शिक्षा की नयी उड़ान : सीएम राइज स्कूल
शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022
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बुधवार, 14 दिसंबर 2022
शनिवार, 3 दिसंबर 2022
‘इंडियन रॉबिन हुड’ यानि वीर सिपाही टंट्या मामा
मनोज कुमार
हम आजादी के 75वां वर्ष का उत्सव मना रहे हैं तब ऐसे अनेक प्रसंग से हमारी नयी पीढ़ी को रूबरू कराने का स्वर्णिम अवसर है। मध्यप्रदेश ऐसे जाने-अनजाने सभी वीर योद्धाओं का स्मरण कर आजादी के 75वें वर्ष को यादगार बना रहा है। खासतौर पर उन योद्वाओं का जिन्होंने अपने शौर्य से अंग्रेजी सेना को नेस्तनाबूद कर दिया। ऐसे में वीर योद्धा टंट्या भील को हम टंट्या मामा के नाम से संबोधित करते हैं, वह सदैव हमारे लिये अनुकरणीय रहे हैं। यह हिन्दुस्तान की माटी है जहां हम अपने योद्धाओं का हमेशा से कृतज्ञ रहे हैं। ऐसे में टंट्या मामा का स्मरण करते हुए हम गर्व से भर उठते हैं कि वीर योद्धा टंट्या मामा की वीरता को सलाम करने के लिए पातालपानी रेल्वे स्टेशन से गुजरने वाली हर रेलगाड़ी के पहिये कुछ समय के लिए आज भी थम जाता है। जनपदीय लोक नायकों का स्मरण तो हम समय-समय पर करते हैं लेकिन वीर योद्धा टंट्या मामा को प्रतिदिन स्मरण करने का यह सिलसिला कभी थमा नहीं, कभी रूका नहीं।
स्वाधीनता का 75वां वर्ष पूरे राष्ट्र का उत्सव है। एक ऐसा उत्सव जो हर पल इस बात का स्मरण कराता है कि ये रणबांकुरे नहीं होते तो हम भी नहीं होते। गुलामों की तरह हम मरते-जीते रहते लेकिन दूरदर्शी लोकनायकों ने इस बात को समझ लिया था और स्वयं की परवाह किये बिना भारत माता को गुलामी की बेडिय़ों से आजाद करने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। हमारा इतिहास ऐसे वीर ही नायकों की कथाओं से लिखा गया है। इतिहास का हर हर्फ हमें गर्व से भर देता है कि हम उस देश के वासी हैं जहां अपने देश के लिए मर-मिटने वालों का पूरा समाज है। ऐसे वीर नायकों का स्मरण करते हुए हम पाते हैं कि स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय समाज के वीर नायकों की भूमिका बड़ी है लेकिन जाने-अनजाने उन्हें समाज के समक्ष लाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। आजादी के इस 75वें वर्ष में देश ऐसे ही वीर नायकों का स्मरण कर रहा है। कोई भी वीर शहीद किसी भी क्षेत्र या राज्य का हो लेकिन उसकी पहचान एक भारतीय की रही है। बिरसा मुंंडा से लेकर टंट्या भील हों या गुंडाधूर। इन सारे वीर जवानों ने कुर्बानी दी तो भारत माता को गुलामी की बेडिय़ों से आजाद करने के लिए। यह सुखद प्रसंग है कि देश का ह्दय प्रदेश कहे जाने वाला मध्यप्रदेश ऐसे सभी चिंहित और गुमनाम जनजाति समाज के वीर योद्धाओं को प्रणाम कर उन्हें स्मरण कर रहा है। मध्यप्रदेश की कोशिश है कि नयी पीढ़ी ना केवल अपने स्वाधीनता के इतिहास को जाने बल्कि अनाम शहीदों के बारे में भी अपनी जानकारी पुख्ता करे।
मध्यप्रदेश के लिए यह गौरव की बात है कि 4 दिसम्बर को जननायक टंट्या मामा के बलिदान दिवस पर हम सब स्मरण कर रहे हैं। यह उल्लेख करना भी गर्व का विषय है कि अविभाजित मध्यप्रदेश सहित सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में ऐसे वीर शहीदों की लम्बी सूची है जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम को स्वर्णिम बनाया। ‘इंडियन रॉबिन हुड’ के नाम से चर्चित टंट्या मामा की वीरता की कहानी का कालखंड है 1878 से लेकर 1889 का जब अंग्रेजों ने उन्हें एक अपराधी के रूप में प्रचारित किया। टंट्या को उन क्रांतिकारियों में से एक के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने 12 साल तक ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था। रिपोर्टों में कहा गया है कि वह ब्रिटिश सरकार के खजाने और उनके अनुयायियों की संपत्ति को गरीबों और जरूरतमंदों में बांटने के लिए लूटता था। इन आंदोलनों से बहुत पहले आदिवासी समुदायों और तांत्या भील जैसे क्रांतिकारी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया था। वह आदिवासियों और आम लोगों की भावनाओं के प्रतीक बन गए। लगभग एक सौ बीस साल पहले तांत्या भील जनता के एक महान नायक के रूप में उभरा और तब से भील जनजाति का एक गौरव बन चुका है। उन्होंने अदम्य साहस, असाधारण चपलता और आयोजन कौशल का प्रतीक बनाया। टंट्या भील का वास्तविक नाम तांतिया था, जिन्हे प्यार से टंट्या मामा के नाम से भी बुलाया जाता था। उल्लेखनीय है कि टंट्या भील की गिरफ्तारी की खबर न्यूयॉर्क टाइम्स के 10 नवंबर 1889 के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। इस समाचार में उन्हें ‘भारत के रॉबिन हुड’ के रूप में वर्णित किया गया था।
इतिहासकारों के अनुसार खंडवा जिले की पंधाना तहसील के बडदा में सन् 1842 के करीब भाऊसिंह के यहां टंट्या का जन्म हुआ था। कहते हैं कि टंट्या का मतलब झगड़ा या संघर्ष होता है और टंट्या के पिता ने उन्हें ये नाम दिया था, क्योंकि वे आदिवासी समाज पर हो रहे जुल्म का बदला लेने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। बचपन में ही तीर कमान, लाठी और गोफल चलाने में पारंगत हो चुके टंट्या ने जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही जमींदारी प्रथा के खिलाफ अंग्रेजों से लोहा लेना शुरु कर दिया था। इंडियन रॉबिनहुड टंट्या भील, जिन्होंने अंग्रजों के छक्के छुड़ा दिए थे। सन् 1870 से 1880 के दशक में तब के मध्य प्रांत और बंबई प्रेसीडेंसी में टंट्या भील ने 1700 गांवों में अंग्रेजों के खिलाफ समानांतर सरकार चलाई थी। तब महान क्रांतिकारी तात्या टोपे ने टंट्या से प्रभावित होकर उन्हें छापामार शैली में हमला बोलने की गौरिल्ला युद्धकला सिखाई थी। इसके बाद टंट्या ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। जनश्रुति के अनुसार मान्यता थी कि मामा टंट्या के राज में कोई आदिवासी भूखा नहीं सो सकता। टंट्या से मुंह की खा रहे अंग्रेजों को टंट्या से लडऩे के लिए ब्रिटिश सेना की खास टुकड़ी भारत बुलानी पड़ी थी। हालांकि टंट्या को ब्रिटिश सेना ने धोखे से गिरफ्तार कर लिया था।
इतिहासकारों के अनुसार 11 अगस्त सन् 1889 को रक्षाबंधन के दिन जब टंट्या अपनी मुंहबोली बहन से मिलने पहुंचे थे तो उसके पति गणपतसिंह ने मुखबिरी कर उन्हें पकड़वा दिया था। जबलपुर में अंग्रेजी सेशन कोर्ट ने 19 अक्टूबर को टंट्या को फांसी की सजा सुना दी थी। उन्हें 4 दिसम्बर 1889 को फांसी दी गई। ब्रिटिश सरकार भील विद्रोह के टूटने से डरी हुई थी। आमतौर पर यह माना जाता है कि उसे फांसी के बाद इंदौर के पास खंडवा रेल मार्ग पर पातालपानी रेलवे स्टेशन के पास फेंक दिया गया था। जिस स्थान पर उनके लकड़ी के पुतले रखे गए थे, वह स्थान तांत्या मामा की समाधि मानी जाती है। आज भी सभी ट्रेन टंट्या मामा के सम्मान में ट्रेन को एक पल के लिए रोक देते हैं।
ऐसे वीर जवानों के लिए कृतज्ञ मध्यप्रदेश उनकी यादों को चिरस्थायी बनाने के लिए प्रयासरत है। इस सिलसिले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को घोषणा की है कि इंदौर में पातालपानी रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर टंट्या भील के नाम पर रखा जाएगा। साथ ही इंदौर बस स्टैंड का नाम टंट्या मामा के नाम पर रखा जाएगा। यह पहल इस मायने में महत्वपूर्ण है कि हर आयु वर्ग के लोगों को यह स्मरण आता रहे कि हमें आजादी दिलाने के लिए ऐसे महान योद्धाओं ने अपने जीवन का उत्र्सग किया। टंट्या मामा जैसे सभी वीर योद्धाओं को हम नमन करते हैं।
शनिवार, 23 अप्रैल 2022
खादी और गांधी पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो रहे हैं-रघु ठाकुर
भोपाल। ‘खादी केवल वस्त्र नहीं बल्कि वह अनेक आयामों से जुड़ा हुआ है. जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा है, वैसे वैसे खादी और गांधी अधिक प्रासंगिक होते जा रहे हैं. यह बात श्री रघु ठाकुर आज स्वराज भवन में शोध पत्रिका समागम द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में कही. उन्होंने कहा कि खादी की ताकत थी कि अंग्रेजों को नतमस्तक होना पड़ा. स्वाधीनता संग्राम में खादी की भूमिका विषय पर उनका कहना था कि खादी के उत्पादन एवं उपयोग को बढ़ावा देकर गांधीजी ने अंग्रेजों को आर्थिक नुकसान पहुंचाया था. इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश£ेषक श्री गिरिजाशंकर ने कहा कि आज बाजार में उत्पाद बेचते समय इस बात पर जोर दिया जाता है कि यह घर का बना है. अर्थात मशीनों के उत्पाद से किनारा किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि खादी और गांधी सदैव प्रासंगिक बने रहेंगे. इस अवसर पर इतिहास लेखक श्री घनश्याम सक्सेना ने अपने पुराने दिनों का स्मरण किया कि कैसे उनका खादी और गांधी से परिचय हुआ. उन्होंने खादी के अर्थशास्त्र को समझाते हुए अनेक किताबों का उल्लेख भी किया. संगोष्ठी में ‘समागम’ का खादी पर एकाग्र अंक का लोकार्पण अतिथि वक्ताओं ने किया।
राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे सत्र में स्वदेशी विचार, खादी संस्कार पर रोजगार निर्माण के संपादक श्री पुष्पेन्द्रपाल सिंह ने कहा कि खादी का संबंध अर्थ, मानवता, पर्यावरण एवं आत्मनिर्भरता से जुड़ा हुआ है. उन्होंने कहा कि विषमता के खिलाफ खादी एक सूत्र की तरह गांधी जी हमें दे गए हैं. इस अवसर प्रो. दिवाकर शुक्ला ने खादी के संदर्भ में अपने बचपन को याद करते हुए कहा कि एक बार उन्हें गांधीजी पर निबंध लिखना था. इस बारे में अपने ताऊजी श्रीलाल शुक्ल से मदद चाही तो उन्होंने एक सवाल के साथ गांव वालों से चर्चा करने भेज दिया. इस बातचीत के निष्कर्ष से जो तैयार हुआ, वह स्वदेशी अवधारणा को पुष्ट करता है. कार्यक्रम का संचालन देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर की मीडिया विभाग की प्रमुख डॉ. सोनाली नरगुंदे ने किया. आभार प्रदर्शन संपादक मनोज कुमार ने किया.
शनिवार, 16 अप्रैल 2022
खादी पर राष्ट्रीय संगोष्ठी 23 को आयोजित
सोमवार, 7 फ़रवरी 2022
शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक लताजी को समर्पित
शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक लताजी को समर्पित
लताजी पर कुछ लिखना सूरज को दीया दिखाने जैसा है. एक आवाज जिन्हें हम सालों से गाते रहे हैं और सदियों तक गुनगुनाते रहेंगे. दुख इस बात का है कि शोध पत्रिका ‘समागम’ अपने 22वें वर्ष का प्रथम अंक सिनेमा पर केन्द्रित कर रहा था लेकिन लताजी को समर्पित करते हुए हम मर्माहत हैं. प्रकृति के आगे हम नतमस्तक हैं. एक पुष्प के रूप में लताजी के श्रीचरणों में शोध पत्रिका ‘समागम’ का अंक समर्पित है.
रविवार, 6 फ़रवरी 2022
6 फरवरी, लता और प्रदीप यादों का सिलसिला
मनोज कुमार
संगीत के दुनिया के कवि प्रदीप और लताजी दो ऐसे सितारे हैं जो कभी अस्त नहीं होते हैं। 6 फरवरी भारतीय संगीत की दुनिया में बेमिसाल तारीख के रूप में याद किया जाएगा। यह तारीख 2022 के पहले अमर गीतकार प्रदीप के नाम पर था जो आज के दिन ही जन्मे थे तो यह तारीख हर साल मन को पीड़ा देती रहेगी कि इस दिन लताजी हमसे जुदा हुई थी। ‘ऐ मेरे वतन के लोगों.. जरा आंख में भर लो पानी...’ प्रदीप की अमर रचना थी तो लताजी की आवाज ने उसे चिरस्थायी बना दिया था। आज हमारे बीच ना प्रदीप रहे और ना लता जी लेकिन हर पल वे हमारे बीच बने रहेंगे। खैर, अब उन बातों का स्मरण करते हैं जिन्होंंने ‘लतिका’ से लता बनी।
लता मंगेशकर के बारे में इतना कुछ लिखा गया, बोला गया और सुना गया कि अब कुछ शेष नहीं रह जाता है। संगीत की दुनिया से इतर लताजी अपने पीछे जो अपनों के लिए अपनापन छोड़ गईं हैं, उन पर लिखना शेष है। लता जी का बचपन किन संकटों से गुजरा और कैसे उन्होंने यह मुकाम पाया, इसकी कहानी भी अनवरत लिखी गई है लेकिन लोगों को यह बात शायद याद में ना हो कि लता ने जिस शिद्दत के साथ अपनी हर सांस संगीत को समर्पित कर दिया था, उसी शिद्दत के साथ अपने जीवन का हर पल अपने परिवार को समर्पित कर दिया था। लताजी के स्वर को लेकर हम अभिमान से भर जाते हैं तो एक सबक वे हमें यह भी सिखाती हैं कि परिवार के लिए क्या कुछ करना पड़ता है। गायक संगीतकार पिता दीनानाथ मंगेश्कर के निधन के बाद घर की बड़ी होने के नाते उन पर पूरे परिवार की जवाबदारी थी। छोटी उम्र में उन्होंने इस जिम्मेदारी को अपने सिर पर लेकर पूरा करने में जीवन खपा दिया।
लता देश की आवाज थीं, यह सबको मालूम है लेकिन उनका सफर कितना कठिन था, यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा। कामयाब शख्स के गीत सभी गाते हैं लेकिन उनके संघर्षों की कहानी उनकी अपनी होती है। एक नामालूम सी गायिका के रास्ते में अनेक रोड़े आए। उनके आत्मविश्वास को डिगाने और हिलाने के लिए भी कोशिशें होती रही लेकिन लता चट्टान सी खड़ी रहीं। आरंभिक दिनों में नकराने और खारिज करने का दंश भी लता को झेलना पड़ा था लेकिन धुन की पक्की लता धुनी बनकर संगीत की दुनिया में अमर आवाज बन गईं और वे हमेशा देश की आवाज बनी रहेंगी।
साल 1929 के सितम्बर माह की 28 तारीख को गायक-संगीतकार के घर पैदा हुई बड़ी बेटी हेमा। हेमा से लता बन जाने की कहानी भी रोचक है। मराठी ड्रामा कंपनी के संचालक दीनानाथ मराठी नाटक ‘भाव बंधन’ में लतिका नामक किरदार से प्रभावित होकर हेमा का नाम बदलकर लता कर दिया। इसी लता को शायद अपने पिता से भय था और कहीं आत्मविश्वास की कमी के चलते वह पांच वर्ष तक अपने पिता के सामने गाने छिपती रही लेकिन एक दिन पिता के कानों में लता का मधुर स्वर मिसरी की तरह घुल गया। उन्होंने तय कर लिया कि कल से मैं लता को गायन सिखाऊंगा। कहते हैं कि लता सिर्फ दो दिनों के लिए स्कूल गईं लेकिन संगीत की सम्पूर्ण शिक्षा घर पर ही हुई। लता ने अपना पहला गाना 16 दिसम्बर, 1941 को रेडियो प्रोग्राम के लिए रिकार्ड किया। करीब 4 महीने बाद पिता का देहांत 24 अप्रेल, 1942 को हो गया। इसके साथ ही लता एकाएक बड़ी हो गईं। परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। साथ में तीन बहनें और एक भाई के साथ मां की जवाबदारी। हालांकि इस बीच उनके लिए रिश्ते आने लगे थे लेकिन कम उम्र में सयानी हो चुकी लता ने रिश्ते से इंकार कर दिया क्योंकि ऐसा नहीं करती तो परिवार की देखभाल कौन करता। फिर तो जिंदगी का पूरा सफर उन्होंने अकेले तय किया। घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए फिल्म में अभिनय करने लगी लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हो गया कि वे अभिनय के लिए नहीं बनी हैं।
25 रुपये का मानदेय लताजी के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी थी जो उन्हेंं स्टेज पर गाने के एवज में पहली बार मिला था। मराठी फिल्म ‘पहली मंगलागौर’ में 13 वर्ष की उम्र में पहली दफा गाना गाया। जूझते हुए अपना मुकाम बनाते हुए लता के जीवन के 18वें वर्ष में एक नया मोड़ आता है जब गुलाम हैदर साहब उनकी आवाज से प्रभावित होकर शशधर मुखर्जी से मिलवाते हैं लेकिन मुखर्जी ने लता की आवाज को पतली कहकर खारिज कर दिया। यह और बात है कि हैदर साहब ने ‘मास्टरजी’ में लता को पहला ब्रेक दिया। यह भी सुख लता के हिस्से में आया जब शशधर मुखर्जी ने अपनी गलती मानकर अनारकली और जिद्दी जैसे फिल्मों में अवसर दिया। मास्टर गुलाम हैदर एक तरह से फिल्म इंडस्ट्री में लता के गॉडफादर बने। हैदर साहब ने सिखाया हिन्दी-उर्दू सीखो और हमेशा फील कर गाओ तो अनिल बिस्वास ने सांस कब लेना और कैसे छोडऩा है।
यह बात आम है कि लता, दिलीप कुमार को अपना भाई मानती थी लेकिन इसके पहले का एक किस्सा। लोकल टे्रन में सफर करते हुए दिलाप कुमार ने लता से पूछा था कि मराठी हो क्या? इस बात से उन्हें ठेस पहुंची और वे एक मौलाना से बकायदा उर्दू की तालीम हासिल की। अपने उसूलों की पक्की लता द्विअर्थी गाना गाने से परहेज किया। अनेक मौके ऐसे आये जब गीतकार को गीत के बोल बदलने पड़े तो कई बार उन्होंने गाने से मना कर दिया। राजकपूर जैसे को फिल्म संगम का गाना ‘मैं का करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया’ गाने के लिए घंटों मिन्नत करनी पड़ी। हालांकि राजकपूर के आग्रह पर गाया तो सही लेकिन कहा कि इसे मैंने मन से नहीं गाया।
लता की शोहरत उनके जान की दुश्मन बन गई थी। 33 वर्ष की उम्र में उन्हें धीमा जहर दिया गया लेकिन आत्मविश्वासी लता अपनों के सहारे उठ खड़ी हुईं। हालांकि यह झूठ फैलाया गया कि वे अभी कभी गाना नहीं गा पाएंगी लेकिन डॉक्टरों ने ऐसा कभी नहीं कहा था। लताजी ने खुद इस बात का खुलासा करते हुए कहा था कि यह कृत्य करने वाला कौन था, पता चल गया था लेकिन सबूत के अभाव में कोई कार्यवाही नहीं कर पाए। यह वह दौर था जब मजरूह सुल्तानपुरी लता का दिल बहलाने के लिए शाम को उनके पास जाकर कविता सुनाया करते थे। इस जानलेवा आफत से मुक्त होने के बाद लताजी ने पहला गाना रिकार्ड किया-‘कहीं दीप जले और कहीं दिल...’
हेमा से लता बन जाने वाली लता हमेशा से भारतीय सभ्यता और संस्कृति की संवाहक बनी रही। उन्होंने अपने जीवनकाल में हजारों गीत गाये लेकिन एकमात्र विज्ञापन किया। उनकी प्रतिष्ठा संगीत की देवी के रूप में रही। यह संयोग देखिये कि ज्ञान की देवी मां सरस्वती की आराधना कर इस फानी दुनिया को उन्होंने अलविदा कहा। लता गीत गाती थीं, उनका गीत पूरा जमाना गाएगा। कवि प्रदीप के गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को सुनकर पंडित जवाहरलाल नेहरू उठकर खड़े हो गए थे और उन्होंने लता से कहा था-तुमने मुझे रूला दिया। आज यही गीत राष्ट्र की धरोहर बन चुका है।
लता मंगेशकर भारत रत्न हैं और यह सम्मान देकर भारत स्वयं को गौरवांवित महसूस होता है। भौतिक रूप से हम भरे मन से लताजी को अलविदा कह रहे हैं लेकिन जब तक सूरज चांद रहेगा, लता तेरा नाम रहेगा जैसे शब्द भी छोटे लगते हैं लेकिन कयामत तक लता को भुल पाना नामुमकिन होगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)
लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता
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