इतरा रहा था. आज स्वच्छता का यही तमगा उसे शर्मसार कर रहा है. इंदौर के भगीरथपुरा में जो कुछ घटा वह दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, शर्मनाक है. मानवता पर कलंक सा मामला है. भगीरथपुरा में जो कुछ और जो कुछ घट रहा है, उसने स्वच्छता के एक-एक धागे खोलकर रख दिया है. यह सबकुछ आईने की तरफ साफ है. कोई लाग-लपेट नहीं. इंदौर नागरिक बोध का शहर है. इस शहर के बाशिंदों को पता है कि स्वच्छता किसे कहते हैं और स्वच्छ कैसे रहा जाता है. देशभर के लिए आइडियल बना इंदौर एकाएक नेपथ्य में चला गया है. उसकी स्वच्छता पर सवाल उठाये जा रहे हैं. सवाल गैरवाजिब नहीं होगा लेकिन क्या आज जब भगीरथपुरा के साथ प्रदेश के अनेक जिले और कस्बा बिसूर रहे हैं. हर जगह मौत का सबब बने दूषित पानी की शिकायत मिल रही है, ऐसे में स्वच्छता का ऑपरेशन करना जरूरी लगता है? क्या यह सही समय है हाथ सेंकने का?  इसके पहले कलमवीरों, सोशल मीडिया के नायकों को इंदौर की कमजोरी नजर क्यों नहीं आयी? अचानक क्या हुआ कि इंदौर का रेशा-रेशा उधेड़ा जा रहा है. भगीरथपुरा की घटना महज घटना नहीं है बल्कि यह इंदौर सहित पूरे देश को सबक लेने का एक सबक है कि जिंदगी इतनी सस्ती नहीं होना चाहिए. सिस्टम को इतना लापरवाह और निर्दयी नहीं होना चाहिए.
खैर, इंदौर एकाध बार नहीं, 6 बार देश के स्वच्छतम शहर घोषित किया गया. थोड़ा पहले जाइए और पन्ने पलट कर देखिये, चैनलों की पुरानी पड़ गई रिकार्डिंग देखिए कि इंदौर के स्वच्छतम शहर ऐलान किए जाने के बाद इंदौर की यशोगाथा की पटकथा लिखी गई. हर कोई आगे था. इंदौर में ही सिस्टम का हिस्सा रहे एक बड़े अधिकारी ने तो इंदौर की स्वच्छता पर किताब तक लिख डाली तो कुछेेक लोगों ने पी-एचडी पर कर लिया. लिखने, बोलने और बताने में इंदौर की ऐसी कहानी सुनायी गई कि गर्व से सिर ऊँचा उठ गया था. खरामा-खरामा जिंदगी चलती रही. यही सब लोग जुट गए थे इंदौर को सातवीं दफा स्वच्छ शहर बनाने के लिए. सब आँख मींचे बैठे थे. किसी को शहर की कमियां नहीं दिख रही थी. किसी ने सिस्टम को नहीं खंगाला था. सब ठीक था, जैसे आम दिनों में होता आया है. दुर्भाग्य से दिल दहला देने वाली भगीरथपुरा की घटना सामने आयी. दूषित पानी से अकेले बीमार नहीं पड़े बल्कि जान भी जानें लगी. एक-दो मौतें होती तो बात थम जाती या थोड़े दिनों बाद शांत पड़ जाता. यहां तो कलेजे तक आ जाने वाले आंकड़ों ने दहशत में डाल दिया. इंदौर से दिल्ली तक की सत्ता हिल गई. हालाँकि थोड़े पहले ही छिंदवाड़ा में कफ सिरप से ऐसी ही दिल दहलाने वाली घटना हुई थी. अब एक और. 
ऐसे मामलों में खुद को चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया का सक्रिय होना लाजिमी था. मेन स्ट्रीम का मीडिया ने अपना दायित्व ओढ़ा और सिस्टम की खामियों को बाहर लाया. पीडि़तों को हरसंभव इलाज और मदद मिले, इसके लिए सिस्टम को एक्टिव किया और इसके साथ ही ऐसे कलमवीरों की फौज खड़ी हो गई जिसने कभी स्वच्छ इंदौर को आइडिल बताया था, वह आज इंदौर को लपेट रहा है. उसे देश का सबसे गंदा शहर नजर आने लगा है. हर गली-चौराहों से गंदगी और शहर को बदसूरत बनाने वाली तस्वीरें वायरल हो रही हैं. ये सच है और ऐसा होना भी जरूरी है. लेकिन क्या कोई बताएगा कि बारिश के दिनों में जब इंदौर के सडक़ पानी से बेतरतीब हुआ जा रहे थे. नालियाँ बजबजा रही थीं और यातायात बेकार और बेकाम हो गया था, तब इंदौर की स्वच्छता पर किस किसने और कब सवाल उठाया था? क्यों नहीं बताया गया कि इंदौर स्वच्छ नहीं, मलिन शहर है. तब इसे बढ़ती आबादी के कारण रोजमर्रा की परेशानी बता कर छोड़ दिया गया था. एक और कारण है कि तब जनहानि नहीं हुई थी. 
बेशक इंदौर की कमियाँ गिनाइए, कोसिए, कटघरे में खड़ा कीजिये लेकिन ध्यान रखिए कि इंदौर को स्वच्छतम शहर बनाने में हम भी साथ थे. दूर-देश से कोई आता और कागज का टुकड़ा भी फेंक देता तो इंदौरी लपक कर कहते-भिया नहीं, इंदौर स्वच्छ शहर है. इसे स्वच्छ रखने में सहयोग कीजिए और खुद उस कागज को डस्टबीन के हवाले कर देते. आज क्या हो गया? मीडिया की संवेदनशीलता यहां दिखना चाहिए, यह मेरी निजी मान्यता है. कितने साथी भागीरथपुरा गए और परिवारों का हाल देखा? कितनी मानवीय संवेदना वाली खबरें की? कितने लोग उन परिवारों के दुख में शामिल हुए? कितने लोग और कोई दूषित पानी ना पिये, इसके लिए कैम्पेन चलाया? कितनों को जागरूक किया. नागरिक बोध के इस गौरवशाली इतिहास वाले शहर में हाथ सेंकने चले आए भिया, ये सब बाद में कर लेना. अभी मरहम की जरूरत है. अभी दवा और संवेदना की जरूरत है. लड़ तो हम बाद में भी लेंगे. अभी हाथ में हाथ देकर साथ चलने का वक्त है. सरकार की जिम्मेदारी सरकार पूरा करेगी लेकिन समाज की जवाबदारी तो हमी को करना होगा. बयानवीरों को ठिकाने लगाइए लेकिन भूल मत जाना कि हमारी जवाबदारी इससे आगे की और बड़ी है. सत्ता आती जाती रहती है. शहर का गौरव पर बात उठी तो हम सब को भुगतना होगा. संवेदना के रास्ते गौरव का शीश हमेशा ऊँचा रहता है और इस बात को हम सबको समझना होगा. देर-अबेर भगीरथपुरा सहित प्रदेश के अन्य हिस्सों के हालात ठीक होने लगेंगे. लेकिन जोश में हमने कुछ कर दिया तो उसका खामियाजा हमें सदियों तक भुगतना होगा. भिया, हाथ बाद में सेंक लेना, पहले इंदौर को बचा लो.

 

हाथ बाद में सेंक लेना भिया, इंदौर तो बचा लो

प्रो. मनोज कुमार इंदौर इस समय दुखी है, परेशान है. अपने बच्चों और साथियों के अकाल मौत से उसके माथे पर सिकन दिख रही है. वह बेबस है. सिस्टम ने ...