रविवार, 6 दिसंबर 2015

सहिष्णुता-असहिष्णुता का विलाप


मनोज कुमार
 सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का यह मुद्दा उन लोगों का है जिनके पेट भरे हुए हैं। जो दिन-प्रतिदिन टेलीविजन के पर्दे पर या अखबार और पत्रिकाओं के पन्ने पर पक्ष लेते हैं दिखते हैं अथवा देश और सरकार को कोसते हैं। ये वही आमिर खान हैं जिन्होंने कभी भोपाल में कहा था कि उनकी मां उनसे कहती हैं कि बेटा, चार पैसा कमा ले। बेचारे गरीब आमिर को इस बार उनकी पत्नी कहती हैं कि देश असहिष्णु हो चला है, चलो देश छोड़ देते हैं। आमिर अपनी निजी बातें सार्वजनिक मंच से शेयर करते हैं. आमिर का यह विलाप देश की चिंता में नहीं है, यह अपने गिरते हुए फिल्मी बाजार को सम्हालने की कोशिश हैं। देश आमिर से पूछना चाहता है कि आमिर तुम स्टार नहीं होते तो यह बातें किस सार्वजनिक मंच से कहने का अवसर मिलता? कौन तुम्हें बोलने का मौका देता और मिल भी जाता तो कौन सुनता? चलो, आमिर कुछ देर के लिए मान भी लेते हैं कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे से तुम जख्मी हो और पत्नी की बात देशवासियों को अपना परिवार मानकर उनसे शेयर कर रहे हो। अब सवाल यह है कि देश में लगभग हर राज्य में किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो क्या एक देशभक्त आमिर का कर्तव्य नहीं है कि वह किसानों के बीच जाए और उनके दर्द बांटे, देशवासियों से किसानों की पीड़ा शेयर करे और उनकी मदद के लिए कोई उपाय तलाशे। यह शायद तुम नहीं करोगे. तुम अपनी ड्यूटी और राईट्स भूल जाते हो क्योंकि किसानों की पीड़ा हरने का काम तो सरकार और तंत्र का है, एक सेलिबे्रटी का तो है नहीं।  
आमिर एक बात और बता दूं। मेरे और मुझ जैसे लाखों लोग इस देश में होंगे जिनके घरों में मां, पत्नी, बहन, भाभी, चाची और मौसी के साथ साथ बच्चे भी कई मुद्दों पर बात करते हैं लेकिन इनके दिमाग में गलती से देश तो क्या शहर छोडऩे का ख्याल भी नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि जहां हम सब लोग रहते हैं, वहां परेशानी नहीं है लेकिन परेशानी से भागने के बजाय हम उस समस्या का हल ढूंढऩा जानते हैं। हमें अपना राइट्स भी पता है और ड्यूटी भी क्योंकि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। हम अपनी निजी बातें सार्वजनिक रूप से शेयर कर अपना और समाज का मजाक नहीं बनाते हैं।  आमिर ध्यान रखो, यह भारत है और भारत देश कभी सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का विलाप नहीं करता है। इस देश ने 1947 से लेकर 2015 के इस दौर तक अनेक बदलाव देखे हैं लेकिन कभी किसी ने देश छोडऩे की बात नहीं की।  इस देश का आम आदमी देश तो दूर, अपना शहर और अपना मोहल्ला  तक नहीं छोड़ना चाहता है. पुश्तैनी मकान की परम्परा इस बात को साबित करती है.  
आमिर के इस विलाप को हवा देते हुए एक दूसरा सेलिब्रिटी शाहरूख खान इस बयान के खिलाफ अपना बयान दे डालता है। इसका चरित्र भी आमिर से अलग नहीं है। उम्रदराज होते इन अभिनेताओं को पता है कि जल्द ही बाजार इन्हें खारिज करने जा रहा है तब यह इस तरह की बातें बोल कर खुद का मार्केट बनाये रखने की जुगत में लग जाते हैं। सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता इनके लिए कोई मुद्दा नहीं है। इनका मुद्दा है करोड़ों की लागत से बनी फिल्में पीटे नहीं और करोड़ों कमा ले जाएं। शाहरूख जो सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता की बात कर रहे हैं, वो याद कर लें कि खेल के मैदान में कितने सहिष्णु रहे हैं ?  दरअसल इनका काम है लोगों का मनोरंजन करना, वही करें और देश की चिंता छोड़ दे. चिंता करना भी है तो एक भारतीय बनकर करें, हीरो बनकर नहीं.    
अनुपम खेर को भी आप इस लाइन से बाहर नहीं कर सकते हैं क्योंकि इस फिल्मी बाजार का वो भी हिस्सा है। वो भी चाहता है कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे के बहाने कुछ नाम पक्का कर लिया जाए तो कभी न कभी राजदरबार में प्रवेश का अवसर मिले। यह और बात है कि वो मीडिया से बात करते समय इससे सहजता से ना कर जाते हे. बावजूद अचानक से वे संवेदनशील हो जाते हैं और उन्हें अपनी ड्यूटी और राईट्स दोनों समझ आने लगता है. सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता पर जुलूस-जलसा निकालने लगते हैं. जिन कश्मीरी पंडितो की पीड़ा का वे इजहार कर रहे है, दुख जता रहे है, क्या कभी उनके बारे में कभी कुछ किया? कभी उनके हक़ के लिए लड़ाई लड़ी? शायद नहीं। केवल टेलीविज़न के परदे पर ही उनका दुख दिखता है. काश! सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता से बाहर आकर देशवासियों के पक्ष में अनुपम खड़े हो पाते। हम उम्मीद कर रहे है कि "सारांश " का वह बूढ़ा बाप परदे से बाहर आकर अपने चरित्र को साकार करेगा।
सेलिब्रेटियों की सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता पर चिंता महज मगरमच्छ के आंसू हैं। मेरी सहमति उनसे भी है जो लगातार चीख-चीख कर असहिष्णुता का विलाप कर रहे है. एक आम आदमी का लगातार मंहगाई से टूटने को क्या कहेंगे? अपराधों से जो डरा हुआ है, उसकी चिंता कौन करेगा? आप सब बुद्दिजीवी हैं, आप  सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता को समझते है लेकिन मेरे जैसा आम आदमी इन बातों को बहुत नहीं समझता है. मेरा मानना है कि आप सब हमारे बीच आये,  सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के बारे में हमें बताये। आम आदमी जानना चाहेगा कि मंहगाई, बेरोजगारी, अपराध, असुरक्षा से बड़ा असहिष्णुता का कोन सा मुद्दा है। उसकी रूचि यह भी जानने में होगी कि जो लोग असहिष्णुता के मुद्दे पर मोर्चे पर है, क्या उन लोगो को आम आदमी के मुद्दे पर सड़क पर नहीं आना चाहिए?  भूखा पेट केवल रोटी ना मिलने पर असहिष्णु होता है, भरा पेट इस बात को क्या जाने और समझे। यह वो  लोग है जिन्होंने कभी रेल की जनरल बोगी  में सफर नहीं किया और ना ही सरकारी अस्पताल में इलाज कराया। इन्हे तो इस बात का भी इल्म नहीं कि सरकारी स्कूल बच्चों को पढ़ाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं.   
दुर्भाग्य की बात है कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का विलाप करने वाले लोगों ने अपने ही एक और हीरा जैसा कलाकार नाना पाटेकर से कुछ नहीं सीखा? नाना महाराष्ट्र के किसानों के बीच गये और अखबार या टेलीविजन में खुद को स्टार बताने के बजाय उनके बीच जाकर अपनी हैसियत से ज्यादा मदद कर आये। ऐसे और भी लोग है, जो सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता को लेकर बेकरार नहीं हैं बल्कि अपनी जवाबदारी समझ कर मदद में जुटे हुए है.  क्या दिल पर हाथ रखकर सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे पर देश को बदनाम करने वाले आमिर, अनुपम और शाहरूख बता सकते हैं कि ऐसा कोई पराक्रम उन्होंने कभी किया हो? शायद नहीं।
माफ करना मेरे वो दोस्त, जिनकी मोहब्बत आमिर, अनुपम और शाहरूख से होगी, उन्हें यह बात नागवार गुजरे लेकिन मुझे पता है कि आप मेरी बातों से सहमत ना हों लेकिन असहमति की गुंजाईश ही मैंने कहां छोड़ी है। सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का प्राथमिक तौर पर  मुद्दा बेमानी लगता है क्योंकि जिस देश में दाल के भाव 2सौ रुपये किलो बिक रहा हो, प्याज और आलू खरीदने की आम आदमी की ताकत जवाब दे रही हो, वहां सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का मुद्दा केवल सियासी और बौद्धिक जुगाली है। एकबारगी यह मान भी लिया जाए कि सरकार का व्यवहार असहिष्णु है तो उसके खिलाफ आवाज उठनी चाहिए लेकिन इसके पहले आम आदमी को उसकी हैसियत जीने का हक नहीं मिलना चाहिए?  यह देश भारत है जिसने अंग्रेजों को भगा कर दम लिया, उसके लिये असहिष्णुता कोई बडा मुद्दा नहीं है. यह भी नहीं भूलना चाहिये कि इसी देश ने आपतकाल को सिरे से खारिज कर दिया था. जो लोग असहिष्णु है, उन्हें चुनाव में जनता बाहर का दरवाज़ा दिखा देती है. 

गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

सेल्फी पत्रकारिता के मायने

-मनोज कुमार
यह पत्रकारिता की नई रीत नहीं है और ना ही यह सेल्फी पत्रकारिता है। यह सौफीसदी मीडिया है और इसे सेल्फी मीडिया ही कहा जाना बेहतर होगा। पत्रकारिता अपने जन्म से लेकर आज तक सत्ता के संग-साथ चलने को न कभी आतुर हुई और न ही कभी विवश। वह तो सत्ता को गरियाने और जगाने का काम करती रही है और करती रहेगी। सच तो यह है कि जिसे हम सेल्फी पत्रकारिता का नाम दे रहे हैं, वहां पत्रकारिता है कहां पर? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ सेल्फी लेने वाले मीडिया साथियों ने इस पर कोई खबर लिखी या इस सेल्फी पत्रकारिता के पीछे कोई कथा सामने आयी जिससे समाज का भला होता? जवाब ना में होगा क्योंकि यह न तो सेल्फी पत्रकारिता है और न पत्रकारिता बल्कि यह एक किस्म का व्यक्तिगत आनंद का समय होता है जब ज्यादतर युवा पत्रकार प्रधानमंत्री के साथ अपनी यादें संजोकर रखना चाहते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। जीवन के सुखद क्षणों को संजोकर रखना कतई गलत नहीं है लेकिन इसे पत्रकारिता या मीडिया का नाम दिया जाना उचित नहीं है।
सेल्फी पत्रकारिता को लेकर बवाल उठने पर मीडिया दो भागों में बंट गई। एक पक्ष के लिए ऐसा किया जाना अनैतिक था तो दूसरा सेल्फी पत्रकारिता के पक्ष में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ फोटो सेशन को सामने लाकर सही साबित करने की कोशिश की है। उस समय या इस समय में कोई ज्यादा फर्क नहीं है क्योंकि तब उस दौर में सोशल मीडिया नहीं था और ना ही हमारे हाथों में कम्प्यूटर जैसा मोबाइल फोन। संचार के आधुनिक संसाधनों ने कैमरे के फोटो से लेकर मोाबाइल पर फोटो खींचने की तकनीक को समृद्ध किया है जिसे हम सेल्फी पत्रकारिता कह कर कोस रहे हैं।
सेल्फी पत्रकारिता हमें पीड़ा पहुंचा रही है लेकिन सच में पत्रकारिता के कटेंट को लेकर हम बहुत चिंतित नहीं हैं। एक दौर वह भी था जब पत्रकार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री अथवा ऐसे बड़े नेताओं से मुलाकात करता था। उनकी भेंट सौजन्य होती थी लेकिन पत्रकार की बारीक नजरों से जब कोई सूचना या घटना गुजरने लगे तो अगले दिन अखबार के पन्नों पर वह खबर का शक्ल लेती थी। खबरों को लेकर प्रतिक्रिया तो होती थी लेकिन जिस तरह सेल्फी पत्रकारिता को लेकर हंगामा मचा है, वैसा कुछ नहीं होता था। राजनेता सहनशील होते थे और व्यक्तिगत रिश्तों को पत्रकारिता से परे रखते थे और यही व्यवहार पत्रकारों का राजनेताओं से होता था। 
हालात बदल चुके हैं। अब पत्रकारिता के स्थान पर मीडिया है जहां सत्ता और मीडिया एक-दूसरे के पूरक बनते जा रहे हैं। सेल्फी पत्रकारिता के लोग पत्रकारिता के गुण-धर्म से परे हैं। किताबों में समाचार की परिभाषा पढ़ी और जनसम्पर्क के गुण सीखकर अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं। सेल्फी पत्रकारिता के इस दौर में सहजता से हम अपने युवा साथियों की आलोचना कर सकते हैं और कर रहे हैं लेकिन क्या कभी वरिष्ठ पत्रकारों ने यह दायित्व लेने की जरूरत समझी कि अपनी नयी पीढ़ी को पत्रकारिता के गुण-धर्म बताया जाए। जनसरोकार की पत्रकारिय दायित्व के प्रति उनमें भावना जगायी जाए? शायद नहीं और हुआ भी हो तो अपवादस्वरूप। ऐसे में सेल्फी पत्रकारिता की आलोचना करने के बजाय सहमत हो जाना चाहिए कि भविष्य की पत्रकारिता, सेल्फी पत्रकारिता  होगी और यदि पत्रकारिता को बचाना चाहते हैं तो पत्रकारिता के गुरुजन अपने-अपने पीठ में पत्रकारिता की नयी पीढ़ी को सिखायें कि सेल्फी पत्रकारिता के पहले भी बहुत कुछ है। आज यह पहल नहीं की गई तो यह मान लेना चाहिए कि पत्रकारिता का एक ही सच शेष है और वह है सेल्फी पत्रकारिता। 

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

उधार के सपने


मनोज कुमार
बैंक के भीतर जाना मेरे लिए आसान नहीं होता है। एक साहस का काम है और साहस जुटाकर जैसे ही मैंने बैेंक के दरवाजे पर पैर रखा, वहां कागज पर छपी इबारत सहसा मेरा ध्यान खींचकर ले गई। ‘सपने पूरे करें, किश्तों में मोबाइल लें।’ यानि दूसरे के महंगे मोबाइल की ओर ताकने की जरूरत नहीं। कर्ज देेने वाली इस इबारत में लिखा था कि आप किश्तों में पचास हजार रुपये कीमत की मोबाइल की खरीददारी कर सकते हैं। दीवार पर लगी इबारत ने मुझे भीतर तक हिला दिया था। बेटी के ब्याह के लिए पिता को कर्जदार होते देखा है, खेतों में फसलों के खराब हो जाने से किसानों को कर्जदार होते देखा है, कारोबार बढ़ाने के लिए कर्जदार होते देखा है और यह भी देखा है कि इसमें सबने अपनी सांसों की कीमत पर कर्ज लिया था। कुछ की सांसें टूट गई कर्ज चुकाते चुकाते तो कुछ कर्ज चुकाने के फेर में बिस्तर पकड़ लिया। शायद कर्ज का फर्ज है कि वह आपकी जिंदगी में जोंक की चिपक जाए और खून की आखिरी बूंद भी निचोड़ ले। कर्जदार होना कितना भयावह है और इसी अनुभव के साथ पुराने लोग कहते थे कि एक रोटी कम खा लो लेकिन कर्ज मत लो। ये वही लोग हैं कर्ज लेने वालों के लिए फब्तियां कसते हुए कहते थे कंबल ओढक़र घी पीना।
उस दौर में कर्ज लेने वालों के आंखों में पानी होता था। अब न वो लोग रहे और ना वो बात। बाजार की इस दुनिया में सबकुछ उधार का है। सपने आप पालिये और आपको पालने के लिए उधार एक पांव पर खड़ा है।  सपनों को पूरा करने के लिए ख्रीसे में दाम हो या ना हो, सपने आपके बड़े होने चाहिए, यह बाजार की शर्त है। सवाल यह नहीं है कि बाजार क्या कर रहा है, मेरे मन को तो यह सवाल मथ रहा है कि आखिर हम जा कहां रहे हैं? शादी-ब्याह के लिए कर्ज तो एक मजबूरी है और खेत में अच्छी फसल की आस में किसान कर्जदार बन जाए तो भी मन को मना लिया जाए लेकिन बड़े आलीशान मकान, बड़ी कार और अब मोबाइल जैसे फालूत यंत्र के लिए भी कर्ज? शिक्षा समाज और देश का निर्माण करती है लेकिन उधार की शिक्षा किस तरह देश और समाज का निर्माण करेगी, यह बात मेरी समझ से परे है। रोज-ब-रोज घपले घोटाले की खबरों में इस उधार की शिक्षा की छांह से आप इंकार नहीं कर सकते हैं। कलाम साहब हमारे लिए उदाहरण हैं कि वे अखबार बेचकर संसार के लिए ‘आइकॉन’ बने तो उसी भारत में उधार की शिक्षा कौन सा पाठ पढ़ाती है? क्या जरूरत है कि हमारे बच्चे विदेशों में पढऩे जाएं या फिर अपने ही देश के महंगे कॉलेजों में पढ़ें और क्यों हम अपने बच्चे को उधार की शिक्षा दें? एक ऑटो चालक पिता ने अपनी बेटी को उधार की शिक्षा नहीं दी लेकिन वह अपनी प्रतिभा से आज देश की अफसर बन चुकी है।  
बाजार से लेकर सरकार तक, सभी आमादा हैं कि आप की एक-एक सांस उनकी कर्जदार हो जाए और हम भी इसके लिए तैयार हैं। हम अपने सपनों को छोटा नहीं करते हैं, खर्चो मेें कटौती नहीं करते हैं, अपनी काबिलियत पर हमारा भरोसा ही नहीं रहा। उधार की गाड़ी में बैठकर मन और तन को खराब करना मंजूर है किन्तु सायकल पर चलना हमारी इज्जत को खाक कर देता है। बच्चे महंगी शिक्षा न लें तो उनका भविष्य चौपट है, भले ही सारी जिंदगी उधार की शिक्षा के नीचे दबे रहें। पैर में भले ही टूटी चप्पल हो लेकिन हाथ में महंगा एनराइड मोबाइल का होना जरूरी है। रातों की नींद इस बात को लेकर उड़ी रहे कि इस माह किश्त की अदायगी कैसे होगी लेकिन आलीशान मकान और गाड़ी को छोड़ देने का मतलब सभ्य समाज से बाहर हो जाना हमने मान लिया है। शर्मनाक तो यह है कि नौकरीपेशा से लेकर खेत मजदूर तक के लिए बाजार उधार का जाल बिछाये बैठा है। हर कोई कह रहा है कि उधार के सपने खरीदो। सपने नहीं  देखोगे तो जियोगे कैसे? जीने के लिए जरूरी है आपकी हर सांस पर उधारी चढ़ा हो।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

छत्तीसगढ़ में देवी उपासना के शक्तिपीठ

-अनामिका
नवरात्रि का छत्तीसगढ़ में विशेष महत्व है। प्राचीन काल में देवी के मंदिरों में जवारा बोई जाती थी और अखंड ज्योति कलश प्रज्वलित की जाती थी। यह परम्परा आज भी अनवरत जारी है। ग्रामीणों द्वारा माता सेवा और ब्राह्मणों द्वारा दुर्गा सप्तमी का पाठ और भजन आदि की जाती है। छत्तीसगढ़ में अनादिकाल से शिवोपासना के साथ साथ देवी उपासना भी प्रचलित थी। शक्ति स्वरूपा मां भवानी यहां की अधिष्ठात्री हैं। यहां के सामंतों, राजा-महाराजाओं, जमींदारों आदि की कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित आज श्रद्धा के केंद्र बिंदु हैं। छत्तीसगढ़ में देवियां अनेक रूपों में विराजमान हैं।
छत्तीसगढ़ में शक्ति पीठ और देवियों की स्थापना को लेकर अनेक किंवदंतियां प्रचलित है। देवियों की अनेक चमत्कारी गाथाओं का भी उल्लेख मिलता है। इसमें राजा-महाराजाओं की कुलदेवी द्वारा पथ प्रदर्शन और शक्ति प्रदान करने से लेकर लड़ाई में रक्षा करने तक की किंवदंतियां यहां सुनने को मिलती है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों में रतनपुर, चंद्रपुर, डोंगरगढ़, खल्लारी और दंतेवाड़ा प्रमुख है- रतनपुर में महामाया, चंद्रपुर में चंद्रसेनी, डोंगरगढ़ में बमलेश्वरी और दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी देवी विराजमान हैं वहीं अम्बिकापुर में महामाया और समलेश्वरी देवी विराजित हैं।  ऐसा माना जाता है कि पूरे छत्तीसगढ़ में महामाया और समलेश्वारी देवी का विस्तार अम्बिकापुर से ही हुआ है। शाक्त धर्म में आदि तत्व को मातृ रूप मानने की सामाजिक मान्यता है- उसके अनुसार नारी पूजनीय माने जाने लगी, विशेषत: माताओं और कुवांरी बालिकाओं का शाक्त धर्म में बहुत ऊंचा स्थान है।
यहां प्रमुख रूप से दो देवियां रतनपुर की महामाया और सम्बलपुर की समलेश्वरी देवी पूजी जाती है, शेष देवियां उनकी प्रतिरूप हैं और क्षेत्र विशेष का बोध कराती हैं- इनमें सरगुजा की सरगुजहीन दाई, खरौद की सौराईन दाई, कोरबा की सर्वमंगला देवी, अड़भार की अष्टभूजी देवी, मल्हार की डिडिनेश्वरी देवी, चंद्रपुर की चंद्रसेनी देवी, डोंगरगढ़ की बमलेश्वरी देवी, बलौदा की गंगा मैया, जशपुर की काली माता, मड़वारानी की मड़वारानी दाई प्रमुख हैं।  
गढ़ों के गढ़ छत्तीसगढ़ अनेक देशी राजवंशों के राजाओं की कार्यस्थली रही है। यहां अनेक प्रतापी राजा और महाराजा हुए जो विद्वान, शक्तिशाली, प्रजावत्सल और देवी उपासक थे। यही कारण है कि यहां अनेक मंदिर और शक्तिपीठ उस काल के साक्षी हैं। ये देवियां उनकी कुलदेवी थीं। यहां देवी रियासतों की स्थापना से लेकर उसके उत्थान पतन से जुड़ी अनेक कथाएं पढ़ने और सुनने को मिलती है।
रतनपुर में महामाया देवी का सिर है और उसका धड़ अम्बिकापुर में है।  प्रतिवर्ष वहां मिट्टी का सिर बनाये जाने की बात कही जाती है। इसी प्रकार संबलपुर के राजा द्वारा देवी मां का प्रतिरूप संबलपुर ले जाकर समलेश्वरी देवी के रूप में स्थापित करने की किंवदंती प्रचलित है। समलेश्वरी देवी की भव्यता को देखकर दर्शनार्थी डर जाते थे अत: ऐसी मान्यता है कि देवी मंदिर में पीठे करके प्रतिष्ठित हुई- सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में जितने भी देशी राजा-महाराजा हुए उनकी निष्ठा या तो रतनपुर के राजा या संबलपुर के राजा के प्रति थी- कदाचित मैत्री भाव और अपने राज्य की सुख, समृद्धि और शांति के लिए वहां की देवी की प्रतिमूर्ति अपने राज्य में स्थापित करने किये जो आज लोगों की श्रद्धा के केंद्र हैं।
चंद्रसेनी या चद्रहासिनी देवी सरगुजा से आकर सारंगढ़ और रायगढ़ के बीच महानदी के तट पर विराजित हैं- ऊन्हीं के नाम पर कदाचित चंद्रपुर नाम प्रचलित हुआ। पूर्व में यह एक छोटी जमींदारी थी- चंद्रसेन नामक राजा ने चंद्रपुर नगर बसाकर चंद्रसेनी देवी को विराजित करने की किंवदंती भी प्रचलित है। पहाड़ी में सीढ़ी के दोनों ओर अनेक धार्मिक प्रसंगों का शिल्पांकन है- हनुमान और अर्द्धनारीश्वर की आदमकद प्रतिमा आकर्षण का केंद्र है- रायगढ़, सारंगढ़, चाम्पा, सक्ती में समलेश्वरी देवी की भव्य प्रतिमा है।
बस्तर की कुलदेवी दंतेश्वरी देवी हैं जो यहां के राजा के साथ आंध्र प्रदेश के वारंगल से आयी और शंखिनी डंकनी नदी के बीच में विराजित हुई और बाद में दंतेवाड़ा नगर उनके नाम पर बसायी गयी। बस्तर का राजा नवरात्रि में नौ दिन तक पुजारी के रूप में मंदिर में निवास करते थे। देवी की उनके उपर विशेष कृपा थी। जगदलपुर महल परिसर में भी दंतेश्वरी देवी का एक भव्य मंदिर है। 
छत्तीसगढ़ के ग्राम्यांचलों में देवी को ग्राम देवी कहा जाता है और शादी-ब्याह जैसे शुभ अवसरों पर आदर पूर्वक न्योता देने की प्रथा है- भुखमरी, महामारी, और अकाल को देवी का प्रकोप मानकर ऊनकी पूजा-अर्चना की जाती है- प्राचीन काल में यहां नर बलि दिये जाने का ऊल्लेख प्राचीन साहित्य में मिलता है- आज पशु बलि दिये जाते हैं- बहरहाल, शक्ति संचय असुर और नराधम प्रवृति के नाश के लिये मां भवानी की उपासना आवश्यक है- इससे सुख, शांति और समृद्धि मिलने से इंकार नहीं किया जा सकता। 
लेखिका भोपाल में युवा पत्रकार हैं।

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन भोपाल में सम्पन्न, अगली मुलाकात मॉरीशस में


हिन्दी और भारतीय भाषाओं को तकनीकी के लिए परिवर्तित करना होगा- मोदी
-मनोज कुमार
34 वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद भारत को विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी का अवसर मिला और यह अवसर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के हिस्से में आया। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर कहा भी किसम्मेलन को मध्यप्रदेश और भोपाल में आयोजित करने का कारण बताते हुए कहा कि मध्यप्रदेश हिन्दी के लिये समर्पित राज्य है और भोपाल सफल आयोजन करने के लिये विख्यात है। श्रीमती स्वराज ने विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजनों की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 32 वर्षों बाद यह भारत में आयोजित हो रहा है। पहला सम्मेलन 1975 में नागपुर में हुआ था। तब से भोपाल के दसवें सम्मेलन तक आयोजन का स्वरूप बदला है। पहले के सम्मेलन साहित्य केन्द्रित थे लेकिन दसवाँ सम्मेलन भाषा की उन्नति पर केन्द्रित है। उन्होंने कहा कि भाषा की उन्नति के लिये संवर्धन ही नहीं संरक्षण की भी जरूरत पड़ रही है। 
दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में उद्घाटन भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि- भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। भाषा हर किसी को जोडऩे वाली होना चाहिए। हर भारतीय भाषा अमूल्य है। भाषा की ताकत का अंदाजा उसके लुप्त होने के बाद होता है। हिन्दी भाषा का आंदोलन देश में ऐसे महापुरूषों ने चलाया जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी, यह प्रेरणा देता है। भाषा और लिपि की ताकत अलग-अलग होती है। देश की सारी भाषाएँ नागरी लिपि में लिखने का आंदोलन यदि प्रभावी हुआ होता तो लिपि राष्ट्रीय एकता की ताकत के रूप में उभर कर आती हैं। यह बात आज दुनिया के अलग-अलग देशों में हिन्दी का महत्व बढ़ रहा है। भारतीय फिल्मों ने भी दुनिया में हिन्दी को पहुँचाने का कार्य किया है। डिजिटल दुनिया ने हमारे जीवन में गहरे तक प्रवेश कर लिया है। हमें हिन्दी और भारतीय भाषाओं को तकनीकी के लिए परिवर्तित करना होगा। बदले हुए तकनीकी परिदृश्य में भाषा का बड़ा बाजार बनने वाला है। उन्होंने विश्वास जताया कि विश्व हिन्दी सम्मेलन के माध्यम से हिन्दी को समृद्ध बनाने की पहल होगी और निश्चित परिणाम निकलेंगे।
बारह विषय के विमर्श प्रतिवेदन हुए प्रस्तुत : तीन दिवसीय दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में 12 विषय पर समानांतर सत्रों में विमर्श किया गया। इनमें आयी अनुशंसाओं को सत्रों के संयोजकों ने समापन अवसर पर प्रस्तुत किया। जिन विषय पर विद्वानों और हिन्दी-प्रेमियों ने विमर्श किया वो इस प्रकार है- गिरमिटिया देशों में हिन्दी, विदेशों में हिन्दी शिक्षण- समस्याएँ और समाधान, विदेशियों के लिए भारत में हिन्दी अध्ययन की सुविधा, अन्य भाषा राज्यों में हिन्दी, विदेश नीति में हिन्दी, प्रशासन में हिन्दी, विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी, संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी, विधि एवं न्याय क्षेत्र में हिन्दी और भारतीय भाषाएँ, बाल साहित्य में हिन्दी, हिन्दी पत्रकारिता और संचार माध्यमों में भाषा की शुद्धता, देश और विदेश में प्रकाशन : समस्याएँ एवं समाधान, शामिल हैं।
10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि हिन्दी भारत की राजभाषा के साथ संपर्क भाषा भी है। भारत की संस्कृति और जीवन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा हिन्दी है।  गृह मंत्री श्री सिंह ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा में हिन्दी शामिल होना चाहिये। जब अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के लिये दुनिया के 177 देश का समर्थन प्राप्त किया जा सकता है तो हिन्दी के लिये क्यों नहीं? हिन्दी दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा में से एक है। टेक्नालॉजी कंपनियों ने हिन्दी के महत्व को समझा है और वे इसे बढ़ावा दे रही हैं। इंटरनेट पर जिस भाषा में सबसे अधिक कंटेंट जनरेट होता है वह भाषा हिन्दी है। भारत में बोली जाने वाली सबसे पुरानी भाषा तमिल है और राष्ट्रीय स्तर पर मातृ भाषा संस्कृत है। 
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सम्मेलन से हिन्दी के प्रति सकारात्मक वातावरण बना है। श्री चौहान ने कहा कि हिन्दी को प्रोत्साहित करने और बढ़ावा देने के लिए मध्यप्रदेश सरकार समाज के साथ मिलकर हरसंभव प्रयास करेगी। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी बोलने वाले को श्रेष्ठ समझने की मानसिकता को बदलना होगा। उन्होंने कहा कि हमारे देश की संस्कृति और हिन्दी भाषा का गौरवपूर्ण इतिहास है। हिन्दी बोलने से सम्मान कम नहीं होता बल्कि और बढ़ता है। उन्होंने कहा कि सम्मेलन की अनुशंसाओं पर भारत सरकार आवश्यक कार्रवाई करेगी। मध्यप्रदेश सरकार अपने स्तर पर हिन्दी को प्रोत्साहित करने के ठोस कदम उठाएगी। उन्होंने हिन्दी को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए घोषणा की कि प्रदेश में राजभाषा विभाग को पुनर्जीवित किया जाएगा। प्रदेश में उपभोक्ता वस्तुओं का नाम हिन्दी में लिखा जाएगा। कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर हिन्दी में बनाए जाएँगे और शासकीय विज्ञापन हिन्दी में जारी किए जाएँगे। उन्होंने घोषणा की कि अटल बिहारी हिन्दी विश्वविद्यालय को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का संस्थान बनाया जाएगा। हिन्दी का उपयोग करना मानव अधिकार माना जाएगा। उच्च न्यायालयों के निर्णय हिन्दी में उपलब्ध करवाने के लिए अनुवादक नियुक्त किए जाएँगे। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को परस्पर ग्रहण किया जाएगा। जहाँ पर अँग्रेजी लिखना जरूरी होगा वहाँ हिन्दी में प्रमुखता से लिखा जाएगा। मध्यप्रदेश के सभी संस्थानों के नाम हिन्दी में लिखे जाएँगे। किसी अधिकारी-कर्मचारी के विरुद्ध हिन्दी में बोलने एवं काम करने पर निलंबन जैसी कार्रवाई नहीं की जाएगी। शासकीय पत्राचार हिन्दी में किया जाएगा। तकनीकी प्राक्कलन हिन्दी में बनाए जाएँगे। मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव एवं सभी विभागाध्यक्ष हिन्दी का प्रयोग करेंगे। प्रदेश में सभी प्रतियोगी परीक्षाएँ हिन्दी माध्यम में होगी। विधि अनुवादकों की नियुक्ति की जाएगी। हिन्दी अधिकारी नियुक्त किए जाएँगे। प्रदेश में हर वर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस आयोजित किया जाएगा। हिन्दी को प्रोत्साहित करने वाले व्यक्तियों को हिन्दी दिवस पर सम्मानित किया जाएगा। गैर हिन्दीभाषी अधिकारियों को हिन्दी का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रदेश में सभी सूचनाएँ और अधिसूचनाएँ हिन्दी में जारी की जाएँगी।
केन्द्रीय विदेश राज्य मंत्री जनरल डॉ. वी.के.सिंह ने प्रस्तावित किया कि विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्राप्त अनुशंसाओं के लिये विदेश मंत्रालय स्तर पर एक विशेष समीक्षा समिति गठित की जाएगी यह अनुशंसाओं को विभिन्न मंत्रालयों को अग्रेषित करेगी। वर्ष 2018 में 11वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन मॉरिशस में होगा। उनके इन दोनों प्रस्ताव को सम्मेलन में अनुमोदित किया गया। सांसद एवं आयोजन समिति के उपाध्यक्ष अनिल माधव दवे ने प्रख्यात अभिनेता अमिताभ बच्चन की अनुपस्थिति में उनके द्वारा प्रेषित पत्र पढ़ा। पत्र में बच्चन ने लिखा था कि  अपनी भाषा के सम्मान से ही कोई समाज बड़ा होता है।
विश्व हिन्दी सम्मान से विभूषित हुए देशी-विदेशी हिन्दीसेवी : समारोह में श्री अनूप भार्गव अमेरिका, कु. स्नेह ठाकुर कनाडा, डॉ. आई.एन.एस. जर्मनी, डॉ. अकीरा साकाखासी जापान, प्रो. ऊषा देवी शुक्ल दक्षिण अफ्रीका, सुश्री कमला रामलखन त्रिकास्त तुबेको, डॉ. देवंतदास लिथुवानिया, डॉ. नीलम कुमारी फिजी, डॉ. सारजिक अजामिन माताबदल मॉरिशस, गुलशन सुखलाल मॉरिशस, डॉ. इंदिरा गाजियाबादी रूस, इंदिरा कुमार दासनायक श्रीलंका, मोहम्मद इस्माइल सउदी अरब, श्री सुरजन परोही सूरीनाम, श्री कैलाश नाथ यू.के. एवं श्रीमती ऊषा राजे सक्सेना, यू.के. तथा भारत के डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय, डॉ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य, डॉ. एन.चन्द्रशेखरन नायर, डॉ. मधु धवन, सुश्री माधुरी जगदीश छेरा, प्रो. अनंत राम त्रिपाठी, कुमारी अहम कामे, वरमानंदन कामछा, डॉ. नागेश्वरम सुंदरम, प्रो. हरिराम मीणा, डा. व्यासमणि त्रिपाठी, डॉ. सुरेश कुमार गौतम, आदित्य चौधरी, डॉ.के.के अग्रवाल, अन्नू कपूर, अरविंद कुमार, माताप्रसाद एवं आनंद मिश्रा अभय को विश्व हिन्दी सम्मान से विभूषित किया गया।

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...