शनिवार, 2 अप्रैल 2016

तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है


मनोज कुमार

इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो और खुद को बचा ले जाओ। इक्का-दुक्का अखबार और पत्रिकाओं को छोड़ दें तो लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में ‘‘टेग लाइन‘‘ होती है- ‘‘यह लेखक के निजी विचार हैं। सम्पादक की सहमति अनिवार्य नहीं।‘‘इस टेग लाइन से यह बात तो साफ हो जाती है कि जो कुछ भी छप रहा हैवह सम्पादक की सहमति के बिना है। लेकिन छप रहा है तो सहमति किसकी है लेखक अपने लिखे की जवाबदारी से बच नहीं सकता लेकिन प्रकाषन की जवाबदारी किसकी हैसम्पादक ने तो किनारा कर लिया और लेखक पर जवाबदारी डाल दी। ऐसे में यह प्रश्न उलझन भरा है और घूम-फिर कर बात का लब्बोलुआब इस बात पर है कि प्रकाशनों को अब सम्पादक की जरूरत ही नहीं है और जो परिस्थितियां हैं, वह इस बात की हामी भी है। इस ‘‘टेग लाइन‘‘ वाली पत्रकारिता से हम टेलीविजन की पत्रकारिता को सौफीसदी बरी करते हैं क्योंकि यहां सम्पादक नाम की कोई संस्था होती है या जरूरत होगी, इस पर चर्चा अलग से की जा सकेगी। यहां पर हम पत्रकारिता अर्थात मुद्रित माध्यमों के बारे में बात कर रहे हैं। अस्तु। 

भारतीय पत्रकारिता की आज की स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। जवबादारी से बचती पत्रकारिता भला किस तरह से अपनी सामाजिक जवाबदारी का निर्वहन कर पाएगी, सवाल यह भी है कि क्या समय अब गैर-जवाबदार पत्रकारिता का आ गया है। यह सवाल गैर-वाजिब नहीं है क्योंकि भारतीय पत्रकारिता ने पत्रकारिता का वह स्वर्णयुग भी देखा है जहां सम्पादक न केवल जवाबदार होता था बल्कि सम्पादक की सहमति के बिना एक पंक्ति का प्रकाशन असंभव सा था। भारतीय पत्रकारिता का इतिहास बताता है कि व्यवस्था के खिलाफ लिखने के कारण एक नहीं कई पत्रकारों को जेल तक जाना पड़ा लेकिन उन्होंने कभी भी जवाबदारी से खुद को मुक्त नहीं किया। उल्टे सम्पादक उपत कर सामने आता और कहता कि हां, इस लेख की मेरी जवाबदारी है और आज के सम्पादक का जवाब ही उल्टा है। मैं कुछ नहीं जानता, मेरा कोई वास्ता नहीं है।

आज की पत्रकारिता में सम्पादक की गौण होती या खत्म हो चुकी भूमिका पर चर्चा करते हैं तो भारतीय पत्रकारिता के उस गौरवशाली कालखंड की सहज ही स्मरण हो आता है जब सम्पादक के इर्द-गिर्द पत्रकारिता की आभा होती थी। हालांकि सम्पादक संस्था के लोप हो जाने को लेकर अर्से से चिंता की जा रही है। यह चिंता वाजिब है। एक समय होता था जब कोई अखबार या पत्रिका, अपने नाम से कम और सम्पादक के नाम पर जानी जाती थी। बेहतर होने पर सम्पादक की प्रतिभा पर चर्चा होती थी और गलतियां होने पर प्रताड़ना का अधिकारी भी सम्पादक ही होता था। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक नहीं अनेक सम्पादक हुए हैं जिन्होंने भारतीय पत्रकारिता को उजाला दिया। समय गुजरता रहा और आहिस्ता आहिस्ता सम्पादक संस्था का लोप होने लगा। प्रकाशन संस्थाओं ने मान लिया कि सम्पादक की जरूरत नहीं है। प्रकाशन संस्था का स्वामी स्वयं सम्पादक हो सकता है और अपने अधीनस्थों से कार्य करा सकता है। उन्हें यह भी लगने लगा था कि सम्पादक करता-वरता तो कुछ है नहीं, बस उसे ढोना होता है। ये लोग उस समय ज्यादा कष्ट महसूस करते थे जब सम्पादक उनके हस्तक्षेप को दरकिनार कर दिया करते थे। एक तरह से यह अहम का मामला था। 
स्वामी या सम्पादक के इस टकराव का परिणाम यह निकला कि सम्पादक किनारे कर दिए गये।

प्रकाषन संस्था के स्वामी के भीतर पहले सम्पादक को लेकर सम्मान का भाव होता था, वह आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने लगा। कई घटनाएं हैं जो इस बात का प्रमाण है जो यह बात साबित करती हैं कि सम्पादक के समक्ष स्वामी बौना हुआ करता था। स्वामी इस बात को जानता था कि सम्पादक ज्ञानी है और प्रकाशन एक सामाजिक जवाबदारी। इस नाते वह स्वयं के अहम पर न केवल नियंत्रण रखता था बल्कि अपने प्रकाशन के माध्यम से लोकप्रिय हो जाने का कोई लालच उसने नहीं पाला था। कहने के लिए तो लोग सन् 75 के आपातकाल के उन काले दिनों का स्मरण जरूर कर लेते हैं जब पत्रकारिता अपने कड़क मिजाज को भूल गई थी। सवाल यह है कि 40 साल गुजर जाने के बाद भी हम पत्रकारिता के आपातकालीन दिनों का स्मरण करेंगे या और गिरावट की तरफ जाएंगे. जहां तक मेरा अनुभव है और मेरी स्मरणशक्ति काम कर रही है तो मुझे लगता है कि सम्पादक संस्था को विलोपित करने का काम आपातकाल ने नहीं बल्कि प्रकाषन संस्था के स्वामी के निजी लालच ने किया है। उन्हें लगने लगा कि कागज को कोटा-सोटा तो खत्म हो गया है। सो आर्थिक लाभ तो घटा ही है बल्कि उसके भीतर स्टेटस का सपना पलने लगा। वह अपने सम्पादक से ज्यादा पूछ-परख चाहता है और चाहता है कि शासन-प्रशासन में उसका दखल बना रहे।

स्वामी के इस लालच के चलते सम्पादक संस्था को किनारे कर दिया गया और सम्पादक के स्थान पर प्रबंध सम्पादक ने पूरे प्रकाशन पर कब्जा कर लिया। एक प्रकाशन संस्था से शुरू हुई लालच की यह बीमारी धीरे-धीरे पूरी पत्रकारिता को अपने कब्जे में कर लिया। पत्र स्वामियों के इस लालच के कारण उन्होंने कम होशियार और उनकी हां में हां मिलाने वाले सम्पादक रखे जाने लगे। गंभीर और जवाबदार सम्पादकों ने इस परम्परा का विरोध किया लेकिन संख्याबल उन सम्पादकों की होती गई जो हां में हां मिलाने वालों में आगे रहे। सम्पादक संस्था की गुपचुप मौत के बाद पत्रकारिता का तेवर ही बदल गया। प्रबंध सम्पादक की कुर्सी पर बैठने वाले सम्पादक के सामने लक्ष्य पत्रकारिता नहीं बल्कि अर्थोपार्जन होता है सो वह पत्र स्वामी को बताता है कि फलां स्टोरी के प्रकाशन से कितना लाभ हो सकता है। स्वामी का एक ही लक्ष्य होता है अधिकाधिक लाभ कमाना। सम्पादक संस्था के खत्म होने और प्रबंध सम्पादक के इस नए चलन ने पेडन्यूज जैसी बीमारी को महामारी का रूप दे दिया।

कुछ भी कहिएयह ‘‘टेग लाइन' वाली पत्रकारिता है मजेदार। जिस अखबार में लेख छापा जा रहा हैउसका सम्पादक-स्वामी कहता है कि यह विचार लेखक के निजी हैं। इसका सीधा अर्थ होता है कि बड़ी ही गैर-जवाबादारी के साथ पत्र-पत्रिकाओं ने लेख को प्रकाशित कर दिया है। न तो प्रकाशन के पूर्व और न ही प्रकाशन के बाद लेख को पढ़ा गया। जब सम्पादक इस तरह की भूमिका में है तो सचमुच में उसकी कोई जरूरत नहीं है। जब एक सम्पादक किसी लेख अथवा प्रकाशन सामग्री को बिना पढ़े प्रकाषन की अनुमति दे सकता है और साथ में इसकी जवाबदारी लेखक के मत्थे चढ़ा देता है तो क्यों चाहिए हमें कोई सम्पादक, जब लेखक को अपने लिखे की जवाबदारी स्वयं ही कबूल करनी है तो सम्पादक क्या करेगा, इन सम्पादकों को कानून का ज्ञान नहीं होगा, यह बात उचित नहीं है लेकिन प्रबंध सम्पादक की हैसियत से वह इससे बचने का उपाय ढूंढ़ते हैं और इसी का तरीका ये ‘‘टेग लाइन वाली पत्रकारिता है। गैर-जवाबदारी के इस दौर में भारतीय पत्रकारिता जिम्मेदार सम्पादक की प्रतीक्षा में खड़ी है जो कहेगी कि छपे हुए एक आलेख नहीं अपितु एक-एक शब्द में सम्पादक की सहमति है और वह इसके प्रकाशन के लिए जवाबदार है। 

मंगलवार, 29 मार्च 2016

पहाड़ी कोरवा की जिंदगी में नई सुबह


-मनोज कुमार
यह शायद पहला मौका होगा जब पहाड़ी कोरवा आदिवासियों के जीवन में इतनी सारी खुशी उनके हिस्से में आयी है. अब से पहले तक उपेक्षा और तकलीफ के सहारे उनकी जिंदगी बसर हो रही थी. जंगलों पर निर्भर रहने वाले ये पहाड़ी कोरवा की चिंता करती तो हर सरकार दिखती लेकिन कागज पर और यह पहली पहली बार हुआ है जब कागज नहीं, बात नहीं बल्कि सच में उनके हक में कुछ दिखाया है तो राज्य की रमन सरकार ने. राज्य सरकार ने इन आदिवासियों की जिंदगी बदलने के लिए शिक्षा से रोजगार और कोठी में अनाज से लेकर स्वच्छता तक का ध्यान रखा है. अब कोई आदिवासी खुले में शौच के लिए नहीं जाता है और न ही किसी आदिवासी को जंगल में खाने की तलाश करने की जरूरत है. आदिवासी बच्चियों के लिए शिक्षा का रास्ता खुल गया है तो युवा आदिवासियों को रोजगार मिलने लगा है. 
बेहद ही गरीबी में पले बढ़े मंगल सिंह ने कभी सोचा भी नही था कि एक दिन वह खुद की मोटर साइकिल चलायेगा और तीर धनुष की जगह उसके हाथों में मोबाइल रहेगा। घर में कलर टीवी रखेगा और आराम से अपना जीवन बितायेगा। उसे तो लगता था कि बड़े होकर उसे भी हाथों में तीर कमान पकडक़र जंगल में चार,तेंदू तोडऩे, महुआ बीनने जाना पड़ेगा।  जब तक हाथ में कोई नौकरी नही थी,पहाड़ी कोरवा मंगल का दिन जंगलों में घूमते फिरते गुजरता था। लेकिन छत्तीसगढ़ शासन द्वारा पहाड़ी कोरवाओं सहित राज्य के विशेष पिछड़ी जनजाति पांचवीं और आठवीं पास युवकों को चतुर्थ श्रेणी पद पर शासकीय नौकरी देने की पहल ने  कोरबा जिले के अनेक पहाड़ी कोरवाओं की तस्वीर और तकदीर ही बदल दी। शासकीय सेवा में आने के साथ ही इनके जीवनयापन का तरीका तो बदला ही, जंगलों के आसपास रहने की वजह से अपना पूरा दिन जंगल में ही इधर उधर घूम-फिरकर  बिताने की मानसिकता भी बदल गई। शिक्षा एवं विकास की मुख्यधारा से दूर रहने की सदियों से बनी एक तरह की धारणा इनके दिमाग से दूर होने के साथ-साथ नौकरी ने इन्हें और आगे बढऩे के लिये प्रेरित किया। अब नौकरी मिलने के बाद आठवी पास पहाड़ी कोरवा मंगल सिंह खुद भी इस साल दसवी की परीक्षा दे रहा है और अपने सभी बच्चों को रोजाना स्कूल भेजता है। परिवार को भी खुशहाल रखता है।
कोरबा विकासखंड के वनांचल ग्राम आंछीमार में रहने वाले 15 सदस्यों दो पहाड़ी कोरवा भाईयों ने अपने परिवार के लिए तय किया भले ही कुछ कमरे न बन पाये,लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी शौचालय है। पहाड़ी कोरवा भाईयों ने लगभग 40 हजार रूपये खर्च कर अपने ही घर के पीछे शौचालय का निर्माण कराया। परिवार के सभी सदस्य अब इस शौचालय का उपयोग करते है। गांव में पहाड़ी कोरवा परिवार की इस सोच ने कुछ अन्य लोगों को भी सीख दी है। कुछ परिवार है जो स्वयं के पैसे से अपना घर संवारने के साथ ही शौचालय निर्माण भी करा रहे है। बहोरन सिंह ने बताया कि कुछ समय पष्चात भले ही सरकार की ओर से नि:शुल्क में शौचालय बन जाता,लेकिन हमने इंतजार नही किया। शौचालय के महत्व को जानने के बाद उसे भी आभास हुआ कि सचमुच शौचालय तो हर घर में बहुत जरूरी है। उसने अपने भाई से बात किया और दोनों ने शौचालय निर्माण में आने वाले खर्च को बराबर हिस्से में बांट कर काम शुरू कराया। आज घर परिवार के सभी सदस्य उस शौचालय का उपयोग करते है।
      पहाड़ी कोरवा परिवारों की जिंदगी गुलाबी गुलाबी हो गई है. अन्त्योदय गुलाबी राशन कार्ड ने इनकी जिंदगी के मायने ही बदल दिए हैं. एक समय वह भी था जब हर दिन खानाबदोश की तरह भोजन की तलाश में पहाड़ी कोरवा परिवारों को भटकना पड़ता था। आज वे आराम से अपने घरों में रहते हैं. आज इस गुलाबी राशन कार्ड से सभी पहाड़ी कोरवा परिवारों को एक रूपये की दर से प्रतिमाह 35 किलो चावल मिल जाता है। इससे घर के चूल्हे भी जल जाते हैं और भूखे पेट सोने की नौबत भी नहीं आती। शासन ने इनकी सुध ली। एक स्थान पर ही ठहराव के लिए आशियाना बनाकर दिया। शिक्षा से जोडऩे स्कूल खोले। आंगनबाड़ी खोला गया। अंधेरा दूर करने के लिए जहां तक संभव था सडक़, बिजली पहुंचाई गई और दुर्गम इलाकों में सौर उर्जा के माध्यम से इनके बसाहटों को रोशन किया गया। आर्थिक रूप से कमजोर कोरवाओं को बचत से जोडऩे एवं कम कीमत पर चावल उपलब्ध कराकर इनके आर्थिक बोझ को कम करने की दिशा में शासन द्वारा सभी कोरवा परिवारों का अन्त्योदय गुलाबी राशन कार्ड बनाया गया है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2012 अन्तर्गत प्रत्येक माह के 7 तारीख को चावल उत्सव के समय 1 रूपये की दर से 35 किलो चावल दिया जाता है। ग्राम छातासरई के पहाड़ी कोरवा पाकाराम ने बताया कि अभी भी अनेक कोरवा हैं जो जंगल जाते हैं। इंदिरा आवास बनाये जाने से अब निश्चित ठिकाना बन गया है, पहले तो बस भटकते रहते थे। उसने बताया कि वे हर माह उचित मूल्य की दुकान में एक रूपए चावल नि:शुल्क दिए जाने वाले अमृत नमक और कम कीमत पर मिलने वाले शक्कर, मिट्टी तेल, चना के पैकेट लेने नीचे आते हैं।
उच्च शिक्षा की राह में अग्रसर हुई पहाड़ी कोरवा छतकुंवर की उड़ान अब चाहे जहां पर थमे। लेकिन उसके इस कदम से कोरवा जनजातियों की उन बालक-बालिकाओं को भी आगे पढ़ाई करने की प्रेरणा मिलेगी जो पांचवीं,आठवीं पढऩे के बाद बीच में ही अपना स्कूल जाना छोड़ देते हंै। लंबे समय तक उच्च शिक्षा से दूर कोरवा समाज की इस बेटी ने 12वीं पास कर कालेज की दहलीज को छुआं है। छात्रा छतकुंवर ऐसे छात्रों के लिये एक मिसाल भी है। इनके पिता बहोरन सिंह ने सिर्फ कक्षा पांचवीं तक ही पढ़ाई किया है। इस गांव से स्कूल की दूरी 6 किलोमीटर और कालेज की दूरी 7 किलोमीटर है। पहाड़ी कोरवा छात्रा कु. छतकुंवर जब हाई स्कूल पहुंची तो मुख्यमंत्री सरस्वती साइकिल योजना के तहत उसे नि:शुल्क साइकिल मिली थी। उस साइकिल से बारहवीं तक की अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्रा छतकुंवर अब उसी साइकिल से कालेज भी जाने लगी है। आगे पढऩे और आगे बढऩे की ललक ने छात्रा को जहंा कालेज तक पहुंचाया वहीं सरस्वती साइकिल योजना से स्कूल में मिली नि:शुल्क साइकिल से कालेज का सपना भी पूरा हो रहा है।
यह बदलाव कागज पर नहीं है बल्कि सच का बदलाव है. मंगल हो या छतकुंवर, सबकी जिंदगी बदल रही है क्योंकि सरकार ने इनके प्रति अपनी सोच बदली तो जिंदगी बदल बदल सी गई है. पहाड़ी कोरवा समाज की जिंदगी में बदलाव एक समुदाय की जिंदगी में बदलाव नहीं बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में बदलाव की बयार है.

रविवार, 20 मार्च 2016

मेरी नई किताब "कम्युनिटी रेडियो"

नई दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक अख़बार "शुकवार" में मेरी नई किताब "कम्युनिटी रेडियो" की समीक्षा प्रकाशित हुई है. आभारी हु संजय जी का जिन्होंने खूबसूरत समीक्षा लिखी। शुक्रिया "शुकवार".

शनिवार, 12 मार्च 2016

तारीख बेमिसाल

 मार्च : पहली बोलती फिल्म आलम आरा के बरक्स

-मनोज कुमार
हर दिन गुजरने के साथ तारीख बदल जाती है. यह क्रम हमारे जीवन में नित्य चलता रहता है किन्तु कुछ तारीखें बेमिसाल होती हैं. बेमिसाल होने के कारण इन तारीखों को हम शिद्दत से याद करते हैं. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ऐसी कई तारीखें हैं जो हमें रोमांचित करती हैं तो आपातकाल की वह तारीख भी हमें भूलने नहीं देती कि किस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नकेल डाला गया था. इन सबसे इतर यहां पर हम उन बेमिसाल तारीखों का जिक्र कर रहे हैं जिन तारीखों ने हमारे सांस्कृतिक वैभव को लगातार उन्नत किया है. दादा साहेब फाल्के ने भारत में सिनेमा की शुरूआत कर एक नई विधा को जन्म दिया. आरंभिक दिनों में सिनेमा में काम करना बहुत अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था किन्तु सौ साल से अधिक समय गुजर जाने के बाद सिनेमा की समाज में स्वीकार्यता न केवल कला विधा के रूप में हुई बल्कि रोजगार की दृष्टि से भी इसे मंजूर किया गया.
दादा साहेब फाल्के ने सफर मूक सिनेमा से भारत में इसकी शुरूआत की थी लेकिन थोड़े समय में ही मूक सिनेमा को आवाज मिल गई. इस कड़ी में पहली बोलती फिल्म के रूप में भारतीय सिनेमा के इतिहास में ‘आलमआरा’ का नाम दर्ज हो गया. भारतीय सिनेमा के इतिहास में तारीख 14 मार्च बेमिसाल तारीख के रूप में दर्ज हो गई. साल कोई भी हो किन्तु 14 मार्च को हम कभी भूल नहीं पाएंगे. यह तारीख सिनेमा से वास्ता रखने वालों, सिनेमा के विद्यार्थियों और सिनेमा के शोधार्थियों के लिए खास मायने रखता है. सौ साल पहले जब भारत में सिनेमा का आरंभ हुआ था, तब किसी को इस बात का इल्म भी नहीं था कि समूचे संसार में सबसे ज्यादा फिल्म निर्माण करने वालों में भारत गिना जाएगा. आज फिल्म निर्माण की दृष्टि से सबसे आगे हैं. यह हमारे लिये गौरव की बात है. 
सौ साल से ज्यादा का सफर तय कर चुके भारतीय सिनेमा के विविध रंग हैं. विषयों को लेकर उसके पास अपार संभावनाएं हैं क्योंकि भारत की छवि अनेकता में एकता की है. बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले भारतीय फिल्मकार समय-काल के अनुरूप फिल्मों का निर्माण करते रहे हैं. भारत में सिनेमा आरंभिक दिनों में धार्मिक विषयों पर केन्द्रित रहा. विविधता भारतीय सिनेमा की खासियत है. लगभग हर दस साल में सिनेमा के विषयों में परिवर्तन होता रहा है. समय-काल के अनुरूप विषयों का चयन करना और समाज को सचेत करने का काम सिनेमा करता रहा है.
भारतीय सिनेमा के सामाजिक सरोकार का केनवास बहुत विस्तार लिए हुए है. इस बात से इंकार नहीं कि दिन प्रति दिन विकसित होते भारत में शिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी जड़मूल समस्या के रूप में विद्यमान है. जैसा कि हम पत्रकारिता में पढ़ते हैं कि पत्रकारिता के तीन मूल ध्येय हैं-1. शिक्षा, 2. सूचना तथा 3. मनोरंजन. सिनेमा भी इन तीन ध्येय को अपने समक्ष रखकर फिल्म का निर्माण करता है. स्मरण करना होगा कि पहले की फिल्मों में भारत की गरीबी और अशिक्षा के साथ बेरोजगारी का चित्रण हुआ करता था. भारतीय सिनेमा की माइलस्टोन फिल्म ‘मदर इंडिया’ में गरीबी का जितना मार्मिक ढंग से चित्रण हुआ है, वह अविस्मरणीय है. साथ ही गरीबी के साथ आत्मसम्मान के साथ जीना भारत की मिट्टी की खासियत है, इस बात का भी बखूबी चित्रण किया गया है. सायस या अनायस इस बात का भी चित्रण किया गया है कि अंग्रेज शोषकों के भारत से विदा हो जाने के बाद शोषण का सिलसिला खत्म नहीं हुआ बल्कि हमारे अपने लोग, अपनों का शोषण करते रहे. 
शोमेन पुकारे जाने वाले राजकपूर की फिल्मों में सामाजिक रूढिय़ों पर आघात किया जाता रहा है किन्तु कई बार राजकपूर विद्रोही भूमिका में भी दिखते हैं. गरीबी उनकी फिल्मों का विषय रहा है और इसी गरीबी के कारण वे विद्रोही भी हो जाते हैं. दृष्टव्य है उनका एक डॉयलाग- ‘जब रोटी मांगने से ना मिले तो छीन लो’. यही राजकपूर दस्यु के आत्मसमर्पण पर फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ का निर्माण करते हैं तो ‘प्रेमरोग’ में वे विधवा विवाह की पैरवी करते हैं. ‘मेरा नाम जोकर’ में वे जीवन के कई रंगों को इतनी सहज ढंग से व्यक्त करते हैं कि बरबस आंखें भीग जाती हैं. उनकी फिल्मों पर चर्चा के लिए पूरे खंड की आवश्यकता होगी किन्तु अभी चर्चा संक्षिप्त में ही.
भारतीय सिनेमा की विषय-वस्तु में साहित्य का पक्ष कभी कमजोर नहीं रहा. मुंशी प्रेमचंद की कहानियों पर फिल्म का निर्माण हुआ किन्तु वह लोकप्रिय नहीं हो सका. कथा सम्राट अपनी कृतियों में हस्तक्षेप नहीं चाहते हैं जबकि सिनेमा बिना हस्तक्षेप कार्य कर नहीं सकता है. प्रेमचंद के बाद के कई नामचीन साहित्यकारों की कृतियों पर फिल्मों का निर्माण हुआ और वे लोकप्रिय भी हुईं. हालांकि जिन साहित्यिक कृतियों पर फिल्मों का निर्माण हुआ, उनमें ज्यादतर बांग्ला साहित्य था. कुछ अंग्रेजी साहित्यकारों, नाट्यकृतियों के साथ ही मराठी, गुजराती और दक्षिण के साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनी किन्तु हिन्दी साहित्यिक कथाओं पर फिल्मों का निर्माण कम ही हुआ.
भारतीय सिनेमा के इतिहास में आलमआरा का उल्लेख पहली बोलती फिल्म को लेकर है तो आहिस्ता आहिस्ता भारतीय सिनेमा तकनीकि दृष्टि से समृद्ध होता चला गया. 70 के दशक तक हम सिनेमास्कोप में फिल्में देखते थे और यह भी हमारे लिए एक सुखद अनुभव था. रंगीन फिल्मों का निर्माण होने लगा था. साल 75 भारतीय सिनेमा के लिए एक और यादगार साल के रूप में जाना जाएगा. इस साल भारतीय सिनेमा ने तकनीक की दृष्टि से बड़ी छलांग लगाकर 70 एमएम स्क्रीन पर फिल्म दिखाने की शुरूआत की थी. साल 75 की अविस्मरणीय फिल्म ‘शोले’ थी. यानि एक तरफ हम 70 एमएम पर्दे पर आनंद ले रहे थे और दूसरी तरफ ड्रामा फिल्म शोले का आनंद.
इसके बाद तकनीक की दृष्टि से हम और मजबूत तथा समृद्ध होते चले गए. संभवत: 80 के दशक में पहली थ्रीडी फिल्म ‘छोटा चेतन’ पर्दे पर उतरी थी. भारतीय दर्शकों लिए यह रोमांच से भरी हुई फिल्म थी.  सिनेमा की टिकट के साथ कुछ अतिरिक्त पैसे लेकर थ्रीडी चश्मे दिये जाते थे और फिल्म देखते हुए हर दृश्य के साथ दर्शक अपने शरीर का मूवमेंट किया करता था.  छोटा चेतन के बाद इस तरह की फिल्मों का दौर ठहर गया. हालांकि तकनीकि दृष्टि से अनेक प्रयोग देखने को मिलते हैं.
नई सदी में भारतीय सिनेमा जब अपने जन्म के सौ साल पूरे कर रहा था, तब नए दौर का नया सिनेमा अपनी नयी पटकथा लिखने में व्यस्त था. सिनेमा की हर विधा मेें नयापन था. ‘दीवार’ फिल्म से एंग्रीमैन के रूप में अमिताभ सरीखा गुस्सैल नायक परदे पर उतर चुका था तो नई सदी में मदर इंडिया को छोडक़र खुद के फ्रिकमंद नायिका फैशन, कम्पनी और डर्टी पिक्चर में नए रूप में मौजूद थी. 
सिनेमा हॉल की सूरत भी बदलने लगी थी. मल्टीप्लेक्स के दौर में लोअर, अपर और बालकनी का कांसेप्ट पीछे छूट गया था. चार आने पैसे की टिकट वाली फिल्में अब दो और पांच सौ में देखने को उपलब्ध थी. अब न तो फिल्में रूकती थी और न दर्शकों को पसीने से सराबोर होना पड़ता था. लाईट बंद हो जाने पर पंखे के लिए शोर मचाने के साथ ही हर दृश्य पर सीटी बजाना और पैसे फेंकने का रिवाज भी लगभग खत्म हो चला था. नए दौर के इन सिनेमाहॉल में कोई दर्शक न तो गरीब था और न ही अमीर. मल्टीप्लेक्स सिनेमा हॉल समाजवाद की नयी परिभाषा गढ़ रही थीं. छोटा चेतन की याद दिलाती सिनेमा हॉल अब थ्रीड और फोरडी में बदल चुकी हैं. हालांकि छोटा चेतन का यह कोई मुकाबला नहीं कर सकती हैं क्योंकि वह पूरे समय की फिल्म थी और इनकी अवधि 20-22 मिनट के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाती हैं.
भारतीय सिनेमा के इस नए दौर में तकनीकि रूप से समृद्ध कई बड़ी फिल्मों का आगाज हुआ. रोबोट, कृश, धूम और इसके बाद बाहुबली जैसी फिल्में आयी. ये फिल्में कथानक के तौर पर शायद कमजोर हों लेकिन तकनीकि दृष्टि से बेहद सम्पन्न थीं. इस दौर में विषय को लेकर एक बड़ा परिवर्तन दिखा और अनिवासी भारतीय लोगों को लेकर फिल्में बनी. इस तरह की फिल्में एक तरह की फ्यूजन फिल्में थी जिसमें यूरोप और भारतीय संस्कृति को मिक्स कर बनायी गयी थी. अपने रिलीज के दौरान बेशक इन फिल्मों ने बिजनेस अच्छा किया लेकिन छाप छोडऩे में कामयाब नहीं हो पायीं. जिस तरह आज के दौर में भी हम मदर इंडिया, दो बीघा जमीन, सुजाता, दो आंखें बारह हाथ, कागज के फूल, बंदिनी, मुगले आजम, शतरंज के खिलाड़ी आदि-इत्यादि फिल्मों को मिसाल के तौर पर स्मरण करते हैं तब यह फिल्में कहीं नहीं ठहरती हैं.
1912-2016 के समय में परिवर्तन को परखते हैं तो पाने की खुशी कम नहीं है तो खोने का अफसोस भी है. बदलाव तो होना था लेकिन विश्व सिनेमा मंच पर हम बार बार बेदखल किए जाते हैं, यह रंज भरा है. यह इसलिए भी कि भारतीय सिनेमा समृद्ध होने के बाद भी ऑस्कर पाने की ललक में बैठा हुआ है. हम विषयगत फिल्मों का निर्माण करते हैं तथा भारतीय सिनेमा सामाजिक सरोकार की विधा है अत: हम अपने समाज की समस्याओं को उकेरते हैं और समाधान तलाशने की कोशिश करते हैं. कला की दृष्टि से यह फिल्में उत्कृष्ट होती हैं और ऑस्कर की लालच में हम जोर लगाते हैं. जिन अंग्रेजों ने सैकड़ों साल हम पर राज किया, उनकी देहरी में हम अपनी कला को सराहने और पुरस्कृत कराने की चाह में पंक्तिबद्ध रहते हैं और वे हैं कि हमारी कला को तो समझने का प्रयास नहीं करते अपितु हमारे देश की गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी को मजाक बनाते हैं. इसके कई उदाहरण हैं और कई बार हमें निराश होना पड़ा है. 14 मार्च को जब हम अपने गौरवशाली इतिहास का स्मरण कर रहे हैं तब हमें इस बात का भी संकल्प लेना चाहिए कि आगे जब हम भारतीय सिनेमा के डेढ़ सौ साल मना रहे होंगे तब भारतीय सिनेमा के पास एक ऐसा मंच हो जहां हॉलीवुड अपनी फिल्म लेकर हमारे पास कतारबद्ध हो और उसे लगे कि एक बार ही सही, दादा साहेब फाल्के अवार्ड उनकी फिल्मों को मिल जाए. सच मानिए, भारतीय सिनेमा ने अपने छोटे से सफर में जितनी ऊंचाई पायी है और वह ऐसा करने में कामयाब हो गया तो एक और बेमिसाल तारीख पर हम चर्चा कर सकेंगे. 

रविवार, 6 मार्च 2016

सहिष्णुता मीडिया का गुण-धर्म


मनोज कुमार
समाज में जब कभी सहिष्णुता की चर्चा चलेगी तो सहिष्णुता के मुद्दे पर मीडिया का मकबूल चेहरा ही नुमाया होगा. मीडिया का जन्म सहिष्णुता की गोद में हुआ और वह सहिष्णुता की घुट्टी पीकर पला-बढ़ा. शायद यही कारण है कि जब समाज के चार स्तंभों का जिक्र होता है तो मीडिया को एक स्तंभ माना गया है. समाज को इस बात का इल्म था कि यह एक ऐसा माध्यम है जो कभी असहिष्णु हो नहीं सकता. मीडिया की सहिष्णुता का परिचय आप को हर पल मिलेगा. एक व्यवस्था का मारा हो या व्यवस्था जिसके हाथों में हो, वह सबसे पहले मीडिया के पास पहुंच कर अपनी बात रखता है. मीडिया ने अपने जन्म से कभी न्यायाधीश की भूमिका नहीं निभायी लेकिन न्याय और अन्याय, सुविधा और सुरक्षा, समाज में शुचिता और देशभक्ति के लिए हमारे एक ऐसे पुल की भांति खड़ा रहा जो हमेशा से निर्विकार है, निरपेक्ष है और स्वार्थहीन. यह गुण किसी भी असहिष्णु व्यक्ति, संस्था या पेशे में नहीं होगा. इस मायने में मीडिया हर कसौटी पर खरा उतरता है और अपनी सहिष्णुता के गुण से ही अपनी पहचान बनाये रखता है.
मीडिया की सहिष्णुता के गुण को समझने के लिए थोड़ा विस्तार की जरूरत होगी. पारम्परिक संचार माध्यमों से उन्नत होते हुए मीडिया आज हथेलियों पर आ चुका है. मीडिया की उन्नति समाज के किसी और पेशे के लिए ईष्या का कारण हो सकती है क्योंकि तकनीक के विकास के साथ आज तक कोई ऐसी चिकित्सा पद्धति नहीं बन सकी जो चलते-फिरते आपका दर्द दूर कर सके, कोई तकनीक नहीं कि कोई इंजीनियर हथेली पर रखे यंत्र से निर्माण कार्य को अंजाम दे सके या कोई ऐसी तकनीक पुलिस व्यवस्था के पास नहीं आ पायी है जिससे अपराध पर नियंत्रण पाया जा सके. तकनीक तो न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के पास भी नहीं है कि वह हथेली पर रखे यंत्र से अपने कार्य और निर्णय को समाज तक पहुंचा सके. केवल एकमात्र मीडिया है जो हथेली पर रखे यंत्र से समाज में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन पहुंचाने में कामयाब होता है. यह मीडिया की ताकत है कि वह उन सूचनाओं को नेपथ्य में ढकेल देता है जिससे समाज की शुचिता बाधित होती है. यह मीडिया ही है जो लाखों किलोमीर बसे लोगों को एक-दूसरे से जोड़ता है और उनके अच्छे कामों से समाज को परिचित कराता है. शासन और सरकार लाखों योजनाएं बना लें लेकिन मीडिया के बिना समाज से जुड़ जाने की कोई विधा सरकार के पास नहीं है. जनहित की सूचनाओं को लोगों तक तटस्थ भाव से पहुंचाने का काम मीडिया ही करता है. 
समाज के चौथे स्तंभ का दर्जा पाये मीडिया को अपनी जवाबदारी का अहसास है इसलिए वह पूरी सहिष्णुता के साथ अपने दायित्व की पूर्ति के लिए हमेशा तत्पर रहता है. मीडिया सहिष्णुता के कई आयाम हैं. प्राकृतिक आपदाओं के समय जब लोग डरे-सहमे अपने घरों में संशय में जी रहे होते हैं तब मीडिया अपनी जान की परवाह किए बिना तूफान हो या प्लेग, भूकंप हो जलजला, घटनास्थल पर पहुंच कर समाज को राहत देने की कोशिश करता है. अपनी जान की परवाह किए बिना, अपने परिवार से बेखबर समाज की चिंता में मीडिया उन खबरों पर हाथ डालने से भी नहीं चूकता जिनसे रसूखदारों को बेनकाब करना होता है. यह सब संभव हो पाता है कि मीडिया के सहिष्णुता के कारण. अपवाद को छोड़ दें तो मीडिया कभी अतिरेक में नहीं बहता. वह संयमित रहता है लेकिन मीडिया का रोमांच उसकी सक्रियता का सबब है. 
निरपेक्ष और नि:स्वार्थ भाव से समाज और देश के लिए जुटे रहने वाला मीडिया हमेशा सवालों से घिरा रहता है. समाज का मीडिया पर इतना अधिक विश्वास है कि वह मीडिया की मानवीय भूल के कारण भी होने वाली एक गलती को बर्दाश्त नहीं कर पाता है. समाज की अपेक्षाएं इस कठिन समय में अगर किसी से शेष रह गयी है तो वह मीडिया है. उसे एक डाक्टर से इस बात की अपेक्षा नहीं है कि जो डाक्टर इस बात की शपथ लेता है कि वह नि:स्वार्थ रूप से समाज की भलाई के लिए कार्य करेगा लेकिन आए दिन आने वाली खबरें बताती है कि क्या हो रहा है. एक इंजीनियर से भी वह निराश है. अनेक दुर्घटनाओं का कारण उसके द्वारा बनायी गई घटिया पुल और पुलिया है जो अचानक टूट जाती हैं जिससे अकारण अनेक लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं. नेता और प्रशासन भी समाज के लिए बहुत उत्साह का भाव पैदा नहीं करते हैं. अक्सर वे चर्चा में इन्हें अपनी विश्वास की प्राथमिकता में नहीं रखते हैं किन्तु जब बात मीडिया की आती है तो सर्वाधिक शिकायतें मीडिया से होती है. सहिष्णु मीडिया के लिए समाज का यह भाव स्थायी पूंजी है. जब जब मीडिया की आलोचना होती है, समाज जब तब उस पर अविश्वास का भाव जताता है, वह असहिष्णु नहीं होता है और ना ही अपनी आलोचना से घबराता है. समाज की आलोचना ही मीडिया की असली ताकत है. इस आलोचना के कारण ही उसे बेहतर करने के लिए ऊर्जा मिलती है. समाज जब मीडिया पर अविश्वास जताता है तो मीडिया फोरम पर इसकी चर्चा होती है और चिंता की जाती है कि हम अपनी इस कमजोरी को कैसे दूर करें. समाज ऊपर उल्लेखित प्रोफेशन पर भी अविश्वास जताता है लेकिन ये लोग इसकी फ्रिक नहीं करते हैं और ना ही किसी फोरम में इस पर चर्चा करते दिखते हैं.
इनकी बेपरवाही का मूल कारण इनके भीतर की असहिष्णुता है और इस असहिष्णुता के मूल में है साधन जबकि मीडिया के पास सहिष्णुता इसलिए है कि उसके पास न्यूनतम साधन हैं किन्तु साध्य एक ही है देश और समाज कल्याण. इस बात का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है कि हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय संगठन इस बात का आंकड़ा जारी करते हैं कि अपने कार्य को अंजाम देते हुए हर वर्ष सैकड़ों की संख्या में मीडिया साथी मौत के घाट उतार दिए जाते हैं. यह अलग तरह का पैशन है जहां मौत डराती नहीं है बल्कि साहस जगाती है और दूसरे साथी उस काम को करने के लिए जुट जाते हैं. यह सब कुछ संभव होता है मीडिया की सहिष्णुता से. असहिष्णु होकर आप बदला लेने पर उतारू हो जाते हैं. आपका लक्ष्य बदल जाता है लेकिन मीडिया के पास रिवेंज का कोई रास्ता नहीं होता है. वह गलत को गलत कहने में नहीं चूकता है तो सही की तारीफ करने में भी वह गुरेज नहीं करता है. सहिष्णुता मीडिया का गुण-धर्म है और अपने इसी गुण-धर्म की वजह से वह समाज का चौथा स्तंभ कहलाता है. आखिर में अपने अनुभव के साथ मैं यह कह सकता हूं कि इस समाज में दो तरह के सैनिक हैं एक वह जो सीमा पर खड़े होकर देश की रक्षा करता है तो दूसरा मीडिया जो समाज के बीच रहकर समाज में शुचिता बनाये रखने का कार्य करता है. दोनों सैनिकों का गुण है सहिष्णुता.मोबा. 9300469918

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

अपना -अपना सा लागे हैं शिवराजसिंह

-मनोज कुमार 

शिवराजसिंह चौहान को आप किस रूप में देखते हैं? यह सवाल आपसे पूछा जाए तो स्वाभाविक रूप से जवाब होगा कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में लेकिन इससे आगे आपसे पूछा जाए कि एक आम आदमी के रूप में क्यों नहीं तो जवाब देने में थोड़ा वक्त लग सकता है. इस सवाल का जवाब देने में वक्त लगना स्वाभाविक है क्योंकि जिस कालखंड में हम जी रहे हैं अथवा पिछला समय हमने जो गुजारा है, उसमें व्यक्ति को उसके गुणों से नहीं बल्कि उसके पद और पद की हैसियत से पहचाना है. स्वाभाविक है कि शिवराजसिंह चौहान की पहचान एक मुख्यमंत्री के रूप में है और इतिहास के पन्नों में भी उन्हें इसी पहचान के साथ दर्ज किया जाएगा लेकिन सच तो यह है कि अपना सा लगने वाला यह मुख्यमंत्री हमारे बीच का, आज भी अपना सा ही है. शिवराजसिंह के चेहरे पर तेज है तो कामयाबी का लेकिन मुख्यमंत्री होने का गरूर नहीं, चेहरे पर राजनेता की छाप नहीं. सत्ता के शीर्ष पर बैठने की उनकी कभी शर्त नहीं रही बल्कि उनका संकल्प था प्रदेश की बेहतरी का. वे राजनीति में आने से पहले भी आम आदमी की आवाज उठाने में कभी पीछे नहीं रहे. वे किसी विचारधारा के प्रवर्तक हो सकते हैं लेकिन वे संवेदनशील इंसान है. एक ऐसा इंसान जो अन्याय को लेकर तड़प उठता है और यह सोचे बिना कि परिणाम क्या होगा, अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने निकल पड़ता है. बहुतेरों को यह ज्ञात नहीं होगा कि शिवराजसिंह चौहान मजदूरों को कम मजदूरी मिलने के मुद्दे पर अपने ही परिवार के खिलाफ खड़े हो गए थे. शिवराजसिंह चौहान का यह तेवर परिवार को अंचभा में डालने वाला था. मामूली सजा भी मिली लेकिन उन्होंने आगाज कर दिया था कि वे आम आदमी के हक के लिए आवाज उठाते रहेंगे.
शिवराजसिंह चौहान उन बिरले मुख्यमंत्रियों में से एक होंगे जिनके कांधे पर हाथ रखकर सैकड़ों लोग मिल जाएंगे यह कहते हुए कि शिवराज हमारे साथ पढ़े हैं. ‘शिवराज हमारे साथ पढ़े हैं’, इसमें अपनापन तो है लेकिन एक भाव यह भी कि देखो हमारे साथ पढ़ा विद्यार्थी, हमारा दोस्त शिवराजसिंह आज मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री है. थोड़े से लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि ‘हम शिवराजसिंह के साथ पढ़े हैं’ं और थोड़े से लोग होंगे जो कहते मिल जाएंगे-‘शिवराजसिंह और हम साथ पढ़े हैं.’ शिवराजसिंह के साथ सहपाठी होने की यह गर्वानुभूति सालों गुजर जाने के बाद हो रही है तो इसलिए कि शिवराजसिंह चौहान जब भोपाल के अपने स्कूल ‘मॉडल स्कूल’ में जाते हैं तो मुख्यमंत्री बनकर नहीं, स्कूल के एक पुराने विद्यार्थी की तरह. शिक्षकों का चरण स्पर्श करना नहीं भूले. सहपाठियों को नाम से याद रखना और उन्हें संबोधित करना उनकी सादगी की एक झलक है.
1956 में जब नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ और समय-समय पर मुख्यमंत्री बदलते रहे. हर मुख्यमंत्री की अपनी शैली थी. काम करने से लेकर जीवन जीने तक. लगभग सभी मुख्यमंत्री कुछ अलग दिखना चाहते थे या लोगों ने उन्हें वैसा प्रस्तुत करने की कोशिश की लेकिन 2005 में मुख्यमंत्री के इस परम्परागत चेहरे के विपरीत सादगी भरा एक चेहरा नुमाया हुआ शिवराजसिंह चौहान का. संसद से विधानसभा और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद भी उन्होंने अपने लिए कोई बनावट नहीं की. उनकी बुनावट इतनी मोहक थी कि कभी पांव पांव वाले भइया के नाम से मशहूर शिवराजसिंह मामा के नाम से मशहूर हो गए. ऐसा नहीं है कि शिवराजसिंह चौहान पहले मुख्यमंत्री हों जिन्हें विशेषण दिया गया बल्कि लगभग हर मुख्यमंत्री को उनकी कार्यशैली और उनके तेवर के अनुरूप विशेषण मिलता रहा है. कोई राजा-महाराजा कहलाए तो किसी को संवेदनशील होने का विशेषण दिया गया. संत और साध्वी के रूप में मध्यप्रदेश की सत्ता सम्हालने वाले भी थे लेकिन लगातार 11 वर्षांे से सत्ता के शिखर पर बैठे शिवराजसिंह चौहान की सादगी चर्चा में रही.
शिवराजसिंह चौहान की सादगी भारतीय राजनीति में उन्हें अलग तरह से रखती है. आमतौर पर मुख्यमंत्री बनते ही सलाहकारों की भीड़ उमड़-घुमड़ पड़ती है. ये सलाहकार उन्हें ‘आम’ से ‘खास’ बनाने में जुट जाते हैं और उनके इर्द-गिर्द एक ऐसा घेरा बना दिया जाता है कि आम आदमी के लिए वे सत्ता पुरुष बनकर रह जाते हैं. शिवराजसिंह चौहान ने ऐसे सलाहकारों से खुद को दूर रखा.  ‘आम’ से ‘खास’ बनने में उनकी कोई रूचि नहीं रही सो वे जैसा थे, वैसा ही बना रहना चाहते हैं. लगभग हर जगह वे अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ पायजामा-कुरता में मिलेंगे. ऐसा नहीं है कि अपनी वेशभूषा के प्रति वे सर्तक ना हों. वे जब नेशनल मीडिया के कांफ्रेंस में जाते हैं तो गलाबंद सूट पहनते हैं या फिर यह सूट जब ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट में उद्योगपतियों से रूबरू होते हैं तब आप देख सकते हैं. यह पहनावा दिखावा नहीं है बल्कि अवसर की जरूरत है और इससे परहेज नहीं किया जा सकता है. इससे इतर एक और ड्रेस उनका अपना प्रिय है जिसमें वे निहायत एक आदमी की तरह टीशर्ट और फुलपेंट में दिख जाते हैं. यह उनका प्रिय लिबास है जब वे सत्ता से अवकाश पर होते हैं. परिवार के साथ होते हैं. हनुवंतिया के सैर-सपाटे के लिए परिवार के साथ गए शिवराजसिंह चूल्हे पर चाय बनाते हुए सोशल मीडिया में दिखे. जिसने देखा, वह हौले से मुस्करा दिया. तामझाम और शोशेबाजी के इस आधुनिक दौर में शिवराजसिंह की यह सादगी उन्हें औरों से अलग, बिलकुल अलग बनाती है.
शिवराजसिंह की सादगी का आलम यह है कि वे गांव-देहात के दौरे के समय धूल भरी सडक़ में अपने लोगों के साथ बैठने में कोई हिचक नहीं करते हैं. आलम तो यह है कि जब वे सडक़ निर्माण का औचक निरीक्षण के लिए पहुंचते हैं और बताते हैं कि वे मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान हैं तो मजदूर उन्हें पहचानने से इंकार कर देते हैंं. इस वाकये से शिवराजसिंह के चेहरे पर गुस्से का भाव नहीं आता है बल्कि वे हंसी में लेते हैं. साथ चल रहे अफसरों को कहते हैं चलो, भई यहां शिवराज को कोई पहचानता नहीं. क्या यह संभव है कि एक मुख्यमंत्री को उसकी जनता पहचानने से इंकार करे और वह निर्विकार भाव से लौट आए? यह सादगी शिवराजसिंह में मिल सकती है. उनके इन्हीं अनुभवों ने उन्हें आम आदमी से जोडऩे के लिए कई तरह के जतन करने का उपाय भी बताया. इन्हीं में से एक मुख्यमंत्री आवास पर होने वाली विभिन्न वर्गों की पंचायत रही है. कभी मुख्यमंत्री आवास आम आदमी के लिए तिलस्म सा था. बाहर से लोग अंदाज लगाया करते थे कि अंदर क्या क्या होगा लेकिन जब आम आदमी को मुख्यमंत्री आवास से बुलावा आया तो यह तिलस्म टूट गया. मध्यप्रदेश की राजनीति में यह शायद पहला अवसर होगा जब कोई मुख्यमंत्री अपने आवास में हर पर्व और हर उत्सव सेलिब्रेट कर रहा है. 
शिवराजसिंह की सादगी के यह उद्धरण वह हैं जिसकी गवाही पूरा मध्यप्रदेश दे रहा है. हां, यह बात भी तय है कि जब आप शिवराजसिंह चौहान को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में जांचते हैं, परखते हैं तो एक राजनेता के रूप में कुछ कमियां आप को दिख सकती हैं. कुछ फैसले सबके मन के नहीं होते हैं और इस बिना पर आप उन्हें घेरे में ले सकते हैं लेकिन एक आदमी से जब आप सवाल करेंगे तो उनका जवाब होगा कि अपना अपना सा लगने वाला यह शिवराज हमारा मुख्यमंत्री है और हमें ऐसा ही मुख्यमंत्री चाहिए. शिवराजसिंह चौहान अपनी उम्र के एक और कामयाब साल पूरे करने जा रहे हैं. हर साल की माह मार्च की 5 तारीख उनके जीवन के लिए सौभाग्य की तारीख हो और वे चिरजीवी हों, यह मंगलकामना मध्यप्रदेश की है क्योंकि मध्यप्रदेश 5 मार्च शिवराजसिंह चौहान के जन्मदिन पर विशेष लेख  का है और शिवराजसिंह चौहान मध्यप्रदेश के हैं.  मोबा. 9300469918

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...