सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

रमन और छत्तीसगढ़ एक-दूसरे के पर्याय बने

छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस 1 नवम्बर पर विशेष
मनोज कुमार

चित्र गूगल से साभार 
बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुआ है. 16 साल पहले आज के ही दिन 1 नवम्बर को छत्तीसगढ़ को स्वतंत्र होने का अवसर मिला था. मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य विविध चुनौतियों और संभावनाओं के मध्य कुछ करगुजरने के लिए बेताब था. आरंभ के तीन वर्ष कांग्रेस के पास रहा लेकिन उसके बाद राज्य की जनता ने बागडोर भाजपा के हाथों सौंप दी. 2003, 2008 और 2013 के राज्य विधानसभा के चुनाव में बार बार, हर बार भाजपा का नारा लगता रहा और भाजपा ही सत्तासीन होती रही. सबसे खास बात यह रही कि इन सालों में लोगों ने मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. रमनसिंह को ही पसंद किया. कभी बीमार लोगों की नब्ज पकड़ कर उनकी बीमारी दूर करने वाले डाक्टर रमनसिंह के हाथों में आज छत्तीसगढ़ की नब्ज है. वे राज्य की बीमारी को भी जानते हैं और उसमें छिपी संभावनाओं को भी और बीमारी का इलाज भी उनके पास है इसलिये छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉक्टर रमनसिंह एक ऐसे व्यक्ति का नाम है जो मुखिया बनकर छत्तीसगढ़ राज्य को विकास की तरफ ले जाने की दिशा में अग्रसर हैं. कभी पिछड़े राज्य के रूप में पहचाना जाने वाला छत्तीसगढ़ आज विकसित राज्यों की पंक्ति में शुमार हो चुका है तो इसके सम्मान के हकदार हैं तो डॉक्टर रमनसिंह. सन् दो हजार में जब छत्तीसगढ़ स्वतंत्र राज्य की हैसियत से भारत के नक्शे पर आया तब किसी ने यकिन नहीं किया था कि राज्य की चमक इस तरह बिखरेगी लेकिन ऐसा हुआ. आरंभ के तीन वर्ष जरूर छत्तीसगढ़ के लिये गुमनामी के रहे लेकिन बाद के वर्षों में विकास की जो गूंज हुई, उसे पूरी दुनिया देख रही है. 
डाक्टर रमनसिंह ने जब छत्तीसगढ़ राज्य की बागडोर अपने हाथों में ली, तब शायद किसी को यह विश्वास ही नहीं था कि एक ऐसा शांत व्यक्तित्व का धनी राज्य को विकास की चहुमुंखी आभा से आलोकित कर देगा. लोगों का यह सोचना अकारण नहीं था. दूसरे राजनेताओं की तरह डाक्टर रमनसिंह की खनक नहीं थी बल्कि आम आदमी के लिये तो लगभग नया चेहरा था लेकिन दुर्ग संभाग के लोगों का पुराना परिचय उनसे था. मुख्यमंत्री बन जाने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपना संकल्प दोहराया कि राज्य में कोई भूखा नहीं सोयेगा. अपने इस संकल्प की पूर्ति के लिये समाज के आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति तक सस्ते में अनाज पहुंचने लगा.  इसी के साथ पहुंचने लगी मुख्यमंत्री की ख्याति. आरंभिक दिनों में विपक्षियों के लिये सस्ता चावल महज शिगूफा था लेकिन आहिस्ता आहिस्ता इस संकल्प का प्रभाव सामने आने लगा और सरकार तथा आम आदमी के बीच विश्वास का रिश्ता बनता चला गया.
मुख्यमंत्री के रूप में डाक्टर रमनसिंह ने छत्तीसगढ़ राज्य की नब्ज अपने हाथों में ले ली थी. बीमार और पिछड़े राज्य को उन्होंने आहिस्ता आहिस्ता ठीक करना शुरू किया. अपने आठ वर्ष के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ को पिछड़े और बीमार राज्य से बाहर ला निकाला. आज छत्तीसगढ़ देश दुनिया के साथ दौडऩे के लिये तैयार है. लोकहितैषी मुख्यमंत्री के रूप में डॉक्टर रमनसिंह का जोर था वनवासी परिवारों की तरफ जिनके हिस्से में उपेक्षा और गुमनामी था. ये लोग छत्तीसगढ़ की पहचान है किन्तु स्वयं अपनी पहचान के लिये दशकों से तरसते रहे हैं. रमनसिंह ने इन्हें इनकी पहचान दिलायी और राज्य को गर्व. अलग अलग योजनाओं के माध्यम से इन्हें नये सिरे से जीने का अवसर मिला तो इनके बच्चों को ऊंची शिक्षा का. हर किस्म की परीक्षाओं में बच्चों ने ऐसी काबिलियत दिखायी कि छत्तीसगढ़ तो क्या पूरा देश अंचभित रह गया. यह सूरत बदलने की जो सर्जरी डाक्टर साहब ने वनवासी समाज के लिये की, वैसा ही कुछ कुछ समाज के किसानों, महिलाओं, मजदूरों और अन्य वर्गों के लिये किया. मुख्यमंत्री और सरकार के बीच आम आदमी की दूरी को पाट दिया गया. जनदर्शन के बहाने सरकार और मुख्यमंत्री गांव गांव जाने लगे, लोगों से बातें करते और उनकी सुनते. समस्याओंं का निपटारा स्थान पर ही कर देते और जो नहीं हो पाता। 
राज्य की दो करोड़ 55 लाख जनता अब भीख और भूख से लगभग पूरी तरह मुक्त हो चुकी है. छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली देश के लिये नजीर बन चुकी है. सर्वोच्च न्यायालय ने  एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार से यह पूछा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सुचारू संचालन के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा किए गए कम्प्यूटरीकरण को पूरे देश में एक मॉडल के रूप में क्यों नहीं अपनाया जाना चाहिए? छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दूसरे राज्यों ने भी अपने यहांं अमल में लाया है. हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, हर किसान को न्यूनतम ब्याज पर खेती के लिए ऋण सुविधा और उसकी मेहनत का पूरा दाम, हर घर को बिजली, हर परिवार को अनाज, हर बच्चे को स्कूल के साथ नि:शुल्क पाठयपुस्तक, हर मरीज को इलाज की अच्छी से अच्छी सुविधा देकर दशकों से उपेक्षित राज्य के नागरिकों को अपने राज्य होने का गौरव दिलाया. महिला शक्ति को एक नयी पहचान मिली और टोनही के नाम पर महिलाओं की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ करने वालों को दंड देने की नीयत से कानून पारित किया गया लिहाजा राज्य में अब ऐसे मामलों में कमी देखी गयी है.
महिलाओं के प्रति रमन सरकार का रूख हमेशा से सकरात्मक रहा है और यही कारण है कि उन्हें आर्थिक रूप से संबल प्रदान करने के लिए अनेक योजनाओं का संचालन किया जा रहा है. उनके जीवन में खुशियां आए, इस बात की लगातार कोशिश हो रही है. छत्तीसगढ़ में टोनही (और स्थानों पर डायन या जादूगरनी का संबोधन) के नाम पर महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ होता था. इसके खिलाफ मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने कड़े कदम उठाते हुए देश में पहली बार टोनही के खिलाफ कानून अमल में लाने की पहल की। कानून के डर से अब महिलाओं के साथ कथित टोनही के नाम पर ना तो दुराचार होता है और न ही उनके साथ अत्याचार।
स्पष्ट नीति, साफ नीयत, संवेदनशील दृष्टिकोण और गतिशील नेतृत्व से ही किसी भी राज्य अथवा देश को विकास की राह पर कदम दर कदम कामयाबी मिलती है। मुख्यमंत्री डाक्टर रमनसिंह ने राज्य में सर्वधर्म समभााव का पूरा पूरा खयाल रखा. यही नहीं, राज्य के इतिहास पुरूषों को भी पूरा सम्मान दिया. इसकी मिसाल महान समाज सुधारक गुरू बाबा घासीदास की जन्मस्थली और तपोभूमि गिरौदपुरी में ऐतिहासिक कुतुबमीनार से भी ऊंचा जैतखाम का निर्माण कराया गया है. कुतुबमीनार से भी ऊंचा यह जैतखाम गुरू बाबा घासीदास के सत्य और अहिंसा के संदेश को दूर-दूर तक पहुंचाएगा। 
केन्द्र सरकार की विविध योजनाओं को लागू करने में भी मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने छत्तीसगढ़ को अगुवा बना दिया है। रमनसिंह की पहल का इतना असर हुआ कि स्वच्छ भारत अभियान में गांव गांव में लहर चल पड़ी। राजनांदगांव जिले छुरिया विकास खंड की एक गरीब महिला ने अपनी बकरियां बेचकर शौचालयों का निर्माण कराया। छत्तीसगढ़ की दान परम्परा की यह एक और कड़ी थीं। इसी तरह स्वच्छ भारत अभियान तेज गति से अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ रहा है। इसी तरह प्रधानमंत्री उज्जवला योजना को भी मुख्यमंत्री डा. रमनसिंह ने जमीनी हकीकत में बदल दिया है. अब एक दो नहीं बल्कि हजारों की संख्या में महिलाओं की जिंदगी धुंआ धुंआ होने से बच रही है. 
प्रदेश के पूर्वोत्तर इलाके में रेल कॉरिडोर निर्माण के उनके प्रस्ताव को रेल मंत्रालय ने हाथों-हाथ लेकर अपनी हरी झंडी दे दी है। यह रेल कॉरिडोर छत्तीसगढ़ में यात्री सेवाओं के विस्तार के साथ-साथ माल-परिवहन की दृष्टि से भी काफी उपयोगी होगा। छत्तीसगढ़ में उद्योग-धंधों को विस्तार मिले, इस दृष्टि से संसार भर के निवेशकों को राज्य में नये उद्योग लगाने के लिये आमंत्रित किया. निवेशकों ने छत्तीसगढ़ सरकार की कोशिशों की तारीफ की और निवेश को उत्सुक दिखे. राज्य सरकार चाहती है कि प्रदेश में नये उद्योग आयें लेकिन वे यह भी नहीं चाहती कि कोई भी निवेशक राज्य की प्राकृतिक संपदा को क्षति पहुंचाये. पर्यावरण की सुरक्षा के वादे के साथ निवेश की संभावना टटोलने वाला संभवत: छत्तीसगढ़ पहला राज्य होगा. एक स्वप्रदृष्टा मुख्यमंत्री के हाथों छत्तीसगढ़ सुघर आकार ले रहा है. 

मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के स्थापना दिवस पर शोध पत्रिका ‘समागम’ का विशेष अंक


मित्रों,
आज एक नवम्बर है. हमारे अपने मध्यप्रदेश का 61वां स्थापना दिवस. आज से 60 वर्ष पूर्व 1956 को मध्यप्रदेश का गठन हुआ था. तब इस प्रदेश की कोई एकजाई पहचान थी तो यह कि यह प्रदेश भौगोलिक रूप से देश का सबसे बड़ा प्रदेश है और भारत के नक्शे में ह्दयप्रदेश के रूप में चिंहित था. हमारे मध्यप्रदेश ने हौले हौले विकास के रास्ते पर कदम बढ़ाया. आज हम इस बात को गर्व से कह सकते हैं कि मध्यप्रदेश अनेक मामलों में देश के लिए नजीर बन चुका है. बस, एक दर्द है तो छत्तीसगढ़ के अलग हो जाने का. मध्यप्रदेश के विभाजन का. हालांकि छत्तीसगढ़ के विकास को देखते हुए प्रसन्नता होती है. शोध पत्रिका ‘समागम’ मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के स्थापना दिवस को सेलिब्रेट कर रहा है.
शोध पत्रिका ‘समागम’ के नवीन अंक में 1956-2016 के बीच के बदलाव, चुनौतियां और सफलता को विशेषज्ञों ने अपनी अपनी दृष्टि के साथ लिखा है. अंक के पहले शोध पत्रिका ‘समागम’  के मुखपृष्ठ आपके अवलोकनार्थ एवं प्रतिक्रिया के लिए आप सबकी शुभकामनाओं और आभार के साथ.

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

अब नहीं होगी उनकी जिंदगी धुंआ-धुंआ...

अनामिका 
भिनसारे उठ जाना और स्नान-ध्यान कर परिवार के लिए रोटी पकाना पलकमती के लिए उतना कष्टसाध्य नहीं था जितना कि रोज-रोज धुंआ होती जिंदगी. चूल्हे पर भोजन पकाना उसकी रोजमर्रा की जिंदगी का काम है लेकिन इस रोजमर्रा के काम में उसकी जिंदगी के एक-एक कर जिंदगी खत्म होती जा रही थी. चूल्हे से निकलता धुंआ उसके सांसों के साथ उसके जिस्म को खाया जा रहा था. मुसीबत तब और बढ़ जाती थी जब बारिश के दिनों में गीली लकडिय़ां सुलग नहीं पाती और पूरी ताकत लगाकर वह उन्हें सुलगाने की कोशिश करती. आज का दिन पलकमती के लिए किसी उत्सव से कम नहीं है. मुख्यमंत्री रमनसिंह उन्हें उज्जवला योजना के तहत गैस चूल्हा दे रहे हैं. पलकमती की पलकें चमकने लगी है तो इस कतार में और भी महिलायें हैं जिनकी जिंदगी पलकमती से अलग नहीं थी. उनके घरों में भी गैस चूल्हा आ गया है और उनकी जिंदगी धुंआ-धुंआ होने से बच जाएगी. एक-दो पांच नहीं बल्कि बड़ी संख्या में वो महिलाएं हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर थीं और जिनके लिए गैस कनेक्शन प्राप्त कर लेना सपना था. इन सभी के सपने सच करने के लिए राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री के वायदे को पूरा करने के लिए जुट गयी है. प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से हजारों महिलाओं के रसोईघर उजाले से भर उठे हैं.
छत्तीसगढ़ राज्य के हजारों महिलाओं को वर्षों से चूल्हे के धुएं से पीडि़त होती आंखों को उज्ज्वला योजना से बेहद राहत मिली है। बरसात में जब लकडिय़ाँ गीली होती थी। तब तो घर परिवार के लिए महिलाओं को खाना बनाना बहुत मुश्किल होता था। चूल्हा फूंक-फूंक कर वे काफी परेशान हो जाती थी। गांव में योजना के पात्र परिवारों की महिलाओं को उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन दिया गया है। इस योजना से एक तरफ जहाँ महिलाओं की सुविधा मिली है। वहीं दूसरी तरफ जंगल से लकडिय़ों की अवैध कटाई पर भी रोक लगेगी। केंद्र एवं राज्य सरकार ने अपनी महत्वपूर्ण योजना के जरिये ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं की जिन्दगी में यह एक बेहतर तोहफा दिया। जब उज्ज्वल योजना के तहत गरीब परिवारों की महिलाओं को गैस-चूल्हा और सिलेंडर प्रदान किया गया। गैस कनेक्शन मिलने के बाद अब उन्हें खाना बनाना बेहद आसान हो गया है। 
श्रीमती शांति मोहन साहू का अब अपनी सास और बेटी रिश्ता और अधिक मजबूत हो रहा है। छुरिया विकासखंड की ग्राम खुर्सीपार निवासी श्रीमती शांति साहू उज्ज्वला योजना के तहत मिले गैस चूल्हे से अब अपनी बेटी को उसकी मन-पसंद सब्जी और अपनी सास को उनका पसंदीदा खाना आधे घंटे में बनाकर दे देती है। इस गैस कनेक्शन के कारण अब शांति साहू की बेटी और सास जब चाहे तब गरमा-गरम खाना पका कर आसानी से खा लेते है। इससे खाना पकाने और पसंदीदा खाना पकाने में देरी के कारण परिवार में होने वाले मतभेद भी अब खत्म हो गये है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरू की गई उज्ज्वला योजना ने ना केवल ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों की गरीब महिलाओं को चूल्हे पर खाना बनाने की समस्याओं से मुक्ति दिलाई है। बल्कि पारिवारीक सदस्यों में आपसी प्रेम और सहयोग की भावना को भी मजबूत किया है. इसी तरह  मनरेगा श्रमिक श्रीमती लीलावती को मात्र 200 रूपये में भरा हुआ गैस सिलेण्डर चूल्हा और रेग्यूलेटर मिलने से वह खुशी एवं राहत महसूस रही है. ग्राम ओबरी निवासी  लीलावती कहती है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने हम गरीब परिवार के महिलाओं को खाना बनाने के लिए गैसा सिलेण्डर और चूल्हा प्रदान कर हमारे जीवन में नई खुशियां ला दी है। पहले खाना बनाने के लिए जंगल से लकड़ी लाकर धुंऐ में परिवार के लिए भोजन बनाती थी। चूल्हे में आग सुलगाने से धुएं से पूरा रसोई घर भर जाता था भोजन बनाने में धुंऐ उनकी आंखो और मुंह में घुस जाती थी। जिससे उन्हें सांस लेने में परेशानियां का सामना करना पड़ता था। लेकिन अब राज्य सरकार ने गरीब महिलाओं के पीड़ा को पहचाना और उन्हें 200 रूपये में भरा हुआ गैस सिलेण्डर चूल्हा एवं रेग्यूलेटर प्रदान कर उनकी पीड़ा को दूर किया है। 
घरेलू महिलाओं के साथ साथ उन महिलाओं को भी राहत मिली है जो आंगनवाड़ी में बच्चों के लिए भोजन बनाने का काम करती थीं. ऐसी कहानी है ग्राम छोटेकापसी के गायत्री महिला समूह की. इस समूह द्वारा आंगनबाडी केन्द्र पी.व्ही.130 को बच्चों के नाश्ता, भोजन बनाने की कठिनाईयों को देखते हुए आंगनबाड़ी गुणवत्ता उन्नयन अभियान से प्रेषित होकर आंगनबाड़ी केन्द्र के लिए एक गैस सिलेण्डर, गैस चूल्हा, बर्तन रखने के लिए रैक, सब्जी रखने के लिए रैक तथा अन्य किचन सामान दिया गया. गैस सिलेण्डर मिलने से आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका को आग के धुएॅ से मुक्ति मिली है. समूह द्वारा गैस सिलेण्डर देने पर गांव के आंगनबाड़ी केन्द्रों के बच्चों के पालकों ने समूह के प्रति आभार व्यक्त किया। उल्लेखनीय है कि गायत्री महिला समूह गांव में कई सामाजिक काम में सक्रिय रहते है। समूह के सदस्य श्रीमती सीमा समद्दार, श्रीमती  संगीता पाल, श्रीमती लक्ष्मी राव, श्रीमती चैती नेताम, श्रीमती सावित्री यादव, श्रीमती निर्मला शील, श्रीमती रमा विश्वकर्मा, श्रीमती ज्योत्सना शील, श्रीमती संगीता घोष, श्रीमती रन्ना शील, श्रीमती सुप्रिया बाढ़ई आदि के उक्त कार्य की चर्चा क्षेत्र में आंगनबाड़ी केन्द्रों में स्वसहायता समूहों के माध्यम से प्रत्येक आंगनबाड़ी केन्द्रों में गैस कनेक्शन दिए जाने से आंगनबाड़ी केन्दोंं्र के बच्चों को समय पर गरम भोजन और रेडी टू ईट से बनाए जाने वाली व्यंजनेां को तैयार करने में सुविधा मिलेगी और स्वादिष्ट व्यंजनों से कुपोषण को समाप्त करने में मील का पत्थर साबित होगा। छत्तीसगढ़ में मातृशक्ति और शक्तिवान बनाने की दिशा में प्रधानमंत्री उज्जवला योजना कारगर पहल साबित हो रही है.

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

असत्य ही असत्य!


मनोज कुमार
इस बार जब मेरे मोहल्ले में रावण का कद नापा गया तो इस बार उसका कद कुछ फीट और बढ़ गया था। मैं पिछले कई सालों से देख रहा हूं कि मेरे मोहल्ले का रावण साल दर साल ऊंचा होता चला जा रहा है। बिलकुल वैसे ही जैसा कि हमारा असत्य। हम मोबाइल के जरिये असत्य के प्रतीक हो गये हैं। हर पल झूठ, हर पल धोखा और न जाने क्या क्या। ऐसे में मेरे मोहल्ले का रावण कुछ फीट और ऊंचा हो जाए तो हमें एतराज नहीं करना चाहिए और न ही इतराना चाहिए कि हमने रावण का कद और ऊंचा का पाठ तो जरूर पढ़ाते हैं लेकिन व्यवहार में सत्य को पराजित करने में कभी पीछे नहीं रहते। कर दिया। एतराज इसलिये नहीं होना चाहिए कि असत्य के इस प्रतीक ने हमसे ऊंचा होने की हिमाकत नहीं की है और इतराना इस बात पर नहीं चाहिए कि हमने असत्य के इस प्रतीक को इतना ऊंचा कर दिया। सच तो यह है कि हमें विजयादशमी मनाने का कोई नैतिक हक है ही नहीं क्योंकि हम अपनी पीढ़ी को असत्य पर सत्य की जीत का पाठ तो जरूर पढ़ाते हैं लेकिन व्यवहार में सत्य को पराजित करने में कभी पीछे नहीं रहते।

परम्परागत विजयादषमी का पर्व मनाने की तैयारी में पूरा समाज जुट गया है। हर साल हम खुद रावण बनाते हैं और उसे मारने का स्वांग भी खुद ही रच डालते हैं। परम्परा का निर्वाह करने के पीछे सत्य और असत्य की परख करना एक पैमाना हो सकता है किन्तु आज की स्थिति में क्या हम विजयादशमी मनाने की स्थिति में हैं? क्या वास्तव में हमने असत्य पर विजय पा ली है? सैंकड़ों साल पहले न जाने राम नाम के एक सात्विक ने रावण का वध किया था, सैकड़ों साल पहले न जाने एक युवा ने पिता के वचन की लाज रखने के लिये वनवास जाना मंजूर कर लिया था। रावण को मारने का हमारा साहस कब का मर चुका है और पिता के वचनों के खातिर वनवास जाने की बात कल्पना से परे है। जब भी वनवास जाने की बात होगी तो हम पिता को ही वनवास भेज देंगे। हमने इसके लिये वृद्धाश्रम बना दिया है। बात जहां तक रावण के मारने की है तो हम अपने आपको क्यों और कैसी सजा दें? आज हम अनैतिकता की पराकाष्ठा को छू रहे हैं। लोकलाज को त्याग दिया है और अराजकता के घोर अंधेरे में भटक रहे हैं। असत्य को असत्य से मारने की हरसंभव हम कोषिष कर रहे हैं। सत्य से हम दूर जा चुके हैं। जीवन की सुबह असत्य से होती है और इसी असत्य को बिछाकर सो जाते हैं।
विजयादषमी का अर्थ होता है विजय की दषमी और हम हर पल पराजित हो रहे हैं। हर कदम पर हमारी पराजय है। इस पराजय के काल में किसकी विजयादषमी और कौन मनाये विजयादशमी। विजयादशमी एक उत्सव की बेला है और यह बेला है असत्य पर सत्य की विजय की। सत्य से हम कोसों दूर हैं। सत्य का अर्थ सिर्फ असत्य बोलना और बोना है। असत्य का यह घनघोर अंधेरा, समाज के किसी कोने में नहीं है बल्कि हर कोना असत्य से काला काला हुआ जा रहा है। किसी समय अपनी मेहनत के बिना कमाने वाले धन को पाप की कमाई कहा जाता था और कोशिश होती थी कि बच्चों को इससे दूर रखा जाये। आज सारे पर्दे गिर गये हैं और बच्चों को पता है कि उसके ठाठ के रास्ते कहां से शुरू होता है। बचपन जब इस पाप की कमाई से बड़ा होता है तो सत्य कहां टिक पायेगा।



मुझे स्मरण हो आता है कि कभी अपने गांव में रामलीला किया करते थे। लगातार आठ नौ दिन की रामलीला। पूरा का पूरा आयोजन जुगाड़ से। हल्की ठंड में लोग अपने अपने घरों से बैठने की व्यवस्था कर आते। मजे लेते और अपने बच्चों को भी अगले बरस रामलीला मंे भागीदार बनने के लिये प्रोत्साहित करते। घर घर से मदद आती। इस रामलीला का मकसद हुआ करता सत्य का संदेश पहुंचाना। इसका मकसद हुआ करता था लोगों के भीतर छिपी प्रतिभा से समाज को अवगत कराना लेकिन अब रामलीला होती है तो पूरी साज-सज्जा के साथ। उस काल के राम आज हमारे बीच आ जाएं तो साज-सज्जा देखकर चौंक जाएं। यह बाजार है और बाजार की लीला से भला कौन अपरिचित है। यह रामलीला की लीला है जो संदेश देती है स्वयं के विजय हो जाने का। जो बताती है बाजार के रास्ते चलो, सत्य और असत्य के फेर में मत पड़ो। विजयादषमी का जो अर्थ बाजार सिखाता है, वही विजयादशमी है क्योंकि अब यह परम्परा का उत्सव नहीं, बदलते बाजार का फेस्टिवल है।

रविवार, 9 अक्टूबर 2016

छोटी-छोटी बातें


मनोज कुमार
सुबह-सबेरे दवा खाते समय जब मेरी बिटिया कहा कि पापा, ये छोटी-छोटी गोलियां कितना असर करती हैं ना? वह ऐसा कहते हुए कांधे पर अपने वजन से ज्यादा बोझ वाला बैग टांगे स्कूल की तरफ चल पड़ी लेकिन अपने पीछे मेरे लिए सवालों का पहाड़ छोड़ गयी. मैं सोचने लगा कि क्या आप एक बार में एक पूरी रोटी खा सकते हैं? क्या एक बार में आप पांच या पचास सीढ़ी चढ़ सकते हैं? गाड़ी कितनी भी आरामदेह हो, क्या आप अकेले गाड़ी की पूरी सीट पर अकेले बैठ सकते हैं? सबका जबाब पक्के में ना में ही होगा. ना में इसलिए कि जिंदगी को एकसाथ हम जी नहीं सकते हैं. हम जिंदगी को टुकड़ों में जीते हैं. जिंदगी ही क्यों, इससे जुड़ी हर चीज को हम टुकड़े ना कहें तो छोटे-छोटे हिस्सों में पाते हैं. आप कितने भी धनी हों, आपके सामने पकवान का ढेर लगा हो लेकिन आप छोटे-छोटे निवाला ही खा पाएंगे. ना तो एक पूरी रोटी एक बार में गले से नीचे उतरेगी और न कोई मिष्ठान. सीढिय़ां भी आप एक साथ नहीं चढ़ सकते हैं. एक-एक करके आप सीढ़ी चढ़ते हैं और आपके पास कितनी भी महंगी और सुविधाजनक कार हो, आप एक कोने की सीट में ही बैठते हैं. इसका मतलब तो हुआ कि हमारी पूरी जिंदगी छोटी-छोटी बातों से बनती है.
छोटी-छोटी बातों से बनती जिंदगी बेहद खूबसूरत होती है. पहला अक्षर मां से सीखते हैं लेकिन मां कितनी बड़ी दुनिया होती है, यह हमें एक उम्र पूरी कर लेने के बाद पता चलता है. कक्षा में अ, आ से हम सीखना शुरू करते हैं और लम्बे अभ्यास के बाद कुछ पढऩे-लिखने के काबिल बनते हैं. मैं सोचता चला जा रहा हूं. जब हमारी जिंदगी छोटी-छोटी बातों से है तो हम दुखी क्यों हैं? क्यों हमारे सपने अधूरे रह जाते हैं? क्यों हमारी हसरतें पूरी नहीं हो पाती हैं? क्यों हमें अपनी मंजिल को पाने के लिए मशक्कत करना पड़ती है, बावजूद हम मुस्करा नहीं पाते हैं. सपने और सच के बीच के इस फासले का कारण अब मुझे कुछ कुछ समझ आने लगा था. मुझे लगने लगा था कि हम सबकुछ एक साथ पा लेना चाहते हैं. जिंदगी की बुनियादी बातों को हम दरकिनार कर देते हैं और छोटी-छोटी बातों से बनने वाली जिंदगी को हम बड़े सपने और बड़ी बातों में उलझा देते हैं. सच को सच, मानने के बजाय हम सपनों को उलझनों में डाल देते हैं. 
किशोरवय के हमारे बच्चे इन दिनों छोटी सी असफलता से निराश होकर जान क्यों देने लगे हैं? यह सवाल मेरे लिए यक्ष प्रश्र की तरह था लेकिन बिटिया की बातें सुनकर जैसे मुझे जवाब मिल गया. छोटी असफलता बच्चों को डराती नहीं है बल्कि उनके सामने सपनों का पहाड़ रख दिया जाता है. जो मां-बाप कभी अव्वल दर्जे में परीक्षा उत्तीर्ण न की हो, वह बच्चे में सपना पालने लगते हैं. वे भूल जाते हैं कि उनके भीतर जितनी योग्यता है, उनका बच्चा उनसे कहीं ज्यादा योग्य है लेकिन वे इस सच को कबूल नहीं कर पाते हैं. मां-बाप कई कारणों से अपने छोटे-छोटे सपने सच नहीं कर पाये तो बच्चों से अपेक्षा पाल लेते हैं. जिंदगी की छोटी-छोटी बातों को भूल जाने के कारण ही मां-बाप के सपनों के बोझ के तले बच्चे कुचल जाते हैं. उनके सपने तो सपने, उनकी सांसें भी थम जाती है. और यहीं से फिर जिंदगी शुरू होती है छोटी-छोटी बातों से. मां-बाप को बच्चे के जाने के बाद याद आता है कि उनका बच्चा क्या बनना चाहता था, उसके सपने क्या थे, उसकी पसंद और नापसंद क्या थी लेकिन तब तक समय आगे निकल चुका होता है. 
सच ही तो है कि हम किताब के पन्ने एक साथ नहीं पढ़ सकते. एक वाक्य पूरा पढऩे के बाद दूसरा वाक्य और इस तरह आगे बढ़ते हुए हम पूरी किताब पढ़ लेते हैं. जिंदगी किसी किताब से क्या कम है? इसे भी तो एक एक वाक्य की तरह ही पढऩा होगा. जीने के लिए बड़े सपने देखना बुरा नहीं है लेकिन सपने को सच करने के लिए बेबी स्टेप लेना होगा. कामयाबी मुश्किल नहीं लेकिन हर बार हमें कछुआ और खरगोश की कहानी से सबक लेकर कामयाबी की तरफ कदम बढ़ाना होगा. छोटी-छोटी बातों से जिंदगी का जो ताना-बाना बनता है, जो जिंदगी बुनी जाती है, वह आपको सुकून देती है. सफलता देती है. धूप मेें पसीना बहाता, बारिश में भीगता, ठंड में ठिठुरते हुए भी एक आम आदमी के चेहरे पर मुस्कान दिखती है तो छोटी-छोटी बातों से. जिंदगी का यह फलसफा पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की उस कविता में झलकती है जिसमें कहा गया है कि चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं, चाह नहीं मैं देवों के शीश पर चढक़र इठलाऊं. क्या आज से हम अपनी जिंदगी नहीं, सोच की शुरूआत छोटी-छोटी बातों से करेंगे?

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

गांधी का सेवा संकल्प


मनोज कुमार
 
मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त करते हैं और परिवार की जवाबदारी उठाने के लिए वकालत की पढ़ाई करते हैं लेकिन कब और कैसे वे इस नाम से परे होकर महात्मा बन जाते हैं और उनका परिवार पीछे छूट जाता है और पूरे भारत वर्ष के लिए वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से पुकारे जाते हैं. एक व्यक्ति से महात्मा हो जाना और हो जाने के बाद लोगों के दिलों में बसे रहना, उनके कहे अनुरूप जीवन जीना और दूसरों को सिखाना कि बापू कैसे सादगी भरा जीवन जीते थे,संभवत: इनके बाद शायद ही कोई दूसरा होगा. गांधी विश्व पुरुष हैं। स्वाधीनता, स्वदेशी, स्वराष्ट्र, स्वतंत्रता और समता, अहिंसा, सत्याग्रह और स्वच्छता सहित सारे मूल्य गांधीजी के लिए शब्द भर नहीं थे। उन्होंने सभी मूल्यों को सत्याग्रह की अग्नि आंच में तपाया था।
  महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने गांधीजी के बारे में 1944 में लिखा था-‘आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था।’ उन्होंने यह भी लिखा है-‘अपने राष्ट्र का ऐसा लीडर जिसे बाह्य शक्ति का सहारा प्राप्त नहीं था। एक ऐसा राजनेता जिसकी सफलता किसी प्रयोजन या तकनीक पर निर्भर नहीं बल्कि मात्र उसके व्यक्तित्व की प्रभावी शक्ति पर है। एक ऐसा संघर्षकर्ता जिसने शक्ति के प्रयोग से नफरत की। एक ऐसा व्यक्ति जिसके दिमाग में प्रबुद्धता और स्वभाव में शालीनता थी, जिसने अपनी सम्पूर्ण क्षमता अपने राष्ट्र के कल्याण पर लगा दी, और इस तरह सदैव के लिए उत्कृष्ट हो गया।’
  गांधीजी बहुआयामी व्यक्तित्व के धारक थे। वह एक नवीन सामाजिक व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे जिसमें एक इंसान या एक वर्ग किसी दूसरे का शोषण न कर सके। समाज को बनाने-संवारने में और उसकी जरूरतों के साधन उत्पन्न करने में सब बराबर की हैसियत से सम्मिलित रहें। संसाधनों का वितरण जात-पात और जन्म के आधार पर न हो। धन-सम्पत्ति के धारक उसे मात्र अपना अधिकार न समझें। ज्ञान एवं व्यवहार अलग-अलग नहीं बल्कि एक दूसरे के सहायक हों।
  अंग्रेजों से लड़ाई शुरू करते समय गांधीजी का एक सूत्र था कि यह समय पश्चाताप और प्रायश्चित का है। लड़ाई गंदगी से है। यह समय भी पश्चाताप और प्रायश्चित का ही है। असल बात है गांधीजी के साथ कुछेक कदम चलना, सत्य का आग्रही होना, स्वयं स्वच्छ होना और भारत को स्वच्छ बनाए रखने के कर्म करना। गांधी भारतीय राष्ट्रभाव की जिजीवीषा है। गांधीजी का आंतरिक जीवन गहन धार्मिक जीवन था जिससे उनके समस्त बाह्य व्यवहार में सार्थकता एवं शक्ति पैदा होती थी। लेकिन वह धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं चाहते थे। उनका यही प्रयास रहा कि जितना सम्भव हो सके वह दिन में अधिक से अधिक लोगों के साथ घुल-मिल सकें। अपने आप को अहंकार के बंधनों से मुक्त रखना उनके जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा है। वे सभी धर्मों का समान रूप से आदर करते थे और उनकी उत्तम शिक्षाओं की सराहना करते थे।
गांधीजी की स्वच्छता की विचारधारा हार्दिक स्वच्छता की विचारधारा थी। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि हमारा हृदय, हमारी सोच धोखाधड़ी, कपट, नफरत से पाक रहे। इससे दूसरों पर इसका प्रभाव पड़ेगा। इस तरह पूरा समाज स्वच्छ हो जाएगा। इस तरह सामूहिक रूप से आंतरिक स्वच्छता का परिवेश बनेगा जो पूरी सृष्टि पर छा जाएगा। इस तरह पूरे विश्व से युद्ध, हिंसा, नफरत, छुआछूत शोषण, असमानता जैसी कुरीतियां समाप्त हो जाएंगी। जीवन के सभी क्षेत्र पवित्र हो जाएंगे चाहे वह पर्यावरण हो, अर्थव्यवस्था हो, राजनीति हो या समाज। अर्थात जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हमारा अंत:करण, हमारी सोच, हमारा दृष्टिकोण हर तरह की गंदगी से शुद्ध रहें।  छुआछूत हमारे समाज में अभिशाप की तरह फैला हुआ है। यह ऐसी गंदगी है कि इसे जड़ से उखाड़ फेंकना समय की सबसे बड़ी अनिवार्यता है। कौन ‘छूत’ है कौन ‘अछूत’, यह विभेद मिटाकर दोनों पक्ष भाई-भाई की तरह गले लग जाएं, यह गांधीजी का एक अरमान, एक सुनहरा स्वप्न रहा है।
गांधी के जीवन-दर्शन में स्वच्छता के बाहरी और आंतरिक दोनों पक्षों का एक-दूसरे से अटूट संबंध दिखता है। यह सत्य है कि बाहरी सफाई गांधी को इतनी प्रिय थी कि वे काया, कपड़े, घर-बार से लेकर मल-मूत्र तक की सफाई के काम खुद करते थे। अपना तो अपना, दूसरों का मल-मूत्र भी साफ करने से उन्हें परहेज नहीं था। अपनी ‘आत्मकथा’ (सत्य के प्रयोग) में उन्होंने अपने सफाई संबंधी कई कार्यों का उल्लेख किया है, जिनका संबंध उनके कपड़े धोने, हजामत बनाने से लेकर मल-मूत्र तक की सफाई से था। उनके लिए सफाई का मतलब तडक़-भडक़ वाली पोशाक पहनना, भव्य मकान में रहना नहीं था, न नाना आभूषणों से शरीर को सजाना था। उनकी सफाई सादगी का पर्याय थी। साफ-सुथरे पहनावे से लेकर मिट्टी, बांस, खपरैल से बने मकानों की सादगी ही उन्हें पसंद थी। उनके दक्षिण अफ्रीका में बनाए फीनिक्स आश्रम से लेकर अमदाबाद के साबरमती, वर्धा के सेवाग्राम, बिहार के भीतिहरवा जैसे आश्रमों को देख कर इस सत्य का पता चल जाता है।
गांधीजी ने न केवल भारतीय समाज को अपितु समूचे संसार को जीवन के विविध पहलुओं के उस उजले और स्याह पक्ष से अवगत कराया है जिससे उनके जीवन में सुख और दुख दोनों की अनुभूति हो सकती है। भारत इस समय संकल्प लेकर चल रहा है कि वह 2019 तक स्वच्छ भारत अभियान को पूर्ण कर लेगा. यह संकल्प एक सरकार का है लेकिन गांधीजी ने कोई तारीख तय नहीं की थी और न ही उनकी कोई शर्त होती थी. सेवा का संकल्प था और एक संकल्प था लोगों का स्वयं होकर अपने जीवन में बदलाव लाना. भारत सरकार का स्वच्छ भारत अभियान बेहतरी की दिशा में एक पहल है लेकिन विशाल भारतीय समाज स्वयं को बदले तो हर साल 2 अक्टूबर ही क्यों, हर तारीख स्वच्छता, सत्य और अहिंसा के नाम होगा. 

सोमवार, 19 सितंबर 2016

खुले में शौच से तौबा करते आदिवासी परिवार


-अनामिका

85 साल का आदिवासी गुगरी और उसकी बीवी कमला अब खुले में शौच के लिए नहीं जाते हैं। उनके घर में ही शौचालय बन गया है और अब दोनों इसका उपयोग करते हैं। इनकी तरह ही बैगा आदिवासी सुकाल ने भी खुले में शौच से तौबा कर ली है। खुद के घर में शौचालय बन जाने से सरस्वती बाई को तो जैसे सारी दुनिया का सुख मिल गया है। वह कहती है कि खुले में शौच करना मजबूरी थी लेकिन हमेशा डर बना रहता था। मैदान के आसपास से बार बार पुरुषों के आने-जाने से उन्हें अनेक किस्म की परेशानी होती थी। इस परेशानी से सरस्वती बाई ही अकेली परेशान नहीं थी बल्कि गांव भर की महिलाओं को दिक्कत हो रही थी लेकिन स्वच्छ भारत अभियान ने उनके जीवन का ढर्रा ही बदल दिया है।  यह तो महज चंद उदाहरण हैं। छत्तीसगढ़ खुले में शौचमुक्त राज्य की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर समूचे देश में स्वच्छ भारत अभियान चल रहा है लेकिन छत्तीसगढ़ की सफलता कुछ अलग मायने रखता है। आदिवासी बहुल राज्य होने और दशकों तक विकास से दूर रहने वाले छत्तीसगढ़ में ऐसे लोगों ने भागीदारी की है जिनकी कल्पना नहीं कर सकते। राजनांदगांव जिले के बकरी पालकर अपना जीवन चलाने वाली वृद्धा तो जैसे हिन्दुस्तान के सामने मिसाल बनकर उभरी है। इसने शौचालय बनाने के लिए अपनी बकरियां बेच दी। एक आयोजन में प्रधानमंत्री श्री मोदी ने उनके पैर छूकर इस बात को स्थापित किया कि खुले में शौचमुक्त की दिशा में इस महिला का कार्य अनुकरणीय है।
छत्तीसगढ़ सरकार की लोकहितैषी सोच के साथ सामाजिक दायित्व को पूरा करने इस अभियान के लिए डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने पंचायत चुनाव लडऩे वाले प्रतिनिधियों के घरों में शौचालय होना अनिवार्य करने वाला देश का पहला राज्य है। इतना ही नहीं बल्कि इस अभियान को सफल बनाने और लोगों को इस दिशा में जागरूक करने के लिए पूरे प्रदेश के सभी सत्ताइस जिला पंचायतों, 146 जनपद पंचायतों और 10 हजार 971 ग्राम पंचायतों में  नौरत्नों का गठन कर उन्हें समुदाय को प्रोत्साहित करने स्वच्छता अभियान से जोड़ा गया है। ये नौरत्न अपने-अपने क्षेत्रों में शौचालय निर्माण, उपयोग और साफ-सफाई के प्रति गांवों और मोहल्लों में लोगों को जागरूक कर रहे है। वर्तमान में सामाजिक जनभागीदारी, जनप्रतिनियों के सहयोग और राज्य सरकार के भरसक प्रयास से प्रदेश में  सात लाख से अधिक व्यक्तिगत और समुदाय आधारित शौचालय का निर्माण हो चुका है। इसके साथ ही राजनांदगांव जिले के दो विकासखण्ड अम्बागढ़-चौकी और छूरिया सहित प्रदेश के 2063 ग्राम पंचायतों को खुले में शौच मुक्त घोषित किया गया है। 
बिना किसी सरकारी मदद के ग्रामीणों द्वारा स्वयं की पहल पर घरों में शौचालय बनाने की ग्राम बावली की गाथा राजनांदगांव जिले से निकलकर सात समंदर पार अमेरिका में यूनिसेफ के मुख्यालय न्यूयार्क तक पहुंच गयी है। जिले के छुरिया विकासखंड के आदिवासी बहुल ग्राम बावली खुले में शौचमुक्त हो गया है। न्यूयार्क स्थित यूनिसेफ मुख्यालय में ग्लोबल डिप्टी एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर योका ब्रैंट भी उच्च स्तरीय दल के साथ छुरिया विकासखंड के ग्राम बावली आ चुके हैं। वहां खुले में शौच मुक्त करने ग्रामवासियों द्वारा किये गये प्रयासों की दाद दी। जंगलों के बीच बसे बावली के ग्रामीणों ने स्वयं की पहल पर गांव के सभी 57 घरों में शौचालय का निर्माण कराया है।
        ग्राम बावली के ग्रामीणों द्वारा पारंपरिक निर्माण पद्धति से सस्ते शौचालय का निर्माण किया गया है। शादी-ब्याह एवं अन्य सार्वजनिक कार्यक्रमों में बाहर से आने वाले सगे-संबंधितों के लिए सार्वजनिक शौचालय भी बनाया गए है। बावली ग्राम में घरों में शौचालय नहीं होने से महिलाओं एवं बुजुर्गों को पहले कठिनाईयों का सामना करना पड़ता था, वहीं खुले में मल त्याग से गांव में बीमारी भी फैलती थी। बावली निवासी श्रीमती सरस्वती बाई बताती है कि शौच के लिए दूर तक जाना, झाडिय़ों की ओर को ढूंढना एवं रास्ते में पुरुषों की आवाजाही से बार-बार खड़ा होना। इन समस्याओं से महिलाओं को रोज गुजरना पड़ता था। ग्रामीण मुन्नी बाई एवं मीना साहू ने बताया कि शौचालयों के निर्माण एवं इस्तेमाल से गांव में स्वच्छता कायम हुई है एवं अस्वच्छता के कारण गांव में जलजनित बीमारियां फैलने की आशंका कम हुई है। उन्होने कहा कि घर में शौचालय बनने से महिलाओं की मान-सम्मान की रक्षा हुई है।
छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचल जंगलों में निवासरत ग्राम लमनी के बैगाओं-आदिवासियों में जागृति आई है। इसी कड़ी में सुकाल बैगा का कहना था कि पहले शौच के लिए बाहर जाते थे। पहले झाड़ी, खेत, डबरा-झोरका में शौच करने जाना होता था। पंच-सरपंच और अधिकारियों द्वारा समझाईश देने पर घर में शौचालय बनवा लिया है। सुकाल ने बताया कि उनके परिवार में 10 सदस्य है जिसमें  दो बेटा-बहू और दो नाती (पौत्र) हंै। सभी शौचालय का उपयोग करते हंै, अब शौच के लिए बाहर नहीं जाते। क्योंकि शौचालय बन जाने से शौच हेतु सुविधा मिल गई है। सुकाल बताता है कि घर में शौचालय नहीं होने के कारण शौच के लिए बाहर जाना पड़ता था। रात्रि में जंगली जानवर, सर्प-बिच्छू का डर बना रहता था। अब घर में शौचालय हो जाने से शौच के लिए चिंता दूर हो गई है। परिवार के लोग अब शौचालय में ही जाना चाहते है। शौचालय अच्छा लगता है। अब सुकाल के घर वालों को रात्रि, बरसात होने पर भी शौच के लिए चिंता नहीं है। 
 इसी कड़ी में विकासखण्ड पथरिया के भूमियापारा के 85 वर्षीय गुगरी ने बताया कि पहले घर में शौचालय नहीं होने के कारण शौच के लिए बाहर जाने की मजबूरी थी तथा शौच हेतु खेत, बाड़ी, पेड़ के नीचे नाला एवं छाया का सहारा लेना पड़ता था। उन्होंने बताया कि स्वच्छता अभियान को समझकर एवं दूसरे व्यक्ति से प्रेरणा लेकर अपने घर में शौचालय का निर्माण करा लिया है। शौच के लिए अब बाहर जाना नहीं पड़ रहा है। गुगरी ने बताया कि वे जड़ी-बूटियों से लोगों का ईलाज भी करते है। उन्होने यह भी बताया कि जड़ी-बूटियां अमरकंटक और बस्तर के वनों से लाते है। मोहल्ले का नारक सिंह और गुगरी ने बताया कि एक लडक़ा है। जो कमाने खाने बाहर गया है। गुगरी का 8 नाती-पोता भी है। उन सभी बच्चों को अपने साथ रखा है और बच्चों का देखभाल भी कर रहा है। उन्होने बताया कि शौचालय बनने के बाद ही शौचालय का उपयोग करने लगे है। बाहर जाने की झंझट और चिंता दूर हो गई है। बरसात के दिनों में पानी बरसते और कीचड़ में शौच के लिए जाना पड़ता था। अब इससे भी मुक्ति मिल गई है।
    भूमियापारा के 85 वर्षीय गुगरी और पत्नी  कमला ने बताया कि घरों में शौचालय बनाने के लिए पारे, मोहल्ले में व्यक्तियों को समझाइश देते है। उनका कहना है कि स्वच्छता अभियान शासन की अच्छा अभियान है। घर में शौचालय बनने से गंदगी और अस्वच्छता नहीं होती है। अब बच्चे लोग बीमार भी कम पड़ रहे है। शासन की यही मंशा है कि लोग स्वच्छता को अपनाये और स्वस्थ जीवन व्यतीत करें। छत्तीसगढ़ में स्वच्छ भारत अभियान जिस तेज गति से चल रहा है और लोगों की भागीदारी बढ़ रही है, उससे लगता है कि समय से पूर्व ही छत्तीसगढ़ स्वच्छ भारत अभियान के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा।

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...