गुरुवार, 30 मार्च 2023
आह! इंदौर, वाह...इंदौरी
रविवार, 26 मार्च 2023
मन को मन से जोड़ती ‘मन की बात’
मनोज कुमार
रेडियो अपने जन्म से विश्वसनीय रहा है. सुभाष बाबू का रेडियो आजाद हिन्द हो या आज का ऑल इंडिया रेडियो. प्रसारण की तमाम मर्यादा का पालन करते हुए जो शुचिता और सौम्यता रेडियो प्रसारण में दिखता है, वह और कहीं नहीं. मौजूं सवाल यह है कि रेडियो प्रसारण सेवा का आप कैसे उपयोग करते हैं? इस मामले में महात्मा गांधी से लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो अभिनव प्रयोग किया है, वह अलहदा है. गांधीजी ने रेडियो को शक्तिशाली माध्यम कहकर संबोधित किया था और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे चरितार्थ कर दिखाया. संचार के विभिन्न माध्यमों के साथ मोदीजी का दोस्ताना व्यवहार रहा है लेकिन रेडियो प्रसारण के साथ वे मन से जुड़ते हैं.
मन से मन को जोडऩे का उपक्रम ‘मन की बात’ के सौ एपिसोड पूरे होने जा रहे हैं तो इसके प्रभाव को लेकर कुछ चर्चा किया जाना सामयिक है. कहने को सौ एपिसोड बहुत आसान सा लगता है लेकिन देखा जाए तो यह एक कठिन टास्क है जिसे मोदीजी जैसे व्यक्ति पूरा कर सकते थे और किया भी. ‘मन की बात’ शीर्षक को लेकर लोगों को लगने लगा कि वे अपने मन की बात कह रहे हैं लेकिन ‘मन की बात’ कार्यक्रम का कोई भी एपिसोड सुन लीजिये और विषयों की विविधता मिलेगी. एक तंत्र विकसित किया गया जो देश के अनजाने और दूर-दराज इलाकों में अपने काम से कामयाबी हासिल करने वालों से प्रधानमंत्री सीधे बात करते हैं. उनके कार्यों के बारे में जानते हैं और अपनी आपसी चर्चा के बीच उस कामयाबी के रास्ते को समझने की कोशिश करते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में देशभर से लाखों की तादाद में जुड़े श्रोताओं को ना केवल नई जानकारी मिलती है बल्कि उन्हें भी कुछ नया करने का हौसला मिलता है. इसे ही मैंने मन से मन को जोडऩे वाला कार्यक्रम ‘मन की बात’ कहा है.
शुरूआती दौर में रेडियो सामान्य दिनचर्या का एक हिस्सा बना हुआ रहता था, वहीं देश और दुनिया से जोड़े रखने का भी यही एक माध्यम था. मोबाइल का दौर आया और रेडियो बाजार से गायब हो गए. हालांकि संचार की इस दौड़ में बने रहने के लिए रेडियो बन गए अब मोबाइल रेडियो. लेकिन वर्ष 2014 के बाद मोबाइल रेडियो में बड़ा बदलाव देखा गया जब 3 अक्टूबर, 2014 को ऑल इंडिया रेडियो पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुरू किया कार्यक्रम ‘मन की बात’. कार्यक्रम की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब कुल 99 एपिसोड प्रसारित किए जा चुके हैं. इस कार्यक्रम की शुरुआत करने का मकसद भारत में एक बार फिर लोगों का ध्यान रेडियो की ओर लाना तो था ही साथ ही जनता से रेडियो के ज़रिए संवाद कर जनता के मुद्दों पर बातचीत करना भी था. इसका असर यह हुआ कि जहां जनता पहले तक खास मौकों पर ही रेडियो सुना करती थी वही नरेंद्र मोदी के मन की बात के शुरू होने के बाद तक भी जनता इस कार्यक्रम से जुडी हुई है.
‘मन की बात’ में मोदी जी अपनी मन की बात कम करते हैं और लोगों के मन की बात ज्यादा सुनते हैं. ‘मन की बात’ कार्यक्रम सुनते हुए मुझे एक छोटी सी कहानी का स्मरण हो आता है. यहां इस कहानी का उल्लेख करना समीचीन होगा. बात यूं है कि एक बंद ताला पड़ा हुआ था और उसके पास एक छोटी सी चाबी और एक भारी-भरकम हथौड़ा भी. बंद ताले को खोलने के लिए हथौड़े ने अपनी पूरी ताकत लगा दी और परास्त होकर वहीं बैठ गया. इतने में छोटी सी चाबी बंद ताले के दिल में प्रवेश किया और ताला खुल गया. भारी-भरकम हथौड़े के लिए यह रहस्य की बात थी. उसने चाबी से पूछा कि मैं इतना वजनदार होने के बाद भी ताला नहीं खोल पाया और तू इत्ती सी चाबी ताले को खोल दिया. यह कैसे हुआ? ताले की तरफ मुस्कराती हुई चाबी ने कहा कि किसी के दिल को खोलने के लिए उसके दिल में उतरना पड़ता है और वही मैंने किया. मोदी जी भी ‘मन की बात’ के जरिये चाबी की मानिंद लोगों के दिल में उतरकर उनके दिल तक पहुंच जाते हैं.
भारत जैसे महादेश में अनेक ऐसे लोग हैं जो गुमनामी का जीवन जी रहे हैं लेकिन उनका काम, उनकी सफलता की कोई चर्चा नहीं होती है. ऐसे में कोई कारीगर, कोई किसान, कोई महिला जब प्रधानमंत्री से बात करती है तो उसकी कामयाबी ना केवल सामने आती है बल्कि ये लोग और आगे बढऩे का हौसला पाते हैं. हमारे भारतीय समाज में परीक्षा प्रतिभा मूल्यांकन के स्थान पर भय का वातावरण निर्मित करता है और बच्चे फेल होने के डर से कई बार जान देने तक उतारू हो जाते हैं. इन बच्चों के भीतर साहस जगाने के लिए और परीक्षा से भयभीत ना होने का मंत्र मोदीजी देते हैं तो ज्यादतर बच्चों के भीतर का डर पूरी तरह भले ही खत्म ना हो लेकिन कम तो जरूर हो जाता है. परीक्षा देने जाने से पहले हम उस अदृश्य शक्ति से पास हो जाने की कामना करते हैं क्योंकि हमारी पीठ पर हाथ रखकर हमें हौसला देने वाला कोई नहीं होता है. समाज का कोई भी तबका इस बड़ी समस्या पर कभी कोई पहल करने की जरूरत नहीं समझा इसलिये परीक्षा का भूत हमेशा हावी रहा लेकिन ‘मन की बात’ के जरिये मोदीजी ने एक पालक की भूमिका का निर्वहन किया तो सारा का सारा मंजर ही बदल गया.
‘मन की बात’ के जरिये मोदीजी ने बड़ी ही खामोशी के साथ बाजार को बदल दिया. इसके लिए एक उदाहरण का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है. खादी हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान है लेकिन नए जमाने के साथ खादी का चलन कम से कम होता जा रहा था. ऐसे में मोदीजी ने ‘मन की बात’ के जरिये खादी अपनाने के लिए लोगों से आह्वान किया. यह यकिन करना मुश्किल होगा लेकिन सच है कि खादी की बिक्री में जो इजाफा हुआ, वह रिकार्ड है. अब यहां इस बात को दर्ज किया जाना चाहिए कि ‘मन की बात’ में मोदीजी के मन की बात है या भारत के एक सौ तीस करोड़ लोगों के मन की बात है.
‘मन की बात’ के जरिये ऑल इंडिया रेडियो का कायाकल्प हो गया. रेडियो के राजस्व में जितनी बढ़ोत्तरी ‘मन की बात’ कार्यक्रम के माध्यम से हुई, वह अब तक के रिकार्ड को ध्वस्त करने वाला है. पक्का-पक्का आंकड़ा देना मुनासिब नहीं है क्योंकि प्रत्येक माह होने वाले ‘मन की बात’ के जरिए रेडियो के राजस्व में बढ़ोत्तरी होती जा रही है. एक मोटा-मोटी आंकड़ें की बात करें तो मन की बात के प्रसारण शुरू होने के बाद से अब तक राजस्व में 33.16 करोड़ कमाए गए हैं जबकि प्रचार पर केवल 7.29 करोड़ खर्च किए गए थे। यह आंकड़ा 2023 के आरंभिक दिनों की है. रेडियो प्रसारण सेवा के क्षेत्र में प्रधानमंत्री द्वारा किये गए नवाचार से ना केवल रेडियो के दिन फिर गए बल्कि देश के दूर-दराज इलाकों में ‘मन की बात’ की गंूज सुनाई देनी लगी.
सोमवार, 20 मार्च 2023
पानी पानी रे...खारे पानी रे...
शनिवार, 11 मार्च 2023
भीड़ में अकेले पुष्पेंद्र
मनोज कुमार
कोई कहे पीपी सर, कोई कहे बाबा और जाने कितनों के लिए थे पीपी. एक व्यक्ति, अनेक संबोधन और सभी संबोधनों में प्यार और विश्वास. विद्यार्थियों के लिए वे संजीवनी थे तो मीडिया के वरिष्ठ और कनिष्ठ के लिए चलता-फिरता पीआर स्कूल. पहली बार जब उनसे 25 बरस पहले पहली बार पुष्पेन्द्रपाल सिंह उर्फ पीपी सिंह से मुलाकात हुई तो उनकी मेज पर कागज का ढेर था. यह सिलसिला मध्यप्रदेश माध्यम में आने के बाद भी बना रहा. अफसरों की तरह कभी मेज पर ना तो माखनलाल में बैठे और ना ही माध्यम में. हमेशा कागज के ढेर से घिरे रहे। बेतरतीब कागज के बीच रोज कोई ना कोई इस उम्मीद में अपना लिखा, छपा उन्हें देने आ जाता कि वे एक नजर देख लेंगे तो उनके काम को मुहर लग जाएगी. यह विश्वास एक रात में उन्होंने अर्जित नहीं किया था. इसके लिए उन्होंने खुद को सौंप दिया था समाज के हाथों में. आखिरी धडक़न तक पीपी शायद एकदम तन्हा रहे। कहने को तो उनके शार्गिदों और चाहने वालों की लम्बी फेहरिस्त थी लेकिन वे भीतर से एकदम अकेले थे। तिस पर मिजाज यह कि कभी अपने दर्द को चेहरे पर नहीं आने दिया. ऐसे बहुतेरे लोग थे जो अपने बच्चों के भविष्य के लिए, कहीं नौकरी की चाहत मेें तो कहीं एडमिशन के लिए उनके पास आते-जाते रहे हैं लेकिन खुद पीपी ने कभी अपने बच्चों का जिक्र किसी से नहीं किया. लोगों को भी पीपी से ही मतलब था. शायद यही कारण है कि पीपी के जाने की खबर आग की तरह फैली तो लोगों को यह पता ही नहीं था कि उनके परिवार में कौन-कौन हैं? पीपी की पूरी दुनिया उन्हीं के इर्द-गिर्द थी. 2023 में जब पीपी ने अंतिम सांसें ली तब योग-संयोग देखिये कि यह वही तारीख थी जब उनकी जीवनसंगिनी उनका साथ छोड़ गयी थीं. भारतीय संस्कृति और परम्परा में विवाह को सात जन्मों का बंधन कहते हैं और यह योग-संयोग इस बात की पुष्टि करता है.
पचास पार पुष्पेन्द्रपाल सिंह उर्फ पीपी सिंह से मेरी मुलाकात को 25 वर्ष से अधिक हो गए. तब माखनलाल पत्रकारिता संस्थान का कैम्पस सात नंबर पर लगता था. ठहाके के साथ हर बार मिलना और इससे भी बड़ी बात कि खुले दिल से दूसरे के काम की तारीफ करना. मुझे नहीं लगता कि वे कभी किसी की आलोचना करते या उनके काम में कमी निकालते दिखे. जिनसे उन्हें शिकायत भी होती, उनसे भी कुछ नहीं कहते. कभी हंस कर, कभी मुस्करा कर टाल जाते. जब कभी मैं शिकायत करता कि आपको पता है फिर कुछ बोलते क्यों नहीं तब वे हल्की मुस्कराहट के साथ कहते रात को गप्प करेंगे ना. मैं समझ जाता कि व्यक्तिगत रूप से कुछ कहना चाहते हैं. मेरी उनसे बात फोन पर अक्सर देर रात हुआ करती थी तब किसी और के फोन आने का अंदेशा कम होता था. बिना रूके कोई घंटा-डेढ़ घंटा हफ्ते-दस दिन में बात करते थे. मेरी शिकायत पर कहते कि आप सही हैं, कई बार कहा लेकिन वे अपनी आदत में सुधार नहीं ला सकते हैं तो क्या करें. जाने दो. आपका काम बढिय़ा है, करते रहें. कई बार अफसोस करते कि मैं आपकी कोई मदद नहीं कर पा रहा हूं. काम की व्यस्तता के चलते भी कुछ नहीं कर पा रहा हूं.
भोपाल में कोई भी आयोजन हो, पीपी की उपस्थिति ना हो, यह लगभग असंभव सा है. हर विषय पर पकड़ और पूरे अधिकार के साथ संवाद. नाट्य निर्देशक संजय मेहता की किताब के विमोचन में उन्हें अतिथि के रूप में आमंत्रित करने के लिए उनसे पूछा तो कहा कि कैसी बात करते हैं. आप जब कहें, मैं हाजिर हो जाऊंगा. बस, एक दिन पहले समय और स्थान बता देना. खासियत यह कि वे बिना तैयारी किये किसी प्रोग्राम में आते भी नहीं थे. संजय जी की किताब ‘मरघटा खुला है’ पहले पढ़ी और फिर विमोचन कार्यक्रम में बोलने आए. और बोले तो पूरे चौंसठ पेज बोल गए. शायद लेखक संजयजी को भी इतना याद नहीं होगा जितना पीपी याद कर आए थे. विमोचन के बाद मजाक में मैंने कहा-पीपी भाई, आप इतना बोल जाते हैं कि दूसरे अतिथियों के लिए बोलने को कुछ शेष नहीं रहता है. जिस बात का उन्हें जवाब नहीं देना होता है, उस बात को अपने ठहाकों से उड़ा दिया करते थे. पब्लिक रिलेशन सोयासटी ने जो लोकप्रियता अर्जित की, वह पीपी के मेहनत के दम पर. लोगों को ना जाने कहां-कहां से जोड़ लाते. मेरा सोसायटी से कोई लेना-देना नहीं लेकिन कभी आग्रह तो कभी अधिकारपूर्वक मुझे जोड़े रखा. स्मारिका में लिखने की बात हो तो लिखने के लिए कहने के बजाय कहते, मनोज भाई, कब मेल कर रहे हैं. इसका मतलब है कि आपको लिखना है. हर मीटिंग के पहले उनका फोन आ जाता था, आज नाइन मसाला में मिलना है. मुझे और समागम को लेकर हमेशा उनका रूख सकरात्मक रहा. आज उनके जाने के बाद जाने कितनी यादें हिल्लोरे मार रही हैं लेकिन पीपी का साथ नहीं होना एक खालीपन का अहसास दिला रहा है. शायद मैं उन थोड़े लोगों में हूं जिनका पीपी के साथ उनके परिवार से परिचय था. उनके छोटे भाई केपी जब भास्कर, इंदौर में थे तो उनके घर भी पीपी के साथ जाना हुआ. लोगों को पीपी के ठहाके दिखते थे लेकिन उनका दर्द देखने की शायद किसी ने कोशिश नहीं की और उनकी आदत में था भी नहीं कि वे अपनी परेशानी बतायें. हां, हो जाएगा या देखते हैं, कहकर दूसरों का हौसला बढ़ाने वाले पीपी के पास दो-एक लोग ही थे. कभी सतही तौर पर मुझसे बातें कर लिया करते थे. 16-18 घंटे काम करने का उन्हें शौक नहीं था बल्कि खुद को काम में डूबा कर अपने अकेलापन को खत्म करने की कोशिश में जुटे रहते थे. पीपी पर लिखने के लिए हजारों-हजार बातें हैं लेकिन क्या लिखूं और क्या छोड़ू, समझ से परे है. लेकिन एक बात तय है कि भीड़ में अकेले पीपी को जान पाना, समझ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था.
शुक्रवार, 3 मार्च 2023
जन्मदिन के साथ ‘भाई-दूज’ मनाएंगी शिवराजसिंह की लाड़ली बहना
5 मार्च जन्मदिन पर विशेष
मनोज कुमार
कल 5 मार्च को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की उम्र में एक वर्ष का और इजाफा हो जाएगा। इस बार उन्होंने अपना जन्मदिन नहीं मनाने का ऐलान किया है लेकिन यह पहला अवसर होगा जब उनके जन्मदिन के साथ प्रदेश भर में उनकी लाडली बहना ‘भाईदूज’ भी मनाएंगी। ‘भाईदूज’ भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पवित्र संस्कार है जिसमें भाई अपनी बहनों की सुरक्षा और समृद्धि का वचन देता है। मातृशक्ति का आंचल शिवराजसिंह के लिए मंगल कामनाओं से भरा-पूरा है। लाडली बहना शिवराजसिंह चौहान के लिए आशीष और उनकी कामयाबी के लिए ईश्वर से प्रार्थना करेंगी। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान वैसे भी स्त्री समाज की बेहतरी के लिए हमेशा से चिंतित और सक्रिय रहे हैं। इस क्रम में उन्होंने हाल ही में ‘लाडली बहना’ योजना का ऐलान किया है और संयोग से इस योजना का आरंभ कल पांच मार्च से हो रहा है। भाई का बहनों को यह तोहफा एक किस्म का अपरोक्ष रूप से ‘भाईदूज’ का नेग माना जा सकता है। कहना ना होगा कि ‘लाडली बहना’ भी उनके जन्मदिन के साथ ‘भाईदूज’ का संस्कार भी पूर्ण करेंगी। ऐसे अवसर अक्सर आंखों को भिगो देते हंै और मन पुलकित हो जाता है। बेशक, यह शिवराजसिंह सरकार की योजना है लेकिन प्रदेश भर की महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा देने का बड़ा उपक्रम है।
उल्लेखनीय है कि साल 2005, माह नवम्बर में जब शिवराजसिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद सम्हाला था तब से उनका संकल्प प्रदेश के बेटियों, बहनों और वृद्ध माता-पिता को बेहतर जिंदगी देने का रहा है। लाडली लक्ष्मी योजना से लेकर, स्कूल जाने के लिए साइकिल योजना हो या अब लाडली बहना, शिवराजसिंह के संकल्प को पूरा करते हुए दिखती हैं। बिटिया के ब्याह हो या निकाह, शिवराजसिंह पूरे सम्मान के साथ योजना का लाभ दिलाते रहे हैं। करीब-करीब 20 वर्ष के कार्यकाल में महिला केन्द्रित योजनाओं में मध्यप्रदेश ने जो मानक गढ़े हैं, वह पूरे देश के लिए मिसाल बन गयी है। अनेक राज्य मध्यप्रदेश के अनुगामी बने हैं और अपने-अपने राज्यों में योजनाओं को लागू कर रहे है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की दूष्टि साफ है और वेे कहते हैं कि मध्यप्रदेश में लागू की गई महिला कल्याण की विभिन्न योजनाओं को देश के अन्य राज्य अपना रहे हैं तो यह प्रसन्नता की बात है क्योंकि बेटी, भांजी, बहन हम सबकी हैं और उनकी सुरक्षा और समृद्धि ही हमारा अंतिम लक्ष्य है।
मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना योजना की शुरुआत करने का उद्देश्य है कि समाज की नकारात्मक सोच को बदलना और बालिकाओं के भविष्य को उज्जवल बनाना है। इस योजना की घोषणा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा नर्मदा जयंती के अवसर पर इसी वर्ष 28 जनवरी 2023 को की गई थी। बालिकाओं के प्रति लोगों में सकारात्मक सोच एवं उनके लिंग अनुपात में सुधार के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना की शुरुआत की है। इस योजना की सहायता से प्रदेश में लोगो को बालिकाओं के प्रति स्नेह बढ़ेगा। प्रदेश के सरकार द्वारा यह भी घोषणा की गई है कि हमारी जो भी गरीब बहने, निम्न-मध्यम वर्ग की बहनें जो किसी भी धर्म या जाति से आती हों, इस योजना का लाभ प्राप्त कर सकेंगी। लाड़ली बहना योजना में किसी परिवार में यदि दो बहुएं हैं तो उन्हें भी हर महीना 1-1 हजार रुपए दिए जाएंगे। सास यदि बुजुर्ग हैं तो उन्हें वृद्धावस्था पेंशन में 600 के साथ इस योजना के 400 जोडक़र दिए जाएंगे। कोई महिला पहले से किसी भी योजना के तहत लाभ उठा रही है तो उसे भी इस योजना में शामिल किया जायेगा एवं पेंशन पाने वाली महिलाएं भी इस योजना का हिस्सा बन पाएंगी।
प्रदेश की सभी बहनों को इस योजना के तहत एक हजार रुपए हर महीने दिया जाएगा। 5 साल में 60 हजार रुपए दिया जाएगा, ताकि वह आर्थिक रूप से मजबूत हो सकें। इस योजना पर सरकार द्वारा पांच वर्षों में 60 हजार करोड़़ रुपए खर्च किया जाएगा। हमारे देश में कई लोग आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के कारण अपनी बहन को उच्च शिक्षा नहीं दे पाते हैं। प्रदेश में रहने वाले कई लोग ऐसे भी हैं जो अभी भी लडक़े और लड़कियों में भेदभाव करते हैं, इस सोच को बदलने में यह योजना कारगर साबित होगी।
अनुभवों से लबरेज शिवराजसिंह चौहान मध्यप्रदेश के चार बार के मुख्यमंत्री हैं लेकिन उनकी कार्यशैली और जीवनशैली आज भी आम आदमी की है। वे अपनी सादगी से लोगों का मन मोह लेते हैं। सबको अपना सा लगता है। रंच मात्र भी उनमें गरुर दिखाई नहीं देता है और वे आज भी एक किसान पुत्र की भांति रहते हैं। उनकी चिंता में महिला, बेटी हैं तो किसान और वृद्ध माता-पिता भी हैं। वे मुख्यमंत्री के रूप में जब कहते हैं कि प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता मेरी भगवान हैं तो उनका आशय उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी का होता है। शिवरासिंह चौहान का मुख्यमंत्री के रूप में सफर कभी आसान नहीं रहा। अनेक चुनौतियों के बीच उन्होंने स्वयं को सम्हाला और चुनौतियों को संभावना में बदल दिया। फिर खेतों में पड़े ओला-पाला हो या कोविड काल में चौपट होती स्वास्थ्य एवं अर्थव्यवस्था, सबको उन्होंने सधे ढंग से सुलझा लिया। कोविड में आम आदमी को हौसला देते हुए खुद कोविड के शिकार हो गए लेकिन इलाज के दरम्यान भी राजकाज जारी रहा। उनके भीतर का यह हौसला, उनका ही नहीं, बल्कि प्रदेश की करोड़ों नागरिकों का है।
शिवराजसिंह चौहान एक संस्कारी राजनेता हैं और यही कारण है कि वे अपने विरोधियों को पूरा सम्मान देते हैं। कभी हल्के शब्दों का उपयोग नहीं करते हैं लेकिन अपने कार्यों से वे विरोधियों को चुप करा देते हैं। अनेक बार उन्हें मिथ्या आरोपों से घेरने की कोशिश की गई लेकिन सब की हवा निकल गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं शिवराजसिंह चौहान के मुरीद हैं और यही कारण है कि वे हर बार मध्यप्रदेश की धरा पर आने के लिए तैयार रहते हैं। महाकाल लोक जैसा अविस्मरणीय धार्मिक स्थल के लोकार्पण का अवसर हो, कूनो अभयारण्य आने का विषय हो या निवेशकों का सम्मेलन हो, प्रधानमंत्री हमेशा पहुंचे हैं। महामहिम राष्ट्रपति भी तीन से अधिक बार मध्यप्रदेश का प्रवास कर चुकी हैं। यह सब संयोग नहीं बल्कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की सदाशयता और उनकी मेहनत को देश-दुनिया देख रही है। सरल, सहज और मिलनसार शिवराजसिंह चौहान भले ही अपना जन्मदिन उत्सवी ना मना रहे हों लेकिन एक-एक पौधा अपना आशीष उन्हें प्रदान करता दिख रहा है। जन्मदिन की कोटिश: बधाई। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)
रविवार, 5 फ़रवरी 2023
‘समागम’ का सिनेमा उत्सव
‘समागम’ : 23वें वर्ष का पहला अंक
दूध की बढ़ती कीमतें नहीं, हमारी चिंता शेयर बाजार है
मनोज कुमार
दूध की बढ़ती कीमतें अब हमें नहीं डराती हैं। इस बढ़ोत्तरी पर हम कोई विमर्श नहीं करते हैं। हमारा सारा विमर्श का केन्द्र शेयर बाजार है। कौन सा पूंजीपति डूब रहा है, इस पर हम चिंता में घुले जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि शेयर मार्केट की चिंता नहीं करना चाहिए लेकिन पहले तय तो हो कि जीवन के लिए दूध जरूरी है कि शेयर? क्या हम मान लें कि एक साथ तीन रुपये दूध की कीमत में बढ़ोत्तरी कोई माथे पर सलवटें नहीं डालती हैं? क्या हम मान लें कि रोजमर्रा की महंगाई से दो-चार होने को हमने स्वीकार कर लिया है? क्या हम मान लें कि दूध से ज्यादा जरूरी है कि शेयर मार्केट उठ रहा है या गिर रहा है? शायद इस समय का सच यही है कि हमने दूध, सब्जी, किराना और इसी तरह की दिनचर्या की जरूरी चीजों की महंगाई को महंगाई नहीं मान रहे हैं। बढ़ती महंगाई के लिए सत्ता और शासन को हम दोषी बताकर किनारा कर लेते हैं लेकिन जिन्हें शायद कल सत्ता और शासन सम्हालने का अवसर मिले, वे भी खामोश हैं। उनकी चिंता में भी दूध नहीं, शेयर मार्केट की मंदी और उछाल है।
हिडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद कारोबारी खानदान की चूलें क्या हिली, पूरा समाज चिंता में डूब गया। सबको लगने लगा कि यह खानदान डूबा तो हम सब डूब जाएंगे। शायद यह सच भी हो सकता है लेकिन इससे बड़ा सच एक यह है कि सवा सौ करोड़ के इस महादेश में मध्यमवर्गीय परिवारों से एक मोटे अनुमान से दो-पांच प्रतिशत लोग होंगे जिनकी रूचि शेयर मार्केट में है और उनका पैसा शेयर में लगा हो लेकिन 99 फीसदी परिवार दूध का उपयोग करता है, इस बात से इंकार नहीं होना चाहिए। अब आप खुद अंदाज लगाइये कि चिंता 99 फीसदी लोगों की होनी चाहिए या उन दो-पांच परसेंट लोगों की। लेकिन हम बेफ्रिक हैं और यह मानकर चल रहे हैं कि यह सब चलता रहता है। कोराबारी खानदान के साथ अन्य कई कम्पनियों के शेयर के भाव औंधे मुंह गिरे तो बात लाखों करोड़ तक जा पहुंची। यह आम चर्चा का विषय हो गया कि अब तो सब कयामत आने वाली है। लेकिन तीन रुपये दूध की कीमत बढ़ जाने से किसी को उन हजारों-हजार परिवार के दूधमुंहे बच्चों की चिंता नहीं हुई जिनका निवाला छीना जा रहा है।
बहुत पुराना तो याद नहीं लेकिन हर्षद मेहता के बाद से कुछ और ऐसी घटनाएं घटी हैं जिसने अर्थव्यवस्था पर असर डाला है। हर्षद मेहता के समय भी और उसके बाद भी आम आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ा। तब शायद मीडिल क्लॉस शेयर मार्केट को ना जानता था और ना उसकी हिम्मत थी कि वह ऐसी जगहों पर पैसा इनवेस्ट करे। इसे सीधे शब्दों में समझना चाहें तो कह सकते हैं कि तब आम आदमी की लालच का ग्राफ नियंत्रण में था। अपनी जीवन भर की कमाई को अधिक से अधिक वह एफडी बनाकर रख देता था। लेकिन आज मामला एकदम उलट है। क्या खास और क्या आम, सब लालच की डोर में ऐसे लिपटे दिख रहे हैं कि रातों रात लखपति बन जाना चाहते हैं। और ऐसे सपनों को पूरा करने के लिए उनके पास एक शॉर्टकट बचता है शेयर मार्केट। ऐसे में जब कोई गड़बड़ी उजागर होती है तब शेयर मार्केट में उछाल या मंदी छा जाती है और सबसे नुकसान में वह मिडिल क्लास होता है जिसके सपनों की डोर शेयर से बंधी होती है। ऐसे में डिप्रेशन, हॉटअटैक और मनोरोगियों की तादात में बढ़ोत्तरी हो जाए तो कोई हैरानी नहीं होना चाहिए। एक आम आदमी का शेयर मार्केट में पैसा डूबता है तो वह सडक़ पर आ जाता है लेकिन एक पूंजीपति को इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता है।
हैरानी में डाल देने वाली बात तो यह है कि हर्षद मेहता प्रकरण के बाद से जितने भी कांड हुए हैं, उसे देखने के बाद भी आम आदमी ने कोई सीख नहीं ली। शायद वह दांव पर अपनी कमाई लगा देना चाहता है और जैसा कि होता आया है, मरना, मिटना और तबाह होना उसे ही है। शेयर मार्केट व्यापार नहीं है बल्कि सपनों की दुनिया है और जैसा कि दुनिया का हर देश भारत के बाजार की ओर आस भरी नजरों से देख रहा है तब उसका भी टॉरगेट आम भारतीय ही होता है। उसे पता है कि ‘फ्री गिफ्ट’ आम आदमी को लुभाता है। यह और बात है कि उसके एवज में उसे दुगुना देना पड़ता है। सोशल मीडिया में रिल्स ने तो आम आदमी को शॉर्टकट में कुछ सेकंड में अमीर बनने का नुस्खा बताकर चला जाता है। एक ऐसा ही उदाहरण याद आता है कि एक व्यक्ति, दूसरे से पूछता है कि तुम रोज कितना शराब पीते हो और उसे बताता है कि बीस साल में तुमने इतने की शराब पीकर पैसा खर्च कर दिया। ऐसा नहीं करते तो तुम्हारे पास ऑडी कार होती। तब वह आदमी पलटकर पूछता है कि तुम तो शराब नहीं पीते, फिर तुम्हारी ऑडी कार कहां है? ऐसे सलाहकारों की बड़ी भीड़ है जो शिकारी की तरह आपको उलझाती है। यह ठीक है कि शराब से पैसा ही नहीं, सेहत भी खराब होती है और शराब नहीं पीना चाहिए। मजेदार बात तो यह है कि दूध की बढ़ती कीमत पर रिल्स पर कोई वीडियो, कोई मोटीवेशनल स्पीच या कोई चिंता नहीं दिख रही है।
जिस बाजारवाद को लेकर एक दशक पहले छाती पीटा जा रहा था, आज वह बाजारवाद हमारी जीवनशैली बन चुका है। कभी तीज-त्योहार पर नए कपड़े खरीदने का चलन था, अब रोज उत्सव हो रहा है। छूट और फ्री ने हर आदमी को उपभोक्ता बना दिया है। युवा वर्ग दो-पांच सौ रुपयों की कॉफी पीने का आदी हो चुका है। पिजा-बर्गर की कीमत के सामने उसे महंगा दूध क्यों बैचेन करेगा? उसके लिए तीन रुपये ही तो है। कभी कहते थे कि सिक्के की चमक के आगे अंधेरा छा जाता है, आज शेयर मार्केट के सामने अंधेरा छा गया है।
गिरमिटया महात्मा गांधी
आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...
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-अनामिका कोई यकीन ही नहीं कर सकता कि यह वही छत्तीसगढ़ है जहां के लोग कभी विकास के लिये तरसते थे। किसी को इस बात का यकिन दिलाना भी आस...
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समागम का नया अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का नवम्बर २०१० का अंक आदिवासी और मीड...
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मनोज कुमार कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरो...



