शनिवार, 7 मार्च 2020

एक धर्म की बिटिया


मनोज कुमार
बिटिया हो जाना ही किसी बेटी का धर्म है. बिटिया का एक ही धर्म होता है बिटिया हो जाना. बिटिया का विभिन्न धर्म नहीं होता, उसकी कोई जात या वर्ग भी नहीं होता, वह एक मायने में अमीर या गरीब भी नहीं होती है. बिटिया, सिर्फ और सिर्फ बिटिया ही होती है. हिन्दू परिवारों में पैदा हुई बेटियों को भी पराया होना होता है तो मुस्लिम, सिक्ख और इसाई परिवार भी इसी परम्परा का निर्वाह करते हैं. बेटियों को लेकर इनमें से किसी का भी धर्म और वर्ग का चरित्र अलग नहीं है. बिटिया को लेकर सबकी दृष्टि एक सी है और वह दृष्टि है बिटिया पराया धन है. यहां तक कि बिटिया को लेकर आलीशान कोठी में रहने वाले धन्ना सेठ जो सोचता है, वही सोच एक आम आदमी के मन की भी होती है. संसार के निर्माण के साथ ही बेटी चीख रही है, चिल्ला रही है कि वह एक वस्तु नहीं है. वह धन भी नहीं है और न ही सम्पत्ति लेकिन परम्परा के खूंटे से बंधी बिटिया एक सोची-समझी साजिश के तहत पराया धन बना दी गई. 
अभी रेल का सफर करते समय इस बात का अनुभव हुआ कि बिटिया का कोई धर्म नहीं होता है. मैंने 14 घंटे के सफर में इस बात की तलाश करता रहा कि किसी एक बिटिया का तो धर्म पता चल सके लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. बिटिया को पराये घर जाना है तो उसे घर का हर काम सीखना होगा, भाई और पिता को खिलाने के बाद खाना ही उसका धर्म है. पिता और भाई के खाने के बाद बचा हुआ वह खाना खाती है और कई बार तो उनके हिस्से के बचे और बासी खाना बिटिया के नसीब में आता है. पीहर से सीखा और ससुराल में यह उसकी नियती बन जाती है. परदे में रहना, चुप रहना और दूसरों की खुशी में हंसना-मुस्कराने वाली बिटिया सुघड़ है, संस्कारी है. इस संस्कारी और एक धर्म का निर्वाह करने वाली बिटिया का जज्बात दहेज के लिये जला देने वालों के लिये कोई मोल नहीं रखता है, यह भी दिल दुखा देने वाली बात है कि एक बलात्कारी बिटिया का धर्म नहीं पूछता. उसके लिये उसका शरीर ही धर्म होता है. हां, इतना जरूर होता है कि सियासी फायदे के लिये कभी-कभार बलात्कार की शिकार बिटिया की जाती चिन्हित की जाती है. यह चिनहारी भी उस लाभ के लिये कि यह दिखाया जा सके कि दुष्कर्म की शिकार बिटिया भी किसी धर्म से आती है. संसार भर में बिटिया के लिये एक ही धर्म है कि उसका बिटिया हो जाना.
बिटिया को पराया कहने पर मुझे आपत्ति है लेकिन उसे धन कहने पर थोड़ी कम आपत्ति क्योंकि बिटिया का तो कोई मोल है लेकिन बेटों का क्या करें? बेटों का तो अपना धर्म है, वह अमीर भी है और गरीब भी. उसके साथ वर्ग और वह जाति के जंजाल में भी उलझा हुआ है. हिन्दू धर्म के लिये बेटा होने का अर्थ घर का चिराग है तो मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई भी इसी तरह सोचते हैं. बेटा उनके वंश को बढ़ाता है इसलिये वह पराया नहीं होता है लेकिन उसे कभी पराया न सही, स्वयं के घर का धन भी कहला नहीं पाया. बेटा न तो पराया होता है और न कभी धन बन पाया. ऐसा क्यों नहीं होता, इस पर भी जब मैंने सोचा तो लगा कि बेटे की हैसियत दिखती तो बड़ी है लेकिन हकीकत में उसकी औकात दो कौड़ी की होती है. जीवन भर वह पराये धन की खाता है. इस बारे में हमारे एक मित्रवत रिश्तेदार भाई अवधेश कहते हंै कि आप तो अधिकतम 25 साल में बरी हो जाएंगे, शायद इससे ज्यादा एक या दो वर्ष में. बिटिया का हाथ पीला करेंगे और निश्चिंत हो जाएंगे लेकिन हमारे लिये तो बेटा जीवन भर की घंटी की बना हुआ है. पहले पालो, शिक्षा दिलाओ, फिर नौकरी की चिंता करो और बाद में बेटे का ब्याह करो. थोड़े साल बाद मां-बाप पराये हो जाते हैं. मां-बाप समाज के नियमों के चलते बिटिया को पराया कर देते हैं और बेटा मां-बाप को अपने लिये पराया कर देता है. तमाम विकास की बातों, महिलाओं की हिस्सेदारी की बाते और जाने क्या क्या जतन किये गये लेकिन जब परिणाम जांचा गया तो पाया कि जतन तो बिटिया के नाम पर था लेकिन फैसला बेटे के पक्ष में हो गया. न तो इन 14 घंटों के सफर में मैं बिटिया का धर्म तलाश कर पाया और न इस पचास साल की उम्र में बिटिया को उसकी पहचान दिला पाया. जो लोग इसे पढ़ रहे होंगे तो उनसे मेरा आग्रह यही होगा कि जब समय मिले तो बिटिया के हक की तलाश करें, मदद करें और हो सके तो बिटियाओं के लिये उनका अपना धर्म तलाश कर सकें जहां वे स्वतंत्र हों, उनकी अपनी पहचान हो. (तस्वीर साभार गूगल से )

मध्यप्रदेश ka सियासी घमासान

मध्यप्रदेश में इस समय सियासी घमासान ने सत्तासीन कांग्रेस और विपक्षी दल भाजपा की नींद उड़ा दी है. विधायकों को अपने अपने पक्ष में करने के लिए दोनों दल जुटे हुए हैं. किसके हाथ में होगी बाजी या कांग्रेस की बनी रहेगी सत्ता, इस पर राजनीतिक गलियारों में चर्चा है. असली परीक्षा कांग्रेस सरकार की विधानसभा में बजट सत्र के दौरान होगी जब विपक्षी दल फ्लोर टेस्ट की मांग करेगी. फ्लोर टेस्ट तय करेगा कि कौन अर्श पर रहेगा और किसे फर्श पर आना होगा.
यहां यह चर्चा भी समीचीन होगा कि एक दिन, 15 दिन एक साल और ढाई साल से लेकर 15 साल की सरकार का रिकार्ड रहेगा. अब कौन सा रिकार्ड टूटेगा या नया बनेगा. इसकी प्रतीक्षा रहेगी.

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

"समागम " का नया अंक.

दशकों से सिने जगत में मध्य प्रदेश के सितारे जगमगाते रहे हैं. मध्य प्रदेश के सितारों से सज़ा "समागम " का नया अंक. 

रविवार, 15 सितंबर 2019

रिसर्च जर्नल "समागम" का यह अंक यूं तो हिंदी पर केंद्रित है लेकिन इस अंक को हमने 
लता जी को समर्पित किया है. इसी महीने की 28 तारीख को उनका 90वां जन्मदिवस है. 
मध्यप्रदेश का गौरव हैं लता, मान हैं, अभिमान हैं. 

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

बेस्ट सेलर वाली हिन्दी का उत्सव मनाइये

हिन्दी दिवस पर विशेष
बेस्ट सेलर वाली हिन्दी का उत्सव मनाइये
मनोज कुमार

सितम्बर के आने की आहट के साथ ही हम हिन्दीमय हो जाते हैं। चारों तरफ हिन्दी दिवस, पखवाड़ा और महीना मनाये जाने का अनवरत सिलसिला जारी हो जाता है। सितम्बर माह बीतते ही हम वापस अपने ढर्रे पर आ जाते हैं जहां हिन्दी केवल औपचारिक रूप से हमारे साथ होती है। हिन्दी की अनिवार्यता का महीना सितम्बर का होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि संविधान में 14 सितम्बर के दिन को मान्यता नहीं मिलती तो हिन्दी आज भी नेपथ्य में विचरण करता रहता और हम अंग्रेजी के मोहमाया में लिपटे होते। साल 1975 में नागपुर में विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया था और इसके बाद हर चार बरस के अंतराल में यह आयोजन विश्व मंच पर होता आ रहा है लेकिन ऐसी क्या मजबूरी है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ से हिन्दी को विश्व मंच पर मान्यता नहीं मिल पायी है? किसी और पर दोष थोपने के बजाय हमें स्वयं आत्ममंथन करना होगा। यह समझने और जानने की कोशिश करना होगी कि आखिर हम अब पायदान पर क्यों खड़े हैं? क्यों हिन्दी का ताज विश्व के माथे पर पहनाने में चूक रहे हैं? ऐसा भी नहीं है कि इन बीते वर्षों में भारत ने दूसरे कई विषयों पर पहल ना की हो और संयुक्त राष्ट्रसंघ की उन्हें मंजूरी ना मिली हो। फिर ऐसा क्या है और क्यों है कि हम हिन्दी को लेकर याचक की मुद्रा में खड़े हैं?
हिन्दी को विश्व मंच पर वह स्थान नहीं मिल पाया, इस बात का दुख तो हम हिन्दीभाषियों को है और रहेगा लेकिन यहां सवाल यह है कि भारतीय समाज में भी क्या हमने हिन्दी को वह सम्मान दे पाए जिसके लिए सालों से आस लगाए हैं? हिन्दी को राजभाषा का दर्जा है लेकिन हम अब तक उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा क्यों नहीं दे पाए? क्यों जन-जन की बोली नहीं बना पाए? हैरानी है कि हम साहित्यिक आयोजनों को भी लिट् फेस्ट बना दिया है। हिन्दी की किताबें सर्वश्रेष्ठ होने के स्थान पर बेस्ट सेलर की श्रेणी में चिंहित किए जाने की एक परम्परा विकसित कर ली है। दुर्भाग्य और शर्मनाक यही नहीं है बल्कि यह है कि हिन्दी के इस तथाकथित प्रतिष्ठित आयोजन में हिन्दी के वो नामधारी हस्ताक्षर उपस्थित रहते हैं और गर्व के साथ लिट् फेस्ट और हिन्दी की बेस्ट सेलर किताबों को सूचीबद्ध कर गर्व से भर उठते हैं। जिनके कंधों पर हिन्दी की जवाबदारी है और जिनकी पहचान हिन्दी से है और वही लोग जब हिन्दी को पहनकर अंग्रेजी की तरफदारी करेंगे तो हिन्दी आगे सौ साल भी गरियायी जाती रहेगी। उसे प्रथम पंक्ति में खड़े होने में युग-युग लग जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि विश्व मंच पर हिन्दी को स्थापित करने का स्वप्र देखने के पहले हम अपने घर में हिन्दी की श्रेष्ठता को बनाए और बाजार के हक में आवाज में आवाज मिलाने से खुद को बरी करने की कोशिश करें। लेकिन जो हालात हैं, वह इस बात का यकीन नहीं दिलाते हैं कि हिन्दी के लिए सचमुच में हम चिंतित हैं।
इस तथाकथित साहित्यिक आयोजनों के केन्द्र में तो हिन्दी है मगर सारा तानाबाना अंग्रेजियत लिए हुए होता है। अंग्रेजी का ऐसा मुल्लमा चढ़ाया जाता है कि हिन्दी बेचारी हो जाती है और किसी कोने में बैठकर बिसूरती रहती है। हिन्दी के कंधे पर सवार होकर अंग्रेजी में बकबकाते लोग ऐसे प्रसन्न होते हैं मानो वो शिरकत नहीं करते, ये आयोजन नहीं करते तो हिन्दी गुमनाम हो जाती। वे भूल जाते हैं कि सवा सौ करोड़ नागरिकों के इस देश में हिन्दी भाषा ही नहीं, विचार है। एक जीवनशैली है और इन सवा सौ करोड़ का 90 फीसदी लोग हिन्दी पढ़ते, बोलते और लिखते हैं। अर्थात जिन हस्ताक्षरों को इन आयोजनों में अपना रौब झाडऩे का मौका मिलता है, वे भूल जाते हैं कि हिन्दी ने उनसे किनारा कर लिया तो उन्हें बचाने वाला कोई नहीं होगा। बेहतर होगा कि वे अभी भी अपनी समझ ठीक कर लें और अंग्रेजियत के लबादे में हिन्दी को कवच बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने से बचें। ये बौनेकद के आयोजन हिन्दी से बड़े होते हैं, हिन्दी इनसे नहीं। हिन्दी हमेशा से श्रेष्ठ है और रहेगी।
हैरानी इस बात की भी होती है कि जिन सरकारी स्कूलों में पढक़र हिन्दी के महान हस्ताक्षरों की जयकारा हिन्दी समाज करता है, वही हस्ताक्षर अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूलों में पढ़ाने भेजने से रोकते हैं। पब्लिक स्कूलों में पढ़ाकर हम उन्हें अंंग्रेजी में बोलता देखकर गर्व से भर उठते हैं। निश्चित रूप से हर बच्चे को सभी भाषाएं सीखना चाहिए लेकिन हिन्दी के कंधे पर चढक़र अंग्रेजी या किसी अन्य विदेशी भाषा की जयकारा किया जाना मंजूर नहीं है। हिन्दी के मूर्धन्य हस्ताक्षर सरकारी स्कूलों के बंद किए जाने पर विलाप करते हैं।
सरकार को निकम्मी प्रमाणित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं लेकिन क्या कोई ऐसा हस्ताक्षर है जो अपने ही पुराने स्कूल में जाकर बच्चों को पढ़ाने का कोई प्रयास किया हो? उन नवोदित पीढ़ी के पास जाकर कभी यह बताने की कोशिश की हो कि श्रेष्ठता स्कूल के भवन में नहीं बल्कि मन में है। उस विश्वास में है जहां एक मल्लाह दुनिया में शीर्ष पर जा बैठता है और जिसने कभी पब्लिक स्कूल का चेहरा भी नहीं देखा। जीवन में सादगी और सभ्यता इन्हीं असुविधाहीन भवनों से आती है क्योंकि पब्लिक स्कूल के एयरकंडीशन कक्षाओं में केवल विलासिता मन में भर जाती है और डिग्री हासिल करने के बाद मन में एक ही इच्छा रह जाती है कि आगे का जीवन विलासिता के साथ ही गुजारना होगा। लालबहादुर शास्त्री के सादा जीवन को हम स्मरण में रखते हैं तो उन स्कूलों में जाकर क्यों नहीं पढ़ाते हैं। किताबों के किसी पाठ में उनके बारे में सौ-पचास पंक्तियां लिखी होती हैं और हम मान लेते हैं कि बच्चों को शास्त्रीजी की जीवनी पढऩे से उन्हें प्रेरणा मिल गई होगी। अरे साहब, सरकारी स्कूलों में जाकर बच्चों को सिखाने की बात को एकबारगी किनारे छोड़ भी दें तो वर्तमान का क्या कोई मूर्धन्य हिन्दी सेवक यह बताने की कृपा करेगा कि अपने बच्चों, नाती-पोतों को आखिर बार किसी महान नेता के बारे में चर्चा की थी? उनके जीवन से सीख लेने की प्रेरणा दी थी? तब शायद आपको उस बच्चे की तरह बगले झांकने के लिए मजबूर होना पड़ेगा जो परीक्षा में तो बैठ गया है लेकिन उसे कुछ नहीं मालूम। पिछले दिनों एक बड़े नाम के सज्जन ने बताया कि उनके पोते को हिन्दी में पचास का अर्थ नहीं मालूम लेकिन अंग्रेजी के फिफ्टी को वह समझ लेता है। इस प्रसंग को मनोरंजन की श्रेणी में रखा जाना चाहिए क्योंकि अगर बच्चा पचास का अंक भी नहीं समझ पा रहा है तो इसमें आपकी गलती है महानुभाव क्योंकि आप उसे पब्लिक स्कूल में भेजकर गलती नहीं करते तो शायद वह फिफ्टी समझ नहीं पाता लेकिन पचास समझने में वह भूल नहीं करता। वही बच्चा जब स्कूल से लौटता है तो उसे श्रीमुख से लिटिल लिटल वंडर स्टार सुनकर आप झूम उठते होंगे लेकिन मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं ना सुना पाने से आप खीझ उठते हैं। मां खादी की चादर बच्चे को सिखाने के बजाय आप सभाओं में बच्चे की कमियां गिनाकर कहते हैं कि आज के बच्चों को हिन्दी शिक्षा की अनिवार्यता है। सवाल यह है कि यह अनिवार्यता बच्चों के लिए या हम पालकों के लिए है, इस पर मंथन किया जाना, आवश्यक है।
हिन्दी कमतर होती जा रही है, का सारा आरोप, सारा दोष हिन्दी पत्रकारिता के मत्थे मढ़ दिया जाता है। कुछ हद तक बात सही हो सकती है लेकिन सभी दोष, सभी आरोप सही हो, यह अनावश्यक है। निश्चित रूप से इस बात का पक्ष नहीं लिया जा सकता है कि जो गलत हो रहा है, वह गलत नहीं है। लेकिन जिस पत्रकारिता को आपने मीडिया बना दिया हो, जो मीडिया बाजार के नियंत्रण में हो, उससे आप कितनी और कैसी अपेक्षा करेंगे? शुक्र मनाना चाहिए कि जो कुछ हिन्दी पढ़ और बोल पाने की स्थिति में आप अपने को पाते हैं तो वह इन्हीं हिन्दी प्रकाशनों के माध्यम से ही। अन्यथा जो अपेक्षा बाजार की मीडिया से है, वह तो आपको नेपथ्य में ले जाकर पटक देती है। कुछेक शीर्षक जरूर हिन्दी के साथ अंग्रेजी में लिखे जा रहे हैं लेकिन इनके परिशिष्ट में आप देखेंगे कि हिन्दी की शुद्धता कायम है। बल्कि हिन्दी के साथ हिन्दुस्तानी भाषा की जो मिठास है, वह आपको तरोताजा कर देती है। मुद्रण की नवीनतम विधि और उस पर होने वाले खर्च का भार बाजार ही उठाता है तो हल्के-फुल्के समझौता किए जाने पर कोई हंगामा करने के स्थान पर उनकी मजबूरी को समझते हुए स्वीकार करना चाहिए। यह इसलिए भी कि हम स्वयं बोलचाल में 25-30 प्रतिशत तो अंग्रेजी का उपयोग करते ही हैं, तब दूसरे से एतराज करने का कोई हक हमें नहीं बनता है। आवश्यक यह है कि हम हिन्दी को अपने जीवन में उतारें, वह भी पूरी ईमानदारी से। हिन्दी को प्रतिष्ठा की भाषा बनाए ना कि दोयम दर्जे की। दुर्भाग्य की बात यह है कि अंग्रेजी हमें बोलना आए या नहीं आए लेकिन हम बोलेंगे अंग्रेजी जरूर लेकिन हिन्दी को लेकर मन में एक अविश्वास का भाव पनपता रहता है। यही नहीं, हम हिन्दी के संवर्धन के लिए कभी कोशिश इसलिए नहीं करते हैं क्योंकि हमारा जन्म तो भारत में हुआ है और हम हिन्दी परिवार में पले-बढ़े हैं तो हिन्दी क्या सीखना? यहीं से हिन्दी के गौरव का क्षरण शुरू होता है। बाजार की पहली सीख यही होती है कि जिसे असरदार बनाना है, उसकी गुणवत्ता का भी ध्यान रखा जाए। हिन्दी की गुणवत्ता की तरफ हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया तो हिन्दी को लेकर विश्व मंच की सहमति की ओर ताकना हमारी मजबूरी है। हमारी कमजोरी है कि हमारा कोई बड़ा प्रतिनिधि विश्व मंच पर अपनी बात कहता है तो सालों-साल उसे हम गाते रहते हैं लेकिन इस सिलसिले का आगे जारी रखे जाने की कोई कोशिश नहीं की जाती है। बेहतर होगा कि हमारा हर नेता, हर प्रतिनिधि विश्व मंच पर हिन्दी में ही अपनी बात कहे तो भारत की श्रीवृद्धि होगी। यह विनय नहीं, नियम होना चाहिए कि हम हिन्दी में ही बात करेंगे। बेहतर होगा कि इस बार संकल्प लें कि चाहे जो हो, हिन्दी को अपनाने के लिए विश्व मंच हमें आमंत्रित करें क्योंकि दुनिया की श्रेष्ठ भाषा हिन्दी ही है।

सोमवार, 22 जुलाई 2019

देवालय जाना हो तो ‘आजाद’ का देवालय जाइए

देवालय जाना हो तो ‘आजाद’ का देवालय जाइए
-मनोज कुमार

तारीखों के पन्ने में जुलाई 23 तारीख भी दर्ज है लेकिन यह तारीख पूरे भारत वर्ष के लिए गौरव की तारीख है. इस दिन धरा में एक ऐसे बच्चे की किलकारी गूंजी थी जिसने भारत वर्ष को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करा दिया. स्वयं शहीद होकर इतिहास के पन्ने पर स्वयं का नाम आजाद लिख गए. यह बच्चा कोई और नहीं बल्कि जिन्हें कभी कोई चंद्रशेखर तिवारी के नाम से जानते रहे होंगे, आज वे चंद्रशेखर आजाद हैं और इस दुनिया में जब तक सूरज-चांद रहेगा, वे आजाद ही बने रहेंगे. हैं. चूंकि वे नाम से आजाद थे, इसलिए किसी राज्य की सीमा से वे बंधे हुए नहीं थे. अंग्रेज शासित भारत में पले बढ़े आजाद की रगों में शुरू से ही अंग्रेजों के प्रति नफरत भरी हुई थी। मध्यप्रदेश से लेकर उत्तरप्रदेश और लगभग सारे देश में उनके नाम की गूंज थी. आजाद का जन्म 23 जुलाई को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गांव में 1906 में हुआ था। आजाद का प्रारंभिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा में ही बीता। आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी अकाल पडऩे पर गांव छोड़ कर मध्यप्रदेश चले गये थे। उनकी मां का नाम जगरानी देवी था। 

चंद्रशेखर तिवारी से क्रांतिकारी आजाद की यात्रा रोमांचक है. एक ऐसी यात्रा जो युवाओं के भीतर देशप्रेम का जज्बा सहज रूप से भर सकती है. भींची हुई मुठ्ठी और आंखों में अंग्रेजों के खिलाफ नफरत ने उन्हें महज 15 साल की उम्र में जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया था. अंग्रेजों के राज में कानून तो था नहीं लेकिन कानून का स्वांग करते रहे और इस सिलसिले में युवा क्रांतिकारी को अदालत में पेश किया गया. 15 साल के किशोरवय आजाद जज को अपना नाम बताया आजाद. पिता का नाम स्वतंत्रता और अपना पता दिया जेल का.15 साल के लडक़े की हिम्मत से चाहे भीतर से जज भयभीत हो गया हो लेकिन बाहरी तौर पर गुस्सा दिखाते हुए आजाद को 15 बेंतो की सजा सुनाई गई। यहीं से चंद्रशेखर के साथ तिवारी विलोपित हो गया और नयी पहचान मिली आजाद। इतिहास के पन्नों में आजाद के हौसले की कहानियां स्वर्णाक्षरों में अंकित है. यहां मैं उन यादों को शेयर कर रहा हूं जिसके साथ कुछ घंटे मैंने जिया है. जाना है कि देवालयों के नाम पर रोज सिर फुटौव्वल करते लोग एक बार आजाद के देवालय के दर्शन कर आएं. एक बार देख आएं कि भाबरा में देव तो पूजे जाते हैं, पूजा के लिए लेकिन आजाद के देवालय में नौजवान, छोटी उम्र के बच्चों के साथ संस्कार सिखाने जाते हैं. उनके भीतर आजाद की वो आग जलाने की सतत कोशिश होती रहती है, जो आजाद की आंखों में अंग्रेजों के खिलाफ थी. अन्याय और दुष्टता के खिलाफ थी. 

लगभग पांच साल पुरानी बात है. तब  23 जुलाई को अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की पुण्यभूमि पर जाने का मुझे अवसर मिला था. यह दिन मेरे लिये किसी उत्सव से कम नहीं था. कभी इस पुण्यभूमि को भाबरा के नाम से पुकारा जाता था किन्तु अब इस नगर की पहचान अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के रूप में है. मध्यप्रदेश शासन के आदिमजाति कल्याण विभाग के सहयोग से राज्य के आदिवासी बाहुल्य जिलों में सामुदायिक रेडियो केन्द्रों की स्थापना की पहली कड़ी में यहां दो वर्ष पहले रेडियो वन्या की स्थापना हुई. 23 जुलाई को रेडियो वन्या के दूसरी सालगिरह पर मैं बतौर रेडियो के राज्य समन्वयक के नाते पहुंचा था. मैं पहली दफा इस पुण्य धरा पर आया था. इस धरा पर अपना पहला कदम रखते ही जैसे मेरे भीतर एक कंपन सी हुई. कुछ ऐसा मन में लगा जिसे अभिव्यक्त कर पाना मुश्किल सा लग रहा है. एक अपराध बोध भी मेरे मन को घर कर गया था. भोपाल से जिस वाहन से हम चंद्रशेखर आजाद नगर पहुंचे थे, उसी वाहन में बैठकर मैं और मेरे कुछ साथी आजाद की कुटिया की तरफ रवाना हुए. कुछ पल बाद ही मेरे मन में आया कि मैं कोई अनैतिक काम कर रहा हूं. उस वीर की भूमि पर मैं कार में सवार होकर उसी तरह चल रहा हूं जिस तरह कभी अंग्रेज चला करते थे. मन ग्लानि से भर गया और तत्काल अपनी भूल सुधार कर वाहन से नीचे उतर गया. वाहन से नीचे उतरते ही जैसेे मन हल्का हो गया. क्षणिक रूप से भूल तो सुधार लिया लेकिन एक टीस मन में शायद ताउम्र बनी रहेगी.

बहरहाल, रेडियो वन्या स्टेशन पर कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद लगभग हजार विद्यार्थियों की बड़ी रैली अमर शहीद चंद्रशेखर की जयकारा करते हुये निकली तो मन खुश हो गया. परम्परा को आगे बढ़ाते देखना है तो आपको चंद्रशेखर नगर जरूर आना होगा. वीर शहीद की कुटिया को सरकार की तरफ से सुंदर बना दिया गया है. इस कुटिया में मध्यप्रदेश स्वराज संस्थान संचालनालय की ओर उनकी पुरानी तस्वीरों का सुंदर संयोजन किया गया है. इस कुटिया में प्रवेश करने से पूर्व ही एक अम्मां मिलेंगी जो बिना किसी स्वार्थ कुटिया की रखवाली करती हैं, जैसे वे अपने देश को अंग्रेजों से बचा रही हों. इस कुटिया के भीतर वीर शहीद चंद्रशेखर आजाद की आदमकद प्रतिमा है जिसे देखते ही लगता है कि वे बोल पड़ेंगे- हम आजाद थे, आजाद रहेेंगे. सब-कुछ किसी फिल्म की रील की तरह आंखों के सामने से गुजरती हुई प्रतीत होता है. जब मैं प्रतिमा निहार रहा था तभी एक लगभग 30-35 बरस का युवा अपनी छोटी सी बिटिया को लेकर कुटिया में आया और बिना समय गंवाये नन्हीं बच्ची को गोद में उठाकर उसे इतना ऊपर उठाया कि बिटिया शहीद का तिलक कर सके. उसने यही नहीं किया बल्कि बिटिया को शहीद के पैरों पर ढोक लगाने के लिये प्रेरित किया. नन्हीं सी बच्ची को शहीद और भगवान में अंतर नहीं मालूम हो लेकिन एक पिता के नाते उस युवक की जिम्मेदारी देखकर मन भाव से भर गया. आजाद का यह देवालय सही अर्थों में संस्कार की प्रथम पाठशाला है. 

एकाएक मन में आया कि काश, भारत आज भी गांवों का देश होता तो अभाव भले ही उसे घेरे होते किन्तु भाव तो नहीं मरते. बिलकुल जैसा कि मैंने चंद्रशेखर आजाद की नगरी में देखा. विकास के दौड़ में हम अपना गौरवशाली अतीत को विस्मृत कर रहे हैं लेकिन यह छोटा सा कस्बानुमा आज भी उस गौरवशाली इतिहास को परम्परा के रूप में आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित कर रहा है. परम्परा के संवर्धन एवं संरक्षण की यह कोशिश ही सही मायने में भारत की तस्वीर है. मैं यह बात बड़े गौरव के साथ कह सकता हूं कि देश का ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में जितना बड़ा योगदान दिया और इनके शहीदों को जिस तरह समाज ने सहेजा है, वह बिराला ही उदाहरण है. यह वही चीज है जिसे हम भारत की अस्मिता कहते हैं, यह वही चीज है जिससे भारत की दुनिया में पहचान है और शायद यही कारण है कि तमाम तरह की विसंगितयां, विश्व वक्रदृष्टि के बावजूद भारत बल से बलवान बना हुआ है.

दुख इस बात है कि विकास की अंधी दौड़ से अब चंद्रशेखर आजाद नगर भी नहीं बचा है. मकान, दुकान पसरते जा रहे हैं. वीर शहीद के नाम पर राजनीति अब आम हो रही है. हालांकि इसे यह सोच कर उबरा जा सकता है कि विकास होगा तो यह लालच बढ़ेगा और लालच बढ़ेगा तो विसंगतियांं आम होंगी लेकिन यह बात भी दिल को सुकून देेने वाली हैं कि चंद्रशेखर आजाद की नगरी में 23 जुलाई का दिन हर वर्ष दीपावली से भी बड़े उत्सव की तरह मनाया जाता है. हो भी क्यों नहीं? मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं हर बार इस मंजर को याद करते हुए. हर बार रोमांचित हो जाता हूं लोगों से चर्चा और बातें करते हुए. हर बार इस बात का स्मरण रह जाता है कि आजाद नहीं होते तो क्या हम आजाद हो पाते? इतिहास के पन्नों में अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद को मेरा कोटिश: प्रणाम.  

रविवार, 19 मई 2019

सुमिरन बैरागी


बालकवि होना तो एक बार आसान हो सकता है लेकिन सत्ता के साथ होते हुए बैरागी होना असम्भव ना भी हो तो मुश्किल ज़रूर है लेकिन बैरागी बन कर सत्ता के साथ रहकर लोक धर्म निभाने वाले बालकवि बैरागी बिरले लोगों मैं एक है। भौतिक रूप से वे अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता में जो प्रतिमान उन्होंने गढ़े, वह मार्गदर्शक बनकर हमारे साथ हैं. "समागम" के इस अंक में सुमिरन बैरागी पर केंद्रित है.

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...