शुक्रवार, 11 अप्रैल 2025
शनिवार, 5 अप्रैल 2025
भारतीय जनता पार्टी : स्थापना दिवस 6 अप्रेल पर विशेष
शून्य से शिखर का सफर
मनोज कुमार
व्यक्ति या संस्था जब शिखर पर होता है तब उसकी विजयगाथा गायी जाती है और यह स्वाभाविक भी है. आज की भारतीय जनता पार्टी की बुनियाद में उसके संघर्ष के दिनों की यात्रा उसकी नींव है. 1951 में जनसंघ के रूप में यात्रा शुरू हुई और जनता पार्टी के रूप में विस्तार मिला और 6 अप्रेल 1980 को स्वयं की पहचान के साथ भारतीय जनता पार्टी की यात्रा आरंभ हुई तो अविरल चल रही है. कभी दो सांसदों के साथ लोकसभा में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने वाली भारतीय जनता पार्टी आज देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में उपस्थित है.
यहां यह जान लेना जरूरी है कि भारतीय जनता पार्टी की यात्रा का आरंभ कहां से शुरू होता है. वैसे तो यह सबको पता है कि 6 अप्रेल 1980 को भाजपा का एक राजनीतिक पार्टी के रूप में गठन हुआ लेकिन भाजपा की रीति-नीति हिन्दुत्व की रही है और इसी आधार पर तब 1951 में हिंदू समर्थक समूह की राजनीतिक शाखा के रूप में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नींव डाला था. ध्येय था हिंदू संस्कृति के अनुसार भारत के पुनर्निर्माण की वकालत की और एक मजबूत एकीकृत राज्य के गठन का आह्वान। यात्रा आहिस्ता आहिस्ता आगे बढऩे लगा और 1967 तक भारतीय जनसंघ ने उत्तर भारत के हिंदी भाषी क्षेत्रों में अपनी मजबूत पकड़ बना ली थी। दस साल बाद, पार्टी ने हिंदी भाषी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत कर ली।
देश में 1977 में आपातकाल की समाप्ति के बाद जनसंघ का अन्य दलों के साथ विलय हो गया और इसके साथ ही जनसंघ के स्थान पर नया नाम मिला जनता पार्टी. जनता पार्टी के गठन के बाद नयी ताकत दिखी और जनता पार्टी ने 1977 में कांग्रेस को पराजित कर दिया. जनता पार्टी में विलय हुई जनता पार्टी की रीति-नीति से अन्य दलों का मेल नहीं खाया और उनके रास्ते अलग अलग हो गए. पूर्व जनसंघ के पदचिह्नों को पुनर्संयोजित करते हुये अटल बिहारी वाजपेयी ने तीन अन्य राजनीतिक दलों के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। जनता पार्टी से अलग होकर सरकार की बागडोर अपने हाथ में ले ली। हालांकि, गुटबाजी और आंतरिक विवादों से त्रस्त होकर जुलाई 1979 में सरकार गिर गई। जनता गठबंधन के भीतर असंतुष्टों द्वारा विभाजन के बाद 1980 में औपचारिक रूप से भाजपा की स्थापना हुई।
यद्यपि शुरुआत में पार्टी असफल रही और 1984 के आम चुनावों में केवल दो लोकसभा सीटें जीतने में सफल रही। इसके बाद राम जन्मभूमि आंदोलन ने पार्टी को ताकत दी। कुछ राज्यों में चुनाव जीतते हुये और राष्ट्रीय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करते हुये 1996 में पार्टी भारतीय संसद में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। इसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया जो 13 दिन चली। 1998 में आम चुनावों के बाद भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का निर्माण हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी जो एक वर्ष तक चली। इसके बाद आम-चुनावों में राजग को पुन: पूर्ण बहुमत मिला और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार ने अपना कार्यकाल पूर्ण किया। इस प्रकार पूर्ण कार्यकाल करने वाली पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी। 2004 के आम चुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा और अगले 10 वर्षों तक भाजपा ने संसद में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभाई।
उल्लेखनीय है कि भाजपा हिन्दुत्व के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त करती है और नीतियाँ ऐतिहासिक रूप से हिन्दू राष्ट्रवाद की पक्षधर रही हैं। इसकी विदेश नीति राष्ट्रवादी सिद्धांतों पर केन्द्रित है। जम्मू ृऔर कश्मीर के लिए विशेष संवैधानिक दर्जा खत्म करना, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करना तथा सभी भारतीयों के लिए समान नागरिकता कानून का कार्यान्वयन करना भाजपा के मुख्य मुद्दे हैं।
भाजपा को 1989 में चुनावी सफलता मिलनी शुरू हुई, जब उसने अयोध्या में हिंदुओं द्वारा पवित्र माने जाने वाले एक क्षेत्र में हिंदू मंदिर के निर्माण की मांग करके मुस्लिम विरोधी भावना को भुनाया , लेकिन उस समय बाबरी मस्जिद (बाबर की मस्जिद) का कब्जा था। 1991 तक भाजपा ने अपनी राजनीतिक अपील में काफी वृद्धि की थी, लोकसभा (भारतीय संसद के निचले सदन) में 117 सीटों पर कब्जा कर लिया और चार राज्यों में सत्ता संभाली। 1998 में भाजपा और उसके सहयोगी दल वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के साथ बहुमत वाली सरकार बनाने में सफल रहे। उस वर्ष मई में, वाजपेयी द्वारा आदेशित परमाणु हथियार परीक्षणों की व्यापक अंतरराष्ट्रीय निंदा हुई। 13 महीने के कार्यकाल के बाद, गठबंधन सहयोगी ऑल इंडिया द्रविड़ प्रोग्रेसिव फेडरेशन (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कडग़म ) ने अपना समर्थन वापस ले लिया और वाजपेयी को लोकसभा में विश्वास मत हासिल करने के लिए बाध्य होना पड़ा, जिसमें वे एक वोट के अंतर से हार गये।
भाजपा ने 1999 के संसदीय चुनावों में एनडीए के आयोजक के रूप में चुनाव लड़ा, जो 20 से अधिक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों का गठबंधन था। गठबंधन ने सत्तारूढ़ बहुमत हासिल किया, जिसमें भाजपा ने गठबंधन की 294 सीटों में से 182 सीटें जीतीं। गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी के नेता के रूप में वाजपेयी फिर से प्रधानमंत्री चुने गए। हालाँकि वाजपेयी ने कश्मीर क्षेत्र को लेकर पाकिस्तान के साथ देश के लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष को सुलझाने और भारत को सूचना प्रौद्योगिकी में विश्व नेता बनाने की कोशिश की, लेकिन गठबंधन ने 2004 के संसदीय चुनावों में कांग्रेस पार्टी के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) गठबंधन के सामने अपना बहुमत खो दिया और वाजपेयी ने पद से इस्तीफा दे दिया। 2009 के संसदीय चुनावों में लोकसभा में पार्टी की सीटों का हिस्सा 137 से घटकर 116 रह गया क्योंकि यूपीए गठबंधन फिर से प्रबल हो गया ।
2014 के आम चुनावों में राजग को गुजरात के लम्बे समय से चले आ रहे मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारी जीत मिली। 2014 के लोकसभा चुनाव कांग्रेस शासन के प्रति असंतोष बढऩा था. मोदी को भाजपा के चुनावी अभियान का नेतृत्व करने के लिए चुना गया. उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार पार्टी ने घोषित किया। भाजपा ने 282 सीटें जीतीं, जो सदन में स्पष्ट बहुमत था, और इसके एनडीए सहयोगियों ने 54 और सीटें जीतीं। मोदी ने 26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली.
दो सीटों पर विजय प्राप्त करने वाली भाजपा ने 2014 से जो विजय यात्रा आरंभ की तो पीछे पलट कर नहीं देखा. लोकसभा के साथ ज्यादतर राज्यों में भाजपा की सरकार बनती गई. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आइकॉन बनकर उभरे. वे समाज के सभी वर्गों में लोकप्रिय हो गए. वे अपने सख्त फैसले से अलग पहचान बना लिया. अयोध्या में राममंदिर निर्माण, जम्मू कश्मीर में बदलाव, तीन तलाक कानून खत्म करने, गोवध रोकने कानून, जीएसटी लागू कर देश में परिवर्तन की नयी बयार ला दी. भाजपा को बनाने और विस्तार देने में अटलविहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी और मुरली मनोहर जोशी का नाम लिया जा सकता है तो एक दशक में भाजपा को मजबूती देने वालों में नरेन्द्र मोदी के नाम का ही उल्लेख मिलेगा. भाजपा ने अपने संकल्प और दूरदृष्टि से आज वैकल्पिक नहीं बल्कि लोकतांत्रिक भारत में मुखर और प्रखर राजनीतिक दल के रूप में सशक्त उपस्थिति दर्ज करायी है.
सोमवार, 31 मार्च 2025
गाँधी विचार का रास्ता
मनोज कुमार
रिश्तों में घुलती कड़वाहट और एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू समाज का डरावना चेहरा हम रोज़-ब-रोज़ देख रहे हैं. कहीं अपने गैर-कानूनी रिश्तेे के लिए पति को मारकर ड्रम में भर देने का मामला हो या पति के फोन पर बात करने से रोकने पर कॉफी में ज़हर देने का. इधर पति भी कम जल्लाद नहीं है और इनके किस्से तो पुराने हो चुके हैं या पत्नी को काट कर गाड़ देना या फिर टुकड़े कर फ्रिज में भर देने की वारदात हम नहीं भूले हैं. तंदूर कांड तो याद में होगा ही और आज भी ऐसी घटनाएँ लगातार जारी है. पति-पत्नी ही क्यों, किसी बेटा माँ की जान ले रहा है तो कहीं माँ बेटे की जान ले रही है. पिता असुरक्षित है तो घर के बच्चे भी डर के साये में जीवन बसर कर रहे हैं. ऐसी ख़बरें ना केवल हमें चौंकाती हैं बल्कि डराती भी हैं. सवाल यह है कि हमारा समाज इतना असहिष्णु कैसे हो गया? हिंसा की इस प्रवृत्ति ने तमाम किस्म के नैतिक मूल्यों को ताक पर रख दिया है. आधुनिक जमाने के साथ चलने की हरसत ने रिश्तों को बेमानी कर दिया है. आखिऱ हम किस समाज का निर्माण कर रहे हैं? कई बार इस बात पर भरोसा नहीं होता कि हम क्या सचमुच उस गाँधी के देश में हैं जहाँ अहिंसक ढंग से अंग्रेेजी शासन को बेदख़ल कर दिया गया. उस गाँधी के विचारों को हम दरकिनार कर रहे हैं जिसे आदर्श मान कर पूरा विश्व उनके रास्ते पर चलने को तैयार है. गाँधी विचारों को दरकिनार करने का एक सुनियोजित चाल चला जा रहा है। लेकिन इस घटाघोप अँधेरे में रोशनी की एक किरण अभी भी टिमटिमा रही है. आज भी बड़े तादाद मे ऐसे लोग हैं जो अहिंसक ढंग से फैसले लेकर जीवन को कलह से मुक्त कर रहे हैं. वे असहिष्णु भी नहीं हैं और ना ही उनका मन कलुषित है. ऐसे लोग मिसाल कायम करते हैं. पिछले दिनों दो ऐसी ही ख़बर ने इस बिगड़ते दौर में संबल के रूप में सामने आया है. एक $खबर उस मजदूर की कहानी से जुड़ा हुआ है जिसका फैसला गाँधी विचारों से सम्पन्न दिखता है. बिगड़ते और डरे हुए समाज के लिए यह आश्वस्ति भी है. पूरा मामला दिलचस्प ही नहीं, प्रेेरणादायक है. जिस मजदूर की हम चर्चा कर रहे हैं, उसके फैसले को जानकर लगता है कि उम्मीद की किरण शेष है. मसला यह है कि वह मजदूर अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ आनंद से जीवन बसर कर रहा था. एक तूफान आहिस्ता से उसके परिवार में आ गया. उसकी पत्नी का प्रेेम किसी अन्य व्यक्ति से हो गया. इस बात की $खबर जब उसे लगी तो उसने तैश नहीं खाया. मन में हिंसक विचार लाकर पत्नी या उसके प्रेमी को मारने की कोई साजिश नहीं रची बल्कि उसने दोनों के समक्ष उनकी शादी का प्रस्ताव रखा. प्ऱस्ताव ही नहीं रखा बल्कि स्वेच्छा से उनकी शादी करा दी. उस मजदूर का बड़प्पन देखिये कि उसने इस नवदम्पत्ति को आश्चस्त किया कि वह बच्चों को पाल लेगा. यह फैसला इस बात की तस्दीक करता है कि अपनी गैर-मौजूदगी के बाद भी गाँधी आज भी भारतीय मन में रचे-बसे हैं. इस सिलसिले में एक अन्य ख़बर भी हमारे लिए सुखद है. उस वृद्ध नवदम्पत्ति का उल्लेख करना भी सुखद और लाजिमी लगता है. यह कहानी भी रोचक है. यह वृद्ध दम्पत्ति आज 80 बरस के हैं और 64 साल पहले प्रेेम विवाह कर लिया था. तब परिवार और समाज ने इसे स्वीकार नहीं किया. समय अपनी गति से चलता रहा. परिवार फैलता गया. दोनों वृद्ध दादा-दादी और नाना-नानी बन गए. 64 साल बाद उनके बच्चों ने तय किया और 80 बरस की उम में वृद्ध दम्पत्ति का पूरे रीति-रिवाज से शादी करवा दी. यह खबर हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि जब मामूली बात में परिवार टूट रहे हैं. लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन रहे हैं तब परिवार की यह एकजुटता उम्मीद की लालटेन की तरह हमारे बीच कहीं टंगा हुआ है. यह उन लोगों के लिए भी नज़ीर है जो अपने ही स्वार्थों में लिप्त होकर परिवार की अहमियत भूल जाते हैं. उस वृद्ध दम्पत्ति का 80 बरस की उम्र में ब्याह होना कोई मायने नहीं रखता है लेकिन इसके पीछे जो ‘मैं’ की जगह ‘हम’ की भावना को ज़ाहिर करता है, वह अर्थपूर्ण है. यह ख़बर भी गाँधी विचारों को विस्तार देता है. ख्यातलब्ध गाँधीवादी विचारक अरविंद मोहन अपने लेख का जब शीर्षक देते हैं कि ‘गाँधी की चिंता मत करिए’ तब मन में यह सवाल बरबस उठता है कि समय गाँधी की चिंता करने का नहीं है अपितु उन पर चिंतन करने का है. असहिष्णु और हिंसक होते समाज और समय में गाँधी विचारों को एक स्पेस देने का है. इस बात से इंकार किया जाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है कि गाँधी और गाँधी विचार समय की आँधी में ढह जाएँगे. उन्हें आप जितना गिराना, मिटाना चाहेंगे, वे उतनी ही शक्ति के साथ उठ खड़े होंगे और पहले से ज्यादा प्रभावी रूप से. कोई मजदूर और कोई परिवार भी गाँधी के रास्ते पर चलकर लालटेन की तरह संदेश देते दिखेगा और हम स्वागत करेंगे. यह संदेश उन लोगों के लिए भी है जो रिश्तों में खटास घोल रहे हैं. हम उम्मीद से हैं कि यह असहिष्णुता और अहिंसक मन एक दिन निर्मल होकर रहेगा.
बुधवार, 19 मार्च 2025
मन बदलती कठपुतली को याद करने का समय
21 मार्च विश्व कठपुलती दिवस पर विशेष
मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025
‘भारतीय ज्ञान परम्परा एवं अनुसंधान की दृष्टि’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
शोध पत्रिका ‘समागम’ रजत जयंती वर्ष में
‘भारतीय ज्ञान परम्परा एवं अनुसंधान की दृष्टि’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
भोपाल. शोध एवं संदर्भ की मासिक पत्रिका ‘समागम’ का प्रकाशन के 25वें वर्ष में प्रवेश कर जाना एक सुखद अनुभूति है. वर्ष 2000 में ‘समागम’ का प्रकाशन आरंभ हुआ था और आहिस्ता-आहिस्ता अपने सीमित संसाधनों में यह सफर तय किया.मीडिया, हिन्दी साहित्य एवं सामाजिक सरोकार पर केन्द्रित ‘समागम’ ने उन विषयों को चुना जिन्हें आमतौर पर स्थान नहीं मिलता है. ‘समागम’ के संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार प्रोफेसर मनोज कुमार ने कहा कि यह हमारे लिए खास बात यह है कि देशभर के शिक्षाविद्, शोधार्थी एवं मीडिया के ख्यातनाम लोग जुड़े हुए हैं. सुपरिचित साहित्यकार बालकवि बैरागी, डॉ. विकास दवे, डॉ. विजय बहादुर सिंह, डॉ. सोनाली नरगुंदे, एवं डॉ. कमलकिशोर गोयनका का समय-समय पर मार्गदर्शन मिलता रहा है. ‘समागम’ की शक्ति इस बात में है कि सुधिजन समय-समय पर गलतियों की ओर ध्यान आकृष्ट करते रहे हैं.
‘समागम’ केवल प्रकाशन तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की. सिकलसेल पर केन्द्रित अंक का विमोचन मध्यप्रदेश के गर्वनर श्री मंगूभाई पटेल ने किया वहीं खादी पर केन्द्रित अंक एवं राष्ट्रीय संगोष्ठी में सुप्रसिद्ध समाजवादी विचारक श्री रघु ठाकुर एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री गिरिजाशंकर की सहभागिता रही.
‘समागम’ ने विविध विषयों यथा सिनेमा के सौ वर्ष, महिला सशक्तिकरण के सौ वर्ष, चम्पारण आंदोलन के सौ वर्ष, महात्मा गांधी के ड़ेढ सौ वर्ष पूर्ण होने के साथ लोकमाता देवी अहिल्या के 300 वर्ष पर विशेष अंक का प्रकाशन किया गया. मीडिया के विविध विषयों के साथ पत्रकारिता के पुरखा यथा राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, राहुल बारपुते सहित अनेक पर अंक का प्रकाशन किया गया. सामाजिक सरोकार से जुड़े विषयों पर भी ‘समागम’ के अंक का प्रकाशन किया गया.
संपादक प्रोफेसर मनोज कुमार का कहना था कि 25वें वर्ष का सफर टीम समागम के लिए आल्हादित करने का अवसर है. उन्होंने बताया कि जल्द ही ‘भारतीय ज्ञान परम्परा एवं अनुसंधान की दृष्टि’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन ‘समागम’ के बैनर तले किया जाएगा.
सोमवार, 24 फ़रवरी 2025
न्यायप्रिय और शौर्य की प्रतिमूर्ति महाराज विक्रमादित्य
लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता
लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...
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-अनामिका कोई यकीन ही नहीं कर सकता कि यह वही छत्तीसगढ़ है जहां के लोग कभी विकास के लिये तरसते थे। किसी को इस बात का यकिन दिलाना भी आस...
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समागम का नया अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का नवम्बर २०१० का अंक आदिवासी और मीड...
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मनोज कुमार कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरो...




