रविवार, 25 जुलाई 2010
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शुक्रवार, 23 जुलाई 2010
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गुरुवार, 24 जून 2010
बुधवार, 16 जून 2010
gas trasadi
रविवार, 13 जून 2010
अपनी बात
रिश्तांे को ढोने से तो अच्छा ही होगा...
तलाक शब्द किसी भी भारतीय स्त्री की मन और उसकी अस्मिता को तार तार कर देता है। एक भारतीय स्त्री चाहे कितनी भी तकलीफ में क्यों न हो, वह आखिरी सूरत तक तलाक से दूर रहना चाहती है। वह अपना मान और प्रतिष्ठा एक परिवार में ही देखती है और इसके बाद उसकी चिंता के केन्द्रबिन्दु में उसके बच्चे होते हैं। वह मन से भले ही तलाक लेने की ख्वाहिश रखती हो लेकिन उसे व्यवहार रूप् में तब्दील नहीं कर पाती है। पति जितना भी निकम्मा और नालायक हो लेकिन स्त्री के लिये बच्चे उसकी पूंजी होते हैं। एक स्त्री जानती है कि तलाक के बाद यह निर्मम पुरूष किसी और स्त्री को अपने भोग के लिये ले आयेगा। आने वाली दूसरी स्त्री मन से कम, मतलब से ज्यादा आती है और उसके लिये किसी और के बच्चे को पालने की न तो कोई मंशा होती है और न लगाव। यहां तक कि जिसके साथ और जिसके लिये वह आयी है, उससे भी उसका संबंध केवल देह तक होता है और बाकि समय वह उन सुविधाओं का अधिकाधिक लाभ उठाना चाहती है जिससे अब तक वह वंचित रही है। कहने का अर्थ यह कि अक्सर दूसरी शादी भावना कम, मजबूरी ज्यादा होती है और यह मजबूरी एकाएक भौतिक लाभ प्राप्ति की ओर ले जाती है। इन स्थितियांे से बचने के लिये कोई भी भारतीय स्त्री तलाक के लिये राजी नहीं होती है। स्त्रियों की दशा पर एक लम्बे समय तक अध्ययन करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि पति की ज्यादती की शिकार केवल हाउस वाइफ ही नहीं होती है बल्कि उनकी स्थिति भी दयनीय होती है जो कामकाजी होती हैं। यहां पर आकर तलाक के लिये हालात बदल जाते हैं। कामकाजी स्त्री आर्थिक रूप से मजबूत होने के कारण तलाक की पहल कर पाती है जबकि घरेलू स्त्री आर्थिक असुरक्षा, पीहर की चिंता और कहीं उसकी छोटी बहनें हों तो उसके ब्याह की चिंता में वह रोज डूबती-मरती रहती है। स्थिति जब काबू से बाहर हो जाये तब उसे इस स्थिति पर पहुंचना पड़ता है जिसे तलाक कहते वर्तमान में स्त्री का चेहरा बदल रहा है। वह अब स्वतंत्र व स्वाधीन जीवन जीना चाहती है और इसके लिये उसे तलाक की जरूरत होती है।
तलाक को लेकर भारतीय मन अभी भी संकुचित दृष्टि रखता है। काननू में भी अनेक किस्म की दिक्कतें हैं और इसके चलते तलाक पाना आसान नहीं होता है। वास्तव में अभी जो कारण बताये गये हैं, वे तलाक की बुनियाद के पहले कारण हैं जैसा कि पत्नी-पति का आपस में नहीं निभना। सहज रूप् से दोनों को अलग होने में अनेक किस्म की दिक्कतें हैं और इन दिक्कतों से उबरने का सहज उपाय है एक दूसरे पर लांछन लगाना। कई बार इसकी हदें पार हो जाती हैं। समय के साथ अब तलाक लेने के इच्छुक दम्पत्तियों की संख्या में वृद्वि होने लगी है और जरूरी है कि तलाक की प्रक्रिया का सरलीकरण किया जाए। वास्तव में यह मानवाधिकार का मामला माना जाना चाहिए। हालांकि भारत इस मामले में सकरात्मक दृष्टिकोण रखता है और आखिरी तक कोशिश करता है कि दोनों के मन बदल जाएं और वे एक हो कर रहें लेकिन जब ऐसा संभव नहीं होता है तब तलाक ही एकमात्र रास्ता बच जाता है। यूं भी रिश्तों को ढोने और घुट घुट कर मरने के बजाय स्वतंत्र जीवन जीने का हक दिया जाना ही स्त्री के लिये श्रेयस्कर होगा।
सोमवार, 7 जून 2010
भोपाल
अपनी हरियाली और झील के मशहूर भोपाल ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन इस पर्यावरण प्रेमी शहर को कोई जहरीली गैस निगल जाएगी लेकिन सच तो यही था। हुआ भी यही और यह होना कल की बात कर तरह लगती है जबकि कयामत के पच्चीस बरस गुजर चुके हैं। इन बरसों में कम से कम दो पीढ़ी जवान हो चुकी है। गंगा नदी में जाने कितना पानी बह चुका है। पच्चीस बरस में दुनिया में कितने परिवर्तन आ चुके हैं। सत्ताधीशों के नाम और चेहरे भी बदलते रहे हैं। इतने बदलाव के बाद भी कुछ नहीं बदला तो भोपाल के अवाम के चेहरे का दर्द। यह घाव इतना गहरा था कि इसे भरने में शायद और भी कई पच्चीस साल लग जाएं। जिस मां की कोख सूनी हो गयी, जिस दुल्हन ने अपना पति खो दिया, राखी के लिये भाई की कलाई ढूंढ़ती बहन का दर्द वही जान सकती है। इस दर्द की दवा किसी सरकार के पास, किसी हकीम के पास नहीं है बल्कि यह दर्द पूरे जीवन भर का है। कुछ लोग यह दर्द अपने साथ समेटे इस दुनिया से चले गये तो कुछ इस दर्द के साथ मर मर कर जी रहे हैं। यह दर्द उस बेरहम कंपनी ने दिया था जिसे यूनियन कार्बाइड के नाम से पुकारा जाता है। हजारों की संख्या में बेकसूर लोगों को मौत की नींद सुलाने वाले हवाई जहाज से उड़ गये। परदेसी हवाई जहाज में उड़ने के साथ ही भोपाल का सुख-चैन ले उड़े। इसे वि·ा की भीषणतम त्रासदी का नाम दिया गया। दुनिया भर में इसे लेकर आवाज गूंजी। कसूरवारों के लिये सजा तो साफ थी किन्तु कानून ऐसा करने की इजाजत नहीं देता है। फिर शुरू हुआ तारीख पर तारीख का सिलसिला, गवाहों और सबूतों को जुटाने की कवायद और इस पूरी कवायद में पता ही नहीं चला कि कब पच्चीस बरस गुजर गये। राहत और रकम की लड़ाई भी खूब चली। आखिरकार फैसले की घड़ी आ ही गयी। ७ जून की तारीख मुर्करर की गयी। भोपाल का दिल एक बार फिर धड़क उठा। पच्चीस बरस की यादें फिर ताजा हो गर्इं। मन में उलझन थी और चेहरे पर तनाव। आखिरकार दोषियों को क्या सजा मिलेगी, इस बात को लेकर कशमकश जारी था। उम्मीद की जा रही थी कि हजारों जान निगलने वाले परदेसियों को छुट्टे में नहीं छोड़ा जाएगा, उन्हें सख्त से सख्त सजा दी जाएगी लेकिन अदालत का फैसला उन्हें फिर निराशा के भंवर में छोड़ गया। अदालत ने अपने सामने रखे दस्तावेजों को आधार बनाकर दो बरस की सजा और एक एक लाख रुपये का जुर्माना ठोंक दिया। फैसले के तत्काल बाद सात लोगों को पच्चीस हजार के मुचलके पर छोड़ दिया गया। इस फैसले के खिलाफ जुटे लोग आगे अदालत में जाने की तैयारी में हैं। फिलवक्त भोपाल की अवाम अवाक है। उसे सपने में भी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि फैसला ऐसा भी आएगा। वि·ाास दरकने लगा। वे जीवन के इस मोड़ पर हैं जहां उनका सबकुछ लुट गया है। सरकार से राहत राशि मिली लेकिन वो राहत कौन देगा जब थका-हारा जवान बेटा आकर आवाज लगायेगा-अम्मां खाना दे दे...पति के आने की राह तकती उस बेचारी को यह पता है कि दरवाजा उसे ही बंद करने जाना है...स्कूलों में अब शोर मचने लगा है लेकिन पच्चीस पहले जो सन्नाटा खींच गया था...उस सन्नाटे को चीरने की कोशिश तो हो नहीं सकती। मौत का शहर बने भोपाल में तब एक दूसरे के आंसू पोंछने वाले भी नहीं थे और आज इस फैसले ने एक बार फिर उसी मुकाम पर पहुंचा दिया है कि आखिर क्या करें?
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