शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

१५ अगस्त को परतंत्रता की छांह में कैद था भोपाल


मनोज कुमार
१५ अगस्त १९४७ को जब भारत वर्ष का गांव-गांव जश्ने आजादी में डूबा था, तब भोपाल की परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाया था. तत्कालीन नवाब हमीदुल्ला खां के उस फैसले से हुआ था जिसमें उन्होंने अपनी रियासत का विलय से इंकार कर दिया था। यह वह समय है जब भोपाल रियासत की सरहद में वर्तमान सीहोर व रायसेन जिला भी शामिल था। लम्बे जद्दोजहद के दो साल बाद ३० अप्रेल १९४९ को भोपाल रियासत का विलय होने के साथ ही वह स्वतंत्र भारत का अभिन्न अंग बन गया। १ मई १९४९ को भोपाल में पहली दफा तिरंगा लहराया था। इस दिन भाई रतनकुमार गुप्ता ने पहली दफा झंडावदन किया। 
उल्लेखनीय है कि १५ अगस्त १९४७ को भोपाल सहित जूनागढ़, कश्मीर, हैदराबाद और पटिलाया रियासत ने भी विलय से इंकार कर दिया था। भोपाल नवाब चेम्बर ऑफ प्रिंसेस के अध्यक्ष थे। उस समय जब पूरा देश स्वतंत्र होने का जश्न मना रहा था तब भोपाल रियासत में खामोशी छायी हुई थी। आजादी नहीं मिल पाने के कारण अगले वर्ष १९४८ को भी भोपाल में खामोशी छायी हुई थी। नवम्बर १९४८ में विलनीकरण आंदोलन का आरंभ हुआ और जिसकी कमान भाई रतनकुमार ने सम्हाली थी। उनके साथ जिन लोगों ने विलनीकरण के समर्थन में आगे आये उनमें डॉ. शंकरदयाल शर्मा, खान शाकिर अली खान, मास्टरलाल सिंह, उद्धवदास मेहता, प्रोफसर अक्षय कुमार जैन, विचित्रकुमार सिन्हा, शांति देवी, मोहिनी देवी, रामचरण राय, तर्जी मशरिकी, गोविंद बाबू एवं भोगचंद कसेरा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। भोपाल में चतुरनारायण मालवीय एवं मास्टर लालसिंह ने हिन्दू महासभा की स्थापना की थी। खान शाकिर अली खान ने अंजुमने खुद्दामे वतन का गठन किया था। विलनीकरण आंदोलन की कमान सम्हालने वाली उस समय की संस्थाओं में हिन्दू महासभा, आर्य समाज और प्रजा मंडल ने अपनी महती भूमिका निभायी। नवम्बर में आरंभ हुआ विलनीकरण आंदोलन अगले साल सन् १९४९ के फरवरी माह में एकदम भड़क उठा। लगभग चालीस दिनों तक भोपाल बंद रहा। जुलूस, धरना, प्रदर्शन और गिरफ्तारियां होती रहीं। 
विलनीकरण आंदोलन में महिलाओं की भूमिका भी उल्लेखनीय रही। पुरूषों की गिरफ्तारी के बाद महिलाओं ने मोर्चा सम्हाल लिया। महिलाओं के सामने आने के बाद तो विलनीकरण आंदोलन एक नये स्वरूप में दिखने लगा। उस समय सिर पर बांधे कफनवा हो शहीदों की टोली निकली लोगों में जोश जगा रहा था। भोपाल विलनीकरण आंदोलन में समाचार पत्रों की भी अहम भूमिका रही। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी कर्मवीर छाप कर नि:शुल्क वितरण के लिये भिजवाते थे तो भाई रतनकुमार का समाचार पत्र नईराह ने विलनीकरण आंदोलन को नईदिशा, जोश और उत्साह से भर दिया था। विलनीकरण आंदोलन अहिंसक नहीं रहा। आंदोलन को दबाने के लिये कई स्तरों पर कोशिशें हुर्इं। अत्याचार किये गये और आखिरकार खून-खराबा भी हुआ। 
बरेली के बोरास गांव में हुए गोलीचालन में तीन आंदोलनकारी शहीद हो गये। इस गोलीबारी से भोपाल की जनता बेहद आहत हुई। नवाब हमीदुल्ला शायद विलनीकरण समझौते के लिये कभी राजी नहीं होते लेकिन हैदराबाद में हुई सैनिक कार्यवाही ने उनके हौसले पस्त कर दिये। वे भीतर ही भीतर डर गये थे। विलनीकरण आंदोलन भी अपने पूरे शबाब पर था। इसी बीच प्रजा मंडल के अध्यक्ष बालकृष्ण गुप्ता दिल्ली जाकर तत्कालीन गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल से मुलाकात की और आग्रह किया कि वे नवाब हमीदुल्ला की अनुचित मांगों को न मांगा जाए। चौतरफा दबाव के सामने आखिरकार नवाब हमीदुल्ला ने विलनीकरण करार पर दस्तखत करने के लिये राजी हुए। केन्द्र सरकार के राज्य सेल के सचिव पी. मेनन और नवाब हमीदुल्ला खान ने समझौते पर दस्तखत किया। इस तरह स्वतंत्रता प्राप्ति के दो वर्ष बाद भोपाल को भी स्वतंत्रता मिल पायी थी।

शनिवार, 6 अगस्त 2016

राजेन्द्र माथुर : हिंदी पत्रकारिता के अमित हस्ताक्षर

मनोज कुमार
किसी व्यक्ति के नहीं रहने पर आमतौर पर महसूस किया जाता है कि वो होते तो यह होता, वो होते तो यह नहीं होता और यही खालीपन राजेन्द्र माथुर के जाने के बाद लग रहा है। यूं तो 8 अगस्त को राजेन्द्र माथुर का जन्म दिवस है किन्तु उनके नहीं रहने के छब्बीस बरस की रिक्तता आज भी हिंदी पत्रकारिता में शिद्दत से महसूस की जाती है। राजेन्द्र माथुर ने हिंदी पत्रकारिता को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया, वह हौसला फिर देखने में नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि उनके बाद हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने में किसी ने कमी रखी लेकिन हिंदी पत्रकारिता में एक संपादक की जो भूमिका उन्होंने गढ़ी, उसका सानी दूसरा कोई नहीं मिलता है। राजेन्द्र माथुर के हिस्से में यह कामयाबी इसलिए भी आती है कि वे अंग्रेजी के विद्वान थे और जिस काल-परिस्थिति में थे, आसानी से अंग्रेजी पत्रकारिता में अपना स्थान बना सकते थे लेकिन हिंदी के प्रति उनकी समर्पण भावना ने हिंदी पत्रकारिता को इस सदी का श्रेष्ठ संपादक दिया। इस दुनिया से फना हो जाने के 26 बरस बाद भी राजेन्द्र माथुर दीपक की तरह हिंदी पत्रकारिता की हर पीढ़ी को रोशनी देने का काम कर रहे हैं।
राजेन्द्र माथुर की ख्याति हिंदी के यशस्वी पत्रकार के रूप में रही है। शायद यही कारण है कि हिंदी पत्रकारिता की चर्चा हो और राजेन्द्र माथुर का उल्लेख न हो, यह शायद कभी नहीं होने वाला है। राजेन्द्र माथुर अपने जीवनकाल में हिंदी पत्रकारिता के लिए जितना जरूरी थे, अब हमारे साथ नहीं रहने के बाद और भी जरूरी हो गए हैं। स्वाधीन भारत में हिंदी पत्रकारिता के बरक्स राजेन्द्र माथुर की उपस्थिति हिंदी की श्रेष्ठ पत्रकारिता को गौरव प्रदान करता है। पराधीन भारत में जिनके हाथों में हिंदी पत्रकारिता की कमान थी उनमें महात्मा गांधी से लेकर पंडित माखनलाल चतुर्वेदी थे। इन महामनाओं के प्रयासों के कारण ही भारत वर्ष अंग्रेजों की दासता से मुक्त हो सका। इस मुक्ति में हिंदी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत वर्ष के स्वाधीन हो जाने के बाद एकाएक अंग्रेजी ने ऐसी धाक जमायी कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजियत की छाया से भारतीय समाज मुक्त नहीं हो पाया था।
स्वाधीनता के बाद ऐसे में हिंदी पत्रकारिता पर संकट स्वाभाविक था किन्तु इस संकट के दौर में मध्यप्रदेश ने एक बार फिर अपनी भूमिका निभाई और मालवा अंचल से राजेन्द्र माथुर नाम के एक ऐसे नौजवान को कॉलम राइटर के रूप में स्थापित किया जिसने बाद के वर्षों में हिंदी पत्रकारिता को नई ऊंचाई दी बल्कि यह कहना भी गैरवाजिब नहीं होगा कि अंग्रेजी पत्रकारिता भी उनसे रश्क करने लगी थी। यह गैरअस्वाभाविक भी नहीं था क्योंकि अखबारों की प्रकाशन सामग्री से लेकर प्रसार संख्या की द्ष्टि से हिंदी के प्रकाशन लगातार विस्तार पा रहे थे। सीमित संचार सुविधायें और आवागमन की भी बहुत बड़ी सुविधा न होने के बावजूद हिंदी प्रकाशनों की प्रसार संख्या लाखों तक पहुंच रही थी। अंग्रेजी पत्रकारिता इस हालात से रश्क भी कर रही थी और भय भी खा रही थी क्योंकि अंग्रेजी पत्रकारिता के पास एक खासवर्ग था जबकि हिंदी के प्रकाशन आम आदमी की आवाज बन चुके थे। हिंदी पत्रकारिता की इस कामयाबी का सेहरा किसी एक व्यक्ति के सिर बंधता है तो वह हैं राजेन्द्रमाथुर।
बेशक राजेन्द्र माथुर अंग्रेजी के ज्ञाता थे, जानकार थे लेकिन उनका रिश्ता मालवा की माटी से था, मध्यप्रदेश से था और वे अवाम की जरूरत और आवाज को समझते थे लिहाजा हिंदी पत्रकारिता के रूप और स्वरूप को आम आदमी की जरूरत के लिहाज से ढाला। उनके प्रयासों से हिंदी पत्रकारिता ने जो ऊंचाई पायी थी, उसका उल्लेख किए बिना हिंदी पत्रकारिता की चर्चा अधूरी रह जाती है। राजेन्द्र माथुर के बाद की हिंदी पत्रकारिता की चर्चा करते हैं तो गर्व का भाव तो कतई नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि राजेन्द्र माथुर के बाद हिंदी पत्रकारिता की श्रेष्ठता को कायम रखने में संपादकों का योगदान नहीं रहा लेकिन संपादकों ने पाठकों के भीतर अखबार के जज्बे को कायम नहीं रख पाये। उन्हें एक खबर की ताकत का अहसास कराने के बजाय प्रबंधन की लोक-लुभावन खबरों की तरफ पाठकों को धकेल दिया। अधिक लाभ कमाने की लालच ने अखबारों को प्रॉडक्ट बना दिया। संपादक मुंहबायें खड़े रहे, इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता है। हालांकि इस संकट के दौर में प्रभाष जोशी जैसे एकाध संपादक भी थे जिन्होंने ऐसा करने में साथ नहीं दिया और जनसत्ता जैसा अवाम का अखबार पाठकों के साथ खड़ा रहा।
ज्यादातर अखबारों बल्कि यूं कहें कि हिंदी के प्रकाशन फैशन, सिनेमा, कुकिंग और इमेज गढ़ने वाली पत्रकारिता करते रहे। इनका पाठक वर्ग भी अलग किस्म का था और इन विषयों के पत्रकार भी अलहदा। सामाजिक सरोकार की खबरें अखबारों से गायब थीं क्योंकि ये खबरें राजस्व नहीं देती हैं। इसी के साथ हिंदी पत्रकारिता में पनपा पेडन्यूज का रोग। पत्रकारिता के स्वाभिमान को दांव पर रखकर की जाने वाली बिकी हुई पत्रकारिता। यह स्थिति समाज को झकझोरने वाली थी लेकिन जिन लोगों को राजेन्द्र माथुर का स्मरण है और जो लोग जानते हैं कि जिलेवार अखबारों के संस्करणों का आरंभराजेन्द्र माथुर ने किया था, वे राहत महसूस कर सकते हैं कि इस बुरे समय में भी उनके द्वारा बोये गए बीज मरे नहीं बल्कि आहिस्ता आहिस्ता अपना प्रभाव बनाये रखे। अपने अस्तित्व को कायम रखा और इसे आप आंचलिक पत्रकारिता के रूप में महसूस कर सकते हैं, देख और समझ सकते हैं।
हिंदी के स्वनाम-धन्य अखबार जब लाखों और करोड़ों पाठक होने का दावा ठोंक रहे हों। जब उनके दावे का आधार एबीसी की रिपोर्ट हो और तब उनके पास चार ऐसी खबरें भी न हो जो अखबार को अलग से प्रतिष्ठित करती दिखती हों तब राजेन्द्र माथुर का स्मरण स्वाभाविक है। राजेन्द्र माथुर भविष्यवक्ता नहीं थे लेकिन समय की नब्ज पर उनकी पकड़ थी। शायद उन्होंने आज की स्थिति को कल ही समझ लिया था और जिलेवार संस्करण के प्रकाशन की योजना को मूर्तरूप दिया था। उनकी इस पहल ने हिंदी पत्रकारिता को अकाल मौत से बचा लिया। राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर पर हिंदी पत्रकारिता की दुर्दशा पर विलाप किया जा रहा हो या बताया जा रहा हो कि यह अखबार बदले जमाने का अखबार है किन्तु सच यही है कि जिस तरह महात्मा गांधी की पत्रकारिता क्षेत्रीय अखबारों में जीवित है उसी तरह हिंदी पत्रकारिता को बचाने में राजेन्द्र माथुर की सोच और सपना इन्हीं क्षेत्रीय अखबारों में है।
हिंदी पत्रकारिता को बहुत शिद्दत से सोचना होगा, उनके शीर्षस्थ संपादकों को सोचना होगा कि वे हिंदी पत्रकारिता को किस दिशा में ले जा रहे हैं? पत्रकारिता के ध्वजवाहकों द्वारा तय दिशा और दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता भटक गई है। हां, आधुनिक टेक्रालॉजी का भरपूर उपयोग हो रहा है और संपादक मोहक तस्वीरों के साथ मौजूद हैं। आज के पत्रकार राजेन्द्र माथुर थोड़े ही हैं जिनकी तस्वीर भी ढूंढ़े से ना मिले। यकिन नहीं होगा, किन्तु सच यही है कि जब आप हिंदी के यशस्वी संपादक राजेन्द्र माथुर की तस्वीर ढूंढऩे जाएंगे तो दुर्लभ किस्म की एक ही तस्वीर हाथ लगेगी लेकिन उनका लिखा पढऩा चाहेंगे तो एक उम्र की जरूरत होगी।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

प्रेमचंद को पढ़ें ही नहीं, गढ़े भी



मनोज कुमार
हम लोग ईश्वर,अल्लाह, गुरूनानक और ईसा मसीह को खूब मानते हैं लेकिन उनका कहा कभी नहीं मानते हैं बिलकुल वैसे ही जैसे हम प्रेमचंद को पढक़र उनकी तारीफ करते अघाते नहीं लेकिन कभी उनके पात्रों को मदद करने की तरफ हमारे हाथ नहीं उठते हैं। प्रेमचंद पर बोलकर, लिखकर हम वाहवाही तो पा लेते हैं लेकिन कभी ऐसा कुछ नहीं करते कि उनका लिखा सार्थक हो सके। प्रेमचंद की जयंती पर विशेष आयोजन हो रहे हंै, उनका स्मरण किया जा रहा है। लाजिमी है कि उनके जन्म तारीख के आसपास ही ईद का पाक उत्सव भी मनाया जाता है। ईद को केन्द्र में रखकर गरीबी की एक ऐसी कथा प्रेमचंद ने ईदगाह शीर्षक से लिखी कि आज भी मन भर आता है। 

सवाल यह है कि दशक बीत जाने के बाद भी हर परिवार उसी उत्साह से ईद मना पा रहा है। शायद नहीं, इस बात का गवाह है ईद के दिन अपनी गरीबी से तंग आकर एक युवक ने मौत को गले लगा लिया। उसे इस बात का रंज था कि वह ईद पर अपने दो बच्चों के लिये नये कपड़े नहीं सिला पाया। उन्हें ईदी भी नहीं दे पाया होगा। एक पिता के लिये यह शायद सबसे ज्यादा मुश्किल की घड़ी होती है। मरने वाला संवेदनशील था और उसे अपनी बेबसी का मलाल था। वह चाहता तो दूसरों की तरह मजबूरी का रोना रोकर और कुछ दिन गुजार लेता लेकिन मरने वाले का जिंदगी से जिस्मानी नहीं, दिली रिश्ता था। वह अपने बच्चों को दुखी देखकर जी नहीं पाया।
 
एक आम आदमी की तरह मैं उसके आत्महत्या की तरफदारी नहीं करूंगा लेकिन एक पिता के नाते उसके भीतर की तड़प को समझने की ताकत मुझमें है। शायद मैं भी कभी इस समय से गुजर चुका हूं लेकिन तब कोई काम मिल गया था और मेरी मदद हो गई थी। मैं थोड़ा बेशर्म किस्म का इंसान हूं इसलिये नजरें झुकाये जी लेता लेकिन मौत को गले नहीं लगाता। बस, उसमें और मुझमें यही फर्क था कि वक्त ने उसका साथ नहीं दिया और मेरा साथ दे दिया था। उसे तो दुनिया से फना हो जाना था, सो हो गया लेकिन क्या यह समाज उसके दर्द को समझ पायेगा? उसके रहते, उसकी बेबसी और मजबूरी के चलते उसके परिवार ने एक ईद नहीं मनायी लेकिन उसके जाने के बाद हर दिन बेवजह उपवास रखने की जो नौबत आ रही है, उसका क्या कीजियेगा?

हैरान इस बात को लेकर हूं कि एक मानवीय खबर को भीतर के पन्ने पर एक दुर्र्घटना के समाचार के रूप में छाप कर अपने दायित्वों की इतिश्री कर ली गई। इस पर कोई बात नहीं हुई। हां, बीजेपी नेता प्रभात झा ने कह दिया कि लाल गाल वाले टमाटर खाते हैं तो अखबारों की प्रमुख खबर तो बन ही गई, आमजन में चर्चा का विषय भी। क्या जो लोग आज और कल प्रेमचंद का स्मरण कर रहे होंगे, वे इस युवक के बारे में कोई बात करेंगे। ईदगाह के हामिद की बार बार चर्चा होगी कि कैसे ईदी के पैसों से उसने दादी की चिंता की लेकिन क्या कोई इस युवक की चर्चा करेगा कि कैसे उसे अपने बच्चों का दुख देखा नहीं गया और उसने मौत को गले लगा लिया। दरअसल, अब हमें ढोंग से उबर जाना चाहिये। हमेें मान लेना चाहिये कि मूर्तिपूजक बन कर रह गये हैं। हमें मूर्ति से वास्ता है, मूर्ति के बताये रास्ते हमारे लिये नहीं हैं।

शनिवार, 16 जुलाई 2016

छत्तीसगढ़ में स्त्री सशक्तिकरण की नई इबारत


अनामिका
मनुष्य ने समय-समय पर अपने साहस का परिचय दिया है. आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, वह हमारे साहस का ही परिणाम है. आदिमानव के रूप में हम कभी इस बात का यकिन ही नहीं कर सकते थे कि आसमान में हवाई जहाज उड़ा करेंगे लेकिन आज मनुष्य अपने सांसों से अधिक तेज गति से विकास कर रहा है. इसी साहस और संकल्प को देखना है तो छत्तीसगढ़ आना होगा. आदिवासी बहुल इस राज्य में प्रकृति का अनुपम वरदान है. एक सम्पन्न राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ की पृथक से पहचान है. बावजूद इसके लगभग चार दशकों से बढ़ती नक्सली हिंसा से जनजीवन बेहद प्रभावित हुआ है. इस हिंसा से आमतौर पर लोगों का मनोबल टूट जाता है लेकिन छत्तीसगढ़ का आदिवासी समाज का आत्मबल इतना मजबूत है कि उन्होंने अपने साहस से नक्सलियों को आईना दिखा दिया है और लगातार सफलता की ओर आगे बढ़ रहे हैं. आदिवासी समाज का यह आत्मविश्वास सरकार के साहस को आगे बढ़ाता है और सरकार विभिन्न योजनाएं चलाकर इनका हौसलाअफजाई करती हैं.
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में राज्य शासन द्वारा महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए संचालित विभिन्न योजनाओं का लाभ उठाकर इस जिले के महिलाएं अपने स्व-सहायता समूहों के माध्यम से धरातल पर आत्म निर्भरता का एक नया इतिहास रच रही हैं। नक्सल हिंसा और आतंक की गंभीर चुनौती के बावजूद छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में महिला सशक्तिकरण की भावना लगातार शक्तिशाली होकर उभरती जा रही है। नक्सल हिंसा पीडि़त जिलों के लिए राज्य शासन द्वारा संचालित एकीकृत विकास योजना के माध्यम से बीजापुर जिले की महिलाओं को भी विभिन्न रोजगार मूलक कुटीर उद्योग और व्यवसाय का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। 
बीजापुर में सशक्तिकरण की यह मशाल लगभग 6 साल पहले जलाई गई थी। कभी अगरबत्ती की काड़ी बनाने वाली महिलाएं आज सरकार के सहयोग से कामयाबी की जोत जला रही हैं। जिले के महिला समूहों को अगरबत्ती काड़ी, आइसक्रीम काड़ी, ईंट निर्माण और स्कूली बच्चों सहित पुलिस तथा होमगार्ड जवानों के लिए वर्दी बनाने का काम भी मिला है। जिले के लगभग पचास महिला स्व-सहायता समूहों की सैकड़ों महिलाओं ने अगरबत्ती की काड़ी बनाने का काम सीख लिया है, वही इनमें से चालीस समूहों की महिलाओं के द्वारा डेढ़ वर्ष में लगभग एक सौ क्विंटल (दस टन) अगरबत्ती काड़ी बनाकर वन विभाग के सहयोग से  पास के राज्यों को भेजा जा रहा है। गायत्री महिला स्व-सहायता समूह बीजापुर की सचिव श्रीमती जयमनी के अनुसार इससे इन समूहों को करीब चार लाख रुपए की आमदनी हुई है। इन महिला समूहों ने दस क्विंटल आइस्क्रीम काड़ी बनाकर भी 3378-2-291011लगभग चालीस हजार रूपए का आमदनी हासिल की है। ये महिलाएं घर-गृहस्थी और खेती-बाड़ी के काम के बाद अपने खाली समय का उपयोग घर पर अगरबत्ती काड़ी और आइस्क्रीम काड़ी बनाने के लिए कर रही हैं। 
इसी जिले के सभी चार विकासखंडों में 35 महिला स्व-सहायता समूहों की साढ़े तीन सौ महिलाएं भवन निर्माण के लिए जरूरी ईट उद्योग का संचालन कर रही हैं। इन समूहों के भ_ों में तैयार ईटों की इस्तेमाल जिला प्रशासन और जिला पंचायत द्वारा विभिन्न सरकारी भवनों, स्कूल और आश्रम शाला भवनों तथा आंगनबाड़ी भवनों सहित इंदिरा आवास योजना के मकानों के लिए भी किया जा रहा है। ग्राम नैमेड़ स्थित मां दंतेश्वरी महिला स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष श्रीमती जयमति ने बताया कि उनके समूह ने तो पिछले आठ महीने में इलाके में स्कूल भवन और आश्रम शाला भवन सहित शिक्षक आवास गृह निर्माण के लिए लगभग डेढ़ लाख ईटों की बिक्री कर करीब दो लाख रूपए की कमाई की है। उनका समूह गांव में ही इंदिरा आवास योजना के हितग्राहियों के मकान बनाने के लिए रियायती दर पर एक लाख ईटों का निर्माण कर रहा है।
इसी तारतम्य में जिले के महिलाएं अपने महिला स्व-सहायता समूहों में संगठित होकर सिलाई-बुनाई का काम भी सीख रही हैं। जिले में इनके लिए छह सिलाई प्रशिक्षण केन्द्र संचालित किए जा रहे हैं, इनमें चालीस महिला समूहों की चार सौ महिलाएं सिलाई-कढ़ाई का काम सीख कर स्कूली बच्चो के लिए वर्दी (गणवेश) सिलाई का काम भी कर रही हैं, इनमें से श्रीराम महिला स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष श्रीमती महादेई के अनुसार उनके समूह ने विगत दस महीने में स्कूली बच्चों की वर्दी सिलकर पांच लाख रूपए की कमाई का एक नया कीर्तिमान बनाया है। अब इस महिला समूह को जिला प्रशासन द्वारा स्वास्थ्य विभाग के पैरामेडिकल कर्मचारियों सहित पुलिस और होमगार्ड के जवानों के लिए भी वर्दी सिलने का काम सौंपा गया है। इससे उन्हें साल भर रोजगार मिलता रहेगा।  गंभीर नक्सली हिंसा से जूझते अंचलों में महिलाओं का यह उद्यम इस बात का संदेश देता है कि- कोई भी लक्ष्य मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं/ हारा वही, जो लड़ा नहीं। महिलाओं की यह कामयाबी से मुख्यमंत्री रमनसिंह का प्रसन्न होना स्वाभाविक है। उनका ही क्यों, महिलाओं के इस उद्यम ने छत्तीसगढ़ में स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में उजियारा फैलाया है जो आगे निकलकर पूरे समाज की महिलाओं को हौसला देती हैं।

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

पत्रकारिता और मीडिया एजुकेशन


मनोज कुमार
आपातकाल के पश्चात पत्रकारिता की सूरत और सीरत दोनों  में आमूलचूल बदलाव आया है और इस बदलाव के साथ ही यह कि पत्रकारिता मिशन है अथवा प्रोफेशन का सवाल यक्ष प्रश्र की तरह एक सवाल उठ खड़ा हुआ है. इस सवाल का भले ही कोई मुकम्मल जवाब किसी भी पक्ष से न आया हो लेकिन आहिस्ता आहिस्ता पत्रकारिता को मिशन से बदल कर प्रोफेशन कर दिया गया है और देखते ही देखते मीडिया एजुकेशन का ऐसा संजाल फैलाया गया जो केवल डिग्रियां देने का काम कर रही हैं. इस मीडिया एजुकेशन में पत्रकारिता का लोप हो गया है और पत्रकारिता हाशिये पर जाकर खड़ी हो गई है और मीडिया का वर्चस्व हो गया है.  हर वर्ष ज्यादा नहीं तो हजारों की संख्या में पूरे भारत वर्ष से मीडिया एजुकेशन प्राप्त कर विद्यार्थी पत्रकारिता करने आते हैं लेकिन उनके पास व्यवहारिक ज्ञान शून्य होता है और फिर वे बेरोजगारी के शिकार होकर कुंठित हो जाते हैं. इस स्थिति में एक तरफ युवा पत्रकारों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है तो दूसरी तरफ अनस्किल्ड पत्रकार शॉर्टकट के जरिए अपना फ्यूचर बनाने की कोशिश करते हैं जो पत्रकारिता को दूषित करती है.
मीडिया एजुकेशन के स्थान पर पत्रकारिता शिक्षा को प्राथमिकता दी जाती तो आज जो डिग्री बांटने के संस्थान बन गए हैं, वह तो नहीं बनते. इन संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को पत्रकारिता का कोई व्यवहारिक ज्ञान नहीं है. बहुत ज्यादा तो नहीं, तीन दशकों से लगातार एक ही परिभाषा पढ़ा रहे हैं. खबरें कैसे निकाली जाती है, स्रोत कैसे बनाये जाते हैं, फीचर और लेख में क्या फर्क है, सम्पादकीय लेखन का क्या महत्व है, जैसी बातें ज्यादतर मीडिया शिक्षकों को ज्ञात नहीं है. इसमें उनका भी दोष नहीं है क्योंकि वे भी इसी संस्थान से शिक्षित हैं और उन्हें इस बात का भान था कि वे पत्रकार नहीं बन सकते, सो शिक्षण में स्वयं को ढाल लिया. सवाल यह है कि मीडिया एजुकेशन के संस्थानों ने इन शिक्षकों को व्यवहारिक प्रशिक्षण देने की दिशा में कोई प्रयास क्यों नहीं किया? क्यों इन संस्थानों को महज डिग्री बांटने वाली संस्थाओं के रूप में आकार-प्रकार देकर खड़ा कर दिया? किताबी मीडिया एजुकेशन से पत्रकारिता का नुकसान हो रहा है, इसमें दो राय नहीं है लेकिन खराब होती चीजों को भी सुधारा जा सकता है लेकिन इसके लिए संकल्प-शक्ति की जरूरत होगी. प्रकाशन-प्रसारण संस्थान और मीडिया एजुकेशन संस्थानों के मध्य एक करार किया जाए जो इस बात के लिए प्रतिबद्ध हों कि वर्ष में एक बार तीन माह का व्यवहारिक प्रशिक्षण मीडिया एजुकेशन से संबद्ध शिक्षकों को दिया जाए और जमीनीतौर पर काम कर रहे पत्रकारों को इसी तरह तीन महीने का मीडिया अध्यापन का प्रशिक्षण अनिवार्य हो. इनमें से भी योग्यता के आधार पर सक्रिय पत्रकारों की सेवाएं मीडिया शिक्षक के तौर पर ली जाएं ताकि पत्रकारिता में आने वाले विद्यार्थियों का भविष्य सुनिश्वित हो सके. 
मीडिया शिक्षा वर्तमान समय की अनिवार्य जरूरत है लेकिन हम पत्रकारिता की टेक्रालॉजी सिखाने के बजाय टेक्रालॉजी की पत्रकारिता सीखा रहे हैं. पंडित माखनलाल चतुर्वेदी कहते हैं कि-‘पत्र संचालन की कला यूर्निवसिटी की पत्थर की तस्वीरों के बूते जीवित नहीं रह सकती, उसके लिए ह्दय की लगन ही आवश्यक है। इस कला का जीवन की सह्दयता, धीरज, लगन, बैचेनी और स्वाभिमान का स्वभाव-सिद्ध होना। शिक्षा और श्रम द्वारा विद्वता और बहुुश्रुतता को जीता जा सकता है, ऊपर लिखे स्वभाव-सिद्ध गुणों को नहीं।’ माखलाल चतुर्वेदी जी की इस बात को मीडिया एजुकेशन की संस्थाएं तथा प्रकाशन-प्रसारण संस्थाएं समझ सकें तो पत्रकारिता शिक्षा को लेकर कोई संशय नहीं रह जाएगा और नहीं समझ सकें तो कथाकार अशोक गुजराती की लिखी लाइनें मीडिया का सच बनकर साथ चलती रहेंगी-
राजा ने कहा रात है/ मंत्री ने कहा रात है/ 
सबने कहा रात है/ ये सुबह-सुबह की बात है. 

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...