शुक्रवार, 3 मार्च 2023

जन्मदिन के साथ ‘भाई-दूज’ मनाएंगी शिवराजसिंह की लाड़ली बहना

 5 मार्च जन्मदिन पर विशेष

मनोज कुमार

कल 5 मार्च को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की उम्र में एक वर्ष का और इजाफा हो जाएगा। इस बार उन्होंने अपना जन्मदिन नहीं मनाने का ऐलान किया है लेकिन यह पहला अवसर होगा जब उनके जन्मदिन के साथ प्रदेश भर में उनकी लाडली बहना ‘भाईदूज’ भी मनाएंगी। ‘भाईदूज’ भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पवित्र संस्कार है जिसमें भाई अपनी बहनों की सुरक्षा और समृद्धि का वचन देता है। मातृशक्ति का आंचल शिवराजसिंह के लिए मंगल कामनाओं से भरा-पूरा है। लाडली बहना शिवराजसिंह चौहान के लिए आशीष और उनकी कामयाबी के लिए ईश्वर से प्रार्थना करेंगी। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान वैसे भी स्त्री समाज की बेहतरी के लिए हमेशा से चिंतित और सक्रिय रहे हैं। इस क्रम में उन्होंने हाल ही में ‘लाडली बहना’ योजना का ऐलान किया है और संयोग से इस योजना का आरंभ कल पांच मार्च से हो रहा है। भाई का बहनों को यह तोहफा एक किस्म का अपरोक्ष रूप से ‘भाईदूज’ का नेग माना जा सकता है। कहना ना होगा कि ‘लाडली बहना’ भी उनके जन्मदिन के साथ ‘भाईदूज’ का संस्कार भी पूर्ण करेंगी। ऐसे अवसर अक्सर आंखों को भिगो देते हंै और मन पुलकित हो जाता है। बेशक, यह शिवराजसिंह सरकार की योजना है लेकिन प्रदेश भर की महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा देने का बड़ा उपक्रम है। 

उल्लेखनीय है कि साल 2005, माह नवम्बर में जब शिवराजसिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद सम्हाला था तब से उनका संकल्प प्रदेश के बेटियों, बहनों और वृद्ध माता-पिता को बेहतर जिंदगी देने का रहा है। लाडली लक्ष्मी योजना से लेकर, स्कूल जाने के लिए साइकिल योजना हो या अब लाडली बहना, शिवराजसिंह के संकल्प को पूरा करते हुए दिखती हैं। बिटिया के ब्याह हो या निकाह, शिवराजसिंह पूरे सम्मान के साथ योजना का लाभ दिलाते रहे हैं। करीब-करीब 20 वर्ष के कार्यकाल में महिला केन्द्रित योजनाओं में मध्यप्रदेश ने जो मानक गढ़े हैं, वह पूरे देश के लिए मिसाल बन गयी है। अनेक राज्य मध्यप्रदेश के अनुगामी बने हैं और अपने-अपने राज्यों में योजनाओं को लागू कर रहे है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की दूष्टि साफ है और वेे कहते हैं कि मध्यप्रदेश में लागू की गई महिला कल्याण की विभिन्न योजनाओं को देश के अन्य राज्य अपना रहे हैं तो यह प्रसन्नता की बात है क्योंकि बेटी, भांजी, बहन हम सबकी हैं और उनकी सुरक्षा और समृद्धि ही हमारा अंतिम लक्ष्य है।

मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना योजना की शुरुआत करने का उद्देश्य है कि समाज की नकारात्मक सोच को बदलना और बालिकाओं के भविष्य को उज्जवल बनाना है। इस योजना की घोषणा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा नर्मदा जयंती के अवसर पर इसी वर्ष 28 जनवरी 2023 को की गई थी। बालिकाओं के प्रति लोगों में सकारात्मक सोच एवं उनके लिंग अनुपात में सुधार के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना की शुरुआत की है। इस योजना की सहायता से प्रदेश में लोगो को बालिकाओं के प्रति स्नेह बढ़ेगा। प्रदेश के सरकार द्वारा यह भी घोषणा की गई है कि हमारी जो भी गरीब बहने, निम्न-मध्यम वर्ग की बहनें जो किसी भी धर्म या जाति से आती हों, इस योजना का लाभ प्राप्त कर सकेंगी। लाड़ली बहना योजना में किसी परिवार में यदि दो बहुएं हैं तो उन्हें भी हर महीना 1-1 हजार रुपए दिए जाएंगे। सास यदि बुजुर्ग हैं तो उन्हें वृद्धावस्था पेंशन में 600 के साथ इस योजना के 400 जोडक़र दिए जाएंगे। कोई महिला पहले से किसी भी योजना के तहत लाभ उठा रही है तो उसे भी इस योजना में शामिल किया जायेगा एवं पेंशन पाने वाली महिलाएं भी इस योजना का हिस्सा बन पाएंगी। 

प्रदेश की सभी बहनों को इस योजना के तहत एक हजार रुपए हर महीने दिया जाएगा। 5 साल में 60 हजार रुपए दिया जाएगा, ताकि वह आर्थिक रूप से मजबूत हो सकें। इस योजना पर सरकार द्वारा पांच वर्षों में 60 हजार करोड़़ रुपए खर्च किया जाएगा। हमारे देश में कई लोग आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के कारण अपनी बहन को उच्च शिक्षा नहीं दे पाते हैं। प्रदेश में रहने वाले कई लोग ऐसे भी हैं जो अभी भी लडक़े और लड़कियों में भेदभाव करते हैं, इस सोच को बदलने में यह योजना कारगर साबित होगी। 

अनुभवों से लबरेज शिवराजसिंह चौहान मध्यप्रदेश के चार बार के मुख्यमंत्री हैं लेकिन उनकी कार्यशैली और जीवनशैली आज भी आम आदमी की है। वे अपनी सादगी से लोगों का मन मोह लेते हैं। सबको अपना सा लगता है। रंच मात्र भी उनमें गरुर दिखाई नहीं देता है और वे आज भी एक किसान पुत्र की भांति रहते हैं। उनकी चिंता में महिला, बेटी हैं तो किसान और वृद्ध माता-पिता भी हैं। वे मुख्यमंत्री के रूप में जब कहते हैं कि प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता मेरी भगवान हैं तो उनका आशय उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी का होता है। शिवरासिंह चौहान का मुख्यमंत्री के रूप में सफर कभी आसान नहीं रहा। अनेक चुनौतियों के बीच उन्होंने स्वयं को सम्हाला और चुनौतियों को संभावना में बदल दिया। फिर खेतों में पड़े ओला-पाला हो या कोविड काल में चौपट होती स्वास्थ्य एवं अर्थव्यवस्था, सबको उन्होंने सधे ढंग से सुलझा लिया। कोविड में आम आदमी को हौसला देते हुए खुद कोविड के शिकार हो गए लेकिन इलाज के दरम्यान भी राजकाज जारी रहा। उनके भीतर का यह हौसला, उनका ही नहीं, बल्कि प्रदेश की करोड़ों नागरिकों का है। 

शिवराजसिंह चौहान एक संस्कारी राजनेता हैं और यही कारण है कि वे अपने विरोधियों को पूरा सम्मान देते हैं। कभी हल्के शब्दों का उपयोग नहीं करते हैं लेकिन अपने कार्यों से वे विरोधियों को चुप करा देते हैं। अनेक बार उन्हें मिथ्या आरोपों से घेरने की कोशिश की गई लेकिन सब की हवा निकल गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं शिवराजसिंह चौहान के मुरीद हैं और यही कारण है कि वे हर बार मध्यप्रदेश की धरा पर आने के लिए तैयार रहते हैं। महाकाल लोक जैसा अविस्मरणीय धार्मिक स्थल के लोकार्पण का अवसर हो, कूनो अभयारण्य आने का विषय हो या निवेशकों का सम्मेलन हो, प्रधानमंत्री हमेशा पहुंचे हैं। महामहिम राष्ट्रपति भी तीन से अधिक बार मध्यप्रदेश का प्रवास कर चुकी हैं। यह सब संयोग नहीं बल्कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की सदाशयता और उनकी मेहनत को देश-दुनिया देख रही है। सरल, सहज और मिलनसार शिवराजसिंह चौहान भले ही अपना जन्मदिन उत्सवी ना मना रहे हों लेकिन एक-एक पौधा अपना आशीष उन्हें प्रदान करता दिख रहा है। जन्मदिन की कोटिश: बधाई। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)

रविवार, 5 फ़रवरी 2023

‘समागम’ का सिनेमा उत्सव


 ‘समागम’ : 23वें वर्ष का पहला अंक

आज स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर हमारे बीच नहीं हैं. उनकी आवाज आज हमारे साथ होने का अहसास कराती है.
समागम टोली लताजी के प्रति अपनी भावांजलि व्यक्त करता है.
भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष का जश्र मनाते हुए ‘समागम’ ने विशेष अंक का प्रकाशन किया था. अब समय है इस सौ साल के बाद गुजरे एक दशक को जानने और समझने का. कोविड-19 का हमला नहीं होता तो सिनेमा में कुछ थोड़ा-बहुत बदलाव आता लेकिन कोविड-19 ने सिनेमा की सूरत बदल दी है. टेक्रालॉजी समृद्ध हुई और सिनेमा देखना आसान लेकिन भाषा को लेकर गिरावट भी साफ देख रहे हैं. बाहुबली से पठान तक की यात्रा का लेखा-जोखा करने का विनम्र प्रयास.

दूध की बढ़ती कीमतें नहीं, हमारी चिंता शेयर बाजार है

मनोज कुमार

दूध की बढ़ती कीमतें अब हमें नहीं डराती हैं। इस बढ़ोत्तरी पर हम कोई विमर्श नहीं करते हैं। हमारा सारा विमर्श का केन्द्र शेयर बाजार है। कौन सा पूंजीपति डूब रहा है, इस पर हम चिंता में घुले जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि शेयर मार्केट की चिंता नहीं करना चाहिए लेकिन पहले तय तो हो कि जीवन के लिए दूध जरूरी है कि शेयर? क्या हम मान लें कि एक साथ तीन रुपये दूध की कीमत में बढ़ोत्तरी कोई माथे पर सलवटें नहीं डालती हैं? क्या हम मान लें कि रोजमर्रा की महंगाई से दो-चार होने को हमने स्वीकार कर लिया है? क्या हम मान लें कि दूध से ज्यादा जरूरी है कि शेयर मार्केट उठ रहा है या गिर रहा है? शायद इस समय का सच यही है कि हमने दूध, सब्जी, किराना और इसी तरह की दिनचर्या की जरूरी चीजों की महंगाई को महंगाई नहीं मान रहे हैं। बढ़ती महंगाई के लिए सत्ता और शासन को हम दोषी बताकर किनारा कर लेते हैं लेकिन जिन्हें शायद कल सत्ता और शासन सम्हालने का अवसर मिले, वे भी खामोश हैं। उनकी चिंता में भी दूध नहीं, शेयर मार्केट की मंदी और उछाल है।

हिडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद कारोबारी खानदान की चूलें क्या हिली, पूरा समाज चिंता में डूब गया। सबको लगने लगा कि यह खानदान डूबा तो हम सब डूब जाएंगे। शायद यह सच भी हो सकता है लेकिन इससे बड़ा सच एक यह है कि सवा सौ करोड़ के इस महादेश में मध्यमवर्गीय परिवारों से एक मोटे अनुमान से दो-पांच प्रतिशत लोग होंगे जिनकी रूचि शेयर मार्केट में है और उनका पैसा शेयर में लगा हो लेकिन 99 फीसदी परिवार दूध का उपयोग करता है, इस बात से इंकार नहीं होना चाहिए। अब आप खुद अंदाज लगाइये कि चिंता 99 फीसदी लोगों की होनी चाहिए या उन दो-पांच परसेंट लोगों की। लेकिन हम बेफ्रिक हैं और यह मानकर चल रहे हैं कि यह सब चलता रहता है। कोराबारी खानदान के साथ अन्य कई कम्पनियों के शेयर के भाव औंधे मुंह गिरे तो बात लाखों करोड़ तक जा पहुंची। यह आम चर्चा का विषय हो गया कि अब तो सब कयामत आने वाली है। लेकिन तीन रुपये दूध की कीमत बढ़ जाने से किसी को उन हजारों-हजार परिवार के दूधमुंहे बच्चों की चिंता नहीं हुई जिनका निवाला छीना जा रहा है। 

बहुत पुराना तो याद नहीं लेकिन हर्षद मेहता के बाद से कुछ और ऐसी घटनाएं घटी हैं जिसने अर्थव्यवस्था पर असर डाला है। हर्षद मेहता के समय भी और उसके बाद भी आम आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ा। तब शायद मीडिल क्लॉस शेयर मार्केट को ना जानता था और ना उसकी हिम्मत थी कि वह ऐसी जगहों पर पैसा इनवेस्ट करे। इसे सीधे शब्दों में समझना चाहें तो कह सकते हैं कि तब आम आदमी की लालच का ग्राफ नियंत्रण में था। अपनी जीवन भर की कमाई को अधिक से अधिक वह एफडी बनाकर रख देता था। लेकिन आज मामला एकदम उलट है। क्या खास और क्या आम, सब लालच की डोर में ऐसे लिपटे दिख रहे हैं कि रातों रात लखपति बन जाना चाहते हैं। और ऐसे सपनों को पूरा करने के लिए उनके पास एक शॉर्टकट बचता है शेयर मार्केट। ऐसे में जब कोई गड़बड़ी उजागर होती है तब शेयर मार्केट में उछाल या मंदी छा जाती है और सबसे नुकसान में वह मिडिल क्लास होता है जिसके सपनों की डोर शेयर से बंधी होती है। ऐसे में डिप्रेशन, हॉटअटैक और मनोरोगियों की तादात में बढ़ोत्तरी हो जाए तो कोई हैरानी नहीं होना चाहिए। एक आम आदमी का शेयर मार्केट में पैसा डूबता है तो वह सडक़ पर आ जाता है लेकिन एक पूंजीपति को इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता है।

हैरानी में डाल देने वाली बात तो यह है कि हर्षद मेहता प्रकरण के बाद से जितने भी कांड हुए हैं, उसे देखने के बाद भी आम आदमी ने कोई सीख नहीं ली। शायद वह दांव पर अपनी कमाई लगा देना चाहता है और जैसा कि होता आया है, मरना, मिटना और तबाह होना उसे ही है। शेयर मार्केट व्यापार नहीं है बल्कि सपनों की दुनिया है और जैसा कि दुनिया का हर देश भारत के बाजार की ओर आस भरी नजरों से देख रहा है तब उसका भी टॉरगेट आम भारतीय ही होता है। उसे पता है कि ‘फ्री गिफ्ट’ आम आदमी को लुभाता है। यह और बात है कि उसके एवज में उसे दुगुना देना पड़ता है। सोशल मीडिया में रिल्स ने तो आम आदमी को शॉर्टकट में कुछ सेकंड में अमीर बनने का नुस्खा बताकर चला जाता है। एक ऐसा ही उदाहरण याद आता है कि एक व्यक्ति, दूसरे से पूछता है कि तुम रोज कितना शराब पीते हो और उसे बताता है कि बीस साल में तुमने इतने की शराब पीकर पैसा खर्च कर दिया। ऐसा नहीं करते तो तुम्हारे पास ऑडी कार होती। तब वह आदमी पलटकर पूछता है कि तुम तो शराब नहीं पीते, फिर तुम्हारी ऑडी कार कहां है? ऐसे सलाहकारों की बड़ी भीड़ है जो शिकारी की तरह आपको उलझाती है। यह ठीक है कि शराब से पैसा ही नहीं, सेहत भी खराब होती है और शराब नहीं पीना चाहिए। मजेदार बात तो यह है कि दूध की बढ़ती कीमत पर रिल्स पर कोई वीडियो, कोई मोटीवेशनल स्पीच या कोई चिंता नहीं दिख रही है। 

जिस बाजारवाद को लेकर एक दशक पहले छाती पीटा जा रहा था, आज वह बाजारवाद हमारी जीवनशैली बन चुका है। कभी तीज-त्योहार पर नए कपड़े खरीदने का चलन था, अब रोज उत्सव हो रहा है। छूट और फ्री ने हर आदमी को उपभोक्ता बना दिया है। युवा वर्ग दो-पांच सौ रुपयों की कॉफी पीने का आदी हो चुका है। पिजा-बर्गर की कीमत के सामने उसे महंगा दूध क्यों बैचेन करेगा? उसके लिए तीन रुपये ही तो है। कभी कहते थे कि सिक्के की चमक के आगे अंधेरा छा जाता है, आज शेयर मार्केट के सामने अंधेरा छा गया है।

शनिवार, 28 जनवरी 2023

इक अखबार बिन सब सून

मनोज कुमार

भारत का संविधान पर्व दिवस 26 जनवरी जनवरी को परम्परानुसार अखबारों के दफ्तरों में अवकाश रहा लिहाजा 27 जनवरी को अखबार नहीं आया और इक प्याली चाय सूनी-सूनी सी रह गयी. 28 तारीख को वापस चाय की प्याली में ताजगी आ गयी क्योंकि अखबार साथ में हाथ में था. अभी हम 2023 में चल रहे हैं और कल 29 तारीख होगी जनवरी माह की और यह तारीख हमारे इतिहास में महफूज है क्योंकि इसी तारीख पर जेम्स आगस्ट हिक्की ने भारत के पहले समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ किया था. शायद तब से लेकर अब तक इक प्याली चाय के साथ अखबार का हमारा रिश्ता बन गया है. हिक्की के अखबार का प्रकाशन 1780 में हुआ था और इस मान से देखें तो भारत की पत्रकारिता की यात्रा 243 साल की हो रही है. भारतीय पत्रकारिता का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि उसने हमेशा जन-जागरण का लोकव्यापी कार्य किया है. कबीर के शब्दों में ढालें तो ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ वाली परम्परा का पोषण भारतीय पत्रकारिता ने किया है. 

शब्द सत्ता का दूसरा नाम अखबार है और शायद यही कारण है कि रसूख वालों को 1780 में जिन अखबारों से डर लगता था, 2023 में भी वही डर कायम है. कानून को अपने हिसाब से जोड़-तोड़ कर लेने में माहिर सत्ताधीश इस बात से हमेशा सजग रहे हैं कि अखबार हमेशा उनसे दूर रहें. आजादी के दौर में अंंग्रेजों की नाक में दम करने वाली पत्रकारिता ने स्वाधीन भारत में भी अपने दायित्व को बखूबी निभाया. नए-नए शासकों और सत्ताधीशों के लिए अखबार में छप जाने वाली इबारत उनकी नींद उड़ा देती है. पत्रकारिता के इस सात्विक कर्म के कारण ही उसे भारतीय परम्परा में चौथा स्तंभ पुकारा गया. इस चौथे स्तंभ ने भी अपनी मर्यादा और दायित्व को पूरी जवाबदारी से निभाते देखा गया. 2023 में हम जब अखबारों की चर्चा करते हैं तो कई विषम स्थितियां हमारे सामने आती हैं. साल 1975 का वह आपातकाल का दौर जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छिन्न-भिन्न करने की कोशिश की. लेकिन कुछ ऐसे अखबार भी रहे जिन्होंने टूटना पसंद किया, झुकना नहीं. इस परिप्रेक्ष्य में कभी लाईमलाईट में रहने वाले लालकृष्ण आडवानी की वह टिप्पणी सामयिक लगती है जब उन्होंने कहा था-‘अखबारों को झुकने के लिए कहा गया लेकिन वे रेंगने लगे।’ 

शायद इसके बाद ही अखबारों की दुनिया बदल गयी। अखबार पत्रकारिता धर्म से परे होकर उद्योग के रूप में सूरत अख्तियार करने लगे. आर्थिक संसाधनों से लैस होकर सत्ता के करीब होते गए और पत्रकारिता हाशिये पर जाने लगी. अखबार देखते ही देखते टेलीविजन में बदल गये. रंगीन फिसलन वाले कागज पर पेजथ्री का कब्जा हो गया. गरीब-गुरवा और शोषित अखबारों से उसी तरह दूर कर दिये गये जिस तरह आज हम टेलीविजन के परदे पर देखते हैं. सत्ता शीर्ष के नाश्ते से लेकर देररात तक शयन कक्ष में जाने की दैनंदिनी क्रियाओं को अखबारों ने महिमामंडित कर छापने लगे. एक पन्ने पर मोहक शब्दों में गुथी गाथा थी तो पारिश्रमिक के तौर पर अगले पन्ने भर का विज्ञापन. यह सच है और इस सच से मुंंह चुराती पत्रकारिता ना कल थी और ना आगे कभी होगी क्योंकि पत्रकारिता का मूल धर्म ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ की रही है और रहेगी. 

29 जनवरी, 1780 का स्मरण करते हैं तब हम खुद से मुंह चुराते हैं क्योंकि इस तारीख को भारतीय पत्रकारिता की नींव रखी गयी थी लेकिन आज 2023 में पत्रकारिता का नाम और रूप बदलकर मीडिया हो गया है. यह भी कम दुर्भाग्यपूर्ण बात नहीं है कि ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ वाली लीक को छोडक़र एक वर्ग इधर का हो गया तो एक वर्ग उधर का हो गया. पाठकों और दर्शकों को भी इसी श्रेणी में बांट दिया गया. जो सत्ता विरोधी बोल और लिख रहा था, वह ईमानदार की श्रेणी में आ गया और जो सत्ता के समर्थन में लिख-बोल रहा था, वह उनका पी_ू हो गया. सच तो यह है कि दोनों श्रेणी के लोग उस पत्रकारिता के हैं ही नहीं जिसकी कल्पना गांधी, तिलक, माखनलाल चतुर्वेदी, पराडक़रजी और विद्यार्थी किया करते थे. सिनेमा के सौ साल के सफर में जब ‘डर्टी पिक्चर’ देखते हैं तो वाह-वाह कर उठते हैं लेकिन अढ़ाई सौ साल की पत्रकारिता के ‘डर्टी मीडिया’ की बात करने से हम सहम जाते हैं. 

नाउम्मीदी का एक घना अंधेरा दिखता है. इसे आप कोहरे में घिरा-छिपा भी कह सकते हैं क्योंकि ना तो घना अंधेरा हमेशा बना रहेगा और ना कोहरे में लिपटा वह झूठ जो सच बनकर दिखाया और समझाया जाता है. अखबार की ताकत हमेशा से मौजूं रही है और आगे भी उसके इस बेबाकीपन से आपका सामना होगा. यह इत्तेफाकन नहीं होगा बल्कि सुनियोजित और सुगठित ढंग से होगा. इस सच के सवाल का जवाब कौन देगा कि जब अखबार अविश्वसनीय हो गए हैं तो 27 जनवरी या 16 अगस्त को क्यों हम उसकी राह तकते हैं? अखबार इतना ही अविश्वसनीय है तो कोरोना में हमने उससे परहेज क्यों नहीं किया? जो लोग मेरे हमउम्र हैं, उन्हें याद दिला दूं कि शशि कपूर अभिनीत ‘न्यू देहली टाइम्स’ ने आगाह कर दिया था कि पत्रकारिता और सत्ता का गठजोड़ कैसे होगा. कैसे पत्रकारिता का चेहरा बदलेगा लेकिन एक खबर पूरे तंत्र को हिला देती है यदि उसमें तडक़ा ना लगाया जाए. तथ्यों और तर्कों के साथ उसे समाज के समक्ष रखा जाए. बहुतेरे साथियों को इस बात की शिकायत होती है कि अब खबर का असर नहीं होता है तो क्या कोई बताएगा कि आपने खबर लिखी कौन सी है और क्यों असर नहीं हुआ। आप मनोरंजन की खबरें लिखें, तो उसे उसी श्रेणी में रहने दें लेकिन लोक समाज के हित में लिखने का साहस रखते हैं तो पांव में बिबाई से ना डरें.

कितना भी आप रो लें, सिर पीट लें लेकिन मुझे यकिन है कि 2023 की 29 जनवरी को भी हम उसी 1780 की 29 जनवरी को जी रहे हैं जिसने भारत में पत्रकारिता का श्रीगणेश किया था. हां, उन अखबारों और पत्रकारों को छोड़ दें जिन्हें अखबार को लोक समाज का प्रहरी बने रहने के बजाय उद्योग बनना है. जब तक ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ से अखबार का रिश्ता बना रहेगा तब तब इक प्याली चाय के साथ दूसरे हाथ में अखबार की जरूरत महसूस होती रहेगी. 

शनिवार, 14 जनवरी 2023

 

एक कोशिश का नाम है ‘समागम’

22 वर्ष पहले ‘समागम’ का प्रकाशन आरंभ किया था. तब मन में कुछ अलग करने का विचार था. पत्रिकाओं की भीड़ तब भी थी और अब भी है. ऐसे में कुछ नया क्या हो, यह दिमाग को मथ रहा था. ऐसे में खयाल आया कि क्यों ना मीडिया रिसर्च को लेकर कोई कार्य आरंभ किया जाए. अकादमिक गतिविधियों से जुडऩे के बाद मेरे विचार को विस्तार मिला. आज 22 वर्ष बाद ‘समागम’ का जो स्वरूप आप देख रहे हैं, वह अपने शुरूआती दिनों में नहीं था लेकिन कोशिश को लोगों ने हौसला दिया. एक चुनौती यह भी थी कि प्रत्येक माह नवीन सामग्री कैसे जुटायी जाएगी? लेकिन यकिन नहीं होता है कि लोगों का स्नेह और सहयोग ने इस संकट को भी दूर कर दिया. आज मोटेतौर पर देखें तो देशभर के सुप्रतिष्ठित प्राध्यापकों, मीडिया विशेषज्ञ एवं शोधार्थियों की लगभग हजार लोगों का साथ है. 

‘समागम’ से रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का सफर भी रोचक रहा है. विभिन्न विश्वविद्यालयों में शिक्षकों और विद्यार्थियों से चर्चा करते हुए मेरी समझ कुछ विकसित हुई. एक ठेठ जर्नलिस्ट का संपादक बन जाना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन एक जर्नलिस्ट का रिसर्च की पत्रिका का एडीटर होना जाना चुनौतीपूर्ण था. आइएसएसएन क्या होता है? प्रीयररिव्यूड जर्नल क्या होता है? जैसे सवालों का जवाब पाकर एक गुणवत्तापूर्ण प्रकाशन की विनम्र कोशिश की है. यह मेरे लिए संतोष की बात है कि देशभर के सुविख्यात शिक्षक एवं पत्रकार मेरे अनुरोध पर तत्काल लिखकर भेजते हैं. आज जब 23वें वर्ष में प्रवेश कर रहा हूं तब पांच लोगों का स्मरण सहज हो आता है. मेेरे मार्गदर्शक बालकवि बैरागी को ‘समागम’ के प्रकाशन के एक दशक बाद डरते हुए अंक भेजा. अचानक उनका फोन आता है ‘बैरागी बोल रहा हूं. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि इतने वर्षों तक मुझे एक समृद्ध पत्रिका से वंचित रखा. अच्छा काम कर रहे हो. रूकना नहीं.’ उसके बाद गलती पर कभी डांट तो बाद में पुचकराते हुए उत्साहवर्धन करते हुए नियमित फोन और खत आना. औरंगाबाद महाराष्ट्र में मीडिया एजुकेशन के गुरु डॉ. सुधीर गव्हाणे सर का इसी तरह मार्गदर्शन मिलता रहा. प्रेमचंद पर शोध को लेकर स्थापित नाम डॉ. गोयनका जी का गलतियों पर ध्यान आकृष्ट करने के लिए फोन करना और सराहना कि अच्छा काम कर रहे हो. डॉ. सोनाली नरगुंदे लिखने का ‘समागम’ को लेकर अनुराग बना रहा. ‘समागम’ को विस्तार देने के लिए वे सतत रूप से प्रयास कर रही हैं. खामोशी के साथ मेरा हौसला बढ़ाने वाले मेरे अग्रज आदरणीय गिरिजा भइया की भूमिका मैं ही समझ सकता हूं.  एकाध ही बार कहा होगा कि दिल्ली में तुम्हारी मैगजीन की तारीफ कर रहे थे. यह मेरे लिये सम्मान से कम नहीं था. मेरे एक और अग्रज श्री जगदीश उपासने इंडिया टुडे के एडीटर रहते हुए ‘समागम’ के बारे में स्वयं लिखकर लोगों तक पहुंचाया. समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ‘समागम’ के कंटेंट को लेकर चर्चा होती रही है. 

देश की अन्य लघु पत्रिकाओं की तरह ‘समागम’ भी आर्थिक झंझावत से गुजर रहा है. लेकिन एक संकल्प और जिद के कारण इसका प्रकाशन अब तक निर्बाध है और शायद आगे भी बना रहे. कोविड काल में भी ‘समागम’ का निरंतर प्रकाशन इस बात की आश्वस्ति है. सबसे सुखद बात यह है कि मेरे साथ अनेक नाम हैं जिनका उल्लेख करना संभव नहीं होगा लेकिन वे परछायी की तरह ‘समागम’ के साथ खड़े हैं. आगे भी यह सिलसिला बना रहे और आपका सहयोग, शुभेच्छा और स्नेह बना रहे.

मनोज कुमार    संपादक


शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

गांधी की याद में प्रवासी भारतीय दिवस

 
मनोज कुमार
इंदौर में आयोजित सत्रहवां प्रवासी भारतीय दिवस तारीख 9 जनवरी के महत्व को दर्शाता है. 9 जनवरी महज कैलेंडर की तारीख नहीं बल्कि इतिहास बदलने की तारीख है जिसका श्रेय महात्मा गांधी को जाता है. आज ही के दिन 1915 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ भारत वापस लौटे थे. 09 जनवरी 1915 की सुबह बंबई (अब मुंबई) के अपोलो बंदरगाह पर गांधी जी और कस्तूरबा पहुंचे तो वहां मौजूद हजारों कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने शानदार तौर तरीके से उनका इस्तकबाल किया था. अब महात्मा गांधी के वापसी के दिन को हर साल भारत में प्रवासी दिवस के तौर पर मनाया जाता है. इस दिन हर साल भारत के विकास में प्रवासी भारतीय समुदाय के योगदान को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है. महात्मा गांधी ने साल 1893 में 24 साल की उम्र में वकालत के लिए साउथ अफ्रीका का रुख किया था. वह वहां 21 साल तक मुकीम रहे. इस दौरान उनकी शोहरत एक बड़े और तजरुबेकार वकील के तौर पर हो चुकी थी. इस अर्से में गांधी जी ने मजलूमों और बेसहारों के लिए कई लड़ाईयां लड़ीं और जीतीं भी. इस दौरान इसकी चर्चा भारत में भी हुई और यहां के लोगों की गांधी जी से उम्मीदें बंधने लगीं. अफ्रीका में गांधी जी के सियासी और अखलाकी फिक्रों की तरक्की हुई थी. साउथ अफ्रीका में अपनी चमड़ी के रंग की वजह से उन्हें बहुत भेदभाव झेलना पड़ा. उन्होंने वहां भारतीयों और अश्वेतों के साथ होने वाले भेदभावों के खिलाफ आवाज उठाई और उनके हक के लिए कई लड़ाइयां लड़ीं और इनमें गाधी जी को कामयाबी भी मिली.
    यह तारीख अंतत: दुनिया भर में प्रवासी भारतीयों और औपनिवेशिक शासन के तहत लोगों के लिए और भारत के सफल स्वतंत्रता संघर्ष के लिए प्रेरणा बने।  प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन आयोजित करने का प्रमुख उद्देश्य भी प्रवासी भारतीय समुदाय की उपलब्धियों को दुनिया के सामने लाना है ताकि दुनिया को उनकी ताकत का अहसास हो सके। देश के विकास में भारतवंशियों का योगदान अविस्मरणीय है। वर्ष 2015 के बाद से हर दो साल में एक बार प्रवासी भारतीय दिवस देश में मनाया जा रहा है।
प्रवासी भारतीय दिवस मनाने का निर्णय एल.एम. सिंघवी की अध्यक्षता में भारत सरकार द्वारा स्थापित भारतीय डायस्पोरा पर उच्च स्तरीय समिति की सिफारिशों के अनुसार लिया गया था। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 9 जनवरी 2002 को प्रवासी भारतीय दिवस को व्यापक स्तर पर मनाने की घोषणा की। इस आयोजन ने प्रवासी भारतीयों की भारत के प्रति सोच को सही मायनों में बदलने का काम किया है। साथ ही इसने प्रवासी भारतीयों को देशवासियों से जुडऩे का एक अवसर उपलब्ध करवाया है। इसके माध्यम से दुनिया भर में फैले अप्रवासी भारतीयों का बड़ा नेटवर्क बनाने में भी मदद मिली है, जिससे भारतीय अर्थ-व्यवस्था को भी एक गति मिली है। हमारे देश की युवा पीढ़ी को भी जहाँ इसके माध्यम से विदेशों में बसे अप्रवासियों से जुडऩे में मदद मिली है वहीं विदेशों में रह रहे प्रवासियों के माध्यम से देश में निवेश के अवसरों को बढ़ाने में सहयोग मिल रहा है।
तत्कालीन प्रधानमंत्री की पहल को आगे बढ़ाने तथा प्रवासी भारतीय समुदाय को भारत से जोडऩे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका उल्लेखनीय रही है। वह अपने विदेशी दौरों में जिस भी देश में जाते हैं वहाँ के प्रवासी भारतीयों के बीच भारत की एक अलग पहचान लेकर जाते हैं। इससे उनमें अपनेपन की भावना का अहसास होता है और प्रवासी भारतीय भारत की ओर आकर्षित होते हैं। विश्व में विदेशों में जाने वाले प्रवासियों की संख्या के संदर्भ में भारत शीर्ष पर है। भारत सरकार ‘ब्रेन-ड्रेन’ को ‘ब्रेन-गेन’ में बदलने के लिये तत्परता के साथ काम कर रही है। आर्थिक अवसरों की तलाश के लिये सरकार इनको अपने देश की जड़ों से जोडऩे का प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में प्रवासी जिस उत्साह के साथ जुटते हैं वह इस बात को साबित करता है कि प्रवासी प्रधानमंत्री के नेतृत्व को उम्मीदों भरी नजऱों से देखते हैं और उनसे उनको बड़ी उम्मीदें हैं। भारतीय प्रवासियों की तादाद दुनिया भर में फैली है। आज दुनिया के कई देशों में भारतीय मूल के लोग रह रहे हैं जो विभिन्न कार्यों में संलग्न हैं। यदि भारत सरकार और प्रवासी भारतीयों के बीच आपसी समन्वय और विश्वास और अधिक बढ़ सके तो इससे दोनों को लाभ होगा। भारत की विकास यात्रा में प्रवासी भारतीय भी हमारे साथ हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रवासी भारतीय दिवस मनाने के प्रति जो उद्देश्य निहित हैं उनमें अप्रवासी भारतीयों की भारत के प्रति सोच, उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ ही उनकी अपने देशवासियों के साथ सकारात्मक बातचीत के लिए एक मंच उपलब्ध कराना प्रमुख है. इसके साथ ही  भारतवासियों को अप्रवासी बंधुओं की उपलब्धियों के बारे में बताना तथा अप्रवासियों को देशवासियों की उनसे अपेक्षाओं से अवगत कराना, विश्व के 110 देशों में अप्रवासी भारतीयों का एक नेटवर्क बनाना, भारत का दूसरे देशों से बनने वाले मधुर संबंध में अप्रवासियों की भूमिका के बारे में आम लोगों को बताना, भारत की युवा पीढ़ी को अप्रवासी भाईयों से जोडऩा तथा भारतीय श्रमजीवियों को विदेश में किस तरह की कठिनाइयों का सामना करना होता है, के बारे में विचार-विमर्श करना। 
भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा डायस्पोरा है। प्रवासी भारतीय समुदाय अनुमानत: 2.5 करोड़ से अधिक है। जो विश्व के हर बड़े क्षेत्र में फैले हुए हैं। फिर भी किसी एक महान् भारतीय प्रवासी समुदाय की बात नहीं की जा सकती। प्रवासी भारतीय समुदाय सैकड़ों वर्षों में हुए उत्प्रवास का परिणाम है और इसके पीछे विभिन्न कारण रहे हैं, जैसे- वाणिज्यवाद, उपनिवेशवाद और वैश्वीकरण। इसके शुरू के अनुभवों में कोशिशों, दु:ख-तकलीफों और दृढ़ निश्चय तथा कड़ी मेहनत के फलस्वरूप सफलता का आख्यान है। 20वीं शताब्दी के पिछले तीन दशकों के उत्प्रवास का स्वरूप बदलने लगा है और ‘नया प्रवासी समुदाय’ उभरा है जिसमें उच्च कौशल प्राप्त व्यावसायिक पश्चिमी देशों की ओर तथा अकुशल,अर्धकुशल कामगार खाड़ी, पश्चिम और दक्षिण पूर्व एशिया की और ठेके पर काम करने जा रहे हैं।
प्रवासी भारतीय समुदाय एक विविध विजातीय और मिलनसार वैश्विक समुदाय है जो विभिन्न धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और मान्यताओं का प्रतिनिधित्व करता है। एक आम सूत्र जो इन्हें आपस में बांधे हुए है, वह है भारत और इसके आंतरिक मूल्यों का विचार। प्रवासी भारतीयों में भारतीय मूल के लोग और अप्रवासी भारतीय शामिल हैं और ये विश्व में सबसे शिक्षित और सफल समुदायों में आते हैं। विश्व के हर कोने में, प्रवासी भारतीय समुदाय को इसकी कड़ी मेहनत, अनुशासन, हस्तक्षेप न करने और स्थानीय समुदाय के साथ सफलतापूर्वक तालमेल बनाये रखने के कारण जाना जाता है। प्रवासी भारतीयों ने अपने आवास के देश की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है और स्वयं में ज्ञान और नवीनता के अनेक उपायों का समावेश किया है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)


बुधवार, 28 दिसंबर 2022

मेरा पसंदीदा रंग तो आज भी काला है...

मनोज कुमार

     तुम खेलो रंगों से, रंग बदलना तुम्हारी आदत में है, मेरा पसंदीदा रंग तो आज भी काला है और काले रंग में समा जाना तुम्हारी फितरत में नहीं क्योंकि तुम रंग बदलने में माहिर हो. साल 2022 मीडिया के ऐसे ही किस्से कहानियों का साल रहा है. सबकी उम्मीदें रही कि मीडिया निरपेक्ष रहे लेकिन यह उम्मीद दूसरे से रही है. कोई खुद निरपेक्ष नहीं बन पाया. मीडिया निरपेक्ष हो भी तो कैसे? किसी एक के पक्ष में लिखना होगा और जब आप किसी के पक्ष में लिखेंगे तो स्वत: आप दूसरे के टारगेट पर होंगे. गोदी मीडिया एक शब्द गढ़ा गया लेकिन कोई यह बताने को तैयार नहीं है कि गोदी मीडिया क्या है? आज जो सत्ता में है, गोदी मीडिया उसकी, कल जो सत्ता में आएगा, गोदी मीडिया उसकी लेकिन पत्रकारिता इन सबसे परे है. पत्रकारिता समाज की है. मुश्किल यह है कि जिस पुण्य कार्य से हमारी पहचान है, हमारा जीवन चलता है, उसे ही हम गरिया रहे हैं. साल 2022 ऐसे ही चरित्र के कारण गिना जाएगा.

मीडिया का मतलब अब जो समझा गया या समझा जा रहा है, वह सोशल मीडिया है. इसके बाद टेलीविजन का क्रम आता है और सबसे आखिर में प्रिंट का. सोशल मीडिया कितना बेहाल है, यह किसी से छिपा नहीं है. कोई नियंत्रण नहीं, कोई देखरेख नहीं, जिसे जो सूझा, वह लिख दिया और शेयर, लाईक और फालो पर सोशल मीडिया जिंदा है. जिन्हें जो भाया, उन्होंने उसे सत्य मान लिया और यही कारण है कि समाज को मार्ग दिखाने वाला खुद भटकाव का शिकार हो गया. सच और गलत के मध्य कोई लक्ष्मण रेखा शेष नहीं रहा. इसके बाद टेलीविजन मीडिया ने इसे आगे बढ़ाया. मीडिया की दुनिया से बावस्ता लोगों को इस बात का ज्ञान है कि रोज सुबह मीटिंग में तय किया जाता है कि आज किस खबर को खेलना है. ‘खबर खेलने’ का यह चलन टेलीविजन ने शुरू किया. और इसके बाद किसी एक विषय को लेकर दर्शकों का हैमरिंग किया जाता रहा. बचे-खुचे में शाम को डिबेट के नाम पर शोर-शराबा, आरोप-प्रत्यारोप और एकाध बार तो दंगल का मैदान भी बन चुका है. हालात यह हो गए कि उकता गए लोग अब न्यूज चैनल से तौबा करने लगे हैं. आम आदमी तो आम आदमी, मीडिया से जुड़े लोग भी अब न्यूज चैनल से दूरी बनाने लगे हैं. यह चलन 2022 में देखने को मिला.

2022 में सबसे ज्यादा विश्वसनीय बनकर उभरा तो प्रिंट मीडिया. प्रिंट मीडिया में भी अखबारों की भूमिका संजीदा रही. इसका एक बड़ा कारण समय का प्रतिबंध रहा क्योंकि लाख कोशिशों के बाद भी 24 घंटे में एक बार ही अखबार का प्रकाशन हो पाता है. पेज संख्या भी सुनिश्चित है इसलिए संपादक चाहे तो भी तो उसके हाथ बंधे होते हैं. अखबारों की मर्यादा यह भी है कि उसे नापतौल कर शब्द लिखने होते हैं और जब सूचनाओं का सैलाब तटबंध तोडक़र बह रहा हो तो सूचनाओं के मध्य खबर तलाशने में अखबारों को विशेष तौर पर मेहनत करनी होती है. और शायद यही कारण है कि हजारों चुनौतियों के बाद भी अखबारों की विश्वसनीयता ना केवल कायम रही बल्कि उसमें इजाफा भी हुआ.

मीडिया में नायक बनने का दौर भी 2022 ने देखा. सोशल मीडिया में नायक जैसा कोई चेहरा शायद ढूंढे से ना मिले और अखबारों में नायक संपादक होने का दौर लगभग खत्म हो चुका है क्योंकि संपादक संस्था कब से अपना अस्तित्व खो चुका है. हां, बेहतर रिपोर्टिंग के लिए रिपोर्टर को शाबासी मिलती है लेकिन नायक नहीं बनाया जाता है. हमारे समय के नायक रिपोर्टर के रूप में अरूण शौरी ने बोफोर्स सौदे का जो खुलासा किया, उसकी गूंज सालों साल तक गुंजती रही. ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे लेकिन अब इस पर भी विराम लग चुका है.  

नायक बनने और बनाने का दौर टेलीविजन पत्रकारिता तक सिमट कर रह गया है. थोड़ा गौर से देखें और समझने की कोशिश करें तो 2022 आते-जाते मीडिया के नायक के रूप में रवीश कुमार दिखते हैं. रवीश कुमार एंग्री यंग मेन की वैसी ही भूमिका में हैं जैसे कभी अमिताभ बच्चन हुआ करते थे. दोनों में साम्य इस बात को लेकर है कि दोनों परदे के हीरो तो रहे, परदे के एंग्री यंग मेन तो रहे लेकिन वास्तविक जिंदगी में इनका कोई असर नहीं दिखा. अमिताभ परदे पर अन्याय और अत्याचार के खिलाफ खड़े हो जाते थे, जैसे रवीश तथाकथित गोदी मीडिया के खिलाफ खड़े हो जाते हैं. शासन-प्रशासन को आइना दिखाते हैं लेकिन सच तो यह है कि वास्तविक जिंदगी में कोई बदलाव नहीं दिखा. सच तो यह है कि हम जो नहीं कर पाते हैं या बोल नहीं पाते हैं, उसे परदे पर उतरता देख हम इत्मीनान कर लेते हैं कि चलो, कोई तो हमारी बात कह रहा है. यह मध्यमवर्गीय समाज का संकट सदियों से बना रहा है.    

साल 2022 की मीडिया को रवीश कुमार के लिए याद किया जाएगा. दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजे गए रवीश कुमार तथाकथित गोदी मीडिया के खिलाफ नायक बनकर उभरे. उनकी छवि ऐसी बन गई थी कि किसी पत्रकार, लेखक या कवि की पंक्ति को उन्होंने अपने प्रोग्राम में दोहरा दिया तो वह पत्रकार, लेखक या कवि स्वयं को धन्य मानता था. रवीश के रोज-ब-रोज आलोचनात्मक भाषण को लोगों ने चाव से सुना लेकिन याद नहीं पड़ता कि कभी उन्हें सीरियस लिया गया होगा. उनके ही एक पुराने सहयोगी दिल्लगी में याद दिलाते हैं कि कभी दूरदर्शन को बुद्धु बक्सा कहा गया और उसे सरकारी भोंपू पुकारा गया तब जसपाल भट्टी का उल्टा-पुल्टा हास्य प्रोग्राम शुरू किया गया. लोगों का मनोरंजन खूब हुआ लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला. आज भी कुछ वैसा ही है. उनकी बातेेंं अतिरंजित हो सकती है लेकिन एकाएक खारिज नहीं किया जा सकता है. 

पत्रकारों को गरियाने वाले, उन्हें गोदी मीडिया कहने वालों से साल 2022 पूछ रहा है कि क्या वे जिस चैनल में हैं, उसकी नीतियों के खिलाफ जा सकते हैं? क्या आप अपनी स्वतंत्र राय रख सकते हैं? शायद इन लोगों ने शशि कपूर अभिनीत फिल्म ‘न्यू देहली टाइम्स’ नहीं देखा है. एक बार देखिये कि चौथे स्तंभ और राजनीति में जब गठजोड़ होता है तो पत्रकार कैसे मरता है. उस दर्द को महसूस करिये कि मेहनत से लिखी गई आपकी खबर समझौते की भेंट चढ़ जाती है. कभी गौर से उन प्रोग्राम को जरूर देखिये जिसमें सरकार के पक्ष में तो एंकर चिल्लाता है लेकिन इस चिल्ल-पों के बीच एक वाक्य ठोंक भी देता है. इस एक वाक्य को हम जानबूझकर अनदेखा कर देते हैं. सवाल यह भी है कि जब आप किसी चैनल या अखबार की कमान सम्हालते हैं तो क्या आप उनकी नीतियों को आगे बढ़ाते हैं या उनके ही खिलाफ खड़े हो जाते हैं? यह दौर भी था कभी लेकिन अखबारों में. टेलीविजन इंडस्ट्री में ऐसी कल्पना करना भी बेमानी है. आखिरकार लाखों की सेलरी और करोड़ों का इंवेस्टमेट्स का मेंटनेंस कैसे होगा? ये सब बातें हैं बातों का क्या?  

सबसे दुखद और डरावना पक्ष यह है कि 2022 और इसके पहले के वर्ष के मीडिया के चरित्र और व्यवहार को देखें तो मीडिया में आने वाले नए विद्यार्थियों को देखकर डर लगने लगता है. वे मानस बनाकर आ रहे हैं. उन्हें इसी मानस के साथ पढ़ाया जा रहा है. कोई चार दशक पहले जब हमने पत्रकारिता का ककहरा सीखना शुरू किया था तब पत्रकारिता का अर्थ था समाज की समस्याओं से रूबरू होना. किसी दुखी-पीडि़त पक्ष को न्याय दिलाना. तब हमें बताया गया था कि सभा-सम्मेलन में जाएं तो यह अपेक्षा ना करें कि विशिष्ठ मेहमान के रूप में आपकी आवभगत की जाए बल्कि आपको एक गिलास पानी के लिए भी ना पूछा जाए तो दुखी ना होइए. आज दौर उल्टा है. मीडिया से होने का अर्थ बताया जा रहा है कि आप विशिष्ट हैं और आपका आवभगत करना आयोजकों का नैतिक दायित्व है. ये जो पीढ़ी पराढकरजी, विद्यार्थीजी, माखनलाल चतुर्वेदी, तिलक, भगतसिंह, गांधी को पढक़र तो आ रही है लेकिन इनके आदर्श 2022 में रूपक मर्डोक हो गए हैं. पत्रकारिता दिल्ली नहीं देहात से शुरू होती है और मीडिया दिल्ली से शुरू होकर देहात तक जाती है. लेकिन 2022 ने दिल्ली की पत्रकारिता को ही माइलस्टोन बना दिया.

रूखे-सूखे और मुझ जैसे दीन-हीन पत्रकार के लिए पीटर भाटिया एक उम्मीद की तरह मेरे सामने हैं जो अपने साथियों की नौकरी बचाने के लिए खुद की नौकरी को दांव पर लगा देते हैं. अमेरिका के प्रमुख प्रकाशन ‘डेट्रायट फ्री प्रेस’ के सम्पादक और उपाध्यक्ष भाटिया ने इसलिये नौकरी छोडऩे का फैसला किया कि उन्हें जितनी सेलरी मिलती है, उससे दस साथियों की नौकरी बच सकती है. मीडिया कहें या पत्रकारिता क्या भारत में ऐसा कोई नायक सामने आएगा जो अपने साथियों की नौकरी की खातिर अपनी नौकरी दांव पर लगा दे? यू ट्यूब पर हिट्स, लाईक और कमाई गिनते बड़े पत्रकारों ने अपनी इस कमाई का कितना हिस्सा कोरोना में बेरोजगार होते साथियों पर खर्च किया, यह सवाल जाते-जाते 2022 पूछ रहा है. इसलिये तो कहता हंू कि आज भी मेरा पसंदीदा रंग काला है.

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