रविवार, 25 जुलाई 2010

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पत्रकारिता से पवित्र पेशा और कोई नहीं
मनोज कुमार
इन दिनों पत्रकारिता को लेकर काफी बहस हो रही है। बहस यदि पत्रकारिता के कार्य और व्यवहार की आलोचना को लेकर होती तो ठीक है बल्कि उसकी सीमा को लेकर हो रही है। वे लोग पत्रकारिता की सीमारेखा की बातंे कर रहे हैं जिन्होंने हर हमेशा अपनी सीमाएं लांघी हैं। इन दिनों पत्रकारिता की आलोचना शब्दों से नहीं, बल्कि उन पर हमला कर हो रही है जिसकी किसी भी स्थिति में निंदा होनी चाहिए। मेरा अपना मानना है कि पत्रकारिता संसार का सबसे पवित्र पेशा है और वह हमेशा से अपनी जवाबदारी निभाता आया है। मुझे व्यक्तिगत रूप् से दुख है कि हमारे लोग ही एक आवाज में अपने बारे में बात नहीं कर पा रहे हैं। ग्वालियर से साथी पंकज की बातों से मैं सहमत हूं। पंकज के लिखे के बहाने एक टिप्पणी में मैं कुछ अनुभवों को सुनाना चाहूंगा कि जो लोग अखबारों से शीर्ष पर पहुंच गये और आज उसी के बूते शीर्ष पर खड़े हैं किन्तु लगभग नफरत की दृष्टि भी बनाये हुए हैं। करेगा। पंकज बहुत सुंदर लिखा है। बधाई।

मैं अपनी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों से इसे संसार का सबसे पवित्र पेशा मानकर चला हूं। पत्रकारिता की आलोचना आज और अभी नहीं हो रही है बल्कि यह पुरानी परम्परा है। साहित्य और आलोचना का जिस तरह का साथ है लगभग पत्रकारिता में भी वही परम्परा है किन्तु इन दिनों आलोचना के नाम पर हमले हो रहे हैं। शाब्दिक और शारीरिक। संभवतः पत्रकारिता ही एकमात्र ऐसा प्रोफेशन है जिसकी आलोचना करने की आजादी सर्वाधिक है। पत्रकारिता इन आलोचना को आत्मसात करता है। मीमांसा करता है और अपने आपको सुधरने का मौका देता है। अपनी गलती मानने में भी पत्रकारिता ने कभी गुरेज नहीं किया तो समाज के कोढ़ को सामने लाने में भी वह सबसे आगे रहा। शायद यही कारण है कि समाज हर पेशे की गलती को व्यवसायिक होने का लिबास पहना कर मुक्त कर देता है किन्तु पत्रकारिता को वह नहीं बख्शता है बल्कि वह गहरे से अपने विरोध दर्ज कराता है। समाज से यहां आशय उस आम आदमी से है जिसकी आशा और निराशा अखबारों से जुड़ी होती है। उसके लिये न्याय का मंच, बहरे कानों तक बात पहुंचाने का माध्यम अखबार ही हैं। ऐेसे में वह चाहता है कि पत्रकारिता और मजबूत हो।

रही बात फिल्म लम्हा में ऐश्वर्या के नाम का इस्तेमाल करने और अमिताभ के नााराज होने की तो यह उनका व्यवसायिक मामला है और इससे फिल्म को लोकप्रियता मिलती है और अमिताभ इतने नासमझ नहीं हैं िकवे ऐसे डायलाग पर ऐतराज करें वह भी तब जब ऐश्वर्या के बहाने मीडिया पर वार किया जा रहा है। एक तीर से दो निशाने लगा है एक तरफ ऐश्वर्या की लोकप्रियता दिखायी गयी है तो दूसरी तरफ मीडिया को ऐश्वर्या के करीब लाकर खड़ा कर दिया गया है। यह एक सुनियोजित ढंंग से मीडिया को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश है। मुझे तो इस बात की खुशी है कि अनुपम खेर जैसा सकरात्मक सोच का अभिनेता ऐसे छोटे डायलाग से अमिताभ से डर रहा है। साथी पंकज क ेलेख के प्रतिक्रियास्वरूप् किसी सज्जन ने रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण दिया है। यह ठीक उदाहरण है और मेरी समझाइश है कि अनुपम खेर रामकृष्ण परमहंस के उदाहरण से कुछ सीख लें, फिर फिल्मों के जरिये आम आदमी को सिखाने और समझाने की कोशिश करें क्योंकि एक डरा हुआ व्यक्ति आम आदमी के डर को भला कैसे और किस तरह दूर करेंगे।

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जननी हमें माफ कर देना

मनोज कुमार

भारतीय संस्कृति में स्त्री की तुलना आदिकाल से देवीस्वरूपा के रूप् में की जाती रही है किन्तु सुप्रीमकोर्ट की फटकार के बाद केन्द्र सरकार का एक नया चेहरा सामने आया है जिसमें उनका रवैया स्त्री के प्रति नकरात्मक ही नहीं, अपमानजनक है। यहां मैं उन शब्दों का उपयोग करने से परहेज करता हूं जो श्रेणी स्त्री के लिये केन्द्र सरकार ने तय की है। यह इसलिये नहीं कि इससे किसी का बचाव होता है बल्कि मैं यह मानकर चलता हूं कि बार बार इन स्तरहीन शब्दों के उपयोग से स्त्री की प्रतिष्ठा पर आघात पहुंचाने में मैं भी कहीं न कहीं शामिल हो जाऊंगा और मैं इस पाप से स्वयं को मुक्त रखना चाहता हूं। केन्द्र सरकार के इस रवैये से केवल स्त्री जाति की ही नहीं बल्कि समूचे भारतीय समाज का अपमान हुआ है।
एक स्त्री मां होती है, बहन होती है, भाभी होती है, मांसी होती है और उसके रिश्ते नाना प्रकार के होते हैं जिसमें वह गंुथकर एक परिवार को आकार देती है। स्त्री गृहणी है तो उसका दायित्व और बढ़ जाता है। उसे पूरे परिवार को सम्हाल कर रखने की जवाबदारी होती है। कहना न होगा कि हर स्त्री यह जवाबदारी दबाव में नहीं बल्कि स्वयं के मन से लेती हैं। स्त्री को परिवार की प्रथम पाठशाला कहा गया है। आप और हम जब कल बच्चे थे तो मां रूपी स्त्री ने हमारे भीतर संस्कार डाले, जीवन का पाठ पढ़ाया, नैतिक और अनैतिक की समझ पैदा की और आज उसी स्त्री को हम ऐसे शब्द दे रहे हैं। मां रूपी इसी स्त्री ने हमें धन कमाने के गुण दिये, साहस दिया और वह समझ जिसमें किसी का नुकसान न हो और वही स्त्री आज हमारे लिये दया की पात्र बन गयी है, यह बात शायद किसी के समझ में न आये।
एक स्त्री जो रिश्ते में हमारी बहन होती है और हम भाई होने के नाते उसकी अस्मत की रक्षा की जवाबदारी लेते हैं। हर रक्षाबंधन पर वह हमारी कलाई पर राखी बांध कर हमारे उत्तरदायित्व का बोध कराती है, आज उसी स्त्री के लिये हमारे मन में यह कलुषित विचार कैसे आ सकते हैं। जिसकी जवाबदारी हमने ले रखी है, उससे हम कैसे फिर सकते हैं। मुझे लगता है िकइस बार रक्षाबंधन में हर बहन की आंखों में सवाल होगा कि क्या अब भी तुम मेरी रक्षा का वचन देते हो? हर भाई कहेगा हां लेकिन उसका मन आत्मग्लानि से भरा होगा।
एक स्त्री जिसे हम भाभी का संबोधन देते हैं, मां की अनुपस्थिति में वह मां की भूमिका में रहती है। क्या इन्हें हम ऐसा कुछ कहेंगे जिससे उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचे? क्या उस स्त्री को हम ऐसा कुछ कह पाएंगे जिसे हम मांसी कहते हैं अर्थात मां जैसी को? क्या हम उन सारे रिश्तों को कभी ऐसा कहने की सोच भी सकते हैं जिनके कहने पर हम हमारी नजरों में छोटा हो जाते हैं।
आखिर में। क्या हम उस स्त्री को कुछ ऐसा अप्रतिष्ठाजनक कह पाएंगे जिसे हमारी संस्कृति, हमारे वेद अर्धाग्नि कहते हैं। अर्धाग्नि का अर्थ पुरूष का आधा हिस्सा। सात फेरों में हम समाज के सामने वचन देते हैं कि एक-दूसरे के सुख और दुख में सहभागी होंगे, क्या उन्हें हम ऐसे हिकारत भरे शब्दों से नवाज सकते हैं? नहीं, कभी नहीं। सुप्रीमकोर्ट ने फटकार लगाकर स्त्री के आत्मसम्मान और उसकी अस्मिता को सम्मान देते हुए जो भूमिका अदा की है, उससे अदालत के प्रति समाज के मन में सम्मान का भाव बढ़ा है। हम उम्मीद करते हैं कि भविष्य में भी कोर्ट इसी तरह चिंता कर गलत कामों को निरूत्साहित करता रहेगा। फिलहाल, जो स्थितियां हैं, उसमें मैं और हम जननी से उनकी प्रतिष्ठा पर आयी आंच के लिये माफी मांगते हैं।

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

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उदासीन पाठक और मीडिया की चिंता

मनोज कुमार

आगे पाठ पीछे सपाट की बात हमें स्कूली दिनों में मास्टरजी कहा करते थे और घर पर पिता लेकिन यह बात मीडिया में भी लागू होगी, यह अब देखने को मिल रहा है। अयोध्या मामले की यह घटना बीस बरस पहले इतिहास के लिये जितनी महत्वपूर्ण थी, उतनी मीडिया के लिये और आज बीस बरस बाद भी यह घटना उतना ही अर्थ रखती है। मुझे पूरी तरह जानकारी तो नहीं है कि देश के किन और अखबारों ने इस खबर को कितना महत्व दिया किन्तु भोपाल से प्रकाशित होने वाले अखबारों में संभवतः भास्कर ने ही इसे प्रमुखता दी। अयोध्या पर इस रिपोर्ट के दो पक्ष हंैं पहला यह कि बीस बरस बाद इस घाव को कुरेदने की जरूरत क्यों पड़ी और दूसरा यह कि क्या हम इतिहास से सबक लेेने के लिये इन घटनाओं को याद नहीं करना चाहेंगे? मुझे लगता है कि दूसरी बात में ज्यादा दम है। इस बारे में थोड़ा विस्तार से बात करते हैं।

बीस बरस पहले जिन दिग्गजों के कहे जाने पर पूरा देश आंदोलित हो उठा था, बीस बरस बाद वही देश शांत है। इन बीस बरसों में काफी कुछ बदल गया है। जीवनशैली बदली है, राजनीति के अर्थ बदले हैं, मीडिया का चेहरा बदला है और आम आदमी के सोच में भी बदलाव दिखता है। पाठक और दर्शक पहले की तरह अब उत्साही नहीं हैं। वे हर घटना को महज राजनीति से रंगे दिखते हैं। बीस बरस पहले मंदिर के मुद्दे पर लोगों में जो भाव था, वह बरस दर बरस ठंडा पड़ता गया। वादों और बातों ने जैसे लोगों के विश्वास को तोड़ दिया था और यही वजह है कि बीस बरस बाद जब दिग्गज वापस अयोध्या में एकत्र हुए तो मामला किसी आग के राख में तब्दील हो जाने जैसा था। भास्कर की इस रिपोर्ट में कई बातों का खुलासा किया गया है किन्तु उन तथ्यों को शामिल नहीं किया गया जिसके कारण बीस बरस बाद खामोशी बनी रही। आम आदमी के मन को नहीं टटोला गया और न ही उन मनोवैज्ञानिकों से बात की गयी कि एक मामला अब अपने समय के साथ कब तक और कैसे गर्म रहता है और यह नहीं रहता तो उसके क्या कारण हैं। जो लोग कल तक आध्यात्मिक नेता के रूप् में आम आदमी के बीच स्थापित थे, आज उनकी छवि ठेठ राजसत्ता वाले नेता की बन गये है। इन लोगों को भी सामने लाना चाहिए था, तब शायद बात बनती। लेआउट के लिहाज से पन्ना खूबसूरत है किन्तु यह जान लेना जरूरी है कि अखबार प्रोडक्ट नहीं है और केवल खूबसूरत पैंकिंग से काम नहीं चलने वाला।

एक बच्चा जब स्कूल से किसी स्पर्धा में जीत कर आता है अथवा किसी विषय में अच्छे अंक पाता है तो वह चाहता है कि उसके पालक उसकी तारीफ करें। बच्चे की तारीफ की लालसा उचित है और लगभग यही मामला हम लोगों के साथ हैं। हम तारीफ नहीं चाहते बल्कि हम समालोचना के आकांक्षी हैं। हम जो लिख रहे हैं, वह अंतिम सत्य नहीं है किन्तु संशोधन, सुधार और बेहतर करने की गुंजाइश बहुत बनी रहती है। पाठकों की प्रतिक्रिया का खत्म हो जाने का अर्थ मीडिया के प्रभाव का आहिस्ता आहिस्ता खत्म हो जाना जैसा प्रतीत होता है। जब तक प्रभाव पता नहीं चलेगा, प्रभावी कैसे होगा। वह किसी भी क्षेत्र का मामला हो। विचारधारा तो जैसे युवापीढ़ी से गायब होती जा रही है। विचारधारा का अभाव ही प्रतिक्रिया से रोकता है। पूरे पन्ने की रिपोर्ट पर चर्चा नहीं होना, विस्मय नहीं, डर पैदा करता है। ऐसा डर जो भविष्य को आतंकित करता है कि आखिर हमारे लिखने का अर्थ क्या है। यह डर विजय और उन जैसे पत्रकारों को है जो वाजिब है। विजय ने बातों ही बातों में मुझसे कहा कि आप इस पर भले ही आलोचना लिखें, इसका यह अर्थ नहीं है कि वे अपनी तारीफ चाहते हैं, शायद उनकी मंशा मुद्दे की सामयिकता को जान लेने की है। पाठकों की यह चुप्पी क्यों, इस पर भी चिंतन की जरूरत है।

प्रतिक्रिया जाहिर करने वालों में युवा वर्ग हमेशा से आगे रहा है और इस समय युवावर्ग अपने आपमें गुम हो गया है। युवाओं में प्रगतिशील, वामपंथी, समाजवादी, आदि अनादि विचारों को लेकर जो बहस होती थी, वह लगभग खत्म हो गयी है। बाजारवाद ने उन्हें भ्रमित कर दिया है। चैबीसों घंटे कानों में इयरफोन लगाये वह गाना सुनने में मस्त है। एफएम ने उसे बता दिया है कि जीना है तो गाने सुनो, बेहद कमजोर और स्तरहीन संवाद कहो। समस्याएं कभी खत्म नहीं होने वाली किन्तु तुम गाना नहीं सुनोगे तो जीवन क ेमजे से मरहूम हो जाओेगे। कानों में दिन भर बजते रोमांटिक गानों ने युवाओं को मदमस्त कर दिया है। उन्हें न तो बीते कल की खबर है और न आने वाले दिनों की। एक साजिश युवाओं के साथ की जा रही है और इस साजिश में जाने-अनजाने में सब लोग शामिल हो गये हैं। बात विजय के एक रिपोर्ट की नहीं है, बात किसी एक अखबार की नहीं है बल्कि बात समूची पत्रकारिता की हो रही है जो इस समय आत्ममुग्ध है िकवह कितना अच्छा लिख रहा है किन्तु अब समय आ गया है िकवह चिंता करे कि उसके लिखे पर कोई अपनी प्रतिक्रिया जाहिर न करे तो इसे लिखे का, छपे का क्या अर्थ होगा। चिंतन का समय है, हम सबको इस पर विचार करना चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं। भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम के संपादक हैं।)

गुरुवार, 24 जून 2010

ध्यप्रदेश में पंचायतीराज के डेढ़ दशक बाद महिला लीडर अब पूरी तरह से चुनौतियों का सामना करने के लिये तैयार दिख रही है। अनेक किस्म की दिक्कतों के बीच वे अपने लिये राह बना रही हैं। सत्ता पाने के बाद उन्हें सरूर (सत्ता का नशा) नहीं हुआ बल्कि सत्ता से वे सत (सच) का रास्ता बना रही हैं। यह स्थिति राज्य के दूरदराज झाबुआ से लेकर मंडला तक के ग्राम पंचायतों में है तो राजधानी भोपाल के आसपास स्थित गांवों की महिला लीडरों का काम अद्भुत है। ये महिलाएं कभी चुनौतियों को देखकर घबरा जाती थीं तो अब चुनौतियों का सामना करने के लिये ये तैयार दिख रही हैं। पंचायतीराज का पूरा का पूरा परिदृश्य बदला बदला दिखायी देने लगा है। कभी गांवों में महिलाओं के नाम पर पुरूषों की सत्ता हुआ करती थी और परिवार वालों का दखल था, अब वहां सिर्फ और सिर्फ महिलाआंे का राज है। वे चुनी जाती हैं, राज करती हैं और समस्याआंे से जूझती हुई गांव के विकास का रास्ता तय करती हैं। किरण बाई आदिवासी महिला है। वह तेंदूखेड़ा में रहती है। इस बार के चुनाव में वह बाबई चिचली जनपद की अध्यक्ष चुनी गयीं। तेंदूखेड़ा और बाबई चिचली के बीच की दूरी लगभग तेरह किलोमीटर है। जनपद अध्यक्ष होने के नाते उन्हें नियमानुसार वाहन की सुविधा मिलनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। जनपद अध्यक्ष होने के नाते किरण बाई ने जनपद पंचायत के सीईओ से इसी साल 2010 के अप्रेल महीने में वाहन देने का अनुरोध किया तो उन्हें किराये पर वाहन लेने की अनुमति दी गई। किरण बाई को लगा कि उनकी मुसीबत खत्म हो गई और वे अपने काम को इत्मीनान के साथ पूरा कर सकेंगी लेकिन उन्हें इस बात का इल्म नहीं था कि अभी उनकी मुसीबत खत्म नहींं हुई है। सीईओ के आदेश पर वाहन किराये पर लिया और अपना काम निपटाने निकल पड़ी। महीना खत्म होते होते जब किरणबाई ने भुगतान के लिये बिल प्रस्तुत किया तो उसे किनारे कर दिया गया और कहा गया कि अभी राशि नहीं है। जनपद अध्यक्ष के लिये अब दोहरी मुसीबत है। पहले तो गाड़ी नहीं थी, अब उधारी उनके मत्थे चढ़ गयी है। सीईओ कहते हैं कि उनके पास ही गाड़ी नहीं है तो जनपद अध्यक्ष को कहां से गाड़ी की सुविधा दें लेकिन पंचायत कानून में साफतौर पर प्रावधान है कि जनपद अध्यक्ष को वाहन सुविधा उपलब्ध करायी जाए। बाबई चिचली जनपद की अध्यक्ष किरण बाई के हौसले को सीईओ की इस बेरूखी से कोई फर्क नहीं पड़ा। वह अपने पति के साथ रोज तेरह किलोमीटर का सफर सायकल से तय कर जनपद मुख्यालय जाती हैं। दिन भर काम निपटाने के बाद वह वापस अपने पति के साथ घर लौट आती हैं। अपने जीवनसाथी के इस सहयोग से जहां किरण बाई के हौसलों को नयी ऊंचाई मिली है। किरणबाई एक मिसाल है उन महिलाओं के लिये जो सुविधाओं के अभाव में अपना काम नहीं कर पाती हैं या दिक्कतों का रोना रोते हुए समय गंवा देती हैं। किरणबाई सुविधा नहीं मिलने से दुखी हैं लेकिन निराश नहीं। वे अपना दायित्व समझती हैं और उसे पूरा करने के लिये आगे आ रही हैं। किरणबाई राज्य की पंचायतों की अकेली लीडर नहीं है बल्कि ऐसे अनेक गुमनाम महिला लीडर हैं जो इसी साहस और ताकत के साथ सत्ता की बागडोर सम्हाले हुए हैं। इन महिला लीडरों को समाज सलाम करता है। मध्यप्रदेश में स्त्री ग्रामीण सत्ता के प्रति पुरूषों में भी भाव बदला है। अब उन्हांेंने किनारा कर लिया है और इसका प्रमाण यह है कि राज्य के अनेक पंचायतों में सौफीसदी सत्ता महिलाओं की बन गयी है। पचास फीसदी आरक्षण के कारण और पचास फीसदी स्वयं पुरूषों द्वारा सत्ता छोड़ने के कारण। हालांकि अभी इसका प्रतिशत कम है लेकिन उम्मीद की एक किरण जागी है। महिला लीडरों के लिये चुनौतियां कम नहीं हुई है। अनेक ऐसे उदाहरण मिले हैं जहां पंचायतोंे में महिला लीडरों को उनके बुनियादी अधिकार एवं सुविधाओं से वंचित रखा गया है। नियमों का हवाला, आर्थिक तंगी और अपरोक्ष रूप महिला लीडर को परेशान करने की मंशा के चलते रोज नयी चुनौतियां दी जा रही हैं। इन चुनौतियों से महिला लीडर परेशान होने के बजाय रोज नयी इबारत लिख रही हैं।

बुधवार, 16 जून 2010

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इस शहर को एक और इल्जाम न दो
मनोज कुमार
दिल्ली और भोपाल के अखबारों में खबर छपी है कि एंडरसन को भगाया नहीं जाता तो लोग उन्हें मार डालते। यह बयान भोपाल को एक और जख्म दे गया। इस इल्जाम को यह शहर नहीं सह पायेगा। भोपाल को जो लोग जानते हैं वे यह जानते हैं कि भोपाल के लोग जान देना जानते हैं, जान लेना नहीं। यदि ऐसा नहीं होता तो इन पच्चीस सालों से वे रोज मर मर कर नहीं जी रहे होते। यदि ऐसा नहीं होता तो पच्चीस साल बाद भी मुंह चिढ़ाती यूका का शानदार गेस्टहाउस यूंह ी आबाद नहीं रहता। जिन लोगों ने यह बयान दिया है, उन्होंने भोपाल की छाती को छलनी कर दिया है। पच्चीस बरस पहले देह में घुला जहर उन्हें धीमा धीमा मार रहा है लेकिन राजनीति और मीडिया जो रोज जहर उगल रहे हैं, उसे उसके दिल पर रोज जख्म हो रहे हैं। इस ताजे जख्म को कौन भरेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। यह सच है कि सच को सामने आना चाहिए और यह भी सच है कि सच को सामने लाने के लिये ऐसे जख्म भोपाल को झेलना भी पड़ेगा लेकिन इस सच का क्या करें जो इल्जाम के रूप् में भोपाल की तहजीब और संस्कृति को तार तार कर जाता है।

भोपाल एक शहर नहीं है बल्कि इस देश की गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतिनिधि शहर है। अपने बसने से लेकर आज तक के सफर में भोपाल ने कई पड़ाव पार किये हैं। अनेक किस्म की त्रासदी झेली है लेकिन यह शहर कभी उन्मादी नहीं हुआ, कभी संयम नहीं खोया। आपातकाल के दिन हों, इंदिराजी की हत्या से उपजी भावनात्मक हिंसा का मामला हो या बाबरी मजिस्द को लेकर हुए फसाद। बार बार और हर बार भोपाल को उन्मादी बनाने की कोशिशें हुई लेकिन सब नाकाम रहीं। गंगा-जमुनी संस्कृति के इस शहर मंे भाईचारा की मिसाल शायद ही कहीं और मिले। जहां तक बात भोपाल गैस कांड की है और इससे उपजे गुस्से के बाद एंडरसन को मार डालने की है तो यह जान लेना चाहिए कि उस समय भोपाल के बाशिंदों को खुद को बचाने का समय नहीं था तो वे क्या एंडरसन को मार डालते?

पच्चीस बरस पहले उस काली रात को जो लोग खुद तिल तिल कर मर रहे थे, जिनके घरों और आसपास में लाशों पर लाशें बिछ रही थी, क्या उनके पास इतना वक्त था कि वे एंडरसन को मारने के लिये एकजुट हो जाते। बेटे को ढूंढ़ती मां, पति को ढूंढती पत्नी, कहीं किनारे पर बैठे मां-बाप और अपनी जान बचाने के लिये भागते लोगों को तो शायद दस बीस दिन बाद पता चला होगा कि एंडरसन देश छोड़कर चला गया है। जो लोग अपने को और अपने लोगों को बचाने में कामयाब नहींे हो पा रहे थे वे भला क्या एंडरसन पर हमला करते? जो लोग भोपाल पर यह इल्जाम लगा रहे हैं वे भीड़ का मनोविज्ञान भी समझते होंगे। भीड़ दोषी को नहीं ढूंढ़ती है बल्कि वह हर उस शख्स को दोषी मान लेती है जो सामने खड़ा होता है और यदि भोपाल उन्मादी होता तो सबसे पहले शिकार स्थानीय नेता होते, सरकार होती लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। जनता अपनी खामोशी का रिजल्ट बैलेट के जरिये देती है लेकिन यहां भी ऐसा नहीं हुआ। फिर भला किस आधार पर भोपाल की अस्मिता पर इल्जाम ठोंक दिया गया कि एंडरसन को नहीं भगाया गया होता तो उसे मार डाला जाता। भोपाल के लिये यह इल्जाम ठीक नहीं है।

एंडरसन को किसने भगाया, दोषी कौन हैं और किसे सजा मिलेगी, इस पर कार्यवाही चल रही है, बातें हो रही हैं। समय करेगा अपना फैसला किन्तु मेरा सवाल यह है कि राजनीति और मीडिया गैस त्रासदी के फैसले के बाद जितना आक्रामक हो रही है, वह बीते सालों में ऐसा तेवर क्यों नहीं दिखाया गया? जो लोग दोषी हैं, उन्हांेने लगभग अपनी जिंदगी जी लिया है और संभव है कि इसमें एक दो इस दुनिया में भी नहीं होंगे। अब इनको सजा भी होगी तो कौन सा पीड़ितों का भला हो जाएगा? जांच तो इस बात की भी होनी चाहिए कि गैस पीड़ितों की इलाज के लिये बनाये गये अस्पताल में जो कुछ हुआ और हो रहा है, उसके लिये दोषी कौन हैं? भोपाल के पीड़ित वाशिंदे मर रहे थे लेकिन माकूल इलाज के अभाव में मरने के लिये मजबूर करने वाले दोषी कौन हैं? दरअसल मुझे लगता है कि सवाल असल अब यह है कि पीड़ितों को अधिकाधिक राहत कैसे पहुंचाया जाए? उनके जख्म को तो भरा नहीं जा सकता लेकिन मरहम लगाने की कोशिश तो की जा सकती है। पीड़ितों के जो लोग सच्चे पैरोकार हैं उन्हें भाई सत्थू, जब्बार और ऐसे ही दर्जनों लोग नाम और अनाम काम कर रहे हैं, वैसे काम करने के लिये आगे आयें। भोपाल जख्म का अभी सूखा नहीं है और शायद कभी सूखे भी नहीं। अपनों के खोने का दर्द, खाने वाला ही जान सकता है। शायद इसलिये ही कहा गया है जाके फटे न पीर बिबाई, वो का जाने दर्द परायी। अच्छा होगा कि पूरे मामले पर देशव्यापी बहस हो, दोषियों को सजा दिलाने के लिये छोटी छोटी बातों को भी प्रकाश में लाया जाए लेकिन याद रहे कि ऐसा कोई इल्जाम न दें जिससे भोपाल का दिल जार जार रोये। अब भोपाल में कोई और इल्जाम झेलने की ताकत नहीं बची है।

(टिप्पणीकार स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं)

रविवार, 13 जून 2010

अपनी बात

रिश्तांे को ढोने से तो अच्छा ही होगा...
तलाक शब्द किसी भी भारतीय स्त्री की मन और उसकी अस्मिता को तार तार कर देता है। एक भारतीय स्त्री चाहे कितनी भी तकलीफ में क्यों न हो, वह आखिरी सूरत तक तलाक से दूर रहना चाहती है। वह अपना मान और प्रतिष्ठा एक परिवार में ही देखती है और इसके बाद उसकी चिंता के केन्द्रबिन्दु में उसके बच्चे होते हैं। वह मन से भले ही तलाक लेने की ख्वाहिश रखती हो लेकिन उसे व्यवहार रूप् में तब्दील नहीं कर पाती है। पति जितना भी निकम्मा और नालायक हो लेकिन स्त्री के लिये बच्चे उसकी पूंजी होते हैं। एक स्त्री जानती है कि तलाक के बाद यह निर्मम पुरूष किसी और स्त्री को अपने भोग के लिये ले आयेगा। आने वाली दूसरी स्त्री मन से कम, मतलब से ज्यादा आती है और उसके लिये किसी और के बच्चे को पालने की न तो कोई मंशा होती है और न लगाव। यहां तक कि जिसके साथ और जिसके लिये वह आयी है, उससे भी उसका संबंध केवल देह तक होता है और बाकि समय वह उन सुविधाओं का अधिकाधिक लाभ उठाना चाहती है जिससे अब तक वह वंचित रही है। कहने का अर्थ यह कि अक्सर दूसरी शादी भावना कम, मजबूरी ज्यादा होती है और यह मजबूरी एकाएक भौतिक लाभ प्राप्ति की ओर ले जाती है। इन स्थितियांे से बचने के लिये कोई भी भारतीय स्त्री तलाक के लिये राजी नहीं होती है। स्त्रियों की दशा पर एक लम्बे समय तक अध्ययन करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि पति की ज्यादती की शिकार केवल हाउस वाइफ ही नहीं होती है बल्कि उनकी स्थिति भी दयनीय होती है जो कामकाजी होती हैं। यहां पर आकर तलाक के लिये हालात बदल जाते हैं। कामकाजी स्त्री आर्थिक रूप से मजबूत होने के कारण तलाक की पहल कर पाती है जबकि घरेलू स्त्री आर्थिक असुरक्षा, पीहर की चिंता और कहीं उसकी छोटी बहनें हों तो उसके ब्याह की चिंता में वह रोज डूबती-मरती रहती है। स्थिति जब काबू से बाहर हो जाये तब उसे इस स्थिति पर पहुंचना पड़ता है जिसे तलाक कहते वर्तमान में स्त्री का चेहरा बदल रहा है। वह अब स्वतंत्र व स्वाधीन जीवन जीना चाहती है और इसके लिये उसे तलाक की जरूरत होती है।
तलाक को लेकर भारतीय मन अभी भी संकुचित दृष्टि रखता है। काननू में भी अनेक किस्म की दिक्कतें हैं और इसके चलते तलाक पाना आसान नहीं होता है। वास्तव में अभी जो कारण बताये गये हैं, वे तलाक की बुनियाद के पहले कारण हैं जैसा कि पत्नी-पति का आपस में नहीं निभना। सहज रूप् से दोनों को अलग होने में अनेक किस्म की दिक्कतें हैं और इन दिक्कतों से उबरने का सहज उपाय है एक दूसरे पर लांछन लगाना। कई बार इसकी हदें पार हो जाती हैं। समय के साथ अब तलाक लेने के इच्छुक दम्पत्तियों की संख्या में वृद्वि होने लगी है और जरूरी है कि तलाक की प्रक्रिया का सरलीकरण किया जाए। वास्तव में यह मानवाधिकार का मामला माना जाना चाहिए। हालांकि भारत इस मामले में सकरात्मक दृष्टिकोण रखता है और आखिरी तक कोशिश करता है कि दोनों के मन बदल जाएं और वे एक हो कर रहें लेकिन जब ऐसा संभव नहीं होता है तब तलाक ही एकमात्र रास्ता बच जाता है। यूं भी रिश्तों को ढोने और घुट घुट कर मरने के बजाय स्वतंत्र जीवन जीने का हक दिया जाना ही स्त्री के लिये श्रेयस्कर होगा।

सोमवार, 7 जून 2010

भोपाल

घाव को हरा कर गया
अपनी हरियाली और झील के मशहूर भोपाल ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन इस पर्यावरण प्रेमी शहर को कोई जहरीली गैस निगल जाएगी लेकिन सच तो यही था। हुआ भी यही और यह होना कल की बात कर तरह लगती है जबकि कयामत के पच्चीस बरस गुजर चुके हैं। इन बरसों में कम से कम दो पीढ़ी जवान हो चुकी है। गंगा नदी में जाने कितना पानी बह चुका है। पच्चीस बरस में दुनिया में कितने परिवर्तन आ चुके हैं। सत्ताधीशों के नाम और चेहरे भी बदलते रहे हैं। इतने बदलाव के बाद भी कुछ नहीं बदला तो भोपाल के अवाम के चेहरे का दर्द। यह घाव इतना गहरा था कि इसे भरने में शायद और भी कई पच्चीस साल लग जाएं। जिस मां की कोख सूनी हो गयी, जिस दुल्हन ने अपना पति खो दिया, राखी के लिये भाई की कलाई ढूंढ़ती बहन का दर्द वही जान सकती है। इस दर्द की दवा किसी सरकार के पास, किसी हकीम के पास नहीं है बल्कि यह दर्द पूरे जीवन भर का है। कुछ लोग यह दर्द अपने साथ समेटे इस दुनिया से चले गये तो कुछ इस दर्द के साथ मर मर कर जी रहे हैं। यह दर्द उस बेरहम कंपनी ने दिया था जिसे यूनियन कार्बाइड के नाम से पुकारा जाता है। हजारों की संख्या में बेकसूर लोगों को मौत की नींद सुलाने वाले हवाई जहाज से उड़ गये। परदेसी हवाई जहाज में उड़ने के साथ ही भोपाल का सुख-चैन ले उड़े। इसे वि·ा की भीषणतम त्रासदी का नाम दिया गया। दुनिया भर में इसे लेकर आवाज गूंजी। कसूरवारों के लिये सजा तो साफ थी किन्तु कानून ऐसा करने की इजाजत नहीं देता है। फिर शुरू हुआ तारीख पर तारीख का सिलसिला, गवाहों और सबूतों को जुटाने की कवायद और इस पूरी कवायद में पता ही नहीं चला कि कब पच्चीस बरस गुजर गये। राहत और रकम की लड़ाई भी खूब चली। आखिरकार फैसले की घड़ी आ ही गयी। ७ जून की तारीख मुर्करर की गयी। भोपाल का दिल एक बार फिर धड़क उठा। पच्चीस बरस की यादें फिर ताजा हो गर्इं। मन में उलझन थी और चेहरे पर तनाव। आखिरकार दोषियों को क्या सजा मिलेगी, इस बात को लेकर कशमकश जारी था। उम्मीद की जा रही थी कि हजारों जान निगलने वाले परदेसियों को छुट्टे में नहीं छोड़ा जाएगा, उन्हें सख्त से सख्त सजा दी जाएगी लेकिन अदालत का फैसला उन्हें फिर निराशा के भंवर में छोड़ गया। अदालत ने अपने सामने रखे दस्तावेजों को आधार बनाकर दो बरस की सजा और एक एक लाख रुपये का जुर्माना ठोंक दिया। फैसले के तत्काल बाद सात लोगों को पच्चीस हजार के मुचलके पर छोड़ दिया गया। इस फैसले के खिलाफ जुटे लोग आगे अदालत में जाने की तैयारी में हैं। फिलवक्त भोपाल की अवाम अवाक है। उसे सपने में भी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि फैसला ऐसा भी आएगा। वि·ाास दरकने लगा। वे जीवन के इस मोड़ पर हैं जहां उनका सबकुछ लुट गया है। सरकार से राहत राशि मिली लेकिन वो राहत कौन देगा जब थका-हारा जवान बेटा आकर आवाज लगायेगा-अम्मां खाना दे दे...पति के आने की राह तकती उस बेचारी को यह पता है कि दरवाजा उसे ही बंद करने जाना है...स्कूलों में अब शोर मचने लगा है लेकिन पच्चीस पहले जो सन्नाटा खींच गया था...उस सन्नाटे को चीरने की कोशिश तो हो नहीं सकती। मौत का शहर बने भोपाल में तब एक दूसरे के आंसू पोंछने वाले भी नहीं थे और आज इस फैसले ने एक बार फिर उसी मुकाम पर पहुंचा दिया है कि आखिर क्या करें?

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