भारतीय राजनीति के महामना अटल विहारी वाजपेयी


भारतीय राजनीति के महामना अटल विहारी वाजपेयी
-अनामिका
भारतीय राजनीति में कई महामना हुए जिन्होंने भारत को नई दिशा और दृष्टि प्रदान की। आधुनिक भारत में भी महान राजनेताओं की लम्बी श्रृंखला है जिन्होंने न केवल भारतीय राजनीति को एक अलग पहचान दी बल्कि वे मील के पत्थर साबित हुए। इन महान नेताओं की चर्चा करते समय अपने समय के अटल विहारी वाजपेयी का उल्लेख सबसे पहले आता है। भारत के राजनीतिक इतिहास में उन महान् नेताओं की श्रृंखलाओं में जन्मे हमारे देश के महत्वपूर्ण कर्णधार श्री अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्होंने भारतवर्ष के राजनैतिक इतिहास में एक नए युग का प्रारंभ कर भारत में नव-परिवर्तन की लहर प्रवाहित कर दी। अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म ग्वालियर में 25 दिसम्बर 1924 को हुआ था। भारतीय राजनीति में यह तारीख अमिट है।
सच कहा जाए तो आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी का जो पूरे देश में उजास फैल रहा है, वह अटलजी के प्रयासों और उनकी प्रतिबद्धता के कारण माना जा सकता है। अटल बिहारी वाजपेयी बचपन से ही चंचल और कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा को अपनी जीवनशैली में उतारने वाले अटल बिहारी वाजपेयी मात्र 15 वर्ष की आयु में ही संघ की शाखा में जाने लगे थे। अपने विद्यार्थी काल में भी अटलजी ने छात्र संघ में महामंत्री और उपाध्यक्ष के रूप में अपनी कार्यक्षमता का परिचय दिया था। भारतीय जनसंघ पार्टी के वरिष्ठ सदस्य डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के पश्चात अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी निष्ठा की टीम लेकर राजनीति की पथरीली राहों पर चल पड़े थे। अपनी काव्यात्मक व सरल भाषण कला के जरिये मिली लोकप्रियता के सहारे लखनऊ के अतिप्रिय सांसद अटल बिहारी वाजपेयी जी 1957 में पहली बार बलरामपुर से लोकसभा के लिए चुने गए थे और एक सांसद के रूप में भारतीय राजनीति में उन्होंने अच्छी खासी लोकप्रियता हासिल कर ली थी। लखनऊ ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता उनकी ओजस्वी भाषण शैली से प्रभावित थी।
1968 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के पश्चात भारतीय जनसंघ पार्टी ने अटल जी को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया। उनकी कार्यकुशलता के आगे सभी पार्टी कार्यकर्ताओं ने वैसी ही अभिरुचि दिखाई, जैसी वे पंडित दीनदयाल उपाध्याय के कार्यकाल में दिखाते थे। अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता के कारण अटलजी तीन बार भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे। यह उन्हीं के अथक परिश्रम, ओजस्वी भाषण, गंभीर लेखन और कार्यकर्ताओं से सम्पर्क आदि का नतीजा था, जो जनसंघ को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला। इसी जनसंघ पार्टी ने 1977 में जनता पार्टी और 1979 में भारतीय जनता पार्टी का रूप लिया। अटल जी तब से लगातार कई वर्ष तक लोकसभा में अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करते रहे। अटल बिहारी वाजपेयी की देश के प्रति सकारात्मक सोच के कारण देश उनके प्रति नतमस्तक है। अनेक अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भी अटलजी के सकारात्मक विचारों के कारण विश्व उनमें एक अंतर्राष्ट्रीय नेता की छवि देखने लगा था। प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन होते ही उनके सामने संकटों के बादल एक-एक करके आते चले गए। इन सभी संकटों का सामना उन्होंने जिस साहस से किया, यह अटल जी जैसे व्यक्तित्व के लिए ही संभव था। 
पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ निरन्तर बढ़ती कटुता, कश्मीर में बढ़ती आतंकवादी गतिविधियां विशेष रूप से चिन्ताजनक थी। एक ऐतिहासिक क्षण में अमन और दोस्ती का पैगाम लेकर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरहद पार पाकिस्तान गए थे। उन्होंने वहां जाकर राजनेताओं से कहा था कि हिंसा से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। वाघा सीमा पर भारत और पाकिस्तान के नेताओं का ऐसा ऐतिहासिक मिलन हुआ, जैसा इससे पहले कभी नहीं हुआ था। इस ऐतिहासिक मिलन के पश्चात् ऐसा सोचा जाने लगा था कि कश्मीर समस्या अब हल हो जाएगी लेकिन दुर्भाग्यवश खुराफाती दिमाग के मुशर्रफ और आतंकवादियों ने ऐसा नहीं होने दिया तथा देश को कारगिल युध्द का सामना करना पड़ा। देश के तमाम सैनिकों में अटल जी ने तब अदम्य उत्साह भर दिया था और सैनिकों ने भी उनके विश्वास को शौर्य और जीवट में बदल कर घुसपैठियों को देश की सीमा से बाहर खदेड़ दिया था। वीर जवानों का मनोबल बढ़ाते हुए अटल जी ने तब कहा था, ‘हम अपने जवानों और अफसरों पर गर्व करते हैं और सारा राष्ट्र उनके पीछे खड़ा है। कारगिल में वे एक नए इतिहास की रचना करें।’
अटल जी ने भारतीय राजनीति में सौम्यता और सद्भावना का की जो परम्परा कायम की, वह अविस्मरणीय है। राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ अटल जी कवि थे, सो उनके मन में सभी के प्रति करूणा का भाव था। वे आत्मसम्मानी राजनेता हैं और उन्होंने राजनीति में ईमानदारी को सबसे ऊपर रखा। उनके सामने कई ऐसे अवसर आए, जब वे कुछ तिकड़म से सत्ता हासिल कर सकते थे लेकिन ऐसा उन्होंने कभी नहीं किया।  वे सह्दयी थे लेकिन उन लोगों के लिए जो देश के प्रति अपनी निष्ठा रखते थे लेकिन उनके लिए वे एकदम कठोर थे जिनमें देशपे्रम का भाव नहीं था। वे अपने विरोधियों को भी समूचा सम्मान देते थे। आज उम्र हो जाने के कारण वे राजनीति में सक्रिय नहीं हैं लेकिन जितने वर्ष उन्होंने विपक्ष के साथ प्रधानमंत्री के रूप में गुजारे हैं, वहां हर दिन राजनीति की एक नई इबारत लिखी है। आज उनके जन्म दिवस पर हम कामना करते हैं कि वे अपनी अस्वस्थ्यता को पराजित कर एक बार फिर सक्रिय हो जाएं और हमारा मार्गदर्शन करें। अपनी कवि वाणी से वे एक बार फिर मन की कविता का पाठ करें और हमें जीवन के सद् गुण सिखाएं।(विकल्प)

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