शनिवार, 28 जनवरी 2023

इक अखबार बिन सब सून

मनोज कुमार

भारत का संविधान पर्व दिवस 26 जनवरी जनवरी को परम्परानुसार अखबारों के दफ्तरों में अवकाश रहा लिहाजा 27 जनवरी को अखबार नहीं आया और इक प्याली चाय सूनी-सूनी सी रह गयी. 28 तारीख को वापस चाय की प्याली में ताजगी आ गयी क्योंकि अखबार साथ में हाथ में था. अभी हम 2023 में चल रहे हैं और कल 29 तारीख होगी जनवरी माह की और यह तारीख हमारे इतिहास में महफूज है क्योंकि इसी तारीख पर जेम्स आगस्ट हिक्की ने भारत के पहले समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ किया था. शायद तब से लेकर अब तक इक प्याली चाय के साथ अखबार का हमारा रिश्ता बन गया है. हिक्की के अखबार का प्रकाशन 1780 में हुआ था और इस मान से देखें तो भारत की पत्रकारिता की यात्रा 243 साल की हो रही है. भारतीय पत्रकारिता का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि उसने हमेशा जन-जागरण का लोकव्यापी कार्य किया है. कबीर के शब्दों में ढालें तो ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ वाली परम्परा का पोषण भारतीय पत्रकारिता ने किया है. 

शब्द सत्ता का दूसरा नाम अखबार है और शायद यही कारण है कि रसूख वालों को 1780 में जिन अखबारों से डर लगता था, 2023 में भी वही डर कायम है. कानून को अपने हिसाब से जोड़-तोड़ कर लेने में माहिर सत्ताधीश इस बात से हमेशा सजग रहे हैं कि अखबार हमेशा उनसे दूर रहें. आजादी के दौर में अंंग्रेजों की नाक में दम करने वाली पत्रकारिता ने स्वाधीन भारत में भी अपने दायित्व को बखूबी निभाया. नए-नए शासकों और सत्ताधीशों के लिए अखबार में छप जाने वाली इबारत उनकी नींद उड़ा देती है. पत्रकारिता के इस सात्विक कर्म के कारण ही उसे भारतीय परम्परा में चौथा स्तंभ पुकारा गया. इस चौथे स्तंभ ने भी अपनी मर्यादा और दायित्व को पूरी जवाबदारी से निभाते देखा गया. 2023 में हम जब अखबारों की चर्चा करते हैं तो कई विषम स्थितियां हमारे सामने आती हैं. साल 1975 का वह आपातकाल का दौर जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छिन्न-भिन्न करने की कोशिश की. लेकिन कुछ ऐसे अखबार भी रहे जिन्होंने टूटना पसंद किया, झुकना नहीं. इस परिप्रेक्ष्य में कभी लाईमलाईट में रहने वाले लालकृष्ण आडवानी की वह टिप्पणी सामयिक लगती है जब उन्होंने कहा था-‘अखबारों को झुकने के लिए कहा गया लेकिन वे रेंगने लगे।’ 

शायद इसके बाद ही अखबारों की दुनिया बदल गयी। अखबार पत्रकारिता धर्म से परे होकर उद्योग के रूप में सूरत अख्तियार करने लगे. आर्थिक संसाधनों से लैस होकर सत्ता के करीब होते गए और पत्रकारिता हाशिये पर जाने लगी. अखबार देखते ही देखते टेलीविजन में बदल गये. रंगीन फिसलन वाले कागज पर पेजथ्री का कब्जा हो गया. गरीब-गुरवा और शोषित अखबारों से उसी तरह दूर कर दिये गये जिस तरह आज हम टेलीविजन के परदे पर देखते हैं. सत्ता शीर्ष के नाश्ते से लेकर देररात तक शयन कक्ष में जाने की दैनंदिनी क्रियाओं को अखबारों ने महिमामंडित कर छापने लगे. एक पन्ने पर मोहक शब्दों में गुथी गाथा थी तो पारिश्रमिक के तौर पर अगले पन्ने भर का विज्ञापन. यह सच है और इस सच से मुंंह चुराती पत्रकारिता ना कल थी और ना आगे कभी होगी क्योंकि पत्रकारिता का मूल धर्म ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ की रही है और रहेगी. 

29 जनवरी, 1780 का स्मरण करते हैं तब हम खुद से मुंह चुराते हैं क्योंकि इस तारीख को भारतीय पत्रकारिता की नींव रखी गयी थी लेकिन आज 2023 में पत्रकारिता का नाम और रूप बदलकर मीडिया हो गया है. यह भी कम दुर्भाग्यपूर्ण बात नहीं है कि ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ वाली लीक को छोडक़र एक वर्ग इधर का हो गया तो एक वर्ग उधर का हो गया. पाठकों और दर्शकों को भी इसी श्रेणी में बांट दिया गया. जो सत्ता विरोधी बोल और लिख रहा था, वह ईमानदार की श्रेणी में आ गया और जो सत्ता के समर्थन में लिख-बोल रहा था, वह उनका पी_ू हो गया. सच तो यह है कि दोनों श्रेणी के लोग उस पत्रकारिता के हैं ही नहीं जिसकी कल्पना गांधी, तिलक, माखनलाल चतुर्वेदी, पराडक़रजी और विद्यार्थी किया करते थे. सिनेमा के सौ साल के सफर में जब ‘डर्टी पिक्चर’ देखते हैं तो वाह-वाह कर उठते हैं लेकिन अढ़ाई सौ साल की पत्रकारिता के ‘डर्टी मीडिया’ की बात करने से हम सहम जाते हैं. 

नाउम्मीदी का एक घना अंधेरा दिखता है. इसे आप कोहरे में घिरा-छिपा भी कह सकते हैं क्योंकि ना तो घना अंधेरा हमेशा बना रहेगा और ना कोहरे में लिपटा वह झूठ जो सच बनकर दिखाया और समझाया जाता है. अखबार की ताकत हमेशा से मौजूं रही है और आगे भी उसके इस बेबाकीपन से आपका सामना होगा. यह इत्तेफाकन नहीं होगा बल्कि सुनियोजित और सुगठित ढंग से होगा. इस सच के सवाल का जवाब कौन देगा कि जब अखबार अविश्वसनीय हो गए हैं तो 27 जनवरी या 16 अगस्त को क्यों हम उसकी राह तकते हैं? अखबार इतना ही अविश्वसनीय है तो कोरोना में हमने उससे परहेज क्यों नहीं किया? जो लोग मेरे हमउम्र हैं, उन्हें याद दिला दूं कि शशि कपूर अभिनीत ‘न्यू देहली टाइम्स’ ने आगाह कर दिया था कि पत्रकारिता और सत्ता का गठजोड़ कैसे होगा. कैसे पत्रकारिता का चेहरा बदलेगा लेकिन एक खबर पूरे तंत्र को हिला देती है यदि उसमें तडक़ा ना लगाया जाए. तथ्यों और तर्कों के साथ उसे समाज के समक्ष रखा जाए. बहुतेरे साथियों को इस बात की शिकायत होती है कि अब खबर का असर नहीं होता है तो क्या कोई बताएगा कि आपने खबर लिखी कौन सी है और क्यों असर नहीं हुआ। आप मनोरंजन की खबरें लिखें, तो उसे उसी श्रेणी में रहने दें लेकिन लोक समाज के हित में लिखने का साहस रखते हैं तो पांव में बिबाई से ना डरें.

कितना भी आप रो लें, सिर पीट लें लेकिन मुझे यकिन है कि 2023 की 29 जनवरी को भी हम उसी 1780 की 29 जनवरी को जी रहे हैं जिसने भारत में पत्रकारिता का श्रीगणेश किया था. हां, उन अखबारों और पत्रकारों को छोड़ दें जिन्हें अखबार को लोक समाज का प्रहरी बने रहने के बजाय उद्योग बनना है. जब तक ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ से अखबार का रिश्ता बना रहेगा तब तब इक प्याली चाय के साथ दूसरे हाथ में अखबार की जरूरत महसूस होती रहेगी. 

शनिवार, 14 जनवरी 2023

 

एक कोशिश का नाम है ‘समागम’

22 वर्ष पहले ‘समागम’ का प्रकाशन आरंभ किया था. तब मन में कुछ अलग करने का विचार था. पत्रिकाओं की भीड़ तब भी थी और अब भी है. ऐसे में कुछ नया क्या हो, यह दिमाग को मथ रहा था. ऐसे में खयाल आया कि क्यों ना मीडिया रिसर्च को लेकर कोई कार्य आरंभ किया जाए. अकादमिक गतिविधियों से जुडऩे के बाद मेरे विचार को विस्तार मिला. आज 22 वर्ष बाद ‘समागम’ का जो स्वरूप आप देख रहे हैं, वह अपने शुरूआती दिनों में नहीं था लेकिन कोशिश को लोगों ने हौसला दिया. एक चुनौती यह भी थी कि प्रत्येक माह नवीन सामग्री कैसे जुटायी जाएगी? लेकिन यकिन नहीं होता है कि लोगों का स्नेह और सहयोग ने इस संकट को भी दूर कर दिया. आज मोटेतौर पर देखें तो देशभर के सुप्रतिष्ठित प्राध्यापकों, मीडिया विशेषज्ञ एवं शोधार्थियों की लगभग हजार लोगों का साथ है. 

‘समागम’ से रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का सफर भी रोचक रहा है. विभिन्न विश्वविद्यालयों में शिक्षकों और विद्यार्थियों से चर्चा करते हुए मेरी समझ कुछ विकसित हुई. एक ठेठ जर्नलिस्ट का संपादक बन जाना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन एक जर्नलिस्ट का रिसर्च की पत्रिका का एडीटर होना जाना चुनौतीपूर्ण था. आइएसएसएन क्या होता है? प्रीयररिव्यूड जर्नल क्या होता है? जैसे सवालों का जवाब पाकर एक गुणवत्तापूर्ण प्रकाशन की विनम्र कोशिश की है. यह मेरे लिए संतोष की बात है कि देशभर के सुविख्यात शिक्षक एवं पत्रकार मेरे अनुरोध पर तत्काल लिखकर भेजते हैं. आज जब 23वें वर्ष में प्रवेश कर रहा हूं तब पांच लोगों का स्मरण सहज हो आता है. मेेरे मार्गदर्शक बालकवि बैरागी को ‘समागम’ के प्रकाशन के एक दशक बाद डरते हुए अंक भेजा. अचानक उनका फोन आता है ‘बैरागी बोल रहा हूं. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि इतने वर्षों तक मुझे एक समृद्ध पत्रिका से वंचित रखा. अच्छा काम कर रहे हो. रूकना नहीं.’ उसके बाद गलती पर कभी डांट तो बाद में पुचकराते हुए उत्साहवर्धन करते हुए नियमित फोन और खत आना. औरंगाबाद महाराष्ट्र में मीडिया एजुकेशन के गुरु डॉ. सुधीर गव्हाणे सर का इसी तरह मार्गदर्शन मिलता रहा. प्रेमचंद पर शोध को लेकर स्थापित नाम डॉ. गोयनका जी का गलतियों पर ध्यान आकृष्ट करने के लिए फोन करना और सराहना कि अच्छा काम कर रहे हो. डॉ. सोनाली नरगुंदे लिखने का ‘समागम’ को लेकर अनुराग बना रहा. ‘समागम’ को विस्तार देने के लिए वे सतत रूप से प्रयास कर रही हैं. खामोशी के साथ मेरा हौसला बढ़ाने वाले मेरे अग्रज आदरणीय गिरिजा भइया की भूमिका मैं ही समझ सकता हूं.  एकाध ही बार कहा होगा कि दिल्ली में तुम्हारी मैगजीन की तारीफ कर रहे थे. यह मेरे लिये सम्मान से कम नहीं था. मेरे एक और अग्रज श्री जगदीश उपासने इंडिया टुडे के एडीटर रहते हुए ‘समागम’ के बारे में स्वयं लिखकर लोगों तक पहुंचाया. समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ‘समागम’ के कंटेंट को लेकर चर्चा होती रही है. 

देश की अन्य लघु पत्रिकाओं की तरह ‘समागम’ भी आर्थिक झंझावत से गुजर रहा है. लेकिन एक संकल्प और जिद के कारण इसका प्रकाशन अब तक निर्बाध है और शायद आगे भी बना रहे. कोविड काल में भी ‘समागम’ का निरंतर प्रकाशन इस बात की आश्वस्ति है. सबसे सुखद बात यह है कि मेरे साथ अनेक नाम हैं जिनका उल्लेख करना संभव नहीं होगा लेकिन वे परछायी की तरह ‘समागम’ के साथ खड़े हैं. आगे भी यह सिलसिला बना रहे और आपका सहयोग, शुभेच्छा और स्नेह बना रहे.

मनोज कुमार    संपादक


शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

गांधी की याद में प्रवासी भारतीय दिवस

 
मनोज कुमार
इंदौर में आयोजित सत्रहवां प्रवासी भारतीय दिवस तारीख 9 जनवरी के महत्व को दर्शाता है. 9 जनवरी महज कैलेंडर की तारीख नहीं बल्कि इतिहास बदलने की तारीख है जिसका श्रेय महात्मा गांधी को जाता है. आज ही के दिन 1915 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ भारत वापस लौटे थे. 09 जनवरी 1915 की सुबह बंबई (अब मुंबई) के अपोलो बंदरगाह पर गांधी जी और कस्तूरबा पहुंचे तो वहां मौजूद हजारों कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने शानदार तौर तरीके से उनका इस्तकबाल किया था. अब महात्मा गांधी के वापसी के दिन को हर साल भारत में प्रवासी दिवस के तौर पर मनाया जाता है. इस दिन हर साल भारत के विकास में प्रवासी भारतीय समुदाय के योगदान को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है. महात्मा गांधी ने साल 1893 में 24 साल की उम्र में वकालत के लिए साउथ अफ्रीका का रुख किया था. वह वहां 21 साल तक मुकीम रहे. इस दौरान उनकी शोहरत एक बड़े और तजरुबेकार वकील के तौर पर हो चुकी थी. इस अर्से में गांधी जी ने मजलूमों और बेसहारों के लिए कई लड़ाईयां लड़ीं और जीतीं भी. इस दौरान इसकी चर्चा भारत में भी हुई और यहां के लोगों की गांधी जी से उम्मीदें बंधने लगीं. अफ्रीका में गांधी जी के सियासी और अखलाकी फिक्रों की तरक्की हुई थी. साउथ अफ्रीका में अपनी चमड़ी के रंग की वजह से उन्हें बहुत भेदभाव झेलना पड़ा. उन्होंने वहां भारतीयों और अश्वेतों के साथ होने वाले भेदभावों के खिलाफ आवाज उठाई और उनके हक के लिए कई लड़ाइयां लड़ीं और इनमें गाधी जी को कामयाबी भी मिली.
    यह तारीख अंतत: दुनिया भर में प्रवासी भारतीयों और औपनिवेशिक शासन के तहत लोगों के लिए और भारत के सफल स्वतंत्रता संघर्ष के लिए प्रेरणा बने।  प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन आयोजित करने का प्रमुख उद्देश्य भी प्रवासी भारतीय समुदाय की उपलब्धियों को दुनिया के सामने लाना है ताकि दुनिया को उनकी ताकत का अहसास हो सके। देश के विकास में भारतवंशियों का योगदान अविस्मरणीय है। वर्ष 2015 के बाद से हर दो साल में एक बार प्रवासी भारतीय दिवस देश में मनाया जा रहा है।
प्रवासी भारतीय दिवस मनाने का निर्णय एल.एम. सिंघवी की अध्यक्षता में भारत सरकार द्वारा स्थापित भारतीय डायस्पोरा पर उच्च स्तरीय समिति की सिफारिशों के अनुसार लिया गया था। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 9 जनवरी 2002 को प्रवासी भारतीय दिवस को व्यापक स्तर पर मनाने की घोषणा की। इस आयोजन ने प्रवासी भारतीयों की भारत के प्रति सोच को सही मायनों में बदलने का काम किया है। साथ ही इसने प्रवासी भारतीयों को देशवासियों से जुडऩे का एक अवसर उपलब्ध करवाया है। इसके माध्यम से दुनिया भर में फैले अप्रवासी भारतीयों का बड़ा नेटवर्क बनाने में भी मदद मिली है, जिससे भारतीय अर्थ-व्यवस्था को भी एक गति मिली है। हमारे देश की युवा पीढ़ी को भी जहाँ इसके माध्यम से विदेशों में बसे अप्रवासियों से जुडऩे में मदद मिली है वहीं विदेशों में रह रहे प्रवासियों के माध्यम से देश में निवेश के अवसरों को बढ़ाने में सहयोग मिल रहा है।
तत्कालीन प्रधानमंत्री की पहल को आगे बढ़ाने तथा प्रवासी भारतीय समुदाय को भारत से जोडऩे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका उल्लेखनीय रही है। वह अपने विदेशी दौरों में जिस भी देश में जाते हैं वहाँ के प्रवासी भारतीयों के बीच भारत की एक अलग पहचान लेकर जाते हैं। इससे उनमें अपनेपन की भावना का अहसास होता है और प्रवासी भारतीय भारत की ओर आकर्षित होते हैं। विश्व में विदेशों में जाने वाले प्रवासियों की संख्या के संदर्भ में भारत शीर्ष पर है। भारत सरकार ‘ब्रेन-ड्रेन’ को ‘ब्रेन-गेन’ में बदलने के लिये तत्परता के साथ काम कर रही है। आर्थिक अवसरों की तलाश के लिये सरकार इनको अपने देश की जड़ों से जोडऩे का प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में प्रवासी जिस उत्साह के साथ जुटते हैं वह इस बात को साबित करता है कि प्रवासी प्रधानमंत्री के नेतृत्व को उम्मीदों भरी नजऱों से देखते हैं और उनसे उनको बड़ी उम्मीदें हैं। भारतीय प्रवासियों की तादाद दुनिया भर में फैली है। आज दुनिया के कई देशों में भारतीय मूल के लोग रह रहे हैं जो विभिन्न कार्यों में संलग्न हैं। यदि भारत सरकार और प्रवासी भारतीयों के बीच आपसी समन्वय और विश्वास और अधिक बढ़ सके तो इससे दोनों को लाभ होगा। भारत की विकास यात्रा में प्रवासी भारतीय भी हमारे साथ हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रवासी भारतीय दिवस मनाने के प्रति जो उद्देश्य निहित हैं उनमें अप्रवासी भारतीयों की भारत के प्रति सोच, उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ ही उनकी अपने देशवासियों के साथ सकारात्मक बातचीत के लिए एक मंच उपलब्ध कराना प्रमुख है. इसके साथ ही  भारतवासियों को अप्रवासी बंधुओं की उपलब्धियों के बारे में बताना तथा अप्रवासियों को देशवासियों की उनसे अपेक्षाओं से अवगत कराना, विश्व के 110 देशों में अप्रवासी भारतीयों का एक नेटवर्क बनाना, भारत का दूसरे देशों से बनने वाले मधुर संबंध में अप्रवासियों की भूमिका के बारे में आम लोगों को बताना, भारत की युवा पीढ़ी को अप्रवासी भाईयों से जोडऩा तथा भारतीय श्रमजीवियों को विदेश में किस तरह की कठिनाइयों का सामना करना होता है, के बारे में विचार-विमर्श करना। 
भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा डायस्पोरा है। प्रवासी भारतीय समुदाय अनुमानत: 2.5 करोड़ से अधिक है। जो विश्व के हर बड़े क्षेत्र में फैले हुए हैं। फिर भी किसी एक महान् भारतीय प्रवासी समुदाय की बात नहीं की जा सकती। प्रवासी भारतीय समुदाय सैकड़ों वर्षों में हुए उत्प्रवास का परिणाम है और इसके पीछे विभिन्न कारण रहे हैं, जैसे- वाणिज्यवाद, उपनिवेशवाद और वैश्वीकरण। इसके शुरू के अनुभवों में कोशिशों, दु:ख-तकलीफों और दृढ़ निश्चय तथा कड़ी मेहनत के फलस्वरूप सफलता का आख्यान है। 20वीं शताब्दी के पिछले तीन दशकों के उत्प्रवास का स्वरूप बदलने लगा है और ‘नया प्रवासी समुदाय’ उभरा है जिसमें उच्च कौशल प्राप्त व्यावसायिक पश्चिमी देशों की ओर तथा अकुशल,अर्धकुशल कामगार खाड़ी, पश्चिम और दक्षिण पूर्व एशिया की और ठेके पर काम करने जा रहे हैं।
प्रवासी भारतीय समुदाय एक विविध विजातीय और मिलनसार वैश्विक समुदाय है जो विभिन्न धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और मान्यताओं का प्रतिनिधित्व करता है। एक आम सूत्र जो इन्हें आपस में बांधे हुए है, वह है भारत और इसके आंतरिक मूल्यों का विचार। प्रवासी भारतीयों में भारतीय मूल के लोग और अप्रवासी भारतीय शामिल हैं और ये विश्व में सबसे शिक्षित और सफल समुदायों में आते हैं। विश्व के हर कोने में, प्रवासी भारतीय समुदाय को इसकी कड़ी मेहनत, अनुशासन, हस्तक्षेप न करने और स्थानीय समुदाय के साथ सफलतापूर्वक तालमेल बनाये रखने के कारण जाना जाता है। प्रवासी भारतीयों ने अपने आवास के देश की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है और स्वयं में ज्ञान और नवीनता के अनेक उपायों का समावेश किया है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)


बुधवार, 28 दिसंबर 2022

मेरा पसंदीदा रंग तो आज भी काला है...

मनोज कुमार

     तुम खेलो रंगों से, रंग बदलना तुम्हारी आदत में है, मेरा पसंदीदा रंग तो आज भी काला है और काले रंग में समा जाना तुम्हारी फितरत में नहीं क्योंकि तुम रंग बदलने में माहिर हो. साल 2022 मीडिया के ऐसे ही किस्से कहानियों का साल रहा है. सबकी उम्मीदें रही कि मीडिया निरपेक्ष रहे लेकिन यह उम्मीद दूसरे से रही है. कोई खुद निरपेक्ष नहीं बन पाया. मीडिया निरपेक्ष हो भी तो कैसे? किसी एक के पक्ष में लिखना होगा और जब आप किसी के पक्ष में लिखेंगे तो स्वत: आप दूसरे के टारगेट पर होंगे. गोदी मीडिया एक शब्द गढ़ा गया लेकिन कोई यह बताने को तैयार नहीं है कि गोदी मीडिया क्या है? आज जो सत्ता में है, गोदी मीडिया उसकी, कल जो सत्ता में आएगा, गोदी मीडिया उसकी लेकिन पत्रकारिता इन सबसे परे है. पत्रकारिता समाज की है. मुश्किल यह है कि जिस पुण्य कार्य से हमारी पहचान है, हमारा जीवन चलता है, उसे ही हम गरिया रहे हैं. साल 2022 ऐसे ही चरित्र के कारण गिना जाएगा.

मीडिया का मतलब अब जो समझा गया या समझा जा रहा है, वह सोशल मीडिया है. इसके बाद टेलीविजन का क्रम आता है और सबसे आखिर में प्रिंट का. सोशल मीडिया कितना बेहाल है, यह किसी से छिपा नहीं है. कोई नियंत्रण नहीं, कोई देखरेख नहीं, जिसे जो सूझा, वह लिख दिया और शेयर, लाईक और फालो पर सोशल मीडिया जिंदा है. जिन्हें जो भाया, उन्होंने उसे सत्य मान लिया और यही कारण है कि समाज को मार्ग दिखाने वाला खुद भटकाव का शिकार हो गया. सच और गलत के मध्य कोई लक्ष्मण रेखा शेष नहीं रहा. इसके बाद टेलीविजन मीडिया ने इसे आगे बढ़ाया. मीडिया की दुनिया से बावस्ता लोगों को इस बात का ज्ञान है कि रोज सुबह मीटिंग में तय किया जाता है कि आज किस खबर को खेलना है. ‘खबर खेलने’ का यह चलन टेलीविजन ने शुरू किया. और इसके बाद किसी एक विषय को लेकर दर्शकों का हैमरिंग किया जाता रहा. बचे-खुचे में शाम को डिबेट के नाम पर शोर-शराबा, आरोप-प्रत्यारोप और एकाध बार तो दंगल का मैदान भी बन चुका है. हालात यह हो गए कि उकता गए लोग अब न्यूज चैनल से तौबा करने लगे हैं. आम आदमी तो आम आदमी, मीडिया से जुड़े लोग भी अब न्यूज चैनल से दूरी बनाने लगे हैं. यह चलन 2022 में देखने को मिला.

2022 में सबसे ज्यादा विश्वसनीय बनकर उभरा तो प्रिंट मीडिया. प्रिंट मीडिया में भी अखबारों की भूमिका संजीदा रही. इसका एक बड़ा कारण समय का प्रतिबंध रहा क्योंकि लाख कोशिशों के बाद भी 24 घंटे में एक बार ही अखबार का प्रकाशन हो पाता है. पेज संख्या भी सुनिश्चित है इसलिए संपादक चाहे तो भी तो उसके हाथ बंधे होते हैं. अखबारों की मर्यादा यह भी है कि उसे नापतौल कर शब्द लिखने होते हैं और जब सूचनाओं का सैलाब तटबंध तोडक़र बह रहा हो तो सूचनाओं के मध्य खबर तलाशने में अखबारों को विशेष तौर पर मेहनत करनी होती है. और शायद यही कारण है कि हजारों चुनौतियों के बाद भी अखबारों की विश्वसनीयता ना केवल कायम रही बल्कि उसमें इजाफा भी हुआ.

मीडिया में नायक बनने का दौर भी 2022 ने देखा. सोशल मीडिया में नायक जैसा कोई चेहरा शायद ढूंढे से ना मिले और अखबारों में नायक संपादक होने का दौर लगभग खत्म हो चुका है क्योंकि संपादक संस्था कब से अपना अस्तित्व खो चुका है. हां, बेहतर रिपोर्टिंग के लिए रिपोर्टर को शाबासी मिलती है लेकिन नायक नहीं बनाया जाता है. हमारे समय के नायक रिपोर्टर के रूप में अरूण शौरी ने बोफोर्स सौदे का जो खुलासा किया, उसकी गूंज सालों साल तक गुंजती रही. ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे लेकिन अब इस पर भी विराम लग चुका है.  

नायक बनने और बनाने का दौर टेलीविजन पत्रकारिता तक सिमट कर रह गया है. थोड़ा गौर से देखें और समझने की कोशिश करें तो 2022 आते-जाते मीडिया के नायक के रूप में रवीश कुमार दिखते हैं. रवीश कुमार एंग्री यंग मेन की वैसी ही भूमिका में हैं जैसे कभी अमिताभ बच्चन हुआ करते थे. दोनों में साम्य इस बात को लेकर है कि दोनों परदे के हीरो तो रहे, परदे के एंग्री यंग मेन तो रहे लेकिन वास्तविक जिंदगी में इनका कोई असर नहीं दिखा. अमिताभ परदे पर अन्याय और अत्याचार के खिलाफ खड़े हो जाते थे, जैसे रवीश तथाकथित गोदी मीडिया के खिलाफ खड़े हो जाते हैं. शासन-प्रशासन को आइना दिखाते हैं लेकिन सच तो यह है कि वास्तविक जिंदगी में कोई बदलाव नहीं दिखा. सच तो यह है कि हम जो नहीं कर पाते हैं या बोल नहीं पाते हैं, उसे परदे पर उतरता देख हम इत्मीनान कर लेते हैं कि चलो, कोई तो हमारी बात कह रहा है. यह मध्यमवर्गीय समाज का संकट सदियों से बना रहा है.    

साल 2022 की मीडिया को रवीश कुमार के लिए याद किया जाएगा. दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजे गए रवीश कुमार तथाकथित गोदी मीडिया के खिलाफ नायक बनकर उभरे. उनकी छवि ऐसी बन गई थी कि किसी पत्रकार, लेखक या कवि की पंक्ति को उन्होंने अपने प्रोग्राम में दोहरा दिया तो वह पत्रकार, लेखक या कवि स्वयं को धन्य मानता था. रवीश के रोज-ब-रोज आलोचनात्मक भाषण को लोगों ने चाव से सुना लेकिन याद नहीं पड़ता कि कभी उन्हें सीरियस लिया गया होगा. उनके ही एक पुराने सहयोगी दिल्लगी में याद दिलाते हैं कि कभी दूरदर्शन को बुद्धु बक्सा कहा गया और उसे सरकारी भोंपू पुकारा गया तब जसपाल भट्टी का उल्टा-पुल्टा हास्य प्रोग्राम शुरू किया गया. लोगों का मनोरंजन खूब हुआ लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला. आज भी कुछ वैसा ही है. उनकी बातेेंं अतिरंजित हो सकती है लेकिन एकाएक खारिज नहीं किया जा सकता है. 

पत्रकारों को गरियाने वाले, उन्हें गोदी मीडिया कहने वालों से साल 2022 पूछ रहा है कि क्या वे जिस चैनल में हैं, उसकी नीतियों के खिलाफ जा सकते हैं? क्या आप अपनी स्वतंत्र राय रख सकते हैं? शायद इन लोगों ने शशि कपूर अभिनीत फिल्म ‘न्यू देहली टाइम्स’ नहीं देखा है. एक बार देखिये कि चौथे स्तंभ और राजनीति में जब गठजोड़ होता है तो पत्रकार कैसे मरता है. उस दर्द को महसूस करिये कि मेहनत से लिखी गई आपकी खबर समझौते की भेंट चढ़ जाती है. कभी गौर से उन प्रोग्राम को जरूर देखिये जिसमें सरकार के पक्ष में तो एंकर चिल्लाता है लेकिन इस चिल्ल-पों के बीच एक वाक्य ठोंक भी देता है. इस एक वाक्य को हम जानबूझकर अनदेखा कर देते हैं. सवाल यह भी है कि जब आप किसी चैनल या अखबार की कमान सम्हालते हैं तो क्या आप उनकी नीतियों को आगे बढ़ाते हैं या उनके ही खिलाफ खड़े हो जाते हैं? यह दौर भी था कभी लेकिन अखबारों में. टेलीविजन इंडस्ट्री में ऐसी कल्पना करना भी बेमानी है. आखिरकार लाखों की सेलरी और करोड़ों का इंवेस्टमेट्स का मेंटनेंस कैसे होगा? ये सब बातें हैं बातों का क्या?  

सबसे दुखद और डरावना पक्ष यह है कि 2022 और इसके पहले के वर्ष के मीडिया के चरित्र और व्यवहार को देखें तो मीडिया में आने वाले नए विद्यार्थियों को देखकर डर लगने लगता है. वे मानस बनाकर आ रहे हैं. उन्हें इसी मानस के साथ पढ़ाया जा रहा है. कोई चार दशक पहले जब हमने पत्रकारिता का ककहरा सीखना शुरू किया था तब पत्रकारिता का अर्थ था समाज की समस्याओं से रूबरू होना. किसी दुखी-पीडि़त पक्ष को न्याय दिलाना. तब हमें बताया गया था कि सभा-सम्मेलन में जाएं तो यह अपेक्षा ना करें कि विशिष्ठ मेहमान के रूप में आपकी आवभगत की जाए बल्कि आपको एक गिलास पानी के लिए भी ना पूछा जाए तो दुखी ना होइए. आज दौर उल्टा है. मीडिया से होने का अर्थ बताया जा रहा है कि आप विशिष्ट हैं और आपका आवभगत करना आयोजकों का नैतिक दायित्व है. ये जो पीढ़ी पराढकरजी, विद्यार्थीजी, माखनलाल चतुर्वेदी, तिलक, भगतसिंह, गांधी को पढक़र तो आ रही है लेकिन इनके आदर्श 2022 में रूपक मर्डोक हो गए हैं. पत्रकारिता दिल्ली नहीं देहात से शुरू होती है और मीडिया दिल्ली से शुरू होकर देहात तक जाती है. लेकिन 2022 ने दिल्ली की पत्रकारिता को ही माइलस्टोन बना दिया.

रूखे-सूखे और मुझ जैसे दीन-हीन पत्रकार के लिए पीटर भाटिया एक उम्मीद की तरह मेरे सामने हैं जो अपने साथियों की नौकरी बचाने के लिए खुद की नौकरी को दांव पर लगा देते हैं. अमेरिका के प्रमुख प्रकाशन ‘डेट्रायट फ्री प्रेस’ के सम्पादक और उपाध्यक्ष भाटिया ने इसलिये नौकरी छोडऩे का फैसला किया कि उन्हें जितनी सेलरी मिलती है, उससे दस साथियों की नौकरी बच सकती है. मीडिया कहें या पत्रकारिता क्या भारत में ऐसा कोई नायक सामने आएगा जो अपने साथियों की नौकरी की खातिर अपनी नौकरी दांव पर लगा दे? यू ट्यूब पर हिट्स, लाईक और कमाई गिनते बड़े पत्रकारों ने अपनी इस कमाई का कितना हिस्सा कोरोना में बेरोजगार होते साथियों पर खर्च किया, यह सवाल जाते-जाते 2022 पूछ रहा है. इसलिये तो कहता हंू कि आज भी मेरा पसंदीदा रंग काला है.

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

शिक्षा की नयी उड़ान : सीएम राइज स्कूल

 शिक्षा की नयी उड़ान : सीएम राइज स्कूल

मनोज कुमार
अनादिकाल से गुरुकुल भारतीय शिक्षा का आधार रहा है लेकिन समय के साथ परिवर्तन भी प्रकृति का नियम है. इन दिनों शिक्षा की गुणवत्ता पर चिंता करते हुए गुरुकुल शिक्षा पद्धति का हवाला दिया जाता है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में गुरुकुल नए संदर्भ और नयी दृष्टि के साथ आकार ले रहा है. सरकारी शब्द के साथ ही हमारी सोच बदल जाती है और हम निजी व्यवस्था पर भरोसा करते हैं. हमें लगता है कि सरकारी कभी असर-कारी नहीं होता है. इस धारणा को तोड़ते हुए मध्यप्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता के साथ नवाचार करने के लिए ‘सीएम राइज स्कूल’ सरकारी से ‘असरकारी’ होने की कल्पना के जल्द ही वास्तविकता की जमीन पर खड़ा होगा. शिक्षा की गुणवत्ता को ताक पर रखकर भौतिक सुविधाओं के मोहपाश में बांध कर ऊंची बड़ी इमारतों को पब्लिक स्कूल कहा गया. सरकारें भी आती-जाती रही लेकिन सरकारी स्कूल उनकी प्राथमिकता में नहीं रहा. परिवर्तन के इस दौर में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने राज्य में ऐसे स्कूलों की कल्पना की जो प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से कमतर ना हों. मुख्यमंत्री चौहान की इस सोच में प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से अलग अपने बच्चों के सपनों को जमीन पर उतारने के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है. इसी सोच और भरोसे की बांहें थामे मध्यप्रदेश के सुदूर गांवों से लेकर जनपदीय क्षेत्र में ‘सीएम राइज स्कूल’ की कल्पना साकार हो रही है.
वर्तमान में राज्य के स्कूलों पर नजर डालें तो एक बात स्पष्ट होती है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने असंतोष को दूर करने के लिए स्कूलों की भीड़ लगा दी. किसी स्कूल में दो बच्चे तो किसी स्कूल में पांच और कहीं-कहीं तो महीनों से ताला डला है. कागज पर स्कूल चल रहे हैं लेकिन हकीकत में इन स्कूलों पर केवल बजट खर्च हो रहा है. ऐसे में एक बड़ी सोच के साथ शिवराजसिंह सरकार ने एक सर्वे करा कर यह तय किया कि फिलहाल एक लाख से ऊपर ऐसे स्कूलों को एकजाई कर ‘सीएम राइज स्कूल’ शुरू किया जाए. योजना के मुताबिक अभी 9200 ‘सीएम राइज स्कूल’ शुरू होंगे. 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में संचालित होने वाले इन स्कूलों में शिक्षा का माध्यम हिन्दी और अंग्रेजी दोनों होगा. आवागमन की सुविधा के लिए सरकार बस और वैन की सुविधा भी दे रही है. बच्चों, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को अकल्पनीय सुविधायें इस स्कूल में होगी. मसलन स्वीमिंग पूल, बैंकिंग काउंटर, डिजिटल स्टूडियो, कैफेटेरिया, जिम, थिंकिंग एरिया होगी जो अभी तक प्रायवेट पब्लिक स्कूल में भी ठीक से नहीं है.  प्री-नर्सरी से हायर सेकंडरी की कक्षा वाले ‘सीएम राइज स्कूल’ आने वाले 2023 तक पूरे राज्य में शुरू हो चुके होंगे.
उल्लेखनीय है कि प्रदेश के बच्चे पढ़ाई के मामले में सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के बच्चों से मुकाबला कर सकें, इसलिए सरकार प्रत्येक स्कूल पर 20 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करेगी. योजना के अनुरूप स्कूल चार स्तर (संकुल से नीचे, संकुल, ब्लॉक और जिला) पर तैयार होंगे। इन स्कूलों में बच्चों को ड्रेस कोड भी निजी स्कूलों जैसा रखने की योजना है. वर्तमान में सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों में से ही सीएम राइज स्कूलों के लिए शिक्षकों का चयन होगा, पर उन्हें लंबी चयन परीक्षा से गुजरना पड़ेगा. लिखित और मौखिक परीक्षा के अलावा जिस कक्षा के लिए उनका चयन होना है, उसमें पढ़ाकर भी दिखाना होगा ताकिसुनिश्चित किया जा सके कि योग्य शिक्षक का चयन हुआ है. उन्हें विधिवत नियुक्ति दी जाएगी. इन स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को परीक्षा देनी होगी और उन्हें नियमित शिक्षकों की तुलना में ज्यादा वेतन दिया जाएगा. शिक्षकों को स्कूल परिसर में ही मकान भी मिलेगा, ताकि उनके अप-डाउन में उलझने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो.  जैसे ही ये स्कूल खुलेंगे, सरकारी स्कूलों की परंपरागत पढ़ाई से इतर नए तरीके से पढ़ाई कराई जाएगी.
स्कूल शिक्षा विभाग के मानक के अनुरूप निजी स्कूलों की तरह व्यवस्थित भवन और अन्य जरूरी सुविधाएं, हर विद्यार्थी के लिए परिवहन सुविधा, नर्सरी एवं केजी कक्षाएं, शिक्षकों एवं अन्य स्टाफ के सौ फीसद पद भरे जाएंगे, स्मार्ट क्लास एवं डिजिटल लर्निंग, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, व्यावसायिक शिक्षा के साथ नए भवनों में स्वीमिंग पूल, खेल सुविधाएं, संगीत कक्षाएं भी रहेंगी. सीएम राइस स्कूल योजना के प्रथम चरण में 259 स्कूल खोले जाएंगे. इनमें से 253 स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा और 96 स्कूल आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा खोले जाएंगे. सी.एम. राइज स्कूल की संरचना के अनुरूप जिला स्तर पर प्रत्येक जिले में एक अर्थात कुल 52 सी.एम. राइज स्कूल होंगे, जिसमें प्रति स्कूल 2000 से 3000 विद्यार्थी होंगे. विकास खंड स्तरीय 261 स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 1500 से 2000 विद्यार्थी होंगे. इसी प्रकार संकुल स्तरीय 3200 स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 100 से 1500 विद्यार्थी होंगे. ग्रामों के समूह स्तर पर 5687 सी.एम.राइस स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 800 से 1000 विद्यार्थी होंगे. कैबिनेट ने इस योजना के प्रथम चरण के लिए 6952 करोड़ की मंजूरी दे दी है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के मानक के अनुरूप सीएम राइज स्कूल में कौशल विकास को प्राथमिकता दी जाएगी. डिग्री के स्थान पर बच्चों को रोजगारपरक शिक्षा देेने पर जोर होगा. नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें भारतीयता से जोड़ा जाएगा. स्वयं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह के अनुसार इन स्कूलों का मुख्य उद्देश्य बच्चों को ज्ञान, कौशल और नागरिकता के संस्कार देना है। साथ ही, भारतीय संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा देना है। स्कूली शिक्षा में बहुविध गतिविधियों के सूर्योदय की उम्मीद के साथ सीएम राइज स्कूल जमीनी तौर पर जल्द ही काम करने लगेंगे

शनिवार, 3 दिसंबर 2022

‘इंडियन रॉबिन हुड’ यानि वीर सिपाही टंट्या मामा


मनोज कुमार

हम आजादी के 75वां वर्ष का उत्सव मना रहे हैं तब ऐसे अनेक प्रसंग से हमारी नयी पीढ़ी को रूबरू कराने का स्वर्णिम अवसर है। मध्यप्रदेश ऐसे जाने-अनजाने सभी वीर योद्धाओं का स्मरण कर आजादी के 75वें वर्ष को यादगार बना रहा है। खासतौर पर उन योद्वाओं का जिन्होंने अपने शौर्य से अंग्रेजी सेना को नेस्तनाबूद कर दिया। ऐसे में वीर योद्धा टंट्या भील को हम टंट्या मामा के नाम से संबोधित करते हैं, वह सदैव हमारे लिये अनुकरणीय रहे हैं। यह हिन्दुस्तान की माटी है जहां हम अपने योद्धाओं का हमेशा से कृतज्ञ रहे हैं। ऐसे में टंट्या मामा का स्मरण करते हुए हम गर्व से भर उठते हैं कि  वीर योद्धा टंट्या मामा की वीरता को सलाम करने के लिए पातालपानी रेल्वे स्टेशन से गुजरने वाली हर रेलगाड़ी के पहिये कुछ समय के लिए आज भी थम जाता है। जनपदीय लोक नायकों का स्मरण तो हम समय-समय पर करते हैं लेकिन वीर योद्धा टंट्या मामा को प्रतिदिन स्मरण करने का यह सिलसिला कभी थमा नहीं, कभी रूका नहीं। 

स्वाधीनता का 75वां वर्ष पूरे राष्ट्र का उत्सव है। एक ऐसा उत्सव जो हर पल इस बात का स्मरण कराता है कि ये रणबांकुरे नहीं होते तो हम भी नहीं होते। गुलामों की तरह हम मरते-जीते रहते लेकिन दूरदर्शी लोकनायकों ने इस बात को समझ लिया था और स्वयं की परवाह किये बिना भारत माता को गुलामी की बेडिय़ों से आजाद करने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। हमारा इतिहास ऐसे वीर ही नायकों की कथाओं से लिखा गया है। इतिहास का हर हर्फ हमें गर्व से भर देता है कि हम उस देश के वासी हैं जहां अपने देश के लिए मर-मिटने वालों का पूरा समाज है। ऐसे वीर नायकों का स्मरण करते हुए हम पाते हैं कि स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय समाज के वीर नायकों की भूमिका बड़ी है लेकिन जाने-अनजाने उन्हें समाज के समक्ष लाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। आजादी के इस 75वें वर्ष में देश ऐसे ही वीर नायकों का स्मरण कर रहा है। कोई भी वीर शहीद किसी भी क्षेत्र या राज्य का हो लेकिन उसकी पहचान एक भारतीय की रही है। बिरसा मुंंडा से लेकर टंट्या भील हों या गुंडाधूर। इन सारे वीर जवानों ने कुर्बानी दी तो भारत माता को गुलामी की बेडिय़ों से आजाद करने के लिए। यह सुखद प्रसंग है कि देश का ह्दय प्रदेश कहे जाने वाला मध्यप्रदेश ऐसे सभी चिंहित और गुमनाम जनजाति समाज के वीर योद्धाओं को प्रणाम कर उन्हें स्मरण कर रहा है। मध्यप्रदेश की कोशिश है कि नयी पीढ़ी ना केवल अपने स्वाधीनता के इतिहास को जाने बल्कि अनाम शहीदों के बारे में भी अपनी जानकारी पुख्ता करे। 

मध्यप्रदेश के लिए यह गौरव की बात है कि 4 दिसम्बर को जननायक टंट्या मामा के बलिदान दिवस पर हम सब स्मरण कर रहे हैं। यह उल्लेख करना भी गर्व का विषय है कि अविभाजित मध्यप्रदेश सहित सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में ऐसे वीर शहीदों की लम्बी सूची है जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम को स्वर्णिम बनाया। ‘इंडियन रॉबिन हुड’ के नाम से चर्चित टंट्या मामा की वीरता की कहानी का कालखंड है 1878 से लेकर 1889 का जब अंग्रेजों ने उन्हें एक अपराधी के रूप में प्रचारित किया। टंट्या को उन क्रांतिकारियों में से एक के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने 12 साल तक ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था। रिपोर्टों में कहा गया है कि वह ब्रिटिश सरकार के खजाने और उनके अनुयायियों की संपत्ति को गरीबों और जरूरतमंदों में बांटने के लिए लूटता था। इन आंदोलनों से बहुत पहले आदिवासी समुदायों और तांत्या भील जैसे क्रांतिकारी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया था।  वह आदिवासियों और आम लोगों की भावनाओं के प्रतीक बन गए। लगभग एक सौ बीस साल पहले तांत्या भील जनता के एक महान नायक के रूप में उभरा और तब से भील जनजाति का एक गौरव बन चुका है। उन्होंने अदम्य साहस, असाधारण चपलता और आयोजन कौशल का प्रतीक बनाया। टंट्या भील का वास्तविक नाम तांतिया था, जिन्हे प्यार से टंट्या मामा के नाम से भी बुलाया जाता था। उल्लेखनीय है कि टंट्या भील की गिरफ्तारी की खबर न्यूयॉर्क टाइम्स के 10 नवंबर 1889 के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। इस समाचार में उन्हें ‘भारत के रॉबिन हुड’ के रूप में वर्णित किया गया था।

इतिहासकारों के अनुसार खंडवा जिले की पंधाना तहसील के बडदा में सन् 1842 के करीब भाऊसिंह के यहां टंट्या का जन्म हुआ था। कहते हैं कि टंट्या का मतलब झगड़ा या संघर्ष होता है और टंट्या के पिता ने उन्हें ये नाम दिया था, क्योंकि वे आदिवासी समाज पर हो रहे जुल्म का बदला लेने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। बचपन में ही तीर कमान, लाठी और गोफल चलाने में पारंगत हो चुके टंट्या ने जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही जमींदारी प्रथा के खिलाफ अंग्रेजों से लोहा लेना शुरु कर दिया था। इंडियन रॉबिनहुड टंट्या भील, जिन्होंने अंग्रजों के छक्के छुड़ा दिए थे। सन् 1870 से 1880 के दशक में तब के मध्य प्रांत और बंबई प्रेसीडेंसी में टंट्या भील ने 1700 गांवों में अंग्रेजों के खिलाफ समानांतर सरकार चलाई थी। तब महान क्रांतिकारी तात्या टोपे ने टंट्या से प्रभावित होकर उन्हें छापामार शैली में हमला बोलने की गौरिल्ला युद्धकला सिखाई थी। इसके बाद टंट्या ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। जनश्रुति के अनुसार मान्यता थी कि मामा टंट्या के राज में कोई आदिवासी भूखा नहीं सो सकता। टंट्या से मुंह की खा रहे अंग्रेजों को टंट्या से लडऩे के लिए ब्रिटिश सेना की खास टुकड़ी भारत बुलानी पड़ी थी। हालांकि टंट्या को ब्रिटिश सेना ने धोखे से गिरफ्तार कर लिया था।

इतिहासकारों के अनुसार 11 अगस्त सन् 1889 को रक्षाबंधन के दिन जब टंट्या अपनी मुंहबोली बहन से मिलने पहुंचे थे तो उसके पति गणपतसिंह ने मुखबिरी कर उन्हें पकड़वा दिया था। जबलपुर में अंग्रेजी सेशन कोर्ट ने 19 अक्टूबर को टंट्या को फांसी की सजा सुना दी थी। उन्हें 4 दिसम्बर 1889 को फांसी दी गई। ब्रिटिश सरकार भील विद्रोह के टूटने से डरी हुई थी। आमतौर पर यह माना जाता है कि उसे फांसी के बाद इंदौर के पास खंडवा रेल मार्ग पर पातालपानी रेलवे स्टेशन के पास फेंक दिया गया था। जिस स्थान पर उनके लकड़ी के पुतले रखे गए थे, वह स्थान तांत्या मामा की समाधि मानी जाती है। आज भी सभी ट्रेन टंट्या मामा के सम्मान में ट्रेन को एक पल के लिए रोक देते हैं।

ऐसे वीर जवानों के लिए कृतज्ञ मध्यप्रदेश उनकी यादों को चिरस्थायी बनाने के लिए प्रयासरत है। इस सिलसिले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को घोषणा की है कि इंदौर में पातालपानी रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर टंट्या भील के नाम पर रखा जाएगा। साथ ही इंदौर बस स्टैंड का नाम टंट्या मामा के नाम पर रखा जाएगा। यह पहल इस मायने में महत्वपूर्ण है कि हर आयु वर्ग के लोगों को यह स्मरण आता रहे कि हमें आजादी दिलाने के लिए ऐसे महान योद्धाओं ने अपने जीवन का उत्र्सग किया। टंट्या मामा जैसे सभी वीर योद्धाओं को हम नमन करते हैं।

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...