गुरुवार, 16 जून 2016

एक कलम स्वच्छता के लिए













स्वच्छ  भारत अभियान को लेकर जनमानस में अभी भी असमंजस है. बहुतेरे लोगो, खासकर मीडिया के स्टूडेंट को यही पता नहीं है कि मोदी जी ने स्वच्छ  भारत अभियान की मियाद कौन सी तय की है. स्वच्छ  भारत अभियान का अर्थ केवल खुले में शौच से ही लगाया जा रहा है. इनके साथ ही स्वच्छ  भारत अभियान से जुड़े विभिन्न आयाम पर शोध पत्रिका "समागम" का यह अंक केंद्रित किया गया है. यह अंक आप वेबसाइट www.sabrangweb.com पर भी देख सकते हैं. 

मंगलवार, 7 जून 2016

हबीब तनवीर का लोक संसार


-अनामिका 
नाचा छत्तीसगढ़ की पारम्परिक प्रतिष्ठापूर्ण लोकविधा है। नाचा का संसार न केवल विविधताओं से परिपूर्ण है बल्कि इसमें सामाजिक जागरूकता का भाव भी है। छत्तीसगढ़ की लोक विधा नाचा को इस सदी के महान रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचाना और नाचा को विश्व रंगमंच पर प्रतिष्ठित किया। नाचा के साथ ही छत्तीसगढ़ की लोककलाओं को विका रंगमंच पर प्रतिष्ठित करने वाले इस सदी के महान रंगकर्मी हबीब तनवीर रायपुर से हैं। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ की लोककलाओं को विका रंगमंच में प्रतिष्ठित करने के लिये स्थानीय कलाकारों को अपनी टीम का हिस्सा बनाया। वे दुनिया की नब्ज जानते थे। रंगकर्म से उनका पुराना रिश्ता था। हबीब तनवीर और उनका नया थियेटर एक दूसरे के पूरक बन गये थे। उनका हर प्रदर्शन कालजयी बना। हबीब तनवीर केवल नाट्य संस्था संस्थापक नहीं थे, वे एक ऐसे व्यक्ति थे जो अनेक कला विधाओं के विशेषज्ञ और सृजनकर्ता भी थे। हबीब तनवीर व्यक्ति न रहकर एक अनन्य संस्था बन गए थे। नाट्य आलेख लेखक, कवि, संगीतकार, अभिनेता, गायक, निर्देशक और संचालक, और क्या नहीं, सभी कुछ, हबीब तनवीर थे। इस तरह छत्तीसगढ़ और हबीब तनवीर का रंगकर्म एक दूसरे के पर्याय बन गये, पहचान बन गये।  
हबीब तनवीर शुरू से अपनी जमीन से जुड़े हुए थे और इस जमीन में ही उन्होंने अपने जीवन के लक्ष्य-रंगमंच-के लिए नई भारतीय पहचान की खोज शुरू की। उन्होंने बंबई में च्आवामी थियेटरज् से नाटक के क्षेत्र में पहले कदम रखे। फिर वे दिल्ली चले गए। दिल्ली में उन्होंने हिन्दुस्तानी थियेटर की स्थापना की। इंग्लैण्ड में उन्होंने रंगमंच का प्रशिक्षण भी लिया। इस तरह रंगमंच के पश्चिमी मानदंडों का अनुभव प्राप्त कर छत्तीसगढ़ लौैटे और यहां उन्होंने राजनांदगांव में नाचा का स्वस्फूर्ति और सहज परंपरागत रूप में प्रस्तुत किए जा रहे हैं। नाचा का प्रदर्शन देखा। इस प्रदर्शन को देखने के बाद उन्होंने अपनी जमीन और अपनी हवा को संजोए रखते हुए नए सिरे से अपने रंगकर्म को आगे बढ़ाया। उन्होंने लोकरंग शैली के ओज और आनंद के तत्वों को इस तरह प्रस्तुत किया जिससे बारतीय रंगमंच की नई पहचान बननी शुरू हो गई। उन्होंने एक बार फिर च्नया थियेटरज् नाम से रंग संस्था शुरू की जा उन्होंने व्यक्तित्व का पर्याय बन गई।
नाचा के इतिहासकर जानते हैं कि नाचा मूलत:  रायपुर दुर्ग औऱ राजनांदगांव जिलों में ग्रामीण कलाकारों द्वारा आत्मरंजन के लिए प्रस्तुत किया जाता था। इसमें ग्राम विशेष में प्रचलित नृत्य, संगीत, हास्य और व्यंग्य के माध्यम से छोटी-छोटी कहानियां या घटनाएं प्रस्तुत की जाती थीव। कहावतों, मुहावरों, रीति-रिवाजों, धार्मिक और अन्य गीत इसमें शामिल  रहते और उनका अभिनय भी किया जाता। ये सारी बातें क्षेत्र के बाहर क्षेत्र विशेष की घटनाओं की प्रस्तुति दर्शक के समझ के बाहर होती। इस प्रस्तुति में कोई निर्धारित पटकथा या अपने आप में पूर्ण एक कहानी नहीं होती थी। उसमें उपर्युक्त सभी तत्व अनगढ़ मिश्रण के रूप में होते जिससे उसका हर अंश या हर अंक स्वतंत्र रचना होती। उसमें सामान्य नाटकों की भांति न आदि होता, और न अंत। इसलिए नाटक की प्रस्तुति में कोई क्लाइमेक्स या चरमबिन्दु नहीं होता। 
1973 में हबीब तनवीर ने नाचा पर कार्यशाला आयोजित की। इस समय तक नाचा में फिल्मी नाच और गानों का प्रवेश हो गया था। जिससे नाचा की मूल कला प्रदूषित हो रही थी। तनवीर ने यह प्रयास किया कि नाचा के मूल रूप को पुन: आविष्कृत किया जाए और इसे इस तरह प्रस्तुत किया जाय कि असंबद्ध क्षेत्र के दर्शक भी समझ सकें कि यह क्या कला है और इसमें क्या हो रहा है। दर्शन कला की शक्तिमत्ता और सृजनात्मकता को ग्रहण कर सकें, उससे आनंद प्राप्त कर सकें और उस आनंद को अपने जीवन अनुभव से जोड़ सकें। हबीब तनवीर ने नाचा कलाकारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को बरकरार रखने के लिए अपने निर्देशन को न्यूनतम कर दिया। उन्होंने कलाकारों को सृजनात्मक कार्य का अभ्यास कराया और विषय वस्तु से लेकर शैली के विकास तथा रंगमंच पर प्रस्तुत करने की सामूहिकता को प्रोत्साहित किया। नाचा का अभ्यास करते-करते उपजी पटकथा की वजह से नाचा किसी ग्राम विशेष की सीमित प्रस्तुति से उठकर विका रंगमंच का अभिमान्य प्रदर्शन बन गया। यहां यह गौर करने की बात है कि पटकथा तो वह खाखा था जिसके भीतर नाचा के कलाकार अपनी उन्मुक्त और अलौकिक कलात्मकता को लौकिक धरातल पर प्रस्तुत करते थे। तनवीर ने ग्रामीण और शहरी संस्कारों, लौकिक और अलौकिक चेतना तथा पूर्वी और पश्चिमी दृष्टियों को इस तरह मिला-जुला दिय कि उनका प्रदर्शन आधुनिक संस्कृति का प्रतिनिधि रंगमंच बन गया।
हबीब तनवीर के रंगकर्म को अनेक कोणों को देखा जा सकता है लेकिन जिस एक विशेषता के कारण वे अनन्य हैं वह है कि उन्होंने भारतीय रंगकर्म को विका रंगमंच पर स्थापित किया। इस उपलब्धि के लिए उन्होंने पूर्व और पश्चिम के रंगकर्म का विवेकपूर्ण समन्वय किया था। इस समन्वय से न केवल भारतीय रंगकर्म की आधुनिकता सामने आई वरन् पूरे  में रंगकर्म का अधुनातन रूप उभर कर आया। इस प्रक्रिया में स्वयं हबीब तनवीर विश्व के अग्रणी रंगकर्मी के रूप में अभिस्वीकृत हुए। हबीबजी ने नाट्य के ज्ञान और अनुशासन को ध्यान में रखकर, भारतीय लोक रंग शैली के आनंद और ओज, सहजता और उन्मुक्तता  को एक साथ समेटकर और पश्चिम के विधान को लक्ष्य करते हुए रंगकर्म की एक अलग पहचान बनाई। और इस पहचान में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सोपान था, नाचा से उनका तादात्म्य। लोक रंग को छत्तीसगढ़ के सुदूर ग्राम्य अंचल से उठाकर विश्व  रंगमंच पर प्रतिष्ठित कर दिया। 

शनिवार, 28 मई 2016

सम्मान एवं सहारे का सवाल

30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष
मनोज कुमार
एक बार फिर हम हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाने की तैयारी में हैं. स्मरण कर लेते हैं कि कैसे संकट भरे दिनों में भारत में हिन्दी पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ था तो आज यह विश£ेषण भी कर लेते हैं कि कैसे हम सम्मान को दरकिनार रखकर सहारे की पत्रकारिता कर रहे हैं. 1826 से लेकर 2016 तक के समूचे परिदृश्य की मीमांसा करते हैं तो सारी बातें साफ हो जाती हैं कि कहां से चले थे और कहां पहुंच गए हैं हम. इस पूरी यात्रा में पत्रकारिता मीडिया और पत्रकार मीडियाकर्मी बन गए. इन दो शब्दों को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि हम सम्मान की नहीं, सहारे की पत्रकारिता कर रहे हैं. जब हम सहारे की पत्रकारिता करेंगे तो इस बात का ध्यान रखना होगा कि सहारा देने वाले के हितों पर चोट तो करें लेकिन उसका हित करने में थोड़ा लचीला बर्ताव करें. मीडिया का यह व्यवहार आप दिल्ली से देहात तक की पत्रकारिता में देख सकते हैं.
शुचिता की चर्चा भी गाहे-बगाहे होती रहती है वह भी पत्रकारिता में. मीडिया में शुचिता और ईमानदारी की चर्चा तो शायद ही कभी हुई हो. इसका अर्थ यह है कि पत्रकारिता का स्वरूप भले ही मीडिया हो गया हो लेकिन आज भी भरोसा पत्रकारिता पर है. फिर ऐसा क्या हुआ कि पत्रकारिता का लोप होता चला जा रहा है? इस पर विवेचन की जरूरत है क्योंकि एक समय वह भी था जब पत्रकारिता में आने वाले साथियों को डिग्री-डिप्लोमा की जरूरत नहीं होती थी. जमीनी अनुभव और समाज की चिंता उनकी लेखनी का आधार होती थी. आज टेक्रालॉजी के इस दौर में डिग्री-डिप्लोमा का होना जरूरी है. पत्रकारिता कभी जीवनयापन का साधन नहीं रही लेकिन आज भी पत्रकारिता में नौकरी नहीं, मीडिया में नौकरी मिलती है जहां हम मीडिया कर्मी कहलाते हैं. एक सांसद महोदय को इस बात से ऐतराज है कि मीडियाकर्मियों को जितनी तनख्वाह मिलती है, वह सांसदों से अधिक है और इस आधार पर वे सांसदों का वेतन बढ़ाने की मांग करते हैं. मुझे याद नहीं कि आज से दस-बीस साल पहले तक कभी इस तरह की तुलना होती हो. हां, ऐेसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जब पत्रकारों ने ऐसी खैरात को लात मार दी है. और ऐसे लोगों की संख्या कम हुई है लेकिन आज भी खत्म नहीं. 
पत्रकारिता देश एवं समाज हित के लिए स्वस्र्फूत चिंतन है. पत्रकार के पास पहनने, ओढऩे-बिछाने और जीने के लिए पत्रकारिता ही होती है. उसकी भाषा समृद्ध होती है और जब वह लिखता है तो नश्तर की तरह लोगों के दिल में उतर जाती है. हालांकि मीडिया के इस बढ़ते युग में आज पेडन्यूज का आरोप लगता है तो बवाल मच जाता है. जांच बिठायी जाती है और निष्कर्ष वही ढाक के तीन पांत होता है. लेकिन कभी किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि इम्पेक्ट फीचर के नाम पर चार और छह पन्ने के विज्ञापन दिए जाते हैं जिसे अखबार सहर्ष प्रकाशित करते हैं. यह जानते हुए भी कि इसमें जो तथ्य और आंकड़े दिए गए हैं, वे बेबुनियाद हैं तथा बहुत हद तक काल्पनिक लेकिन हम इसकी पड़ताल नहीं करते हैं क्योंकि इन्हीं के सहारे प्रकाशन संभव हो पा रहा है. आधुनिक मशीनें और आगे निकल जाने की होड़ में खर्चों की पूर्ति करने का यही सहारा है. यह भी मान लिया जाए तो क्या इसके आगे विज्ञापनों के रूप में छपे तथ्यों की पड़ताल कर खबर नहीं छापना चाहिए? इस पर एक वरिष्ठ से चर्चा हुई तो ऐसा करने को उन्होंने नैतिकता के खिलाफ बताया. उनका तर्क था कि जिस चीज का आप मूल्य ले चुके हैं, उसकी पड़ताल नैतिक मूल्यों के खिलाफ होगा. मैं हैरान था कि सहारे की मीडिया के दौर में नैतिक मूल्यों की चिंता. संभव है कि उनकी बात वाजिब हो लेकिन इस बदलते दौर में हमें पत्रकारिता की भाषा, शैली एवं उसकी प्रस्तुति पर चिंतन कर लेना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को हम कुछ दे सकें और नहीं तो हर वर्ष हम यही बताते रहेंगे कि 30 मई को भारत का पहला हिन्दी समाचार पत्र का प्रकाशन हुआ था. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)  

बुधवार, 4 मई 2016

बाल विवाह : चुनौती और सफलता


-अनामिका
भारतीय समाज संस्कारों का समाज है. जन्म से लेकर मृत्यु तक सिलसिले से विधान हैं. यह सारे विधान वैज्ञानिक संबद्धता एवं मनोविज्ञान पर आधारित है. जैसे-जैसे हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे कामयाबी के साथ चुनौतियां हमारे समक्ष बड़ी से बड़ी होती जा रही हैं. यह एक सच है तो एक सच यह भी है कि इन संस्कारों में कई ऐसी रीति-रिवाज और परम्परा में कुछ ऐसी भी हैं जो समाज के समग्र विकास को रोकती हैं. इनमें से एक है बाल विवाह. वह एक समय था जब बाल विवाह की अनिवार्यता रही होगी लेकिन आज के समय में बाल विवाह लड़कियों के लिए जंजीर की तरह है. समय के साथ कदमताल करती लड़कियां अंतरिक्ष में जा रही हैं. सत्ता और शासन सम्हाल रही हैं. खेल और सिनेमा के मैदान में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. ऐसे में उन्हें बाल विवाह के बंधन में बांध देना अनुचित ही नहीं, गैर-कानूनी भी है. 
बाल विवाह का सबसे बड़ा दोष अशिक्षा है. विकास के तमाम दावे-प्रतिदावे के बाद भी हर वर्ष बड़ी संख्या में बाल विवाह होने की सूचना मिलती है. यह दुर्भाग्यजनक है और यह दुर्भाग्य केवल ग्रामीण समाज के हिस्से में नहीं है बल्कि शहरी समाज भी इस दुर्भाग्य का शिकार है. अशिक्षा के साथ संकीर्ण सोच भी इस दिशा में अपना काम करती है. भारतीय ग्रामीण समाज अशिक्षा के साथ ही आर्थिक संकटों से घिरे रहने के कारण वह कम उम्र में बिटिया का ब्याह कर जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहता है लेकिन शहरी समाज के पास सभी किस्म के स्रोत होने के बावजूद स्वयं को इस अभिशाप से मुक्त रखने की इच्छाशक्ति शेष नहीं है. कुतर्क यह भी दिया जाता है कि ब्याह के पहले लड़कियां असुरक्षित रहती हैं और ब्याह हो जाने से असमाजिक तत्वों से वह सुरक्षित रहती है. अब यह बात कौन समझाए कि भारत में महिलाओं के साथ रेप के जो आंकड़े आते हैं, उनमें ब्याहता औरतों की संख्या बड़ी होती है.
बाल विवाह समाप्त करने की बड़ी चुनौतियों के बीच सरकारों द्वारा लगातार किए जा रहे प्रयासों को सफलता भी मिली है. सफलता के प्रतिशत पर ना जाएं तो संभावनाओं के द्वार जरूर खुलते दिख रहे हैं. केन्द्र से लेकर राज्यों में सरकारों द्वारा बेटियों की शिक्षा, सशक्तिकरण और उनके लिए सुनहरे भविष्य को सुनिश्चित करते अनेक योजनओं का संचालन किया जा रहा है. बिगड़ते लिंगानुपात समाज के लिए चिंता का विषय है क्योंकि बाल विवाह के पूर्व अनेक बच्चियों को जनम से पूर्व या जन्म के तत्काल बाद मार दिया जाता था. शासकीय योजनाओं का लाभ मिलने के बाद समाज की सोच में परिवर्तन दिखने लगा है. माता-पिता अब बच्चियों को लेकर निश्चिंत होने लगे हैं. अपनी बेटियों की पढ़ाई पर उन्हें आर्थिक प्रबंध नहीं करना पड़ता है और ना ही उनके शादी-ब्याह की चिंता करनी होती है. इस तरह अनेक शासकीय योजनाओं बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ की सोच ने जनमानस को बदला है.
यह सच है कि शासकीय योजनाओं से जनमानस की सोच बदली है तो यह भी एक सच है कि शासकीय योजनाएं जरूरतमंदों तक पहुंव ही नहीं रही हैं. शासकीय तंत्र की कार्यवाही इतनी जटिल है कि जानते हुए भी कई बार आम आदमी इन योजनाओं का लाभ लेने से पीछे हट जाता है. कोई एक रास्ता ऐसा निकालना होगा कि बेटियों का हक उन तक सहज रूप से पहुंच सके. बिचौलियों की प्रथा पर सरकारों को नियंत्रण पाने की जरूरत होगी. उम्मीद की जा सकती है कि यह चुनौती बड़ी नहीं है और समय आने पर इसका समाधान भी हो पाएगा. सरकारों का सामाजिक दायित्व है कि वह आगे बढक़र समाज को रूढि़मुक्त करें और इसकी पहल जारी है. उम्मीदें अभी कायम हैं.
बाल विवाह की सबसे बड़ी चुनौती है लोगों में जागरूकता का अभाव. कम उम्र में बच्चों की शादी के दुष्परिणाम से समाज को अवगत कराने की जरूरत है. यह काम समाज का है और समाज के प्रबुद्ध लोगों को आगे आकर जगाना होगा. बाल विवाह एक अभिशाप ही नहीं है बल्कि बच्चों के मानसिक एवं शारीरिक विकास के लिए बाधक है. उनका समग्र विकास नहीं हो पाता है. स्वयंसेवी संस्थाओं को चाहिए कि वे एक दिन अक्षय तृतीया पर बाल विवाह रोकने की औपचारिकता पूर्ण ना करें बल्कि पूरे वर्ष बल्कि सतत रूप से इसे अभियान बनाकर चलाते रहें. ऐसी कोई समस्या नहीं, ऐसी कोई चुनौती नहीं जो हमारे साहसिक प्रयासों और पहल के सामने टिक सकें.

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

जल परम्परा और बाजार


मनोज कुमार
एक समय था जब आप सफर पर हैं तो पांच-दस गज की दूरी पर लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा आपकी खातिरदारी के लिए तैयार मिलेगा. पानी के घड़े के पास जाते हुए मन को वैसी ही शीतलता मिलती थी, जैसे उस घड़े का पानी लेकिन इस पाऊच की दुनिया में मन पहले ही कसैला हो जाता है. आज समय बदल गया है. जेब में दो-दो रुपये के सिक्के रखिये और किसी दुकानदार से पानी का पाऊच मांगिये. पानी का यह पाऊच आपकी प्यास तो थोड़ी देर के लिए शांत कर सकता है लेकिन मन को शीतलता नहीं दे सकता है. आखिर ऐसा क्या हुआ और क्यों हुआ कि हमने अपने आपसे इस घड़े को परे कर दिया है? पानी का यह घड़ा न तो पर्यावरण को प्रदूषित करता था और न ही शरीर को किसी तरह का नुकसान पहुंचाता था. देखते ही मन को भीतर ही भीतर जो खुशी मिलती थी, वह कहीं गुम हो गई है, उसी तरह जिस तरह लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा लगभग गुम हो गया है. 
इस घड़े का गुम होते जाना, सिर्फ एक घड़े का गुम हो जाना नहीं है बल्कि एक संस्कार का और परम्परा का गुम हो जाना है. जो लोग इस बात को तो हवा दे रहे हैं कि अबकी विश्व युद्ध पानी को लेकर होगा, क्या वे लोग इस घड़े को बचाने में अपना कोई योगदान दे रहे हैं? ऐसे लोग एक माहौल क्रियेट करते हैं और लोगों के मन में डर पैदा करते हैं. यह डर अकारण नहीं है बल्कि बाजार का दबाव उन्हें इस सुनियोजित साजिश का हिस्सा बनाता है. सवाल यह है कि अनुपम मिश्र की तरह आप तालाब आज भी खरे हैं कि तर्ज पर पानी की चिंता क्यों नहीं करते हैं? क्यों जलस्रोतों को बचाने की मुहिम में हिस्सेदार नहीं बनते हैं? मॉल और बड़ी बिल्डिंगों के नीचे कराहते हमारे जलस्रोत अपने को बचा लेने की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन हम उन्हें अनसुनी कर आगे बढ़ लेते हैं.
अभी सूरज की तपिश बढ़ी नहीं है लेकिन हौले-हौले उसकी गर्मी का अहसास होने लगा है और इसी अहसास के साथ पानी का संकट बढऩे लगा है. पानी का यह संकट लोगों के चेहरे से ‘पानी’ उतार रहा है. एक मटका पानी के लिए पिछले सालों में कई जानों पर बन आयी थी. पानी के लिए पानी-पानी होते लोगों का यह नया व्यवहार अब नया नहीं रहा. साहबों की गाडिय़ों की धुलाई में अनगित लीटर पानी का खर्च और निचली बस्तियों में रहने वाले एक गरीब के बर्तन से गायब होता पानी आज का सच है. पानी का कम होते जाना एक बड़ा संकट है किन्तु संकट इससे भी बड़ा यह है कि हम आज तक पानी के जतन के लिए जाग नहीं पाये हैं. लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा भारतीय समाज की जरूरत ही नहीं बल्कि संस्कार है. यहीं से यह संस्कार पानी के जतन की शिक्षा देता है. जरूरी है कि छोटे-छोटे प्रयासों से पानी को जीवन दें, लाल कपड़े में लिपटे पानी के घड़े को दिखने दें. ऐसा नहीं किया तो पानी के फेर में अब किसी के चेहरे पर ‘पानी’ नहीं रह जाएगा. तब कैसे कहेंगे पानीदार समाज?
भारत गांवों का देश रहा है और अभी भी भारत ग्रामीण परिवेश में ही जीता है। ग्रामीण परिवेश का सीधा सा अर्थ है एक बंधी-बंधायी परम्परा की जीवन शैली। इस परम्परागत जीवनशैली को करीब से देखेंगे तो आप यह जान पायेंगे कि वे शहरी जीवनशैली से कहीं अधिक समृद्ध हैं। वे बाजार के मोहताज नहीं हैं बल्कि वे अपनी परम्परा को बाजार से एकदम परे रखे हुये हैं और यही कारण है कि अनेक किस्म की समस्याओं के बावजूद उनका जीवन तनावपूर्ण नहीं है। जहां तक जल संरक्षण की चर्चा करते हैं तो सर्वाधिक जल स्रोत ग्रामीण क्षेत्रों में ही मिलेंगे। पानी उनके लिये उपयोग की वस्तु नहीं है बल्कि पानी उनके लिये जल-देवता है और वे उसका जीवन जीने के लिये उपयोग करते हैं न कि उसका दुरूपयोग। ग्रामीण परिवेश में जीने वाले अधिसंख्य लोग अपनी किसी उपलब्धि पर आयोजन में खर्च नहीं करते हैं बल्कि पानी के नये स्रोत बनाने के लिये करते हैं। पुराने जल स्रोतों के नाम देख्ेंगे तो आपको किसी न किसी पुराने परिवार के सदस्यों के नाम का उल्लेख मिलेगा। सेठानी घाट कहां है, यह आप से पूछा जाये तो आप हैरानी में पडऩे के बजाय नर्मदाजी के नाम का उल्लेख करेंगे क्योंकि यह सेठानी घाट प्रतीक है उस जलसंरक्षण की परम्परा का जहां बिटिया का ब्याह हो, घर में नया सदस्य आया हो या किसी ऐसे अवसर को परम्परा के साथ जोडक़र जलस्रोतों का निर्माण किया जाता रहा है। गांवों से निकलकर जब हम कस्बों की तरफ बढ़ते हैं तो यहां भी जल संरक्षण परम्परा का निर्वाह करते हुये लोग दिख जाते हैं। जिन पुरातन जल स्रोतों में गाद भर गयी है अथवा उसके जीर्णोद्धार की जरूरत होती है तो लोग स्वयमेव होकर श्रमदान करते हैं। इन श्रमदानियों में कस्बे का आम आदमी तो होता ही है अपितु बुद्धिजीवी वर्ग जिसमें शिक्षक, पत्रकार, समाजसेवी आदि-इत्यादि सभी का सहयोग मिलता है। यह है भारतीय जल संरक्षण की पुरातन परम्परा।

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

‘सेल्यूलॉयड मैन’ पीके नायर को याद करते हुए

जन्मदिन 6 अप्रेल पर विशेष

-मनोज कुमार
50 साल पहले  लगभग-लगभग 32-35 साल का एक युवा बनाना तो फिल्में था लेकिन उसकी रूचि सिनेमा के इतिहास को संजोने की हुई. एक बड़े सपने को लेकर छोटी सी कोशिश करने वाले परमेश कृष्णनन नायर ने अपने हौसले से एक ऐसे संग्रहालय गढ़ दिया जिसे आज हम नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया के नाम से जानते हैं. आज 6 अप्रेल है और नायर साहब आज हमारे साथ होते तो 82 साल पार कर चुके होते लेकिन पिछले मार्च महीने उनकी सांसों का हिसाब-किताब ईश्वर के खाते में हो गया. यह सच है कि नायर साहब आज हमारे साथ नहीं हैं लेकिन उन्होंने जो काम किया, वह कभी खत्म नहीं होगा. नायर साहब के जन्मदिन के बहाने उन्हें याद करना, उनके द्वारा किये गए कार्य को सलाम करना बनता है. आखिर बार-बार और हर बार ऐसे परमेश कृष्णनन नायर थोड़े ही हमारे बीच आते हैं. नायर साहब का जीवन एनएफएआई में फिल्मों के संरक्षण और संग्रहण के लिए समर्पित रहा। उन्होंने कई ऐतिहासिक भारतीय फिल्मों के संग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    
भारत में सिनेमा के जनक के रूप में दादा साहेब फाल्के की प्रतिष्ठा है. दादा साहेब ने व्यक्तिगत प्रयासों से भारत में सिनेमा की नींव रखी. उनके इस कार्य को लोग आगे बढ़ाते गए और कौडिय़ों से शुरू हुआ भारतीय सिनेमा आज करोड़ों का हो चुका है. भारतीय सिनेमा के बीते सौ साल के इतिहास में अनेक नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं, उनमें एक नाम पी.के. नायर का होगा. नायर उन लोगों में से एक थे जो आज की नहीं कल की सोचते थे और इसी सोच के साथ 1964 में स्वयं के प्रयासों से फिल्म संग्रहालय की बुनियाद रखी जिसे आज हम  नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया के नाम से जानते हैं. नायर एक कुशल निर्देशक भी थे और वे चाहते तो कई पॉपुलर फिल्म निर्माण कर लोकप्रियता हासिल कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. फिल्मों का निर्माण तो उनका शौक था, जिसे वे पूरा करते रहे लेकिन उनकी चिंता सिनेमा की उन भावी पीढिय़ों की थी जो जान सकें कि भारतीय सिनेमा का इतिहास क्या था और आज हम कैसे वहां तक पहुंचे. नायर का यह काम आज एक गाईड, एक मार्गदर्शक के रूप में काम कर रहा है.
भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले ही सिनेमा बनाने की शुरूआत हो चुकी थी. 1912 में भारत की पहली फिल्म ची राजा हरिशचन्द्र का निर्माण दादा साहेब फाल्के ने किया था. तकरीबन दस साल बाद  भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ का निर्माण कर लोगों को चौंका दिया था. समय गुजरने के साथ फिल्म निर्माण की तकनीक में इजाफा होता रहा. आज हम थ्री-डी और फोर-डी तकनीक की सिनेमा का निर्माण कर रहे हैं. यह वही समय था जब भारत में सिनेमा निर्माण कला से उद्योग में बदल रहा था. और यह वही समय था जब सरकार के पास सिनेमा के संरक्षण के लिए कोई बजट और रूचि नहीं थी. सरकार का तब तर्क था कि सिनेमा के अलावा भी देश के विकास में और भी काम हैं. सरकार का रवैया बस कुछ कुछ वैसा ही था कि जब किसी के घर वाले सुनें कि उनकी बच्चा सिनेमा में काम करने जा रहा है तो उपेक्षा के अलावा कुछ हाथ नहीं आता था. ऐसा सबकुछ नायर साहब के साथ भी हुआ। ऐेसे में 50 साल पहले एक युवा परमेश कृष्णनन नायर को एक ऐसे संग्रहालय बनाने की सूझी जहां भारतीय सिनेमा के आरंभ से इतिहास संजोया जाए. काम मुश्किल था लेकिन संकल्प के आगे कुछ भी मुश्किल नहीं होता है सो नायर के संकल्प के आगे सारी चुनौतियां बौनी हो गईं. नायर के प्रयासों के बाद सरकार भी जागी और सिनेमा के संरक्षण संवर्धन की दिशा में आगे आयी.    
तिरुवनंतपुरम में 1933 को जन्मे नायर की 1940 के दशक में पौराणिक धारावाहिकों के साथ उनके करियर की शुरुआत हुई। नायर ने अनंतसयनम और भक्त प्रहलाद जैसे तमिल धारावाहिकों में काम किया। एनएफएल के साथ नायर का कार्यकाल 1965 से सहायक क्यूरेटर के रूप में शुरू हुआ. नायर 1961 में शोध सहायक के रूप में भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान में नियुक्त हुए थे। उन्होंने यहां 1991 तक काम किया। 17 साल बाद 1982 में वह निर्देशक बने। उन्होंने सत्यजित रे, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, वी. शांताराम, राजकपूर और गुरुदत्त जैसे फिल्म निर्देशकों के साथ काम किया। 
एनएफएआई के निदेशक पद से सेवानिवृत्ति तक उन्होंने 12,000 फिल्मों का संग्रहण किया, जिसमें से 8,000 फिल्में भारतीय एवं बाकी विदेशी हैं।  परमेश कृष्णन नायर का जीवन एनएफएआई में फिल्मों के संरक्षण और संग्रहण के लिए समर्पित रहा। उन्होंने कई ऐतिहासिक भारतीय फिल्मों के संग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने दादासाहेब फाल्के की ‘राजा हरिश्चन्द्र’ और ‘कालिया मर्दन’, बॉम्बे टॉकीज की ‘जीवन नैया’, ‘बंधन’, ‘कंगन’, ‘अछूत कन्या’, ‘किस्मत’ और एस एस वासन की ‘चन्द्रलेखा’ व उदय शंकर की ‘कल्पना’ जैसी फिल्मों का संरक्षण एवं संग्रहण किया।
नायर साहब को जानने वाले बताते हैं कि रेल्वे स्टेशन की वजन तौलने वाली मशीन से निकलने वाली टिकट के पीछे फिल्मी सितारों की फोटो के लिए वे बार बार वजन कराते थे. यह जुनूनी बच्चा सिनेमा देखते बड़ा हुआ और अपनी आखिरी सांस तक सिनेमा को जीता रहा. विज्ञान में स्नातक रहे नायर साहब अपना लक्ष्य जानते थे और वे चकाचौंध में गुम हो जाने के बाद अपना लक्ष्य पाने निकल पड़े थे. सिनेमा के अपने आरंभिक दिनों में जिन हस्तियों का साथ और सहयोग मिला, नायर साहब उसमें रम सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्हें यह बात बार बार चुभती थी कि हम उन क्लासिक फिल्मों का दस्तावेजीकरण क्यों नहीं कर रहे हैं? आने वाली पीढ़ी को हम सिनेमा के नाम पर क्या देंगे? आदि-इत्यादि सवाल उनके मन में उठते रहे और इन्हीं सवालों से जज्बाती हुए नायर साहब ने वह अनुपम काम कर दिखाया जो उन्हें हमारे बीच हमेशा-हमेशा के लिए जिंदा रखेगी. 
नायर साहब पूरी जिंदगी खामोशी से अपना काम करते रहे और दबे पांव हम सबको छोड़ कर चले गए . भारतीय सिनेमा के संसार में मील के पत्थर के रूप में अपने पीछे अपनी पहचान छोड़ जाने वाले पी.के. नायर पर शिवेन्द्र सिंह डूंगरपुर ने नायर साहब के जीवन और काम को डाक्युमेंट्री फिल्म ‘सेल्यूलाइड मैन’ के जरिए सुरक्षित कर लिया है. दुर्र्भाग्यपूर्ण बात यह रही कि सिनेमा के इस मौन साधक के चले जाने को हमने मौन रहकर ही मान लिया. बात बात पर हंगामा करने वाला मीडिया भी भारतीय सिनेमा के इस महान शिल्पकार को भूल गया था. कहा जाता है कि सुंदर भविष्य निर्माण के लिए अपने अतीत को स्मरण में रखना होता है और यही बात नायर साहब के संदर्भ में स्मरण रखी जानी चाहिए. अस्तु, नायर साहब को उनके जन्मदिवस के अवसर पर स्मरण करते हुए उन्हें सलाम करते हैं और सेल्यूलॉयड मैन, सिनेमाई एनसाइक्लोपीडिया जैसे उपनामों से मशहूर नायर साहब हमारे बीच हमेशा वैसे ही बने रहेंगे जैसा कि सिनेमा का हर रील हमें हर बार ताजा कर देता है. 

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है


मनोज कुमार

इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो और खुद को बचा ले जाओ। इक्का-दुक्का अखबार और पत्रिकाओं को छोड़ दें तो लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में ‘‘टेग लाइन‘‘ होती है- ‘‘यह लेखक के निजी विचार हैं। सम्पादक की सहमति अनिवार्य नहीं।‘‘इस टेग लाइन से यह बात तो साफ हो जाती है कि जो कुछ भी छप रहा हैवह सम्पादक की सहमति के बिना है। लेकिन छप रहा है तो सहमति किसकी है लेखक अपने लिखे की जवाबदारी से बच नहीं सकता लेकिन प्रकाषन की जवाबदारी किसकी हैसम्पादक ने तो किनारा कर लिया और लेखक पर जवाबदारी डाल दी। ऐसे में यह प्रश्न उलझन भरा है और घूम-फिर कर बात का लब्बोलुआब इस बात पर है कि प्रकाशनों को अब सम्पादक की जरूरत ही नहीं है और जो परिस्थितियां हैं, वह इस बात की हामी भी है। इस ‘‘टेग लाइन‘‘ वाली पत्रकारिता से हम टेलीविजन की पत्रकारिता को सौफीसदी बरी करते हैं क्योंकि यहां सम्पादक नाम की कोई संस्था होती है या जरूरत होगी, इस पर चर्चा अलग से की जा सकेगी। यहां पर हम पत्रकारिता अर्थात मुद्रित माध्यमों के बारे में बात कर रहे हैं। अस्तु। 

भारतीय पत्रकारिता की आज की स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। जवबादारी से बचती पत्रकारिता भला किस तरह से अपनी सामाजिक जवाबदारी का निर्वहन कर पाएगी, सवाल यह भी है कि क्या समय अब गैर-जवाबदार पत्रकारिता का आ गया है। यह सवाल गैर-वाजिब नहीं है क्योंकि भारतीय पत्रकारिता ने पत्रकारिता का वह स्वर्णयुग भी देखा है जहां सम्पादक न केवल जवाबदार होता था बल्कि सम्पादक की सहमति के बिना एक पंक्ति का प्रकाशन असंभव सा था। भारतीय पत्रकारिता का इतिहास बताता है कि व्यवस्था के खिलाफ लिखने के कारण एक नहीं कई पत्रकारों को जेल तक जाना पड़ा लेकिन उन्होंने कभी भी जवाबदारी से खुद को मुक्त नहीं किया। उल्टे सम्पादक उपत कर सामने आता और कहता कि हां, इस लेख की मेरी जवाबदारी है और आज के सम्पादक का जवाब ही उल्टा है। मैं कुछ नहीं जानता, मेरा कोई वास्ता नहीं है।

आज की पत्रकारिता में सम्पादक की गौण होती या खत्म हो चुकी भूमिका पर चर्चा करते हैं तो भारतीय पत्रकारिता के उस गौरवशाली कालखंड की सहज ही स्मरण हो आता है जब सम्पादक के इर्द-गिर्द पत्रकारिता की आभा होती थी। हालांकि सम्पादक संस्था के लोप हो जाने को लेकर अर्से से चिंता की जा रही है। यह चिंता वाजिब है। एक समय होता था जब कोई अखबार या पत्रिका, अपने नाम से कम और सम्पादक के नाम पर जानी जाती थी। बेहतर होने पर सम्पादक की प्रतिभा पर चर्चा होती थी और गलतियां होने पर प्रताड़ना का अधिकारी भी सम्पादक ही होता था। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक नहीं अनेक सम्पादक हुए हैं जिन्होंने भारतीय पत्रकारिता को उजाला दिया। समय गुजरता रहा और आहिस्ता आहिस्ता सम्पादक संस्था का लोप होने लगा। प्रकाशन संस्थाओं ने मान लिया कि सम्पादक की जरूरत नहीं है। प्रकाशन संस्था का स्वामी स्वयं सम्पादक हो सकता है और अपने अधीनस्थों से कार्य करा सकता है। उन्हें यह भी लगने लगा था कि सम्पादक करता-वरता तो कुछ है नहीं, बस उसे ढोना होता है। ये लोग उस समय ज्यादा कष्ट महसूस करते थे जब सम्पादक उनके हस्तक्षेप को दरकिनार कर दिया करते थे। एक तरह से यह अहम का मामला था। 
स्वामी या सम्पादक के इस टकराव का परिणाम यह निकला कि सम्पादक किनारे कर दिए गये।

प्रकाषन संस्था के स्वामी के भीतर पहले सम्पादक को लेकर सम्मान का भाव होता था, वह आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने लगा। कई घटनाएं हैं जो इस बात का प्रमाण है जो यह बात साबित करती हैं कि सम्पादक के समक्ष स्वामी बौना हुआ करता था। स्वामी इस बात को जानता था कि सम्पादक ज्ञानी है और प्रकाशन एक सामाजिक जवाबदारी। इस नाते वह स्वयं के अहम पर न केवल नियंत्रण रखता था बल्कि अपने प्रकाशन के माध्यम से लोकप्रिय हो जाने का कोई लालच उसने नहीं पाला था। कहने के लिए तो लोग सन् 75 के आपातकाल के उन काले दिनों का स्मरण जरूर कर लेते हैं जब पत्रकारिता अपने कड़क मिजाज को भूल गई थी। सवाल यह है कि 40 साल गुजर जाने के बाद भी हम पत्रकारिता के आपातकालीन दिनों का स्मरण करेंगे या और गिरावट की तरफ जाएंगे. जहां तक मेरा अनुभव है और मेरी स्मरणशक्ति काम कर रही है तो मुझे लगता है कि सम्पादक संस्था को विलोपित करने का काम आपातकाल ने नहीं बल्कि प्रकाषन संस्था के स्वामी के निजी लालच ने किया है। उन्हें लगने लगा कि कागज को कोटा-सोटा तो खत्म हो गया है। सो आर्थिक लाभ तो घटा ही है बल्कि उसके भीतर स्टेटस का सपना पलने लगा। वह अपने सम्पादक से ज्यादा पूछ-परख चाहता है और चाहता है कि शासन-प्रशासन में उसका दखल बना रहे।

स्वामी के इस लालच के चलते सम्पादक संस्था को किनारे कर दिया गया और सम्पादक के स्थान पर प्रबंध सम्पादक ने पूरे प्रकाशन पर कब्जा कर लिया। एक प्रकाशन संस्था से शुरू हुई लालच की यह बीमारी धीरे-धीरे पूरी पत्रकारिता को अपने कब्जे में कर लिया। पत्र स्वामियों के इस लालच के कारण उन्होंने कम होशियार और उनकी हां में हां मिलाने वाले सम्पादक रखे जाने लगे। गंभीर और जवाबदार सम्पादकों ने इस परम्परा का विरोध किया लेकिन संख्याबल उन सम्पादकों की होती गई जो हां में हां मिलाने वालों में आगे रहे। सम्पादक संस्था की गुपचुप मौत के बाद पत्रकारिता का तेवर ही बदल गया। प्रबंध सम्पादक की कुर्सी पर बैठने वाले सम्पादक के सामने लक्ष्य पत्रकारिता नहीं बल्कि अर्थोपार्जन होता है सो वह पत्र स्वामी को बताता है कि फलां स्टोरी के प्रकाशन से कितना लाभ हो सकता है। स्वामी का एक ही लक्ष्य होता है अधिकाधिक लाभ कमाना। सम्पादक संस्था के खत्म होने और प्रबंध सम्पादक के इस नए चलन ने पेडन्यूज जैसी बीमारी को महामारी का रूप दे दिया।

कुछ भी कहिएयह ‘‘टेग लाइन' वाली पत्रकारिता है मजेदार। जिस अखबार में लेख छापा जा रहा हैउसका सम्पादक-स्वामी कहता है कि यह विचार लेखक के निजी हैं। इसका सीधा अर्थ होता है कि बड़ी ही गैर-जवाबादारी के साथ पत्र-पत्रिकाओं ने लेख को प्रकाशित कर दिया है। न तो प्रकाशन के पूर्व और न ही प्रकाशन के बाद लेख को पढ़ा गया। जब सम्पादक इस तरह की भूमिका में है तो सचमुच में उसकी कोई जरूरत नहीं है। जब एक सम्पादक किसी लेख अथवा प्रकाशन सामग्री को बिना पढ़े प्रकाषन की अनुमति दे सकता है और साथ में इसकी जवाबदारी लेखक के मत्थे चढ़ा देता है तो क्यों चाहिए हमें कोई सम्पादक, जब लेखक को अपने लिखे की जवाबदारी स्वयं ही कबूल करनी है तो सम्पादक क्या करेगा, इन सम्पादकों को कानून का ज्ञान नहीं होगा, यह बात उचित नहीं है लेकिन प्रबंध सम्पादक की हैसियत से वह इससे बचने का उपाय ढूंढ़ते हैं और इसी का तरीका ये ‘‘टेग लाइन वाली पत्रकारिता है। गैर-जवाबदारी के इस दौर में भारतीय पत्रकारिता जिम्मेदार सम्पादक की प्रतीक्षा में खड़ी है जो कहेगी कि छपे हुए एक आलेख नहीं अपितु एक-एक शब्द में सम्पादक की सहमति है और वह इसके प्रकाशन के लिए जवाबदार है। 

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