रविवार, 15 सितंबर 2019
शुक्रवार, 13 सितंबर 2019
बेस्ट सेलर वाली हिन्दी का उत्सव मनाइये
हिन्दी दिवस पर विशेष
बेस्ट सेलर वाली हिन्दी का उत्सव मनाइये
मनोज कुमार
सितम्बर के आने की आहट के साथ ही हम हिन्दीमय हो जाते हैं। चारों तरफ हिन्दी दिवस, पखवाड़ा और महीना मनाये जाने का अनवरत सिलसिला जारी हो जाता है। सितम्बर माह बीतते ही हम वापस अपने ढर्रे पर आ जाते हैं जहां हिन्दी केवल औपचारिक रूप से हमारे साथ होती है। हिन्दी की अनिवार्यता का महीना सितम्बर का होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि संविधान में 14 सितम्बर के दिन को मान्यता नहीं मिलती तो हिन्दी आज भी नेपथ्य में विचरण करता रहता और हम अंग्रेजी के मोहमाया में लिपटे होते। साल 1975 में नागपुर में विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया था और इसके बाद हर चार बरस के अंतराल में यह आयोजन विश्व मंच पर होता आ रहा है लेकिन ऐसी क्या मजबूरी है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ से हिन्दी को विश्व मंच पर मान्यता नहीं मिल पायी है? किसी और पर दोष थोपने के बजाय हमें स्वयं आत्ममंथन करना होगा। यह समझने और जानने की कोशिश करना होगी कि आखिर हम अब पायदान पर क्यों खड़े हैं? क्यों हिन्दी का ताज विश्व के माथे पर पहनाने में चूक रहे हैं? ऐसा भी नहीं है कि इन बीते वर्षों में भारत ने दूसरे कई विषयों पर पहल ना की हो और संयुक्त राष्ट्रसंघ की उन्हें मंजूरी ना मिली हो। फिर ऐसा क्या है और क्यों है कि हम हिन्दी को लेकर याचक की मुद्रा में खड़े हैं?
हिन्दी को विश्व मंच पर वह स्थान नहीं मिल पाया, इस बात का दुख तो हम हिन्दीभाषियों को है और रहेगा लेकिन यहां सवाल यह है कि भारतीय समाज में भी क्या हमने हिन्दी को वह सम्मान दे पाए जिसके लिए सालों से आस लगाए हैं? हिन्दी को राजभाषा का दर्जा है लेकिन हम अब तक उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा क्यों नहीं दे पाए? क्यों जन-जन की बोली नहीं बना पाए? हैरानी है कि हम साहित्यिक आयोजनों को भी लिट् फेस्ट बना दिया है। हिन्दी की किताबें सर्वश्रेष्ठ होने के स्थान पर बेस्ट सेलर की श्रेणी में चिंहित किए जाने की एक परम्परा विकसित कर ली है। दुर्भाग्य और शर्मनाक यही नहीं है बल्कि यह है कि हिन्दी के इस तथाकथित प्रतिष्ठित आयोजन में हिन्दी के वो नामधारी हस्ताक्षर उपस्थित रहते हैं और गर्व के साथ लिट् फेस्ट और हिन्दी की बेस्ट सेलर किताबों को सूचीबद्ध कर गर्व से भर उठते हैं। जिनके कंधों पर हिन्दी की जवाबदारी है और जिनकी पहचान हिन्दी से है और वही लोग जब हिन्दी को पहनकर अंग्रेजी की तरफदारी करेंगे तो हिन्दी आगे सौ साल भी गरियायी जाती रहेगी। उसे प्रथम पंक्ति में खड़े होने में युग-युग लग जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि विश्व मंच पर हिन्दी को स्थापित करने का स्वप्र देखने के पहले हम अपने घर में हिन्दी की श्रेष्ठता को बनाए और बाजार के हक में आवाज में आवाज मिलाने से खुद को बरी करने की कोशिश करें। लेकिन जो हालात हैं, वह इस बात का यकीन नहीं दिलाते हैं कि हिन्दी के लिए सचमुच में हम चिंतित हैं।
इस तथाकथित साहित्यिक आयोजनों के केन्द्र में तो हिन्दी है मगर सारा तानाबाना अंग्रेजियत लिए हुए होता है। अंग्रेजी का ऐसा मुल्लमा चढ़ाया जाता है कि हिन्दी बेचारी हो जाती है और किसी कोने में बैठकर बिसूरती रहती है। हिन्दी के कंधे पर सवार होकर अंग्रेजी में बकबकाते लोग ऐसे प्रसन्न होते हैं मानो वो शिरकत नहीं करते, ये आयोजन नहीं करते तो हिन्दी गुमनाम हो जाती। वे भूल जाते हैं कि सवा सौ करोड़ नागरिकों के इस देश में हिन्दी भाषा ही नहीं, विचार है। एक जीवनशैली है और इन सवा सौ करोड़ का 90 फीसदी लोग हिन्दी पढ़ते, बोलते और लिखते हैं। अर्थात जिन हस्ताक्षरों को इन आयोजनों में अपना रौब झाडऩे का मौका मिलता है, वे भूल जाते हैं कि हिन्दी ने उनसे किनारा कर लिया तो उन्हें बचाने वाला कोई नहीं होगा। बेहतर होगा कि वे अभी भी अपनी समझ ठीक कर लें और अंग्रेजियत के लबादे में हिन्दी को कवच बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने से बचें। ये बौनेकद के आयोजन हिन्दी से बड़े होते हैं, हिन्दी इनसे नहीं। हिन्दी हमेशा से श्रेष्ठ है और रहेगी।
हैरानी इस बात की भी होती है कि जिन सरकारी स्कूलों में पढक़र हिन्दी के महान हस्ताक्षरों की जयकारा हिन्दी समाज करता है, वही हस्ताक्षर अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूलों में पढ़ाने भेजने से रोकते हैं। पब्लिक स्कूलों में पढ़ाकर हम उन्हें अंंग्रेजी में बोलता देखकर गर्व से भर उठते हैं। निश्चित रूप से हर बच्चे को सभी भाषाएं सीखना चाहिए लेकिन हिन्दी के कंधे पर चढक़र अंग्रेजी या किसी अन्य विदेशी भाषा की जयकारा किया जाना मंजूर नहीं है। हिन्दी के मूर्धन्य हस्ताक्षर सरकारी स्कूलों के बंद किए जाने पर विलाप करते हैं।
सरकार को निकम्मी प्रमाणित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं लेकिन क्या कोई ऐसा हस्ताक्षर है जो अपने ही पुराने स्कूल में जाकर बच्चों को पढ़ाने का कोई प्रयास किया हो? उन नवोदित पीढ़ी के पास जाकर कभी यह बताने की कोशिश की हो कि श्रेष्ठता स्कूल के भवन में नहीं बल्कि मन में है। उस विश्वास में है जहां एक मल्लाह दुनिया में शीर्ष पर जा बैठता है और जिसने कभी पब्लिक स्कूल का चेहरा भी नहीं देखा। जीवन में सादगी और सभ्यता इन्हीं असुविधाहीन भवनों से आती है क्योंकि पब्लिक स्कूल के एयरकंडीशन कक्षाओं में केवल विलासिता मन में भर जाती है और डिग्री हासिल करने के बाद मन में एक ही इच्छा रह जाती है कि आगे का जीवन विलासिता के साथ ही गुजारना होगा। लालबहादुर शास्त्री के सादा जीवन को हम स्मरण में रखते हैं तो उन स्कूलों में जाकर क्यों नहीं पढ़ाते हैं। किताबों के किसी पाठ में उनके बारे में सौ-पचास पंक्तियां लिखी होती हैं और हम मान लेते हैं कि बच्चों को शास्त्रीजी की जीवनी पढऩे से उन्हें प्रेरणा मिल गई होगी। अरे साहब, सरकारी स्कूलों में जाकर बच्चों को सिखाने की बात को एकबारगी किनारे छोड़ भी दें तो वर्तमान का क्या कोई मूर्धन्य हिन्दी सेवक यह बताने की कृपा करेगा कि अपने बच्चों, नाती-पोतों को आखिर बार किसी महान नेता के बारे में चर्चा की थी? उनके जीवन से सीख लेने की प्रेरणा दी थी? तब शायद आपको उस बच्चे की तरह बगले झांकने के लिए मजबूर होना पड़ेगा जो परीक्षा में तो बैठ गया है लेकिन उसे कुछ नहीं मालूम। पिछले दिनों एक बड़े नाम के सज्जन ने बताया कि उनके पोते को हिन्दी में पचास का अर्थ नहीं मालूम लेकिन अंग्रेजी के फिफ्टी को वह समझ लेता है। इस प्रसंग को मनोरंजन की श्रेणी में रखा जाना चाहिए क्योंकि अगर बच्चा पचास का अंक भी नहीं समझ पा रहा है तो इसमें आपकी गलती है महानुभाव क्योंकि आप उसे पब्लिक स्कूल में भेजकर गलती नहीं करते तो शायद वह फिफ्टी समझ नहीं पाता लेकिन पचास समझने में वह भूल नहीं करता। वही बच्चा जब स्कूल से लौटता है तो उसे श्रीमुख से लिटिल लिटल वंडर स्टार सुनकर आप झूम उठते होंगे लेकिन मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं ना सुना पाने से आप खीझ उठते हैं। मां खादी की चादर बच्चे को सिखाने के बजाय आप सभाओं में बच्चे की कमियां गिनाकर कहते हैं कि आज के बच्चों को हिन्दी शिक्षा की अनिवार्यता है। सवाल यह है कि यह अनिवार्यता बच्चों के लिए या हम पालकों के लिए है, इस पर मंथन किया जाना, आवश्यक है।
हिन्दी कमतर होती जा रही है, का सारा आरोप, सारा दोष हिन्दी पत्रकारिता के मत्थे मढ़ दिया जाता है। कुछ हद तक बात सही हो सकती है लेकिन सभी दोष, सभी आरोप सही हो, यह अनावश्यक है। निश्चित रूप से इस बात का पक्ष नहीं लिया जा सकता है कि जो गलत हो रहा है, वह गलत नहीं है। लेकिन जिस पत्रकारिता को आपने मीडिया बना दिया हो, जो मीडिया बाजार के नियंत्रण में हो, उससे आप कितनी और कैसी अपेक्षा करेंगे? शुक्र मनाना चाहिए कि जो कुछ हिन्दी पढ़ और बोल पाने की स्थिति में आप अपने को पाते हैं तो वह इन्हीं हिन्दी प्रकाशनों के माध्यम से ही। अन्यथा जो अपेक्षा बाजार की मीडिया से है, वह तो आपको नेपथ्य में ले जाकर पटक देती है। कुछेक शीर्षक जरूर हिन्दी के साथ अंग्रेजी में लिखे जा रहे हैं लेकिन इनके परिशिष्ट में आप देखेंगे कि हिन्दी की शुद्धता कायम है। बल्कि हिन्दी के साथ हिन्दुस्तानी भाषा की जो मिठास है, वह आपको तरोताजा कर देती है। मुद्रण की नवीनतम विधि और उस पर होने वाले खर्च का भार बाजार ही उठाता है तो हल्के-फुल्के समझौता किए जाने पर कोई हंगामा करने के स्थान पर उनकी मजबूरी को समझते हुए स्वीकार करना चाहिए। यह इसलिए भी कि हम स्वयं बोलचाल में 25-30 प्रतिशत तो अंग्रेजी का उपयोग करते ही हैं, तब दूसरे से एतराज करने का कोई हक हमें नहीं बनता है। आवश्यक यह है कि हम हिन्दी को अपने जीवन में उतारें, वह भी पूरी ईमानदारी से। हिन्दी को प्रतिष्ठा की भाषा बनाए ना कि दोयम दर्जे की। दुर्भाग्य की बात यह है कि अंग्रेजी हमें बोलना आए या नहीं आए लेकिन हम बोलेंगे अंग्रेजी जरूर लेकिन हिन्दी को लेकर मन में एक अविश्वास का भाव पनपता रहता है। यही नहीं, हम हिन्दी के संवर्धन के लिए कभी कोशिश इसलिए नहीं करते हैं क्योंकि हमारा जन्म तो भारत में हुआ है और हम हिन्दी परिवार में पले-बढ़े हैं तो हिन्दी क्या सीखना? यहीं से हिन्दी के गौरव का क्षरण शुरू होता है। बाजार की पहली सीख यही होती है कि जिसे असरदार बनाना है, उसकी गुणवत्ता का भी ध्यान रखा जाए। हिन्दी की गुणवत्ता की तरफ हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया तो हिन्दी को लेकर विश्व मंच की सहमति की ओर ताकना हमारी मजबूरी है। हमारी कमजोरी है कि हमारा कोई बड़ा प्रतिनिधि विश्व मंच पर अपनी बात कहता है तो सालों-साल उसे हम गाते रहते हैं लेकिन इस सिलसिले का आगे जारी रखे जाने की कोई कोशिश नहीं की जाती है। बेहतर होगा कि हमारा हर नेता, हर प्रतिनिधि विश्व मंच पर हिन्दी में ही अपनी बात कहे तो भारत की श्रीवृद्धि होगी। यह विनय नहीं, नियम होना चाहिए कि हम हिन्दी में ही बात करेंगे। बेहतर होगा कि इस बार संकल्प लें कि चाहे जो हो, हिन्दी को अपनाने के लिए विश्व मंच हमें आमंत्रित करें क्योंकि दुनिया की श्रेष्ठ भाषा हिन्दी ही है।
सोमवार, 22 जुलाई 2019
देवालय जाना हो तो ‘आजाद’ का देवालय जाइए
देवालय जाना हो तो ‘आजाद’ का देवालय जाइए
-मनोज कुमार
तारीखों के पन्ने में जुलाई 23 तारीख भी दर्ज है लेकिन यह तारीख पूरे भारत वर्ष के लिए गौरव की तारीख है. इस दिन धरा में एक ऐसे बच्चे की किलकारी गूंजी थी जिसने भारत वर्ष को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करा दिया. स्वयं शहीद होकर इतिहास के पन्ने पर स्वयं का नाम आजाद लिख गए. यह बच्चा कोई और नहीं बल्कि जिन्हें कभी कोई चंद्रशेखर तिवारी के नाम से जानते रहे होंगे, आज वे चंद्रशेखर आजाद हैं और इस दुनिया में जब तक सूरज-चांद रहेगा, वे आजाद ही बने रहेंगे. हैं. चूंकि वे नाम से आजाद थे, इसलिए किसी राज्य की सीमा से वे बंधे हुए नहीं थे. अंग्रेज शासित भारत में पले बढ़े आजाद की रगों में शुरू से ही अंग्रेजों के प्रति नफरत भरी हुई थी। मध्यप्रदेश से लेकर उत्तरप्रदेश और लगभग सारे देश में उनके नाम की गूंज थी. आजाद का जन्म 23 जुलाई को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गांव में 1906 में हुआ था। आजाद का प्रारंभिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा में ही बीता। आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी अकाल पडऩे पर गांव छोड़ कर मध्यप्रदेश चले गये थे। उनकी मां का नाम जगरानी देवी था।
चंद्रशेखर तिवारी से क्रांतिकारी आजाद की यात्रा रोमांचक है. एक ऐसी यात्रा जो युवाओं के भीतर देशप्रेम का जज्बा सहज रूप से भर सकती है. भींची हुई मुठ्ठी और आंखों में अंग्रेजों के खिलाफ नफरत ने उन्हें महज 15 साल की उम्र में जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया था. अंग्रेजों के राज में कानून तो था नहीं लेकिन कानून का स्वांग करते रहे और इस सिलसिले में युवा क्रांतिकारी को अदालत में पेश किया गया. 15 साल के किशोरवय आजाद जज को अपना नाम बताया आजाद. पिता का नाम स्वतंत्रता और अपना पता दिया जेल का.15 साल के लडक़े की हिम्मत से चाहे भीतर से जज भयभीत हो गया हो लेकिन बाहरी तौर पर गुस्सा दिखाते हुए आजाद को 15 बेंतो की सजा सुनाई गई। यहीं से चंद्रशेखर के साथ तिवारी विलोपित हो गया और नयी पहचान मिली आजाद। इतिहास के पन्नों में आजाद के हौसले की कहानियां स्वर्णाक्षरों में अंकित है. यहां मैं उन यादों को शेयर कर रहा हूं जिसके साथ कुछ घंटे मैंने जिया है. जाना है कि देवालयों के नाम पर रोज सिर फुटौव्वल करते लोग एक बार आजाद के देवालय के दर्शन कर आएं. एक बार देख आएं कि भाबरा में देव तो पूजे जाते हैं, पूजा के लिए लेकिन आजाद के देवालय में नौजवान, छोटी उम्र के बच्चों के साथ संस्कार सिखाने जाते हैं. उनके भीतर आजाद की वो आग जलाने की सतत कोशिश होती रहती है, जो आजाद की आंखों में अंग्रेजों के खिलाफ थी. अन्याय और दुष्टता के खिलाफ थी.
लगभग पांच साल पुरानी बात है. तब 23 जुलाई को अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की पुण्यभूमि पर जाने का मुझे अवसर मिला था. यह दिन मेरे लिये किसी उत्सव से कम नहीं था. कभी इस पुण्यभूमि को भाबरा के नाम से पुकारा जाता था किन्तु अब इस नगर की पहचान अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के रूप में है. मध्यप्रदेश शासन के आदिमजाति कल्याण विभाग के सहयोग से राज्य के आदिवासी बाहुल्य जिलों में सामुदायिक रेडियो केन्द्रों की स्थापना की पहली कड़ी में यहां दो वर्ष पहले रेडियो वन्या की स्थापना हुई. 23 जुलाई को रेडियो वन्या के दूसरी सालगिरह पर मैं बतौर रेडियो के राज्य समन्वयक के नाते पहुंचा था. मैं पहली दफा इस पुण्य धरा पर आया था. इस धरा पर अपना पहला कदम रखते ही जैसे मेरे भीतर एक कंपन सी हुई. कुछ ऐसा मन में लगा जिसे अभिव्यक्त कर पाना मुश्किल सा लग रहा है. एक अपराध बोध भी मेरे मन को घर कर गया था. भोपाल से जिस वाहन से हम चंद्रशेखर आजाद नगर पहुंचे थे, उसी वाहन में बैठकर मैं और मेरे कुछ साथी आजाद की कुटिया की तरफ रवाना हुए. कुछ पल बाद ही मेरे मन में आया कि मैं कोई अनैतिक काम कर रहा हूं. उस वीर की भूमि पर मैं कार में सवार होकर उसी तरह चल रहा हूं जिस तरह कभी अंग्रेज चला करते थे. मन ग्लानि से भर गया और तत्काल अपनी भूल सुधार कर वाहन से नीचे उतर गया. वाहन से नीचे उतरते ही जैसेे मन हल्का हो गया. क्षणिक रूप से भूल तो सुधार लिया लेकिन एक टीस मन में शायद ताउम्र बनी रहेगी.
बहरहाल, रेडियो वन्या स्टेशन पर कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद लगभग हजार विद्यार्थियों की बड़ी रैली अमर शहीद चंद्रशेखर की जयकारा करते हुये निकली तो मन खुश हो गया. परम्परा को आगे बढ़ाते देखना है तो आपको चंद्रशेखर नगर जरूर आना होगा. वीर शहीद की कुटिया को सरकार की तरफ से सुंदर बना दिया गया है. इस कुटिया में मध्यप्रदेश स्वराज संस्थान संचालनालय की ओर उनकी पुरानी तस्वीरों का सुंदर संयोजन किया गया है. इस कुटिया में प्रवेश करने से पूर्व ही एक अम्मां मिलेंगी जो बिना किसी स्वार्थ कुटिया की रखवाली करती हैं, जैसे वे अपने देश को अंग्रेजों से बचा रही हों. इस कुटिया के भीतर वीर शहीद चंद्रशेखर आजाद की आदमकद प्रतिमा है जिसे देखते ही लगता है कि वे बोल पड़ेंगे- हम आजाद थे, आजाद रहेेंगे. सब-कुछ किसी फिल्म की रील की तरह आंखों के सामने से गुजरती हुई प्रतीत होता है. जब मैं प्रतिमा निहार रहा था तभी एक लगभग 30-35 बरस का युवा अपनी छोटी सी बिटिया को लेकर कुटिया में आया और बिना समय गंवाये नन्हीं बच्ची को गोद में उठाकर उसे इतना ऊपर उठाया कि बिटिया शहीद का तिलक कर सके. उसने यही नहीं किया बल्कि बिटिया को शहीद के पैरों पर ढोक लगाने के लिये प्रेरित किया. नन्हीं सी बच्ची को शहीद और भगवान में अंतर नहीं मालूम हो लेकिन एक पिता के नाते उस युवक की जिम्मेदारी देखकर मन भाव से भर गया. आजाद का यह देवालय सही अर्थों में संस्कार की प्रथम पाठशाला है.
एकाएक मन में आया कि काश, भारत आज भी गांवों का देश होता तो अभाव भले ही उसे घेरे होते किन्तु भाव तो नहीं मरते. बिलकुल जैसा कि मैंने चंद्रशेखर आजाद की नगरी में देखा. विकास के दौड़ में हम अपना गौरवशाली अतीत को विस्मृत कर रहे हैं लेकिन यह छोटा सा कस्बानुमा आज भी उस गौरवशाली इतिहास को परम्परा के रूप में आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित कर रहा है. परम्परा के संवर्धन एवं संरक्षण की यह कोशिश ही सही मायने में भारत की तस्वीर है. मैं यह बात बड़े गौरव के साथ कह सकता हूं कि देश का ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में जितना बड़ा योगदान दिया और इनके शहीदों को जिस तरह समाज ने सहेजा है, वह बिराला ही उदाहरण है. यह वही चीज है जिसे हम भारत की अस्मिता कहते हैं, यह वही चीज है जिससे भारत की दुनिया में पहचान है और शायद यही कारण है कि तमाम तरह की विसंगितयां, विश्व वक्रदृष्टि के बावजूद भारत बल से बलवान बना हुआ है.
दुख इस बात है कि विकास की अंधी दौड़ से अब चंद्रशेखर आजाद नगर भी नहीं बचा है. मकान, दुकान पसरते जा रहे हैं. वीर शहीद के नाम पर राजनीति अब आम हो रही है. हालांकि इसे यह सोच कर उबरा जा सकता है कि विकास होगा तो यह लालच बढ़ेगा और लालच बढ़ेगा तो विसंगतियांं आम होंगी लेकिन यह बात भी दिल को सुकून देेने वाली हैं कि चंद्रशेखर आजाद की नगरी में 23 जुलाई का दिन हर वर्ष दीपावली से भी बड़े उत्सव की तरह मनाया जाता है. हो भी क्यों नहीं? मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं हर बार इस मंजर को याद करते हुए. हर बार रोमांचित हो जाता हूं लोगों से चर्चा और बातें करते हुए. हर बार इस बात का स्मरण रह जाता है कि आजाद नहीं होते तो क्या हम आजाद हो पाते? इतिहास के पन्नों में अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद को मेरा कोटिश: प्रणाम.
रविवार, 19 मई 2019
सुमिरन बैरागी
बालकवि होना तो एक बार आसान हो सकता है लेकिन सत्ता के साथ होते हुए बैरागी होना असम्भव ना भी हो तो मुश्किल ज़रूर है लेकिन बैरागी बन कर सत्ता के साथ रहकर लोक धर्म निभाने वाले बालकवि बैरागी बिरले लोगों मैं एक है। भौतिक रूप से वे अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता में जो प्रतिमान उन्होंने गढ़े, वह मार्गदर्शक बनकर हमारे साथ हैं. "समागम" के इस अंक में सुमिरन बैरागी पर केंद्रित है.
मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018
रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का विशेषांक महात्मा गांधी के डेढ़ सौ साल पर
महात्मा गांधी कल 2 अक्टूबर को अपने जन्म के डेढ़ सौ वर्ष में प्रवेश कर जाएंगे. इस विशेष अवसर पर भोपाल से प्रकाशित रिसर्च जर्नल ‘समागम’ ने सौ पृष्ठों का ‘गांधी : 150 साल’ शीर्षक से विशेषांक का प्रकाशन किया है. इस विशेषांक में विभिन्न विषयों पर गांधी को केन्द्र में रखकर सुधि लेखकों यथा डॉ. विजयबहादुर सिंह, मनोज कुमार श्रीवास्तव, घनश्याम सक्सेना, रामेश्वर शुक्ल ‘पंकज’ जगदीश उपासने, कुलपति एमसीयू, राकेश कुमार पालीवाल प्रधान आयकार आयुक्त सहित अनेक नामचीन लेखकों के आलेख हैं. स्वाधीनता संग्राम के दौरान मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में गांधी प्रवास का विस्तार से विवेचन किया गया है तो गांधी से प्रेरणा पाकर कैसे लोगों का जीवन बदला, इस पर भी लेख पढऩे को मिल जाएंगे. विशेषांक में सबसे खास लेखों का संग्रह है बा और बापू, बापू के निज सचिव महादेव देसाई, गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर और चम्पारण आंदोलन के लिए महात्मा गांधी को चम्पारण आने के लिए प्रेरित करने वाले राजकुमार शुक्ल को पढऩा अच्छा लगता है. गांधी एक कुशल पत्रकार और कम्युनिकेटर थे, इस पर सुपरिचित पत्रकार अरविंद मोहन और राजेश बादल के लेख एक नई दृष्टि देते हैं. वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया अध्येता मनोज कुमार के सम्पादन में नियमित रूप से 18 वर्षों से प्रकाशित ‘समागम’ ने इसके पूर्व भारतीय सिनेमा के सौ साल तथा भोपाल में सम्पन्न विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर इसी तरह के विशेषांक का प्रकाशन कर चुके हैं.
सोमवार, 14 मई 2018
साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता के एक सूर्य का अस्त होना
मनोज कुमार
मन आज व्याकुल है। ऐसा लग रहा है कि एक बुर्जुग का साया मेरे सिर से उठ गया है। मेरे जीवन में दो लोग हैं। एक दादा बैरागी और एक मेरे घर से जिनका नाम इस वक्त नहीं लेना चाहूंगा। दोनों की विशेषता यह है कि उनसे मेरा संवाद नहीं होता है लेकिन वे मेरे साथ खड़े होते हैं। उनका होना ही मेरी ताकत है। दादा के जाने के बाद यह ताकत आधी हो गई है। दादा तो गाहे-बगाहे सलाह देते थे, डांट देते थे लेकिन अनकही ढंग से मेरी हौसलाअफजाई करते हैं। खैर, दादा के अचानक देवलोकगमन की खबर ने मुझे स्तब्ध कर दिया। मैं अवाक था और लगभग नि:शब्द। अभी महीने भर पहले की तो बात है। ‘समागम’ का अंंक रेडियो पर केन्द्रित किया था। हर आलेख पर वे अपनी टिप्पणी से मुझे अवगत कराते रहे और बधाई देते रहे। कहते थे कि ऐसे समय में जब पत्रिकाओं की शताधिक संख्या है, उसमें श्रम करके जो प्रकाशन कर रहे हो, वह अतुलनीय है। मुझसे वे फोन पर जो बोलते थे, सो तो है। वे अपने अनन्य मित्रों और पत्रकार साथियों को भी ‘समागम’ पढऩे के लिए प्रेरित किया करते थे। मई महीने की बात है, साल याद नहीं। इंदौर के प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. सरोज कुमार का मुझे फोन आया। वे कहने लगे यार ऐसी कौन सी पत्रिका का प्रकाशन कर रहे हो जिसकी तारीफ बैरागीजी कर रहे थे। यही नहीं, उन्होंने मुझसे कहा है कि कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर में व्याख्यान देने जाने के पहले ‘समागम’ के कुछ अंकों का अध्ययन कर लूं। डॉ. सरोज कुमार को मैं नाम से जानता हूं लेकिन परिचय नहीं था। अपनी प्रशंसा सुनकर मन ही मन फूल गया लेकिन ऊपर से कहा कि यह दादा का मुझ पर स्नेह है। मैं आपको कुछ अंक प्रेषित कर रहा हूं, शायद उपयोगी हो। इसके बाद डॉ. सरोज कुमार से संवाद नहीं हुआ। संभव है कि ‘समागम’ को लेकर उनमें उतना उत्साह नहीं रहा होगा जितना कि दादा में था। बहरहाल, एक दिन दादा का फोन आया। तब मैंने साथी राजेश बादल की पत्रकारिता के संदर्भ में एक लम्बा साक्षात्कार प्रकाशित किया था। इसे वे राजस्थान की किसी पत्रिका में पुर्नप्रकाशन के लिए देना चाहते थे और मुझसे अनुमति चाह रहे थे। इन सालों में दादा से मेरा रिश्ता गहरा चुका था। कई बार लडक़पन में मैं उनसे दादागिरी किया करता था। अपनी सीमा लांघकर उनसे बातेें करने लगता था। मैंने जवाब में कहा कि आप भी कमाल करते हैं। आप जिसे चाहें, जो सामग्री चाहें,उपयोग करने के लिए भेज सकते हैं। इसमें मुझसे पूछने की क्या जरूरत? लेकिन दादा तो दादा ठहरे। कहने लगे कि सम्पादक की अनुमति जरूरी होती है। एक बार फिर मैं उनका कायल ही नहीं हुआ बल्कि एक पाठ भी सीखा कि किसी का लिखा प्रकाशन करें लेकिन लेखक की अनुमति जरूर लें।
‘समागम’ के प्रकाशन के इन 18 सालों में वे मेरे लिए गुरु और मार्गदर्शक के रूप में साथ रहे। कभी लगा नहीं कि वे मनासा में हैं और मैं भोपाल में बैठा हूं। हमेशा इस बात का अहसास रहा कि बस, उनका फोन आता ही होगा। इस संदर्भ में मुझे स्मरण में मराठी के एक कथाकार की वह लघुकथा जिसमें वे लिखते हैं कि एक बंद ताले को खोलने के लिए हथोड़े ने भारी-भरकम वार किया। हर तरह की कोशिश के बाद भी वह नाकामयाब रहा। इत्ते में पास पड़ी चाबी ताले के दिल में उतरी और ताला खुल गया। हथोड़ा अवाक और परेशान। उसने चाबी से अपनी ताकत और वजन की दुहाई देते हुए चाबी से पूछा कि तु इत्ती से फिर ताला कैसे खुल गया। मुस्कराती हुई चाबी ने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया कि किसी का दिल खोलने के लिए उसके दिल में उतरा जरूरी होता है।
दादा से मेरा रिश्ता भी इसी ताला चाबी का था। मैं कब उनके दिल में उतर गया और कब उन्होंने मेरे सामने अपना दिल खोलकर रख दिया, पता ही नहीं चला। बात दो-तीन साल पुरानी है। भोपाल के होटल अशोका में वे ठहरे थे। उन्हें मध्यप्रदेश शासन की ओर से कवि प्रदीप सम्मान दिया जाना था। मैं उनसे मिलने गया। अपने दर्द को भीतर ही भीतर रखते थे और समाज में आनंद को वे बेपनाह बांटते थे। लेकिन उस दिन वे अपना दिल खोल बैठे। बचपन से अब तक के अनुभवों को उन्होंने मुझसे शेयर किया। बचपन के कष्ट से लेकर आज तक की बातें बताते हुए उनकी पलकें कई बार भींग गई। हमेशा कडक़ आवाज में बात करने वाले दादा बैरागी का गला भर आया था। वे कहने लगे-‘आज ईश्वर का दिया हुआ सबकुछ है। लेकिन मैं आज भी कपड़े मांगकर पहनता हूं। यह इसलिए कि मैं अपने पुराने दिन भूल ना जाऊं।’
जब किसी का दिल खुलता है तो बस खुलता ही चला जाता है, यह मैंने पहली बार महसूस किया। पिता के शारीरिक परेशानियां, मां का दर्द, स्वयं भीख मांगकर गुजारा करने को कष्टप्रद अनुभव था, वह सिलसिले से शेयर करते गए। बात करते करते अचानक बीते दिनों से बाहर आए। चुपके से आंखों के आंसुओं को पोंछा और ठहाके लगा पड़े। कहने लगे-‘कई बार जिस मंच पर मैं उपस्थित होता हूं, उसी मंच से कोई नया या पुराना कवि मेरी ही कविता को अपने नाम से पढ़ता है। मैं मुस्करा कर रह जाता हूं, बल्कि आनंद भी प्राप्त करता हूं।’ वे आगे कहते हैं-‘मनोज, जब तक हम लिखते हैं, तब तक ही वह हमारी प्रापर्टी है। लिखने के बाद छपने के साथ ही वह समाज की हो जाती है। इसमें कोई कॉपीराइट जैसी बात नहीं होती है। तुम ऐसा ही करते रहना।’
बालकवि बैरागी ही उनका प्रचलित नाम हो चला था। वास्तव में उनका नाम नंदरामदास बैरागी था। वे बताते थे कि इस नाम से एक कविता तब की नईदुनिया में प्रकाशित हुई थी। इस कविता को जब एक लडक़ी ने पढ़ा तो वह अपने पिता से जिद कर नंदरामदास बैरागी से ब्याह करने अड़ गई। बाद में वही उनकी जीवनसंगिनी बनीं। शीर्ष पंक्ति के कवि और राजनीति के शीर्ष पर रहने वाले दादा बैरागी पूरा जीवन यूं ही बने रहे। अपने से छोटा किसी को माना नहीं और स्वयं को बड़ा होने दिया नहीं। वे साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता के त्रयी थे लेकिन वर्तमान हालात से वे दुखी भी रहते थे लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि एक दिन बदलेगा। अंधेरा छंटेगा और समाज में रोशनी आएगी। वे खरे थे और हमेशा खरे रहेंगे क्योंकि वे निर्दोष राजनेता थे और प्रतिबद्ध रचनाकार। हां, दुख इस बात का है कि साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता का एक सूर्य अस्त हो गया है।
शनिवार, 21 अप्रैल 2018
#पीआर बोले तो #सोसायटी की #हार्टबीट है
पीआर बोले तो सोसायटी की हार्टबीट है
मनोज कुमार
अंग्रेजी के पब्लिक रिलेशन को जब आप अलग अलग कर समझने की कोशिश करते हैं तो पब्लिक अर्थात जन और रिलेशन अर्थात सम्पर्क होता है जिसे हिन्दी में जनसम्पर्क कहते हैं. रिलेशन अर्थात संबंधों के बिना समाज का तानाबाना नहीं बुना जा सकता है और इस दृष्टि से पब्लिक रिलेशन का केनवास इतना बड़ा है कि लगभग सभी विधा उसके आसपास या उसमें समाहित होती हैं. पब्लिक रिलेशन को लेकर भारत में आम धारणा है कि यह एक किस्म का सरकारी का काम होता है या सरकारी नौकरी पाने का एक जरिया होता है. कुछ लोग पब्लिक रिलेशन को जर्नलिज्म से अलग कर देखते हैं. वास्तविकता यह है कि वह भारत की सोसायटी हो या दुनिया के किसी देश की सोसायटी, इन्हें जीवंत रखने के लिए जर्नलिज्म जितना जरूरी है, उतना ही पब्लिक रिलेशन. हमारा मानना है कि सोसायटी एक नदी है और पब्लिक रिलेशन तथा जर्नलिज्म इस नदी के दो पाट हैं. दोनों साथ साथ चलते हैं लेकिन आपस में कभी मिल नहीं पाने की सच्चाई जितनी है, उतनी ही सच्चाई यह है कि नदी के अविरल बहने के लिए दो पाटों का होना जरूरी है. ठीक उसी तरह सोसायटी की जीवंतता के लिए पीआर और जर्नलिज्म दोनों का सक्रिय होना जरूरी है.
पब्लिक रिलेशन और जर्नलिज्म के मध्य एक महीन सा विभाजन है. सही मायने में जर्नलिज्म के नए स्टूडेंट को पहले पीआर पढऩा और सीखना चाहिए. बहुतेरे लोग इस बात से असहमत हो सकते हैं कि यहां पर पीआर और जर्नलिज्म का घालमेल किया जा रहा है लेकिन जब आप बारीकी से जांच करेंगे तो पाएंगे कि एक कामयाब जर्नलिस्ट बनने के पहले एक कामयाब पब्लिक रिलेशन ऑफिसर होना जरूरी है. पीआर की बात करें या जर्नलिज्म की, दोनों की बुनियादी जरूरत है सोसायटी से सम्पर्क बनाये रखना और सोसायटी से सम्पर्क कैसे बनाया रखा जा सकता है यह सबक पब्लिक रिलेशन के सेक्टर में जाकर बखूबी सीखा जा सकता है. जर्नलिस्ट के लिए किसी खबर को प्राप्त करने के लिए, उसे डेवलप करने के लिए सोर्स बनाने का सबक पढ़ाया जाता है. सोर्स कैसे डेवलप हो और उनसे हमारा सम्पर्क कैसे हो, इसके लिए पीआर सीखना होता है. एक अच्छा पीआरओ, एक अच्छा जर्नलिस्ट हो सकता है लेकिन एक अच्छा जर्नलिस्ट एक अच्छा पीआरओ हो, यह अपवाद ही होता है.
जनसम्पर्क (पब्लिक रिलेशन्स) का सीधा अर्थ है ‘जनता से संपर्क रखना’। जनसम्पर्क एक प्रक्रिया है जो एक उद्देश्य से व्यक्ति या वस्तु की छवि, महत्व एवं विश्वास को समूह अथवा समाज में स्थापित करने में सहायक होती है। जनसंचार के विभिन्न उपकरणों के माध्यम से समाज या समूह से जीवन्त सम्बन्ध बनाने में यह सेतु का कार्य करती है। जनसंपर्क, संचार और सम्प्रेषण का एक पहलू है, जिसमें किसी व्यक्ति या संगठन तथा इस क्षेत्र से संबंधित लोगों के बीच संपर्क स्थापित किया जाता है। इस प्रकार यह सेवा लेने वालों तथा सेवा देने वालों के बीच एक सेतु का काम करता है। यह एक द्विपक्षीय कार्रवाई है, जिसमें सूचनाओं तथा विचारों का आदान-प्रदान होता है।
एडवर्ड एल.बर्जेल के अनुसार ‘जनसम्पर्क का उद्देश्य व्यक्ति, समुदाय और समाज में परस्पर एकीकरण है। प्रतिस्पर्धापूर्ण जीवन-प्रणाली में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए हमें एक-दूसरे की भावनाओं को समझने और आदर करने की आवश्यकता होती है। जनसम्पर्क व्यक्ति और समाज में समायोजन करने और जन भावनाओं को मुखरित करने का एक साधन है।’
यह बात भी स्पष्ट है कि पब्लिक रिलेशन और जर्नलिज्म की अपनी अपनी सीमा है. पब्लिक रिलेशन में इमेज बिल्डिंग का काम प्राथमिक होता है वहीं जर्नलिज्म में छिपे हुए तथ्यों और घटनाओं को बेनकाब करना प्राथमिक होता है. दोनों की अपनी मर्यादा है. पब्लिक रिलेशन ऑफिसर संबंधित संस्थान, प्रोडक्ट की कमियों को बाहर नहीं आने देता है बल्कि सुविचारित ढंग से वह इन कमियों को इस तरह स्टेबलिस करता है कि वह प्रोडक्ट मानक स्तर से कहीं बेहतर है. पब्लिक रिलेशन ऑफिसर कुटिल ना होकर कुशल होता है. दक्ष होता है और वह अपनी संस्थान के लिए इमेज बिल्डिंग का काम करता है.पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की आवश्यकता शासकीय संस्थानों के साथ साथ निजी क्षेत्रों में बनी हुई है. पब्लिक रिलेशन ऑफिसर का पद बेहद महत्वपूर्ण होता है. शासकीय सेवाओंं, खासकर भारतीय और राज्य सूचना सेवाओं में कार्यरत पब्लिक रिलेशन ऑफिसर को सरकार का पी_ू कहा जाता है. यह इमेज पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की प्रायवेट सेक्टर में भी है लेकिन यहां उसका सीधा वास्ता जर्नलिस्ट के बजाय मीडिया मैनेजमेंट से होता है इसलिए वह कुछ हद तक बचा रहता है. जनसम्पर्क के लिए जनसंचार और जनसंचार के लिए जनसम्पर्क का निर्देशन अत्यधिक आवश्यक है। यदि जनसम्पर्क के मौखिक, मुद्रित, श्रृव्य तथा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का प्रयोग विज्ञान की देन है, तो जनसम्पर्क वह कला है जो इन माध्यमों का उपयोग प्रचार कार्य करने के लिए करती है ओर सदैव लक्ष्य तक पहुंचने का प्रयास करती है।
पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की भूमिका को विस्तार से समझने के लिए सोसायटी में प्रत्येक दशक के अंतराल में सोसायटी में होने वाले कई बड़े परिवर्तन को देखना और समझना होगा. खासतौर पर जब हम लाईफस्टाइल की बात करें, बिजनेस की बात करें या लोगों से जुडऩे और संवाद की बात करें तो पीआर अर्थात पब्लिक रिलेशन का अहम रोल होता है. इसलिए पीआर को सोसायटी की हार्टबीट कहना अनुचित नहीं होगा. हमारे जीवन में बदलाव में पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की भूमिका महत्वपूर्ण होती है क्योंकि वह अकेला पीआर नहीं देखता है बल्कि सोसायटी का मनोविज्ञान समझता है. वह सोसायटी की जरूरत को समझता है और इस अपनी इस समझ को वह सोसायटी की जरूरत के अनुरूप अनिवार्य बना देता है. ऐड केम्पन में पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की खास भूमिका होती है. पब्लिक रिलेशन ऑफिसर अपनी कम्पनी के प्रोडक्ट के अनुरूप टारगेट आडियन्स चुन लेता है और वह उनकी रूचि और आवश्यकता के अनुरूप ऐड केम्पन तैयार करता है. खबरें बनाता है और अपने प्रोडक्ट और कम्पनी की इमेज बिल्डिंग करता है. अमूल के प्रोडक्ट के ऐड कैम्पन आपको रोज ताजा रखते हैं क्योंकि वह स्थूल ऐड केम्पेन ना होकर प्रतिदिन सोसायटी में होने वाली घटनाओं को केन्द्र में रखकर तैयार करता है तो कई दशक पुराना निरमा वाशिंग पावडर का ऐड आज भी आपको लुभाता है.
प्रायवेट सेक्टर के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर इस बात के लिए सर्तक और सजग रहता है कि लोगों के दिलों में उसे कैसे उतरना है. इस संदर्भ में एक लघु कथा का उल्लेख करना समीचीन होगा. एक बंद ताले पर भारी-भरकम हथौड़ा अपनी पूरी ताकत से वार करता है लेकिन ताला नहीं खुलता है. वहीं पर एक छोटी सी चाबी ताले के ह्दयस्थल में बनी सुराख में प्रवेश करती है और ताला खुल जाता है. हथौड़ा हैरान रह जाता है और चाबी से कहता है कि तु छोटी सी और मैं तुझसे बड़ा और बलवान लेकिन मैं ताले को खोल नहीं पाया और तुने ताले को खोल दिया. हथौड़े की बात को सुनकर चाबी हौले से मुस्कराई और कहा कि किसी के दिल को खोलने के लिए उसके दिल में उतरना पड़ता है. लब्बोलुआब ये कि पब्लिक रिलेशन ऑफिसर यह जानता है कि कैसे लोगों के दिल में उतरना है. पब्लिक रिलेशन ऑफिसर के लिए जरूरी होता है कि वह भारी-भरकम शब्दों के बजाय छोटे और सरल शब्दों का अपनी खबरों में और अपने ऐड केम्पन में उपयोग करे. इसका सबसे बेहतरी उदाहरण के तौर पर हेलमेट पहनने के लिए प्रोत्साहित करने वाले एड के इस वाक्य को देख सकते हैं-‘सिर है आपका, मर्जी है आपकी’.
पब्लिक रिलेशन ऑफिसर का कार्य व्यापक होता है. अब हम सरकार के विभागों के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की चर्चा करते हैं तो उनका दायित्व एक अलग किस्म का होता है और बंधन तथा मर्यादा में बंधा होता है. इसके पहले प्रायवेट सेक्टर के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की बात कर रहे थे, वे अपेक्षाकृत स्वतंत्र होते हैं. किसी भी शासन के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की जवाबदारी शासन और सरकार के प्रति प्राथमिक रूप से होती है. सोसायटी और सरकार के मध्य वह एक पुल की तरह काम करता है. लोकतंत्र में कल्याणकारी सरकार की अवधारणा बनी हुई है और चुनी गई सरकारें जनता के प्रति जवाबदार होती हैं. जनता और राज्य तथा देश के कल्याण के लिए अनेक योजनाओं का निर्माण किया जाता है. ये योजनाएं आम आदमी तक पहुंचे और उनका लाभ ले सकें, यह जवाबदारी पब्लिक रिलेशन ऑफिसर के जिम्मे होती है. साथ में सरकार की इमेज बिल्डिंग का काम भी उन्हें करना होता है. चूंकि वे एक शासकीय सेवा में होते हैं तो उन्हें कई किस्म की वैधानिक मर्यादाओं का पालन करना होता है. शासकीय सेवा के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर के साथ जर्नलिस्ट का लगभग प्रतिदिन का सम्पर्क होता है. जर्नलिस्ट के लिए अपरोक्ष रूप से अनेक बार सोर्स का काम भी यही पीआरओ करते हैं. वे क्लू देते हैं लेकिन खबरों से बचते हैं लेकिन जर्नलिस्ट उन क्लू या सूचना को खबर का आधार बना लेता है. पीआरओ द्वारा जारी की गई खबरों और उसमें दिए गए आंकड़ों का मिलान कर जर्नलिस्ट प्रामाणिक खबरें तैयार करते हैं. यह सब संभव होता है कि आपका पीआरओ के साथ रिलेशन कैसा है? अर्थात एक जर्नलिस्ट के लिए जरूरी है कि वह पहले दक्ष पीआरओ बने. प्रायवेट सेक्टर और गर्वमेंट सेक्टर में काम करने वाले पीआरओ की भूमिका में बुनियादी अंतर बहुत कुछ नहीं होता है लेकिन प्रायमरी काम उनका इमेज बिल्डिंग करना होता है.
जनसम्पर्क वह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें सत्ता, संस्थान एवं व्यक्ति को जनता की मानसिक कृत्तियों, व्यवहार, अभिरूचियों परिवेश तथा प्रचलित परम्पराओं को दृष्टिगत करते हुए निर्णय लेने चाहिए। उत्तम छवि-निर्माण, सह-अभिव्यक्ति, समर्थन एवं जनअनुकूलता की प्राप्ति ही प्रतिष्ठित जनसम्पर्क की अभिव्यक्ति है। जनसंपर्क का स्वरूप केवल दफ्तर खोलकर बैठे रहना ही नहीं है, बल्कि कई तरह से इस काम को अंजाम देना पड़ता है। इसके अंतर्गत मीडिया रिलेशन, क्राइसिस मैनेजमेंट, मार्केटिंग कम्युनिकेशन, फाइनेंशियल, पब्लिक रिलेशंस, सरकारी संबंध, औद्योगिक संबंध शामिल हैं। आज सभी छोटे-बड़े संस्थानों में जनसंपर्क क्रय तथा पब्लिक रिलेशन ऑफिसर सूचना संप्रेषण तथा विचारों की अभिव्यक्ति का दायित्व निभा रहे हैं और कैरियर निर्माण की दृष्टि से यह एक सम्मानजनक क्षेत्र माना जाता है।
निष्र्कत: माना जा सकता है कि सोसायटी में होने वाले सकरात्मक परिवर्तन में पब्लिक रिलेशन की भूमिका अहम होती है. पत्रकारिता के तीन सूत्र सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का प्रतिपादन पब्लिक रिलेशन में भी बखूबी किया जाता है.जनसंपर्क की प्रक्रिया में वांछित जानकारी को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बल्कि उसके वास्तविक रूप में लेकिन प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। एक तरह से पब्लिक रिलेशन सोसायटी की हार्टबीट है.
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