गुरुवार, 3 सितंबर 2026

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुनिया को उन्होंने उस बुरे दौर में भी जिंदा रखकर भारत की सनातनी परंपरा को आगे बढ़ाया है. समय बदला और चीजें भी बदली लेकिन गिरमिटिया शब्द एक तरह से उनके साथ चिपक गया है. कोई सौ वर्ष पहले गुलामी की प्रतीक जो कांट्रेक्ट हुआ करता था, उसे कानूनन समाप्त कर दिया गया है. गिरमिटिया के इस संसार पर केन्द्रित अंतरराष्ट्रीय मानक की अनुसंधान पत्रिका का अक्टूबर 2026 का यह महत्वपूर्ण अंक है. माना जाता है कि पहले गिरमिटया महात्मा गांधी थे, सो उनके जन्मदिवस पर यह अंक गिरमिटिया गांधी को समर्पित कर रहे हैं. इस अंक को समृद्ध बनाने के लिए आपके विचार, लेख और शोध आलेख आमंत्रित हैं. 25 सितंबर, 2026 तक हमें भेजिए.

बुधवार, 2 सितंबर 2026

श्रीकृष्ण, सांदीपनी और जेन अल्फा

 जनमाष्टमी ओर शिक्षक दिवस पर विशेष

श्रीकृष्ण, सांदीपनी और जेन अल्फा

प्रो. मनोज कुमार
श्रीकृष्ण का उदात्त चरित्र को लेकर हम हमेशा से ऊर्जावान रहे हैं। जिस सहजता और सरलता से उन्होंने जीवन जीने की सीख दी है, वह अपने आप में विशिष्ट है। सतयुग से लेकर वर्तमान समय में श्रीकृष्ण हमेशा से सामयिक रहे हैं। जब हम श्रीकृष्ण के जीवन का विवेचन करते हैं तो सहज ही शिक्षा के व्यापक परिप्रेक्ष्य में श्रीकृष्ण और उनके गुरु सांदीपनि का संबंध हमें भारतीय ज्ञान परंपरा से अवगत कराता है। भारतीय ज्ञान-परंपरा में शिक्षा केवल सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं रही है। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को ज्ञानवान बनाने के साथ-साथ विवेकशील, अनुशासित, संवेदनशील और उत्तरदायी बनाना भी रहा है। वर्तमान समय में हम श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए जेन अल्फा तक आ गए हैं। इस समय भी भारतीय ज्ञान परंपरा हमें इस बात का स्मरण कराती है कि श्रीकृष्ण भी अपने समय में जेन अल्फा रहे हैं लेकिन उन्हें किशोर वय संबोधन दिया गया। आधुनिक टेक्रालॉजी के दौर में यह समझना रोचक होगा कि श्रीकृष्ण, सांदीपनी और जेन अल्फा का रिश्ता कैसे सामयिक हो सकता है। और यह भी कि इस संदर्भ में हम गुरु-शिष्य परंपरा को किस तरह देखते हैं। यह संयोग है कि पहले दिन हम श्रीकृष्ण के उदात्त चरित्र का स्मरण कर रहे हैं और अगले दिन ही हम शिक्षक दिवस मनाएंगे और दोनों दिनों में श्रीकृष्ण की उपस्थिति अपरिहार्य है।
आज शिक्षा के सामने चुनौती केवल ज्ञान उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि ज्ञान के असीमित प्रवाह में सही ज्ञान का चयन करने की है। श्रीकृष्ण के समय में ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरु के पास जाना पड़ता था; आज के जेन अल्फज्ञ के समय में ज्ञान स्वयं बच्चे की स्क्रीन तक पहुँच रहा है। तब गुरु ज्ञान का प्रमुख स्रोत था, आज इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी ज्ञान के स्रोत बन चुके हैं। किंतु ज्ञान के स्रोत बदल जाने से ज्ञान की आवश्यकता, विवेक की आवश्यकता और मार्गदर्शन की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है। इसी दृष्टि में श्रीकृष्ण और उनके गुरु सांदीपनि के संबंध को भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा के स्वरूप में देखते हैं तो दूसरी ओर, आज की  पीढ़ी है जिसका जन्म डिजिटल तकनीक, इंटरनेट, स्मार्टफोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया के वातावरण में हुआ है।
भारतीय परंपरा में सांदीपनि आश्रम का उल्लेख केवल इस कारण महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वहाँ श्रीकृष्ण और बलराम ने शिक्षा प्राप्त की, बल्कि इसलिए भी कि यह आश्रम उस शिक्षा-दृष्टि का प्रतीक है जिसमें विद्यार्थी का निर्माण बहुआयामी रूप से किया जाता था। गुरु के सान्निध्य में विद्यार्थी केवल विषयगत ज्ञान अर्जित नहीं करता था, बल्कि जीवन जीने की कला, अनुशासन, कर्तव्य, सामाजिक उत्तरदायित्व और आत्मसंयम भी सीखता था।  प्रश्न यह है कि क्या हजारों वर्ष पुरानी सांदीपनि-परंपरा और आज की डिजिटल पीढ़ी के बीच कोई सार्थक संवाद संभव है? यदि संभव है तो वह संवाद किस प्रकार का होगा?
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व इस शिक्षा-दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण माना जा सकता है। वे एक साथ दार्शनिक, कूटनीतिज्ञ, योद्धा, प्रशासक, मित्र और मार्गदर्शक के रूप में सामने आते हैं। उनके व्यक्तित्व में ज्ञान और कर्म का जो समन्वय दिखाई देता है, वह इस बात की ओर संकेत करता है कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य परीक्षा में सफलता प्राप्त करना मात्र नहीं, बल्कि जीवन की जटिल परिस्थितियों का विवेकपूर्ण सामना करने की क्षमता विकसित करना है। वहीं जेन अल्फा अनेक प्रकार की सूचनाओं और विकल्पों से घिरा हुआ है। उसे केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि क्या जानना है; उसे यह भी सिखाना आवश्यक है कि क्या स्वीकार करना है, क्या अस्वीकार करना है और क्यों स्वीकार या अस्वीकार करना है। चुनौती यह है कि यह पीढ़ी अपने जिज्ञासा का समाधान करने या किसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए पुस्तकालय तक जाने के बजाय कुछ सेकंड में डिजिटल माध्यमों में तलाश करने लगता है। हम मानते हंै कि सूचना का विस्फोट हो रहा है और यह लाजिमी भी है लेकिन हम यह भी मानते हैं कि परंपरा और अनुभव का कोई विकल्प नहीं। सूचना की अधिकता भी ज्ञान की गारंटी नहीं है। श्रीकृष्ण की शिक्षा और जेन अल्फा की शिक्षा के मध्य यह बड़ा अंतर दिखता है।
श्रीकृष्ण का समकालीन महत्त्व इसी बिंदु पर दिखाई देता है। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व हमें यह समझने में सहायता करता है कि ज्ञान तब तक अधूरा है, जब तक उसमें विवेक और परिस्थिति-बोध का समावेश न हो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सामने केवल सूचनाओं का ढेर नहीं रखा। उन्होंने उसे कर्तव्य, कर्म, आत्मबोध और निर्णय के प्रश्नों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया। सांदीपनि की परंपरा हमें गुरु की एक ऐसी भूमिका की याद दिलाती है जिसमें गुरु विद्यार्थी के व्यक्तित्व को समझता है। वह केवल विषय नहीं पढ़ाता, बल्कि विद्यार्थी के भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानता है। डिजिटल युग ने शिक्षक की भूमिका को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है। गुरु की भूमिका मार्गदर्शक और मूल्य-निर्माता के रूप में और अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकती है। शिक्षक को बच्चे को यह सिखाना होगा कि तकनीक का उपयोग कैसे किया जाए, लेकिन उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि तकनीक का उपयोग किस उद्देश्य से किया जाए। यह भी सत्य है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता विद्यार्थी के लिए उत्तर लिख सकती है, लेकिन शिक्षक उसे यह सिखा सकता है कि उस उत्तर की सत्यता की जाँच कैसे की जाए। इंटरनेट जानकारी दे सकता है, लेकिन शिक्षक यह समझा सकता है कि जानकारी को ज्ञान और ज्ञान को विवेक में कैसे बदला जाता है। गुरु-शिष्य संबंध को नए संदर्भों में पुनर्परिभाषित किए जाने की आवश्यकता है।
आने वाला समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और डिजिटल अर्थव्यवस्था का है। ऐसे में अनेक पारंपरिक रोजगार बदलेंगे और नई प्रकार की क्षमताओं की आवश्यकता होगी। लेकिन तकनीकी दक्षता के साथ मानवीय गुणों का महत्त्व कम नहीं होगा। सहानुभूति, सहयोग, धैर्य, नेतृत्व, नैतिक निर्णय, रचनात्मकता और सामाजिक उत्तरदायित्व ऐसी क्षमताएँ हैं जिन्हें मशीनें पूर्ण नहीं कर सकती हैं अपितु अनुभव ही यहाँ कारगर भूमिका निभाएगा।
डिजिटल गुरुकुल की आवश्यकता
सांदीपनि आश्रम को आधुनिक संदर्भ में देखा जाए तो आज के विद्यालय और विश्वविद्यालय एक प्रकार के डिजिटल गुरुकुल में परिवर्तित हो सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिक शिक्षा को पुराने गुरुकुल की नकल करने के स्थान पर उसके मूल तत्वों—अनुशासन, संवाद, आत्मीयता, अनुभवात्मक शिक्षा, प्रकृति से जुड़ाव और चरित्र-निर्माण—को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा जाना चाहिए। ऐसी शिक्षा वास्तव में आधुनिक तकनीक और प्राचीन ज्ञान-दृष्टि का समन्वय होगी।
जड़ों की और लौटता मध्यप्रदेश
कहते हैं कि नाम का प्रभाव अधिक होता है और उसी के अनुरूप भाव बनते बिगड़ते हैं। सांदीपनि संबोधन सुनते ही भला-भला सा लगता है और मोहन सरकार ने अंग्रेजी दासता से मुक्त करते हुए सीएमराइज स्कूल के स्थान पर सांदीपनि संबोधन दिया है। सीएमराइज स्कूल का संबोधन से भाव अंग्रेजियत का हो जाता है वहीं सांदीपनि हमारी परंपरा की ओर लौटने का संकेत देता है। यह नहीं, मध्यप्रदेश में श्रीकृष्ण ने शिक्षा ग्रहण की थी, सो सांदीपनि अपने आपमें सुंदर और सम्मानजनक भी है।
यह भी समझना होगा कि सांदीपनि की परंपरा विद्यार्थी को केवल परीक्षा के लिए तैयार नहीं करता है अपितु उसे जीवन के लिए तैयार करता है। सांदीपनि-परंपरा का आधुनिक पुनर्पाठ हमें याद दिलाता है कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य अच्छे अंक नहीं, अच्छा मनुष्य बनाना है। वर्तमान समय में मन के अनुकूल परीक्षा परिणाम नहीं आने पर अनेक आत्महंता के उदाहरण देखने को मिलते हैं। यह दुर्भाग्यजनक है। शिक्षा हमें ज्ञान, विवेक और कर्म के समन्वय की प्रेरणा देते हैं और जेन अल्फा हमें यह चुनौती देती है कि इन मूल्यों को नई तकनीकी दुनिया में किस प्रकार जीवित रखा जाए। शिक्षा को तकनीक-विरोधी नहीं, बल्कि तकनीक-सचेत और मूल्य-संपन्न बनाना होगा। सांदीपनि जैसी मार्गदर्शक शिक्षा, श्रीकृष्ण जैसा विवेक और  जेन अल्फा जैसी तकनीकी जिज्ञासा। हम मानते हैं कि संतुलित समन्वय संभव हो सका, तो डिजिटल युग की शिक्षा केवल स्मार्ट नहीं होगी, बल्कि सार्थक, संवेदनशील और मानवीय भी होगी। आइए श्रीकृष्ण के साथ शिक्षकों का भी स्मरण कर लें क्योंकि एक सुशिक्षित समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित शिक्षक की आवश्यकता हमेशा रहेगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबंद्ध हैं)

सोमवार, 20 जुलाई 2026

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता













लिव-इन रिलेशनशिप :

स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता 

प्रो. मनोज कुमार

लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इससे सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न नहीं हो रहा है? बिलकुल इस नए किस्म के रिश्ते से कई तरह की समस्या उत्पन्न हो रही है। आए दिन अपराध के जो नए-नए मामले आ रहे हैं, वह कानूनी दृष्टि से एक बड़ी समस्या बन चुकी है तो समाज में अविश्वास का भाव उत्पन्न हो रहा है। जिस सनातनी समाज की हम कल्पना करते हैं, वहाँ वसुधैव कुंटुंबकम की बात करते हैं, वहाँ इस तरह के नए रिश्तों को कोई जगह नहीं है। अलग-अलग किस्म के सर्वे में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि अब लड़कियाँ जल्द शादी नहीं करना चाहती हैं या नहीं करना चाहती हैं। कई ऐसे सेलिब्रेटी हैं जिन्होंने पिछले दिनों भारतीय विवाह संस्था को बेकार और बेकाम साबित करने वाले बयान दिए हैं। भारतीय वैवाहिक संस्था किसी धर्म के आधार पर नहीं बल्कि सुविचारित अनादिकाल से बनी हुई है। विवाह का अर्थ केवल संतान उत्पन्न करना नहीं है अपितु दो परिवार आपस में मिलते हैं और समग्र विकास, सहयोग और विश्वास का रिश्ता बनता है। यही भारतीयता का मूल आधार है लेकिन लिव-इन रिलेशनशिप ने जैसे इसे ताक पर रख दिया है।   

जब हम कानून के परिप्रेक्ष्य में चर्चा करते हैं तो कानून समाज में सभी के अधिकारों की बात करता है और इसे उसका दायित्व माना जा सकता है। जैसा कि लिव-इन रिलेशनशिप के लिए  व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा माना है। इस पर समाज में लंबे समय से विमर्श चल रहा है और बातें आगे भी होती रहेंगी। इस संबंध में मध्यप्रदेश सरकार ने प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) के अंतर्गत लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। यह कानून वर्तमान समय में सामाजिक और कानूनी दृष्टि से चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। सरकार का उद्देश्य लिव-इन संबंधों को कानूनी मान्यता प्रदान करने के साथ-साथ महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। संभव है कि जल्द ही प्रस्तावित प्रावधान अमल में लाया जा सके। सरकार जो कर सकती है, वह कर रही है।  प्रस्तावित नए कानून में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि लिव-इन संबंध में रहने वाले जोड़ों को अपने संबंध का पंजीकरण एक निर्धारित समय सीमा, अर्थात् एक महीने के भीतर कराना अनिवार्य होगा। सरकार का मानना है कि इससे संबंधों में पारदर्शिता आएगी तथा भविष्य में उत्पन्न होने वाले विवादों को कम किया जा सकेगा। प्रस्तावित कानून के अनुसार यदि कोई व्यक्ति निर्धारित समय में अपने लिव-इन संबंध का पंजीकरण नहीं कराता है, तो उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार नियमों के उल्लंघन पर दंड और कारावास का प्रावधान भी प्रस्तावित किया गया है। इसका उद्देश्य लोगों को कानून का पालन करने के लिए प्रेरित करना है।

सरकार की चिंता इस बात से जाहिर होती है कि इस कानून का एक महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा है। कई बार लिव-इन संबंधों में महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक और कानूनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। संबंध टूटने की स्थिति में महिलाओं के लिए भरण-पोषण, संपत्ति और बच्चों की देखभाल से जुड़े प्रश्न उत्पन्न होते हैं। प्रस्तावित कानून इन समस्याओं के समाधान के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करने का प्रयास करता है। महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए इसके अतिरिक्त, लिव-इन संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को भी समान अधिकार देने का प्रावधान किया गया है। सरकार का मानना है कि किसी बच्चे के अधिकार उसके माता-पिता की वैवाहिक स्थिति पर निर्भर नहीं होने चाहिए। इसलिए ऐसे बच्चों को उत्तराधिकार और अन्य कानूनी अधिकार प्रदान करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं।

उपरोक्त बिंदु से सरकार की मंशा साफ है कि वह हर स्थिति में ऐसे रिश्ते में रहने वाली स्त्री को सुरक्षा दिलाना चाहती है। अब इसके बाद समाज का दायित्व होता है कि कानूनन लिव-इन रिलेशनशिप भले ही नाजायज ना हो लेकिन समाज की दृष्टि में वह जायज नहीं है। भारतीय कानून ने ही विवाह के लिए लडक़े और लडक़ी की उम्र का निर्धारण कर उसे वयस्क अथवा अवस्यक बताया है। रूढि़वादी भारतीय समाज का मानस बदलने के लिए राजा राममोहन राय ने विधवा विवाह परंपरा की शुरूआत की। जो लोग अकेले हो गए हैं, उसे सनातनी संस्कृति में नवजीवन शुरू करने का प्रावधान है फिर यह लिव-इन रिलेशनशिप जैसे रिश्तों में उलझने की जरूरत ही क्या है। जब लोग लिव-इन रिलेशनशिप के खतरे को समझ जाएंगे या मानने लगेंगे तो सरकार और कानून पर पडऩे वाला अतिरिक्त दबाव स्वयमेव समाप्त हो जाएगा। कथित विकासवादी सोच के लोगों के लिए लिव-इन रिलेशनशिप जरूरी हो सकता है औवे राज्य शासन के प्रस्तावित प्रावधान के खिलाफ हैं। प्रावधान पर कुछ आलोचकों का कहना है कि लिव-इन संबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है और अनिवार्य पंजीकरण से निजता के अधिकार पर प्रभाव पड़ सकता है। उनका मानना है कि राज्य को व्यक्तिगत संबंधों में अत्यधिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। वहीं कुछ लोग इसे महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम मानते हैं।  कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि यदि इस कानून को संतुलित तरीके से लागू किया जाए, तो यह सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए, जिन्हें लिव-इन संबंध टूटने के बाद कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं हो पाता, यह कानून सहायक सिद्ध हो सकता है। दूसरी ओर, कानून बनाते समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के संवैधानिक अधिकारों का भी ध्यान रखना आवश्यक है।

कुछ सामाजिक विचारकों और पारंपरिक दृष्टिकोण रखने वाले लोगों के अनुसार लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता मिलने से विवाह संस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। विवाह भारतीय समाज की एक प्राचीन और महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था रही है, जो केवल दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि दो परिवारों का भी संबंध मानी जाती है। यदि बिना विवाह के साथ रहने को कानूनी संरक्षण प्राप्त होता है, तो युवाओं में विवाह के प्रति प्रतिबद्धता और उसकी सामाजिक महत्ता कम हो सकती है। लिव-इन संबंध अपेक्षाकृत कम औपचारिक और आसानी से समाप्त किए जा सकने वाले संबंध माने जाते हैं। इससे दीर्घकालिक पारिवारिक स्थिरता प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जाती है। कुछ लोगों का मानना है कि इससे विवाह, परिवार और पारंपरिक सामाजिक मूल्यों के प्रति लोगों की आस्था कमजोर हो सकती है। इसके अतिरिक्त, पारिवारिक जिम्मेदारियों, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा बच्चों के पालन-पोषण से जुड़ी पारंपरिक धारणाओं में भी परिवर्तन आ सकता है। यह एक दृष्टिकोण मात्र है। 

कई विशेषज्ञों का मत है कि किसी भी संबंध की मजबूती केवल कानूनी व्यवस्था पर नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, जिम्मेदारी और सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसलिए विवाह संस्था पर वास्तविक प्रभाव समय के साथ सामाजिक परिवर्तनों के आधार पर ही स्पष्ट हो सकेगा। कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश में लिव-इन रिलेशनशिप से संबंधित प्रस्तावित कानून भारतीय समाज और कानूनी व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत देता है। यह कानून एक ओर महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को मजबूत करने का प्रयास करता है, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के अधिकार को लेकर नई बहस उत्पन्न हो गई है। समय-समय पर डॉक्टर भी सजग करते रहे हैं कि अधिक उम्र में विवाह अनेक शारीरिक समस्या का कारण बनता है, खासतौर पर माँ-बाप बनने में वहीं लिव-इन रिलेशनशिप में आप संतान उत्पत्ति के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन बच्चे के कानूनी अधिकार पर सब खामोश हैं और ऐसे में राज्य सरकार का प्रावधान अनुकूल है। भारतीय समाज में यह अंधानुकरण भविष्य के लिए खतरा साबित हो रहा है। रिश्तों में अविश्वास उत्पन्न हो गया और युवा वर्ग लिव-इन रिलेशनशिप में स्वतंत्रता को स्वच्छंदता समझ बैठा है। (लेखक मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) 

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

दतिया उप चुनाव : सिंधिया की प्रतिष्ठा दांव पर

 


























दतिया उप चुनाव : सिंधिया की प्रतिष्ठा दांव पर

प्रो. मनोज कुमार

सारे कैमरे और कलम नरोत्तम मिश्रा पर आकर ठहर गया है। मीडिया के लिए खबर है कि भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा को दतिया से मैदान में नहीं उतारना। मीडिया की नजर से देखने वालों के लिए यह बड़ी खबर है। चलो, मान लें कि नरोत्तम को टिकट नहीं देना या उनकी जगह पर उनके परिवार को टिकट नहीं देना बड़ी खबर है तो क्या राजेन्द्र भारती की जगह पर उनके परिवार को टिकट नहीं देना बड़ी खबर नहीं है? पार्टी की दृष्टि से देखें तो यह रूटीन है और किसे टिकट देना है, किसे प्रत्याशी बनाना है, यह पार्टी तय करती है। जैसे भाजपा ने किया, वही व्यवहार कांग्रेस ने राजेन्द्र भारती के परिवार को दतिया उपचुनाव से बाहर रखकर किया। इस उपचुनाव में कांग्रेस और भाजपा ना ‘तुम हारे, न हम हारे’ बयान कर रहे हैं। दतिया उप चुनाव में सिंधिया की राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर है। चुनाव भाजपा जीत जाती है तो सिंधिया पावरफुल हो जायेंगे और हार जाती है तो नए समीकरण बनेंगे।

दतिया मध्यप्रदेश के उन 320 सीटों में एक विधानसभा सीट है जहाँ उपचुनाव होना है। दतिया उपचुनाव के लिए प्रत्याशी घोषित होने के साथ हंगामा शुरू हो गया। हंगामा भी भाजपा प्रत्याशी को लेकर है ना कि कांग्रेस को लेकर। अदालत से अयोग्य कांग्रेस के राजेन्द्र भारती के स्थान पर पूर्व विधायक को टिकट दिया जाना मीडिया की नजर में सामान्य है तो नरोत्तम मिश्रा की जगह भाजपा से अन्य को टिकट दिया जाना क्यों असमान्य है। दरअसल, भाजपा पार्टी लाईन से हटकर यह मानस बना लिया गया था कि दतिया उपचुनाव में भाजपा से नरोत्तम मिश्रा ही उम्मीदवार होंगे जबकि पार्टी की तरफ से ऐसा कोई संदेश नहीं दिया गया था। कांग्रेस के लिए मीडिया में इसलिए रार नहीं मचा कि राजेन्द्र भारती की जगह किसी को भी टिकट दें, क्या ही फर्क पडऩे वाला है? शुरूआती दौर में श्रीमती राजेन्द्र भारती को टिकट देने की सुगबुगाहट हुई थी लेकिन उनकी जगह पर पूर्व विधायक को टिकट देने को पार्टी का सामान्य फैसला मान लिया गया। 

दतिया उप चुनाव के लिए भाजपा मीडिया के केन्द्र में है। खबरें यह भी चल पड़ी कि नरोत्तम मिश्र का टिकट काट दिया गया। क्या कोई बताएगा कि भाजपा ने कब उन्हें दतिया उप चुनाव के लिए प्रत्याशी घोषित किया था, जो उनकी टिकट काट कर किसी अन्य को दे दिया गया? पार्टी ने तो किसी का नाम ही ऐलान नहीं किया था, तो नाम कटने का सवाल कहाँ से आया? हाँ, इतना जरूर हुआ कि जैसा होता है, उसके आधार पर मान लिया गया था कि दतिया से नरोत्तम चुनाव में पराजित हुए थे, सो उन्हें ही मौका दिया जाएगा। भाजपा अपनी रीति-नीति के अनुरूप इस ढर्रे को बदल कर नए प्रत्याशी को मैदान में उतार दिया। वैसे तो कहा जाए कि कांग्रेस ने भी राजेन्द्र भारती के परिवार का टिकट काट दिया। यहाँ भी वही बात लागू होती है कि अदालत ने राजेन्द्र भारती को अयोग्य घोषित किया और कांग्रेस को जरूरी नहीं लगा कि उनके परिजनों को चुनाव मैदान में उतारा जाना चाहिए। दरअसल, इस पूरे परिदृश्य में जो सबसे बड़ी स्थिति उत्पन्न हुई है, वह यह कि फिलहाल भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा परिवार को और कांग्रेस ने राजेन्द्र भारती परिवार को चुनाव से अलग-थलग कर दिया है। यहाँ पर एक पुरानी राजनीतिक कहावत-‘ना तुम जीते, ना हम।’ 

अब थोड़े इस बात की भी चिंता कर लें। नरोत्तम का अपने विधानसभा क्षेत्र में प्रभाव है और भाजपा उन्हें अपना प्रत्याशी बनाती तो जीत के आसार बड़े थे। नरोत्तम उम्मीदवार बनते तो कांग्रेस के राजेन्द्र भारती पर लगे आरोप को भाजपा भुनाती और अब नरोत्तम उम्मीदवार नहीं हैं तो भी वह इस मुद्दे को भुनाने का प्रयास करेगी। नरोत्तम को टिकट नहीं मिलने से उनके समर्थकों को गुस्सा होना अस्वाभाविक नहीं है लेकिन जिस तरह सडक़ पर गुस्सा उतरा वह नरोत्तम के राजनीति सेहत को बिगाड़ता है। 26 साल पहले छत्तीसगढ़ में बृजमोहन समर्थकों ने ऐसे ही गुस्से का इजहार नए-नवेले छत्तीसगढ़ में किया था। तब इसका खामियाज़ा बृजमोहन अग्रवाल को भुगतना पड़ा था। एक बार यह दोहराता हुआ दिख रहा है। फिलहाल तो भाजपा संगठन ने कहा कि है नरोत्तम मिश्र की अगुवाई में दतिया उप चुनाव जीत लेेंगे। और ऐसा हो जाए तो हैरानी नहीं होगी क्योंकि कांग्रेस के पास बचाव का कोई अभेद तरीका नहीं दिखता है। पार्टी ने दतिया उप चुनाव की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप दी है और उनकी सहज अपेक्षा होगी कि दतिया सीट भाजपा के खाते में आए। सिंधिया पूरी ताकत लगा देेंगे और जीत भी असंभव नहीं है। कदाचित दतिया उप चुनाव भाजपा खेत रही तो सिंधिया के राजनीतिक अस्तित्व पर भी सवाल उठ सकते हैं। यहाँ भाजपा के खोने के लिए बहुत कुछ दिख रहा है और कांग्रेस के पास ऐसा कुछ नहीं है। खबरें चल रही हैं, राजनीतिक गलियारों से खबरें आ रही हैं कि यहाँ भाजपा ने कांग्रेस को वाकओवहर दिया है और ऐसा है तो भविष्य सवालों के बीच है और समय की प्रतीक्षा ही शेष है।

शनिवार, 11 जुलाई 2026

 

क्या मैं तुम्हारी कुछ नहीं लगती हूँ?

चीखती, दम तोड़ती बच्ची का सवाल....

प्रो. मनोज कुमार

स्त्री शक्ति की दुहाई देते देवियों को पूजने वाले हमारे समाज की हकीकत है। राजस्थान की वह मासूम जिसने अभी चलना ही शुरू किया था। जिंदगी में वह रंग भरती, इसके पहले उसे बदरंग कर दिया गया। दरिदंगों की शिकार बच्ची मर गई। उसे मरना तो था ही। पहले ही उसकी आत्मा मर गई थी। बदन पर खुरचे गए जख्म उसे पल प्रति पल मार रहे थे। ये उसका ही साहस था कि वह दरिदों को बेनकाब करने खुद को बचा कर सडक़ पर आ गई थी। यह बच्ची दरिदंगी की शिकार का वह चेहरा है जहाँ हजारों-हजार बच्चियाँ शिकार हो रही हैं। बेमौत मर रही हैं और अपराधी बेखौफ हैं। कुछ समय पहले देश के सबसे शिक्षित राज्य कहे जाने वाले केरल से ऐसी ही खबर आयी और हाल में मध्यप्रदेश के भोपाल से खबर मिल रही है। ऐसे अपराध का सिलसिला थमा नहीं है। निर्भया को लेकर समाज ने जो सजगता दिखायी थी, तब लगा था कि समाज ऐसी दरिदंगी के खिलाफ सजग और सचेत रहेगा और शायद ऐसे लोगों में डर पैदा होगा लेकिन हालात ऐसी कोई चिंह अपने पीछे नहीं छोड़ रहा है। हालत बद से बदतर होती जा रही है। 

राजस्थान में जो कुछ हुआ, उसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। 32 दानवों में से कुछ को पुलिस ने धर लिया है। सडक़ों पर उनकी पिटाई हो रही है। चिंहित लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाने की खबर भी है। यह एक तरीका हो सकता है लेकिन इसके खिलाफ डर पैदा करना इस समय की बड़ी जरूरत है। अपराध के आंकड़ों को देखें तो कोई राज्य कम या कोई ज्यादा होता है और इन आंकड़ों से बहुत ज्यादा फर्क पडऩे वाला नहीं है। मूल बात है उस दरिदें सोच की। समाज के प्रतिकूल व्यवहार करने के लिए कभी फिल्मों को दोष दिया जाता था और अब सोशल मीडिया को। लेकिन क्या दोष देने से मामला समाप्त हो जाता है। मान भी लें कि फिल्मों के चलते अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं तो फिल्मों को देखकर हम सीखते क्यों नहीं? हिंदी फिल्म मदर इंडिया तो आपके हमारे जेहन में है। अपराध के लिए अपने ही बेटे को मार डालने वाली माँ क्यों हमारे लिए सबक नहीं बनती है। मुझे स्मरण हो रहा है कि छतरपुर या टीकमगढ़ में एकाध दशक पहले गाँव की पंच या सरपंच रही एक स्त्री ने अपने बेटे को इसलिए गाँव निकाला कर दिया कि उसने पंचायत का नियम तोडक़र शराब पीने की जुर्रत की थी। एक उदाहरण यह भी है। एक दृष्टांत लोकमाता अहिल्या का भी मिलता है जिन्होंने अनैतिक आचरण पर बेटे को सजा दी थी। 

हमारे समाज का दुर्भाग्य यह भी है कि हमारे विमर्श में इस समय दूसरे हजारों विषय हैं लेकिन नैतिक रूप से पतित होते इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है। शिक्षा से जुड़ी अमिता नीरव जैसी कुछेक लोग चिंता जाहिर कर रहे हैं। बहुसंख्य वीडियो इधर से उधर करने में लगे हैं। एक किस्म का इसे भी सायबर अपराध मान सकते हैं। ये दरिदें केवल हैवान नहीं हैं बल्कि इससे आगे निकल कर ये नरभक्षी हो गए हैं। डराने वाली बात यह है कि इस अपराध में बालिक के साथ नाबालिग भी शरीक हैं। थू करते हैं, घिन आती है ऐसे लोगों पर लिखते, बोलते और सोचते हुए। निरपराध मासूम दुनिया से चली गई और हमने आज नहीं बोला तो वह दूर बैठी हमसे सवाल कर रही होगी, क्यों मेरा दर्द महसूस नहीं कर पाये? क्या मैं तुम्हारी कुछ नहीं लगती हूँ। मन थर्रा उठता है और तब जब हम अपने आसपास की बच्चियों को चेहरा देखते हैं। कल्पना करके सिहरन हो उठती है और मन पहले से ज्यादा डरा हुआ महसूस करते हैं।

कह सकते हैं कि सरकार को चाहिए कि वह अपराध को रोके और यह सच भी है। लेकिन हमारी जवाबदारी कौन तय करेगा? पहले हमें जिम्मेदारी उठानी होगी। कानून अपना काम करेगा और पुलिस अपना लेकिन इससे पहले सुरक्षा की जवाबदारी हमें लेना होगी। जमाने भर के नए एप आ गए हैं। तकनीक बाँह पसारे हर कुछ कर रही है तब स्कूल, कॉलेज जाती बच्चियाँ, ऑफिस जाती बहन बेटियों को सुरक्षा दी जाए। उनके भीतर कांफिडेंस क्रियेट किया जाए कि डरना नहीं है। हालाँकि निजी तौर पर मानना है कि जब स्थिति भयानक हो जाती है तब ये सारी सीख कागजी साबित हो जाती है। फिर भी कुछ तो उम्मीद रखना होगी, कुछ तो कोशिश करना होगा। कानून को भी ऐसे अपराधों के लिए नए ढंग से परिभाषित करने की जरूरत है। मकान गिरा दिए गए, यह उचित है। इससे आगे बढक़र उनकी संपत्ति और कैश को राजसात कर उन्हें अपंग बना दिया जाए ताकि रास्ते ढूंढ कर बच ना सकें। हमारे एडव्होकेट समाज ने कई बार मिसाल पेश की है कि ऐसे मामलों की पैरवी ना कर। इस बार भी उनसे ऐसी ही अपेक्षा होगी। एक बड़ा सवाल यह है कि एक रिक्शे वाले से लेकर होटल-दर-होटल बच्ची का सौदा होता रहा और किसी को खबर नहीं हुई? इसकी पड़ताल करना भी जरूरी है। इन दरिंदों के अलावा और कौन है जिनके चेहरे अभी ढके-छिपे हैं। एक और इल्तजा है कि इसे राजनीतिक चश्मे से परे देखा जाए तो मासूम को शायद शांति मिल पाए।

रविवार, 5 जुलाई 2026

तीजन, भाऊ साहब और वो समय

 

















तीजन, भाऊ साहब और वो समय

प्रो. मनोज कुमार

तीजन बाई नहीं रहीं। ख़बर दुखदायक है लेकिन होनी है। अभी वे 70 वर्ष की थीं। कुछ समय से बीमार भी थीं और इससे भी बड़ी बात यह कि वे इन दिनों लगभग गुमनाम सी भी थीं। 

मेरी पहली मुलाकात मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद के ऑफिस में हुई थी। तब यह ऑफिस मालवीय नगर में आज के मुकाबले विपन्न सा था लेकिन इसकी गामक भाऊ साहब से थी। भाऊ साहब बोले तो खिरवरडकर साहब। कहने को तो वो अफसर थे लेकिन सचाई यह थी कि वे चलते फिरते स्कूल थे। कम से कम मुझ जैसे के लिए। या वही समय था। तीजन बाई, तब तीजन बाई नहीं बनी थी, बावजूद इसके इनकी प्रतिभा चमकने लगी थी। कला उनकी थी और कलाकार बनाने में भाऊ साहब की भूमिका बड़ी थी। वो गुरु थे और वो तराशना जानते थे। तीजन को मंच दिया। गनियारी गांव से निकली लड़की भोपाल से दिल्ली और लोगों के दिलों में उतरती सात समंदर पार पंडवानी की नायिका बन गई।

इस पहली मुलाकात करते समय मैं और दोस्त सुनील मिश्र साथ थे। मैं उनसे एक पत्रकार बनकर सवाल कर रहा था तो सुनील एक कला समीक्षक के नाते। जब मैने तीजन से सवाल किया कि वो देहाती कपड़ों को छोड़ कर ये शहरी फैशन वाले कपड़े पहनने लगी तो उन्होंने हँस कर टाल दिया। सुनील को तब ये सवाल और ऐसे ही कुछ सवाल तल्ख लगे। हालांकि बाद में हम दोनों एक साथ तब की प्रमुख सांस्कृतिक पत्रिका सारंगा स्वर में छपे। इसके पहले धर्मयुग और बाद में सहारा, लोकमत समाचार सहित अनेक जगह तीजन पर फीचर आर्टिकल छपा।

संभवतः तीजन उन चुनिंदा कलाकारों में हैं जिन्हें तीन पद्म सम्मान मिले। उन्होंने एक तरफ पांडवानी को दुनिया के समक्ष प्रतिष्ठित किया तो वे छत्तीसगढ़ की अघोषित सांस्कृतिक राजदूत की तरह काम करती रहीं। निजी जीवन उनका सरल नहीं रहा। महाभारत का गायन वो करती रहीं और निजी जीवन में उनके लड़ाइयाँ लड़ीं। उनकी मंशा थी कि वे तीजन विद्यापीठ बन जाए। भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रबंधन ने अपने स्कूल में पंडवानी पढ़ाने के लिए नियुक्त किया था लेकिन वह भी औपचारिक ही रहा। तीजन की परंपरा से रितु वर्मा और शांति बाई चेलक आईं लेकिन तीजन के पासंग खड़ी नहीं हो पाई। शांति का पता नहीं, शायद रितु को भी भाऊ साहब का सानिध्य मिला। सही भी है, हर कोई तीजन नहीं हो सकता।

छत्तीसगढ़ क्या, मध्यप्रदेश क्या, वो पूरी लोक कला की राजदूत थीं। उनका जाना एक परंपरा का थम जाना है। तीजन को याद करते समय बार बार भाऊ साहब की याद भी आ जा जाती है। और एक सच यह भी है कि उनके जाने बाद संस्कृति विभाग में अफसर आए, गुरु नहीं। वैसे ही जैसे स्वामीनाथन ने ईट गारा उठाने वाली भूरी बाई के भीतर की कलाकार तलाश कर लिया था।

तीजन बाई कैसे कहें कि तुम हमारे बीच से चली गई हो।

सादर नमन


सोमवार, 29 जून 2026

जल संवर्धन अभियान से आगे अब हमारी जवाबदारी का समय
















जल संवर्धन अभियान से आगे अब हमारी जवाबदारी का समय

प्रो. मनोज कुमार

मानसून आँख-मिचौली कर रहा है। लगता है कि बादल अब बरस पड़ेंगे की तब बरस पड़ेंगे लेकिन खेतों से लेकर शहरों तक की आँखें पथराई जा रही है। बादल बिना बरसे चले जा रहे हैं। यह समस्या साल-दर-साल बढ़ती चली जा रही है। अंधाधुँध विकास के कारण हमने ही यह स्थिति उत्पन्न की है। बीते सालों के मुकाबले इस साल गर्मी का ताप अधिक रहा और आने वाले सालों की कल्पना करना भी मुश्किल है। ऐसे में जरूरी है कि बीते दिनों को हम लौटा नहीं सकते लेकिन आने वाले दिनों को सुधार जरूर सकते हैं। राज्य में डॉ. मोहन सरकार ने जल गंगा संवर्धन अभियान का आरंभ प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) से शुरू किया था जो माह जून के आखिरी दिन थम गया। यह अभियान समाज को जागृत करने तथा नदियों, तालाबों, कुँओं और बावडिय़ों जैसे जल स्रोतों का पुनरुद्धार और संरक्षण करना प्रमुख था। स्वाभाविक है कि सरकार अपना काम कर रही है लेकिन समाज की हिस्सेदारी भी जरूरी है। सरकारी आंकड़ों को मानें तो यह अभियान ने सार्थकता प्रदान की है और मान लेना चाहिए कि आंकड़े हवा में जारी नहीं किए जाते हैं। लेकिन इससे आगे की बात यह है कि सरकार के इस अभियान में जिन जलस्रोतों को पुर्नजीवन दिया गया, उसे बचाने और संवारने का समय अब आ चुका है। 

जल प्रकृति का अमूल्य उपहार है और पृथ्वी पर जीवन का आधार भी। मानव, पशु-पक्षी, वनस्पति तथा समस्त जीव-जगत का अस्तित्व जल पर निर्भर है। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में जल को जीवन, पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। किंतु बढ़ती जनसंख्या, अनियोजित शहरीकरण, औद्योगीकरण, जल स्रोतों का अंधाधुंध दोहन तथा जल प्रदूषण के कारण आज विश्व गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और नदियाँ, तालाब तथा झीलें सूखती जा रही हैं। यदि समय रहते जल संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं अपनाए गए, तो भविष्य में पीने योग्य जल की भारी कमी उत्पन्न हो सकती है। इसलिए जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक का नैतिक और सामाजिक दायित्व है।

इस स्थिति में हमें जल गंगा संवर्धन अभियान के आगे अब चलने की जरूरत है। यह अभियान गर्मी के मौसम में शुरू हुआ और जल स्रोतों को स्वच्छ और साफ किया गया। अब इन जल स्रोतों को लबालब करने का समय आ गया है। मानूसन अभी भले ही हमसे आँख-मिचौली कर रहा है लेकिन जब बरसेगा तो हमें लबालब कर देगा, यह उम्मीद बेमानी नहीं है। ऐसे में हम सबका दायित्व बन जाता है कि बारिश की इन बूँदों को सहेज और संवार कर रखें। जल संरक्षण के अनेक उपाय बताये जाते हैं और आप हम में से अनेक लोग करते हैं और यही जल गंगा संवर्धन अभियान को सार्थकता प्रदान करेगा। 

जल संरक्षण के लिए सरकार तो जो करती है और करेगी, हम व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्तर पर क्या कर सकते हैं, इस पर विचार और पहल करने की जरूरत है।  सबसे पहले वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना चाहिए। घरों, विद्यालयों, कार्यालयों तथा सार्वजनिक भवनों में वर्षा के जल को एकत्र कर भूजल पुनर्भरण किया जा सकता है। इससे भूजल स्तर में सुधार होता है और भविष्य के लिए जल उपलब्ध रहता है। इसी तरह वृक्षारोपण भी जल संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम है। पेड़ वर्षा को आकर्षित करते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं तथा भूजल पुनर्भरण में सहायता करते हैं। इसलिए अधिक से अधिक पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना आवश्यक है। कुछ साथी इस दिशा में सक्रियता के साथ प्रयास कर रहे हैं और बारिश के पहले ही लोगों को अपने घरों और मोहल्ले में पौधे लगाने की सलाह दे रहे हैं। वर्षाकाल में पौध रोपण करने से इसका परिणाम सुखदायक होता है और थोड़े समय में यह पौध वृक्ष का स्वरूप ग्रहण कर लेता है।

खेती किसानी करने वाले किसान भाईयों को भी कृषि क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों, जैसे ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर सिंचाई का उपयोग किया जाना चाहिए। इससे कम जल में अधिक सिंचाई संभव होती है और जल की बचत होती है। किसानों को कम पानी वाली फसलों को अपनाने तथा वैज्ञानिक खेती के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। खेती के लिए पानी की जरूरत सबसे अधिक होती है और खेती ना हो पायी तो अनेक प्रकार के संकटों से समाज को जूझना पड़ सकता है।

यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि  जल का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए। आवश्यक है कि नल को अनावश्यक खुला न छोडऩा, रिसाव की तुरंत मरम्मत कराना, आवश्यकता के अनुसार ही जल का उपयोग करना तथा पानी की बर्बादी रोकना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। छोटी-छोटी सावधानियाँ प्रतिदिन हजारों लीटर जल बचा सकती हैं। हमें इस मानसिकता से बाहर आना होगा कि हर कार्य सरकार को करना चाहिए। यह ठीक है कि संसाधन जुटाने और समाज को जागरूक करने का कार्य सरकार करती है लेकिन इसे परिणाममूलक बनाने की जवाबदारी अंतत: समाज की होती है। गंगा जल संवर्धन अभियान के माध्यम से जलस्रोतों को पुर्नजीवित करने का कार्य सरकार ने कर दिया है लेकिन इनके लंबे और सुदीर्घ जीवन के लिए जल संरक्षण का कार्य हमें करना होगा। जल संरक्षण एक सामूहिक अभियान है, जिसमें समाज की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। प्रत्येक व्यक्ति को जल का महत्व समझना चाहिए और दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक करना चाहिए। परिवार में बच्चों को बचपन से ही जल बचाने की आदत सिखानी चाहिए। तस्वीर गूगल से साभार



टूटता भरोसा, दरकते रिश्ते

 













टूटता भरोसा, दरकते रिश्ते

प्रो. मनोज कुमार

सोनम और सिया के मामले को लेकर जवान लडक़ी का पिता जो मेरा दोस्त है, चिंता में डूबा हुआ है। उसे लगता है कि उसकी बेटी के हाथ पीले करने में अब सौ अड़चनें आएगी। टूटता भरोसा और दरकते रिश्ते का यह जीवंत उदाहरण है। दोस्त की बेटी उच्च शिक्षित है, संस्कारी है और आत्मनिर्भर है लेकिन जो सोनम-सिया कांड है, वह उसके भावी जिंदगी का रोड़ा बन रही है। यह एक कड़ुआ सच है और इस सच से इंकार किया जाना मुश्किल ही नहीं,नामुमकीन है। जिन स्थितियों, परिस्थतियों मेंं सोनम के बाद सिया प्रकरण हुआ, जो हुआ, सो वो हुआ लेकिन रिश्तों के मध्य भरोसे की एक महीन लकीर टूट गई। इन दोनों के कारण पूरे समाज में निराशा फैल गई है। लोगों को भरोसा रिश्ते से उठने लगा, जबकि सच यह है कि ये दोनों मामले एक अपराधिक मामले हैं। अदालत इसका फैसला करेंगी। साफतौर पर इसका बहुसंख्य समाज से बहुत कुछ लेना-देना नही है। समाज में बहुत किस्म के अपराध होते हैं और इसमें एक यह भी है। लेकिन एक अपराध से इतर समाज का मनोविज्ञान कुछ और ही कहता है। मीडिया रिपोटर््स की मानें तो रिश्ता करने से पहले परिवार अब जासूसों की मदद लेने लगे हैं। वे तहकीकात कर इत्मीनान कर लेना चाहते हैं। यह भारतीय संस्कारों के प्रतिकूल है लेकिन स्थितियाँ ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही है।

लौटते हैं मेरे उस दोस्त की चिंता पर। मैं उसकी बातों से इत्तेफाकर रखता हूँ लेकिन निराशावादी नहीं हूँ और उसे समझाता हूँ कि मध्यप्रदेश में आठ करोड़ से अधिक की आबादी है और कोई डेढ़ करोड़ परिवार होंगे। ऐसे में एक परिवार में होने वाली दुघर्टना को नजीर मान लेना उचित नहीं है। वह इस बात से सहमत है लेकिन उसका अगला सवाल होता है कि मान लो, इसी एक परिवार और हो जाए तब? कहने को तो यह कपोल-कल्पित बातें हैं लेकिन कोई मुक्कमल जवाब मेरे पास नहीं है। इसलिए भी नहीं कि विकास की तमाम संभावनाओं के बाद भी हम रूढि़वादी संस्कृति से मुक्ति नहीं पा सके हैं। भारतीय समाज का विवाह का ताना-बाना ऐसा है जो आमतौर पर हमें उत्साह से भर देता है। लेकिन बदलती-बिगड़ती व्यवस्था के कारण विवाह संस्था पर आँच आने लगी है। इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि ऐसा क्यों? थोड़े समय पहले सुपरिचित अभिनेत्री जया बच्चन ने अपनी नीतिन शादी नहीं करने की बात कही थी। और ऐसे ही गाहे-बगाहे शोध-सर्वेक्षणों में आ रहा है कि भविष्य में विवाह संस्था का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। हो सकता है कि ऐसा हो जाए लेकिन इसके पहले जया के बयान पर गौर करना जरूरी है। यह उनकी सोच नहीं, अनुभव हो सकता है। बरसों वैवाहिक जीवन गुजारने के बाद वे अपनी ही बच्ची को ऐसा सुझाव दें तो कहीं ना कहीं उनका अपना अनुभव सामने आता है। ईश्वर करे ऐसी सारी बातें खारिज हो जाएं लेकिन सोनम-सिया प्रकरण के चलते सोचना जरूरी हो जाता है। 

भारतीय विवाह संस्था का ताना-बाना कितना बिखरेगा, यह तो भविष्य बताएगा लेकिन खरोंच अभी से आने लगी है और दिखने लगा है। लिव-इन-रिलेशनशिप जैसी प्रथा इसके मूल में है। कथित आजादी की आवाज के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप भारतीय समाज के ताना-बाना को छिन्न-भिन्न कर रही है। अनादिकाल से भारतीय समाज में विवाह संस्था का अस्तित्व है और हर सनातनी के लिए यह एक धर्म है, नैतिक दायित्व है। ऐसे अनेक परिवार मिल जाएँगे जिनके परिजनों में पच्चीस, पचास और पचहतरवीं शादी की सालगिरह मनायी जाती है। विवाह एक सामाजिक बंधन नहीं बल्कि यह सामाजिक रिश्तों को विस्तार देने की परंपरा है। सनातन में एक ही गोत्र में शादी करना वर्जित माना गया है तो इसके पीछे भी वैज्ञानिक सोच काम करती है। जब दो अलग परिवार मिलते हैं तो समाज में एक नए समूह का उदय होता है लेकिन निकट के रिश्तों में शादी होने से संबंधों का दायरा छोटा हो जाता है। इस पर भी विचार करने की जरूरत है। एक पिता के नाते मेरे दोस्त की चिंता जायज हो सकती है लेकिन तर्क की कसौटी पर देखें तो इतनी चिंता की बात नहीं है। सोनम-सिया के प्रकरण को महज एक अपराधिक कृत्य ही मानें और इसका फैसला कानून समय के साथ करेगा। जो दोषी होगा, उसे सजा मिलेगी लेकिन एक ही तराजू पर रखकर तौलने से सामाजिक ताना-बाना भरभरा कर गिर जाएगा। विवाह भारतीय समाज का संस्कार है, विधान है और एक जरूरी परंपरा। इसे ऐसी घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है समाज के भरोसे को टूटने से बचाना और रिश्तों को मजबूती से जोडक़र रखना। भारतीय समाज में, सनातन प्रकृति में बहुत सारी चीजें दरक रही हैं लेकिन दरकते रिश्तों को बचाना भी हमारा दायित्व है। और इन सबके लिए जरूरी है स्वयं के ऊपर विश्वास बनाये रखना।

सोमवार, 15 जून 2026

चाँदनी को आशीष और समाज को संदेश

 










प्रो. मनोज कुमार

सरकार अंतिमजन के घर तभी जाती है, जब चुनाव हो, यह समाज की आमधारणा बन चुकी है और बहुत हद तक यही सत्य भी है लेकिन बिना चुनाव या किसी राजनीतिक लाभ के जब सरकार अंतिमजन के घर पहुँचती है तो खबर बन जाना स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का एक प्रतिभावान बिटिया को आशीर्वाद देने के लिए उसके घर जाना एक अलहदा मामला बन जाता है। बहुतेरे होंंगे जो इसे राजनीतिक चश्मे से देख रहे होंगे लेकिन थोड़ी देर के लिए राजनीतिक चश्मा उतार लीजिए क्योंकि ऐसे अवसर बिरले ही जीवन में देखने को मिलते हैं। मुख्मंत्री डॉ. मोहन यादव विशाल अट्टालिका जिसे हम मंत्रालय अथवा वल्लभभवन संबोधित करते हैं, के सामने बसी भीमनगर (इसे झुग्गी बस्ती कहने में मुझे परहेज है) की संकरी गलियों से गुजर कर उस बच्ची के पास जा पहुँचते हैं जिसने हाल ही में कार्मस विषय की 12वीं कक्षा में टॉप किया है। अपनी प्रतिभा से उजाला फैलाने वाले इस प्रतिभावान बच्ची का नाम है चाँदनी। अपने नाम के अनुरूप अपनी प्रतिभा की रोशनी फैलायी कि सरकार अंतिमजन के द्वार पहुँच गई।

यूँ तो ऐसी किसी प्रतिभा का खिल जाना कोई असामान्य घटना नहीं है लेकिन चाँदनी का मामला अब थोड़ा अलग है। उसकी प्रतिभा की गूँज ऐसी थी कि मोहन सरकार उनके द्वार पर पहुँच कर उसकी पीठ थपथपा कर उसे हौसला दिया और कहा कि- ‘तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं।’ यहाँ हम से मतलब डॉ. मोहन यादव नहीं, मध्यप्रदेश सरकार है। इसे राजनीतिक चश्मे से देखिए तो भी आपको एक अपनापन सा लगेगा। प्रतिभावान चाँदनी के सिर पर हाथ फेरते डॉ. मोहन यादव गए तो मुख्यमंत्री बनकर उसके घर लेकिन भाव एक पालक का दिख रहा था। परिवार के साथ बैठने वाले तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने लेकिन उसके परिवार ने उन्हें अपना कोई भाई, मामा या चाचा के रूप में देखा। ऐसे अवसर बिरले होते हैं। स्वाभाविक है कि डॉ. मोहन यादव और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के बीच एक महीन सी रेखा है जो उन्हें औरों से अलग बनाती है। अपना शुभाषीश दिया, प्रतिभावान चाँदनी से उसके भविष्य के सपने सुने और आश्वस्त किया कि वो सब कुछ किया जाएगा, जिसका उसका मन है। परिजनों से उनके बारे में पूछा और बातचीत की। हम महसूस कर सकते हैं कि उस परिवार की उस समय क्या मनोदशा रही होगी जब स्वयं सरकार उनके पास बैठी है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 12 वर्ष के सफल कार्यकाल और उनके कार्यों को जन-जन तक पहुँचाने और जोडऩे का एक सिलसिला जारी है। और ऐसा पहले भी होता रहा है। यहाँ भी यह हुआ तो कोई हैरानी नहीं लेकिन हैरानी है कि पूरे लाव-लश्कर के साथ सरकार उन्हें अपने दरबार में बुलाकर भी सम्मानित कर सकती थी, पीठ ठोंक सकती थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया, और सरकार स्वयं चाँदनी के घर पहुँच गई। तंग गलियों में सरकार का लाव-लश्कर नहीं जा सकता है इसलिए अधिकतर सरकारों ने वहाँ जाने से परहेज किया। डॉ. मोहन यादव भी ऐसा कर सकते थे लेकिन किया नहीं। सरकार को पीछे छोडक़र ई-स्कूटर खुद चलाते हुए विधायक सबनानी को पीछे बिठाकर पहुँच गए। अपने अंदाज में बात-बात पर ठहाका लगाने वाले मोहन ने पूरे परिवार को मोह लिया। सेल्फी ली और उनके हाल जानें। इसे एक राजनीतिज्ञ से जोडक़र देखने के बजाय एक सोच के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके इस नवाचार से समाज में संदेश जाता है कि एक सरकार ऐसी भी होती है, एक मुख्यमंत्री स्कूटर में बैठकर तंग गलियों में जा पहुँचता है तो उन हजारों-हजार बच्चों को तसल्ली होती है कि इस बार ना सही, अगली बार उनका मूल्यांकन करने सरकार ना सही, मुख्यमंत्री ना सही, मोहन भिया जरूर आएंगे।

स्मरण आ रहा है कि इसके पहले भी कुछ मंत्रियों ने प्रतिभावान बच्चों को और उनके परिवार को फोन लगाकर बातचीत कर उनका हौसला बढ़ाया था। शायद यह उसका विस्तार है जिसे स्वयं मुख्यमंत्री ने दिया है। यह केवल चाँदनी का हौसला बढ़ाने का मसला नहीं है बल्कि एक खामोश संदेश यह है कि जो जहाँ है, वह वहाँ जाकर ऐसी प्रतिभाओं का, उनके परिवार का हौसला बढ़ाये। यह समझना मुश्किल नहीं है कि वो परिवार, वो बच्चे अपनी मेहनत और प्रतिभा से आगे बढ़ रहे हैं और आगे भी बढ़ते रहेंगे लेकिन इस तरह की गैर-राजनीतिक नवाचार समाज में सकरात्मक भाव उत्पन्न करता है। मुख्यमंत्री के चाँदनी के घर जाने से उसके परिवार की गरीबी दूर नहीं होगी और ना ही चाँदनी के दैनंदिनी जीवन में कोई बड़ा बदलाव आएगा लेकिन जो बदलाव आएगा, वह नेपथ्य में होगा। वह बदलाव दिखेगा नहीं लेकिन मोहन भिया के आशीष से उसका मन पर्वत बन जाएगा और वह अपने मन के पर्वत की विजेता। उसके सपने को चार चाँद लग गए हैं और स्वयं का भरोसा बढ़ गया है। ध्यान आता है लेकिन पक्का-पक्का नहीं, रींवा की बेटी भी ऐसे ही अपने सपने पूरे कर जहाज उड़ाने लगी और एक दिन हमारे सामने आज की टॉपर चाँदनी कर अपने सपने को सच करती हुई आर्मी में लेफ्टिनेंट बनकर खड़ी होगी। उसके सपने, उसके हौसले से पूरे होंगे लेकिन थोड़ा-थोड़ा सा असर मोहन भिया के सिर पर हाथ रखने का होगा। सीख यही है कि हम सरकार नहीं हैं, मुख्यमंत्री नहीं हैं लेकिन समाज का वो हिस्सा हैं जो ऐसी चाँदनी की चमक को बढ़ा सकते हैं। शायद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव यही संदेश देना चाहते होंगे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

गुरुवार, 11 जून 2026

कुछ बात तो है उनमें, कोई यूँ ही मोदी नहीं हो जाता

 











प्रो. मनोज कुमार

कुछ बात तो है उनमें, कोइ यूँ ही नरेन्द्र मोदी नहीं कहलाता. वैसे भी भारतीय राजनीति में अलग-अलग समय में अलग-अलग मानक गढ़े जाते हैं और वह ऐतिहासिक हो जाता है. एक और राजनीतिक मानक गढ़ा है प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने. लगातार 12 वर्ष प्रधानमंत्री बने रहने का उनका यह नया कीर्तिमान है. आप चाहें जितना विरोध कर लें, आप चाहें जितनी आलोचना कर लें लेकिन कुछ बात तो उनमें है कि कई बार विरोधी भी कायल हो जाते हैं. 12 वर्ष पूर्व उनका अभिनंदन, स्वागत और उम्मीदों का साल था. जैसा होता है समय के साथ इस भाव में कहीं कमी दिखी तो चाहने वाले वैसे ही बने रहे. उनकी पहचान वैश्विक नेता के रूप में अपवाद स्वरूप बनी रही तो लगातार और बार-बार राज्यों के चुनावों में उनके नाम पर जीत इस बात की आश्वस्ति दिलाती रही कि ‘मोदी मैजिक’ कायम है. साथ ही अन्य दलों से टूटकर भी आने वाले जनप्रतिनिधियों ने उनके प्रति अपना भरोसा जताया, यह एक अलग किस्म का भारतीय राजनीति को अनुभव हुआ. इसके पहले भी दल-बदल होता रहा है लेकिन इसे दल-बदल के साथ ‘दिल’ बदल के रूप में देखा जाना चाहिए. आम आदमी पार्टी और हालिया तृणमूल कांग्रेस के सांसदों का उनके साथ चले जाना, यह परिघटना के रूप में परिभाषित होगा. हालांकि विरोधियों का कहना है कि उनका ‘डर से दिल’ बदला है. डर या विश्वास, दिल से दल बदल रहा है और 12 वर्षों में इस बदलाव को रेखांकित किया जाएगा. यह भी अजीब सा लगता है कि बार-बार कहा जा रहा है कि मोदी ने नेहरु के रिकार्ड को तोड़ दिया. अरे नहीं, भाई मोदी ने रिकार्ड बनाया है. 

भारतीय राजनीति में 12 वर्ष का समय बहुत होता है और जब चौतरफा हमले हो रहे हैं तब सत्ता में बने रहना सच में अर्थपूर्ण है. विरोध विरोधियों से हो तो सामान्य सी बात है लेकिन विरोध खुद के घर से हो तो यह चुनौती बन जाता है. विरोधियों के कुछ जायज हमले हैं तो कुछ नाजायज. कुछ हमले तो व्यक्तिगत हो रहे हैं, जिसे सही नहीं कहा जा सकता है. नीति-नियमों के आधार पर तार्किक विरोध का हर मंच पर स्वागत होता है लेकिन पूर्वाग्रहों से भरे विरोध कोई मायने नहीं रखता है. खैर, वैश्विक संकट का असर भारत में दिखने लगा. अनेक स्तरों पर भारत भी इस संकट से जूझ रहा है और इसका परिणाम यह हुआ कि 12 साल पहले किए गए वायदों को पूरा करने में खरोंच लगी. महंगाई, बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ता गया. युद्ध के चलते भारत की आर्थिक हालत पर भी घाव लगा और देखते ही देखते महंंगाई का ग्राफ तेजी से बढऩे लगा. आखिरकार मोदी को आम आदमी के सामने आकर सहयोग का आह्वान करना पड़ा. कुछ बातें ऐसी थी जिसे एक आम भारतीय नहीं मानता है जैसे सोना ना खरीदने की बात लेकिन अर्थशास्त्र के जानकार बताएंगे ऐसा क्यों? हम मोटामोटी तौर पर सहज और सरल जिंदगी चाहते हैं और सरकार को अलादीन का चिराग मानकर उसे हर मुराद पूरी करने की जिद् भी कर बैठते हैं और जब जिद् पूरी नहीं होती है तब सरकार खराब हो जाती है. इस समय सरकार का मतलब समझा दिया गया है मोदी और मोदी को खराब साबित करने के लिए हर स्तर पर कोशिश जारी है.

यह भी सच है कि 12 वर्ष पहले युवाओं को जो उम्मीदों के पंख लगे थे, वह टूटकर बिखरने लगे. उम्मीद टूटी लेकिन नाउम्मीद नहीं हुए और वे अपने एक ‘वोट’ से अपने नायक मोदी को मजबूत करते रहे, यह भी एक बड़ा सच है. स्मरण कीजिए कि लोकपाल की माँग को लेकर यही नौजवान सडक़ पर उतरे तो कांग्रेस की सरकार पलट दी तो क्या यह नाराजगी मोदी को चुनौती नहीं दे सकती है? जरूर दे सकती है लेकिन तब जब युवा नाउम्मीद हो जाए. इन 12 वर्षों में ऐसे चाहे-अनचाहे बात-बयान हुआ और उनकी इमेज को सोशल मीडिया के जरिए तोडऩे की कोशिश की गई. अतिरेक में विरोधियों के साथ भी ऐसा ही हुआ और इसका दुष्परिणाम यह निकला कि सत्ता और प्रतिपक्ष में जो समन्वय होना चाहिए था, उसमें दरार पड़ गई. प्रतिपक्ष की प्रकृत्ति प्रतिरोध की रही है लेकिन विरोधी व्यवहार कई नीतिगत मुश्किलें उत्पन्न करता है और ऐसा हुआ भी.

समय एक सा नहीं रहता है और यह सबके साथ होता है, मोदी कोइ अपवाद नहीं लेकिन 12 वर्षों तक मोदी करिश्मा अपवाद है. इस अपवाद का सबसे बड़ा गुण है एक कुशल जनसंचार के रूप में स्वयं को स्थापित करना. ‘मन की बात’ के माध्यम से वे देश के करोड़ों लोगों तक पहुँच गए. माटी से खादी तक चर्चा कर हुनरमंद लोगोंं को उनके घेरे से बाहर लाकर मुख्यधारा से जोडक़र एक नया मुकाम दिया. प्रधानमंत्री मोदी तारीफ करें तो उनके हुनर को पंख लग जाना स्वाभाविक है. ‘मन की बात’ की हर ऐपिसोड में समाज के अंतिम छोर पर बैठे हुनरमंद को तलाश कर ले आते हैं. वे जनता की नब्ज भी जानते हैं और समझते हैं. और ऐसे में वे कभी खेल के मैदान में उतर जाते हैं तो कभी गाँव की चौपाल में खाट में बैठकर अपनापन का भाव जताते हैं. जैसा कि उन्होंने खुद ही अपील कर कहा कि मोदीजी नहीं, मोदी कहा जाए. वे जानते हैं कि एक ‘जी’ अपनों से पराया बना देती है. उनका यही हुनर उन्हें एक कुशल संचारक के रूप में स्थापित करता है. संचार की अवधारणा कहती है कि संदेश देने वाले की कामयाबी इस बात में नहीं है कि वह संदेश क्या देता है बल्कि कामयाबी इस बात में है कि संदेश ग्रहण करने वाला उसे कैसे ग्रहण करता है. बातें और भी बहुत सी है और यही बातें उन्हें दूसरों से जुदा करती है. एक बात स्मरण में हो आता है कि एक कामयाब व्यक्ति से पूछा गया कि आपका मुकाबला किससे है? तो उनका जवाब था-मेरा अपने आप से. मोदीजी के बारे में भी यही बात लागू होती है. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

बुधवार, 3 जून 2026

# ‘समागम’ का जुलाई 2026 का अंक राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर एकाग्र

 ‘समागम’ का जुलाई 2026 का अंक  राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर एकाग्र 




















भारतीय शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का क्रियान्वयन कर दिया है. शिक्षा के क्षेत्र में यह बदलाव कितना कारगर हुआ? क्या प्रभाव समाज पर पड़ा? क्या चुनौती है और इस चुनौती का समाधान क्या है? जैसे मुद्दे पर अनुसंधान की अंतरराष्ट्रीय मानक की पत्रिका ‘समागम’ का जुलाई 2026 का अंक राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर एकाग्र होगा. स्कॉलर, शिक्षक एवं मीडिया के सजग लेखकों से राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर अनुसंधानपरक शोध लेख/आलेख आमंत्रित हैं. आपका आलेख कृतिदेव या मंगल फॉट में हो तथा शब्द सीमा 1800-2000 से अधिक ना हो. अंतिम तिथि 25 जून 2026 है. अन्य जानकारी के लिए श्री दत्ता कोल्हारे मोबा. ९८६०६ ७८४५८ पर संपर्क कर सकते हैं.

क्वान्ग्तोंग (भारत अध्ययन) विश्वविद्यालय, चीन 

से हिन्दी जर्नल के रूप में मान्यता प्राप्त हैं. 

ढ्ढस्स्हृ २२३१-०४७९ / ढ्ढद्वश्चड्डष्ह्ल स्नड्डष्ह्लशह्म् ५.०

रिसर्च पेपर भेजते समय निम्रांकित बातों का ध्यान रखें जाने का अनुरोध है-

४रिसर्च पेपर में विषय पर केन्द्रित हो लेकिन किसी समुदाय, व्यक्ति या धर्म पर अनावश्यक टिप्पणी ना किया जाए.

४रिसर्च पेपर में संदर्भ का पूर्ण रूप से उल्लेख किया जाए. यथा पुस्तक का नाम, लेखक, संपादक, प्रकाशक, प्रकाशन स्थान, संस्करण एवं प्रकाशन का वर्ष.

४स्कॉलर/प्राध्यापक का पूरा नाम, पदनाम, कॉलेज/विश्वविद्यालय, शहर और राज्य का स्पष्ट उल्लेख किया जाए.

४रिसर्च पेपर में उपयोग होने वाले शब्दों की ‘समागम’ की स्टाइल शीट है, उसी के अनुरूप शब्दों का उपयोग किया जाता है. 

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शनिवार, 30 मई 2026

# ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर केन्द्रित विशेष अंक का विमोचन

 


भाषा की मर्यादा का चीरहरण- संजय मेहता

भोपाल। वर्तमान में हिंदी पत्रकारिता के समक्ष कोई बड़ी चुनौती है तो वह भाषा की। परम्परागत पत्रकारिता की बात करें अथवा वर्तमान में डिजीटल मीडिया की, दोनों ही जगहों पर भाषा के सारे तटबंध तोड़े जा रहे हैं। भाषा की मर्यादा का चीरहरण हो रहा है। यह बात वरिष्ठ रंग निर्देशक संजय मेहता ने हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर आयोजित विमर्श में कही। श्री मेहता ने पत्रकारिता के साथ रंगमंच एवं सिनेमा को जोड़ते हुए कहा कि हम सबकी जवाबदारी समाज है और सामाजिक सरोकार ही हमें जिंदा रखेगा। पत्रकारिता की तरह रंगमंच की बड़ी जिम्मेदारी है।

इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीमट कोर्ट की एडव्होकेट एवं जिला भाजपा उपाध्यक्ष सुश्री गुंजन चौकसे का कहना था कि ‘सामाजिक सरोकार से ही पत्रकारिता होती है। एक मायने में पत्रकारिता केवल छपे शब्द नहीं बल्कि अवाम की आवाज है।’ उन्होंने अदालत, मीडिया और राजनीति के संदर्भ में अनेक उदाहरण के साथ अपनी बात रखी।

इस अवसर पर प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि- समय कितना ही बदल जाए, पत्रकारिता का मूल स्वरूप हमेशा कायम रहेगा। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता संग्राम से भारत के नवनिर्माण में पत्रकारिता का अहम योगदान रहा है। मिशन से व्यवसाय में पत्रकारिता का परिर्वतन आपातकाल के बाद हुआ। दुर्भाग्य से पत्रकारिता को उद्योग का दर्जा देने की साजिशन माँग की जाने लगी। 

अंतरराष्ट्रीय मानक की अनुसंधान की पत्रिका ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर केन्द्रित विशेष अंक का विमोचन किया गया।  ‘समागम’ के इस विशेष अंक में विविध विषयों का संयोजन किया गया है। लेखक कुंवर इंद्रजीत की सद्य प्रकाशित नवीन पुस्तक ‘जीवन यात्रा के सुमन’ का भी लोकार्पण किया गया। लेखक इंद्रजीत सिंह ने अपने जीवन अनुभव भी साझा किया।

गुरुवार, 28 मई 2026

#माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!

 हिंदी पत्रकारिता दिवस 30 मई पर विशेष

माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!

प्रो. मनोज कुमार

दो सौ साल की पत्रकारिता का स्मरण करते हुए जब हम पंडित युगल किशोर का स्मरण करते हैं, उदंत मात्र्तण्ड का स्मरण करते हैं तो स्वाभाविक रूप से हम अभिमान से भर उठते हैं और दो सौ साल बाद की पत्रकारिता की सीरत देखते हैं तो कम से कम अभिमान तो होता ही नहीं है। दो साल में हिंदी पत्रकारिता के पास बताने के लिए बहुत कुछ था लेकिन हमने बहुत कुछ पाने के लिए उसे खो दिया। हिंदी पत्रकारिता कहाँ दो सौ साल पहले अंग्रेजों से लोहा ले रही थी और आज हम अपने ही लोगों से लोहा ले रहे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी की साख को बचाने के लिए पत्रकारिता संघर्ष कर रही है और यह संघर्ष अनवरत चलने वाला है। हर सत्ता के लिए पत्रकारिता खतरे की घंटी हुआ करती थी और आगे भी रहेगी। यह जानकर अच्छा लगता है कि चाहे पत्रकारिता में जितनी गिरावट आ गई हो, हर कोई अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए पत्रकारिता से भयभीत रहता है। दो साल की हिंदी पत्रकारिता की यही साख है और पूँजी भी। हालाँकि इन दो सौ सालों में बहुत कुछ बदला है। पत्रकारिता की तकनीक हाशिये पर है और हम तकनीक की पत्रकारिता करने लग गए हैं। इस बदलाव से हिंदी पत्रकारिता का यह संक्रमण काल है। यह बात पत्रकारिता में रचे-बसे नए और पुराने दोनों पीढिय़ों को मान लेना चाहिए। वर्तमान समय में चारों तरफ इसी बात पर चर्चा हो रही है कि हिंदी पत्रकारिता एआई और चैटजीपीटी से कैसे निपटे? संकट बड़ा है तो इसका समाधान भी हमें ही तलाश करना होगा। हिंदी पत्रकारिता पर यह संकट पहली बार नहीं है और ना ही आखिरी बार है। ऐसे संकट आते-जाते रहेंगे लेकिन यह भी भरोसा है कि समय के साथ इसका समाधान भी हम सब तलाश कर ही लेंगे।

लंबे संघर्ष के बाद भारत ने स्वाधीनता हासिल किया तो इसमें हिंदी पत्रकारिता की अहम भूमिका थी। अनेक संकटों और झंझावतों से गुजरते हुए अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा वाली हिंदी पत्रकारिता पर अब जिम्मेदारी थी नव भारत निर्माण में चौकीदार बनने की। देश में नवाचार हो रहा था लिहाजा उस समय काल और परिस्थिति के अनुरूप बजट भी आ रहा था। पैसों की बंदरबाट की कहानी शायद उसके जन्म से है। कल भी था और आज भी है। खैर, तब हिंदी पत्रकारिता ने जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका का निर्वाह किया और तब भी अनेक घपले-घोटाले को बेनकाब किया। इस भूमिका के लिए हिंदी पत्रकारिता की पीठ सबने थपथपायी लेकिन भीतर से सत्ता का नाराज होना लाजिमी था। प्रतिपक्ष के लिए तब हिंदी पत्रकारिता की जवाबदारी नैतिक और राष्ट्रहित में होता था लेकिन यही प्रतिपक्ष जब सत्तासीन होता है तो पत्रकारिता उसकी बैरी हो जाती है। सत्ता के साथ पत्रकारिता का रिश्ता वैसा ही है, जैसा की नदी के दो पाट। चलेंगे साथ-साथ लेकिन मिलेेंगे कभी नहीं। खरामा-खरामा साल 47 से साल 75 तक पहुँच गए और यही वह साल था जब हिंदी पत्रकारिता का गला घोंटने की साजिश की गई। तानाशाह शासन व्यवस्था ने पत्रकारिता पर पहरे बिठा दिए। शब्द-शब्द सरकार की निगरानी में छपने लगे। तमाम बंदिशों के बाद भी पत्रकारिता कहाँ हार मानने वाली थी। तानाशाह सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया गया। विरोधस्वरूप संपादकीय पृष्ठ कोरा छोड़ दिया गया। और भी विरोध के अपने तरीके अपनाए गए। पत्रकारिता का यह स्वाभिमान आज भी शेष है। हालाँकि यह भी सच है कि इसी दौर में यह वाक्य चल पड़ा कि- तानाशाह शासन ने कहा कि घुटने के बल चलो तो लोग रेंगने लगे। सौ तो नहीं, अंशभर यह उस समय की सच्चाई है। 

असल चेहरा और पत्रकारिता की साख गिरने का समय साल 75 के बीत जाने के बाद दिखने लगा। पत्रकारिता, मीडिया का स्वरूप धारण करने लगा और मीडिया को उद्योग का दर्जा दिए जाने की माँग उठने लगी। मिशन से मीडिया और मीडिया से उद्योग बन चली पत्रकारिता आहिस्ता-आहिस्ता रोजगार का चेहरा बनने लगी। एक तरफ पत्रकारिता मीडिया बन गई तो दूसरी तरफ पेशेवर पत्रकार तैयार करने के लिए उद्योग की तरह ही मीडिया शिक्षा के संस्थान कुकुरमुत्ते की भाँति उठ खड़े हुए। हर की अपनी खासियत, हरेक के अपने दावे। पत्रकारिता को औजार बना दिया गया। मीडिया शिक्षा तब और बढऩे लगा जब पत्रकारिता की तकनीक हाशिये पर जाने लगी और तकनीक की पत्रकारिता होने लगी। अबके समय में आपकी दक्षता विचारों की नहीं, किसी की पीड़ा को देखकर उसे न्याय दिलाने की नहीं, तकनीक के माध्यम से क्या स्टोरी बनायी जा सकती है और इसमें कौन कितना दक्ष होगा, यह मीडिया शिक्षा तय कर रही है। अपनी 45 सालों की पत्रकारिता में मेरे गुरुजनों ने सिखाया कि पत्रकारिता दिल से होती है लेकिन मेरी बाद की पीढ़ी के लिए पत्रकारिता दिमाग का है। रही-सही कसर आज की एआई और चैटजीपीटी जैसे तकनीक ने पूरा कर दिया है। बरसों पहले मर चुकी संपादक संस्था के नए कारकून मोबाइल पर अपने डिमांड के अनुरूप स्टोरी लिखने को बोलते हैं और चट से ‘बोलो मेरे आका’ के अंदाज में वह सबकुछ दे देता है, जो आपको चाहिए। तकनीक की पत्रकारिता का यह खतरा हम सबके लिए खतरा बन चुका है। अब एक ही रास्ता है कि हम खुद को इस तकनीकी पत्रकारिता के ढाँचे में ढाल लें या इससे बाहर हो जाएँ। कोई तीन दशक पहले फोटोटाइप सेटर और इसके बाद कम्प्यूटर आया तो जो इसके हमसफर हो गए, वे तो बच गए लेकिन अनेक की पत्रकारिता आले पर रख दी गई। अब ओटले की पत्रकारिता होने लगी। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कभी समाज भरोसे के साथ कहता था कि-पढ़ा नहीं, फलां अखबार में छपा है और आज वही कहते हैं कि एक बार खबर को जाँच लेना। इन सबके बावजूद हमारे पुरखा बालकवि बैरागी जी कि यह पंक्ति बरबस याद आ जाती है-

 माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!

मंगलवार, 26 मई 2026

 

अंतरराष्ट्रीय मानक की अनुसंधान पत्रिका ‘समागम’ का 
जून 2026 का अंक अवलोकनार्थ प्रस्तुत है.

गुरुवार, 21 मई 2026

‘जेन जी’ का नया एडीशन और ‘कॉकरोच’ का ‘हिट’


प्रो. मनोज कुमार

2014 को समाज नहीं भूला होगा और अब उनकी याद में 2026 भी दर्ज हो गया है। 2014 में ‘जेन जी’ का भारत में उदय हुआ था। भ्रष्टाचार और युवाओं के सपनों को लेकर अन्ना हजारे की अगुवाई में लाखों युवा सडक़ पर उतर आए थे। उम्मीद और भरोसे के साथ देश की राजधानी दिल्ली की सडक़ें युवाओं से पट गई थी। इसी समय चाय पर चर्चा करती भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। केन्द्र की सरकार पर भाजपा इस ‘जेन जी’ के रास्ते सत्ता में काबिज हो गई तो केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली राज्य की सत्ता पर ‘जेन जी’ के सहारे बैठ गए। 2014 की पुनरावृत्ति सडक़ पर नहीं, सोशल मीडिया पर दिख रही है जब गुस्साये एक नौजवान ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से संगठन खड़ा कर दिया। हैरानी नहीं होना चाहिए बल्कि पड़ताल होना चाहिए कि ‘जेन जी’ इस समय कितना उबल रहा है और देखिए कि कुछ घंटों में हजारों से लाखों और लगभग इस समय तक करोड़ के आसपास युवा जुड़ गए हैं। 2014 के आंदोलन और आज के कॉकरोच जनता पार्टी के बीच कोई साम्य नहीं है लेकिन जेपी आंदोलन, अन्ना आंदोलन और आज के इस सोशल मीडिया आंदोलन में एक साम्य है, वह कि युवा जब घायल होता है तो वह संसार बदल डालता है। इसे आप कॉकरोच जनता पार्टी कहें या नेपाल के ‘जेन जी’ का नया एडीशन, युवाओं का गुस्सा उफान पर है। 

कॉकरोच जनता पार्टी से जुडऩे का आह्वान भी अलग किस्म का है। यहाँ उसे सरकार बदलने या कथित बयान पर गुस्सा निकालने की कोई अपील नहीं किया गया बल्कि सीधे-सीधे उन लोगों से जुडऩे का अनुरोध किया गया जो बेरोजगार हों, आलसी हों और ज्यादतर ऑनलाइन रहते हों। यह अपील भी नाराजगी जाहिर करने का अपनी किस्म का शायद पहला हो लेकिन देखते ही देखते करोड़ों की संख्या में लोग जुडऩे लगे। सोशल मीडिया के महारथी भी इस तूफान से औचक और हैरान रह गए। उनकी सारी कोशिशें नाकाम हो गई और ‘कॉकरोच’ ने ऐसा ‘हिट’ मारा की सबके सब दुबक गए। पहले तो इस बात को समझ लें कि आखिर कॉकरोच जनता पार्टी का सोशल मीडिया एडीशन क्यों और कैसे खड़ा हुआ? कहा जाता है कि इस समूह का जन्म एक कथित टिप्पणी के विरोध से हुआ। यह भी स्पष्ट कर दें कि जिस टिप्पणी को लेकर युवा आक्रोशित हुआ है, उस टिप्पणी पर सफाई भी दी जा चुकी है। आमतौर पर देखा और समझा जा सकता है कि अनेक बार बयानों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है और सोशल मीडिया में ऐसे बयान को वायरल कर दिया जाता है। वायरल करने वाले का एकमात्र मकसद होता है अधिकाधिक धन अर्जन करना लेकिन दूसरी तरफ इस वायरल मैसेज से समाज में जो अराजकता उत्पन्न होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है, उसकी आहट सुनायी देने लगी है। भारत के इतिहास में यह पहला मौका नहीं है, अनेक बार ऐसी स्थिति आयी है किन्तु इस बार इसे सतही तौर पर लिया जाना थोड़ा खतरनाक हो सकता है। सोशल मीडिया का प्रभाव जितना बड़ा है, उसका बिजनेस मॉडल कहीं उससे ज्यादा बड़ा है। इस बात को भी जेहन में रखकर सोचना होगा। 

2014 का अन्ना आंदोलन आज भी लोगों के जेहन में है और केन्द्र की सत्ता परिवर्तन का एक बड़ा कारक इसे माना जाता है। यह आज के कॉकरोच जनता पार्टी की भाँति उदय ना होकर मुद्दा आधारित था। लोकपाल माँग के साथ अन्ना आंदोलन की स्क्रिप्ट लिखी गई थी। 

जिस लोकपाल की माँग को लेकर आंदोलन खड़ा किया गया था, वह पूर्ण हुआ या नहीं, यह अलग विषय है। हालाँकि इसी आंदोलन से केजरीवाल ने ‘आप’ पार्टी को जन्म दिया। लोकप्रियता का आलम यह था कि लोकसभा में जलवा दिखाने वाली भाजपा को नाक के नीचे ‘जेन जी’ वाले केजरीवाल ने सत्ता से बाहर ही रखा। यह सब सुनियोजित नहीं था, जो हो रहा था, वह अप्रत्याशित था। लोगों के बीच संदेश गया कि जेपी आंदोलन के बाद देश में फिर एक बार परिवर्तन की लहर चल पड़ी है। दिल्ली की सत्ता में आप पार्टी ने कई प्रयोग किए लेकिन आखिरकार उनको भी मतदाताओं ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। लोकतंत्र में मतदाता भगवान होता है और वह चाहे जो निर्णय दे, वही मान्य होता है। पराजय के बाद आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक है। 

यहाँ यह बता देना सामयिक होगा कि जिन लोगों को जेपी आंदोलन याद है, जिन लोगों को अन्ना आंदोलन का स्मरण है, वे याद रखें कि संभवत: देश में ऐसी ही युवा आंदोलन से असम में पहली बार प्रफुल्ल मोहंता सरकार बनी थी। इसकी उम्र भी कोई दसेक साल की रही। सवाल यह है कि युवा जोश ठंडा पड़ गया या कि मतदाता जागरूक हो गए जिन्होंने तीसरी बार मोहंता को अवसर नहीं दिया। कुछ ऐसा ही मामला बंगाल से रूखसत की गई ममता बेनर्जी को दिखता है। ऐसे ही जोश-खरोश के साथ बंगाल के मतदाताओं ने टीएमसी को पंद्रह वर्षों तक सत्ता सौंपी थी लेकिन विकल्प मिलते ही उन्हें सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। फिर वही विलाप कि चुनाव में धांधली की गई। खैर, यह सब होता है और होता रहेगा।  

अब सवाल आज की सोशल मीडिया पर बनी कॉकरोच जनता पार्टी का है। युवा वेग उफान पर है लेकिन यक्ष प्रश्र यह है कि यह वेग कब तक रहेगा और किस दिशा में चलेगा? नाराजगी में बना कोई संगठन (फिलहाल कानूनी अस्तित्व नहीं) अक्सर रास्ता भटक जाता है। जिस तेजी से युवा लामबंद हो रहे हैं, वह बदलाव ला भी सकते हैं और खुद भी बदल सकते हैं। मिसाल के तौर पर नेपाल में जो कुछ हुआ, वह भारत में संभव नहीं है। युवा उम्र ही क्रांति का बीज बोती है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है लेकिन क्रांति के लिए मुद्दाआधारित गुस्से की जरूरत होती है और ऐसे आंदोलन जेपी और अन्ना का इस देश ने देखा है। भारत में नए किस्म के ‘जेनजी’ को फिलवक्त कुछ राजनीतिक लोगों का समर्थन भी मिलता दिख रहा है। प्रतिपक्ष की राजनीति देशहित के लिए होता है और संभव है कि आगे भी इस नए-नवेले संगठन को कोई साथ मिलेगा क्योंकि लाभ की राजनीति भला कौन छोडऩा चाहेगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि सोशल मीडिया का प्रभाव संचार के किसी भी अन्य माध्यमों से ज्यादा प्रभावी और व्यापक है। घड़ी के सेकंड के काँटें के साथ सोशल मीडिया में लिखी-बोली गई बातें दुनिया भर में फैल जाती हैं और यही सबकुछ अभी हो रहा है। किसी राजनीतिक पार्टी को अपना कुनबा बढ़ाने के लिए वर्षों लग जाते हैं, वहीं अल्प समय में खड़ी हुए संगठन में करोड़ लोगों का जुट जाना अस्वाभाविक है।आगे देखना दिलचस्प होगा कि कॉकरोच जनता पार्टी रील की तरह स्क्रॉल हो जाएगी या इसका जेपी-अन्ना आंदोलन जैसा कोई प्रभाव दिखेगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) तस्वीर गूगल से साभार

गुरुवार, 14 मई 2026

कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे

 













प्रो. मनोज कुमार

प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से देशवासियों से अपील किया है कि आसन्न संकट को देखते हुए ईंधन की बचत करें. साथ में कुछ और आग्रह भी. स्वाभाविक है कि पीएम की यह अपील सर्वसमाज के लिए था लेकिन मैं और हम में बँटे लोग इस अपील का मौखाल उड़ा रहे थे। सोशल मीडिया में लगातार इस पर तरह-तरह की बातें चल रही थी। यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि उनके ही दल के लोग उदाहरण प्रस्तुत करें लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने फौरन अपनी सुरक्षा व्यवस्था में लगी गाडिय़ों की संख्या कम कर दी। अपरोक्ष रूप से उन्होंने अपने मंत्रिमंडल एवं नव-नियुक्त निगम-मंडलों के अध्यक्षों को निर्देश था लेकिन दिल है कि मानता नहीं के तर्ज पर शक्ति प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया था। ख$फा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जनप्रतिनिधियों को संदेश दे दिया है- ‘कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे’ अन्यथा उनकी सख्ती जग-जाहिर है। यह अपने आपमें हैरान में डाल देने वाला सवाल है कि जिस मोदी को आप अपना आदर्श मानते हैं, उनकी अपील का असर होता नहीं दिख रहा है. सवाल यह भी है कि क्या यह अपील उनके निजी नफा-नुकसान के लिए है अथवा आसन्न संकट से बचाने के लिए देशहित में है।

किसी भी किस्म का संकट हमेशा समाधान की ओर लेकर जाता है. और कोई भी संकट स्थायी नहीं होता है. हमारी पीढ़ी ने कोविड महामारी को झेला और अब अमेरिका-इजराइल और इराक के मध्य युद्ध से उपजे हालात से वैश्विक संकट से दो-चार हो रहा है. यह संकट भी स्थायी नहीं हैं लेकिन हालांकि हालात जो हैं, वह इस बात की गवाही नहीं देते कि समस्या का अंत तुरंत होगा और इसके चलते अनेक किस्म के संकट से भारत समेत दुनिया के अनन्य देश जूझ रहे हैं. भारत के समक्ष इस समय सर्वाधिक संकट ईंधन का है. इसके चलते गैस और पेट्रोल की सप्लाई पर असर साफ दिख रहा है. भले ही अभी हाहाकार ना मचा हो लेकिन जिस तरह से लोग पैनिक हो रहे हैं, हालात वैसा ही बन रहा है. इस युद्ध से जो परिस्थिति निर्मित हो रही है, वह किसी सरकार, राजनीतिक दल का नहीं अपितु राष्ट्र के संकट के रूप में देखा जाना चाहिए. सरकार तो अपने स्तर पर संकट से निपटने के लिए तैयारी कर रही है और उसकी कोशिश होगी कि ईंधन की आपूर्ति की निरंतरता बनी रहे. इस संकट इस बात की आपकी परीक्षा ले रहा है और शायद आगे इम्तहान का दौर जारी रह सकता है और इस स्थिति में आपकी असल परीक्षा होगी कि आप वास्तविक में कितने देशभक्त हैं और ऐसे विकट समय में राष्ट्र का साथ कैसे देते हैं. इस परीक्षा में खरे उतरते हैं, तब आप गर्व से कह सकते हैं कि हम सब भारतीय हैं. हम यह भी मानते हैं कि सामान्य हालत में शासकीय योजनाओं का अधिकाधिक लाभ आम लोगों को मिले किंतु संकटकालीन स्थितियों में इन पर रोक लगाया जाना देशहित में है. लाडली बहनों को दिए जाने वाली राशि फिलहाल स्थगित कर देना एक बड़ा उपाय हो सकता है। और हम यह भी जानते हैं कि हमारी मातृशक्ति हर संकट में घर-परिवार, समाज और देश को उबारने में सक्षम हैं और इस समय भी उनका साथ मिलेगा।

मोदी के विरोधी जिस स्तर पर उनका मजाक बना रहे हैं, वह स्वाभाविक है लेकिन क्या ऐसे लोगों के पास जवाब है कि जब देश संकट से गुजर रहा होगा तो वे बच जाएंगे? सुरक्षित रह पाएँगे? वे और उनका परिवार भी इसी देश के नागरिक हैं तो मोदी ना सही, प्रधानमंत्री की बात सुनिए, मानिए. लोकतंत्र की खूबसूरती इसी बात की है कि विरोध का मंच खुला होता है। सत्ता के कार्यों की समीक्षा करना और उनकी आलोचना करना, सुधार का सुझाव देना किसी भी विपक्ष के लिए जिम्मेदारी होता है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में विरोध ही एक पक्ष है? अधिकार के साथ क्या हमें दायित्व का पालन नहीं करना चाहिए? लोकतंत्र आपको अधिकार देता है तो आपका दायित्व भी निर्धारित करता है और इसलिए आवश्यक है कि समयकाल और परिस्थितियों के अनुरूप विरोध करें या समर्थन कर देशहित में निर्णय लें। वर्तमान समय की माँग है कि हम देशहित में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करें। 

इस तात्कालिक संकट में एकजुटता की जरूरत है और इसे हम स्थानीय स्तर पर ही सुलझा सकते हैं. मोहल्ले और चौपालों में आपसी समझदारी से बैठकी कर यह जान लें कि अपने मोहल्ले में कितने घर हैं और प्रत्येक घर को कितनी ईंधन की जरूरत है? फिर आपस में सुविधानुसार एक-दूसरे की सहायता करें. इससे समाज के पैनिक होने से बचा जा सकेगा और सरकार को व्यवस्था करने में सहायता मिलेगी. इसी तरह आवश्यक होने पर ही वाहनों का उपयोग करें और कोशिश करें कि पेट्रोल का खर्च कम से कम हो. कुछ लोग मानकर कर चल रहे हैं कि हमारे पास ईवी है तो हम चिंता क्यों करें? तो वे लोग जान लें कि ईवी के लिए आपको इलेक्ट्रीसिटी की जरूरत होती है और इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए भी अपरोक्ष रूप से ईंधन की जरूरत होती है. बेहतर होगा कि ईवी को भी सुरक्षित रखें और आपातकाल में जरूरतमंदों की मदद में उपयोग लाएं. इस तरह छोटे-छोटे उपाय से समाज में पैनिक नहीं फैलेगा बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण को बेहतर करने की दिशा में मदद मिलेगी. ऐसा हमने कोविड के दरम्यान देखा है.

पीएम की अपील भी हैकि वर्कफ्रॉम होम को प्राथमिकता देंञ सरकारों को चाहिए कि वे आपातकालीन सेवाओं को छोडक़र वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी लागू कर दे जिससे ईंधन की बड़ी मात्रा में बचत होगी. पर्यावरण को इसका लाभ मिलेगा ही और जीवन सहज हो जाएगा. वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी से लाभ यह होता है कि अनेक अकारण स्थापना खर्च में भी कटौती होती है. साथ ही जरूरत पडऩे पर व्यक्ति हर समय उपलब्ध होता है. कार्यालयीन समय का बंधन नहीं होता है, इसमें वह भी नहीं है. सरकार अपने स्तर पर व्यवस्था को सुचारू बनाने की दिशा में काम कर रही है और यह संकट स्थायी नहीं है. समाज और सरकार साथ मिलकर चलेंगे तो स्थिति से निपटने में आसानी होगी. फिलवक्त संकट बहुत भयावह नहीं है लेकिन हमारा डर उसे भयावह बना रहा है. बहुत जल्द ही हम तनाव मुक्त होंगे लेकिन जो संकट है, वह सरकार का ही नहीं, समाज का है. एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से हमें डर के आगे जीत को सामने रखना होगा. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) 

शुक्रवार, 8 मई 2026

चिथड़े में लिपटी माँ को भी याद कर लें

 



‘मदर्स डे’ पर दिल की बात

प्रो. मनोज कुमार

अपने हाथों से दही-शक्कर खिलाकर कामयाबी की कामना करती माँ, अपने बच्चों की बलाएँ उतराती माँ और देहरी लाँघ कर जाते बच्चे को अपने आँचल में बँधा मुड़ा-तुड़ा दस का नोट देकर पूरी दुनिया खरीद लेने की ताकत देती माँ को इस बदलते समय ने बाजार बना दिया है। हमारी सनातन संस्कृति में ‘मदर्स डे’ जैसा कोई कांसेप्ट कभी था ही नहीं। शाम ढले जब थका-हारा बच्चा घर लौटता और दुलार के साथ माँ की गोदी में सिर रखकर जन्नत का अहसास करने लगता उसी समय ‘मदर्स डे’ हो जाता था। भागते-दौड़ते समय में यह पल-छीन, बाजार ने छीन लिया है। ‘मदर्स डे’ का मतलब बता दिया है कि माँ के लिए एक महँगा तोहफा खरीद कर उसे दो, सेल्फी लो और दुनिया को बता दो कि तुम अमीर नहीं, माँ गरीब हो गई है। वो दस रूपये का मुड़ा-तुड़ा नोट जो तुम्हें इस बाजार को खरीद लेने की ताकत देता था, वह पूँजी हम सबने गँवा दी है। हम सब फिर एक बार ‘मदर्स डे’ मनाने के लिए उतावले हो रहे हैं।

‘मदर्स डे’ क्या होता है, यह समझाने के लिए बाजार सज गया है। हम बाजार के बहकावे में आ गए हैं। दही-शक्कर खिलाती माँ और अपने भीतर के दर्द को समेटकर हर बार बच्चे की मुस्कराहट पर निसार होती माँ अब ‘मदर्स डे’ में सिमट गई है। आए दिन खबरें पढ़ते हैं कि एक बेटे ने माँ को इसलिए मौत के घाट उतार दिया कि उसने मोबाइल के लिए पैसे नहीं दिए या कि उसकी अनाप-शनाप जरूरतों को पूरा करने के लिए माँ की गाँठ में पैसे नहीं थे। एक पुरानी कहानी इस संदर्भ में स्मरण हो आता है कि एक बार एक बेटे ने गुस्से में कुल्हाड़ी से माँ की गर्दन उड़ा दी। कटी हुई गर्दन ने शिकायत करने के बजाय पूछा-बेटा ऐसा करते हुए तुझे चोट तो नहीं लगी। ये है हमारा ‘मदर्स डे’ और कौन सा बाजार इस ‘दिल’ को बेच पाएगा और कौन सी औलाद है जो इसे खरीद पाएगी।

हम ‘मदर्स डे’ नहीं मनाते हैं बल्कि माँ की त्याग और उत्सर्ग को याद करने के लिए कभी वीरांगना लक्ष्मीबाई का स्मरण कर लेते हैं तो कभी ‘मदर इंडिया’ देख लेते हैं। माँ बच्चे की पहली पाठशाला होती है। उसे नैतिक शिक्षा देती है और संबंधों का मूल्य समझाती है और जब वह ऐसे में खुद को विफल होता देखती है तो ‘मदर इंडिया’ हो जाती है। पुरानी बात क्या कहें, एक दशक पहले टीकमढ़ में एक सरपंच माँ ने अपने ही बेटे को गाँव निकाला दे दिया कि नियम के खिलाफ जाकर उसने शराब पीने की जुर्रत की थी। माँ का दुलार और उसकी सख्ती से मिलकर हमारे सनातनी समाज का ‘मदर्स डे’ मनता है। बाजार ने ‘मदर्स डे’ पर अपना कारोबार खड़ा कर लिया है लेकिन आज भी सैकड़ों मध्यम वर्गीय भारतीय परिवार हैं जिनकेे लिए भगवान से पहले माँ है। ये परिवार एक दिन का ‘मदर्स डे’ नहीं मनाते हैं, इनके लिए हर पल छीन ‘मदर्स डे’ होता है। मैं ऐेसे कई अनुभव का साक्षी हूँ। एक बड़े उत्सव के आयोजन में एक बड़े संपादक को आमंत्रित किया और ऐनवक्त में उनकी ना हो गई। दुख हुआ और जब कारण पता चला कि माँ और पिता की तबीयत के चलते वो शामिल नहीं हो पा रहे हैं तो दुख कपूर की तरह उड़ गया। यहाँ एक बार फिर श्रवण कुमार याद आ गए। ऐसे भारतीय समाज में ‘मदर्स डे’, ‘फादर्स डे’ के बहाने बाजार की घुसपैठ आतंकित करता है। डराता है कि हमारे बच्चे कभी श्रवण कुमार को जान पाएंगे कि नहीं?

बाजार का अपना चरित्र है और उसने देखा कि भारतीय चरित्र की बुनियाद को इस नकली दिनों के बहाने और कमजोर किया जा सकता है तो उसने साल में एकाध दर्जन ऐसे दिन खड़े कर दिए। हमेशा की तरह बाजार सज गया है। जिस माँ ने कभी स्कूल की देहरी तक नहीं पहुँच पायी, उसका औलाद उसे ‘आई लव यू ममा’ का लुभावना चमकदार महँगा कार्ड भेंट कर रहा है। माँ को समझ ही नहीं आता कि ये क्या है, उसका क्या करे? उसके लिए तो उपहार उसकी औलाद है जो कुछ पल के लिए उसकी गोद में लेट जाए और वह दुलार से उसके सिर पर हाथ फेरने लगे तो हर पल माँ का हो जाता है। माँ समझ ही नहीं पा रही है कि ये ‘मदर्स डे’ होता क्या है? और औलाद के लिए माँ के पास वक्त नहीं, बाजार से खरीदे गए महँगे तोहफे हैं। हम कौन से समय में किस दुनिया मेंं खड़े हैं। कवियों ने शायरों ने माँ को ऐसा महिमामंडित किया कि बाप की औकात दिखा दी गई। क्या माँ और पिता के बिना हम अपनी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं। ऐसे में मशहूर जावेद अख़्तर एक सभा में बेबाकी से इस पर तल्ख शब्दों में ऐतराज जाहिर करते हैं तो लगता कि वे ‘मदर्स डे’ की औकात दिखा रहे हैं। बाजार को उसकी औकात बता रहे हैं।

भारत के 130 करोड़ से अधिक नागरिकों में बमुश्किल एक करोड़ भी नहीं होंगे जिसकी औलाद के पास ‘मदर्स डे’ मनाने की औकात हो। यहाँ यह भी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि अपनी आर्थिक हैसियत को दरकिनार कर वह महँगा तोहफा इसलिए खरीद रहा है कि चार लोग क्या कहेंगे? माँ के पैरों में जन्नत तलाश करने वाला बच्चा अपनी माँ से कब बड़ा हो गया? माँ की कमजोर होती आँख के लिए एक सुंदर सा चश्मा बनाने के लिए औलाद के पास पैसे नहीं है, पैसे नहीं है माँ की दवा लाने के लिए और पैसे हैं तो वक्त नहीं माँ के लिए। यह भी आज के ‘मदर्स डे’ का सबसे बड़ा सच है। बाजार ने बच्चों को निर्मम बना दिया है। 

अभी एक तस्वीर मेरी नजरों से गुजरी जिसमें एक माँ अपने बच्चे को कमर में आँचल से लपेट कर किसी धन्ना सेठ के बच्चे की शादी में लाईट लेकर चली जा रही है। डीजे में नाचते, खुशियों में रुपये लुटाते इस समाज की नजर ना तो उस माँ पर गई और ना ही उस नन्हें बच्चे पर। माँ कभी गरीब नहीं होती है, यह तस्वीर इस बात की तस्दीक करती है। माँ अमीर होती है अपने संकल्प से, अपने मातृत्व से और वो अपनी औलाद को दुनिया का सबसे कामयाब आदमी बनते देखना चाहती है, भले ही उसे आधा पेट खाना मिले। शरीर पर चिथड़े की सूरत में बदलती साड़ी सही मायने में माँ को परिभाषित करती है। बाजार जिस दिन ये तमीज हमें सिखा जाएगा फिर किसी ‘मदर्स डे’ की जरूरत नहीं होगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) 

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...