रविवार, 6 फ़रवरी 2022

6 फरवरी, लता और प्रदीप यादों का सिलसिला

मनोज कुमार

संगीत के दुनिया के कवि प्रदीप और लताजी दो ऐसे सितारे हैं जो कभी अस्त नहीं होते हैं। 6 फरवरी भारतीय संगीत की दुनिया में बेमिसाल तारीख के रूप में याद किया जाएगा। यह तारीख 2022 के पहले अमर गीतकार प्रदीप के नाम पर था जो आज के दिन ही जन्मे थे तो यह तारीख हर साल मन को पीड़ा देती रहेगी कि इस दिन लताजी हमसे जुदा हुई थी। ‘ऐ मेरे वतन के लोगों.. जरा आंख में भर लो पानी...’ प्रदीप की अमर रचना थी तो लताजी की आवाज ने उसे चिरस्थायी बना दिया था। आज हमारे बीच ना प्रदीप रहे और ना लता जी लेकिन हर पल वे हमारे बीच बने रहेंगे। खैर, अब उन बातों का स्मरण करते हैं जिन्होंंने ‘लतिका’ से लता बनी।

लता मंगेशकर के बारे में इतना कुछ लिखा गया, बोला गया और सुना गया कि अब कुछ शेष नहीं रह जाता है। संगीत की दुनिया से इतर लताजी अपने पीछे जो अपनों के लिए अपनापन छोड़ गईं हैं, उन पर लिखना शेष है। लता जी का बचपन किन संकटों से गुजरा और कैसे उन्होंने यह मुकाम पाया, इसकी कहानी भी अनवरत लिखी गई है लेकिन लोगों को यह बात शायद याद में ना हो कि लता ने जिस शिद्दत के साथ अपनी हर सांस संगीत को समर्पित कर दिया था, उसी शिद्दत के साथ अपने जीवन का हर पल अपने परिवार को समर्पित कर दिया था। लताजी के स्वर को लेकर हम अभिमान से भर जाते हैं तो एक सबक वे हमें यह भी सिखाती हैं कि परिवार के लिए क्या कुछ करना पड़ता है। गायक संगीतकार पिता दीनानाथ मंगेश्कर के निधन के बाद घर की बड़ी होने के नाते उन पर पूरे परिवार की जवाबदारी थी। छोटी उम्र में उन्होंने इस जिम्मेदारी को अपने सिर पर लेकर पूरा करने में जीवन खपा दिया।

लता देश की आवाज थीं, यह सबको मालूम है लेकिन उनका सफर कितना कठिन था, यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा। कामयाब शख्स के गीत सभी गाते हैं लेकिन उनके संघर्षों की कहानी उनकी अपनी होती है। एक नामालूम सी गायिका के रास्ते में अनेक रोड़े आए। उनके आत्मविश्वास को डिगाने और हिलाने के लिए भी कोशिशें होती रही लेकिन लता चट्टान सी खड़ी रहीं। आरंभिक दिनों में नकराने और खारिज करने का दंश भी लता को झेलना पड़ा था लेकिन धुन की पक्की लता धुनी बनकर संगीत की दुनिया में अमर आवाज बन गईं और वे हमेशा देश की आवाज बनी रहेंगी।

साल 1929 के सितम्बर माह की 28 तारीख को गायक-संगीतकार के घर पैदा हुई बड़ी बेटी हेमा। हेमा से लता बन जाने की कहानी भी रोचक है। मराठी ड्रामा कंपनी के संचालक दीनानाथ मराठी नाटक ‘भाव बंधन’ में लतिका नामक किरदार से प्रभावित होकर हेमा का नाम बदलकर लता कर दिया। इसी लता को शायद अपने पिता से भय था और कहीं आत्मविश्वास की कमी के चलते वह पांच वर्ष तक अपने पिता के सामने गाने छिपती रही लेकिन एक दिन पिता के कानों में लता का मधुर स्वर मिसरी की तरह घुल गया। उन्होंने तय कर लिया कि कल से मैं लता को गायन सिखाऊंगा। कहते हैं कि लता सिर्फ दो दिनों के लिए स्कूल गईं लेकिन संगीत की सम्पूर्ण शिक्षा घर पर ही हुई। लता ने अपना पहला गाना 16 दिसम्बर, 1941 को रेडियो प्रोग्राम के लिए रिकार्ड किया। करीब 4 महीने बाद पिता का देहांत 24 अप्रेल, 1942 को हो गया। इसके साथ ही लता एकाएक बड़ी हो गईं। परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। साथ में तीन बहनें और एक भाई के साथ मां की जवाबदारी। हालांकि इस बीच उनके लिए रिश्ते आने लगे थे लेकिन कम उम्र में सयानी हो चुकी लता ने रिश्ते से इंकार कर दिया क्योंकि ऐसा नहीं करती तो परिवार की देखभाल कौन करता। फिर तो जिंदगी का पूरा सफर उन्होंने अकेले तय किया। घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए फिल्म में अभिनय करने लगी लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हो गया कि वे अभिनय के लिए नहीं बनी हैं। 

25 रुपये का मानदेय लताजी के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी थी जो उन्हेंं स्टेज पर गाने के एवज में पहली बार मिला था। मराठी फिल्म ‘पहली मंगलागौर’ में 13 वर्ष की उम्र में पहली दफा गाना गाया। जूझते हुए अपना मुकाम बनाते हुए लता के जीवन के 18वें वर्ष में एक नया मोड़ आता है जब गुलाम हैदर साहब उनकी आवाज से प्रभावित होकर शशधर मुखर्जी से मिलवाते हैं लेकिन मुखर्जी ने लता की आवाज को पतली कहकर खारिज कर दिया। यह और बात है कि हैदर साहब ने ‘मास्टरजी’ में लता को पहला ब्रेक दिया। यह भी सुख लता के हिस्से में आया जब शशधर मुखर्जी ने अपनी गलती मानकर अनारकली और जिद्दी जैसे फिल्मों में अवसर दिया। मास्टर गुलाम हैदर एक तरह से फिल्म इंडस्ट्री में लता के गॉडफादर बने। हैदर साहब ने सिखाया हिन्दी-उर्दू सीखो और हमेशा फील कर गाओ तो अनिल बिस्वास ने सांस कब लेना और कैसे छोडऩा है। 

यह बात आम है कि लता, दिलीप कुमार को अपना भाई मानती थी लेकिन इसके पहले का एक किस्सा। लोकल टे्रन में सफर करते हुए दिलाप कुमार ने लता से पूछा था कि मराठी हो क्या? इस बात से उन्हें ठेस पहुंची और वे एक मौलाना से बकायदा उर्दू की तालीम हासिल की। अपने उसूलों की पक्की लता द्विअर्थी गाना गाने से परहेज किया। अनेक मौके ऐसे आये जब गीतकार को गीत के बोल बदलने पड़े तो कई बार उन्होंने गाने से मना कर दिया। राजकपूर जैसे को फिल्म संगम का गाना ‘मैं का करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया’ गाने के लिए घंटों मिन्नत करनी पड़ी। हालांकि राजकपूर के आग्रह पर गाया तो सही लेकिन कहा कि इसे मैंने मन से नहीं गाया। 

लता की शोहरत उनके जान की दुश्मन बन गई थी। 33 वर्ष की उम्र में उन्हें धीमा जहर दिया गया लेकिन आत्मविश्वासी लता अपनों के सहारे उठ खड़ी हुईं। हालांकि यह झूठ फैलाया गया कि वे अभी कभी गाना नहीं गा पाएंगी लेकिन डॉक्टरों ने ऐसा कभी नहीं कहा था। लताजी ने खुद इस बात का खुलासा करते हुए कहा था कि यह कृत्य करने वाला कौन था, पता चल गया था लेकिन सबूत के अभाव में कोई कार्यवाही नहीं कर पाए। यह वह दौर था जब मजरूह सुल्तानपुरी लता का दिल बहलाने के लिए शाम को उनके पास जाकर कविता सुनाया करते थे। इस जानलेवा आफत से मुक्त होने के बाद लताजी ने पहला गाना रिकार्ड किया-‘कहीं दीप जले और कहीं दिल...’ 

हेमा से लता बन जाने वाली लता हमेशा से भारतीय सभ्यता और संस्कृति की संवाहक बनी रही। उन्होंने अपने जीवनकाल में हजारों गीत गाये लेकिन एकमात्र विज्ञापन किया। उनकी प्रतिष्ठा संगीत की देवी के रूप में रही। यह संयोग देखिये कि ज्ञान की देवी मां सरस्वती की आराधना कर इस फानी दुनिया को उन्होंने अलविदा कहा। लता गीत गाती थीं, उनका गीत पूरा जमाना गाएगा। कवि प्रदीप के गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को सुनकर पंडित जवाहरलाल नेहरू उठकर खड़े हो गए थे और उन्होंने लता से कहा था-तुमने मुझे रूला दिया। आज यही गीत राष्ट्र की धरोहर बन चुका है।

लता मंगेशकर भारत रत्न हैं और यह सम्मान देकर भारत स्वयं को गौरवांवित महसूस होता है। भौतिक रूप से हम भरे मन से लताजी को अलविदा कह रहे हैं लेकिन जब तक सूरज चांद रहेगा, लता तेरा नाम रहेगा जैसे शब्द भी छोटे लगते हैं लेकिन कयामत तक लता को भुल पाना नामुमकिन होगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)

  

  


शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

गांधी : सदा के लिए, सबके लिए

  मनोज कुमार    

        राष्ट्रपिता अथवा महात्मा को लेकर मत-भिन्नता हो सकती है लेकिन गांधी को लेकर सबके विचार समान ही होना चाहिए, यह माना जा सकता है. लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि राष्ट्रपिता अथवा महात्मा को लेकर सवाल उठाना गलत है. यह सवाल सहज ही उठता है कि एक तरफ गांधी को लेकर सहमति की चर्चा है तो दूसरी तरफ राष्ट्रपिता या महात्मा लेकर मत भिन्नता पर स्वीकृति? आखिर गांधी ही तो राष्ट्रपिता अथवा महात्मा हैं. यहीं पर विचार के मार्ग पृथक हो जाते हैं. राष्ट्रपिता अथवा महात्मा व्यक्ति के रूप में हैं किन्तु गांधी व्यक्ति नहीं विचार के रूप में हमारे बीच मौजूद हैं. गांधी विचार को भारत भूमि पर ही नहीं, समूचे संसार में स्वीकार किया गया है. वर्तमान समय में गांधी विचार पहले से ज्यादा सामयिक और व्यवहारिक हो गया है. लेकिन इसके साथ ही गांधी को लेकर मत-भिन्नता का ग्राफ भी बढ़ा है और यह अस्वाभाविक भी नहीं है. गांधी विचार और राष्ट्रपिता या महात्मा में सूत भर का फकत अंतर है. जो समझना चाहते हैं,  वे जानते हैं या जान जाएंगे कि हम किसके साथ हैं या किसके खिलाफ हैं. राष्ट्रपिता या महात्मा को लेकर मत-भिन्नता इस सवाल के साथ स्वाभाविक है कि उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा किस विधान के तहत दिया गया या कि वे महात्मा किस मायने में हो गए? मोहनदास करमचंद गांधी तो एक बैरिस्टर थे, फिर उनकी इतनी अहमियत क्यों? ऐसे अनेक सवाल हमारे आसपास हैं जिन्हें जवाब की प्रतीक्षा है. क्योंकि जिस आधार पर गांधी को राष्ट्रपिता कहा गया, उन्हें महात्मा कहा गया , उसकी वैधानिक स्वीकृति भले ही ना हो लेकिन लोक समाज की स्वीकृति साथ जरूर है. और इसी लोक स्वीकृति के साथ गांधी विचार कभी राष्ट्रपिता तो कभी महात्मा का संबोधन प्राप्त करते हैं. और शायद यही कारण है कि उनकी साद्र्धशती को हम पूरे उत्साह के साथ उत्सव की तरह मनाते हैं. 

लोक समाज की स्वीकृति के साथ ही किसी भी समाज का ताना-बाना बुना जाता है और खासतौर पर भारतीय समाज का ताना-बाना तो लोक समाज की स्वीकृति पर ही रचित है. हमारे समक्ष ऐसे कई पात्र हैं जिनका अस्तित्व नहीं है, वे निराकार हैं लेकिन लोक समाज की उन्हें स्वीकृति प्राप्त है और बिना किसी तर्क हम उन्हें सदियों से मान रहे हैं. संसार का कोई भी लोक समाज हिंसा, पाप, असत्य जैसे विषयों पर अपनी सहमति नहीं देता है. गांधी इन्हीं विषयों पर समाज का ध्यान आकृष्ट करते हैं. सबसे बड़ी बात होती है कि स्वयं की गलती सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना. गांधी ऐसा करते हैं और शायद इसलिए उनकी स्वीकारोक्ति गांधी विचार के रूप में लोक समाज अधिग्रहित करता है. स्वाधीनता के करीब सात दशक बाद हमारे प्रधानमंत्री स्वच्छ भारत अभियान आरंभ करते हैं तो वह रास्ता भी गांधी विचार से उपजा हुआ होता है. ऐसे कई प्रसंग हंै जब स्वयं गांधी ने पाखाना साफ कर स्वच्छता का संदेश दिया था. जब हमारे प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर भारत की चर्चा करते हैं तो यह रास्ता भी गांधी विचार से उपजा होता है. आत्मनिर्भर का रास्ता लघु उद्योग और ग्राम समाज से बनता है. ऐसे कई प्रसंग हैं जो बार-बार और हर बार हमें गांधी विचार की ओर लेकर जाते हैं. इन सब प्रसंग की चर्चा करते हैं तो सहज ही मन में भाव आता है कि गांधी सदा के लिए और सबके लिए हैं. वे लोक समाज के प्रतिनिधि रहे हैं और बने रहेंगे.

कुछ और ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विमर्श करना सामयिक प्रतीत होता है. किसी भी महापुरुष ने नहीं कहा कि उनके नाम के स्मारक बनाओ, सडक़, चौराहे बनाओ या ऐसे कोई प्रकल्प तैयार करो जिसमेंं उनकी छवि उकेरी जाती हो लेकिन हमने ऐसा किया क्योंकि लोक समाज का मानना है कि इससे एक संदेश जाता है कि ये कौन थे. इसे भी आप उचित मान लें तो आपने गांधी मार्ग का निर्माण किया लेकिन उसे सडक़ में बदल दिया और सडक़ की जो दुर्दशा होती है, वह कोई विमर्श नहीं मांगता है. गांधी मार्ग को छोडक़र हम सडक़ पर चल रहे हैं और सडक़ हमें अपनी गंतव्य के आसपास ही छोड़ देती है लेकिन गांधी मार्ग अपनाते तो हम जीवन के निश्चित लक्ष्य तक पहुंच सकते थे.  गांधी मार्ग सडक़ नहीं है, यह विचारों का सफर है जो आपके लक्ष्य को सुनिश्चित करता है. यह भी बेहद पीड़ादायक है कि किसी भी ग्रंथ का, विचारधारा का पठन-पाठन करने के पहले ही हम अपनी प्रतिक्रिया हवा में उछाल देते हैं. यह अधिकार तो किसी ने नहीं दिया कि आप सतही और तर्कहीन बातें करें और खासतौर पर लोक समाज में ऐसी प्रतिक्रियाओं के लिए कोई स्थान शेष नहीं हैं. स्वाधीन भारत में हमारे 70 साल का समय गुजर रहा है और स्वाधीनता संग्राम के समय बहुत कुछ अच्छा हुआ तो कुछेक प्रसंग दुखदायी भी होंगे लेकिन आज आवश्यकता इस बात की है कि हम लोक समाज में उन स्वर्णिम प्रसंग को लेकर जाएं जो नयी पीढ़ी के लिए प्रकाश का कार्य करे. हम एक नये भारत के निर्माण की चर्चा करते हैं तो स्वाभाविक है कि विचार भी नए होंं. गांधी के विचार इसलिए हमेशा सामयिक हैं कि उन्हें जिस खाने में रखना चाहेंगे, आकार ले लेगा. सत्य, अहिंसा, नैतिक मूल्य, आत्मनिर्भरता, महिला शिक्षा, किसान आदि इत्यादि ऐसे विषय हैं जो यक्ष प्रश्र की तरह हमारे समक्ष खड़े होकर जवाब मांग रहे हैं. यह समय बदलाव का है और बदलते समय में जो भी प्रासंगिक है, उसे लोक समाज को परिचित कराने की जवाबदारी हमारी है. गांधी का सबसे बड़ा अस्त्र दूसरों की गलतियों को माफ करना रहा है तो आज हम संकल्प लें कि आज से हम इस अस्त्र को अपने विकास के लिए उपयोग करेंगे क्योंकि दूसरों को माफी देने के लिए नैतिक साहस की जरूरत होती है और जब नैतिक साहस होगा तो अनेक समस्याओं का समाधान स्वयमेव हमें मिल जाएगा. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) 


बुधवार, 5 जनवरी 2022

फिर से ऑनलाइन हो जाने का वक्त

 फिर से ऑनलाइन हो जाने का वक्त

मनोज कुमार
कोरोना की पहल लहर को हमने बहुत हल्के में लिया था और दूसरी लहर के मुकाबले उसने उतना नुकसान नहीं किया था। दूसरी लहर को भी हमने पहली लहर की तरह हल्के में लिया और हम सब पर कयामत टूट पड़ी। तीसरी लहर सिर पर खड़ी है और रोज-ब-रोज बदलती जानकारियां भ्रमित कर रही हैं। इन सबके बावजूद इस अंदेशे से इंकार करना मुश्किल है कि कोरोना की यह तीसरी लहर हमें नुकसान पहुंचाये बिना ही गुजर जाएगी। बड़े-बुर्जुगों ने कहा भी है कि दुघर्टना से सर्तकता भली और यह समय कह रहा है कि हम सम्हल जाएं, सर्तक हो जाएं। निश्चित रूप से जब हमारी दिनचर्या बदलती है तो कई तरह की परेशानी आती है लेकिन जान है तो जहान है, इस बात का खयाल रखना होगा। सरकार और उसका तंत्र पहले की तरह अपना काम कर रहा है लेकिन हम सर्तक नहीं रहेंगे तो हमारी-आपकी या हमारे लोगों की जिंदगी पर ही खतरा आना है। दवा, इलाज, डॉक्टर, ऑक्सीजन तो तभी कारगर होंगे जब स्थिति नियंत्रण में होगी। जैसा कि दूसरी लहर में चौकचौबंद व्यवस्था धरी रह गई क्योंकि इंतजाम से ज्यादा बीमारों की संख्या हो गई थी। एक बार फिर हम सबको अपने स्तर पर चेत जाना है और स्थिति बिगडऩे लगे, इसके पहले नियंत्रण में लेेने में सहयोग करना होगा।
कोरोना का सबसे ज्यादा हमला भीड़ भरी जगह में होता है। ताजा जानकारी इस बात को पुख्ता करती है कि कोरोना का डेल्टा का चेहरा अब ओमिक्रॉन के नाम पर आ गया है जो आसपास गुजरने से दूसरे को बीमार कर सकता है। यह बेहद दुर्भाग्यजनक है कि एक बड़े संकट से गुजर जाने के बाद भी हम लापरवाह बने हुए हैं। चेहरे पर ना तो मॉस्क है और ना ही हम सेनेटाइजर का उपयोग कर रहे हैं। शारीरिक दूरी बनाये रखने में तो जैसे हमें किसी अज्ञात शक्ति ने रोक रखा है। लगभग दो साल के कोरोना के पीरियड में इस बात की सीख बार बार दी जा रही है कि यही तीन उपाय हैं जिससे हम अपने जीवन को आफत से बचा सकते हैं। बावजूद इसके हमारी जिद से कोरोना भागे या डरेगा, यह हमारी कल्पना हो सकती है लेकिन हम जिंदगी हार जाएंगे, इसकी आशंका बनी रहती है। समाज को चेताने के लिए सरकारी प्रयास हो रहे हैं लेकिन वैसे सख्ती और पाबंदी देखने को नहीं मिल रही है, जो कोरोना को फैलने से रोकने में कारगर हो।
बीते दो साल और शायद आगे आने वाले कुछ माह हम उत्सवहीन नहीं रह सकते हैं? क्या हम अपने आपको अपने घरों तक सिमट कर नहीं रह सकते हैं? क्या शिक्षण संस्थाओं को वापस ऑनलाइन मोड में नहीं लाया जा सकता है? क्या ऑफिसों को वर्कफ्रॉम होम नहीं किया जा सकता है? यह सबकुछ किया जा सकता है और किया जाना चाहिए क्योंकि हमारा जो सामाजिक ताना-बाना है, वह ऐसा नहीं है कि इन सब पाबंदियों के बिना हम बीमारी को रोक सकें. शिक्षण संस्थायें खुली रहेंगी तो निश्चित रूप से बच्चों के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग होगा और पब्लिक ट्रांसपोर्ट होने का अर्थ शारीरिक दूरी की समाप्ति। निजी एवं शासकीय दफ्तरों के सक्रिय रहने से वह तमाम आशंकायें सिर उठाने लगती हैं जिससे कोरोना के फैलाव को रोकना लगभग असंभव सा होता है। फाइलोंं का आदान-प्रदान, एक-दूसरे के सम्पर्क में आना लाजिमी है जिससे कब, कौन कोरोना के लपेटे में आ जाए, कहना मुश्किल होगा। लॉकडाउन एक बड़ा संकट खड़ा कर सकता है लेकिन वीकएंड लॉकडाउन कोरोना को रोकने का बेहतर उपाय हो सकता है। वैसे भी पांच दिनी कार्यदिवस है तो क्यों ना दो दिनों के लिए आवाजाही, सौदा-सुलह पर बंदिश लगा दी जाए। ऐसा किये जाने से इस बात की आश्वस्ति तो होगी कि कोरोना को आने से भले ही ना रोक सकें लेकिन उसके फैलाव को तो रोक सकते हैं।
शासन-प्रशासन को सख्ती के साथ शिक्षण संस्थाओं को ऑफलाइन मोड से ऑनलाइन मोड पर अनिवार्यत: लेकर आने पर ना केवल विचार करना चाहिए बल्कि इसे तत्काल प्रभाव से लागू किया जाना चाहिए। यह स्कूल और कॉलेज दोनों स्तर पर किया जाना चाहिए। इस प्रतिबंध के खिलाफ यह तर्क दिया जा सकता है कि इंटरनेट की सुविधा आड़े आती है तो इस बात की भी तसल्ली की जानी चाहिए कि जैसा बीता समय गुजर गया, वैसा ही कुछ और समय लेकिन कोरोना के फैलने से जो समस्या आएगी, उससे बचा जा सकेगा। वर्कफ्रॉम होम को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जिस आधुनिक समय के साथ हमकदम हो रहे हैं और जीवन का हर पक्ष अब टेक्रालॉजी फ्रेंडली हो रहा है तो इसे पूर्वाभ्यास मानकर हमें आत्मसात कर लेना चाहिए क्योंकि आने वाले समय में भारी-भरकम खर्चों को बचाने तथा तत्काल परिणाम देने वाली कार्यसंस्कृति के लिए जिंदगी ऑनलाइन हो जाएगी। अभी तो धडक़न की शर्त पर ऑनलाइन किये जाने की बात है तब आगे भविष्य में हम और ऑनलाइन साथ-साथ होंगे।
उत्सव के सारे उपक्रम को थाम देना चाहिए। जीवन शेष रहा तो हर दिन उत्सव होगा। अभी हम कठिन दौर से गुजर रहे हैं और इससे बाहर निकलने के लिए स्व-नियंत्रण और नियमन जरूरी हो जाता है। सब लोग समय पर और बिना किसी भय के साथ टीकाकरण करायें, इसकी जवाबदारी भी हम सब अपने अपने स्तर पर लें। बचाव का यह एक बड़ा उपाय है। यह कठिन समय गुजर जाएगा इसलिए डरने और डराने के बजाय सम्हलने और सम्हालने का वक्त है। सरकार पर आश्रित रहने के बजाय अपनी दिनचर्या और आदतों को बदल कर स्वास्थ्य सेवाओं को सहज और सुलभ बनायें। कोरोना एक सबक है कि हम जीवन को कितना आसान बना सकते हैं। चलों, एक बार फिर ऑनलाइन हो जाएं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

मंगलवार, 30 नवंबर 2021

कोरोना : डरने, डराने का नहीं, सम्हलने का वक्त है

 मनोज कुमार

कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरोना की दूसरी लहर को याद करने के बाद रूह कांप जाती है और तीसरी लहर ने भी ऐसे ही कयामत ढाया तो जिंदगी कल्पना से बाहर होगी। पहली लहर को सभी वर्गों ने हल्के में लिया था और कोरोनो को लोग मजाक बता रहे थे। सामान्य खांसी-सर्दी की बीमारी बताकर उसे अनदेखा कर रहे थे लेकिन दूसरी लहर में जब जिंदगी के लाले पडऩे लगे तो समझ में आया कि सौ साल बाद महामारी किस कदर कहर ढाती है। हममें से अधिकांश को पता ही नहीं है कि सौ साल पहले आयी महामारी का प्रकोप कितना और कैसा था लेकिन जब हम खुद इस बार की महामारी का सामना कर रहे हैं तो समझ में आने लगा है कि महामारी होती क्या है? कोरोना की तीसरी लहर की अभी शुरूआत है और अपने आरंभिक लक्षणों में उसकी भयावहता का अंदाज होने लगा है। इस आहट को भांप कर हम सबको डरने की जरूरत नहीं है और ना ही डराने की जरूरत है बल्कि जरूरत है कि हम सब अपने अपने स्तर पर सावधानी बरतें क्योंकि सावधानी ही इस महामारी का इकलौता इलाज है। लापरवाही या अनदेखी के चलते पहले भी कितने घरों में तकलीफ आयी है और इसका दुहराव ना हो, इस बात की सावधानी हमें बरतनी होगी। 

कोरोना की तीसरी लहर को लेकर सोशल मीडिया में जिस तरह की आधी-अधूरी बातें की जा रही है, वह किसी महामारी से कम नहीं है। संभव है कि कोरोना को लिखने वाले जानकार हों लेकिन इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि आपके लिखे शब्दों से समाज में डर पैदा ना हो क्योंकि डर के कारण आपाधापी मचती है और बीमारी से ज्यादा डर बेकाबू हो जाता है। कोशिश होना चाहिए कि संतुलित भाषा में कोरोना से बचाव के लिए लोगों को जागरूक करें। कोरोना के दरम्यान बरतने वाली सावधानी से लोगों को अवगत कराया जाए ताकि स्थिति पहले पायदान पर ही नियंत्रण में हो सके। जो जिस क्षेत्र में है, उस क्षेत्र की मेडिकल सुविधाओं के बारे में बताया जाए ताकि जरूरत पडऩे पर लोगों को भटकना ना पड़े। देखने में यह भी आया है कि वैक्सीन को लेकर भी यह चर्चा की जा रही है कि यह कारगर नहीं है। इस सूचना का कोई तर्क नहीं है और एक कारण लोगों का वैक्सीन नहीं लगाने में यह भी है। कायदे से हम लोगों को प्रेरित करें कि अविलम्ब कोरोना प्रतिरोधक वैक्सीन लगा लें ताकि  कोरोना के शिकार होने के बाद भी गंभीर स्थिति से बचा जा सके। अभी डराने या बिना तर्क की बात करने का नहीं है क्योंकि डर से व्यवस्था बाधित होती है और महामारी को फैलने के लिए स्थान मिल जाता है।

कोरोना के आरंभ के साथ मीडिया की भूमिका सकरात्मक रही है और यही कारण है कि बीते दो लहर से व्यवस्था के नियंत्रण में शासकीय तंत्र को सहायता मिली है। कमियों की आलोचना से शासकीय तंत्र सजग हुआ और व्यवस्था दुरूस्त की गई। जैसे निजी अस्पतालों द्वारा इलाज के नाम पर जो मनमानी की जा रही थी, उसे रोकने के लिए मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान स्वयं आगे आए। ऐसी आपदाओं में मीडिया की भूमिका बड़ी और गंभीर हो जाती है। समाज की अपेक्षा होती है कि मीडिया सारा सच बताये लेकिन सच तो यह है कि स्थिति को नियंत्रण में रखने, लोगों में डर ना फैले तथा वे व्यवस्था के प्रति सुनिश्चित रहें, इसकी जवाबदारी भी मीडिया की होती है। मीडिया रिपोट्र्स की भाषा और प्रस्तुति बेहद संयत और संवेदनशील होती है जिससे लोगों के भीतर उपजने वाला डर खत्म होता है। डरे हुए लोग भीड़ में तब्दील हो जाते हैं और भीड़ को नियंत्रण में रखना मुश्किल कार्य होता है। ऐसे में सामंजस्य बनाकर रखना ऐसी विकट स्थिति में मीडिया का कार्य होता  है क्योंकि मीडिया समाज और सरकार के मध्य सेतु का कार्य करती है। 

कोरोना प्रकोप को नियंत्रण में देखकर सरकार ने जीवन को सहज बनाने के लिए अनेक फैसले लिये हैं जिसमें शैक्षणिक संस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित किये जाने के आदेश हैं। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में ऑनलाइन शिक्षा की चर्चा की गई है। अभी समाज मुसीबत से दूर नहीं हुआ है और जरूरी है कि ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था को बनाये रखें ताकि शिक्षण संस्थाओं में एकत्र होने वाली भीड़ से कोरोना वायरस फैलने से रोका जा सके। यूं भी टेक्रालॉजी का जिस तरह से विस्तार हो रहा है और आने वाला भविष्य टेक्रालाजी फ्रेंडली होना है तब ऑनलाइन शिक्षा और वर्क फ्रॉम होम को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इन विकल्प से ना केवल हम कोरोना के हमले से बच सकते हैं बल्कि पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के साथ ही संस्थागत व्यय पर भी नियंत्रण हो जाता है। यह किया जाना आज के लिए ही नहीं, भविष्य के लिए भी जरूरी हो जाता है। शादी-ब्याहो, सभा-संगत और मॉल-टॉकीज शुरू करने की जो छूट दी गई है, उस पर पुर्नविचार किया जाना चाहिए। निश्चित रूप से भारतीय जीवनशैली का पाश्चात्य जीवनशैली से कोई मेल नहीं है लेकिन कोरोना के चलते एक बार विचार किया जाना जरूरी हो जाता है।

यह सूचना राहत देती है कि कोरोना की आहट के पहले ही चिकित्सा व्यवस्था चाक-चौबंद कर ली गई है लेकिन इसकी वास्तविकता को जांचना भी जरूरी है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान इस मामले में गंभीर हैं और कलेक्टरों को आदेश देकर यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि अपने अपने जिलों में ऑक्सजीन प्लांट की स्थिति का निरीक्षण-परीक्षण करें और उसे चालू करें। आग लगने पर कुंआ खोदने से अच्छा है कि कुंआ पहले तैयार रखें ताकि वक्त-बे-वक्त काम आ सके। मेडिकल सहित संबद्ध सेवाओं को आपातकालीन घोषित करना भी समय की जरूरत है। ऐसा किये जाने से विपत्ति का समाधान मौजूद होगा। सरकार के इन प्रयासों को मूर्त रूप देने के लिए समाज को भी आगे आना होगा। अफवाहों से दूर रहकर वेक्सीन लगवा लें। अनावश्यक यात्रा या बाजार जाने से बचें। मॉस्क और सेनिटाइजर का उपयोग जीवनशैली में शामिल कर लें। मॉस्क ना केवल कोरोना से बचाती है बल्कि प्रदूषण से भी आपके शरीर को बचाती है। दिल्ली का हाल किसी से छिपा नहीं है। झीलों की नगरी भोपाल अपनी ताजगी के साथ अपनी पहचान कायम रखे, इसके लिए जरूरी है कि हम सब मिलकर कोरोना का मुकाबला करें। सजग रहें, स्वस्थ्य रहें क्योंकि जीवन हमारा अपना है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक हैं)




रविवार, 28 नवंबर 2021

टंट्या मामा को सलामी देने आज भी ट्रेन के पहिये थम जाते हैं


मनोज कुमार
स्वाधीनता के सात दशक बाद भी किसी योद्धा को सलामी देने के लिए गुजरने वाले ट्रेन के पहिये कुछ समय के लिए थम जाए, यह जानकर मन रोमांचित हो जाता है। यह शायद उन लोगों के लिए एक पहेली के समान भी हो जिन्होंने किताबों में तो स्वाधीनता संग्राम का इतिहास पढ़ा है लेकिन इतिहास आज भी लिखा जा रहा है, यह अपने किस्म का अलग अनुभव है। लेकिन सच है कि अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने वाले जनजाति वीर योद्धा टंट्या मामा की वीरता को सलाम करने के लिए पातालपानी रेल्वे स्टेशन से गुजरने वाली हर रेलगाड़ी के पहिये कुछ समय के लिए आज भी थम जाता है। जनपदीय लोक नायकों का स्मरण तो हम समय-समय पर करते हैं लेकिन वीर योद्धा टंट्या मामा को प्रतिदिन स्मरण करने का यह सिलसिला कभी थमा नहीं, कभी रूका नहीं। अब जब हम आजादी के 75वां वर्ष का उत्सव मना रहे हैं तब ऐसे अनेक प्रसंग से हमारी नयी पीढ़ी को रूबरू कराने का स्वर्णिम अवसर है। मध्यप्रदेश ऐसे जाने-अनजाने सभी वीर योद्धाओं का स्मरण कर आजादी के 75वें वर्ष को यादगार बना रहा है।
स्वाधीनता का 75वां वर्ष पूरे राष्ट्र का उत्सव है। एक ऐसा उत्सव जो हर पल इस बात का स्मरण कराता है कि ये रणबांकुरे नहीं होते तो हम भी नहीं होते। गुलामों की तरह हम मरते-जीते रहते लेकिन दूरदर्शी लोकनायकों ने इस बात को समझ लिया था और स्वयं की परवाह किये बिना भारत माता को गुलामी की बेडिय़ों से आजाद करने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। हमारा इतिहास ऐसे वीर ही नायकों की कथाओं से लिखा गया है। इतिहास का हर हर्फ हमें गर्व से भर देता है कि हम उस देश के वासी हैं जहां अपने देश के लिए मर-मिटने वालों का पूरा समाज है। ऐसे वीर नायकों का स्मरण करते हुए हम पाते हैं कि स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय समाज के वीर नायकों की भूमिका बड़ी है लेकिन जाने-अनजाने उन्हें समाज के समक्ष लाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। आजादी के इस 75वें वर्ष में देश ऐसे ही वीर नायकों का स्मरण कर रहा है। कोई भी वीर शहीद किसी भी क्षेत्र या राज्य का हो लेकिन उसकी पहचान एक भारतीय की रही है। बिरसा मुंंडा से लेकर टंट्या भील हों या गुंडाधूर। इन सारे वीर जवानों ने कुर्बानी दी तो भारत माता को गुलामी की बेडिय़ों से आजाद करने के लिए। यह सुखद प्रसंग है कि देश का ह्दय प्रदेश कहे जाने वाला मध्यप्रदेश ऐसे सभी चिंहित और गुमनाम जनजाति समाज के वीर योद्धाओं को प्रणाम कर उन्हें स्मरण कर रहा है। मध्यप्रदेश की कोशिश है कि नयी पीढ़ी ना केवल अपने स्वाधीनता के इतिहास को जाने बल्कि अनाम शहीदों के बारे में भी अपनी जानकारी पुख्ता करे। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि स्वतंत्रता सेनानियों को ब्रिटिश शासन द्वारा विद्रोही कहा गया है और उन्हें अपराधी भी साबित करने की कोशिश की गई है और इन्हीं गलत तथ्यों को सुधारने का समय आ गया है।
बिरसा मुंडा का जन्मोत्सव के बाद ट्ंटया भील जो समाज के लिए टंट्या मामा हैं, का स्मरण किया जा रहा है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान आजादी के इस 75वें वर्ष को जनजाति योद्धाओं को समर्पित करते हुए दिखते हैं। मध्यप्रदेश के लिए यह गौरव की बात है कि वह एक राष्ट्र की चर्चा कर रहा है। बिरसा मुंडा के स्मरण से जो यात्रा आरंभ हुई है, वह सिलसिला आगे बढ़ेगा। यह महज संयोग है कि महज 20 दिनों के अंतराल में देश के दो महान योद्धा का स्मरण करने का अवसर हमें मिला है। बिरसा मुंडा के बाद 4 दिसम्बर को जननायक टंट्या मामा के बलिदान दिवस पर हम सब स्मरण कर रहे हैं। यह उल्लेख करना भी गर्व का विषय है कि अविभाजित मध्यप्रदेश सहित सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में ऐसे वीर शहीदों की लम्बी सूची है जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम को स्वर्णिम बनाया।
‘इंडियन रॉबिन हुड’ के नाम से चर्चित टंट्या मामा की वीरता की कहानी का कालखंड है 1878 से लेकर 1889 का जब अंग्रेजों ने उन्हें एक अपराधी के रूप में प्रचारित किया। टंट्या को उन क्रांतिकारियों में से एक के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने 12 साल तक ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था। रिपोर्टों में कहा गया है कि वह ब्रिटिश सरकार के खजाने और उनके अनुयायियों की संपत्ति को गरीबों और जरूरतमंदों में बांटने के लिए लूटता था। इन आंदोलनों से बहुत पहले आदिवासी समुदायों और तांत्या भील जैसे क्रांतिकारी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया था। वह आदिवासियों और आम लोगों की भावनाओं के प्रतीक बन गए। लगभग एक सौ बीस साल पहले तांत्या भील जनता के एक महान नायक के रूप में उभरा और तब से भील जनजाति का एक गौरव बन चुका है। उन्होंने अदम्य साहस, असाधारण चपलता और आयोजन कौशल का प्रतीक बनाया। टंट्या भील का वास्तविक नाम तांतिया था, जिन्हे प्यार से टंट्या मामा के नाम से भी बुलाया जाता था। उल्लेखनीय है कि टंट्या भील की गिरफ्तारी की खबर न्यूयॉर्क टाइम्स के 10 नवंबर 1889 के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। इस समाचार में उन्हें ‘भारत के रॉबिन हुड’ के रूप में वर्णित किया गया था।
इतिहासकारों के अनुसार खंडवा जिले की पंधाना तहसील के बडदा में सन् 1842 के करीब भाऊसिंह के यहां टंट्या का जन्म हुआ था। कहते हैं कि टंट्या का मतलब झगड़ा या संघर्ष होता है और टंट्या के पिता ने उन्हें ये नाम दिया था, क्योंकि वे आदिवासी समाज पर हो रहे जुल्म का बदला लेने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। बचपन में ही तीर कमान, लाठी और गोफल चलाने में पारंगत हो चुके टंट्या ने जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही जमींदारी प्रथा के खिलाफ अंग्रेजों से लोहा लेना शुरु कर दिया था। इंडियन रॉबिनहुड टंट्या भील, जिन्होंने अंग्रजों के छक्के छुड़ा दिए थे। सन् 1870 से 1880 के दशक में तब के मध्य प्रांत और बंबई प्रेसीडेंसी में टंट्या भील ने 1700 गांवों में अंग्रेजों के खिलाफ समानांतर सरकार चलाई थी। तब महान क्रांतिकारी तात्या टोपे ने टंट्या से प्रभावित होकर उन्हें छापामार शैली में हमला बोलने की गौरिल्ला युद्धकला सिखाई थी। इसके बाद टंट्या ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। जनश्रुति के अनुसार मान्यता थी कि मामा टंट्या के राज में कोई आदिवासी भूखा नहीं सो सकता। टंट्या से मुंह की खा रहे अंग्रेजों को टंट्या से लडऩे के लिए ब्रिटिश सेना की खास टुकड़ी भारत बुलानी पड़ी थी। हालांकि टंट्या को ब्रिटिश सेना ने धोखे से गिरफ्तार कर लिया था।
इतिहासकारों के अनुसार 11 अगस्त सन् 1889 को रक्षाबंधन के दिन जब टंट्या अपनी मुंहबोली बहन से मिलने पहुंचे थे तो उसके पति गणपतसिंह ने मुखबिरी कर उन्हें पकड़वा दिया था। जबलपुर में अंग्रेजी सेशन कोर्ट ने 19 अक्टूबर को टंट्या को फांसी की सजा सुना दी थी। उन्हें 4 दिसम्बर 1889 को फांसी दी गई। ब्रिटिश सरकार भील विद्रोह के टूटने से डरी हुई थी। आमतौर पर यह माना जाता है कि उसे फांसी के बाद इंदौर के पास खंडवा रेल मार्ग पर पातालपानी रेलवे स्टेशन के पास फेंक दिया गया था। जिस स्थान पर उनके लकड़ी के पुतले रखे गए थे, वह स्थान तांत्या मामा की समाधि मानी जाती है। आज भी सभी ट्रेन टंट्या मामा के सम्मान में ट्रेन को एक पल के लिए रोक देते हैं।
ऐसे वीर जवानों के लिए कृतज्ञ मध्यप्रदेश उनकी यादों को चिरस्थायी बनाने के लिए प्रयासरत है। इस सिलसिले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को घोषणा की है कि इंदौर में पातालपानी रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर टंट्या भील के नाम पर रखा जाएगा। साथ ही इंदौर बस स्टैंड का नाम टंट्या मामा के नाम पर रखा जाएगा। यह पहल इस मायने में महत्वपूर्ण है कि हर आयु वर्ग के लोगों को यह स्मरण आता रहे कि हमें आजादी दिलाने के लिए ऐसे महान योद्धाओं ने अपने जीवन का उत्र्सग किया। टंट्या मामा जैसे सभी वीर योद्धाओं को हम नमन करते हैं।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक हैं)

गुरुवार, 4 नवंबर 2021

सहारा देकर जिम्मेदारी का बीज बोती सरकार

मनोज कुमार

एक मजदूर के बेटे ने यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली.. एक चाय बेचने वाले ने अपने बेटे को आइएसएस बना दिया.. एक गरीब परिवार के बेटे ने संघर्ष कर कामयाबी हासिल की... ये खबरें बताती हैं कि हमारे समाज में प्रतिभाओं की कमी नहीं है.. वे अपने दम पर कामयाबी पा रहे हैं.. यह खबरें देश के कोने कोने से आती हैं.. दूसरे राज्यों की तरह मध्यप्रदेश भी यह खबरें सुन रहा था.. अब यहां आकर मध्यप्रदेश और दूसरे राज्यों में फकत इस बात का अंतर रह गया कि दूसरे युवाओं की कामयाबी की खबरें सुनते रह गए और मध्यप्रदेश सरकार ने आगे बढक़र ऐसे हीरों को गले से लगा लिया. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने इन प्रतिभावान युवाओं के कंधे पर हाथ रखा और कहा-बढ़ो और आगे बढ़ते रहो. मैं तुम्हारे साथ हूं. यकिन करना आसान नहीं है लेकिन मध्यप्रदेश में आप हैं तो इस पर यकिन ना करने का भी कोई कारण नहीं बचता है. 
एक बच्चा यूपीएससी की परीक्षा में पास हो जाता है. दिल्ली से उसका बुलावा साक्षात्कार के लिए आया है. परिवार की मदद से वह दिल्ली जाने का इंतजाम करने लगता है कि तभी सरकार की तरफ से उसे संदेशा मिलता है मध्यप्रदेश भवन में आपके रूकने के लिए इंतजाम सरकार की ओर से किया गया है. पहले तो उसे यकीन ही नहीं होता है कि क्या सच है? वह दो बार फोन करने वाले अफसर से सच जानना चाहता है. उसे भरोसा दिलाया जाता है कि वह स्वयं इस बात की तस्दीक कर ले. वह दिल्ली स्थित मध्यप्रदेश भवन पहुंचता है तो कोई गफलत की गुंजाईश ही नहीं रह जाती है. उसके एक सामने एक संकट का निदान हो गया तो एक और बात उसके मन में डूबती-उतरती रहती है. संकोच करते हुए वह सरकार के अधिकारी से पूछ लेता है कि मेरे पिताजी को अपने साथ ठहरा सकता हूं? मुस्कराते हुए अधिकारी कहते हैं- बिना शक, आप अपने पेरेंट को अपने साथ ही रख सकते हैं. सरकार का यह आदेश है. 
यह कपोल-कल्पित घटना नहीं है. यह एक सच्ची घटना है जो मेरे एक नजदीक के परिचित के साथ घटित हुई थी. चूंकि परिचित के सम्पर्क गहरे हैं तो वह कुछ प्रयास कर रहे थे कि दिल्ली में रूकने का ठिकाना मिल जाए लेकिन उन्हें भी यही सूचना मिली तो पहले पहल यकिन नहीं हुआ लेकिन बेटे ने जब कन्फर्म किया तो उनके लिए राहत की बात थी.सबसे बड़ी बात यह थी कि जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं और जिस जवाबदारी की अपेक्षा हम अपनी चुनी हुई भरोसे की सरकार से करते हैं, वह मध्यप्रदेश में पूरा होता दिख रहा है. यह तय है कि हम इसमें भी नुक्स निकाल सकते हैं और कह सकते हैं कि ये महज सरकार की वाहवाही करने की स्कीम है लेकिन कभी उन बच्चों से पूछिये जिन्होंने अपनी मेहनत से कामयाबी तो पा ली और अब उनके साथ सरकार खड़ी है तो उनका भरोसा कितना बढ़ा होगा.
भोपाल के मिंटो हॉल में यूपीएससी परीक्षा पास करने वालों से मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने संवाद किया तो यह एक महज औपचारिक कार्यक्रम लग रहा था. लेकिन जब मुख्यमंत्री ने इन युवाओं का साथ देने के लिए ऐलान किया तो यह भी पहली सूरत में औपचारिक ही लगा क्योंकि आजादी के सात दशक बाद ऐसा करिश्माई ऐलान की उम्मीद नहीं की जा सकती थी. लेकिन जो हुआ, वह सच था और जो हो रहा है वह लोकतांत्रिक सरकार की नयी परिभाषा गढ़ रहा है. हालांकि इस योजना का श्रेय उच्च शिक्षामंत्री डॉ. मोहन यादव के हिस्से में जाता है जो इस योजना के शिल्पकार रहे हैं. उन्होंने अपने लीडर शिवराजसिंह को इस बात के लिए सहमत किया और आज युवाओं की कामयाबी की खबरें पढऩे वाले राज्य, मध्यप्रदेश की इस अनोखी पहल से स्तब्ध हैं. हो सकता है कि पूर्व में जिस तरह से मध्यप्रदेश की योजनाओं को अन्य राज्यों ने अपनाया है, वैसा ही इस योजना के बारे में सक्रियता दिखायें. ऐसा होता है तो निश्चित रूप से युवाओं को ना केवल सहारा मिलेगा बल्कि जिम्मेदारी की भावना बलवती होगी.
इस बात को भी याद रखा जाना चाहिए कि यूपीएससी की परीक्षा पहले दफा नहीं हो रही है और ना ही पहली दफा युवा कामयाब हो रहे हैं. लेकिन इस बार एक खास बात यह भी हुई कि युवाओं का हौसलाअफजाई करने राज्य शासन ने कामयाब युवाओं पर केन्द्रित एक पुस्तक भी तैयार की. यह सुखद अनुभव भी उनके लिए पहली होगा. संभव है कि इसके पहले भी कुछ युवा परीक्षा तो पास कर चुके होंगे लेकिन तब कोई शिवराजसिंह नहीं था जो उनके हौसले बुलंद करता. जो लोग इसके पहले परीक्षा पास कर चुके होंगे और साक्षात्कार में रूक गए होंगे, वह अपनी योग्यता और प्रतिभा की कमी के कारण नहीं बल्कि आर्थिक तनाव और संसाधनों की कमी के कारण विफल हो गए होंगे. इस बार वे तनाव मुक्त हैं और मन में उल्लास है. शिवराजसिंह सरकार के इस प्रयास को इस नजर से भी देखा जाना चाहिए कि ये वही युवा हैं जो भविष्य में प्रदेश के प्रशासन की कमान सम्हालेंगे. कोई प्रशासनिक अधिकारी होगा तो कोई पुलिस का अफसर बनेगा तो किसी के जिम्मे जंगल महकमा आएगा. तब इन लोगों के भीतर अपनेपन का अहसास होगा. जिम्मेदारी होगी और नेक-नीयति के साथ अपने दायित्वों को पूर्ण कर सकेंगे. दरअसल, इन युवाओं को सहारा देने का अर्थ उस बीज का छिडक़ाव है जो आने वाले दिनों में फलदार पौधे के रूप में पूरे प्रदेश को हरा-भरा करेगा. अपने इन्हीं फैसलों की वजह से मध्यप्रदेश, देश के दिल में धडक़ता है क्योंकि देश की धडक़न का नाम है मध्यप्रदेश है. 

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