गुरुवार, 21 मई 2026

‘जेन जी’ का नया एडीशन और ‘कॉकरोच’ का ‘हिट’


प्रो. मनोज कुमार

2014 को समाज नहीं भूला होगा और अब उनकी याद में 2026 भी दर्ज हो गया है। 2014 में ‘जेन जी’ का भारत में उदय हुआ था। भ्रष्टाचार और युवाओं के सपनों को लेकर अन्ना हजारे की अगुवाई में लाखों युवा सडक़ पर उतर आए थे। उम्मीद और भरोसे के साथ देश की राजधानी दिल्ली की सडक़ें युवाओं से पट गई थी। इसी समय चाय पर चर्चा करती भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। केन्द्र की सरकार पर भाजपा इस ‘जेन जी’ के रास्ते सत्ता में काबिज हो गई तो केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली राज्य की सत्ता पर ‘जेन जी’ के सहारे बैठ गए। 2014 की पुनरावृत्ति सडक़ पर नहीं, सोशल मीडिया पर दिख रही है जब गुस्साये एक नौजवान ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से संगठन खड़ा कर दिया। हैरानी नहीं होना चाहिए बल्कि पड़ताल होना चाहिए कि ‘जेन जी’ इस समय कितना उबल रहा है और देखिए कि कुछ घंटों में हजारों से लाखों और लगभग इस समय तक करोड़ के आसपास युवा जुड़ गए हैं। 2014 के आंदोलन और आज के कॉकरोच जनता पार्टी के बीच कोई साम्य नहीं है लेकिन जेपी आंदोलन, अन्ना आंदोलन और आज के इस सोशल मीडिया आंदोलन में एक साम्य है, वह कि युवा जब घायल होता है तो वह संसार बदल डालता है। इसे आप कॉकरोच जनता पार्टी कहें या नेपाल के ‘जेन जी’ का नया एडीशन, युवाओं का गुस्सा उफान पर है। 

कॉकरोच जनता पार्टी से जुडऩे का आह्वान भी अलग किस्म का है। यहाँ उसे सरकार बदलने या कथित बयान पर गुस्सा निकालने की कोई अपील नहीं किया गया बल्कि सीधे-सीधे उन लोगों से जुडऩे का अनुरोध किया गया जो बेरोजगार हों, आलसी हों और ज्यादतर ऑनलाइन रहते हों। यह अपील भी नाराजगी जाहिर करने का अपनी किस्म का शायद पहला हो लेकिन देखते ही देखते करोड़ों की संख्या में लोग जुडऩे लगे। सोशल मीडिया के महारथी भी इस तूफान से औचक और हैरान रह गए। उनकी सारी कोशिशें नाकाम हो गई और ‘कॉकरोच’ ने ऐसा ‘हिट’ मारा की सबके सब दुबक गए। पहले तो इस बात को समझ लें कि आखिर कॉकरोच जनता पार्टी का सोशल मीडिया एडीशन क्यों और कैसे खड़ा हुआ? कहा जाता है कि इस समूह का जन्म एक कथित टिप्पणी के विरोध से हुआ। यह भी स्पष्ट कर दें कि जिस टिप्पणी को लेकर युवा आक्रोशित हुआ है, उस टिप्पणी पर सफाई भी दी जा चुकी है। आमतौर पर देखा और समझा जा सकता है कि अनेक बार बयानों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है और सोशल मीडिया में ऐसे बयान को वायरल कर दिया जाता है। वायरल करने वाले का एकमात्र मकसद होता है अधिकाधिक धन अर्जन करना लेकिन दूसरी तरफ इस वायरल मैसेज से समाज में जो अराजकता उत्पन्न होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है, उसकी आहट सुनायी देने लगी है। भारत के इतिहास में यह पहला मौका नहीं है, अनेक बार ऐसी स्थिति आयी है किन्तु इस बार इसे सतही तौर पर लिया जाना थोड़ा खतरनाक हो सकता है। सोशल मीडिया का प्रभाव जितना बड़ा है, उसका बिजनेस मॉडल कहीं उससे ज्यादा बड़ा है। इस बात को भी जेहन में रखकर सोचना होगा। 

2014 का अन्ना आंदोलन आज भी लोगों के जेहन में है और केन्द्र की सत्ता परिवर्तन का एक बड़ा कारक इसे माना जाता है। यह आज के कॉकरोच जनता पार्टी की भाँति उदय ना होकर मुद्दा आधारित था। लोकपाल माँग के साथ अन्ना आंदोलन की स्क्रिप्ट लिखी गई थी। 

जिस लोकपाल की माँग को लेकर आंदोलन खड़ा किया गया था, वह पूर्ण हुआ या नहीं, यह अलग विषय है। हालाँकि इसी आंदोलन से केजरीवाल ने ‘आप’ पार्टी को जन्म दिया। लोकप्रियता का आलम यह था कि लोकसभा में जलवा दिखाने वाली भाजपा को नाक के नीचे ‘जेन जी’ वाले केजरीवाल ने सत्ता से बाहर ही रखा। यह सब सुनियोजित नहीं था, जो हो रहा था, वह अप्रत्याशित था। लोगों के बीच संदेश गया कि जेपी आंदोलन के बाद देश में फिर एक बार परिवर्तन की लहर चल पड़ी है। दिल्ली की सत्ता में आप पार्टी ने कई प्रयोग किए लेकिन आखिरकार उनको भी मतदाताओं ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। लोकतंत्र में मतदाता भगवान होता है और वह चाहे जो निर्णय दे, वही मान्य होता है। पराजय के बाद आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक है। 

यहाँ यह बता देना सामयिक होगा कि जिन लोगों को जेपी आंदोलन याद है, जिन लोगों को अन्ना आंदोलन का स्मरण है, वे याद रखें कि संभवत: देश में ऐसी ही युवा आंदोलन से असम में पहली बार प्रफुल्ल मोहंता सरकार बनी थी। इसकी उम्र भी कोई दसेक साल की रही। सवाल यह है कि युवा जोश ठंडा पड़ गया या कि मतदाता जागरूक हो गए जिन्होंने तीसरी बार मोहंता को अवसर नहीं दिया। कुछ ऐसा ही मामला बंगाल से रूखसत की गई ममता बेनर्जी को दिखता है। ऐसे ही जोश-खरोश के साथ बंगाल के मतदाताओं ने टीएमसी को पंद्रह वर्षों तक सत्ता सौंपी थी लेकिन विकल्प मिलते ही उन्हें सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। फिर वही विलाप कि चुनाव में धांधली की गई। खैर, यह सब होता है और होता रहेगा।  

अब सवाल आज की सोशल मीडिया पर बनी कॉकरोच जनता पार्टी का है। युवा वेग उफान पर है लेकिन यक्ष प्रश्र यह है कि यह वेग कब तक रहेगा और किस दिशा में चलेगा? नाराजगी में बना कोई संगठन (फिलहाल कानूनी अस्तित्व नहीं) अक्सर रास्ता भटक जाता है। जिस तेजी से युवा लामबंद हो रहे हैं, वह बदलाव ला भी सकते हैं और खुद भी बदल सकते हैं। मिसाल के तौर पर नेपाल में जो कुछ हुआ, वह भारत में संभव नहीं है। युवा उम्र ही क्रांति का बीज बोती है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है लेकिन क्रांति के लिए मुद्दाआधारित गुस्से की जरूरत होती है और ऐसे आंदोलन जेपी और अन्ना का इस देश ने देखा है। भारत में नए किस्म के ‘जेनजी’ को फिलवक्त कुछ राजनीतिक लोगों का समर्थन भी मिलता दिख रहा है। प्रतिपक्ष की राजनीति देशहित के लिए होता है और संभव है कि आगे भी इस नए-नवेले संगठन को कोई साथ मिलेगा क्योंकि लाभ की राजनीति भला कौन छोडऩा चाहेगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि सोशल मीडिया का प्रभाव संचार के किसी भी अन्य माध्यमों से ज्यादा प्रभावी और व्यापक है। घड़ी के सेकंड के काँटें के साथ सोशल मीडिया में लिखी-बोली गई बातें दुनिया भर में फैल जाती हैं और यही सबकुछ अभी हो रहा है। किसी राजनीतिक पार्टी को अपना कुनबा बढ़ाने के लिए वर्षों लग जाते हैं, वहीं अल्प समय में खड़ी हुए संगठन में करोड़ लोगों का जुट जाना अस्वाभाविक है।आगे देखना दिलचस्प होगा कि कॉकरोच जनता पार्टी रील की तरह स्क्रॉल हो जाएगी या इसका जेपी-अन्ना आंदोलन जैसा कोई प्रभाव दिखेगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) तस्वीर गूगल से साभार

गुरुवार, 14 मई 2026

कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे

 













प्रो. मनोज कुमार

प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से देशवासियों से अपील किया है कि आसन्न संकट को देखते हुए ईंधन की बचत करें. साथ में कुछ और आग्रह भी. स्वाभाविक है कि पीएम की यह अपील सर्वसमाज के लिए था लेकिन मैं और हम में बँटे लोग इस अपील का मौखाल उड़ा रहे थे। सोशल मीडिया में लगातार इस पर तरह-तरह की बातें चल रही थी। यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि उनके ही दल के लोग उदाहरण प्रस्तुत करें लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने फौरन अपनी सुरक्षा व्यवस्था में लगी गाडिय़ों की संख्या कम कर दी। अपरोक्ष रूप से उन्होंने अपने मंत्रिमंडल एवं नव-नियुक्त निगम-मंडलों के अध्यक्षों को निर्देश था लेकिन दिल है कि मानता नहीं के तर्ज पर शक्ति प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया था। ख$फा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जनप्रतिनिधियों को संदेश दे दिया है- ‘कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे’ अन्यथा उनकी सख्ती जग-जाहिर है। यह अपने आपमें हैरान में डाल देने वाला सवाल है कि जिस मोदी को आप अपना आदर्श मानते हैं, उनकी अपील का असर होता नहीं दिख रहा है. सवाल यह भी है कि क्या यह अपील उनके निजी नफा-नुकसान के लिए है अथवा आसन्न संकट से बचाने के लिए देशहित में है।

किसी भी किस्म का संकट हमेशा समाधान की ओर लेकर जाता है. और कोई भी संकट स्थायी नहीं होता है. हमारी पीढ़ी ने कोविड महामारी को झेला और अब अमेरिका-इजराइल और इराक के मध्य युद्ध से उपजे हालात से वैश्विक संकट से दो-चार हो रहा है. यह संकट भी स्थायी नहीं हैं लेकिन हालांकि हालात जो हैं, वह इस बात की गवाही नहीं देते कि समस्या का अंत तुरंत होगा और इसके चलते अनेक किस्म के संकट से भारत समेत दुनिया के अनन्य देश जूझ रहे हैं. भारत के समक्ष इस समय सर्वाधिक संकट ईंधन का है. इसके चलते गैस और पेट्रोल की सप्लाई पर असर साफ दिख रहा है. भले ही अभी हाहाकार ना मचा हो लेकिन जिस तरह से लोग पैनिक हो रहे हैं, हालात वैसा ही बन रहा है. इस युद्ध से जो परिस्थिति निर्मित हो रही है, वह किसी सरकार, राजनीतिक दल का नहीं अपितु राष्ट्र के संकट के रूप में देखा जाना चाहिए. सरकार तो अपने स्तर पर संकट से निपटने के लिए तैयारी कर रही है और उसकी कोशिश होगी कि ईंधन की आपूर्ति की निरंतरता बनी रहे. इस संकट इस बात की आपकी परीक्षा ले रहा है और शायद आगे इम्तहान का दौर जारी रह सकता है और इस स्थिति में आपकी असल परीक्षा होगी कि आप वास्तविक में कितने देशभक्त हैं और ऐसे विकट समय में राष्ट्र का साथ कैसे देते हैं. इस परीक्षा में खरे उतरते हैं, तब आप गर्व से कह सकते हैं कि हम सब भारतीय हैं. हम यह भी मानते हैं कि सामान्य हालत में शासकीय योजनाओं का अधिकाधिक लाभ आम लोगों को मिले किंतु संकटकालीन स्थितियों में इन पर रोक लगाया जाना देशहित में है. लाडली बहनों को दिए जाने वाली राशि फिलहाल स्थगित कर देना एक बड़ा उपाय हो सकता है। और हम यह भी जानते हैं कि हमारी मातृशक्ति हर संकट में घर-परिवार, समाज और देश को उबारने में सक्षम हैं और इस समय भी उनका साथ मिलेगा।

मोदी के विरोधी जिस स्तर पर उनका मजाक बना रहे हैं, वह स्वाभाविक है लेकिन क्या ऐसे लोगों के पास जवाब है कि जब देश संकट से गुजर रहा होगा तो वे बच जाएंगे? सुरक्षित रह पाएँगे? वे और उनका परिवार भी इसी देश के नागरिक हैं तो मोदी ना सही, प्रधानमंत्री की बात सुनिए, मानिए. लोकतंत्र की खूबसूरती इसी बात की है कि विरोध का मंच खुला होता है। सत्ता के कार्यों की समीक्षा करना और उनकी आलोचना करना, सुधार का सुझाव देना किसी भी विपक्ष के लिए जिम्मेदारी होता है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में विरोध ही एक पक्ष है? अधिकार के साथ क्या हमें दायित्व का पालन नहीं करना चाहिए? लोकतंत्र आपको अधिकार देता है तो आपका दायित्व भी निर्धारित करता है और इसलिए आवश्यक है कि समयकाल और परिस्थितियों के अनुरूप विरोध करें या समर्थन कर देशहित में निर्णय लें। वर्तमान समय की माँग है कि हम देशहित में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करें। 

इस तात्कालिक संकट में एकजुटता की जरूरत है और इसे हम स्थानीय स्तर पर ही सुलझा सकते हैं. मोहल्ले और चौपालों में आपसी समझदारी से बैठकी कर यह जान लें कि अपने मोहल्ले में कितने घर हैं और प्रत्येक घर को कितनी ईंधन की जरूरत है? फिर आपस में सुविधानुसार एक-दूसरे की सहायता करें. इससे समाज के पैनिक होने से बचा जा सकेगा और सरकार को व्यवस्था करने में सहायता मिलेगी. इसी तरह आवश्यक होने पर ही वाहनों का उपयोग करें और कोशिश करें कि पेट्रोल का खर्च कम से कम हो. कुछ लोग मानकर कर चल रहे हैं कि हमारे पास ईवी है तो हम चिंता क्यों करें? तो वे लोग जान लें कि ईवी के लिए आपको इलेक्ट्रीसिटी की जरूरत होती है और इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए भी अपरोक्ष रूप से ईंधन की जरूरत होती है. बेहतर होगा कि ईवी को भी सुरक्षित रखें और आपातकाल में जरूरतमंदों की मदद में उपयोग लाएं. इस तरह छोटे-छोटे उपाय से समाज में पैनिक नहीं फैलेगा बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण को बेहतर करने की दिशा में मदद मिलेगी. ऐसा हमने कोविड के दरम्यान देखा है.

पीएम की अपील भी हैकि वर्कफ्रॉम होम को प्राथमिकता देंञ सरकारों को चाहिए कि वे आपातकालीन सेवाओं को छोडक़र वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी लागू कर दे जिससे ईंधन की बड़ी मात्रा में बचत होगी. पर्यावरण को इसका लाभ मिलेगा ही और जीवन सहज हो जाएगा. वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी से लाभ यह होता है कि अनेक अकारण स्थापना खर्च में भी कटौती होती है. साथ ही जरूरत पडऩे पर व्यक्ति हर समय उपलब्ध होता है. कार्यालयीन समय का बंधन नहीं होता है, इसमें वह भी नहीं है. सरकार अपने स्तर पर व्यवस्था को सुचारू बनाने की दिशा में काम कर रही है और यह संकट स्थायी नहीं है. समाज और सरकार साथ मिलकर चलेंगे तो स्थिति से निपटने में आसानी होगी. फिलवक्त संकट बहुत भयावह नहीं है लेकिन हमारा डर उसे भयावह बना रहा है. बहुत जल्द ही हम तनाव मुक्त होंगे लेकिन जो संकट है, वह सरकार का ही नहीं, समाज का है. एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से हमें डर के आगे जीत को सामने रखना होगा. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) 

शुक्रवार, 8 मई 2026

चिथड़े में लिपटी माँ को भी याद कर लें

 



‘मदर्स डे’ पर दिल की बात

प्रो. मनोज कुमार

अपने हाथों से दही-शक्कर खिलाकर कामयाबी की कामना करती माँ, अपने बच्चों की बलाएँ उतराती माँ और देहरी लाँघ कर जाते बच्चे को अपने आँचल में बँधा मुड़ा-तुड़ा दस का नोट देकर पूरी दुनिया खरीद लेने की ताकत देती माँ को इस बदलते समय ने बाजार बना दिया है। हमारी सनातन संस्कृति में ‘मदर्स डे’ जैसा कोई कांसेप्ट कभी था ही नहीं। शाम ढले जब थका-हारा बच्चा घर लौटता और दुलार के साथ माँ की गोदी में सिर रखकर जन्नत का अहसास करने लगता उसी समय ‘मदर्स डे’ हो जाता था। भागते-दौड़ते समय में यह पल-छीन, बाजार ने छीन लिया है। ‘मदर्स डे’ का मतलब बता दिया है कि माँ के लिए एक महँगा तोहफा खरीद कर उसे दो, सेल्फी लो और दुनिया को बता दो कि तुम अमीर नहीं, माँ गरीब हो गई है। वो दस रूपये का मुड़ा-तुड़ा नोट जो तुम्हें इस बाजार को खरीद लेने की ताकत देता था, वह पूँजी हम सबने गँवा दी है। हम सब फिर एक बार ‘मदर्स डे’ मनाने के लिए उतावले हो रहे हैं।

‘मदर्स डे’ क्या होता है, यह समझाने के लिए बाजार सज गया है। हम बाजार के बहकावे में आ गए हैं। दही-शक्कर खिलाती माँ और अपने भीतर के दर्द को समेटकर हर बार बच्चे की मुस्कराहट पर निसार होती माँ अब ‘मदर्स डे’ में सिमट गई है। आए दिन खबरें पढ़ते हैं कि एक बेटे ने माँ को इसलिए मौत के घाट उतार दिया कि उसने मोबाइल के लिए पैसे नहीं दिए या कि उसकी अनाप-शनाप जरूरतों को पूरा करने के लिए माँ की गाँठ में पैसे नहीं थे। एक पुरानी कहानी इस संदर्भ में स्मरण हो आता है कि एक बार एक बेटे ने गुस्से में कुल्हाड़ी से माँ की गर्दन उड़ा दी। कटी हुई गर्दन ने शिकायत करने के बजाय पूछा-बेटा ऐसा करते हुए तुझे चोट तो नहीं लगी। ये है हमारा ‘मदर्स डे’ और कौन सा बाजार इस ‘दिल’ को बेच पाएगा और कौन सी औलाद है जो इसे खरीद पाएगी।

हम ‘मदर्स डे’ नहीं मनाते हैं बल्कि माँ की त्याग और उत्सर्ग को याद करने के लिए कभी वीरांगना लक्ष्मीबाई का स्मरण कर लेते हैं तो कभी ‘मदर इंडिया’ देख लेते हैं। माँ बच्चे की पहली पाठशाला होती है। उसे नैतिक शिक्षा देती है और संबंधों का मूल्य समझाती है और जब वह ऐसे में खुद को विफल होता देखती है तो ‘मदर इंडिया’ हो जाती है। पुरानी बात क्या कहें, एक दशक पहले टीकमढ़ में एक सरपंच माँ ने अपने ही बेटे को गाँव निकाला दे दिया कि नियम के खिलाफ जाकर उसने शराब पीने की जुर्रत की थी। माँ का दुलार और उसकी सख्ती से मिलकर हमारे सनातनी समाज का ‘मदर्स डे’ मनता है। बाजार ने ‘मदर्स डे’ पर अपना कारोबार खड़ा कर लिया है लेकिन आज भी सैकड़ों मध्यम वर्गीय भारतीय परिवार हैं जिनकेे लिए भगवान से पहले माँ है। ये परिवार एक दिन का ‘मदर्स डे’ नहीं मनाते हैं, इनके लिए हर पल छीन ‘मदर्स डे’ होता है। मैं ऐेसे कई अनुभव का साक्षी हूँ। एक बड़े उत्सव के आयोजन में एक बड़े संपादक को आमंत्रित किया और ऐनवक्त में उनकी ना हो गई। दुख हुआ और जब कारण पता चला कि माँ और पिता की तबीयत के चलते वो शामिल नहीं हो पा रहे हैं तो दुख कपूर की तरह उड़ गया। यहाँ एक बार फिर श्रवण कुमार याद आ गए। ऐसे भारतीय समाज में ‘मदर्स डे’, ‘फादर्स डे’ के बहाने बाजार की घुसपैठ आतंकित करता है। डराता है कि हमारे बच्चे कभी श्रवण कुमार को जान पाएंगे कि नहीं?

बाजार का अपना चरित्र है और उसने देखा कि भारतीय चरित्र की बुनियाद को इस नकली दिनों के बहाने और कमजोर किया जा सकता है तो उसने साल में एकाध दर्जन ऐसे दिन खड़े कर दिए। हमेशा की तरह बाजार सज गया है। जिस माँ ने कभी स्कूल की देहरी तक नहीं पहुँच पायी, उसका औलाद उसे ‘आई लव यू ममा’ का लुभावना चमकदार महँगा कार्ड भेंट कर रहा है। माँ को समझ ही नहीं आता कि ये क्या है, उसका क्या करे? उसके लिए तो उपहार उसकी औलाद है जो कुछ पल के लिए उसकी गोद में लेट जाए और वह दुलार से उसके सिर पर हाथ फेरने लगे तो हर पल माँ का हो जाता है। माँ समझ ही नहीं पा रही है कि ये ‘मदर्स डे’ होता क्या है? और औलाद के लिए माँ के पास वक्त नहीं, बाजार से खरीदे गए महँगे तोहफे हैं। हम कौन से समय में किस दुनिया मेंं खड़े हैं। कवियों ने शायरों ने माँ को ऐसा महिमामंडित किया कि बाप की औकात दिखा दी गई। क्या माँ और पिता के बिना हम अपनी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं। ऐसे में मशहूर जावेद अख़्तर एक सभा में बेबाकी से इस पर तल्ख शब्दों में ऐतराज जाहिर करते हैं तो लगता कि वे ‘मदर्स डे’ की औकात दिखा रहे हैं। बाजार को उसकी औकात बता रहे हैं।

भारत के 130 करोड़ से अधिक नागरिकों में बमुश्किल एक करोड़ भी नहीं होंगे जिसकी औलाद के पास ‘मदर्स डे’ मनाने की औकात हो। यहाँ यह भी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि अपनी आर्थिक हैसियत को दरकिनार कर वह महँगा तोहफा इसलिए खरीद रहा है कि चार लोग क्या कहेंगे? माँ के पैरों में जन्नत तलाश करने वाला बच्चा अपनी माँ से कब बड़ा हो गया? माँ की कमजोर होती आँख के लिए एक सुंदर सा चश्मा बनाने के लिए औलाद के पास पैसे नहीं है, पैसे नहीं है माँ की दवा लाने के लिए और पैसे हैं तो वक्त नहीं माँ के लिए। यह भी आज के ‘मदर्स डे’ का सबसे बड़ा सच है। बाजार ने बच्चों को निर्मम बना दिया है। 

अभी एक तस्वीर मेरी नजरों से गुजरी जिसमें एक माँ अपने बच्चे को कमर में आँचल से लपेट कर किसी धन्ना सेठ के बच्चे की शादी में लाईट लेकर चली जा रही है। डीजे में नाचते, खुशियों में रुपये लुटाते इस समाज की नजर ना तो उस माँ पर गई और ना ही उस नन्हें बच्चे पर। माँ कभी गरीब नहीं होती है, यह तस्वीर इस बात की तस्दीक करती है। माँ अमीर होती है अपने संकल्प से, अपने मातृत्व से और वो अपनी औलाद को दुनिया का सबसे कामयाब आदमी बनते देखना चाहती है, भले ही उसे आधा पेट खाना मिले। शरीर पर चिथड़े की सूरत में बदलती साड़ी सही मायने में माँ को परिभाषित करती है। बाजार जिस दिन ये तमीज हमें सिखा जाएगा फिर किसी ‘मदर्स डे’ की जरूरत नहीं होगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) 

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

प्रतिभा देखिए, जात, रोजगार नहीं


 

प्रो. मनोज कुमार                                                                                                                                         मध्यप्रदेश के गर्वनर आदिवासी बच्चों के सरकारी कार्यक्रमों में प्रदर्शन के लिए उपयोग किए जाने पर ऐतराज जाहिर कर रहे थे, उसी समय दूसरी तरफ समाज प्रतिभावान बच्चों की प्रतिभा को धर्म, जात और रोजगार से तौल रही थी. दोनों मामले अलग-अलग होते हुए भी एक मंच पर एकाकार होते दिख रहे थे. गर्वनर का ऐतराज वाजिब है तो इस कृत्य को जायज नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि किसी बच्चे की प्रतिभा इस बात से नहीं आंकी जा सकती है कि वह किस जाति, धर्म का है या उसके पिता का रोजगार क्या है. हमारे समाज में गरीब की कोई मदद नहीं करेगा लेकिन गरीबी को बाजार में बेचने जरूर चला जाएगा. यह मसला स्कूली बच्चों के टॉपर होने का हो, भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन को हो या फिर ऑस्कर की दौड़ में शामिल वो फिल्में जिनमें भारत की गरीबी और भूखे-नंगे समाज का विद्रूपता के साथ किया गया चित्रण हो. यह मसला बाजार में गरीबी बेचने को लेकर तो है ही, बल्कि अवचेतन में हमारे मस्तिष्क में बैठा वह सोच है जो यह सब करने के लिए प्रेरित करता है.
कोई अल्पशिक्षित अथवा गरीब परिवार सबकुछ दांव पर लगाकर अपने बच्चों को इसलिए ही पढ़ाता है कि वह इस जलालत भरी जिंदगी से बाहर निकल सके. बच्चा भी हाड़तोड़ मेहनत कर खुद की प्रतिभा और मेहनत कर स्वयं को साबित करता है. प्रतिभावान बच्चे के मन में अपने माता-पिता को सुखपूर्वक जिंदगी देने का सपना भी कहीं भीतर पल रहा होता है. ये वो प्रतिभावान बच्चे होते हैं जिनका कोई गॉडफादर नहीं होता है और ना ही इन्हें भौतिक सुविधायें मयस्सर होती हैं. अभावों और जुगाड़ के बीच किसी सरकारी स्कूल में पढक़र ये अपने सपने सच करने निकल पड़ते हैं. ऐसे में इन प्रतिभाओं का आंकलन इस तरह करने से ना केवल उनकी प्रतिभा को शर्मसार किया जाता है बल्कि उन पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी पड़ता है.
अब यहाँ प्रश्र उठता है कि प्रतिभावान बच्चों की गरीबी, जात-धर्म और रोजगार की गिनती कर उन्हें श्रेष्ठ बताने वाला समाज कभी उन रईसजादों और सुविधासम्पन्न बच्चों के बारे में बात करता है. क्या किसी समय किसी प्रभावशाली परिवार से उपलब्धि का शिखर छूने वाले बच्चे की जात-धर्म को पूछा गया या कि इसके पहले उनका परिवार कभी गरीबी में रहा तो उसका उल्लेख किया है. यही नहीं, लैंपपोस्ट के नीचे बैठकर सफलता का शिखर छूने वाला बच्चा समाज के लिए हीरो है तो एयरकंडीशन में सर्वसुविधायुक्त प्रायवेट स्कूल-कॉलेज में पढक़र निराश करने वाले बच्चों की स्टोरी की गई. शायद नहीं क्योंकि ऐसी स्टोरी बाजार का ‘माल’ नहीं है. गरीबी, जात-धर्म और रोजगार से टीआरपी हासिल होता है.
जब गर्वनर पब्लिक प्रोग्राम में आदिवासी बच्चों के प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए सरकारी कार्यक्रमों में प्रदर्शन कर देखकर उखड़ जाते हैं तो यह भी उसी वर्ग में आता है जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं. यहाँ भी आदिवासी बच्चों का उपयोग किया जाता है. यह समाज का सौभाग्य है कि मध्यप्रदेश को गार्जियन के रूप में एक ऐसे महामहिम मिले हैं जो हर वक्त आदिवासी समाज की चिंता करते हैं. यदा-कदा आदिवासी विकास के बजट का उपयोग नहीं करने पर भी उनका ऐतराज जायज है. यह शायद पहली-पहली बार हो रहा है कि जब महामहिम स्वयं ऐसे मामलों का संज्ञान ले रहे हैं. आदिवासियों के साथ समाज में तेजी से पैर पसार रहे सिकलसेल रोग को लेकर भी महामहिम चिंतित हैं. वे इसके खिलाफ लंबे समय से जागरूकता अभियान चलाकर जुटे हुए हैं. उनके इन प्रयासों का परिणाम है कि केन्द्र सरकार ने 2047 की मियाद तय की है जब समूचा समाज सिकलसेल जैसे अनुवांशिक रोग से मुक्त हो जाएगा. यह चर्चा तो महामहिम की सामाजिक सरोकार की चिंता पर है और इसी के बरक्स प्रतिभाओं के आंकलन पर चिंता करना जरूरी हो जाता है.
इस पूरे परिदृश्य में एक सुखद पक्ष यह भी उभर कर आता है कि जिन मेधावी विद्यार्थियों ने कामयाबी के शिखर छुए हैं, वे लगभग सभी सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं. यह तथ्य भी मिथ्या साबित हो जाता है कि सरकारी स्कूल में शिक्षा अच्छी नहीं है और बच्चों को वैसा मंच नहीं मिल पाता है, जैसा की सुविधासंपन्न निजी स्कूलों में. सरकार अपने तईं इन स्कूलों में वैसी ही शिक्षा देने का प्रयास कर रही है, जैसा कि मिथ निजी स्कूलों के बारे में बना हुआ है. सीएम राईज स्कूल बनाम सांदीपनी पाठशाला इसी मंतव्य को पूरा करते दिख रहे हैं. आंकड़ें बताते हैं कि निजी स्कूलों की भारी-भरकम फीस के चलते अब पालकों का मोह भंग हो रहा है और वे सरकारी स्कूल की तरफ लौट रहे हैं. मेधावी विद्यार्थियों की कामयाबी की खबर भी उनका भरोसा बढ़ाती है. सबकुछ होते हुए भी सरकारी स्कूल हों या अस्पताल, इनमें सुविधाओं की कमी नहीं है, कमी है तो विश्वास की. सरकारी व्यवस्था पर विश्वास लौटाने के लिए सरकार को विभिन्न स्तरों पर जतन करना पड़ेगा और इसका सबसे सुविधाजनक रास्ता है समाज को साथ लेकर चलना. सरकारी स्कूलों पर भरोसा तो लौट रहा है लेकिन गरीबी, रोजगार और धर्म-जाति से प्रतिभा को ना तौला जाएगा, इस बात के प्रति भी सर्तक रहना होगा. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)तस्वीर इंटरनेट से साभार 

रविवार, 19 अप्रैल 2026



 























Ai भी कमाल का है। अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान की मासिक पत्रिका #समागम का न्यू लुक दोस्त @संजीव शर्मा के सौजन्य से। 

हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूर्ण होने पर समागम के विशेष अंक के प्रकाशन की तैयारी है। विगत से आगत के साथ ही AI के साथ विमर्श है उन विषयों पर जो पत्रकारिता के केंद्र में हैं। जल्द ही इस अंक पर कुछ और भी जानकारी। पढ़ते रहिए #समागम

https//samagam.co.in

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

नारी शक्ति वंदन अधिनियम से स्त्री समाज को मिलेगा अधिकार और सम्मान



















हर जनम मोहे बिटिया ही कीजो

प्रो. मनोज कुमार

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ यह मात्र श£ोक नहीं है बल्कि सनातनी परंपरा इस बात की साक्षी है कि हर युग में मातृशक्ति को पूरा सम्मान और अधिकार दिया जाता रहा है. जहाँ स्त्री का सम्मान होता है, उसे बराबरी का अधिकार दिया जाता है, वह घर, समाज और राष्ट्र पुष्पित-पल्लवित होता है. भारत वर्ष में हर युग में स्त्री को अधिकार और सम्मान दिया जाता रहा है किन्तु बीते दशकों में स्त्रियों को अधिकार और सम्मान के नाम पर छलावा किया जाता रहा है. योजना बनाने की घोषणा होती रही है और इसे कभी अमलीजामा नहीं पहनाया गया. स्त्री स्वयं को ठगा सा महसूस करती रही है. हालात अब बदलने लगे हैं. डेढ़ दशक में महिला कल्याण के लिए बातों और वायदों से ऊपर उठकर जमीनी स्तर पर उन्हें अधिकार और सम्मान दिया जा रहा है. हालिया सत्ता में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का केन्द्र सरकार का फैसला उन्हीं में से एक है. स्त्री सशक्तिकरण को इस फैसले से वास्तविक शक्ति मिलेगी क्योंकि सत्ता में भागीदारी से ही उसकी ताकत में इजाफा होता है. महिलाओंं की सत्ता में भागीदारी का यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दूरदृष्टि की सोच का परिणाम है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि केन्द्र सरकार के इस फैसले के इतर कोई भी राजनीतिक दल जाएगा क्योंकि यह सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय का संदेश देता है. इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि इस नए कानून को सर्वसम्म्ति से पारित किये जाने की पूरी संभावना है, बावजूद इसके कि किसी भी प्रकार की और देरी दुर्भाग्यपूर्ण होगी और भारत की महिलाओं के साथ घोर अन्याय होगा। महिलाओंं की सत्ता में भागीदारी का यह प्रस्ताव स्वतंत्र भारत का यह क्रांतिकारी पहल है. इससे ना केवल महिलाओं को अधिकार प्राप्त होगा बल्कि देश की राजनीति का आचार-व्यवहार भी बदलेगा. इस पहल की सबसे बड़ी बात यह है कि समाज अब तक स्त्रियों को लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा का दर्जा देकर उन्हें महिमामंडित करता रहा है लेकिन अब वास्तव में यह स्वरूप व्यवहार में देखने को मिलेगा. यह बिल दोनों सदनों से पास होकर कानूनी रूप ले लेता है, तो यह दशकों में भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली का सबसे बड़ा ढांचागत बदलाव होगा, जो 2029 में देश को 273 महिला सांसद देगा. 

महिलाओंं की सत्ता में भागीदारी का यह प्रस्ताव भारत का भविष्य तय करने वाला है. प्रतिदिन महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार, उनके साथ अन्याय और आर्थिक रूप से निर्बल बनाने की जो कुचक्र जारी है, उसे तोडऩे में यह सहायक होगा. इस प्रस्ताव के पूर्व समूची राजनीति दलों में महिलाओं की सहभागिता का आंकड़ा जाँचें तो स्थिति शर्मनाक दिखती है. पुरुष प्रधान समाज की जो धारणा है, वह पुष्ट करती है. यही नहीं, महिला सहभागिता का अवसर भी तभी दिया गया जब लगा कि उनकी सहभागिता से ही उनके राजनीतिक और आर्थिक उद्देश्य पूरे होंगे. पिछले डेढ़ दशक की विवेचना करें तो समाज इस बात के लिए राहत महसूस कर सकता है कि आहिस्ता-आहिस्ता स्त्रियों के पक्ष में अनेक ठोस कदम उठाये गए हैं. सबसे उल्लेखनीय पक्ष तो यही है कि मोदी सरकार का यह फैसला संप्रदाय या धर्म विशेष को लक्ष्य करके नहीं बल्कि भारतीय स्त्री समाज के पक्ष में लिया गया है. तीन तलाक जैसी कुप्रथा को समाप्त किया गया तो यह भारतीय स्त्री समाज के हक में ही है. आदिवासाी, दलित और पिछड़े वर्ग की स्त्रियों को सर्वशक्तिशाली पद पर निर्विकार भाव से बिठाया गया तो यह स्त्री सम्मान का सबसे बड़ा उदाहरण के रूप में आप देख सकते हैं. देश की राष्ट्रपति पद पर विदुषी मूर्मु का चयन किया गया. चाहते तो किसी सामान्य वर्ग की कुलीन स्त्री को अवसर दे सकते थे लेकिन ऐसा नहीं कर संदेश दिया गया कि सबका साथ, सबका विकास में समाज के अंतिम छोर पर बैठे प्रतिभावान स्त्री को अवसर देना है. मोदी जी उस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं जो उनके शीर्ष नेतृत्व ने आरंभ किया था. स्मरण रहे कि मध्यप्रदेश के इतिहास में उमा भारती को मुख्यमंत्री निर्वाचित कर इस परंपराका श्रीगणेश किया गया. इसके पहले ऐसा साहस किसी सत्ताधारी दल ने नहीं किया. दो अन्य राज्यों में भी भाजपा ने महिला मुख्यमंत्री बनाने का कार्य किया. अन्य प्रभावशाली पदों पर महिलाओं को अधिकार सम्पन्न बनाकर उन्हें सम्मान दिया गया और हालिया प्रस्ताव इस सोच को विस्तार देता है.

ताजा प्रस्ताव के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 2029 में लोकसभा और विभिन्न विधानसभाओं के चुनाव महिलाओं के लिए पूरे आरक्षण के साथ कराए जाते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र और भी मजबूत और जीवंत बनेगा। उनका मानना है कि महिलाएं आज कई क्षेत्रों में बेहतरीन काम कर रही हैं, इसलिए विधायी संस्थाओं में उनकी भागीदारी बढ़ाना बेहद जरूरी है। यहाँ यह भी जान लेना उचित होगा कि महिलाओंं की सत्ता में भागीदारी का यह प्रस्ताव कैसे लागू किया जाएगा. महिला आरक्षण विधेयक जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम  संबोधित किया गया है, जिसके पारित होने से संसद में महिलाओं की भागीदारी 33 प्रतिशत सुनिश्चित हो जाएगी। उल्लेखनीय है कि 1996 में महिला आरक्षण विधेयक की जाँच करने वाली संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि ओबीसी के लिए आरक्षण की अनुमति देने के लिए संविधान में संशोधन होने के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की महिलाओं के लिए आरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए. ज्ञात रहे कि 19 सितंबर 2023 को मोदी सरकार ने विशेष सत्र में इस विधेयक को 128वें संवैधानिक संशोधन विधेयक, 2023 के रूप में पेश किया था। अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम लोकसभा से पारित होने के बाद दोबारा राज्यसभा में जाएगा.

इस अधिनियम के पारित होने पश्चात लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटें 131 में से 43 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. इन 43 सीटों को सदन में महिलाओं के लिए आरक्षित कुल सीटों के एक हिस्से के रूप में गिना जाएगा. महिलाओं के लिए आरक्षित 181 सीटों में से 138 ऐसी होंगी जिन पर किसी भी जाति की महिला को उम्मीदवार बनाया जा सकेगा यानी इन सीटों पर उम्मीदवार पुरुष नहीं हो सकते. 

महिलाओंं को सत्ता में अधिकार देने के लिए वर्तमान व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के स्थान पर परिसीमन कर सीटें बढ़ायी जा रही हैं जिसमें भी सरकार की मानें तो रोटेशन पद्धति लागू होगी. वर्तमान में लोकसभा में 543 सीटें हैं. नए प्रस्ताव के तहत 50 प्रतिशत वृद्धि के बाद यह संख्या बढक़र लगभग 816 हो जाएगी. इन 816 सीटों में से एक तिहाई यानी करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. सबसे खास बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया के लिए अब अगली जनगणना का इंतजार नहीं किया जाएगा, बल्कि 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जाएगी. साल 2029 का लोकसभा चुनाव पूरी तरह से इसी नए बिल और नई परिसीमन व्यवस्था के आधार पर लड़ा जाएगा.

मोदी सरकार की महिलाओं हक में लिये गए फैसले ऐतिहासिक रूप में याद किए जाएंगे. अपने डेढ़ दशक के कार्यकाल में महिलाओं की शक्ति में ही इजाफा नहीं हुआ अपितु उन्हें आर्थिक, राजनीतिक रूप से भी बराबरी का दर्जा हासिल हुआ है. कल तक जो बिटिया अपने जन्म पर निराश होकर कहती थी-‘अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो’, आज वही बिटिया अपने जन्म पर इतरा रही है और कह रही है कि ‘मोहे हर जनम बिटिया ही कीजो’. स्त्री सम्मान भारतीय समाज का शाश्वत सत्य है और घर, परिवार, समाज और राष्ट में जिन्होंने स्त्री सम्मान को दोयम दर्जा दिया, उसे भी समाज में सम्मान नहीं मिला है. स्त्री अधिकार और सम्मान का यह निर्णय किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं, यह भारत वर्ष का है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) 


शनिवार, 14 मार्च 2026

जिम्मेदार नागरिक बनने का वक्त

 












प्रो. मनोज कुमार

किसी भी किस्म का संकट हमेशा समाधान की ओर लेकर जाता है. और कोई भी संकट स्थायी नहीं होता है. हमारी पीढ़ी ने कोविड महामारी को झेला और अब अमेरिका-इजराइल और इराक के मध्य युद्ध से उपजे हालात से वैश्विक संकट से दो-चार हो रहा है.  यह संकट भी स्थायी नहीं हैं लेकिन हालांकि हालात जो हैं, वह इस बात की गवाही नहीं देते कि समस्या का अंत तुरंत होगा और इसके चलते अनेक किस्म के संकट से भारत समेत दुनिया के अनन्य देश जूझ रहे हैं. भारत के समक्ष इस समय सर्वाधिक संकट ईंधन का है. इसके चलते गैस और पेट्रोल की सप्लाई पर असर साफ दिख रहा है. भले ही अभी हाहाकार ना मचा हो लेकिन जिस तरह से लोग पैनिक हो रहे हैं, हालात वैसा ही बन रहा है. इस युद्ध से जो परिस्थिति निर्मित हो रही है, वह किसी सरकार, राजनीतिक दल का नहीं अपितु राष्ट्र के संकट के रूप में देखा जाना चाहिए. सरकार तो अपने स्तर पर संकट से निपटने के लिए तैयारी कर रही है और उसकी कोशिश होगी कि ईंधन की आपूर्ति की निरंतरता बनी रहे. इस संकट इस बात की आपकी परीक्षा ले रहा है और शायद आगे इम्तहान का दौर जारी रह सकता है और इस स्थिति में आपकी असल परीक्षा होगी कि आप वास्तविक में कितने देशभक्त हैं और ऐसे विकट समय में राष्ट्र का साथ कैसे देते हैं. इस परीक्षा में खरे उतरते हैं, तब आप गर्व से कह सकते हैं कि हम सब भारतीय हैं. यह समय नीति-नियमों और सरकार के व्यवहार की समीक्षा का नहीं है बल्कि हम सब के एक हो जाने का है. 

इस संदर्भ में मुझे अपने एक वरिष्ठ का कथन याद आता है जिसमें वे कहते हैं-सब सुविधा हो और आप कार्य का प्रदर्शन कर रहे हैं, यह बड़ी बात नहीं है बल्कि असुविधा में बेहतर कार्य का प्रदर्शन करना आपके कौशल को दिखाता है. लगभग यही स्थिति हम सबके समक्ष है.  जब तक ईंधन की आपूर्ति सामान्य थी और युद्ध जैसी कोई स्थिति निर्मित नहीं थी, तब हम राष्ट्रभक्त थे लेकिन अब जब संकट व्यक्ति नहीं, समूचे समाज पर है तो अब हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए ना केवल खुद आना ही नहीं होगा बल्कि अन्य को प्रेरित भी करना होगा ताकि जल्द ही स्थिति सामान्य हो सके. युद्ध के पहले भी हम कोविड के संकट से जूझ चुके हैं और इस बड़े संकट महामारी से खुद को निकाल पाने में कामयाब रहे. कोविड हो या युद्ध, यह संकटकालीन स्थितियां हमें राष्ट्र के प्रति निहित जिम्मेदारी को पूर्ण करने के लिए प्रेरित करती हैं. हमारी एक बड़ी कमजोरी यह है कि हम जल्दी से ना केवल पैनिक हो जाते हैं बल्कि स्टोर करने की मानसिकता के दास बन जाते हैं. कोविड के समय भी हमने ऐसा ही किया था और अनेक जरूरतमंदों को हमारी इस मानसिकता से नुकसान भी हुआ था. वर्तमान में भी यही देखने को आ रहा है लोग गैस टंकी स्टोर करने में तुल गए हैं. किसी उपभोक्ता के घर में चार और पाँच गैस सिलेंडर है तो वह सबको भरकर रख लेना चाहता है जबकि जिनके घरों में जरूरत के लायक एक सिलेंडर है, उसे पहले मिलना चाहिए. जब हम वसुधैव कुटुंबकम की बात करते हैं, सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की बात करते हैं तो इस पर अमल करने का वक्त आता है तो हम क्यों नहीं करते हैं? यह यक्ष प्रश्र ऐसे संकटकालीन स्थिति में हमारे समक्ष खड़ा होता है.

इस तात्कालिक संकट में एकजुटता की जरूरत है और इसे हम स्थानीय स्तर पर ही सुलझा सकते हैं. मोहल्ले और चौपालों में आपसी समझदारी से बैठकी कर यह जान लें कि अपने मोहल्ले में कितने घर हैं और प्रत्येक घर को कितनी ईंधन की जरूरत है? फिर आपस में सुविधानुसार एक-दूसरे की सहायता करें. इससे समाज के पैनिक होने से बचा जा सकेगा और सरकार को व्यवस्था करने में सहायता मिलेगी. इसी तरह आवश्यक होने पर ही वाहनों का उपयोग करें और कोशिश करें कि पेट्रोल का खर्च कम से कम हो. कुछ लोग मानकर कर चल रहे हैं कि हमारे पास ईवी है तो हम चिंता क्यों करें? तो वे लोग जान लें कि ईवी के लिए आपको इलेक्ट्रीसिटी की जरूरत होती है और इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए भी अपरोक्ष रूप से ईंधन की जरूरत होती है. बेहतर होगा कि ईवी को भी सुरक्षित रखें और आपातकाल में जरूरतमंदों की मदद में उपयोग लाएं. इस तरह छोटे-छोटे उपाय से समाज में पैनिक नहीं फैलेगा बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण को बेहतर करने की दिशा में मदद मिलेगी. ऐसा हमने कोविड के दरम्यान देखा है.

सरकारों को चाहिए कि वे आपातकालीन सेवाओं को छोडक़र वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी लागू कर दे जिससे ईंधन की बड़ी मात्रा में बचत होगी. पर्यावरण को इसका लाभ मिलेगा ही और जीवन सहज हो जाएगा. वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी से लाभ यह होता है कि अनेक अकारण स्थापना खर्च में भी कटौती होती है. साथ ही जरूरत पडऩे पर व्यक्ति हर समय उपलब्ध होता है. कार्यालयीन समय का बंधन नहीं होता है, इसमें वह भी नहीं है. सरकार अपने स्तर पर व्यवस्था को सुचारू बनाने की दिशा में काम कर रही है और यह संकट स्थायी नहीं है. समाज और सरकार साथ मिलकर चलेंगे तो स्थिति से निपटने में आसानी होगी. फिलवक्त संकट बहुत भयावह नहीं है लेकिन हमारा डर उसे भयावह बना रहा है. बहुत जल्द ही हम तनाव मुक्त होंगे लेकिन जो संकट है, वह सरकार का ही नहीं, समाज का है. एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से हमें डर के आगे जीत को सामने रखना होगा. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

रविवार, 8 मार्च 2026

पीपी का होना, इस संस्था का होना है

 





















    बार बार फोन की तरफ ध्यान जा रहा है, लगता है कि दूसरी तरफ से आवाज आएगी... मनोज भाई, आप पहुंचे नहीं। जल्दी आइए, और हां, मैं केके को बोल देता हूं, गाड़ी भिजवा देगा। अब ये आवाज हवा में गुम हो गया है। कल 7 मार्च को उनकी पुण्यतिथि थी और अपने जाने के पहले उन्होंने 8 मार्च को विश्व महिला दिवस पर पीआरएसआई के प्रोग्राम की रूपरेखा बना गए थे। उनके नहीं रहने के दूसरे दिन ही, यह आयोजन हुआ। हालांकि इस आयोजन में वो बात नहीं थी लेकिन उनकी प्लानिंग के हिसाब से ठीक ठाक हो गया था। इसके बाद साल दर साल 

पीआरएसआई के प्रोग्राम की आंच धीमी पड़ती गई। पिछले साल भी जनसंपर्क दिवस के साथ इसकी भी औपचारिकता पूरी कर दी गई थी, इस बार भी कुछ ऐसा ही होगा।

सच तो यह है कि पीपी सरीखा कोई दूसरा हो नहीं सकता। पीआरएसआई को उनके होते हुए जो ऊंचाई मिली थी और हरेक को जोड़ कर रखते थे। उनकी अगुवाई में होने वाले आयोजन की प्रतीक्षा केवल स्टूडेंट्स को ही नहीं, पत्रकारिता जगत को भी रहती थी। विश्व महिला दिवस एवं जनसंपर्क दिवस के इतर भी कभी होली दीवाली मिलन, अन्य अवसर तलाश कर किया करते थे।

कल 7 मार्च को उनकी पुण्यतिथि थी और हमेशा की तरह स्टूडेंट्स ने आयोजन कर पीपी का स्मरण किया। यहां भी पीआरएसआई नदारद था।किसी संस्था का आरंभ किया जाना आसान है लेकिन उसे ऊंचाई देना और उसकी निरंतरता बनाए रखने के लिए एक पीपी की जरूरत होती है। अब दूसरा पीपी कहां से लाएं? अच्छा होगा कि नया कुछ ना कर सकें तो उनकी खींची लाइन को ही कायम रख लें। पीआरएसआई सच में पीपी के लिए संस्था नहीं, सपना थी, वे इसमें सब कुछ झोंक देते थे। इस बात का साक्षी पूरा समाज है। काश, पीआरएसआई उनके बनाए रास्ते पर चल कर कुछ नया गढ़ ले, उम्मीद कम ही है।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

मध्यप्रदेश में खुलते स्त्रियों के लिए बंद कपाट

 














विश्व महिला दिवस 8 मार्च पर विशेष

प्रो. मनोज कुमार 

        समाज में स्त्रियों के लिए बंद कपाट मध्यप्रदेश में खुल गए हैं. स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में बीते वर्षों में जो कोशिशें हुई हैं, वह पूरे देश के लिए रोल मॉडल साबित हो रहा है. स्त्री समाज की नींव मजबूत करने के लिए जरूरी होता है कि उन्हें शिक्षित किया जाए और आर्थिक रूप से उन्हें सशक्त बनाया जाए. महिला सशक्तीकरण, सुरक्षा, सम्मान और समग्र विकास के अद्वितीय कोशिशों ने महिला समाज को उजास से भर दिया है. शहरी इलाके होंं या गांव-पंचायत, सभी जगहों पर महिलाओं की बुलंद आवाज सुनाई देती है.  राज्य के कोने-कोने में स्व-सहायता समूह के माध्यम से महिलाओं को उनके हुनर के अनुरूप अवसर मिल रहा है. साथ में केन्द सरकार द्वारा महिला कल्याण के लिए चलायी जा रही योजनाओं ने महिलाओं को और भी संबल दिया है. इस बार विश्व महिला दिवस पर मध्यप्रदेश एक नया अध्याय लिखने जा रहा है. केन्द सरकार द्वारा लागू उज्ज्वला योजना, जनधन खाता, मातृत्व वंदना योजना और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे कार्यक्रमों ने करोड़ों बेटियों, बहनों के जीवन को नई दिशा दी है वहीं मध्यप्रदेश में महिलाओं को संपत्ति में अधिकार, शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में अभूतपूर्व कार्य हो रहे हैं। 

महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना सबसे क्रांतिकारी पहलों में से एक रही है। पहली नजर में लगता कहा जाता है कि महिला वोटबैंक को मजबूत करने के लिए रुपये बांटने वाली स्कीम चलायी जा रही है लेकिन जतीनी हकीकत जाँचने जाएं तो पता चलेगा कि इन रुपयो से महिला सशक्तिकरण के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं. करोड़ों रुपये महिलाओं के खातों में पारदर्शी डिजिटल अंतरण के माध्यम से प्रदान किए गए, जिसने मध्यप्रदेश की महिलाओं को आत्मनिर्भरता की नई दिशा दी है। इस राशि से महिलाओं ने स्व-रोजगार की शुरूआत की है. पहले इस राशि से किराये की सिलाई मशीन ली गई और बाद में अपने मुनाफा से स्वयं की सिलाई मशीन खरीद ली गई. पशु पालन से लेकर किराने की दुकान जैसे अनेक कोशिशों में महिलायें सफल हुई हेैं. इस आत्मनिर्भरता के चलते आहिस्ता-आहिस्ता महिलायें स्वयं में सक्षम होकर योजना से स्वयं ही बाहर होकर शेष जरूरतमंद महिलाओं को अवसर दे रही हैं. सरकार द्वारा जारी आंकड़ें इस बात की पुष्टि करते हैं. 

इसी तरह सात महिलाओं ने अपना समूह तैयार कर एक नए किस्म की कोशिश को अंजाम दिया है. इसे स्व-सहायता समूह कहा गया. स्व-सहायता का सामान्य रूप से अर्थ समझ सकते हैं स्वयं की सहायता करना. स्व-सहायता समूह ने सशक्तिकरण के नए आयाम छुए हैं. कल तो जिन कामों पर पुरुषों का एकाधिकार था, आज उनमें महिलाएं पारंगत हैं. बिजली ठीक करने से लेकर बैंक खाता खुलवाने और उसका परिचालन करने जैसे अनेक कार्य महिलाएं कर रही हैं. मोहन सरकार ने अनेक कार्य स्व-सहायता समूह को सौंप दिया है जो कभी पहले निजी संस्थाएं करती थीं. मोहन सरकार की इस पहल से जैसे पूरा परिदृश्य बदल रहा है. मध्यान्ह भोजन से लेकर गणवेश बनाने का कार्य बड़े पैमाने पर स्व-सहायता समूह की महिलाएं कर रही हैं. प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के माध्यम से आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को मजबूत सामाजिक सुरक्षा प्रदान की गई है।

जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों में पीएम-जनमन तथा धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्थान अभियान के माध्यम से सैकड़ों नए आंगनवाड़ी केंद्रों का संचालन प्रारंभ किया गया है। इससे जनजातीय महिलाओं और बच्चों को पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ उनके गांवों तक उपलब्ध कराई गई हैं। हजारों भवनों के निर्माण और उन्नयन से आंगनवाड़ी व्यवस्था अधिक सशक्त और सुरक्षित बनी है। पोषण अभियान के अंतर्गत लाखों बच्चों के विकास की निगरानी के लिए अत्याधुनिक उपकरण प्रदान किए गए हैं। फेस-मैच आधारित सत्यापन ने हितग्राहियों को पारदर्शी और समयबद्ध लाभ दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियानों ने पोषण और पर्यावरण—दोनों आयामों को जोडक़र जनभागीदारी का नया मॉडल प्रस्तुत किया है।

मध्यप्रदेश, महिला सम्मान और सुरक्षा के विषय में समाज को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है। मिशन शक्ति के अंतर्गत वन स्टॉप सेंटरों, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, पिंक ड्राइविंग लाइसेंस, जेंडर चैंपियन पहल और सशक्त वाहिनी कार्यक्रमों ने महिलाओं और बालिकाओं के सशक्तीकरण को और मजबूती प्रदान की है। बीते साल मेंं 20,332 महिलाओं को त्वरित राहत और परामर्श उपलब्ध कराया। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के अंतर्गत नवजात बालिकाओं का स्वागत, पूजा-अर्चना और व्यापक पौधारोपण ने समाज में बेटियों के सम्मान की संस्कृति को मजबूत किया है। पिंक ड्राइविंग लाइसेंस और जेंडर चैंपियंस जैसी पहलें बालिकाओं के आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता को नई उड़ान दे रही हैं। राज्य एवं जिला स्तर के हब फॉर एम्पावरमेंट ऑफ वुमन ने जनजागरूकता की दृष्टि से अभूतपूर्व कार्य किया है। 100 दिवसीय अभियान, घरेलू हिंसा निरोधक कार्यक्रम, बाल विवाह मुक्ति प्रतिज्ञा, क्कष्ट-क्कहृष्ठञ्ज अधिनियम जागरूकता अभियान, साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण और आत्मरक्षा कार्यक्रमों ने समाज में व्यापक संवेदनशीलता विकसित की है। वर्ष साल में 1.47 लाख से अधिक गतिविधियाँ आयोजित हुईं और लाखों नागरिकों की भागीदारी ने यह सिद्ध किया कि मध्यप्रदेश, महिला सम्मान और सुरक्षा के विषय में समाज को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है।

मध्यप्रदेश के लिए यह गौरव की बात है कि यहां से आरंभ की गई योजनाओं को देश के अन्य प्रदेश वैसा ही अपना लेते हैं. मातृशक्ति को लेकर मध्यप्रदेश हमेशा से संवेदनशील रहा है. महिलाओं के आमूलचूल परिवर्तन की साक्षी बनता मध्यप्रदेश को दिशा देने में लोकमाता अहिल्या देवी जैसी शासक, अवंतिबाई, रानी कमलापति जैसी साहसी और सुभदा कुमारी चौहान जैसी विदुषी महिलाओं का मार्गदर्शन हेै. मध्यप्रदेश हमेशा से स्त्री शक्ति का सम्मान करता रहा है और इस विश्व महिला दिवस पर हम सब स्त्री शक्ति का नमन करते हैं, अभिनंदन करते हैं.

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

मेरी आवाज़ ही पहचान है

 












विश्व रेडियो दिवस 13 फरवरी 

प्रो. मनोज कुमार

    सडक़ से सरकार तक संचार के माध्यमों में अपने जन्म से लेकर अब तक भरोसेमंद साथी रेडियो रहा है. भारत की आजादी की ख़बर हो या दैनंदिनी गतिविधियों की पुख्ता और सही जानकारी रेडियो से ही मिल पाती है. एक समय हुआ करता था जब रेडियो का मतलब आकाशवाणी हुआ करता था लेकिन अब शहरी इलाकों में एफएम और गाँव-खेड़े के लिए सामुदायिक रेडियो प्रचलन में है. रेडियो एक नए अनुभव की तरह हमारे साथ-साथ चल रहा है. किसी समय रेडियो के लिए लायसेंस लेना होता था तो आज टेक्रालॉजी ने सारे मायने बदल दिए हैं और हथेलियों पर बंद मोबाइल फोन में आप अपना पसंदीदा रेडियो प्रोग्राम, गीत-संगीत सुन सकते हैं. हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस सेलिब्रेट किया जाता है तो इसके पीछे भी ठोस कारण है और वह है कि इस दिन 13 फरवरी, 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना हुई थी. संयुक्त राष्ट्र के रेडियो लोकतांत्रिक संवाद का सर्वोत्कृष्ट मंच मानता  है. पहली रेडियो सेवा 23 फरवरी 1920 को और पहली खेल रेडियो रिपोर्ट 11 अप्रैल 1921 को प्रसारित हुई थी तब से रेडियो युवा और गतिशील बना हुआ है। भारत में ऑल इंडिया रेडियो का नाम एकजाई कर आकाशवाणी कर दिया गया है.

अमीन सयानी और रेडियो सीलोन एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं. दुनिया के सबसे पुराने रेडियो प्रसारकों में से एक, रेडियो सीलोन ने अपने 100 वर्ष पूरे कर लिए. ऐसे समय में जब रेडियो एक नई चीज थी और टीवी द्वारा दक्षिण एशिया के मीडिया परिदृश्य को बदलने से दशकों पहले, रेडियो सीलोन ने आधिकारिक तौर पर 16 दिसंबर, 1925 से प्रसारण शुरू किया. यह एशिया का पहला रेडियो प्रसारक था. भारत में निजी रेडियो प्रसारण 1927 में शुरू हुआ, जबकि ऑल इंडिया रेडियो ने 1936 में परिचालन शुरू किया. नीदरलैंड 1919 में सार्वजनिक प्रसारण शुरू करने वाला पहला देश था, जिसके बाद 1920 में अमेरिका ने इसका अनुसरण किया.

आमतौर पर बोलचाल में हम एक संबोधन रेडियो कह देते हैं लेकिन रेडियो और ट्रांजिस्टर में बुनियादी फर्क है. रेडियो एक स्थूल उपकरण है जबकि ट्रांजिस्टर मोबाइल की तरह चलायमान. 1947 में डब्ल्यू. शॉकली के नेतृत्व में बेल लेबोरेटरीज (यूएसए) में ट्रांजिस्टर के आविष्कार ने वाल्व वाले रेडियो का अंत कर दिया।. 1954 में, अमेरिकी कंपनी रीजेंसी ने पहला पूरी तरह से ट्रांजिस्टर वाला रेडियो बनाया और बेचा. हालाँकि अब इसे पीसी या स्मार्टफोन से भी सुना जा सकता है, लेकिन फर्नीचर के रूप में रेडियो का आकर्षण आज भी बरकरार है और समय के साथ इसमें ऐसी तकनीक और कार्यक्षमता जुड़ती गई है जो पहले मौजूद नहीं थी. 

रेडियो तकनीक की चर्चा करें तो अब हम विजुअल रेडियो की दुनिया में पहुँच गए हैं. कानों सुनी के साथ अब आँखों देखी रेडियो का जमाना भी आ गया है, इसे विजुअल रेडियो का नाम दिया गया है. विजुअल रेडियो में एक आधुनिक प्रसारण तकनीक है जो पारंपरिक रेडियो की ऑडियो सामग्री को दृश्य तत्वों (विजुअल्स) के साथ जोड़ती है. इसमें रेडियो प्रसारण के साथ-साथ चित्र, वीडियो, ग्राफिक्स, टेक्स्ट, और अन्य मल्टीमीडिया सामग्री को एकीकृत किया जाता है, जिसे श्रोता रेडियो सेट, मोबाइल ऐप, या इंटरनेट के माध्यम से सुनने के साथ साथ रेडियो प्रसारण को देख भी सकते हैं. इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम मन की बात से भी समझ सकते हैं. मन की बात मूलत: रेडियो पर प्रसारित एक ऑडियो कार्यक्रम है लेकिन रेडियो प्लस यानि रेडियो सेट से इतर जब इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर प्रस्तुत किया जाता है तो उसमें दृश्य भी जोड़ दिए जाते हैं.

सडक़ से सरकार तक रेडियो की उपयोगिता बनी हुई है. खेत में जाता किसान, मजदूरी के लिए जाता मजदूर अपने कंधे पर ट्रांजिस्टर सेट लटका कर सुनते हुए चलता हुआ कहीं भी दिख जाता है. अब नए जमाने में कार में रेडियो ट्यून कर लेते हैं या मोबाइल पर भी ट्यून कर पसंदीदा गीत सुन सकते हैं. इस दौर में सामुदायिक रेडियो का आगमन हुआ और यह दूर-दराज इलाके जहाँ संचार की सुविधा नहीं है, उनके लिए वरदान साबित हुआ. औसतन पंद्रह किलोमीटर रेंज में प्रसारित होने वाले सामुदायिक रेडियो समुदाय विशेष के लिए होता है. खास बात यह है कि इस रेडियो का संचालन भी समुदाय विशेष के लिए किया जाता है. महात्मा गांधी से लेकर इंदिरा गांधी और वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रेडियो के प्रभाव को समझा और लोगों से सीधा संवाद करने के लिए उसे चुना. ‘मन की बात’  कार्यक्रम से ना केवल आकाशवाणी को आर्थिक लाभ हुआ अपितु देश भर की छिपी प्रतिभाओं को सामने आने का अवसर मिला. कम खर्च, सीमित संसाधन लेकिन एक सौ तीस करोड़ लोगों से संवाद का यह अनूठा प्रयास प्रभावकारी हुआ है. 

मध्यप्रदेश के संदर्भ में रेडियो की बात करना सुखद लगता है. जनजातीय विभाग ने आदिवासी बहुल इलाकों में रेडियो प्रसारण के जरिए जनजातीय समुदाय में जागृति लाने एवं मुख्यधारा से जोडऩे का अथक प्रयास किया. वर्ष 2010 में कम्युनिटी रेडियो स्थापना की कार्यवाही आरंभ की गई और 2012 आते-आते आठ कम्युनिटी रेडियो आदिवासी अंचलों में बजने लगे थे. नाम दिया गया ‘रेडियो वन्या’. ‘रेडियो वन्या’ के स्टेट कॉडिनेटर के नाते अनुभव का एक नया संसार रचने का अवसर मिला. ये सभी रेडियो स्टेशन आदिवासी बोलियों में प्रसारित हो रहे थे. चुनौती थी कि बोलियों में प्रामाणिकता एवं शुद्वता की थी सो आदिवासी बोलियों के विशेषज्ञों को आमंत्रित कर हिन्दी में मेरे बनायी गई स्क्रिप्ट को वे बोलियों में बदल देते थे. इस तरह सरकार की अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ जनजातीय समुदाय को मिलने लगा. इसके साथ ही तब के संस्कृति संचालक श्रीराम तिवारी के प्रयासों से देश का एकमात्र स्वाधीनता संग्राम पर एकाग्र कम्युनिटी रेडियो ‘रेडियो आजाद हिन्द’ का प्रसारण होने लगा. इस अनुभव के साथ मुझे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में कम्युनिटी रेडियो स्थापना के लिए पहले सलाहकार के रूप में जिम्मेदारी दी गई. तत्कालीन कुलपति प्रो. के.जी. सुरेश के साथ ‘रेडियो कर्मवीर’ का प्रसारण आरंभ हो गया. इस वर्ष पद्यश्री से सम्मानित डॉ. रामामूर्ति भी ‘रेडियो कर्मवीर’ की सलाह ली गई थी. इन अनुभवों को एकाग्र कर कम्युनिटी रेडियो पर हिन्दी में पहली किताब कही जा सकती है. कहा जा सकता है कि कम्युनिटी रेडियो के क्षेत्र में मध्यप्रदेश की अलग ही पहचान है. आदिवासी बोलियों में रेडियो प्रसारण वाला मध्यप्रदेश संभवत: अपनी तरह का इकलौता प्रदेश है.

रेडियो का असीमित और स्थायी प्रभाव आज भी बना हुआ है या यों कह सकते हैं कि समय के साथ रेडियो की उपयोगिता में श्रीवृद्धि हुई है. रजतपट और रेडियो का चोली-दामन का साथ रहा है. अनेक नई-पुरानी फिल्मों में रेडियो को प्रभावी माध्यम के रूप में देखा और समझा गया है. हालिया फिल्म ‘मेरी सुलु’ ने जता दिया कि रेडियो जॉकी के लिए खांटी प्रोफेशनल्स होना जरूरी नहीं, बस इस मीडिया के लिए जुनून और जज्बा चाहिए. कहना पड़ेगा मन का रेडियो बजने दे जरा... (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

‘ऋषि समागम व्याख्यान’-2026



दुनिया ने कहा ईश्वर ही सत्य है और गांधी ने कहा सत्य ही ईश्वर-अनुराधा शंकर सिंह

    भोपाल। यूरोप ने भारतीय मेधा का अपने फायदे के लिए लाभ लिया और जब उनकी जरूरत पूरी हो गई तो दुनिया भर से भारतीयों को भगाने के लिए साजिश रची जा रही है. कभी भारतीय उनके आँखों के तारे हुआ करते थे, आज भारतीयों को गंदा बताया जा रहा है. हम समझते रहे कि हम कम्प्यूटर इंजीनियर हैं, दरअसल हम उनके मजदूर थे. विचारक एवं सेवानिवृत्त एडीजी सुश्री अनुराधाशंकर सिंह ने रिसर्च जर्नल ‘समागम’ के 25वें वर्ष के अवसर पर आयोजित ‘ऋषि समागम व्याख्यान’ को संबोधित कर रही थीं. उनका कहना था कि सारी दुनिया ने ईश्वर को सत्य माना लेकिन अकेले गांधी ने सत्य को ईश्वर कहा. गांधी हमेशा प्रासंगिक रहेंगे. उन्होंने ‘समागम’ के 25 वर्ष की यात्रा को सुखद और प्रेरणादायक बताया. 

आने वाले समय में गूगल बाबा रिपोर्टिंं भी होने लगे तो अचरज नहीं करना चाहिए -गिरिजाशंकर

वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश£ेषक श्री गिरिजाशंकर ने कहा कि- ‘हर नई चीज के साथ संभावना के दरवाजे खुलते हैं. डिजीटल एज में भी यही हो रहा है.’ उन्होंने कहा कि हालांकि सबकुछ अच्छा भी नहीं होता है, जैसे पहले आँखों देखी रिपोर्टिंग होती थी, अब कानों सुनी रिपोर्टिंग हो रही है और आने वाले समय में गूगल बाबा रिपोर्टिंं भी होने लगे तो अचरज नहीं करना चाहिए. 

सब कुछ यांत्रिक हो गया है तो परेशानी बढ़ी है-  डॉ. सुधीर सक्सेना

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सुधीर सक्सेना ने कहा कि- ‘इस कठिन समय में गांधी पर केन्द्रित अंक का प्रकाशन अपने आपमें साहस का कार्य है और ‘समागम यह कर रहा है.’ उन्होंने डिजीटल ऐरा में कम्युनिकेशन की चुनौती के बारे में कहा कि अब सब कुछ यांत्रिक हो गया है तो परेशानी बढ़ी है।

यह संघर्ष नहीं आनंद की पत्रिका-मनोज कुमार

    कार्यक्रम के आरंभ में आधार वक्तव्य में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त रिसर्च जर्नल ‘समागम’ के संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री मनोज कुमार ने कहा कि- ‘जिस दिन पत्रिका की समाज को आवश्यकता नहीं होगी, इसका प्रकाशन स्थगित कर दिया जाएगा. यह संघर्ष नहीं आनंद की पत्रिका है.’ आयोजन को परम्परागत स्वागत से दूर रखा गया और वक्ता में किसी को भी मुख्य अतिथि या कार्यक्रम अध्यक्ष बताने के स्थान पर सबको एक जैसा रखकर समाज में नवाचार आरंभ किया गया. कार्यक्रम में लेखक संजय सक्सेना की किताब ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ का विमोचन अतिथियों ने किया. आयोजन में पीआरएसआई सहयोगी थे.

‘समागम’ सम्मान 2024-2025

    ‘समागम’ के 25वें वर्ष के अवसर पर लोकमाता अहिल्या, स्वामी विवेकानंद के नाम पर स्थापित सम्मान से शिक्षा के क्षेत्र में अहा जिंदगी एवं मधुरिमा की संपादक सुश्री रचना संमदर एवं आरती सारंग को, ज्ञान के क्षेत्र में रंग निदेशक श्री संजय मेहता एवं डॉ. मोना परसाई को, समाजसेवा के क्षेत्र में सुप्रीमकोर्ट की एडवोकेट सुश्री गुंजन चौकसे एवं भक्ति शर्मा को प्रदान किया गया. स्वामी विवेकानंद युवा प्रतिभा सम्मान भास्कर के पुस्तकालय प्रभारी श्री केशव किशोर एवं युवा फिल्ममेकर आदित्य चौरसिया को तथा अभ्युदय समागम सम्मान पीएससी टॉपर सुश्री हर्षिता दवे एवं डॉ. नरेन्द्र त्रिपाठी को प्रदान किया गया.  

कार्यक्रम का संचालन पूर्वा शर्मा त्रिवेदी ने किया एवं साहित्यकार श्री संजीव परसाई ने आभार व्यक्त किया. 

 

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

हाथ बाद में सेंक लेना भिया, इंदौर तो बचा लो



प्रो. मनोज कुमार
इंदौर इस समय दुखी है, परेशान है. अपने बच्चों और साथियों के अकाल मौत से उसके माथे पर सिकन दिख रही है. वह बेबस है. सिस्टम ने उसे कलंकित कर दिया है. साफ पीने का पानी भी उस इंदौर के लोगों को नसीब ना हो, यह देख-सुन कर लोकमाता अहिल्या भी कांप उठी होगी. कल तक इंदौर स्वच्छतम शहर होने पर इतरा रहा था. आज स्वच्छता का यही तमगा उसे शर्मसार कर रहा है. इंदौर के भगीरथपुरा में जो कुछ घटा वह दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, शर्मनाक है. मानवता पर कलंक सा मामला है. भगीरथपुरा में जो कुछ और जो कुछ घट रहा है, उसने स्वच्छता के एक-एक धागे खोलकर रख दिया है. यह सबकुछ आईने की तरफ साफ है. कोई लाग-लपेट नहीं. इंदौर नागरिक बोध का शहर है. इस शहर के बाशिंदों को पता है कि स्वच्छता किसे कहते हैं और स्वच्छ कैसे रहा जाता है. देशभर के लिए आइडियल बना इंदौर एकाएक नेपथ्य में चला गया है. उसकी स्वच्छता पर सवाल उठाये जा रहे हैं. सवाल गैरवाजिब नहीं होगा लेकिन क्या आज जब भगीरथपुरा के साथ प्रदेश के अनेक जिले और कस्बा बिसूर रहे हैं. हर जगह मौत का सबब बने दूषित पानी की शिकायत मिल रही है, ऐसे में स्वच्छता का ऑपरेशन करना जरूरी लगता है? क्या यह सही समय है हाथ सेंकने का?  इसके पहले कलमवीरों, सोशल मीडिया के नायकों को इंदौर की कमजोरी नजर क्यों नहीं आयी? अचानक क्या हुआ कि इंदौर का रेशा-रेशा उधेड़ा जा रहा है. भगीरथपुरा की घटना महज घटना नहीं है बल्कि यह इंदौर सहित पूरे देश को सबक लेने का एक सबक है कि जिंदगी इतनी सस्ती नहीं होना चाहिए. सिस्टम को इतना लापरवाह और निर्दयी नहीं होना चाहिए.
खैर, इंदौर एकाध बार नहीं, 6 बार देश के स्वच्छतम शहर घोषित किया गया. थोड़ा पहले जाइए और पन्ने पलट कर देखिये, चैनलों की पुरानी पड़ गई रिकार्डिंग देखिए कि इंदौर के स्वच्छतम शहर ऐलान किए जाने के बाद इंदौर की यशोगाथा की पटकथा लिखी गई. हर कोई आगे था. इंदौर में ही सिस्टम का हिस्सा रहे एक बड़े अधिकारी ने तो इंदौर की स्वच्छता पर किताब तक लिख डाली तो कुछेेक लोगों ने पी-एचडी पर कर लिया. लिखने, बोलने और बताने में इंदौर की ऐसी कहानी सुनायी गई कि गर्व से सिर ऊँचा उठ गया था. खरामा-खरामा जिंदगी चलती रही. यही सब लोग जुट गए थे इंदौर को सातवीं दफा स्वच्छ शहर बनाने के लिए. सब आँख मींचे बैठे थे. किसी को शहर की कमियां नहीं दिख रही थी. किसी ने सिस्टम को नहीं खंगाला था. सब ठीक था, जैसे आम दिनों में होता आया है. दुर्भाग्य से दिल दहला देने वाली भगीरथपुरा की घटना सामने आयी. दूषित पानी से अकेले बीमार नहीं पड़े बल्कि जान भी जानें लगी. एक-दो मौतें होती तो बात थम जाती या थोड़े दिनों बाद शांत पड़ जाता. यहां तो कलेजे तक आ जाने वाले आंकड़ों ने दहशत में डाल दिया. इंदौर से दिल्ली तक की सत्ता हिल गई. हालाँकि थोड़े पहले ही छिंदवाड़ा में कफ सिरप से ऐसी ही दिल दहलाने वाली घटना हुई थी. अब एक और. 
ऐसे मामलों में खुद को चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया का सक्रिय होना लाजिमी था. मेन स्ट्रीम का मीडिया ने अपना दायित्व ओढ़ा और सिस्टम की खामियों को बाहर लाया. पीडि़तों को हरसंभव इलाज और मदद मिले, इसके लिए सिस्टम को एक्टिव किया और इसके साथ ही ऐसे कलमवीरों की फौज खड़ी हो गई जिसने कभी स्वच्छ इंदौर को आइडिल बताया था, वह आज इंदौर को लपेट रहा है. उसे देश का सबसे गंदा शहर नजर आने लगा है. हर गली-चौराहों से गंदगी और शहर को बदसूरत बनाने वाली तस्वीरें वायरल हो रही हैं. ये सच है और ऐसा होना भी जरूरी है. लेकिन क्या कोई बताएगा कि बारिश के दिनों में जब इंदौर के सडक़ पानी से बेतरतीब हुआ जा रहे थे. नालियाँ बजबजा रही थीं और यातायात बेकार और बेकाम हो गया था, तब इंदौर की स्वच्छता पर किस किसने और कब सवाल उठाया था? क्यों नहीं बताया गया कि इंदौर स्वच्छ नहीं, मलिन शहर है. तब इसे बढ़ती आबादी के कारण रोजमर्रा की परेशानी बता कर छोड़ दिया गया था. एक और कारण है कि तब जनहानि नहीं हुई थी. 
बेशक इंदौर की कमियाँ गिनाइए, कोसिए, कटघरे में खड़ा कीजिये लेकिन ध्यान रखिए कि इंदौर को स्वच्छतम शहर बनाने में हम भी साथ थे. दूर-देश से कोई आता और कागज का टुकड़ा भी फेंक देता तो इंदौरी लपक कर कहते-भिया नहीं, इंदौर स्वच्छ शहर है. इसे स्वच्छ रखने में सहयोग कीजिए और खुद उस कागज को डस्टबीन के हवाले कर देते. आज क्या हो गया? मीडिया की संवेदनशीलता यहां दिखना चाहिए, यह मेरी निजी मान्यता है. कितने साथी भागीरथपुरा गए और परिवारों का हाल देखा? कितनी मानवीय संवेदना वाली खबरें की? कितने लोग उन परिवारों के दुख में शामिल हुए? कितने लोग और कोई दूषित पानी ना पिये, इसके लिए कैम्पेन चलाया? कितनों को जागरूक किया. नागरिक बोध के इस गौरवशाली इतिहास वाले शहर में हाथ सेंकने चले आए भिया, ये सब बाद में कर लेना. अभी मरहम की जरूरत है. अभी दवा और संवेदना की जरूरत है. लड़ तो हम बाद में भी लेंगे. अभी हाथ में हाथ देकर साथ चलने का वक्त है. सरकार की जिम्मेदारी सरकार पूरा करेगी लेकिन समाज की जवाबदारी तो हमी को करना होगा. बयानवीरों को ठिकाने लगाइए लेकिन भूल मत जाना कि हमारी जवाबदारी इससे आगे की और बड़ी है. सत्ता आती जाती रहती है. शहर का गौरव पर बात उठी तो हम सब को भुगतना होगा. संवेदना के रास्ते गौरव का शीश हमेशा ऊँचा रहता है और इस बात को हम सबको समझना होगा. देर-अबेर भगीरथपुरा सहित प्रदेश के अन्य हिस्सों के हालात ठीक होने लगेंगे. लेकिन जोश में हमने कुछ कर दिया तो उसका खामियाजा हमें सदियों तक भुगतना होगा. भिया, हाथ बाद में सेंक लेना, पहले इंदौर को बचा लो.

 

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

@मीठी मीठी यादें बातें साथ रख लें


















 प्रियजन

गुजरते साल की हर वो

मीठी मीठी यादें बातें साथ रख लें

जो जगाती हो उम्मीद

दिलाती हो भरोसा

भूल जाएं उन यादों, बातों

और लोगों को जो देते हैं दुख 

टूटती है उम्मीद 

खुद को भी परख लेना

किसका तोड़ा है भरोसा

या पहुंचा है हमसे दुख

जीवन हो जाता है सरल

जैसे उम्मीद टिकी है दुनिया 

भरोसे से रिश्ते और 

नया साल हो

उम्मीद और भरोसे का

नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं 

प्रो. मनोज कुमार

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

जो बचा है, उसे ही बचा लो

 जो बचा, उसे ही बचा लो

जैसे प्रेम और प्रकृति 

जैसे पेड़, पहाड़ और नदियां 

हम सब मर जाएंगे 

तब भी बचा रहेगा यह सब

इन्हें आज ना बचा पाए तो

कहां विसर्जित होंगी

तुम्हारी अस्थि

जब नहीं होगी नदियां 

कैसे जलेंगे तुम्हारे शव

जब नहीं होंगे जंगल

कैसे आनंदित होगे

जब नहीं होंगे पहाड़

जो बचा है, उसे ही बचा लो

प्रेम और प्रकृति 

प्रो. मनोज कुमार

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

‘ज्ञानपीठ’ का महाप्रयाण हो जाना

 





प्रो. मनोज कुमार

    आखिरकार ‘ज्ञानपीठ’ विनोद कुमार शुक्ल जीवन संघर्ष में पराजित होकर अलविदा कह दिया. उनका जाना नियति की स्वीकृति हो सकती है लेकिन समाज और साहित्य को यह बिलकुल भी गंवारा नहीं था. उनकी एक-एक धडक़न समाज के लिए धरोहर थी. कहते हैं सरल होना कठिन नहीं है लेकिन सरल बने रहना कठिन है. विनोदजी ने सरल बने रहना को सच कर दिखाया था. अविभाजित मध्यप्रदेश के एक कस्बानुमा शहर में पढ़ाते हुए वे रचना किया करते थे. उनके जानने वाले जानते थे कि विनोदजी किस मिट्टी के बने हुए हैं. बेहद सरल और सहज. अपनों से छोटे हों, हमउम्र हों या उम्रदराज, उनके पास जाकर किसी ने खुद को छोटा नहीं पाया. यह बहुत कम होता है कि किसी को श्रेष्ठ सम्मान से नवाजा जाए तो पूरा समाज स्वयं को सम्मानित महसूस करता है. विनोदजी को जब ‘ज्ञानपीठ’ मिलने का ऐलान हुआ तो यह भी उन अपवाद वाले पल-छीन में था. रायपुर से दिल्ली तक स्वागत और उत्साह का माहौल था. 

        ‘वह आदमी नया गरम कोट पहनकर चला गया विचार की तरह’ अपनी इस पहली कविता संगह से वे चर्चा में आ गए. यह प्रयोगधर्मी शीर्षक को पढक़र सुनकर साहित्य प्रेमी चौंक गए थे. तब उस दौर में ऐसा प्रयोग ना के बराबर था. वे इस बात के कभी हामी नहीं रहे कि कविता को नारे की तरह गढ़ा जाए. उनकी रचनाओं में लोक की छाप दिखती है तो आधुनिक समाज में हो रहे परिवर्तन, आकांक्षाओं के साथ उनकी संवेदनशीलता झलकती है. सही मायने में देखा जाए तो उनका लेखन सुपतिेिष्ठत कवि भवानी प्रसाद मिश्र की बातों को आगे बढ़ाते हुआ दिखता है जिसमें भवानी भाई कहते हैं- जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख, और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख. 

विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर के थे लेकिन उनकी कविताएं और कथा संसार सारी भौगोलिक सीमा को लांघ जाती है. ज्ञानपीठ सम्मान का ऐलान हो जाने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि ‘मेरे पास में शब्द नहीं हैं कहने के लिए, क्योंकि बहुत मीठा लगा कहूंगा, तो मैं शुगर का पेशेंट हूं. मैं इसको कैसे कह दूं कि बहुत मीठा लगा. बस अच्छा लग रहा है.’. यह सादगी उन्हें और बड़ा बनाती है. 

एक जनवरी, 1937 में विनोद कुमार शुक्ल का जन्म साहित्य से रचे-बसे शहर राजनांदगांव में हुआ. वे अध्यापक रहे और पूरा समय साहित्य को समर्पित कर दिया था.  उम्र के 88वें पड़ाव पर खड़े विनोद कुमार शुक्ल वैसे ही सहज और सरल रहे जैसा कि छत्तीसगढ़ का एक व्यक्ति होता है. वे ज्ञानपीठ सम्मान को केवल सम्मान नहीं मानते हैं बल्कि अपनी जवाबदारी के रूप में देखते थे. बकौल विनोद कुमार शुक्ल ‘मुझे लिखना बहुत था, बहुत कम लिख पाया. मैंने देखा बहुत, सुना भी मैंने बहुत, महसूस भी किया बहुत, लेकिन लिखने में थोड़ा ही लिखा. कितना कुछ लिखना बाकी है, जब सोचता हूं, तो लगता है बहुत बाकी है. इस बचे हुए को मैं लिख लेना चाहता हूं. अपने बचे होने तक मैं अपने बचे लेखक को शायद लिख नहीं पाऊंगा, तो मैं क्या करूं? मैं बड़ी दुविधा में रहता हूं. मैं अपनी जिंदगी का पीछा अपने लेखन से करना चाहता हूं. लेकिन मेरी जिंदगी कम होने के रास्ते पर तेजी से बढ़ती है और मैं लेखन को उतनी तेजी से बढ़ा नहीं पाता, तो कुछ अफसोस भी है’. ऐसे थे विनोद जी.

विनोद जी के उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ पर सुपरिचित फिल्मकार मणि कौल फिल्म भी बना चुके हैं. उनकी कहानियाँ ‘आदमी की औरत’ एवं ‘पेड़ पर कमरा’ पर राष्ट़ीय फिल्म इंस्टीट्यूट, पूना द्वारा अमित दत्ता के निर्देशन में निर्मित फिल्म को वेनिस अंतरराष्टीय फिल्म समारोह 2009 में ‘स्पेशल मेनशन अवार्ड’ मिला. उनके उपन्यास ‘दीवार में एक खिडक़ी रहती थी’ पर प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक मोहन महर्षि सहित अन्य रचनाओं पर निर्देशकों द्वारा नाट्य मंचन भी हो चुका है.

ज्ञानपीठ के पहले उन्हें मध्यपदेश शासन का गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप, मध्यप्रदेश कला परिषद  का रज़ा पुरस्कार, मध्यपदेश शासन का शिखर सम्मान, राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, मोदी फाउंडेशन का  दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान, भारत सरकार का साहित्य अकादमी सम्मान, उत्तरपदेश हिन्दी संस्थान का हिन्दी गौरव सम्मान, अंग्रेजी कहानी संग्रह के लिए मातृभूमि सम्मान के साथ ही साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सर्वोच्च सम्मान ‘महत्तर सदस्य’ मनोनीत किया गया था. 

विशिष्ट भाषिक बनावट, संवेदनात्मक गहराई, उत्कृष्ट सृजनशीलता से उन्होंने भारतीय भाषा साहित्य को समृद्ध किया है. इसलिए कहते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल हो जाना आसां नहीं है. तभी तो 59वें ज्ञानपीठ सम्मान के लिए चयनित हो जाने की सूचना के बाद हिंदी के वरिष्ठ कवि-चिंतक अशोक वाजपेयी का कहते हंै कि ‘यह सम्मान एक ऐसे व्यक्ति को दिया गया है, जिसने अपनी रचनाधर्मिता को निपट साधारण और नायकत्व से निरपेक्ष व्यक्ति को समर्पित किया है’. वे समाज के नब्ज को जानते हैं और उन पर भी उनका दखल है. 

विनोद कुमार शुक्ल की कविता संगह लगभग जयहिंद वर्ष, 1971, वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह, वर्ष 1981, सब कुछ होना बचा रहेगा, वर्ष, 1992, अतिरिक्त नहीं, वर्ष 2000, कविता से लंबी कविता, वर्ष 2001, आकाश धरती को खटखटाता है, वर्ष 2006, पचास कविताएँ, वर्ष 2011, कभी के बाद अभी, वर्ष 2012, कवि ने कहा -चुनी हुई कविताएँ, वर्ष 2012, प्रतिनिधि कविताएँ, वर्ष 2013 में पकाशित हुई. उपन्यास संग्रह नौकर की कमीज़, वर्ष 1979, खिलेगा तो देखेंगे, वर्ष 1996, दीवार में एक खिडक़ी रहती थी, वर्ष 1997, हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़, वर्ष 2011, यासि रासा त, वर्ष 2017, एक चुप्पी जगह, वर्ष 2018 है. कहानी संग्रह मेें पेड़ पर कमरा, वर्ष 1988, महाविद्यालय, वर्ष 1996, एक कहानी, वर्ष 2021, घोड़ा और अन्य कहानियाँ, वर्ष 2021 के साथ कहानी/कविता पर पुस्तक ‘गोदाम’, वर्ष 2020, ‘गमले में जंगल’, वर्ष 2021 हैं. विनोद कुमार शुक्ल की अनेक कृतियों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है. साहित्य, संस्कृति एवं मनुष्यत्व के ‘ज्ञानपीठ’ विनोद जी के चले जाने से उनके पीछे जो रिक्तता आयी है, उसे भरा पाना लगभग कठिन सा होगा. तस्वीर इंटरनेट से साभार

 


सोमवार, 22 दिसंबर 2025

#रिसर्च जर्नल ‘समागम’ जनवरी 2026 का अंक ‘गांधी का अर्थशास्त्र’ पर एकाग्र



 25वें वर्ष का अंतिम अंक ‘गांधी का अर्थशास्त्र’ पर एकाग्र 

रिसर्च जर्नल ‘समागम’ जनवरी 2026 में अपने प्रकाशन के 25वें वर्ष पूर्ण कर लेगा. शोध और संदर्भ की इस मासिक प्रकाशन को देशभर के बुद्धिजीवियों, अध्यापकोंं, विद्यार्थियों एवं स्कॉलर का पूरा सहयोग एवं समर्थन मिलता है. आरंभ से प्रयास रहा है कि कुछ अलग करें और इस सोच के साथ हम नवाचार की ओर कदम बढ़ाते हुए रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का प्रत्येक अंक विषय-विशेष का रहा. भारतीय सिनेमा के सौ साल, गांधी की साद्र्धशती, महिला सशक्तिकरण के सौ वर्ष, रेडियो का सफर, खादी पर, विश्व हिन्दी सम्मलेन सहित अनेक विषयों पर अंक का प्रकाशन किया जाता रहा. हाल ही में दिवंगत विज्ञापन गुरु पीयूष पांडे पर रिसर्च जर्नल ‘समागम’ अंक एकाग्र प्रस्तुत किया गया. रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का 25वें वर्ष का अंतिम अंक ‘गांधी का अर्थशास्त्र’ पर एकाग्र है. 

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण

 



























-मनोज कुमार 
 इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण. इस बात में अब कोई दो राय नहीं है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण हो चुका है. आने वाले समय में व्यवसायिकरण का यह चेहरा और विकृत और विकराल देखने को मिले तो समाज को हैरान नहीं होना चाहिये.  माध्यम अर्थात अंग्रेजी का शब्द मीडिया. मीडिया का सामान्य सा अर्थ है मीडियम अर्थात समाज और सरकार के बीच संवाद का सेतु किन्तु संवाद का यह सेतु वह चाहे इलेक्ट्रानिक हो या मुद्रित, दोनों का चेहरा कारोबारी हो गया है. इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने के पूर्व पत्रकारिता एवं माध्यम दोनों के स्वरूप एवं चरित्र पर गौर करना उचित होगा. पत्रकारिता एवं माध्यम अर्थात मीडिया दोनों की विषय-वस्तु अलग अलग है. दोनों की प्रवृति एवं प्रकृति एकदम अलग हैं. व्यवसायिकरण की चर्चा के पूर्व दोनों को समझना होगा. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण की बात करने के पूर्व मीडिया और पत्रकारिता के अन्र्तसंबंध एवं इन दोनों के बीच का अंतर समझना होगा. सबसे पहले मैं पत्रकारिता की प्रवृति एवं प्रकृति पर प्रकाश डालना चाहूंगा. 
सर्वप्रथम हम बात करेंंगे पत्रकारिता की. पत्रकारिता समाज का वटवृक्ष है तो मीडिया नये जमाने का संचार माध्यम. पत्रकारिता निरपेक्ष होकर, लाभ-हानि के गणित से परे रहकर, सामाजिक सरोकार की पैरोकार है. पत्रकारिता का चरित्र और कार्य व्यवहार, मीडिया से एकदम भिन्न है. पत्रकारिता दिल से होती है. समाज में जब अन्याय होता है, अराजकता की स्थिति बनती है और आम आदमी के हितों पर कुठाराघात होता है तो पत्रकारिता स्वयं में आंदोलित हो उठती है. स्मरण कीजिये पराधीन भारत के उस दौर को जब गोरे शासकोंं के नाक में पत्रकारिता ने दम कर रखा था. तिलक, महात्मा गांधी से लेकर गणेशशंकर विद्यार्थी, गोखले, माधवराव सप्रे, माखनलाल चतुर्वेदी जैसे दर्जनों लोगों ने अपनी लेखनी से अंग्रेज शासकों की नींद उड़ा दी थी. समय बदला, काल बदला लेकिन पत्रकारिता के तेवर नहीं बदले. देश के स्वाधीन होने के बाद भारत वर्ष के नवनिर्माण में पत्रकारिता ने अपना योगदान दिया. देश की पहली पंचवर्षीय योजनाओं के लागू होने के साथ ही भ्रष्टाचार का श्रीगणेश हुआ. पत्रकारिता अपनी ही सरकार को आईना दिखाने से नहीं चूकी. परिणाम यह हुआ कि भ्रष्टाचार तो हुआ लेकिन उसका ग्राफ रूक गया. यह मान लेना भी भूल होगी कि पत्रकारिता ने भ्रष्टाचार को, अनाचार को, अत्याचार को खत्म कर दिया है लेकिन पत्रकारिता की ही ताकत थी कि भ्रष्ट को भ्रष्टतम नहीं होने दिया. पत्रकारिता को दमन का शिकार भी होना पड़ा है. पराधीन भारत में अंग्रेज शासकों ने किया और स्वतंत्र भारत में हमारे अपनों ने ही. उन अपनों ने जिन्हें अपनी करतूतों के खुल जाने का भय था. पत्रकारिता की ही ताकत है कि 25 बरस से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी अरूण शौरी द्वारा उद्घाटित किया गया बोफोर्स का मामला आज भी जीवित है. विश्व की भीषणत औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड को भला कौन भूल सकता है. एक अनाम सा साप्ताहिक अखबार ने सचेत किया था. पत्रकारिता का यह चरित्र है. पत्रकारिता के इस चरित्र के कारण ही पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तंभ संबोधित किया गया . 
पत्रकारिता का इतिहास हमें गर्व से भर देता है. पराधीन भारत से लेकर स्वाधीन भारत की पत्रकारिता की विश्वसनीयता इतनी पक्की है कि करीब ढाई सौ सालों के इतिहास में कोई अखबार अथवा पत्रिका गलत खबर छापने के कारण बंद नहीं हुई लेकिन पश्चिमी देशों में पत्रकारिता की जो दशा है, उसके चलते हाल ही में सौ साल से अधिक पुराने अखबार का प्रकाशन बंद कर दिया गया. भारत में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन रूका या बंद हुआ तो सिर्फ इसलिये कि उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी. वे व्यवसायिक नहीं बन पाये. पत्रकारिता एक चुनौती है. यह चुनौती आपको कस्बाई पत्रकारिता में देखने को मिल जाएगी. जहां एक दरोगा, एक पटवारी या एक मामूली सा धनवान व्यक्ति भी अपने खिलाफ कुछ पढऩा या सुनना नहीं जानता है. ऐसे में सच का साथ देना ही पत्रकारिता है.
पत्रकारिता की अपनी भाषा होती है. उसकी अपनी शैली है. पत्रकारिता की भाषा बेलौस नहीं होती है. वह संयमित होती है और सम्मानजनक भी. पत्रकारिता किसी को बेपर्दा भी करती है तो पूरे तथ्य और प्रमाण के साथ. वह सनसनी नहीं फैलाती है. पत्रकारिता का गुण यह भी है कि वह खबर का पीछा करती है. जिसे अंग्रेजी में फालोअप कहते हैं. वह आखिरी सिरे तक पहुंच कर सच को सामने लाने की कोशिश करती है ताकि समाज में शुचिता कायम रहे. पत्रकारिता का यह गुण उसकी विश्वसनीयता को बनाये रखता है. आगे पाठ, पीछे सपाट पत्रकारिता की शैली नहीं है. 
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की बात के बरक्स मैं वापस दोहराना चाहूंगा कि इसे एक ही नाम मिला है मीडिया. मीडिया में पत्रकारिता को भी शामिल किया गया है, बावजूद इसके मीडिया और पत्रकारिता का फर्क वैसा ही दिखता है जैसा कि इलहाबाद में गंगा और जमुना के संगम का.  मीडिया का कार्य-व्यवहार दिमाग से होता है. वह पहले लाभ-हानि का गणित लगा लेता है. वह अपने लाभ को पहले रखता है, फिर वह एक निश्चित सोच के साथ अपने कार्य को पूर्ण करता है. मीडिया अर्थात टेलीविजन के पर्दे पर वही दिखाया जाता है, जो मीडिया के पक्ष में लाभकारी होता है. संचार के इस विधा में दिल का नहीं, सौफीसद दिमाग का कब्जा होता है. पत्रकारिता और मीडिया के बीच यह बुनियाद अंतर दोनों को कई अर्थों में अलग करता है. मीडिया का बहुत सीधा वास्ता सामाजिक सरोकार से नहीं होता है. वह अपने लाभ के लिये लोगों की इमेज बिल्डिंग का काम करता है. जिन खबरों या घटनाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम स्थान देता है तो इसलिये कि उसकी टीआरपी बढ़ सके. 
मीडिया की उत्पत्ति लगभग तीन दशक के आसपास की है. मीडिया शब्द आया कहां से, यह अनसुलझा सा है.  इस बारे में विद्वानों की राय भी स्पष्ट नहीं है. कुछ लोगों का मत है कि जिस तरह पत्रकारिता से सम्पादक संस्था का लोप कर दिया गया, उसी समय मीडिया शब्द को चलन में लाया गया. सम्पादक संस्था की कमान प्रबंधकों के हाथों में आ गयी और मीडिया में सम्पादक संस्था के लिये कोई स्थान रखा ही नहीं गया था. इस तरह अर्मूत रूप से मीडिया शब्द की रचना की गयी और बेहद चालाकी के साथ इसे स्थापित कर दिया गया. मीडिया तो माध्यम है ही, पत्रकारिता को भी माध्यम बना दिया गया.
उपरोक्त संदर्भ के रूप में अब यह बात हमारे सामने स्पष्ट हो जाती है कि पत्रकारिता क्या है, उसकी प्रवृति और प्रकृति क्या है तथा मीडिया की प्रवृत्ति और प्रकृति क्या है. इन दोनों के बीच का अन्र्तसंबंध भी लगभग स्पष्ट हो गया है. सवाल यह है कि क्या दोनों माध्यम व्यवसायिक हो गये हैं, तो इस सवाल का सीधा-सादा जवाब हां में है. मुद्रित माध्यम से आशय पत्रकारिता से हो सकता है और आज की तारीख में पत्रकारिता को लेकर जो संशय और सवाल उठाये जा रहे हैं, सवाल उठ रहे हैं, वह पत्रकारिता के व्यवसायिकरण की ओर संकेत करता है. कुछ आगे बढक़र कहें कि पत्रकारिता के व्यवसायिकरण की बात को स्थापित करता है तो भी गलत नहीं होगा. पत्रकारिता के हिस्से में पेडन्यूज का जो धब्बा बार बार लगता रहा है, वह पत्रकारिता के व्यवसायिकरण का ही उदाहरण है. पेडन्यूज को लेकर चिंता चारों तरफ है तो इसलिये कि पत्रकारिता का मूल स्वरूप सामाजिक दायित्व, निरपेक्ष व्यवहार और सच का साथ देने की ताकत खत्म न हो जाये. यह बात हमें सुकून देती है कि पेडन्यूज का दाग तो लगा है लेकिन अभी रोशनी के कुछ सुराख ही बंद हुये हैं. पूरा केनवास अभी काला नहीं हुआ है. हालांकि जिस तेजी से पत्रकारिता का व्यवसायिकरण हो रहा है, वह भयावह है. पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामले प्रकाश में आये हैं जहां पत्रकारिता के दिग्गज भ्रष्टाचारियों को बचाने में शामिल पाये गये. यह और बात है कि प्रमाण के अभाव में या प्रभाव के बूूते पर वे अपने आसान पर जमे हुये हैं. अब पत्रकारिता की भाषा भी बेलौस होती जा रही है क्योंकि वह बाजार की भाषा बोलने लगी है. मुद्रित माध्यम का व्यवासायिक होने के पीछे उसका आधुनिक भी हो जाना है. महंगी मशीनें, महंगी छपाई, कागज और उत्पादन खर्च इतना है कि वह दो-पांच रूपये की कीमत से वसूला नहीं जा सकता है. इस तरह मुद्रित माध्यम पूर्णरूप से व्यवसायिकरण की ओर कदम बढ़ चुका है.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम अपने जन्मकाल से व्ययवसायिक रहा है. पत्रकारिता अथवा मुद्रित माध्यम के विपरीत इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का चरित्र है. दूरदर्शन का जब जन्म हुआ था, तब इसे बुद्धु बक्सा कह कर इसे समाज ने तव्वजो नहीं दी थी किन्तु आकाशीय चैनलों के आगमन के साथ इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का एकछत्र राज्य कायम हो गया. इस माध्यम ने एक वाक्य गढ़ा जो दिखता है, वो बिकता है और इसी सूत्रवाक्य के सहारे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पूरी तरह बाजार के कब्जे में आ गया. व्यवसायिकरण कुछ इस माध्यम की बुनियादी जरूरतें थी तो कुछ उसने स्वयं उत्पन्न कर लिया. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने मान लिया कि बाजार के मन के मुताबिक उसे चलना है और वह चलता गया. एक प्रिंस के गड्ढे में गिर जाने को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने इतना हाइप दिया कि लगा कि संसार में पहली दफा कोई बच्चा गड्ढे में गिरा है. इसके बाद ऐसी घटनाओं को दिखाने में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की रूचि कम होने लगी. उसे पता था कि दर्शक बहुत ज्यादा नहीं झेल पायेंगे. तथ्यपरक घटनाओं को दिखाने की कोशिश तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में होती है लेकिन अवसर पाकर इस माध्यम ने सनसनी फैलायी है. ऐसा एक बार नहीं, कई कई बार हुआ है. दिल्ली की एक शिक्षिका के मामले में तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को अदालत का सामना भी करना पड़ा है.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की प्रवृति हमेशा से आगे पाठ, पीछे सपाट की रही है. वह खबरों के पीछे भागना नहीं जानता है अथवा नहीं चाहता है. वह हर घड़ी नयी खबर की तलाश में जुटा रहता है. खबरों को अथवा घटनाओं को बीच में छोड़ देना भी इस माध्यम की प्रवृति रही है. इस बात का एक बड़ा उदाहरण है ऑपरेशन चक्रव्यूह. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने उन सांसदों को बेनकाब करने का अभियान चलाया था जो कथित रूप से गैरकानूनी ढंग से धन प्राप्त करते हैं. इस ऑपरेशन में 11 सांसदों को घेरे में लिया गया था और अचानक से यह अभियान बंद कर दिया गया. इसके पीछे क्या कारण समझा या माना जाये, दर्शकों के पास जो संदेश गया, वह क्या यह नहीं था कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का व्यवसायिकरण हो चुका है और शायद इन्हीं कारणों से यह अभियान बीच में बंद कर दिया गया. करप्सन अंगेस्ट इंडिया आंदोलन में भी मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाया गया था. जी-जिंदल विवाद किस बात की तरफ संकेत करते हैं?  इस तरह यह बात साफ है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का व्यवसायिकरण हो चुका है.
निष्र्कषत: हम यह मान लेना चाहिये कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम एवं मुद्रित माध्यम व्यवसायिकरण की तरफ अपना कदम बढ़ा चुके हैं. कुछ व्यवसायिक जरूरतों के कारण और कुछ कथित रूप से उत्पन्न जरूरतों के कारण. मुद्रित माध्यम को पेडन्यूज जैसे कलंक से स्वयं को बचाना होगा. यह राहत की बात है कि व्यवसायिकरण के इस दौर में मुद्रित माध्यम ने अपनी साख बचाकर रखी है. मुद्रित माध्यम पर लोगों का विश्वास अभी भी कायम है और बार बार टेलीविजन के पर्दे पर खबरें देखने और सुनने के बाद भी वह अखबार और पत्रिकाओं के पन्ने पलटने के बाद ही राहत पाता है. (औरगाबाद में हुए एक  दिवसीय सेमिनार में दिया गया भाषण) 

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