शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

मेरा मध्य प्रदेश; हृदय प्रदेश का सप्तक


प्रो. मनोज कुमार

वरिष्ठ पत्रकार, भोपाल

सप्तक अर्थात सात यानि मध्यप्रदेश के जन्म के सत्तर वर्ष। सब कुछ अनूठा, सबकुछ अलग। जब बना तब भी और आज सात दशक बाद भी। मध्यप्रदेश का भाग्य सोने की कलम से नहीं लिखा गया था और ना ही उसकी हथेलियों में सरसों उग जाने का कोई सपना बोया गया था। अपने दम पर, अथक संघर्ष और जीत लेने की आकांक्षा ने उसे अलग बना दिया। यह होना ही था क्योंकि मध्यप्रदेश एक राज्य मात्र नहीं है, वह समूचे भारत वर्ष का ह्दय है और इसे स्वस्थ्य रहना ही था। कभी इसे बीमारू राज्य कहा गया तो कभी पिछड़ा लेकिन आज वह अपने दम पर आगे और आगे है। इस दिलदार मध्यप्रदेश का कोई मुकाबला नहीं। हालात यह बन चले हैं कि योजना बनती है मध्यप्रदेश के नागरिकों के लिए और लागू करते हैं देश के अलग-अलग राज्य। सात दशक की यात्रा का विवेचन करते हैं तब रोमांच से इस प्रदेश कर नागरिक भर जाता है। खुद को उल्लासित और गौरवांवित महसूस करता है।  
थोड़ा, पीछे चलना होगा। एक-दो कदम नहीं, सत्तर साल पहले। वही एक नवंबर, साल 1956 जब मध्यप्रदेश की नींव रखी गई। भारत वर्ष के मानचित्र पर मध्यप्रदेश चिंहित होता है तब से लेकर अब तक वह भाषाई और भौगोलिक विविधताओं का एक महाकोलाज बना हुआ। यही कोलाज उसे देश का ह्दय प्रदेश का दर्जा देता है।  मध्यप्रदेश का गठन विंध्य प्रदेश, मध्य भारत, भोपाल राज्य और पुराने सीपी एंड बरार के महाकौशल को मिलाकर एक ऐसा ढाँचा तैयार किया गया, जिसके पास कोई एक ऐतिहासिक केंद्र नहीं था, बल्कि अपनी-अपनी विशिष्टताओं के साथ धडक़ते कई केंद्र थे। आहिस्ता-आहिस्ता मध्यप्रदेश खुद से लड़ते हुए आगे बढऩे लगा। इसलिए कह सकते हैं कि सात दशक का सफर अपनी अस्मिता को तलाशने, उसे गढऩे और फिर देश के ‘हृदय प्रदेश’ के रूप में खुद को स्थापित करने की एक महागाथा है।
भारत को आजादी मिलने के बाद 9 साल बीत चुके थे। राज्यों की सीमाएं भाषाई और सांस्कृतिक असमानता के कारण विवादों में थीं। 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम लागू किया गया, जिसके तहत देश में 14 नए राज्य बनाए गए। इन्हीं में से एक था मध्यप्रदेश। अपने शुरुआती दशकों में मध्य प्रदेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक साझा पहचान विकसित करने की थी। मालवा की संस्कृति अलग थी, बुंदेलखंड का मिजाज जुदा था, बघेलखंड अपनी ठसक में था और महाकौशल तथा गोंडवाना के अपने सरोकार थे। भोपाल को राजधानी तो चुन लिया गया, लेकिन इसे दिल से स्वीकारने में राज्य के अलग-अलग हिस्सों को वक्त लगा। आज समय बदल गया है। 70 साल की यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि आज इंदौर का पोहा-जलेबी हो, ग्वालियर की तानसेन परंपरा हो, जबलपुर का मार्बल रॉक हो या झाबुआ तक की जनजातीय विरासत—यह सब मिलकर एक अखंड पहचान बनते हैं। आज यहां का नागरिक खुद को बुंदेली या मालवी कहने से पहले गर्व से कहता है, ‘हम मध्य प्रदेश के हैं।’
ह्दय प्रदेश का ‘सप्तक’ हो जाना अपने आपमें कई मायनों में उल्लेखनीय रहा है। भौगोलिक रूप से भले ही मध्यप्रदेश सुडौल नहीं हो लेकिन आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से यह अपने आपमें विशिष्ट है। मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल से लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की दृष्टि ने मध्यप्रदेश को विकसित राज्य का चेहरा दिया है। राजनीति के मंच पर सबके अपने विचार और समझ है लेकिन मध्यप्रदेश के विकास की बात आती है तो इनका एका भी अपनेआप में मिसाल कायम करता है। बहुधा हुआ है जब सत्ताधारी दल के साथ प्रतिपक्ष ने अपनी आवाज मिलायी है तो यह भी हुआ है कि राज्य को नुकसान देने वाली हर पहल का प्रतिपक्ष ने विरोध कर अपनी जिम्मेदारी का परिचय दिया है। सबने मिलकर मध्यप्रदेश का भारत का अतुल्य प्रदेश के रूप में गढ़ा है।
मध्यप्रदेश में सबकुछ अच्छा-अच्छा ही नहीं रहा। उसके हिस्से में विभाजन से लेकर दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी का लेखा-जोखा भी आया है। देश में सबसे अधिक बार स्वच्छ शहर का तमगा पहनने वाले मध्यप्रदेश की उपलब्धियाँ अनगिनत है। खासतौर पर महिला कल्याण के लिए जो कुछ यहाँ हुआ, वह पूरे भारत के लिए नजीर है। पुरातत्व के मामले में मध्यप्रदेश बेजोड़ है तो सनातनी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए धार्मिक पर्यटन के रूप में लगातार नए प्रयास करता हुआ आगे बढ़ रहा है। खनिज और वन के मामले में इस संपन्न प्रदेश की पहचान अब एक चीता संपन्न राज्य के रूप में चिंहित हुआ है। मध्यप्रदेश के धरतीपुत्रों को लेकर राज्य सरकार के अभिनव प्रयासों ने उन्हें अलग पहचान के साथ उन्हें भरोसा भी दिलाया है, ठीक वैसे ही जैसे किसानों, मजदूरों और युवाओं के लिए। औद्योगिक परिदृश्य में मध्यप्रदेश ने जो उल्लेखनीय प्रयास किया है, उसके परिणाम जमीनीतौर पर देखने को मिल रहा है।
औद्योगिक विकास के इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी झेलने का दुर्भाग्य भी मध्यप्रदेश के खाते में ही है। प्रदेश की राजधानी भोपाल का गैस कांड आज भी विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक ट्रेजेडी (आपदा) के रूप में दर्ज है। 2-3 दिसंबर 1984 की रात यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशनकारखाने से निकली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस ने एक ही रात में दस हजार से अधिक लोगों की जान ले ली थी। इस गैस के प्रभाव से पचास हज़ार लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए थे, वहीं पांच लाख लोगों में इसका असर दिखाई दिया था।
इन 70 वर्षों के सफर का सबसे निर्णायक और ऐतिहासिक मोड़ 1 नवंबर 2000 को आया, जब राज्य का पुनर्गठन हुआ और दक्षिण-पूर्वी हिस्से को अलग कर ‘छत्तीसगढ़’ को देश का 26वां राज्य बनाया गया। इस विभाजन से पहले मध्य प्रदेश क्षेत्रफल के लिहाज से भारत का सबसे बड़ा राज्य हुआ करता था। छत्तीसगढ़ के अलग होने के बाद यह खिताब राजस्थान के पास चला गया और मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर आ गया। विभाजन केवल जमीनी सीमाओं का नहीं था, बल्कि इसके साथ ही राज्य का एक बड़ा खनिज संपदा (कोयला, लोहा), सघन वन क्षेत्र और धान का कटोरा कहे जाने वाला उपजाऊ इलाका नवगठित राज्य के पास चला गया।
भारतीय राजनीतिक इतिहास में कई राज्यों के विभाजन हिंसक या कटुतापूर्ण रहे हैं, लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का अलग होना प्रशासनिक और सामाजिक रूप से बेहद शांतिपूर्ण और परिपक्व रहा। दोनों राज्यों ने एक-दूसरे की सांस्कृतिक कडिय़ों को टूटने नहीं दिया। आज भी दोनों प्रदेशों के लोगों के बीच ‘बड़े भाई और छोटे भाई’ जैसा स्नेह बना हुआ है।
मध्य प्रदेश भारत का सबसे बड़ा जनजातीय जनसंख्या वाला राज्य है। गोंड, भील, बैगा, सहरिया और भारिया जैसी जनजातियों की संस्कृति केवल जंगलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मध्य प्रदेश ने उन्हें मुख्यधारा के विमर्श में सहेजने का काम किया है। भोपाल का जनजातीय संग्रहालय जनजातीय कला और कलाकारों का तीर्थ है। यह उल्लेखनीय है कि करीब-करीब दर्जन भर जनजातीय कलाकारों को पद्यश्री जैसे राष्ट्रीय सम्मान मिल चुका है। देश के साथ विदेशों में इनका फलक काफी बड़ा है।
छत्तीसगढ़ के अलग होने के बाद कई विश्लेषकों का मानना था कि प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के चले जाने से मध्य प्रदेश आर्थिक रूप से कमजोर हो जाएगा। आर्थिक मोर्चे पर मध्यप्रदेश का सफर चुनौतीपूर्ण था। एक समय था जब देश के पिछड़े राज्यों के लिए बने ‘बीमारू’ शब्द में ‘म’ का मतलब मध्य प्रदेश हुआ करता था। सडक़ों के नाम पर गड्ढे, बिजली के नाम पर कटौती और खेती के नाम पर सूखा इस राज्य की नियति मान लिए गए थे। लेकिन मध्य प्रदेश ने इस चुनौती को अवसर में बदल दिया। विगत ढाई दशकों में राज्य ने अपनी नीतियां बदलीं और बुनियादी ढाँचे  के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया। कृषि के क्षेत्र में तो मध्य प्रदेश ने पंजाब और हरियाणा को भी पीछे छोड़ दिया। वर्ष 2026 को मध्य प्रदेश सरकार ‘किसान कल्याण वर्ष’ के रूप में मना रही है और इस साल के स्थापना दिवस की थीम भी ‘समृद्ध किसान-समृद्ध प्रदेश’ रखी गई है, जो इसकी कृषि क्रांति का जीवंत प्रमाण है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कहते हैं कि आज का मध्यप्रदेश उस दौर से बहुत आगे निकल चुका है जब इसे ‘बीमारू राज्य’ कहा जाता था। अब यह राज्य कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में अग्रणी है। डॉ. यादव ने कहा कि प्रदेश अब ‘भारत का फूड बास्केट’ बन चुका है। अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के साथ ही किसानों की आय दोगुनी करने के लिए अनेक योजनाएं प्रभावी रूप से लागू की गई हैं। सिंचाई क्षमता का लगातार विस्तार, कृषि में आधुनिक तकनीक का उपयोग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण ने प्रदेश की आर्थिक स्थिति को नई मजबूती दी है।
70 साल के मध्य प्रदेश को आज दुनिया के नक्शे पर देखना हो, तो इसके सबसे बड़े प्रतीक हैं-इंदौर और भोपाल। इंदौर ने लगातार कई वर्षों तक देश का सबसे स्वच्छ शहर बनकर अर्बन प्लानिंग और नागरिक चेतना की नई परिभाषा गढ़ी है। वहीं भोपाल देश की सबसे हरी-भरी और खूबसूरत राजधानियों में शुमार है। पर्यटन के क्षेत्र में खजुराहो, सांची, भीमबेटका के तीन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों से लेकर ‘चीता और टाइगर स्टेट’ तक की पहचान ने मध्य प्रदेश को वैश्विक पटल पर ला खड़ा किया है।
अनेकता में एकता और विविधता मध्यप्रदेश की पहचान है। यहाँ के तीज-त्योहार और उत्सव मध्यप्रदेश की जीवंतता के प्रतीक हैं।  यहाँ की लोक-संस्कृति में त्यौहारों का एक विशेष स्थान है, जो न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाते हैं बल्कि सामाजिक समरसता, सामूहिक आनंद और आपसी भाईचारे का सबसे बड़ा संदेश देते हैं। मध्य प्रदेश में जनजातीय परंपराओं, प्रादेशिक लोक-पर्वों और होली-दिवाली जैसे देशव्यापी त्यौहारों का ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है, जो पूरे समाज को एक सूत्र में पिरो देता है।
मध्यप्रदेश सबसे अलग और अनोखा है। वरिष्ठ पत्रकार श्री महेश श्रीवास्तव का लिखा  ‘मध्यप्रदेश गान’ सुनते हैं तो समूचा मध्यप्रदेश आँखों के सामने जीवंत हो उठता है। माँ नर्मदा से लोकमाता अहिल्या का स्मरण करता यह गीत मध्यप्रदेश की विशेषताओं को विशेषण से भर देता है। और हम सब कह उठते हैं-‘मेरा मध्यप्रदेश’
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

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