पेड़ news


रसीद कटा लो...रसीद
मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया अध्येता
इन दिनों पेड न्यूज को लेकर हर मंच पर विलाप किया जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि पेड न्यूज के इस मसले के चलते पूरी मीडिया के अस्तित्व पर सवालिया निशान लग गया है। पेड न्यूज का मामला कांग्रेस के अशोक चव्हाण के उस चुनावी केम्पन का हिस्सा है जिसमें उनकी इमेज बिÏल्डग करती हुए एक जैसी खबरें अनेक अखबारों में सम्पादकों और संवाददाताओं के नाम से प्रकाशित हुई है। नेता, सरकार और कम्पनियों की इमेज बिÏल्डग करने वाला मीडिया केम्पन आजादी के बाद इस देश में एक बार नहीं, बार बार हुआ है और हो रहा है और शायद भविष्य में यह केम्पन और विस्तार पायेगा। पेड न्यूज के बारे में एक सवाल मेरे जेहन में बार बार कौंध रहा है वह यह कि आखिर आप किसे पेड न्यूज बता रहे हैं? पेड यानि भुगतान अर्थात जिस खबर/रिपोर्ट को लेकर हंगामा मचा है, विलाप किया जा रहा है, वह खबर कितने में बिकी, इस सवाल का जवाब न तो किसी ने मांगा और न कहीं दिया गया है। अंग्रेजी के शब्द पेड का जो सामान्य सा अर्थ मुझे समझ आता है, उसका मतलब तो यही है कि भुगतान किया जाना और जिस वस्तु का क्रय किया जाता है और इस क्रय के बदले भुगतान की रसीद प्राप्त की जाती है। यह व्यापार का सामान्य सा नियम है। मध्यप्रदेश शासन उपभोक्ताओं को जागरूक बनाने के लिये अभियान चलाये हुए है कि आप जो भी खरीदें, उसकी रसीद जरूर प्राप्त करें। क्या पेड न्यूज के इस मामले में व्यापार के इस नियम का पालन किया गया है अथवा अनदेखी की गई है। यदि नियम का पालन किया गया है तो पेड न्यूज का मामला बनता है और नहीं किया गया है तो यह एक तरह से बेबुनियाद बातें हैं। अब यह कहा जाएगा कि ऐसी बातों का क्या मतलब? मेरा मानना है कि जब हम कोई खबर लिखते हैं तो पूरी जवाबदारी से लिखते हैं और उसकी पूरी पड़ताल करते हैं और जब हम अपने ही प्रोफेशन पर सवालिया निशान लगा रहे हैं तो उसके तथ्यों की जांच करना हमारा पहला दायित्व है। जहां तक पत्रकारिता का मेरा अपना अनुभव है उसके आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि इम्पेक्ट फीचर, किसी सरकार के सौ दिन, एक साल अथवा ऐसे ही किसी मौके पर विज्ञापन की शक्ल में जारी किया जाने वाला समाचार भी पेड न्यूज की श्रेणी में आता है किन्तु कभी इस पर कोई हंगामा नहीं हुआ। इसे मान लिया जाता है कि किसी अखबार अथवा टेलीविजन को चलाने के लिये विज्ञापन की जरूरत होती है और इस रूप में मीडिया संस्थान को आय होती है। इसके साथ ही ऐसे पेड न्यूज की चर्चा पर विराम लगा दिया जाता है।
पेड न्यूज को लेकर एक दूसरा सवाल यह कि यह हंगामा इसलिये मच रहा है कि मीडिया को समाज की चिंता है और चिंता इस बात को लेकर है कि पेडन्यूज में सही-गलत की परख किये बिना जो तथ्य दिये जाते हैं, वह पाठकों-दर्शकों को गुमराह करते हैं। ऐसा है तो इम्पेक्ट फीचर और सरकार की इमेज बिÏल्डग करने वाली खबरों से परहेज क्यों नहीं किया जाता है? क्यों हम सरकार की ओर से दिये गये तथ्यों को जांचे बिना पाठकों-दर्शकों तक पहुंचा देते हैं? तब हम पेड न्यूज का हल्ला क्यों नहीं मचाते? मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा लगता है कि पूरा मामला दर्शकों-पाठकों की चिंता का नहीं बल्कि उन लोगों का विलाप है जो इस लाभ से वंचित रह गये। इस मामले में जिसके पक्ष में खबर छपी है और जिसे पेड न्यूज कहा जा रहा है और जिसने अपने चुनावी खर्च को कम बताया है, उसके खिलाफ खर्च कम दिखाये जाने का मामला चलना चाहिए। मामला उनके खिलाफ भी चलना चाहिए जिन्होंने इन खबरों को प्रकाशित किया। यदि यह माना जाता है कि खबर विज्ञापन की सूरत में प्रकाशित किया गया है तो पेड न्यूज जैसा कोई मामला ही नहीं बनता है। यह विलाप पाठक एवं दर्शकों को भरमाने का एक ड्रामा माना जाना चाहिए।
यह मानने में किसी को हिचक नहीं होना चाहिए कि अन्य प्रोफेशन की तरह पत्रकारिता में भी गिरावट आयी है किन्तु इस बात पर पत्रकारिता गर्व कर सकती है कि वह औरों की तरह अपने ऊपर लगे लांछन को कुतर्क से ढंकने के बजाय आत्म विवेचना करती है। उसका आत्मविवेचन बंद कमरे में न होकर समाज के मंचों पर जाकर होता है। यह अपने आप में सुखद और बेहतरी की ओर संकेत देती है कि आने वाले वक्त में भी मीडिया वि·ासनीय बना रहेगा। पेड न्यूज को जिस तरह हाइप किया जा रहा है, वह ठीक उसी तरह है जैसा कि बताया जा रहा है पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन बन गया है। यह बात भी मेरी समझ से परे है। परतंत्र भारत में पत्रकारिता के महानायकों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला था तो स्वतंत्र भारत में हम भ्रष्टाचारियों, अनैतिकता के साथ ही आम आदमी की सुविधा के लिये तंत्र के खिलाफ मोर्चाे खोले खड़े हैं। पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधाओं का विस्तार हो सके, इसके लिये पत्रकारिता ने आजादी इन वर्षाें में सतत रूप से लड़ाई लड़ी है और लड़ रहे हैं। ऐसे में मिशन गुम नहीं हुआ है बल्कि मिशन के चलते ही तंत्र को सजग और सर्तक रहना पड़ रहा है। Ïस्टग ऑपरेशन को भले ही आप कोसें लेकिन कैमरे का डर आज भी गैरकानूनी काम करने वालों के मन में घर कर गया है किन्तु आम आदमी के लिये मीडिया अपनी बात रखने का सबसे सशक्त माध्यम बना हुआ है।
पत्रकारिता की वि·ासनीयता पर ऐसा ही हंगामा किया गया किन्तु उसके विस्तार ने बता दिया कि यह बकवास है। मीडिया की वि·ासनीयता न केवल कायम है बल्कि उसमें विस्तार भी हुआ है। आज पेड न्यूज को लेकर जो लोग हंगामा मचा रहे हैं, उन्हें खबर की कीमत तय होने का इंतजार करना चाहिए क्योंकि जब तक खबर की कीमत तय नहीं होगी, पेड न्यूज की पत्रकारिता नहीं हो पायेगी। विज्ञापन के लिये भुगतान मिलता है, रसीदें कटती हैं। फिलहाल खबर के मामले में ऐसा नहीं हो पाया है। मुझे उस दिन का इंतजार होगा जब आवाज लगेगी रसीद कटवा लो...रसीद...। आखिरी में एक बात और। जिन लोगों ने अभिषेक बच्चन अभिनीत फिल्म देखी हो उन्हें यह याद होगा कि स्वतंत्र मत के स्वामी संपादक की भूमिका का निर्वाह कर रहे मिथुन चक्रवर्ती इसी तरह के पेड न्यूज को लेकर अपने संपादक और स्टाफ पर नाराज होते हैं और साथ ही यह निर्देश देते हैं कि अगले दिन उनका अखबार क्षमायाचना प्रकाशित करेगा। क्या किसी संपादक में अभी इतनी हिम्मत बची है कि वह ऐसे पेड न्यूज के बारे में हल्ला मचाने के बजाय अखबार में इसके लिये माफीनामा छाप सके। जिस दिन किसी संपादक के भीतर इतनी आत्मशक्ति आ जाएगी, उस दिन पेड न्यूज के बारे में बात करना न केवल नैतिक होगा बल्कि व्यवहारिक भी। मुझे उस दिन का इंतजार रहेगा।

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