रविवार, 2 जुलाई 2023
‘सिकल सेल’ के खिलाफ शंखनाद
बुधवार, 21 जून 2023
टेक्नो फ्रेंडली संवाद से स्वच्छत
मनोज कुमार
शुक्रवार, 2 जून 2023
वो अढाई साल और भोपाल का गौरव दिवस
मनोज कुमार
15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश आजाद हवा में सांस ले रहा था तब भोपाल की धडक़न थरथरा रही थी. भोपाल के वाशिंदों को एक-दो दिन नहीं, पूरे अढाई साल आजाद हवा में सांस लेने के लिए इंतजार करना पड़ा था. आखिर एक लम्बे इंतजार के बाद हौले से आजादी ने भोपाल के दरवाजे पर दस्तक दी. ये अढाई साल भोपालियों के लिए संघर्ष के उन दिनों से ज्यादा भारी थे जो उन्होंने फिरंगियों से लिये थे. इस बार लड़ाई घर में थी. वह तो भला हो उस लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का जिन्होंने उन नापाक मंसूबों को धराशायी कर दिया. वे ऐसा नहीं करते तो आज भोपाल, भोपाल नजर नहीं आता और गौरव दिवस तो छोडिय़े, मेरा भोपाल कहने लायक भी नहीं रहते . आज भोपाल का गौरव दिवस मनाते समय उस घाव का दर्द महसूस करना इसलिए जरूरी हो जाता है कि हमारी नयी पीढ़ी जान सके कि गौरव ऐसे ही नहीं पाया जाता है. 1947 में ब्रिटिश हुकूमत से देश को भले ही आजादी मिली हो, लेकिन, भोपाल के लोगों ढाई साल तक गुलाम ही महसूस करते रहे। 15 अगस्त 1947 के बाद भी यहां नबावों का शासन था। इसके लिए ढाई साल तक संघर्ष हुआ। खास बात यह भी है कि तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की सख्ती के बाद 1 जून 1949 को भोपाल रियासत का विलय भारत में हो गया।
15 अगस्त, 1947 को तब भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्लाह थे। अंग्रेजों के खास नवाब हमीदुल्लाह भारत में विलय के पक्ष में नहीं थे क्योंकि वे भोपाल पर शासन करना चाहते थे। जब भारत को आजाद करने का फैसला किया गया उस समय यह निर्णय भी लिया गया कि पूरे देश में से राजकीय शासन हटा लिया जाएगा। मौजूदा तथ्य बताते हैं कि जब पाकिस्तान बनाने पर निर्णय हुआ और जिन्ना ने हिन्दुस्तान के सभी मुस्लिम शासकों को भी पाकिस्तान का हिस्सा बनाने का प्रस्ताव दिया। जिन्ना के करीबी होने के कारण भोपाल नवाब को पाकिस्तान में सेक्र्रेटरी जनरल का पद सौंपने की बात की गई। ऐसे में हमीदुल्लाह ने अपनी बेटी आबिदा को भोपाल का शासन बनाकर रियासत संभालने को कहा, लेकिन इंकार कर दिया गया। अंतत: हमीदुल्लाह भोपाल में ही रहे और भोपाल को अपने अधीन बनाए रखने के लिए भारत सरकार के खिलाफ खड़े हो गए। देश आजाद हो चुका था, हर मोर्चों पर भारतीय ध्वज लहराया जाता था लेकिन, भोपाल में इसकी आजादी किसी को नहीं थी। दो साल तक ऐसी स्थिति रही। तब भोपाल के नवाब भारत सरकार के किसी कार्यक्रम में शिरकत नहीं करते थे और आजादी के जश्न में भी नहीं जाते थे।
सरदार पटेल जैसे कडक़ मिजाज वाले होम मिनिस्टर नहीं होते तब शायद संभव था कि भोपाल पाकिस्तान का हिस्सा बन चुका होता. इधर मार्च 1948 में भोपाल नवाब हमीदुल्लाह ने रियासत को स्वतंत्र रहने की घोषणा कर दी। मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का एक मंत्रिमंडल घोषित कर दिया। प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय बनाए गए थे। इसी दौर में भोपाल रियासत में विलीनीकरण के लिए विद्रोह शुरू हो चुका था। भोपाल में चल रहे बवाल पर आजाद भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सख्त रवैया अपना लिया। पटेल ने नवाब के पास संदेश भेजा कि भोपाल स्वतंत्र नहीं रह सकता है। भोपाल को मध्यभारत का हिस्सा बनना ही होगा। 29 जनवरी 1949 को नवाब ने मंत्रिमंडल को बर्खास्त करते हुए सत्ता के सभी अधिकार अपने हाथ में ले लिए। इसके बाद भोपाल के अंदर ही विलीनीकरण के लिए विरोध-प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया। तीन माह तक जमकर आंदोलन हुआ।
होम मिनिस्ट पटेल के कड़े रूख के आगे नवाब हमीदुल्ला को अपनी जिद छोडक़र 30 अप्रैल 1949 को विलीनीकरण के पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद भोपाल रियासत 1 जून 1949 को भारत का हिस्सा बन गई। केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त चीफ कमिश्नर एनबी बैनर्जी ने भोपाल का कार्यभार संभाला और नवाब को 11 लाख सालाना का प्रिवीपर्स तय कर सत्ता के सभी अधिकार उनसे ले लिए। उल्लेखनीय है कि भारत सन् 1947 को स्वाधीन हो गया था किन्तु मध्यप्रदेश के 2 जिले रायसेन एवं सीहोर भोपाल नवाब हमीदुल्ला के गुलाम थे। इसी गुलामी को समाप्त करने हेतु तत्कालीन रियासत भोपाल के नागरिकों ने जो आंदोलन चलाया था उसे इतिहास में भोपाल विलीनीकरण आंदोलन के नाम से जाना जाता है।
भोपाल विलीनीकरण आंदोलन भी इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. हमीदुल्लाह ने भारत सरकार के साथ बातचीत करते हुए भोपाल को अलग स्वतंत्र राज्य घोषित करने पैरवी की थी. असल में, भोपाल एक मुस्लिम नवाबी स्टेट था लेकिन वहां आबादी हिंदू बहुल थी. नवाब के अलग रहने की इच्छा बने रहने की खबर के बाद दिसंबर 1948 में भोपाल में जनआंदोलन शुरू हुआ, जब नवाब हज के लिए गए हुए थे. शंकरदयाल शर्मा, भाई रतन कुमार गुप्ता जैसे नेताओं के नेतृत्व में भोपाल के भारत में विलय के लिए ‘विलीनीकरण आंदोलन’ शुरू हुआ. आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा तो नवाबी व्यवस्था ने इसे कुचलने की कोशिश भी की. कुछ आंदोलनकारी शहीद हुए तो शर्मा जैसे कुछ नेताओं को कई महीनों के लिए जेल में रहना पड़ा. आंदोलन जनक्रांति का रूप धारण कर उग्र हो गया। नबाबी कार्यालयों पर तिरंगा फहराना एवं वंदे मातरम् गान पर गिरफ्तारी, लाठी चार्ज किया जाता था।
भोपाल विलीनीकरण आंदोलन 14 जनवरी 1949 को मकर संक्रांति मेले में क्षेत्र के नवयुवकों का उत्साह चरम पर था। नर्मदा किनारे बोरास घाट पर मेला भरा हुआ था कि बीच मेले में भोपाल नवाव के खिलाफ विलीनीकरण आंदोलन के नवयुवकों द्वारा झंडा वंदन एवं सभा का आयोजन किया गया। झंडा वंदन होने के बाद स्व. बैजनाथ गुप्ता बिजली बाबा ने झंडा वंदन गीत गाया। जाफर अली ने सभास्थल पहुंचकर झंडा उतारने एवं सभा बंद करने चेतावनी दी। इस चेतावनी से बेपरवाह 16 साल के छोटेलाल आगे आए और बोला गोली का क्या डर बताता है? तभी थानेदार ने गोली चलाने का आदेश दे दिया। इस गोली से छोटेलाल शहीद हो गए। सुल्तानगंज निवासी 25 वर्षीय वीर धनसिंह राजपूत ने थाम लिया, किन्तु अगली गोली धनसिंह के सीने में समा गई। तीसरे शहीद हुए 30 वर्षीय मंगल सिंह, 3 नवयुवकों के शहीद होने के बाबजूद झंडे नीचे नहीं गिरे। चौथे नवयुवक ग्राम भुआरा निवासी विशाल सिंह ने थाम लिया परन्तु गोली चलना जारी था। विशाल सिंह के सीने में 2 गोलियां लगी परन्तु उसने भी झंडा नहीं छोड़ा। पुलिस कू्ररता पर उतर आई संगीन उसके पेट में उमेठ दी गई किन्तु विशाल सिंह ने झंडा झुकने नहीं दिया. झंडे की शान को कायम रखते हुए विशाल नर्मदा के जल तक ले गए और गड़ा दिया और हर नर्मदे कह कर अंतिम सांस ली। भोपाल की आजादी में जिन नायकों ने अपना सर्वस्व स्वाहा कर दिया प्रो. अक्षय कुमार जैन, रामचरण राय, शंकरदयाल शर्मा, उद्धवदास मेहता, रतन दास गुप्ता, प्रेमनारायण श्रीवास्तव, बाल कृष्ण गुप्ता, ठाकुर लाल सिंह, शांति देवी, मोहिनी देवी, मथुरा बाबू आदि शामिल थे। दमन की कार्यवाही के बाद भी विलीनीकरण आंदोलन तेज होता गया। उस दौर में 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता सेनानियों ने जुमेराती उप डाकघर पर तिरंगा फहराया था।
भोपाल गौरव दिवस अपने होने को सार्थक कर रहा है. यह बताने का माकूल वक्त है कि आजादी के परवानों ने कैसी-कैसी आहूति दी है तब जाकर हम आजाद हैं. अंग्रेजों की कू्ररता के सामने सिर ना झुकाने वाले नायकों ने कू्रर और बेरहम नवाब को भी झुकने के लिए मजबूर कर दिया. ऐसा है मेरा भोपाल और हम हैं भोपाली.
रविवार, 14 मई 2023
यह शिवराजसिंह का मध्यप्रदेश है साहेब
कुमार
जीत हमेशा सकुन देती है. यह जीत व्यक्ति की हो या संस्था की और बात जब राजनीति की हो तो यह और भी अर्थपूर्ण हो जाता है. कांग्रेस की कर्नाटक में बम्पर जीत से कांग्रेसजनों का उल्लासित होना लाजिमी है. यह इसलिए भी कि लगातार पराजय के कारण कांग्रेस पार्टी के भीतर निराशा पनपने लगी थी और यह माहौल बनाया जा रहा था कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पराभव के दौर से गुजर रही है. राजनीति में यह सब होना कोई अनोखा नहीं है. कल हम शीर्ष पर थे तो आज वो हैं और कल कोई होगा. ये पब्लिक है सब जानती है कि बात यहीं चरितार्थ होती है. कांग्रेस के खुश होने के अपने कारण हैं तो भाजपा को स्वयं की समीक्षा करने के लिए एक अवसर है. आने वाले समय में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और इन राज्यों में भाजपा की परीक्षा होगी तो कांग्रेस को भी इम्तहान से गुजरना होगा. एक जीत के बाद जश्र में डूब जाना कांग्रेस के लिए कतई हितकारी नहीं होगा. कांग्रेस के लिए कर्नाटक एक अवसर बनकर आया है और इस अवसर को आगे उसे भुनाने के लिए स्वयं को तैयार करना होगा. कांग्रेस की कर्नाटक में बड़ी जीत के बाद यह माहौल बनाया जा रहा है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी जीत मिल सकती है और भाजपा पीछे रह जाएगी. लेकिन ऐसा हो पाएगा, या नहीं, यह भविष्य के गर्भ में है. इस बात को भी समझना होगा कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे हिन्दी प्रदेश कर्नाटक नहीं हैं। इन राज्यों की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग है इसलिए यह मानकर चलना कि कर्नाटक जैसा परिणाम इन राज्यों में कांग्रेस के लिए होगा, अभी जल्दबाजी होगी.
जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव निकट भविष्य में होना है, वहां भाजपा समीक्षा करेगी और लगभग शेष छह माह की अवधि में स्वयं को तैयार कर इन राज्यों में अपनी सरकार बनाने या बचाने का प्रयास पुरजोर ढंग से करेगी. कांग्रेसशासित राजस्थान एवं छत्तीगसगढ़ में जिस तरह की गुटबाजी कांग्रेस में है, वह जगजाहिर है. मुख्यमंत्री गहलोत के लिए सचिन पायलट रोज एक मुसीबत लेकर सामने आ रहे हैं तो छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल वर्सेस सिंहदेव की खटास भी किसी से छिपा हुआ नहीं है. मध्यप्रदेश में सरकार तो कांग्रेस की बन गई थी लेकिन आपसी रार के चलते एक बड़ा गुट भाजपा के साथ होकर सरकार गिराने में कामयाब रही. यही नहीं, कांग्रेस छोडक़र भाजपा का दामन थामने वाले बागी नेताओं में अधिकांश ने उपचुनाव में वापस जीत दर्ज की. इस तरह से कांगे्रस को अभी आत्ममंथन की जरूरत है कि कैसे इन राज्यों में सत्ता में वापसी हो. हालांकि भाजपा में सब ठीक है, यह कहना भी गलत है। यहां भी असंतोष उभार पर है। वैसे भी राजनीति में महत्वकांक्षा पालना गलत नहीं है लेकिन योग्यता और भाग्य ही साथ देते हैं और इस पैमाने पर फिलवक्त शिवराज सिंह का कोई विकल्प नहीं है।
मध्यप्रदेश में भी विधानसभा चुनाव इस साल के आखिर में होना है और यह राज्य कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती है. चुनौती कांग्रेस के लिए स्वयं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान हैं. चौहान उन बिरले नेताओं में हैं जिनकी पकड़ जमीनी तौर पर पक्की है. आम आदमी के साथ उनका अपनापन का रिश्ता उस जमीन को मजबूत करता है जिसकी आम आदमी को चाहत होती है. थोड़ा अंतराल छोड़ दें तो करीब-करीब 20 वर्षों से सत्ता पर काबिज शिवराजसिंह चौहान बहनों के लिए भाई, बेटा-बेटियों के लिए मामा तो बुर्जुर्गों के लिए श्रवण कुमार बने हुए हैं. आम आदमी के बीच शिवराजसिंह चौहान ने अपनी जो छवि बनायी है, उसका तोड़ भाजपा के भीतर भी नहीं है, कांग्रेस तो दूर है ही. आपदा को अवसर में बदलने का मंत्र शिवराजसिंह को बखूबी आता है. वे किसी भी अवसर पर चूकते नहीं हैं. यही कारण है कि बार-बार उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के कयास लगाये जाते रहे और अब राजनीतिक गलियारों में इस कयास पर भी पूर्ण विराम लग गया है. यह अकारण नहीं है क्योंकि लोकप्रियता की दृष्टि से देखें तो शिवराजसिंह के बराबर इस समय प्रदेश में किसी भी दल में कोई लीडर नहीं दिखता है.
शिवराजसिंह इतने लोकप्रिय क्यों हैं, यह जानने की कोशिश करेंगे तो एक पंक्ति में जवाब मिलेगा कि गैरों को भी अपना बनाने की अदा. पिछले बीस वर्षों में उन्होंने जनकल्याण की इतनी जमीनी योजनाएं लागू की कि उनका कोई तोड़ किसी के पास नहीं है. अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने बेटियों को सक्षम बनाने के लिए लाडली लक्ष्मी योजना का श्रीगणेश किया. बच्चियों की शिक्षा पर पूरा ध्यान आकर्षित किया और किताबों से लेकर स्कूल जाने तक के लिए सायकल का इंतजाम कर उनकी शिक्षा की गारंटी ली. अब शहरी बच्चों को स्कूटी दिला रहे हैं. यह योजना इतना पापुलर हुई कि वे सहज रूप से घर-घर के मामा बन गए. कोई उन्हें मुख्यमंत्री या राजनेता के रूप में नहीं देखता है बल्कि वे परिवार के मुखिया के रूप में चिहिंत किये गए.
ओला-पाला के बीच रोते-बिसूरते किसानों के साथ खेतों में बैठकर उनका दुख बांटते रहे. दिलासा देते रहे और उनकी जिम्मेदारी अपने हिस्से लेकर उन्हें राहत दिलाने का पूरा प्रयास किया. यहां तक कि ऐसे किसानों की बेटियों के ब्याह का जिम्मा भी सरकार ने लिया. प्रदेश के उन हजारों-हजार परिवारों के लिए वे एक नेमत की तरह मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना लेकर आए. आर्थिक और शारीरिक रूप से अशक्त वृद्धजनों को तीर्थ यात्रा पर लेकर निकल पड़े. सबसे बड़ी बात यह कि इस तीर्थदर्शन में सभी वर्ग के लोग शामिल किये गए. सर्वधर्म, समभाव की उनका यह दर्शन लोगों के दिलों तक पहुंच गया. वृद्धावस्था पेंशन का मामला हो या बच्चों के इलाज के लिए इंतजाम करना, कोई कटौती नहीं की गई. कोविड-19 के दौरान मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने जो सक्रियता दिखाकर लोगों की जिंदगी बचाने में जुटे रहे. गरीब और असमर्थ लोगों को आयुष्मान योजना के तहत पूरा लाभ दिलाया और निजी अस्पतालों के खिलाफ कड़े कदम उठाने से भी नहीं चूके. मंडला से झाबुआ तक, कब और कहां शिवराजसिंह पहुंच जाएं, किसी को खबर नहीं होती है. लोगों से चर्चा करना, संवाद करना और उनकी जरूरतों को जानकर उनकी जरूरत के अनुरूप योजना को मूर्तरूप देने की जो उनकी कोशिश होती है, उन्हें एक अलग रूप में खड़ा करती है.
हालिया लाड़ली बहना स्कीम ने तो मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को एक अलग किस्म की ऊंचाई दी है. प्रत्येक महिला को प्रत्येक माह एक हजार रुपये दिए जाएंगे जिससे वे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सकें. पेंशन पाने वाली माताओं को अलग करने के बजाय इसमें जोडक़र उनका भी आशीष पा रहे हैं. उनके विरोधियों केे लिए लाडली बहना स्कीम पॉलिटिकल गिमिक हो सकता है लेकिन जो लाभ लेने की स्थिति में हैं, वे इसे अपने भाई शिवराजसिंह से मिलने वाली सुरक्षा मान रही हैं. अगले महीने जब बहनों के खाते में रकम जमा होने लगेगी, तब यह अब तक कि शिवराजसिंह सरकार की सबसे बड़ी लोकप्रिय योजना साबित होगी. शिवराजसिंह जब जनसभा में बड़े मजे में बोलते हैं कि ‘बहनों को जब एक हजार रुपया मिलेगा तो सास घी चुपड़ी रोटी खिलाएगी’. उनकी इस बात पर हरेक के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है.
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान कभी किसी चाय के टपरे पर जाकर खड़े हो जाते हैं तो कभी किसी के कांधे पर हाथ रख देते हैं तो वह भाव-विभोर हो जाता है. उनके ही क्षेत्र में कुछ मजदूरों ने शिवराजसिंह को पहचानने से इंकार कर दिया था. तब भी शिवराजसिंह चौहान इसे हंसी हंसी में लेते हुए रवाना हो गए-चलो, भाई यहां शिवराज को नहीं पहचानते हैं. यही मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की विनम्रता है. यही उनकी पूंजी है जो राजनीतिक फलक से बाहर है. कल्पना कीजिए, यहीं पर उनके स्थान पर कोई और राजनेता होता तो शायद इन मजदूरों पर कहर टूट पड़ता. सौम्य, मृदुभाषी और संयत भाषा के साथ विरोधियों का सम्मान करने वाले शिवराजसिंह चौहान अजेय हैं.
निकट भविष्य के चुनाव में जीत हासिल करने के लिए एक विनम्र और मिलनसार शिवराजसिंह चाहिए. मतदाता भाजपा को अपना वोट दे या ना दे लेकिन शिवराजसिंह के नाम पर वोट ना मिले, इस पर सहसा भरोसा नहीं किया जा सकता है. मध्यप्रदेश की आर्थिक हालात, भ्रष्टाचार और ऐसे जनमुद्दों पर राज्य सरकार को घेरा जा सकता है लेकिन स्पष्ट है कि विधानसभा चुनाव में किसी भी दल के लिए शिवराजसिंह के स्तर पर मुकाबला आसान नहीं है. यह मध्यप्रदेश का दिल है और राज्य की जनता के दिलों में शिवराजसिंह राज करते हैं, मध्यप्रदेश की सत्ता पर नहीं.
कर्नाटक में विजय के पहले हिमाचल में जीत और नेता राहुल गांधी की अथक मेहनत के बाद कांग्रेस का आत्मविश्वास लौटा है और एक मजबूत लोकतंत्र के लिए यह जरूरी भी है. किन्तु इस बात का भी खास खयाल रखना होगा कि मध्यप्रदेश हो, छत्तीसगढ़ हो या राजस्थान, सबकी आबो-हवा एक सी नहीं है. इसलिए जीत का सेहरा पहनने के लिए उत्सव नहीं, आत्ममंथन की जरूरत इस समय अधिक है. भाजपा को भी सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि छत्तीसगढ़ में साय और मध्यप्रदेश में दीपक जोशी का कांग्रेस में जाना चिंता में तो डालता है। कौन जीतेगा और कौन हारेगा, यह तो समय के गर्भ में है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
गुरुवार, 30 मार्च 2023
आह! इंदौर, वाह...इंदौरी
रविवार, 26 मार्च 2023
मन को मन से जोड़ती ‘मन की बात’
मनोज कुमार
रेडियो अपने जन्म से विश्वसनीय रहा है. सुभाष बाबू का रेडियो आजाद हिन्द हो या आज का ऑल इंडिया रेडियो. प्रसारण की तमाम मर्यादा का पालन करते हुए जो शुचिता और सौम्यता रेडियो प्रसारण में दिखता है, वह और कहीं नहीं. मौजूं सवाल यह है कि रेडियो प्रसारण सेवा का आप कैसे उपयोग करते हैं? इस मामले में महात्मा गांधी से लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो अभिनव प्रयोग किया है, वह अलहदा है. गांधीजी ने रेडियो को शक्तिशाली माध्यम कहकर संबोधित किया था और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे चरितार्थ कर दिखाया. संचार के विभिन्न माध्यमों के साथ मोदीजी का दोस्ताना व्यवहार रहा है लेकिन रेडियो प्रसारण के साथ वे मन से जुड़ते हैं.
मन से मन को जोडऩे का उपक्रम ‘मन की बात’ के सौ एपिसोड पूरे होने जा रहे हैं तो इसके प्रभाव को लेकर कुछ चर्चा किया जाना सामयिक है. कहने को सौ एपिसोड बहुत आसान सा लगता है लेकिन देखा जाए तो यह एक कठिन टास्क है जिसे मोदीजी जैसे व्यक्ति पूरा कर सकते थे और किया भी. ‘मन की बात’ शीर्षक को लेकर लोगों को लगने लगा कि वे अपने मन की बात कह रहे हैं लेकिन ‘मन की बात’ कार्यक्रम का कोई भी एपिसोड सुन लीजिये और विषयों की विविधता मिलेगी. एक तंत्र विकसित किया गया जो देश के अनजाने और दूर-दराज इलाकों में अपने काम से कामयाबी हासिल करने वालों से प्रधानमंत्री सीधे बात करते हैं. उनके कार्यों के बारे में जानते हैं और अपनी आपसी चर्चा के बीच उस कामयाबी के रास्ते को समझने की कोशिश करते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में देशभर से लाखों की तादाद में जुड़े श्रोताओं को ना केवल नई जानकारी मिलती है बल्कि उन्हें भी कुछ नया करने का हौसला मिलता है. इसे ही मैंने मन से मन को जोडऩे वाला कार्यक्रम ‘मन की बात’ कहा है.
शुरूआती दौर में रेडियो सामान्य दिनचर्या का एक हिस्सा बना हुआ रहता था, वहीं देश और दुनिया से जोड़े रखने का भी यही एक माध्यम था. मोबाइल का दौर आया और रेडियो बाजार से गायब हो गए. हालांकि संचार की इस दौड़ में बने रहने के लिए रेडियो बन गए अब मोबाइल रेडियो. लेकिन वर्ष 2014 के बाद मोबाइल रेडियो में बड़ा बदलाव देखा गया जब 3 अक्टूबर, 2014 को ऑल इंडिया रेडियो पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुरू किया कार्यक्रम ‘मन की बात’. कार्यक्रम की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब कुल 99 एपिसोड प्रसारित किए जा चुके हैं. इस कार्यक्रम की शुरुआत करने का मकसद भारत में एक बार फिर लोगों का ध्यान रेडियो की ओर लाना तो था ही साथ ही जनता से रेडियो के ज़रिए संवाद कर जनता के मुद्दों पर बातचीत करना भी था. इसका असर यह हुआ कि जहां जनता पहले तक खास मौकों पर ही रेडियो सुना करती थी वही नरेंद्र मोदी के मन की बात के शुरू होने के बाद तक भी जनता इस कार्यक्रम से जुडी हुई है.
‘मन की बात’ में मोदी जी अपनी मन की बात कम करते हैं और लोगों के मन की बात ज्यादा सुनते हैं. ‘मन की बात’ कार्यक्रम सुनते हुए मुझे एक छोटी सी कहानी का स्मरण हो आता है. यहां इस कहानी का उल्लेख करना समीचीन होगा. बात यूं है कि एक बंद ताला पड़ा हुआ था और उसके पास एक छोटी सी चाबी और एक भारी-भरकम हथौड़ा भी. बंद ताले को खोलने के लिए हथौड़े ने अपनी पूरी ताकत लगा दी और परास्त होकर वहीं बैठ गया. इतने में छोटी सी चाबी बंद ताले के दिल में प्रवेश किया और ताला खुल गया. भारी-भरकम हथौड़े के लिए यह रहस्य की बात थी. उसने चाबी से पूछा कि मैं इतना वजनदार होने के बाद भी ताला नहीं खोल पाया और तू इत्ती सी चाबी ताले को खोल दिया. यह कैसे हुआ? ताले की तरफ मुस्कराती हुई चाबी ने कहा कि किसी के दिल को खोलने के लिए उसके दिल में उतरना पड़ता है और वही मैंने किया. मोदी जी भी ‘मन की बात’ के जरिये चाबी की मानिंद लोगों के दिल में उतरकर उनके दिल तक पहुंच जाते हैं.
भारत जैसे महादेश में अनेक ऐसे लोग हैं जो गुमनामी का जीवन जी रहे हैं लेकिन उनका काम, उनकी सफलता की कोई चर्चा नहीं होती है. ऐसे में कोई कारीगर, कोई किसान, कोई महिला जब प्रधानमंत्री से बात करती है तो उसकी कामयाबी ना केवल सामने आती है बल्कि ये लोग और आगे बढऩे का हौसला पाते हैं. हमारे भारतीय समाज में परीक्षा प्रतिभा मूल्यांकन के स्थान पर भय का वातावरण निर्मित करता है और बच्चे फेल होने के डर से कई बार जान देने तक उतारू हो जाते हैं. इन बच्चों के भीतर साहस जगाने के लिए और परीक्षा से भयभीत ना होने का मंत्र मोदीजी देते हैं तो ज्यादतर बच्चों के भीतर का डर पूरी तरह भले ही खत्म ना हो लेकिन कम तो जरूर हो जाता है. परीक्षा देने जाने से पहले हम उस अदृश्य शक्ति से पास हो जाने की कामना करते हैं क्योंकि हमारी पीठ पर हाथ रखकर हमें हौसला देने वाला कोई नहीं होता है. समाज का कोई भी तबका इस बड़ी समस्या पर कभी कोई पहल करने की जरूरत नहीं समझा इसलिये परीक्षा का भूत हमेशा हावी रहा लेकिन ‘मन की बात’ के जरिये मोदीजी ने एक पालक की भूमिका का निर्वहन किया तो सारा का सारा मंजर ही बदल गया.
‘मन की बात’ के जरिये मोदीजी ने बड़ी ही खामोशी के साथ बाजार को बदल दिया. इसके लिए एक उदाहरण का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है. खादी हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान है लेकिन नए जमाने के साथ खादी का चलन कम से कम होता जा रहा था. ऐसे में मोदीजी ने ‘मन की बात’ के जरिये खादी अपनाने के लिए लोगों से आह्वान किया. यह यकिन करना मुश्किल होगा लेकिन सच है कि खादी की बिक्री में जो इजाफा हुआ, वह रिकार्ड है. अब यहां इस बात को दर्ज किया जाना चाहिए कि ‘मन की बात’ में मोदीजी के मन की बात है या भारत के एक सौ तीस करोड़ लोगों के मन की बात है.
‘मन की बात’ के जरिये ऑल इंडिया रेडियो का कायाकल्प हो गया. रेडियो के राजस्व में जितनी बढ़ोत्तरी ‘मन की बात’ कार्यक्रम के माध्यम से हुई, वह अब तक के रिकार्ड को ध्वस्त करने वाला है. पक्का-पक्का आंकड़ा देना मुनासिब नहीं है क्योंकि प्रत्येक माह होने वाले ‘मन की बात’ के जरिए रेडियो के राजस्व में बढ़ोत्तरी होती जा रही है. एक मोटा-मोटी आंकड़ें की बात करें तो मन की बात के प्रसारण शुरू होने के बाद से अब तक राजस्व में 33.16 करोड़ कमाए गए हैं जबकि प्रचार पर केवल 7.29 करोड़ खर्च किए गए थे। यह आंकड़ा 2023 के आरंभिक दिनों की है. रेडियो प्रसारण सेवा के क्षेत्र में प्रधानमंत्री द्वारा किये गए नवाचार से ना केवल रेडियो के दिन फिर गए बल्कि देश के दूर-दराज इलाकों में ‘मन की बात’ की गंूज सुनाई देनी लगी.
सोमवार, 20 मार्च 2023
पानी पानी रे...खारे पानी रे...
गिरमिटया महात्मा गांधी
आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...
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-अनामिका कोई यकीन ही नहीं कर सकता कि यह वही छत्तीसगढ़ है जहां के लोग कभी विकास के लिये तरसते थे। किसी को इस बात का यकिन दिलाना भी आस...
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समागम का नया अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का नवम्बर २०१० का अंक आदिवासी और मीड...
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मनोज कुमार कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरो...

