शुक्रवार, 2 जून 2023

वो अढाई साल और भोपाल का गौरव दिवस

मनोज कुमार

       15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश आजाद हवा में सांस ले रहा था तब भोपाल की धडक़न थरथरा रही थी. भोपाल के वाशिंदों को एक-दो दिन नहीं, पूरे अढाई साल आजाद हवा में सांस लेने के लिए इंतजार करना पड़ा था. आखिर एक लम्बे इंतजार के बाद हौले से आजादी ने भोपाल के दरवाजे पर दस्तक दी. ये अढाई साल भोपालियों के लिए संघर्ष के उन दिनों से ज्यादा भारी थे जो उन्होंने फिरंगियों से लिये थे. इस बार लड़ाई घर में थी. वह तो भला हो उस लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का जिन्होंने उन नापाक मंसूबों को धराशायी कर दिया. वे ऐसा नहीं करते तो आज भोपाल, भोपाल नजर नहीं आता और गौरव दिवस तो छोडिय़े, मेरा भोपाल कहने लायक भी नहीं रहते . आज भोपाल का गौरव दिवस मनाते समय उस घाव का दर्द महसूस करना इसलिए जरूरी हो जाता है कि हमारी नयी पीढ़ी जान सके कि गौरव ऐसे ही नहीं पाया जाता है. 1947 में ब्रिटिश हुकूमत से देश को भले ही आजादी मिली हो, लेकिन, भोपाल के लोगों ढाई साल तक गुलाम ही महसूस करते रहे। 15 अगस्त 1947 के बाद भी यहां नबावों का शासन था। इसके लिए ढाई साल तक संघर्ष हुआ। खास बात यह भी है कि तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की सख्ती के बाद 1 जून 1949 को भोपाल रियासत का विलय भारत में हो गया।

15 अगस्त, 1947 को तब भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्लाह थे। अंग्रेजों के खास नवाब हमीदुल्लाह भारत में विलय के पक्ष में नहीं थे क्योंकि वे भोपाल पर शासन करना चाहते थे। जब भारत को आजाद करने का फैसला किया गया उस समय यह निर्णय भी लिया गया कि पूरे देश में से राजकीय शासन हटा लिया जाएगा।  मौजूदा तथ्य बताते हैं कि जब पाकिस्तान बनाने पर निर्णय हुआ और जिन्ना ने हिन्दुस्तान के सभी मुस्लिम शासकों को भी पाकिस्तान का हिस्सा बनाने का प्रस्ताव दिया। जिन्ना के करीबी होने के कारण भोपाल नवाब को पाकिस्तान में सेक्र्रेटरी जनरल का पद सौंपने की बात की गई। ऐसे में हमीदुल्लाह ने अपनी बेटी आबिदा को भोपाल का शासन बनाकर रियासत संभालने को कहा, लेकिन इंकार कर दिया गया। अंतत: हमीदुल्लाह भोपाल में ही रहे और भोपाल को अपने अधीन बनाए रखने के लिए भारत सरकार के खिलाफ खड़े हो गए। देश आजाद हो चुका था, हर मोर्चों पर भारतीय ध्वज लहराया जाता था लेकिन, भोपाल में इसकी आजादी किसी को नहीं थी। दो साल तक ऐसी स्थिति रही। तब भोपाल के नवाब भारत सरकार के किसी कार्यक्रम में शिरकत नहीं करते थे और आजादी के जश्न में भी नहीं जाते थे।

सरदार पटेल जैसे कडक़ मिजाज वाले होम मिनिस्टर नहीं होते तब शायद संभव था कि भोपाल पाकिस्तान का हिस्सा बन चुका होता. इधर मार्च 1948 में भोपाल नवाब हमीदुल्लाह ने रियासत को स्वतंत्र रहने की घोषणा कर दी। मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का एक मंत्रिमंडल घोषित कर दिया। प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय बनाए गए थे। इसी दौर में भोपाल रियासत में विलीनीकरण के लिए विद्रोह शुरू हो चुका था। भोपाल में चल रहे बवाल पर आजाद भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सख्त रवैया अपना लिया। पटेल ने नवाब के पास संदेश भेजा कि भोपाल स्वतंत्र नहीं रह सकता है। भोपाल को मध्यभारत का हिस्सा बनना ही होगा। 29 जनवरी 1949 को नवाब ने मंत्रिमंडल को बर्खास्त करते हुए सत्ता के सभी अधिकार अपने हाथ में ले लिए। इसके बाद भोपाल के अंदर ही विलीनीकरण के लिए विरोध-प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया। तीन माह तक जमकर आंदोलन हुआ।

होम मिनिस्ट पटेल के कड़े रूख के आगे नवाब हमीदुल्ला को अपनी जिद छोडक़र 30 अप्रैल 1949 को विलीनीकरण के पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद भोपाल रियासत 1 जून 1949 को भारत का हिस्सा बन गई। केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त चीफ कमिश्नर एनबी बैनर्जी ने भोपाल का कार्यभार संभाला और नवाब को 11 लाख सालाना का प्रिवीपर्स तय कर सत्ता के सभी अधिकार उनसे ले लिए। उल्लेखनीय है कि भारत सन् 1947 को स्वाधीन हो गया था किन्तु मध्यप्रदेश के 2 जिले रायसेन एवं सीहोर भोपाल नवाब हमीदुल्ला के गुलाम थे। इसी गुलामी को समाप्त करने हेतु तत्कालीन रियासत भोपाल के नागरिकों ने जो आंदोलन चलाया था उसे इतिहास में भोपाल विलीनीकरण आंदोलन के नाम से जाना जाता है।

भोपाल विलीनीकरण आंदोलन भी इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. हमीदुल्लाह ने भारत सरकार के साथ बातचीत करते हुए भोपाल को अलग स्वतंत्र राज्य घोषित करने पैरवी की थी. असल में, भोपाल एक मुस्लिम नवाबी स्टेट था लेकिन वहां आबादी हिंदू बहुल थी. नवाब के अलग रहने की इच्छा बने रहने की खबर के बाद दिसंबर 1948 में भोपाल में  जनआंदोलन शुरू हुआ, जब नवाब हज के लिए गए हुए थे. शंकरदयाल शर्मा, भाई रतन कुमार गुप्ता जैसे नेताओं के नेतृत्व में भोपाल के भारत में विलय के लिए ‘विलीनीकरण आंदोलन’ शुरू हुआ. आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा तो नवाबी व्यवस्था ने इसे कुचलने की कोशिश भी की. कुछ आंदोलनकारी शहीद हुए तो शर्मा जैसे कुछ नेताओं को कई महीनों के लिए जेल में रहना पड़ा. आंदोलन जनक्रांति का रूप धारण कर उग्र हो गया। नबाबी कार्यालयों पर तिरंगा फहराना एवं वंदे मातरम् गान पर गिरफ्तारी, लाठी चार्ज किया जाता था। 

भोपाल विलीनीकरण आंदोलन 14 जनवरी 1949 को मकर संक्रांति मेले में क्षेत्र के नवयुवकों का उत्साह चरम पर था। नर्मदा किनारे बोरास घाट पर मेला भरा हुआ था कि बीच मेले में भोपाल नवाव के खिलाफ विलीनीकरण आंदोलन के नवयुवकों द्वारा झंडा वंदन एवं सभा का आयोजन किया गया। झंडा वंदन होने के बाद स्व. बैजनाथ गुप्ता बिजली बाबा ने झंडा वंदन गीत गाया। जाफर अली ने सभास्थल पहुंचकर झंडा उतारने एवं सभा बंद करने चेतावनी दी। इस चेतावनी से बेपरवाह 16 साल के छोटेलाल आगे आए और बोला गोली का क्या डर बताता है? तभी थानेदार ने गोली चलाने का आदेश दे दिया। इस गोली से  छोटेलाल शहीद हो गए। सुल्तानगंज निवासी 25 वर्षीय वीर धनसिंह राजपूत ने थाम लिया, किन्तु अगली गोली धनसिंह के सीने में समा गई। तीसरे शहीद हुए 30 वर्षीय मंगल सिंह, 3 नवयुवकों के शहीद होने के बाबजूद झंडे नीचे नहीं गिरे। चौथे नवयुवक ग्राम भुआरा निवासी विशाल सिंह ने थाम लिया परन्तु गोली चलना जारी था। विशाल सिंह के सीने में 2 गोलियां लगी परन्तु उसने भी झंडा नहीं छोड़ा। पुलिस कू्ररता पर उतर आई संगीन उसके पेट में उमेठ दी गई किन्तु विशाल सिंह ने झंडा झुकने नहीं दिया. झंडे की शान को कायम रखते हुए विशाल नर्मदा के जल तक ले गए और गड़ा दिया और हर नर्मदे कह कर अंतिम सांस ली। भोपाल की आजादी में जिन नायकों ने अपना सर्वस्व स्वाहा कर दिया प्रो. अक्षय कुमार जैन, रामचरण राय, शंकरदयाल शर्मा, उद्धवदास मेहता, रतन दास गुप्ता, प्रेमनारायण श्रीवास्तव, बाल कृष्ण गुप्ता, ठाकुर लाल सिंह, शांति देवी, मोहिनी देवी, मथुरा बाबू आदि शामिल थे। दमन की कार्यवाही के बाद भी विलीनीकरण आंदोलन तेज होता गया। उस दौर में 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता सेनानियों ने जुमेराती उप डाकघर पर तिरंगा फहराया था।

भोपाल गौरव दिवस अपने होने को सार्थक कर रहा है. यह बताने का माकूल वक्त है कि आजादी के परवानों ने कैसी-कैसी आहूति दी है तब जाकर हम आजाद हैं. अंग्रेजों की कू्ररता के सामने सिर ना झुकाने वाले नायकों ने कू्रर और बेरहम नवाब को भी झुकने के लिए मजबूर कर दिया. ऐसा है मेरा भोपाल और हम हैं भोपाली.

रविवार, 14 मई 2023

यह शिवराजसिंह का मध्यप्रदेश है साहेब

  कुमार

जीत हमेशा सकुन देती है. यह जीत व्यक्ति की हो या संस्था की और बात जब राजनीति की हो तो यह और भी अर्थपूर्ण हो जाता है. कांग्रेस की कर्नाटक में बम्पर जीत से कांग्रेसजनों का उल्लासित होना लाजिमी है. यह इसलिए भी कि लगातार पराजय के कारण कांग्रेस पार्टी के भीतर निराशा पनपने लगी थी और यह माहौल बनाया जा रहा था कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पराभव के दौर से गुजर रही है. राजनीति में यह सब होना कोई अनोखा नहीं है. कल हम शीर्ष पर थे तो आज वो हैं और कल कोई होगा. ये पब्लिक है सब जानती है कि बात यहीं चरितार्थ होती है. कांग्रेस के खुश होने के अपने कारण हैं तो भाजपा को स्वयं की समीक्षा करने के लिए एक अवसर है. आने वाले समय में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और इन राज्यों में भाजपा की परीक्षा होगी तो कांग्रेस को भी इम्तहान से गुजरना होगा. एक जीत के बाद जश्र में डूब जाना कांग्रेस के लिए कतई हितकारी नहीं होगा. कांग्रेस के लिए कर्नाटक एक अवसर बनकर आया है और इस अवसर को आगे उसे भुनाने के लिए स्वयं को तैयार करना होगा. कांग्रेस की कर्नाटक में बड़ी जीत के बाद यह माहौल बनाया जा रहा है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी जीत मिल सकती है और भाजपा पीछे रह जाएगी. लेकिन ऐसा हो पाएगा, या नहीं, यह भविष्य के गर्भ में है. इस बात को भी समझना होगा कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे हिन्दी प्रदेश कर्नाटक नहीं हैं। इन राज्यों की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग है इसलिए यह मानकर चलना कि कर्नाटक जैसा परिणाम इन राज्यों में कांग्रेस के लिए होगा, अभी जल्दबाजी होगी.

जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव निकट भविष्य में होना है, वहां भाजपा समीक्षा करेगी और लगभग शेष छह माह की अवधि में स्वयं को तैयार कर इन राज्यों में अपनी सरकार बनाने या बचाने का प्रयास पुरजोर ढंग से करेगी. कांग्रेसशासित राजस्थान एवं छत्तीगसगढ़ में जिस तरह की गुटबाजी कांग्रेस में है, वह जगजाहिर है. मुख्यमंत्री गहलोत के लिए सचिन पायलट रोज एक मुसीबत लेकर सामने आ रहे हैं तो छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल वर्सेस सिंहदेव की खटास भी किसी से छिपा हुआ नहीं है. मध्यप्रदेश में सरकार तो कांग्रेस की बन गई थी लेकिन आपसी रार के चलते एक बड़ा गुट भाजपा के साथ होकर सरकार गिराने में कामयाब रही. यही नहीं, कांग्रेस छोडक़र भाजपा का दामन थामने वाले बागी नेताओं में अधिकांश ने उपचुनाव में वापस जीत दर्ज की. इस तरह से कांगे्रस को अभी आत्ममंथन की जरूरत है कि कैसे इन राज्यों में सत्ता में वापसी हो. हालांकि भाजपा में सब ठीक है, यह कहना भी गलत है। यहां भी असंतोष उभार पर है। वैसे भी राजनीति में महत्वकांक्षा पालना गलत नहीं है लेकिन योग्यता और भाग्य ही साथ देते हैं और इस पैमाने पर फिलवक्त शिवराज सिंह का कोई विकल्प नहीं है। 

मध्यप्रदेश में भी विधानसभा चुनाव इस साल के आखिर में होना है और यह राज्य कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती है. चुनौती कांग्रेस के लिए स्वयं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान हैं. चौहान उन बिरले नेताओं में हैं जिनकी पकड़ जमीनी तौर पर पक्की है. आम आदमी के साथ उनका अपनापन का रिश्ता उस जमीन को मजबूत करता है जिसकी आम आदमी को चाहत होती है. थोड़ा अंतराल छोड़ दें तो करीब-करीब 20 वर्षों से सत्ता पर काबिज शिवराजसिंह चौहान बहनों के लिए भाई, बेटा-बेटियों के लिए मामा तो बुर्जुर्गों के लिए श्रवण कुमार बने हुए हैं. आम आदमी के बीच शिवराजसिंह चौहान ने अपनी जो छवि बनायी है, उसका तोड़ भाजपा के भीतर भी नहीं है, कांग्रेस तो दूर है ही. आपदा को अवसर में बदलने का मंत्र शिवराजसिंह को बखूबी आता है. वे किसी भी अवसर पर चूकते नहीं हैं. यही कारण है कि बार-बार उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के कयास लगाये जाते रहे और अब राजनीतिक गलियारों में इस कयास पर भी पूर्ण विराम लग गया है. यह अकारण नहीं है क्योंकि लोकप्रियता की दृष्टि से देखें तो शिवराजसिंह के बराबर इस समय प्रदेश में किसी भी दल में कोई लीडर नहीं दिखता है.

शिवराजसिंह इतने लोकप्रिय क्यों हैं, यह जानने की कोशिश करेंगे तो एक पंक्ति में जवाब मिलेगा कि गैरों को भी अपना बनाने की अदा. पिछले बीस वर्षों में उन्होंने जनकल्याण की इतनी जमीनी योजनाएं लागू की कि उनका कोई तोड़ किसी के पास नहीं है. अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने बेटियों को सक्षम बनाने के लिए लाडली लक्ष्मी योजना का श्रीगणेश किया. बच्चियों की शिक्षा पर पूरा ध्यान आकर्षित किया और किताबों से लेकर स्कूल जाने तक के लिए सायकल का इंतजाम कर उनकी शिक्षा की गारंटी ली. अब शहरी बच्चों को स्कूटी दिला रहे हैं. यह योजना इतना पापुलर हुई कि वे सहज रूप से घर-घर के मामा बन गए. कोई उन्हें मुख्यमंत्री या राजनेता के रूप में नहीं देखता है बल्कि वे परिवार के मुखिया के रूप में चिहिंत किये गए. 

ओला-पाला के बीच रोते-बिसूरते किसानों के साथ खेतों में बैठकर उनका दुख बांटते रहे. दिलासा देते रहे और उनकी जिम्मेदारी अपने हिस्से लेकर उन्हें राहत दिलाने का पूरा प्रयास किया. यहां तक कि ऐसे किसानों की बेटियों के ब्याह का जिम्मा भी सरकार ने लिया. प्रदेश के उन हजारों-हजार परिवारों के लिए वे एक नेमत की तरह मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना लेकर आए. आर्थिक और शारीरिक रूप से अशक्त वृद्धजनों को तीर्थ यात्रा पर लेकर निकल पड़े. सबसे बड़ी बात यह कि इस तीर्थदर्शन में सभी वर्ग के लोग शामिल किये गए. सर्वधर्म, समभाव की उनका यह दर्शन लोगों के दिलों तक पहुंच गया. वृद्धावस्था पेंशन का मामला हो या बच्चों के इलाज के लिए इंतजाम करना, कोई कटौती नहीं की गई. कोविड-19 के दौरान मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने जो सक्रियता दिखाकर लोगों की जिंदगी बचाने में जुटे रहे. गरीब और असमर्थ लोगों को आयुष्मान योजना के तहत पूरा लाभ दिलाया और निजी अस्पतालों के खिलाफ कड़े कदम उठाने से भी नहीं चूके. मंडला से झाबुआ तक, कब और कहां शिवराजसिंह पहुंच जाएं, किसी को खबर नहीं होती है. लोगों से चर्चा करना, संवाद करना और उनकी जरूरतों को जानकर उनकी जरूरत के अनुरूप योजना को मूर्तरूप देने की जो उनकी कोशिश होती है, उन्हें एक अलग रूप में खड़ा करती है.

हालिया लाड़ली बहना स्कीम ने तो मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को एक अलग किस्म की ऊंचाई दी है. प्रत्येक महिला को प्रत्येक माह एक हजार रुपये दिए जाएंगे जिससे वे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सकें. पेंशन पाने वाली माताओं को अलग करने के बजाय इसमें जोडक़र उनका भी आशीष पा रहे हैं. उनके विरोधियों केे लिए लाडली बहना स्कीम पॉलिटिकल गिमिक हो सकता है लेकिन जो लाभ लेने की स्थिति में हैं, वे इसे अपने भाई शिवराजसिंह से मिलने वाली सुरक्षा मान रही हैं. अगले महीने जब बहनों के खाते में रकम जमा होने लगेगी, तब यह अब तक कि शिवराजसिंह सरकार की सबसे बड़ी लोकप्रिय योजना साबित होगी. शिवराजसिंह जब जनसभा में बड़े मजे में बोलते हैं कि ‘बहनों को जब एक हजार रुपया मिलेगा तो सास घी चुपड़ी रोटी खिलाएगी’. उनकी इस बात पर हरेक के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है. 

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान कभी किसी चाय के टपरे पर जाकर खड़े हो जाते हैं तो कभी किसी के कांधे पर हाथ रख देते हैं तो वह भाव-विभोर हो जाता है. उनके ही क्षेत्र में कुछ मजदूरों ने शिवराजसिंह को पहचानने से इंकार कर दिया था. तब भी शिवराजसिंह चौहान इसे हंसी हंसी में लेते हुए रवाना हो गए-चलो, भाई यहां शिवराज को नहीं पहचानते हैं. यही मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की विनम्रता है. यही उनकी पूंजी है जो राजनीतिक फलक से बाहर है. कल्पना कीजिए, यहीं पर उनके स्थान पर  कोई और राजनेता होता तो शायद इन मजदूरों पर कहर टूट पड़ता. सौम्य, मृदुभाषी और संयत भाषा के साथ विरोधियों का सम्मान करने वाले शिवराजसिंह चौहान अजेय हैं. 

निकट भविष्य के चुनाव में जीत हासिल करने के लिए एक विनम्र और मिलनसार शिवराजसिंह चाहिए. मतदाता भाजपा को अपना वोट दे या ना दे लेकिन शिवराजसिंह के नाम पर वोट ना मिले, इस पर सहसा भरोसा नहीं किया जा सकता है. मध्यप्रदेश की आर्थिक हालात, भ्रष्टाचार और ऐसे जनमुद्दों पर राज्य सरकार को घेरा जा सकता है लेकिन स्पष्ट है कि विधानसभा चुनाव में किसी भी दल के लिए शिवराजसिंह के स्तर पर मुकाबला आसान नहीं है. यह मध्यप्रदेश का दिल है और राज्य की जनता के दिलों में शिवराजसिंह राज करते हैं, मध्यप्रदेश की सत्ता पर नहीं. 

कर्नाटक में विजय के पहले हिमाचल में जीत और नेता राहुल गांधी की अथक मेहनत के बाद कांग्रेस का आत्मविश्वास लौटा है और एक मजबूत लोकतंत्र के लिए यह जरूरी भी है. किन्तु इस बात का भी खास खयाल रखना होगा कि मध्यप्रदेश हो, छत्तीसगढ़ हो या राजस्थान, सबकी आबो-हवा एक सी नहीं है. इसलिए जीत का सेहरा पहनने के लिए उत्सव नहीं, आत्ममंथन की जरूरत इस समय अधिक है. भाजपा को भी सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि छत्तीसगढ़ में साय और मध्यप्रदेश में दीपक जोशी का कांग्रेस में जाना चिंता में तो डालता है। कौन जीतेगा और कौन हारेगा, यह तो समय के गर्भ में है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

गुरुवार, 30 मार्च 2023

आह! इंदौर, वाह...इंदौरी


मनोज कुमार
इंदौर में मौत की बावड़ी से धडक़न टूटने की गिनती हो रही है। सबके अपने सूत्र, सबके अपने आंकड़ेें। पलकें नम हो गई हैं। हर कोई इस विपदा से दुखी और बेबस है। खबरों की फेहरिस्त है। कोई शासन-प्रशासन को गरियाने में लगा है तो कोई इस बात की तह तक जाने की जल्दबाजी में है कि हादसा हुआ कैसे? सब खबरों और हेडलाइंस तक अपने आपको सीमित रखे हुए हैं। इस हादसे में अगर प्रशासन नाकाम है तो यह कौन सी नयी बात है? राजनेता हादसे को भुनाने में लग गए तो इसमें हैरानी कैसी? यह ना तो पहली दफा हो रहा है और ना आखिरी दफा है। प्रशासन का निकम्मापन हमेशा और हर हादसे में उजागर होता रहा है और शायद आगे भी उसका वही रवैया रहे। इसमें सयापा करने की कोई बहुत ज्यादा जरूरत नहीं है। जिंदगी को रूसवा करने और मौत को रुपयों से तौलने की रवायत भी पुरानी हो चुकी है। रुपये नम आंखों में खुशी ला सकते तो क्या बात थी कि हर रईस मौत से मालामाल हो जाता। कभी उन घरों में आज से चार-छह हफ्ते बाद जाकर पूछे और देखें उन बच्चों को जिनकी मां ने उनके सामने दम तोड़ दिया या पिता का साया सिर से उठ गया। किसी का पति चला गया तो किसी का घर सुना हो गया। थोड़े दिनों बाद जिंदगी पटरी पर आज जाएगी और फिर किसी हादसे पर यही रोना-पीटना और सांत्वना देने का सिलसिला शुरू हो जाएगा।
मौत की बावड़ी से एक शब्द मुंंह से बेसाख्ता निकलता है आह! इंदौर और इसके बाद जुबान पर आता है वाह इंदौरी। इंदौर का यह हादसा पहली बार किसी शहर में होने वाला हादसा नहीं है। अक्सर खबरों में देश के अलग-अलग शहरों और कस्बों में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण सूचना मिलती रही है लेकिन इंदौरी जो कर जाते हैं, वह इंदौर से सटे दो-पांच सौ किलोमीटर के शहर में देखने-सुनने में नहीं आया। हादसे की खबर सुनते ही पूरे शहर में सन्नाटा पसर गया। उत्सव थम गया। मौत किसी के घर में हुई हो, हर इंदौरी की आंखों में आंसू थे। किसी के कहने और बताने के पहले बाजार बंद हो गया और अगले दिन भी बाजार बंद किये जाने का ऐलान हो गया। अलग-अलग जगहों पर होने वाला जश्र स्वस्फूर्त रोक दिया गया। यह सब कुछ एक जिंदा शहर की पहचान है। इंदौरियों का दिल अपने शहर के लिए धडक़ता है। उन्हें सिखाना और बताना नहीं पड़ता कि जश्र मनाने के लिए बेखौफ लाखों की तादात में घरों से बाहर निकल पड़ते हैं तो दुख में अपने-अपने में सिमट जाना भी जानते हैं। उन्हें इस बात की फ्रिक नहीं है कि मरने वाले से उनका क्या रिश्ता था। वे तो बस एक बात जानते हैं कि मरने वाला कोई भी हो, इंदौरी था और हर इंदौरी इस शहर की पहचान था।
समूचे हिन्दुस्तान में इंदौर की पहचान अलहदा है तो इसलिये नहीं कि वह मिनी बाम्बे है। वह उद्योग का एक बड़ा किला है। इंदौर की पहचान है तो उसके इंदौरीपने से। अपने शहर के लिए यह तड़प अब बहुत कम देखने को मिलता है। इंदौर इसकी नायाब मिसाल है। कोई भी पर्व और त्योहार उत्सव की तरह मनाने वालों में इंदौरियों का कोई मुकाबला नहीं। छह बार से स्वच्छ शहर का खिताब इंदौर को शासन-प्रशासन के कारण नहीं बल्कि उन इंदौरियों के कारण मिला है जिनकी धडक़न इंदौर है। कोरोना में जब लोग घर में दुबके बैठे थे तब इंदौरी लाखों की संख्या में सडक़ पर उतर कर गेर खेल रहे थे। 2023 का इंदौरी गेर तो वल्र्ड रिकार्ड बना गया। कोरोना के चलते गेर खेलने वाले इंदौरियों ने मिलकर जैसे शहर को स्वच्छ बनाया था, इंदौर को कोरोना से लडऩे का जज्बा दिया।
इंदौरी हो जाना सरल नहीं है। इसके लिए आपके दिल में आपका अपना शहर धडक़ना चाहिए। धडक़न भी ऐसी कि हंसें तो सबके साथ और किसी के घर में दुख टूटे तो आंखें भीग जाए। इन दिनों किसी भी शहर को दो भागों में देख सकते हैं। नया शहर, पुराना शहर। नया शहर लगभग सुविधाभोगी होता है जबकि पुराना शहर उसी तर्ज पर जिंदा रहता है। नए शहर की तासीर में अपनेपन का भाव नहीं होता है जबकि पुराना शहर उसी अपनेपन में जिंदा रहता है। नए दौर में इंदौर का विकास भी खूब हुआ। शहर फैलता चला गया लेकिन नया इंदौर और पुराना इंदौर का टेग कहीं देखने-सुनने में नहीं मिला। दिल्ली से भोपाल तक आपको नया और पुराने की छाप देखने को मिल जाएगी। इंदौर तब भी एक था और आज भी एक है और हम नए और पुराने में बंट गए हैं। बंटना भौगोलिक नहीं है बल्कि मन भी बंट गया है और इंदौरियों ने ना शहर बांटा और ना मन।
पीयूष मिश्रा की पंक्ति याद हो आती है कि जो बचा है, उसे बचा लो। दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर बता दिया कि इंदौर जिंदा है और जिंदादिल लोगों का शहर है। दुख में दुखी होते हैं, यह भेद किये बिना कि हम तो सुरक्षित हैं। काश! हम सब भी अपने अंदर एक इंदौर को बसा लें। कहना तो पड़ेगा... आह! इंदौर, वाह... इंदौरी। 

रविवार, 26 मार्च 2023

मन को मन से जोड़ती ‘मन की बात’


मनोज कुमार

रेडियो अपने जन्म से विश्वसनीय रहा है. सुभाष बाबू का रेडियो आजाद हिन्द हो या आज का ऑल इंडिया रेडियो. प्रसारण की तमाम मर्यादा का पालन करते हुए जो शुचिता और सौम्यता रेडियो प्रसारण में दिखता है, वह और कहीं नहीं. मौजूं सवाल यह है कि रेडियो प्रसारण सेवा का आप कैसे उपयोग करते हैं? इस मामले में महात्मा गांधी से लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो अभिनव प्रयोग किया है, वह अलहदा है. गांधीजी ने रेडियो को शक्तिशाली माध्यम कहकर संबोधित किया था और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे चरितार्थ कर दिखाया. संचार के विभिन्न माध्यमों के साथ मोदीजी का दोस्ताना व्यवहार रहा है लेकिन रेडियो प्रसारण के साथ वे मन से जुड़ते हैं. 

मन से मन को जोडऩे का उपक्रम ‘मन की बात’ के सौ एपिसोड पूरे होने जा रहे हैं तो इसके प्रभाव को लेकर कुछ चर्चा किया जाना सामयिक है. कहने को सौ एपिसोड बहुत आसान सा लगता है लेकिन देखा जाए तो यह एक कठिन टास्क है जिसे मोदीजी जैसे व्यक्ति पूरा कर सकते थे और किया भी. ‘मन की बात’ शीर्षक को लेकर लोगों को लगने लगा कि वे अपने मन की बात कह रहे हैं लेकिन ‘मन की बात’ कार्यक्रम का कोई भी एपिसोड सुन लीजिये और विषयों की विविधता मिलेगी. एक तंत्र विकसित किया गया जो देश के अनजाने और दूर-दराज इलाकों में अपने काम से कामयाबी हासिल करने वालों से प्रधानमंत्री सीधे बात करते हैं. उनके कार्यों के बारे में जानते हैं और अपनी आपसी चर्चा के बीच उस कामयाबी के रास्ते को समझने की कोशिश करते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में देशभर से लाखों की तादाद में जुड़े श्रोताओं को ना केवल नई जानकारी मिलती है बल्कि उन्हें भी कुछ नया करने का हौसला मिलता है. इसे ही मैंने मन से मन को जोडऩे वाला कार्यक्रम ‘मन की बात’ कहा है.

शुरूआती दौर में रेडियो सामान्य दिनचर्या का एक हिस्सा बना हुआ रहता था, वहीं देश और दुनिया से जोड़े रखने का भी यही एक माध्यम था. मोबाइल का दौर आया और रेडियो बाजार से गायब हो गए. हालांकि संचार की इस दौड़ में बने रहने के लिए रेडियो बन गए अब मोबाइल रेडियो. लेकिन वर्ष 2014 के बाद मोबाइल रेडियो में बड़ा बदलाव देखा गया जब   3 अक्टूबर, 2014 को ऑल इंडिया रेडियो पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुरू किया कार्यक्रम ‘मन की बात’. कार्यक्रम की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब कुल 99 एपिसोड प्रसारित किए जा चुके हैं. इस कार्यक्रम की शुरुआत करने का मकसद भारत में एक बार फिर लोगों का ध्यान रेडियो की ओर लाना तो था ही साथ ही जनता से रेडियो के ज़रिए संवाद कर जनता के मुद्दों पर बातचीत करना भी था. इसका असर यह हुआ कि जहां जनता पहले तक खास मौकों पर ही रेडियो सुना करती थी वही नरेंद्र मोदी के मन की बात के शुरू होने के बाद तक भी जनता इस कार्यक्रम से जुडी हुई है.

‘मन की बात’ में मोदी जी अपनी मन की बात कम करते हैं और लोगों के मन की बात ज्यादा सुनते हैं. ‘मन की बात’ कार्यक्रम सुनते हुए मुझे एक छोटी सी कहानी का स्मरण हो आता है. यहां इस कहानी का उल्लेख करना समीचीन होगा. बात यूं है कि एक बंद ताला पड़ा हुआ था और उसके पास एक छोटी सी चाबी और एक भारी-भरकम हथौड़ा भी. बंद ताले को खोलने के लिए हथौड़े ने अपनी पूरी ताकत लगा दी और परास्त होकर वहीं बैठ गया. इतने में छोटी सी चाबी बंद ताले के दिल में प्रवेश किया और ताला खुल गया. भारी-भरकम हथौड़े के लिए यह रहस्य की बात थी. उसने चाबी से पूछा कि मैं इतना वजनदार होने के बाद भी ताला नहीं खोल पाया और तू इत्ती सी चाबी ताले को खोल दिया. यह कैसे हुआ? ताले की तरफ मुस्कराती हुई चाबी ने कहा कि किसी के दिल को खोलने के लिए उसके दिल में उतरना पड़ता है और वही मैंने किया. मोदी जी भी ‘मन की बात’ के जरिये चाबी की मानिंद लोगों के दिल में उतरकर उनके दिल तक पहुंच जाते हैं.

भारत जैसे महादेश में अनेक ऐसे लोग हैं जो गुमनामी का जीवन जी रहे हैं लेकिन उनका काम, उनकी सफलता की कोई चर्चा नहीं होती है. ऐसे में कोई कारीगर, कोई किसान, कोई महिला जब प्रधानमंत्री से बात करती है तो उसकी कामयाबी ना केवल सामने आती है बल्कि ये लोग और आगे बढऩे का हौसला पाते हैं. हमारे भारतीय समाज में परीक्षा प्रतिभा मूल्यांकन के स्थान पर भय का वातावरण निर्मित करता है और बच्चे फेल होने के डर से कई बार जान देने तक उतारू हो जाते हैं. इन बच्चों के भीतर साहस जगाने के लिए और परीक्षा से भयभीत ना होने का मंत्र मोदीजी देते हैं तो ज्यादतर बच्चों के भीतर का डर पूरी तरह भले ही खत्म ना हो लेकिन कम तो जरूर हो जाता है. परीक्षा देने जाने से पहले हम उस अदृश्य शक्ति से पास हो जाने की कामना करते हैं क्योंकि हमारी पीठ पर हाथ रखकर हमें हौसला देने वाला कोई नहीं होता है. समाज का कोई भी तबका इस बड़ी समस्या पर कभी कोई पहल करने की जरूरत नहीं समझा इसलिये परीक्षा का भूत हमेशा हावी रहा लेकिन ‘मन की बात’ के जरिये मोदीजी ने एक पालक की भूमिका का निर्वहन किया तो सारा का सारा मंजर ही बदल गया.

‘मन की बात’ के जरिये मोदीजी ने बड़ी ही खामोशी के साथ बाजार को बदल दिया. इसके लिए एक उदाहरण का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है. खादी हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान है लेकिन नए जमाने के साथ खादी का चलन कम से कम होता जा रहा था. ऐसे में मोदीजी ने ‘मन की बात’ के जरिये खादी अपनाने के लिए लोगों से आह्वान किया. यह यकिन करना मुश्किल होगा  लेकिन सच है कि खादी की बिक्री में जो इजाफा हुआ, वह रिकार्ड है. अब यहां इस बात को दर्ज किया जाना चाहिए कि ‘मन की बात’ में मोदीजी के मन की बात है या भारत के एक सौ तीस करोड़ लोगों के मन की बात है. 

‘मन की बात’ के जरिये ऑल इंडिया रेडियो का कायाकल्प हो गया. रेडियो के राजस्व में जितनी बढ़ोत्तरी ‘मन की बात’ कार्यक्रम के माध्यम से हुई, वह अब तक के रिकार्ड को ध्वस्त करने वाला है. पक्का-पक्का आंकड़ा देना मुनासिब नहीं है क्योंकि प्रत्येक माह होने वाले ‘मन की बात’ के जरिए रेडियो के राजस्व में बढ़ोत्तरी होती जा रही है. एक मोटा-मोटी आंकड़ें की बात करें तो मन की बात के प्रसारण शुरू होने के बाद से अब तक राजस्व में 33.16 करोड़ कमाए गए हैं जबकि प्रचार पर केवल 7.29 करोड़ खर्च किए गए थे। यह आंकड़ा 2023 के आरंभिक दिनों की है. रेडियो प्रसारण सेवा के क्षेत्र में प्रधानमंत्री द्वारा किये गए नवाचार से ना केवल रेडियो के दिन फिर गए बल्कि देश के दूर-दराज इलाकों में ‘मन की बात’ की गंूज सुनाई देनी लगी. 

सोमवार, 20 मार्च 2023

पानी पानी रे...खारे पानी रे...


 विश्व जल दिवस पर चिंता करता लेख

मनोज कुमार
दो दशक पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाने की परिकल्पना की थी तब उनकी सोच रही होगी कि इस आयोजन के बहाने दुनिया जागेगी और एक पानीदार समाज का निर्माण होगा लेकिन जब हम पलटकर देखते हैं कि आंखों से पानी उतर रहा है और गला सूखता चला जा रहा है। यह आज का सच है। हमारे समय के लेखक एवं चिंतक अनुपम मिश्र को पानीदार समाज की चिंता करते हुए हम स्मरण कर लेते हैं। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ के बहाने हम उन सुनहरे दिनों को याद कर लेते हैं लेकिन यह सब किताबी बातें रह गयी हैं। तालाब और पोखर को पाटकर बहुमंजिला इमारतें इठला रही हैं और हम बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। कहा जाता रहा है कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा लेकिन जो हालात बन रहे हैं, उसे यह प्रतीत होता है कि बिना युद्ध किये ही हमने अपने मरने की तैयारी कर ली है।
अलग-अलग स्रोतों से जो जानकारी हासिल होती है, वह ना केवल पानी के बर्बादी की कहानी कहती है बल्कि हमारे भविष्य के सामने भी सवालिया निशान खड़ा करती है। जैसे
- मुंबई में प्रतिदिन वाहन धोने में ही 50 लाख लीटर पानी खर्च हो जाता है।
- दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइप लाइनों के वॉल्व की खराबी के कारण रोज 17 से 44 प्रतिशत पानी बेकार बह जाता है।
-पानीजन्य रोगों से विश्व में हर वर्ष 22 लाख लोगों की मौत हो जाती है।
- यदि ब्रश करते समय नल खुला रह गया है, तो पाँच मिनट में करीब 25 से 30 लीटर पानी बरबाद होता है।
-  बाथ टब में नहाते समय 300 से 500 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि सामान्य रूप से नहाने में 100 से 150 पानी लीटर खर्च होता है।
- भारतीय स्त्रियां पीने के पानी के लिए रोज ही औसतन चार मील पैदल चलती हंै।
- विश्व में प्रति 10 व्यक्तियों में से 2 व्यक्तियों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल पाता है।
-  प्रति वर्ष 3 अरब लीटर बोतल पैक पानी मनुष्य द्वारा पीने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
- पिछले 50 वर्षों में पानी के लिए 37 भीषण हत्याकांड हुए हैं।
- भारत में औसतन 50 सेंटी मीटर से भी अधिक वर्षा होने के बावजूद अनाज की कमी बनी रहती है। वहीं इजऱाइल में औसतन मात्र 10 सेंटीमीटर वर्षा होती है, इस वर्षा से वह इतना अनाज पैदा कर लेता है कि वह उसका निर्यात कर सकता है।
यह तथ्य और आंकड़ें भविष्य के पानी के संकट के प्रति हमारी आंखें खोलती हैं। एक नजर इन आंकड़ों पर भी डाल लें कि हमारी पृथ्वी पर एक अरब 40 घन किलो लीटर पानी है। इसमें से 97.5 प्रतिशत पानी समुद्र में है, जो खारा है, शेष 1.5 प्रतिशत पानी बर्फ के रूप में धु्रव प्रदेशों में है। इसमें से बचा एक प्रतिशत पानी नदी, सरोवर, कुओं, झरनों और झीलों में है जो पीने के लायक है। इस एक प्रतिशत पानी का 60वाँ हिस्सा खेती और उद्योग कारखानों में खपत होता है। बाकी का 40वां हिस्सा हम पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं साफ-सफाई में खर्च करते हैं।
समय आ गया है जब हम वर्षा का पानी अधिक से अधिक बचाने की कोशिश करें। बारिश की एक-एक बूँद कीमती है। इन्हें सहेजना बहुत ही आवश्यक है। यदि अभी पानी नहीं सहेजा गया, तो संभव है जलसंकट के साथ आँखों में बचा पानी भी उतरने लगे। पहले कहा गया था कि हमारा देश वह देश है जिसकी गोदी में हज़ारों नदियाँ खेलती थी, आज वे नदियाँ हज़ारों में से केवल सैकड़ों में ही बची हैं। कहाँ गई वे नदियाँ, कोई नहीं बता सकता। नदियों की बात छोड़ दो, हमारे गाँव-मोहल्लों से तालाब आज गायब हो गए हैं, इनके रख-रखाव और संरक्षण के विषय में बहुत कम कार्य किया गया है। पानी के बारे में एक नहीं, कई चौंकाने वाले तथ्य हैं। विश्व में और विशेष रुप से भारत में पानी किस प्रकार नष्ट होता है इस विषय में जो तथ्य सामने आए हैं उस पर जागरूकता से ध्यान देकर हम पानी के अपव्यय को रोक सकते हैं। अनेक तथ्य ऐसे हैं जो हमें आने वाले ख़तरे से तो सावधान करते ही हैं, दूसरों से प्रेरणा लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और पानी के महत्व व इसके अनजाने स्रोतों की जानकारी भी देते हैं।
नदियाँ पानी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। जहाँ एक ओर नदियों में बढ़ते प्रदूषण रोकने के लिए विशेषज्ञ उपाय खोज रहे हैं वहीं कल कारखानों से बहते हुए रसायन उन्हें भारी मात्रा में दूषित कर रहे हैं। ऐसी अवस्था में जब तक कानून में सख्ती नहीं बरती जाती, अधिक से अधिक लोगों को दूषित पानी पीने का समय आ सकता है।
- पृथ्वी पर पैदा होने वाली सभी वनस्पतियाँ से हमें पानी मिलता है।
- आलू में और अनन्नास में 80 प्रतिशत और टमाटर में 15 प्रतिशत पानी है।
- पीने के लिए मानव को प्रतिदिन 3 लीटर और पशुओं को 50 लीटर पानी चाहिए।
- 1 लीटर गाय का दूध प्राप्त करने के लिए 800 लीटर पानी खर्च करना पड़ता है।
- एक किलो गेहूँ उगाने के लिए 1 हजार लीटर और एक किलो चावल उगाने के लिए 4 हजार लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इस प्रकार भारत में 83 प्रतिशत पानी खेती और सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है।
जल संरक्षण को लेकर समय-समय पर सेमीनार और वर्कशॉप होते हैं लेकिन आयोजन के साथ ही सारी बातें बिसरा दी जाती हैं। कोविड-19 के बाद पूरे देश में बोतलबंद पानी का जो चलन शुरू हुआ है, वह एक भयानक खतरे का संकेत है। एक तरफ तो हम पर्यावरण को प्लास्टिक की बोतलों से तबाह करने पर उतारू हैं तो दूसरी तरफ दो घूंट पानी पीकर पूरा बोतल भर पानी छोड़ दिया जाता है। आधा गिलास पानी का कांसेप्ट लगभग तिरोहित होता जा रहा है। इस दिशा में कोई बोलने वाला नहीं है और लगता है कि इनके कानों में खतरे की आहट पहुंची नहीं है।
पिछले दिनों भोपाल में आयोजित दो दिवसीय जल दृष्टि 2047 सम्मेलन में केन्द्रिय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि यह आयोजन पानी को बचाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि भारत को 2047 तक अनुमानित जल तनाव की स्थिति के लिए पहले से तैयार रहना चाहिए। वही 2047 तक पानी की आवश्यकता का आकलन हमारे पास उपलब्ध पानी की कुल मात्रा से अधिक होगा। आज की तारीख में पानी का संचयन योग्य घटक लगभग 1,180 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है और हमारी आवश्यकता 880 बीसीएम है। लेकिन 2047 तक मांग जा रही है। अब इन्हें कौन बताए कि यह आदर्श स्थिति कागज पर है और दूर-दराज गांवों में जाकर स्थिति का जायजा लिया जाए तो 2047 की प्लानिंग धरा रह जाएगा। हालांकि पीएम मोदी ने ग्राम पंचायतों से अगले पांच वर्षों के लिए एक कार्य योजना तैयार करने का भी आग्रह किया है ताकि जल आपूर्ति से लेकर स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन तक के रोडमैप पर विचार किया जा  सके। उन्होंने कहा कि पंचायतों को जल जीवन मिशन का नेतृत्व करना चाहिए ताकि सभी ग्रामीण परिवारों को नल से पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध  हो सके। सीएम शिवराज ने कहा कि जल ही जीवन है। इसका दुरुपयोग रोकना हम सबका कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि वर्षा के जल को इक_ा करें ताकि भूजलस्तर भी बढ़े। अलग-अलग तालाबों, नहरों का जीर्णोद्धार करें। चेकडेम-स्टॉपडेम जैसी जलसंरचनाएं बचाएं।
वो दिन हवा हो गए जब गांव-कस्बों में प्रत्येक मंगल कार्य को स्मरणीय बनाये रखने के लिए तालाब और पोखर का निर्माण कराया जाता था। भारत में जल संरक्षण और जल संरचना को लेकर अनेक किंवदंतिया प्रचलन में है लेकिन अब मनुष्य के लालच ने नई जल संचरना का निर्माण करना तो दूर, पहले से बनी-बनायी जल संरचनाओं को मिटाने पर तुले हुए हैं। अब पानी का महत्व भारत के लिए कितना है यह हम इसी बात से जान सकते हैं कि हमारी भाषा में पानी के कितने अधिक मुहावरे हैं। आज पानी की स्थिति देखकर हमारे चेहरों का पानी तो उतर ही गया है, मरने के लिए भी अब चुल्लू भर पानी भी नहीं बचा, अब तो शर्म से चेहरा भी पानी-पानी नहीं होता, हमने बहुतों को पानी पिलाया, पर अब पानी हमें रुलाएगा, यह तय है। सोचो तो वह रोना कैसा होगा, जब हमारी आँखों में ही पानी नहीं रहेगा? वह दिन दूर नहीं, जब सारा पानी हमारी आँखों के सामने से बह जाएगा और हम कुछ नहीं कर पाएँगे। आखिर में याद आता है पानी पानी रे...खारे पानी रे...(tasvir sabahar google)

शनिवार, 11 मार्च 2023

भीड़ में अकेले पुष्पेंद्र

मनोज कुमार

कोई कहे पीपी सर, कोई कहे बाबा और जाने कितनों के लिए थे पीपी. एक व्यक्ति, अनेक संबोधन और सभी संबोधनों में प्यार और विश्वास. विद्यार्थियों के लिए वे संजीवनी थे तो मीडिया के वरिष्ठ और कनिष्ठ के लिए चलता-फिरता पीआर स्कूल. पहली बार जब उनसे 25 बरस पहले पहली बार पुष्पेन्द्रपाल सिंह उर्फ पीपी सिंह से मुलाकात हुई तो उनकी मेज पर कागज का ढेर था. यह सिलसिला मध्यप्रदेश माध्यम में आने के बाद भी बना रहा. अफसरों की तरह कभी मेज पर ना तो माखनलाल में बैठे और ना ही माध्यम में. हमेशा कागज के ढेर से घिरे रहे। बेतरतीब कागज के बीच रोज कोई ना कोई इस उम्मीद में अपना लिखा, छपा उन्हें देने आ जाता कि वे एक नजर देख लेंगे तो उनके काम को मुहर लग जाएगी. यह विश्वास एक रात में उन्होंने अर्जित नहीं किया था. इसके लिए उन्होंने खुद को सौंप दिया था समाज के हाथों में. आखिरी धडक़न तक पीपी शायद एकदम तन्हा रहे। कहने को तो उनके शार्गिदों और चाहने वालों की लम्बी फेहरिस्त थी लेकिन वे भीतर से एकदम अकेले थे। तिस पर मिजाज यह कि कभी अपने दर्द को चेहरे पर नहीं आने दिया. ऐसे बहुतेरे लोग थे जो अपने बच्चों के भविष्य के लिए, कहीं नौकरी की चाहत मेें तो कहीं एडमिशन के लिए उनके पास आते-जाते रहे हैं लेकिन खुद पीपी ने कभी अपने बच्चों का जिक्र किसी से नहीं किया. लोगों को भी पीपी से ही मतलब था. शायद यही कारण है कि पीपी के जाने की खबर आग की तरह फैली तो लोगों को यह पता ही नहीं था कि उनके परिवार में कौन-कौन हैं? पीपी की पूरी दुनिया उन्हीं के इर्द-गिर्द थी. 2023 में जब पीपी ने अंतिम सांसें ली तब योग-संयोग देखिये कि यह वही तारीख थी जब उनकी जीवनसंगिनी उनका साथ छोड़ गयी थीं. भारतीय संस्कृति और परम्परा में विवाह को सात जन्मों का बंधन कहते हैं और यह योग-संयोग इस बात की पुष्टि करता है. 

पचास पार पुष्पेन्द्रपाल सिंह उर्फ पीपी सिंह से मेरी मुलाकात को 25 वर्ष से अधिक हो गए. तब माखनलाल पत्रकारिता संस्थान का कैम्पस सात नंबर पर लगता था. ठहाके के साथ हर बार मिलना और इससे भी बड़ी बात कि खुले दिल से दूसरे के काम की तारीफ करना. मुझे नहीं लगता कि वे कभी किसी की आलोचना करते या उनके काम में कमी निकालते दिखे. जिनसे उन्हें शिकायत भी होती, उनसे भी कुछ नहीं कहते. कभी हंस कर, कभी मुस्करा कर टाल जाते. जब कभी मैं शिकायत करता कि आपको पता है फिर कुछ बोलते क्यों नहीं तब वे हल्की मुस्कराहट के साथ कहते रात को गप्प करेंगे ना. मैं समझ जाता कि व्यक्तिगत रूप से कुछ कहना चाहते हैं. मेरी उनसे बात फोन पर अक्सर देर रात हुआ करती थी तब किसी और के फोन आने का अंदेशा कम होता था. बिना रूके कोई घंटा-डेढ़ घंटा हफ्ते-दस दिन में बात करते थे. मेरी शिकायत पर कहते कि आप सही हैं, कई बार कहा लेकिन वे अपनी आदत में सुधार नहीं ला सकते हैं तो क्या करें. जाने दो. आपका काम बढिय़ा है, करते रहें. कई बार अफसोस करते कि मैं आपकी कोई मदद नहीं कर पा रहा हूं. काम की व्यस्तता के चलते भी कुछ नहीं कर पा रहा हूं. 

भोपाल में कोई भी आयोजन हो, पीपी की उपस्थिति ना हो, यह लगभग असंभव सा है. हर विषय पर पकड़ और पूरे अधिकार के साथ संवाद. नाट्य निर्देशक संजय मेहता की किताब के विमोचन में उन्हें अतिथि के रूप में आमंत्रित करने के लिए उनसे पूछा तो कहा कि कैसी बात करते हैं. आप जब कहें, मैं हाजिर हो जाऊंगा. बस, एक दिन पहले समय और स्थान बता देना. खासियत यह कि वे बिना तैयारी किये किसी प्रोग्राम में आते भी नहीं थे. संजय जी की किताब ‘मरघटा खुला है’ पहले पढ़ी और फिर विमोचन कार्यक्रम में बोलने आए. और बोले तो पूरे चौंसठ पेज बोल गए. शायद लेखक संजयजी को भी इतना याद नहीं होगा जितना पीपी याद कर आए थे. विमोचन के बाद मजाक में मैंने कहा-पीपी भाई, आप इतना बोल जाते हैं कि दूसरे अतिथियों के लिए बोलने को कुछ शेष नहीं रहता है. जिस बात का उन्हें जवाब नहीं देना होता है, उस बात को अपने ठहाकों से उड़ा दिया करते थे. 

पब्लिक रिलेशन सोयासटी ने जो लोकप्रियता अर्जित की, वह पीपी के मेहनत के दम पर. लोगों को ना जाने कहां-कहां से जोड़ लाते. मेरा सोसायटी से कोई लेना-देना नहीं लेकिन कभी आग्रह तो कभी अधिकारपूर्वक मुझे जोड़े रखा. स्मारिका में लिखने की बात हो तो लिखने के लिए कहने के बजाय कहते, मनोज भाई, कब मेल कर रहे हैं. इसका मतलब है कि आपको लिखना है. हर मीटिंग के पहले उनका फोन आ जाता था, आज नाइन मसाला में मिलना है. मुझे और समागम को लेकर हमेशा उनका रूख सकरात्मक रहा. आज उनके जाने के बाद जाने कितनी यादें हिल्लोरे मार रही हैं लेकिन पीपी का साथ नहीं होना एक खालीपन का अहसास दिला रहा है. शायद मैं उन थोड़े लोगों में हूं जिनका पीपी के साथ उनके परिवार से परिचय था. उनके छोटे भाई केपी जब भास्कर, इंदौर में थे तो उनके घर भी पीपी के साथ जाना हुआ. लोगों को पीपी के ठहाके दिखते थे लेकिन उनका दर्द देखने की शायद किसी ने कोशिश नहीं की और उनकी आदत में था भी नहीं कि वे अपनी परेशानी बतायें. हां, हो जाएगा या देखते हैं, कहकर दूसरों का हौसला बढ़ाने वाले पीपी के पास दो-एक लोग ही थे. कभी सतही तौर पर मुझसे बातें कर लिया करते थे. 16-18 घंटे काम करने का उन्हें शौक नहीं था बल्कि खुद को काम में डूबा कर अपने अकेलापन को खत्म करने की कोशिश में जुटे रहते थे.  पीपी पर लिखने के लिए हजारों-हजार बातें हैं लेकिन क्या लिखूं और क्या छोड़ू, समझ से परे है. लेकिन एक बात तय है कि भीड़ में अकेले पीपी को जान पाना, समझ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था. 

शुक्रवार, 3 मार्च 2023

जन्मदिन के साथ ‘भाई-दूज’ मनाएंगी शिवराजसिंह की लाड़ली बहना

 5 मार्च जन्मदिन पर विशेष

मनोज कुमार

कल 5 मार्च को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की उम्र में एक वर्ष का और इजाफा हो जाएगा। इस बार उन्होंने अपना जन्मदिन नहीं मनाने का ऐलान किया है लेकिन यह पहला अवसर होगा जब उनके जन्मदिन के साथ प्रदेश भर में उनकी लाडली बहना ‘भाईदूज’ भी मनाएंगी। ‘भाईदूज’ भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पवित्र संस्कार है जिसमें भाई अपनी बहनों की सुरक्षा और समृद्धि का वचन देता है। मातृशक्ति का आंचल शिवराजसिंह के लिए मंगल कामनाओं से भरा-पूरा है। लाडली बहना शिवराजसिंह चौहान के लिए आशीष और उनकी कामयाबी के लिए ईश्वर से प्रार्थना करेंगी। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान वैसे भी स्त्री समाज की बेहतरी के लिए हमेशा से चिंतित और सक्रिय रहे हैं। इस क्रम में उन्होंने हाल ही में ‘लाडली बहना’ योजना का ऐलान किया है और संयोग से इस योजना का आरंभ कल पांच मार्च से हो रहा है। भाई का बहनों को यह तोहफा एक किस्म का अपरोक्ष रूप से ‘भाईदूज’ का नेग माना जा सकता है। कहना ना होगा कि ‘लाडली बहना’ भी उनके जन्मदिन के साथ ‘भाईदूज’ का संस्कार भी पूर्ण करेंगी। ऐसे अवसर अक्सर आंखों को भिगो देते हंै और मन पुलकित हो जाता है। बेशक, यह शिवराजसिंह सरकार की योजना है लेकिन प्रदेश भर की महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा देने का बड़ा उपक्रम है। 

उल्लेखनीय है कि साल 2005, माह नवम्बर में जब शिवराजसिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद सम्हाला था तब से उनका संकल्प प्रदेश के बेटियों, बहनों और वृद्ध माता-पिता को बेहतर जिंदगी देने का रहा है। लाडली लक्ष्मी योजना से लेकर, स्कूल जाने के लिए साइकिल योजना हो या अब लाडली बहना, शिवराजसिंह के संकल्प को पूरा करते हुए दिखती हैं। बिटिया के ब्याह हो या निकाह, शिवराजसिंह पूरे सम्मान के साथ योजना का लाभ दिलाते रहे हैं। करीब-करीब 20 वर्ष के कार्यकाल में महिला केन्द्रित योजनाओं में मध्यप्रदेश ने जो मानक गढ़े हैं, वह पूरे देश के लिए मिसाल बन गयी है। अनेक राज्य मध्यप्रदेश के अनुगामी बने हैं और अपने-अपने राज्यों में योजनाओं को लागू कर रहे है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की दूष्टि साफ है और वेे कहते हैं कि मध्यप्रदेश में लागू की गई महिला कल्याण की विभिन्न योजनाओं को देश के अन्य राज्य अपना रहे हैं तो यह प्रसन्नता की बात है क्योंकि बेटी, भांजी, बहन हम सबकी हैं और उनकी सुरक्षा और समृद्धि ही हमारा अंतिम लक्ष्य है।

मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना योजना की शुरुआत करने का उद्देश्य है कि समाज की नकारात्मक सोच को बदलना और बालिकाओं के भविष्य को उज्जवल बनाना है। इस योजना की घोषणा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा नर्मदा जयंती के अवसर पर इसी वर्ष 28 जनवरी 2023 को की गई थी। बालिकाओं के प्रति लोगों में सकारात्मक सोच एवं उनके लिंग अनुपात में सुधार के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना की शुरुआत की है। इस योजना की सहायता से प्रदेश में लोगो को बालिकाओं के प्रति स्नेह बढ़ेगा। प्रदेश के सरकार द्वारा यह भी घोषणा की गई है कि हमारी जो भी गरीब बहने, निम्न-मध्यम वर्ग की बहनें जो किसी भी धर्म या जाति से आती हों, इस योजना का लाभ प्राप्त कर सकेंगी। लाड़ली बहना योजना में किसी परिवार में यदि दो बहुएं हैं तो उन्हें भी हर महीना 1-1 हजार रुपए दिए जाएंगे। सास यदि बुजुर्ग हैं तो उन्हें वृद्धावस्था पेंशन में 600 के साथ इस योजना के 400 जोडक़र दिए जाएंगे। कोई महिला पहले से किसी भी योजना के तहत लाभ उठा रही है तो उसे भी इस योजना में शामिल किया जायेगा एवं पेंशन पाने वाली महिलाएं भी इस योजना का हिस्सा बन पाएंगी। 

प्रदेश की सभी बहनों को इस योजना के तहत एक हजार रुपए हर महीने दिया जाएगा। 5 साल में 60 हजार रुपए दिया जाएगा, ताकि वह आर्थिक रूप से मजबूत हो सकें। इस योजना पर सरकार द्वारा पांच वर्षों में 60 हजार करोड़़ रुपए खर्च किया जाएगा। हमारे देश में कई लोग आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के कारण अपनी बहन को उच्च शिक्षा नहीं दे पाते हैं। प्रदेश में रहने वाले कई लोग ऐसे भी हैं जो अभी भी लडक़े और लड़कियों में भेदभाव करते हैं, इस सोच को बदलने में यह योजना कारगर साबित होगी। 

अनुभवों से लबरेज शिवराजसिंह चौहान मध्यप्रदेश के चार बार के मुख्यमंत्री हैं लेकिन उनकी कार्यशैली और जीवनशैली आज भी आम आदमी की है। वे अपनी सादगी से लोगों का मन मोह लेते हैं। सबको अपना सा लगता है। रंच मात्र भी उनमें गरुर दिखाई नहीं देता है और वे आज भी एक किसान पुत्र की भांति रहते हैं। उनकी चिंता में महिला, बेटी हैं तो किसान और वृद्ध माता-पिता भी हैं। वे मुख्यमंत्री के रूप में जब कहते हैं कि प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता मेरी भगवान हैं तो उनका आशय उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी का होता है। शिवरासिंह चौहान का मुख्यमंत्री के रूप में सफर कभी आसान नहीं रहा। अनेक चुनौतियों के बीच उन्होंने स्वयं को सम्हाला और चुनौतियों को संभावना में बदल दिया। फिर खेतों में पड़े ओला-पाला हो या कोविड काल में चौपट होती स्वास्थ्य एवं अर्थव्यवस्था, सबको उन्होंने सधे ढंग से सुलझा लिया। कोविड में आम आदमी को हौसला देते हुए खुद कोविड के शिकार हो गए लेकिन इलाज के दरम्यान भी राजकाज जारी रहा। उनके भीतर का यह हौसला, उनका ही नहीं, बल्कि प्रदेश की करोड़ों नागरिकों का है। 

शिवराजसिंह चौहान एक संस्कारी राजनेता हैं और यही कारण है कि वे अपने विरोधियों को पूरा सम्मान देते हैं। कभी हल्के शब्दों का उपयोग नहीं करते हैं लेकिन अपने कार्यों से वे विरोधियों को चुप करा देते हैं। अनेक बार उन्हें मिथ्या आरोपों से घेरने की कोशिश की गई लेकिन सब की हवा निकल गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं शिवराजसिंह चौहान के मुरीद हैं और यही कारण है कि वे हर बार मध्यप्रदेश की धरा पर आने के लिए तैयार रहते हैं। महाकाल लोक जैसा अविस्मरणीय धार्मिक स्थल के लोकार्पण का अवसर हो, कूनो अभयारण्य आने का विषय हो या निवेशकों का सम्मेलन हो, प्रधानमंत्री हमेशा पहुंचे हैं। महामहिम राष्ट्रपति भी तीन से अधिक बार मध्यप्रदेश का प्रवास कर चुकी हैं। यह सब संयोग नहीं बल्कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की सदाशयता और उनकी मेहनत को देश-दुनिया देख रही है। सरल, सहज और मिलनसार शिवराजसिंह चौहान भले ही अपना जन्मदिन उत्सवी ना मना रहे हों लेकिन एक-एक पौधा अपना आशीष उन्हें प्रदान करता दिख रहा है। जन्मदिन की कोटिश: बधाई। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)

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