Samagam ka naya ank
मंगलवार, 25 जून 2024
रविवार, 11 फ़रवरी 2024
नागर समाज से समुदाय का रेडिय
13 फरवरी
विश्व रेडियो दिवस पर विशेष
मनोज कुमार
कभी नागर समाज के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक होने वाला रेडियो आज समुदाय के रेडियो के रूप में बज रहा है। समय के विकास के साथ संचार के माध्यमों में परिवर्तन आया है और उनके समक्ष विश्वसनीयता का सवाल खड़ा है तो रेडियो की विश्वसनीयता के साथ उसका प्रभाव भी समूचे समाज पर है। ऑल इंडिया रेडियो से आकाशवाणी का नाम धर लेने के बाद एफएम रेडियो और सामुदायिक रेडियो की दुनिया का अपरिमित विस्तार हुआ है। करीब ढाई सौ वर्षों से प्रिंट मीडिया का एकछत्र साम्राज्य था जिसे कोई पांच दशक पहले इलेक्ट्रानिक मीडिया के आगमन के साथ चुनौती मिली। इन माध्यमों के साथ रेडियो का संसार अपने आप में अकेला और अछूता था। अपने जन्म के साथ रेडियो प्रामाणिक एवं उपयोगी रहा है और नए जमाने में रेडियो की सामाजिक उपयोगिता बढ़ी है। रेडियो क्यों उपयोगी है और रेडियो की दुनिया किस तरह बढ़ती गई है, इसके बारे में विस्तार से चर्चा करना जरूरी होता है। महात्मा गांधी से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों तक पहुंचने के लिए संचार माध्यम में रेडियो को चुना। रेडियो अपने जन्म से विश्वसनीय रहा है। सुभाष बाबू का रेडियो आजाद हिन्द हो या आज का ऑल इंडिया रेडियो। प्रसारण की तमाम मर्यादा का पालन करते हुए जो शुचिता और सौम्यता रेडियो प्रसारण में दिखता है, वह और कहीं नहीं। मौजूं सवाल यह है कि रेडियो प्रसारण सेवा का आप कैसे उपयोग करते हैं? इस मामले में महात्मा गांधी से लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो अभिनव प्रयोग किया है, वह अलहदा है। गांधीजी ने रेडियो को शक्तिशाली माध्यम कहकर संबोधित किया था और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे चरितार्थ कर दिखाया। संचार के विभिन्न माध्यमों के साथ मोदीजी का दोस्ताना व्यवहार रहा है लेकिन रेडियो प्रसारण के साथ वे मन से जुड़ते हैं।
शुरूआती दौर में रेडियो सामान्य दिनचर्या का एक हिस्सा बना हुआ रहता था, वहीं देश और दुनिया से जोड़े रखने का भी यही एक माध्यम था। मोबाइल का दौर आया और रेडियो बाजार से गायब हो गए। हालांकि संचार की इस दौड़ में बने रहने के लिए रेडियो बन गए अब मोबाइल रेडियो। लेकिन वर्ष 2014 के बाद मोबाइल रेडियो में बड़ा बदलाव देखा गया जब 3 अक्टूबर, 2014 को ऑल इंडिया रेडियो पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुरू किया कार्यक्रम ‘मन की बात’। इस कार्यक्रम की शुरुआत करने का मकसद भारत में एक बार फिर लोगों का ध्यान रेडियो की ओर लाना तो था ही साथ ही जनता से रेडियो के जरिए संवाद कर जनता के मुद्दों पर बातचीत करना भी था। इसका असर यह हुआ कि जहां जनता पहले तक खास मौकों पर ही रेडियो सुना करती थी वही नरेंद्र मोदी के मन की बात के शुरू होने के बाद तक भी जनता इस कार्यक्रम से जुडी हुई है।
यह सवाल स्वाभाविक है कि संचार के विभिन्न साधनों में रेडियो की उपयोगिता क्यों बनी हुई है? वजह साफ है कि रेडियो का प्रभाव व्यापक है लेकिन रेडियो के संचालन के लिए सीमित संसाधन चाहिए। रेडियो के लिए सबसे सुविधाजनक पक्ष यह है कि रेडियो सुनने के लिए किसी श्रोता का साक्षर होना जरूरी नहीं है लेकिन रेडियो सुनकर एक श्रोता साक्षर हो सकता है। दूसरा यह कि रेडियो का एक विकल्प भी होता है जिसे हम ट्रांजिस्टर कहते हैं। यह एक तरह का मोबाइल यंत्र होता है और महज दो-चार बैटरी डाल कर इसे संचालित किया जा सकता है। यह रखने में भी सुविधाजनक होता है अत: किसान खेत में, मजदूर अपने काम की जगह पर और रेडियो के शौकीन रास्ते में सुन सकते हैं। रेडियो आम आदमी के लिए इसलिए भी सुविधाजनक है कि इंटरनेट, बिजली और बड़़े बजट इस पर खर्च करना नहीं होता है। बहुत छोटे बजट में रेडियो खरीदा जा सकता है और बिना तामझाम के इसे संचालित किया जा सकता है।
रेडियो और आकाशवाणी एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। रेडियो का उल्लेख होते ही हमें आकाशवाणी का स्मरण हो आता है। लेकिन व्यवहारिक तौर पर रेडियो की दुनिया भी बदल चुकी है। अब रेडियो के तीन प्रकार हैं जिसमें प्रथम सरकारी रेडियो जिसे हम आकाशवाणी कहते हैं और दूसरा एफएम रेडियो एवं तीसरा सामुदायिक रेडियो कहलाता है। रेडियो एक ही है लेकिन इसकी उपयोगिता अलग-अलग है। रेडियो अर्थात आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले कार्यक्रम प्रामाणिक होते हैं क्योंकि इस पर सीधा-सीधा भारत सरकार का नियंत्रण होता है।
भारत सरकार के नियंत्रण में ही एफएम रेडियो संचालन की अनुमति मिलती है लेकिन इस पर कई बंदिशें हैं। मसलन, अभी तक एफएम रेडियो पर समाचार प्रसारण की अनुमति नहीं है और ना ही ऐसे किसी कार्यक्रम प्रसारण की अनुमति है जो समाज को प्रभावित करते हों और कदाचित शांति भंग होने का खतरा बना हो। वर्तमान समय में एफएम रेडियो का उपयोग विशेषकर मनोरंजक कार्यक्रमों तक सीमित है। हालांकि अनेक प्रायोजित कार्यक्रमों के माध्यम से सूचना देने का कार्य एफएम रेडियो करता है। एफ एम रेडियो का पूरा मॉडल कामर्शियल है और इसकी आय का जरिया भी विभिन्न विज्ञापनों के माध्यम से होता है। एफएम के कार्यक्रम प्रस्तोता को आरजे अर्थात रेडियो जॉकी या एमजे अर्थात म्यूजिक जॉकी संबोधित किया जाता है।
वर्ष 2006 से भारत में सुप्रीमकोर्ट के अहम फैसले के पश्चात सामुदायिक रेडियो का प्रसारण आरंभ हुआ। सामुदायिक रेडियो जिसे हम अंग्रेजी में कम्युनिटी रेडियो भी कहते हैं का अर्थ है कि समुदाय द्वारा समुदाय के लिए समुदाय पर कार्यक्रम का निर्माण करना। भारत जैसे महादेश के लिए कम्युनिटी रेडियो वरदान है। तमाम विकास की संरचनाओं के बाद भी देश के अनेक अंचल ऐसे हैं जहां संचार सुविधाओं का अभाव है। उन्हें समय पर अपने हित की सूचना नहीं मिल पाता है। कई बार तो आपदा के समय वे अकाल मुसीबत में फंस जाते हैं क्योंकि संचार सुविधा के अभाव में जानकारी नहीं मिल पाने के कारण वे स्वयं को सुरक्षित नहीं कर पाते हैं। देश का पहला कम्युनिटी रेडियो अन्ना रेडियो को कहा जाता है। कम्युनिटी रेडियो की उपयोगिता सघन बस्ती से अलग दूर-दराज इलाकों के लिए ज्यादा उपयोगी होता है। खासतौर पर समुद्र के किनारे रहने वाले समुदाय या जंगलों में जीवन बसर करने वाले समुदाय। भारत सरकार की नीति में कम्युनिटी रेडियो की अनुमति दूर-दराज के इलाकों में देना रही है। शहरी और अद्र्धशहरी इलाकों में कम्युनिटी रेडियो संचालन की अनुमति नहीं दी जाती है।
देश में सर्वाधिक कम्युनिटी रेडियो स्टेशन अगर किसी राज्य के पास है तो वह मध्यप्रदेश है। राज्य शासन के जनजातीय कार्य विभाग के उपक्रम वन्या ने सुदूर ग्रामीण अंचलों में आठ कम्युनिटी रेडियो की स्थापना की। इसके अतिरिक्त स्वाधीनता संग्राम पर केन्द्रित एकमात्र कम्युनिटी रेडियो ‘रेडियो आजाद हिन्द’ की स्थापना की गई। इसके उपरांत एशिया के प्रथम पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के बिशनखेड़ी स्थित परिसर में ‘रेडियो कर्मवीर’ की स्थापना की गई। यह कैम्पस रेडियो नहींं होकर कम्युनिटी रेडियो का स्वरूप है। इस तरह मध्यप्रदेश के पास दस कम्युनिटी रेडियो है। इन कम्युनिटी रेडियो स्टेशनों में कार्य करते हुए मुझे जमीनी अनुभव हासिल हुआ।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम को सामुदायिक रेडियो मॉडल से जोडक़र देखता हूं। भारत जैसे महादेश में अनेक ऐसे लोग हैं जो गुमनामी का जीवन जी रहे हैं लेकिन उनका काम, उनकी सफलता की कोई चर्चा नहीं होती है। ऐसे में कोई कारीगर, कोई किसान, कोई महिला जब प्रधानमंत्री से बात करती है तो उसकी कामयाबी ना केवल सामने आती है बल्कि ये लोग और आगे बढऩे का हौसला पाते हैं। हमारे भारतीय समाज में परीक्षा प्रतिभा मूल्यांकन के स्थान पर भय का वातावरण निर्मित करता है और बच्चे फेल होने के डर से कई बार जान देने तक उतारू हो जाते हैं। इन बच्चों के भीतर साहस जगाने के लिए और परीक्षा से भयभीत ना होने का मंत्र मोदीजी देते हैं तो ज्यादतर बच्चों के भीतर का डर पूरी तरह भले ही खत्म ना हो लेकिन कम तो जरूर हो जाता है। परीक्षा देने जाने से पहले हम उस अदृश्य शक्ति से पास हो जाने की कामना करते हैं क्योंकि हमारी पीठ पर हाथ रखकर हमें हौसला देने वाला कोई नहीं होता है। समाज का कोई भी तबका इस बड़ी समस्या पर कभी कोई पहल करने की जरूरत नहीं समझा इसलिये परीक्षा का भूत हमेशा हावी रहा लेकिन मोदीजी ने एक पालक की भूमिका का निर्वहन किया तो सारा का सारा मंजर ही बदल गया। ‘मन की बात’ के जरिए मोदीजी ने बड़ी ही खामोशी के साथ बाजार को बदल दिया। कम्युनिटी रेडियो का वैसे तो कोई रेवेन्यू मॉडल नहीं है लेकिन सूचना प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार प्रत्येक एक घंटे के प्रसारण में पांच मिनिट विज्ञापन प्रसारण की अनुमति देता है। इसके लिए सरकार द्वारा चार रुपये प्रति सेकंड की दर तय की गई है। बंधन यही है कि विज्ञापन सामाजिक चेतना जगाने वाला हो ना कि व्यवसायिक। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व समन्वयक रेडियो वन्या, भोपाल)
गुरुवार, 28 सितंबर 2023
नागरिक बोध और प्रशासनिक दक्षता से सिरमौर स्वच्छ मध्यप्रदेश
सोमवार, 28 अगस्त 2023
'मन में देश का दिल मध्यप्रदेश
मनोज कुमार
देश का दिल है मध्यप्रदेश और मध्यप्रदेश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दिल में भी बसता है. प्रधानमंत्री अपने लोकप्रिय कार्यक्रम 'मन की बातÓ में निरंतर मध्यप्रदेश की उपलब्धियों का उल्लेख करते रहे हैं. वे अपने संबोधन में मध्यप्रदेश की उपलब्धियों और विशेषताओं से अन्य राज्यों को अवगत कराते रहे हैं. वे मानते हैं कि मध्यप्रदेश देश का ह्दयप्रदेश ही नहीं है बल्कि वह देश के लिए एक आदर्श प्रदेश है. एक रोल मॉडल राज्य के रूप में मध्यप्रदेश ने अपनी पहचान स्थापित की है. यह जानना रोचक होगा कि इस विशाल देश के कोने-कोने से हुनरमंद लोगों की तलाश कर लोगों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं. मध्यप्रदेश के संदर्भ में यह तो और भी रोचक है.
यूं तो मन की बात कार्यक्रम के करीब 105 एपिसोड होने जा रहे हैं. इनमें से कुछ ऐसे एपिसोड हैं जिसमें मध्यप्रदेश का विशेष रूप से उल्लेख हुआ है. मन की बात का 103वां एपिसोड मध्यप्रदेश के लिए खास था। पीएम मोदी ने इस कार्यक्रम में मध्यप्रदेश के शहडोल का उल्लेख करते हुए कहा कि 'कुछ समय पहले, मैं, एम.पी. के शहडोल गया था। वहां मेरी मुलाकात पकरिया गांव के आदिवासी भाई-बहनों से हुई थी। वहीं पर मेरी उनसे प्रकृति और पानी को बचाने के लिए भी चर्चा हुई थी। अभी मुझे पता चला है कि पकरिया गांव के आदिवासी भाई-बहनों ने इसे लेकर काम भी शुरू कर दिया है। यहां, प्रशासन की मदद से, लोगों ने, करीब सौ कुओं को वॉटर रिजार्च सिस्टम में बदल दिया है। बारिश का पानी, अब इन कुओं में जाता है, और कुओं से ये पानी, जमीन के अंदर चला जाता है। इससे इलाके में भू-जल स्तर भी धीरे-धीरे सुधरेगा। अब सभी गांव वालों ने पूरे क्षेत्र के करीब-करीब 800 कुएं को रिचार्ज के लिए उपयोग में लाने का लक्ष्य बनाया है।Ó उन्होंने शहडोल के ही विचारपुर गांव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इसे मिनी ब्राजील कहा जाता है। पीएम मोदी ने कहा कि 'ये गांव आज उभरते सितारों का गढ़ बन गया है। यहां मेरी मुलाकात इन खिलाडिय़ों से हुई। विचारपुर गांव के मिनी ब्राजील बनने की यात्रा 2 दशक पहले शुरू हुई। यह गांव कभी अवैध शराब के लिए बदनाम था। इसका सबसे बड़ा नुकसान यहां के युवाओं को हो रहा था। एक पूर्व नेशनल प्लेयर और कोच रईस एहमद ने इन युवाओं की प्रतिभा को पहचाना। रईस जी ने युवाओं को फुटबॉल सिखाना शुरू किया। कुछ साल के भीतर ही यहां फुटबॉल इतनी प्रसिद्ध हो गई कि विचारपुर गांव की पहचान ही इससे होने लगी। अब यहां फुटबॉल क्रांति नाम से एक प्रोग्राम भी चल रहा है।Ó
मन की बात में जिन दो प्रसंग का मोदीजी ने उल्लेख किया है, वह मध्यप्रदेश में हो रहे नवाचार की झलकी तो दिखाते ही हंै बल्कि दूसरों को प्रेरणा भी देते हैं. उज्जैन में अलग-अलग शैलियों में बन रही पुराणों पर आधारित पेंटिंग के बारे में बताया। अमेरिका द्वारा भारत को लौटाई गई मूर्तियों में एक मूर्ति का नाता मध्य प्रदेश से है यह भी प्रधानमंत्री ने बताया। वहीं फिर एक बार शहडोल जिले के विचारपुर गांव जिसे मिनी ब्राजील के नाम से जाना जाता है उसका जिक्र करते हुए बताया कि कैसे यह गांव नशे से मुक्त होकर फुटबाल से प्रेम करने लगा।
मन की बात में उज्जैन में बन अलग-अलग शैली के चित्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि एक प्रयास इन दिनों उज्जैन में चल रहा है। यहां देशभर के 18 चित्रकार, पुराणों पर आधारित आकर्षक चित्रकथाएं बना रहे हैं। ये चित्र, बूंदी शैली, नाथद्वारा शैली, पहाड़ी शैली और अपभ्रंश शैली जैसी कई विशिष्ट शैलियों में बनेंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि, इन्हें उज्जैन के त्रिवेणी संग्रहालय में प्रदर्शित किया जाएगा, यानि कुछ समय बाद, जब आप उज्जैन जाएंगे, तो, महाकाल महालोक के साथ-साथ एक और दिव्य स्थान के आप दर्शन कर सकेंगे। अपना अनुभव शेयर करते हुए उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले इंटरनेट मीडिया पर एक अद्भुत क्रेज दिखा। अमेरिका ने हमें 100 से ज्यादा दुर्लभ और प्राचीन कलाकृतियां वापस लौटाई हैं। इनमें से कुछ तो ऐसी हैं, जो आपको, आश्चर्य से भर देंगी। आप इन्हें देखेंगे, तो देखते ही रह जाएंगे। इनमें 11वीं शताब्दी का एक खुबसूरत सेंड स्टोन स्कल्पचर भी आपको देखने को मिलेगा। ये नृत्य करती हुई एक 'अप्सराÓ की कलाकृति है, जिसका नाता मध्यप्रदेश से है। युवाओं में अपनी विरासत के प्रति गर्व का भाव दिखा। भारत लौटीं ये कलाकृतियां 2500 साल से लेकर 250 साल तक पुरानी हैं।
मन की बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश के तीन ऐसे उदाहरण बताए जिन्होंनेे देश में अनोखा काम किया है. इनमें इंदौर की ह्यूमन चेन, मंडला में अमृत सरोवर और दतिया के मेरा बच्चा अभियान है. प्रधानमंत्री मोदी ने दतिया जिले के मेरा बच्चा अभियान की सराहना करते हुए कहा कि आप कल्पना कर सकते हैं कि कुपोषण दूर करने में गीत-संगीत और भजन का भी इस्तेमाल हो सकता है? मध्यप्रदेश के दतिया जिले में मेरा बच्चा अभियान में इसका सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया। बीते 15 अगस्त को इंदौर में 5000 से अधिक स्कूली छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य लोग सबसे बड़ी मानव श्रृंखला के जरिए भारत का भौगोलिक नक्शा बनाने का नया विश्व रिकॉर्ड बनाया था. पीएम नरेंद्र मोदी ने मण्डला के मोचा ग्राम पंचायत में बने अमृत सरोवर को अनूठा बताया.
सामाजिक जागरूकता के लिए उम्र और साधन सम्पन्न होने की जरूरत नहीं. केवल मन में इच्छा भी लोगों को जागरूक कर सकती है. कटनी जिले की नन्हीं मीनाक्षी और बश्वर ने ऐसा कर दिखाया. मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने आज मन की बात में प्रदेश की प्रतिभाओं का उल्लेख कर उनका मनोबल बढ़ाने का कार्य किया है। मन की बात में प्रधानमंत्री श्री मोदी ने बच्चों के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि 'हम सब जानते हैं कि बच्चों को गुल्लक से कितना प्यार होता है। लेकिन मध्यप्रदेश के कटनी जिले की 13 वर्ष की मीनाक्षी और पश्चिमी बंगाल के डायमंड हार्बर के 11 वर्ष के बश्वर मुखर्जी कुछ अलग हैं। इन दोनों बच्चों ने अपनी गुल्लक के पैसे टी.बी. मुक्त भारत के लिए लगा दिए। उनका यह उदाहरण भावुकता से भरे होने के साथ प्रेरक करने वाला भी है। कम आयु में बड़ी सोच रखने वाले इन सभी बच्चों की मैं प्रशंसा करता हूँ।Ó कटनी जिले की हमारी बेटी मीनाक्षी सहित अनेक बच्चों के टी.बी.मुक्त भारत के लिए दिये गये योगदान की प्रशंसा कर प्रधानमंत्री ने अन्य बच्चों का मनोबल बढ़ाया है। इ
मन की बात में ग्वालियर निवासी कु. निधि पवैया जिन्होंने उत्तर प्रदेश में हाल ही में सम्पन्न खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम में शॉट-पुट प्रतिस्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता था, का भी उल्लेख किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय की छात्रा कु. निधि पवैया ने घुटने में गंभीर चोट के बावजूद शॉट-पुट में गोल्ड मेडल जीतने में कामयाबी हासिल की। कु. निधि ग्वालियर जिले के चिनौर गाँव की निवासी है और उनके पिता छोटे सिंह पवैया किसान हैं.
प्रधानमंत्री मन की बात में मध्यप्रदेश के जिन लोगों का उल्लेख कर चुके हैं, उनमें मुख्य रूप से ममता शर्मा, आसाराम चौधरी, मास्टर तुषार, उषा दुबे, रजनीश, बबीता राजपूत, अर्जुन सिंह , रोहित सिसोदिया , फील्ड डायरेक्टर पेंच टाइगर रिजर्व, सुभाष सिसोदिया अतुल पाटीदार, अनुराग असाटी और पद्म पुरस्कार विजेता डॉक्टर जनक पलटा, शांति परमार और भूरी बाई हैं. इनके अलावा भी जिन लोगों का जिक्र मन की बात में हुआ उनमें ग्राम पंचायत के कमलेश और कविता चंदवानी, भावना, राम लोटन कुशवाह ,किशोरी लाल धुर्वे , मीना राहंगडाले, भज्जू श्याम , शिवा चौबे, आशीष पारे, स्वाति श्रीवास्तव, अवनि चतुर्वेदी समेत कई लोग शामिल हैं. इन अद्भुत लोगों का मन की बात के सौ एपिसोड पूरे होने पर राजभवन भोपाल में सम्मान किया गया. यह सारे प्रसंग बताते हैं कि मध्यप्रदेश में प्रतिभावान, सामाजिक सरोकार और पर-हितैषी लोगों की संख्या बेशुमार हैं. कला, खेल और रोजगार के अवसर उत्पन्न करने में इनका कोई सानी नहीं है. इनकी प्रतिभा, इनका समर्पण दबा-छिपा रहता लेकिन मन की बात में उल्लेख होते ही ये लोग पूरे देश और दुनिया के लिए बेमिसाल उदाहरण बन गए हैं. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
रविवार, 2 जुलाई 2023
‘सिकल सेल’ के खिलाफ शंखनाद
बुधवार, 21 जून 2023
टेक्नो फ्रेंडली संवाद से स्वच्छत
मनोज कुमार
शुक्रवार, 2 जून 2023
वो अढाई साल और भोपाल का गौरव दिवस
मनोज कुमार
15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश आजाद हवा में सांस ले रहा था तब भोपाल की धडक़न थरथरा रही थी. भोपाल के वाशिंदों को एक-दो दिन नहीं, पूरे अढाई साल आजाद हवा में सांस लेने के लिए इंतजार करना पड़ा था. आखिर एक लम्बे इंतजार के बाद हौले से आजादी ने भोपाल के दरवाजे पर दस्तक दी. ये अढाई साल भोपालियों के लिए संघर्ष के उन दिनों से ज्यादा भारी थे जो उन्होंने फिरंगियों से लिये थे. इस बार लड़ाई घर में थी. वह तो भला हो उस लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का जिन्होंने उन नापाक मंसूबों को धराशायी कर दिया. वे ऐसा नहीं करते तो आज भोपाल, भोपाल नजर नहीं आता और गौरव दिवस तो छोडिय़े, मेरा भोपाल कहने लायक भी नहीं रहते . आज भोपाल का गौरव दिवस मनाते समय उस घाव का दर्द महसूस करना इसलिए जरूरी हो जाता है कि हमारी नयी पीढ़ी जान सके कि गौरव ऐसे ही नहीं पाया जाता है. 1947 में ब्रिटिश हुकूमत से देश को भले ही आजादी मिली हो, लेकिन, भोपाल के लोगों ढाई साल तक गुलाम ही महसूस करते रहे। 15 अगस्त 1947 के बाद भी यहां नबावों का शासन था। इसके लिए ढाई साल तक संघर्ष हुआ। खास बात यह भी है कि तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की सख्ती के बाद 1 जून 1949 को भोपाल रियासत का विलय भारत में हो गया।
15 अगस्त, 1947 को तब भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्लाह थे। अंग्रेजों के खास नवाब हमीदुल्लाह भारत में विलय के पक्ष में नहीं थे क्योंकि वे भोपाल पर शासन करना चाहते थे। जब भारत को आजाद करने का फैसला किया गया उस समय यह निर्णय भी लिया गया कि पूरे देश में से राजकीय शासन हटा लिया जाएगा। मौजूदा तथ्य बताते हैं कि जब पाकिस्तान बनाने पर निर्णय हुआ और जिन्ना ने हिन्दुस्तान के सभी मुस्लिम शासकों को भी पाकिस्तान का हिस्सा बनाने का प्रस्ताव दिया। जिन्ना के करीबी होने के कारण भोपाल नवाब को पाकिस्तान में सेक्र्रेटरी जनरल का पद सौंपने की बात की गई। ऐसे में हमीदुल्लाह ने अपनी बेटी आबिदा को भोपाल का शासन बनाकर रियासत संभालने को कहा, लेकिन इंकार कर दिया गया। अंतत: हमीदुल्लाह भोपाल में ही रहे और भोपाल को अपने अधीन बनाए रखने के लिए भारत सरकार के खिलाफ खड़े हो गए। देश आजाद हो चुका था, हर मोर्चों पर भारतीय ध्वज लहराया जाता था लेकिन, भोपाल में इसकी आजादी किसी को नहीं थी। दो साल तक ऐसी स्थिति रही। तब भोपाल के नवाब भारत सरकार के किसी कार्यक्रम में शिरकत नहीं करते थे और आजादी के जश्न में भी नहीं जाते थे।
सरदार पटेल जैसे कडक़ मिजाज वाले होम मिनिस्टर नहीं होते तब शायद संभव था कि भोपाल पाकिस्तान का हिस्सा बन चुका होता. इधर मार्च 1948 में भोपाल नवाब हमीदुल्लाह ने रियासत को स्वतंत्र रहने की घोषणा कर दी। मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का एक मंत्रिमंडल घोषित कर दिया। प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय बनाए गए थे। इसी दौर में भोपाल रियासत में विलीनीकरण के लिए विद्रोह शुरू हो चुका था। भोपाल में चल रहे बवाल पर आजाद भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सख्त रवैया अपना लिया। पटेल ने नवाब के पास संदेश भेजा कि भोपाल स्वतंत्र नहीं रह सकता है। भोपाल को मध्यभारत का हिस्सा बनना ही होगा। 29 जनवरी 1949 को नवाब ने मंत्रिमंडल को बर्खास्त करते हुए सत्ता के सभी अधिकार अपने हाथ में ले लिए। इसके बाद भोपाल के अंदर ही विलीनीकरण के लिए विरोध-प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया। तीन माह तक जमकर आंदोलन हुआ।
होम मिनिस्ट पटेल के कड़े रूख के आगे नवाब हमीदुल्ला को अपनी जिद छोडक़र 30 अप्रैल 1949 को विलीनीकरण के पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद भोपाल रियासत 1 जून 1949 को भारत का हिस्सा बन गई। केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त चीफ कमिश्नर एनबी बैनर्जी ने भोपाल का कार्यभार संभाला और नवाब को 11 लाख सालाना का प्रिवीपर्स तय कर सत्ता के सभी अधिकार उनसे ले लिए। उल्लेखनीय है कि भारत सन् 1947 को स्वाधीन हो गया था किन्तु मध्यप्रदेश के 2 जिले रायसेन एवं सीहोर भोपाल नवाब हमीदुल्ला के गुलाम थे। इसी गुलामी को समाप्त करने हेतु तत्कालीन रियासत भोपाल के नागरिकों ने जो आंदोलन चलाया था उसे इतिहास में भोपाल विलीनीकरण आंदोलन के नाम से जाना जाता है।
भोपाल विलीनीकरण आंदोलन भी इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. हमीदुल्लाह ने भारत सरकार के साथ बातचीत करते हुए भोपाल को अलग स्वतंत्र राज्य घोषित करने पैरवी की थी. असल में, भोपाल एक मुस्लिम नवाबी स्टेट था लेकिन वहां आबादी हिंदू बहुल थी. नवाब के अलग रहने की इच्छा बने रहने की खबर के बाद दिसंबर 1948 में भोपाल में जनआंदोलन शुरू हुआ, जब नवाब हज के लिए गए हुए थे. शंकरदयाल शर्मा, भाई रतन कुमार गुप्ता जैसे नेताओं के नेतृत्व में भोपाल के भारत में विलय के लिए ‘विलीनीकरण आंदोलन’ शुरू हुआ. आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा तो नवाबी व्यवस्था ने इसे कुचलने की कोशिश भी की. कुछ आंदोलनकारी शहीद हुए तो शर्मा जैसे कुछ नेताओं को कई महीनों के लिए जेल में रहना पड़ा. आंदोलन जनक्रांति का रूप धारण कर उग्र हो गया। नबाबी कार्यालयों पर तिरंगा फहराना एवं वंदे मातरम् गान पर गिरफ्तारी, लाठी चार्ज किया जाता था।
भोपाल विलीनीकरण आंदोलन 14 जनवरी 1949 को मकर संक्रांति मेले में क्षेत्र के नवयुवकों का उत्साह चरम पर था। नर्मदा किनारे बोरास घाट पर मेला भरा हुआ था कि बीच मेले में भोपाल नवाव के खिलाफ विलीनीकरण आंदोलन के नवयुवकों द्वारा झंडा वंदन एवं सभा का आयोजन किया गया। झंडा वंदन होने के बाद स्व. बैजनाथ गुप्ता बिजली बाबा ने झंडा वंदन गीत गाया। जाफर अली ने सभास्थल पहुंचकर झंडा उतारने एवं सभा बंद करने चेतावनी दी। इस चेतावनी से बेपरवाह 16 साल के छोटेलाल आगे आए और बोला गोली का क्या डर बताता है? तभी थानेदार ने गोली चलाने का आदेश दे दिया। इस गोली से छोटेलाल शहीद हो गए। सुल्तानगंज निवासी 25 वर्षीय वीर धनसिंह राजपूत ने थाम लिया, किन्तु अगली गोली धनसिंह के सीने में समा गई। तीसरे शहीद हुए 30 वर्षीय मंगल सिंह, 3 नवयुवकों के शहीद होने के बाबजूद झंडे नीचे नहीं गिरे। चौथे नवयुवक ग्राम भुआरा निवासी विशाल सिंह ने थाम लिया परन्तु गोली चलना जारी था। विशाल सिंह के सीने में 2 गोलियां लगी परन्तु उसने भी झंडा नहीं छोड़ा। पुलिस कू्ररता पर उतर आई संगीन उसके पेट में उमेठ दी गई किन्तु विशाल सिंह ने झंडा झुकने नहीं दिया. झंडे की शान को कायम रखते हुए विशाल नर्मदा के जल तक ले गए और गड़ा दिया और हर नर्मदे कह कर अंतिम सांस ली। भोपाल की आजादी में जिन नायकों ने अपना सर्वस्व स्वाहा कर दिया प्रो. अक्षय कुमार जैन, रामचरण राय, शंकरदयाल शर्मा, उद्धवदास मेहता, रतन दास गुप्ता, प्रेमनारायण श्रीवास्तव, बाल कृष्ण गुप्ता, ठाकुर लाल सिंह, शांति देवी, मोहिनी देवी, मथुरा बाबू आदि शामिल थे। दमन की कार्यवाही के बाद भी विलीनीकरण आंदोलन तेज होता गया। उस दौर में 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता सेनानियों ने जुमेराती उप डाकघर पर तिरंगा फहराया था।
भोपाल गौरव दिवस अपने होने को सार्थक कर रहा है. यह बताने का माकूल वक्त है कि आजादी के परवानों ने कैसी-कैसी आहूति दी है तब जाकर हम आजाद हैं. अंग्रेजों की कू्ररता के सामने सिर ना झुकाने वाले नायकों ने कू्रर और बेरहम नवाब को भी झुकने के लिए मजबूर कर दिया. ऐसा है मेरा भोपाल और हम हैं भोपाली.
गिरमिटया महात्मा गांधी
आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...
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-अनामिका कोई यकीन ही नहीं कर सकता कि यह वही छत्तीसगढ़ है जहां के लोग कभी विकास के लिये तरसते थे। किसी को इस बात का यकिन दिलाना भी आस...
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मनोज कुमार कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरो...
