गुरुवार, 1 मई 2025

## 26 साल का इंतजार और मेहनतकशों के हक में मोहन सरकार

 26 साल का इंतजार और मेहनतकशों के हक में मोहन सरकार

मनोज कुमार

कैलेंडर में दर्ज तारीख के हिसाब से हर साल एक मई को दुनिया के साथ हम लोग भी मई दिवस मनाते हैं. मजदूरों के हक-हूकुक की बातें करते हैं और इस दिन के साथ बिसरा देते हैं लेकिन मध्यप्रदेश मई दिवस के लिए 1 मई का इंतजार नहीं करेगा बल्कि हर साल सेलिबे्रट करेगा 25 दिसम्बर को. मोहन सरकार के एक फैसले ने ना केवल मई दिवस की तारीख का अर्थ ही बदल दिया बल्कि हजारों मजदूरों की आँखों से आँसू पोंछ लिए. हजारों मजदूर, 224 करोड़ रुपये और 26 सालों का लम्बा इंतजार. इन सालों में 26 बार मई दिवस आता-जाता रहा लेकिन आने-जाने वाली सरकारों के लिए यह एक आम मुद्दा था. न्याय के लिए बरसों से इंतजार करते करते अनेक मजदूरों की जीवनलीला खत्म हो गई. परिवार तंगहाली और बदहाली में जीता रहा. यहां-वहां से लेकर अदालत के दरवाजे तक इन मजदूरों ने गुहार लगायी लेकिन मामला सिफर रहा. सब कुछ हो रहा था लेकिन नहीं हुआ तो मजदूरों के हक में फैसला. करीब-करीब डेढ़ वर्ष पहले मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री का परिवर्तन होता है और शिवराजसिंह चौहान के स्थान पर डॉ. मोहन यादव नए मुख्यमंत्री बनते हैं. कभी शिवराजसिंह चौहान मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री का प्रभार सम्हालने वाले डॉ. यादव से भी कोई बड़ी उम्मीद सालों से अपनी मजदूरी पाने के लिए लड़ते मजदूरों को नहीं थी. लेकिन समय का लेखा कौन जानता है. मुुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अचानक से फैसला लिया और 26 सालों से अटकी उनकी मजदूरी का फैसला चंद मिनटों में कर दिया. डॉ. यादव के इस फैसले ने मोहन सरकार के प्रति लोगों में विश्वास का भाग जगा दिया. इसी के साथ 25 दिसम्बर, 2023 एक अमिट तारीख के रूप में मध्यप्रदेश के कैलेंडर में दर्ज हो गया है. मामला मालवा की कभी शान और इंदौर की पहचान रही हुकमचंद कपड़ा मिल के बंद हो जाने के बाद बेकार और बेबस हुए मजदूरों का है. साल-दर-साल गुजरता रहा और सब कुछ स्याह अंधेरे में कैद रहा. अदालत ने आदेश दिया कि हुकमचंद कपड़ा मिल के मालिकाना हक की जमीन को बेच कर मजदूरों की मजदूरी का भुगतान किया जाए. अनेक कोशिशों के बाद भी जमीन कौड़ी के मोल पड़ी रही. कोई खरीददार सामने नहीं आया और ना ही पूर्ववर्ती सरकारों ने कोई ठोस फैसला लिया. निराशा में डूबते-उतरते हजारों मजदूरों को लग रहा था कि अब उन्हें न्याय नहीं मिलने वाला लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मोहन सरकार ने फैसला लिया और चंद मिनटों में सभी मजदूरों को उनका बकाया मजदूरी, ग्रेज्युटी और दीगर भुगतान देेने का रास्ता साफ कर दिया.

मोहन सरकार का यह फैसला चौंकाने वाला था लेकिन था जनहित का फैसला. मालवा की तासीर ही कुछ अलग किस्म की है और उज्जैन से आने वाले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की तासीर भी मालवा की तरह ही है. वे स्वयं एक ऐसे परिवार से आते हैैं जिन्होंने मजदूरों का दर्द देखा है सो मुख्यमंत्री की नजर से नहीं बल्कि मनुष्य की नजर से उन्होंने इस मामले को देखा. देखा और समझा तो उन्होंने पहले भी था लेकिन मामला उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं था, सो खामोश रहे लेकिन सत्ता की बागडोर सम्हालते ही किसी और के अप्रोच किए बिना ही स्वयं संज्ञान लेकर मजदूरों की झोली में खुशी का फैसला डाल दिया. मोहन सरकार के इस फैसले से जैसे मालवा और खासतौर पर इंदौर झूूम उठा. इंदौर का मस्तिष्क शान से और गर्व से भर उठा. 

26 साल पहले हुकमचंद मिल बंद हुई थी। इसके बाद से मिल के पांच हजार से ज्यादा मजदूर वेतन, ग्रेच्युटी और अन्य लेनदारियों के लिए भटक रहे हैं। कोर्ट ने मिल की जमीन बेचकर मजदूरों का भुगतान करने का आदेश दिया था। कई बार नीलामी निकालने के बावजूद जमीन नहीं बिकी। हुकमचंद कपड़ा मिल के मामले में मोहन सरकार का यह फैसला दूरदर्शी था. अदालत के आदेश के बाद भी हुकमचंद कपड़ा मिल की जमीन ना बिक पाने पर उन्होंने सरकार के हक में लेकर नगर निगम इंदौर को सौंप दिया. अब इस जमीन पर आवासीय और व्यवसायिक गतिविधियां शुरू हो रही है. मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल को यह जमीन सौंप कर जिम्मेदारी दी गई है कि आवासीय और व्यवसायिक गतिविधियां शुरू की जाए.  सरकार ने मिल की जमीन का लैंड यूज औद्योगिक से बदलकर वाणिज्यिक और आवासीय कर दिया है। मिल की कुल जमीन में से 10.768 हेक्टेयर जमीन का लैंड यूज वाणिज्यिक और 6.752 हेक्टेयर जमीन का लैंड यूज आवासीय किया गया है। 

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने निर्देश दिए कि मध्यप्रदेश में जिन अन्य मिलों की देनदारियां शेष हैं, उन मिलों के प्रकरणों का निराकरण भी हुकुमचंद मिल के मॉडल के आधार पर कर मजदूरों को राहत दी जाए. यह एक सत्ताधीश का फैसला नहीं है औ ना ही इसे राजनीतिक चश्मे से देखा जाना चाहिए। यह एक मनुष्य का मनुष्य के लिए लिया गया फैसला है जिसे मानव कल्याण के रूप में देखा और समझा जाना चाहिए. जैसा कि डॉ. मोहन यादव के निर्देश हैं कि अन्य मिलों की देनदारियों को इसे ही मॉडल मानकर निपटारा किया जाए तो यह फैसले मध्यप्रदेश का ऐतिहासिक फैसला माना जाएगा.

एक समय था जब बड़े मजदूर संगठन हुआ करते थे. मजदूरों के हक के लिए वे सडक़ों पर उतर आते थे. कई बार उनकी मांगों को मान लिया जाता था तो कई बार ठुकरा दिया जाता था. धीरे-धीरे श्रमिक संगठन विलुप्त होते गए. मजदूर खुद के हक की लड़ाई खुद ही लड़ते रहे. मई दिवस का ताप समाप्त होता रहा और शायद यही कारण है कि 26 सालों से हुकुमचंद मिल के मजदूरों को उनका हक नहीं मिल पाया था. अभी और भी ऐसे मिल शेष हैं जिनके मामले निपटाया जाना है. अब श्रमिक संगठन कागज पर हैं और वे जमीन पर होते तो शायद हुकुमचंद मिल के श्रमिकों को 26 साल का इंतजार नहीं करना होता. खैर, अब मध्यप्रदेश के मेहनतकशों को श्रमिक संगठनों की जरूरत नहीं पड़ेगी जब सरकार ही उनके हक में फैसला ले रही है. शायद 1956 में मध्यप्रदेश की स्थापना के बाद मेहनतकशों के हक में ऐसा फैसला पहली बार किसी ने लिया है तो इसके लिए मोहन सरकार के हक में जाता है. मध्यप्रदेश अब गर्व से मई दिवस सेलिबे्रट करेगा.

बुधवार, 30 अप्रैल 2025

‘अक्षय’ संकल्प लें बाल विवाह के खिलाफ#

 ‘अक्षय’ संकल्प लें बाल विवाह के खिलाफ

मनोज कुमार

समय बदल रहा है लेकिन हमारी सोच आज भी वही पुरातन है. आधुनिक बनने का भले ही ढोंग करें लेकिन भीतर से हम रूढि़वादी हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो भारतीय समाज से बाल विवाह जैसी कुप्रथा कब की खत्म हो चुकी होती लेकिन ऐसा नहीं हुआ है. अनेक प्रयासों के बाद भी हर वर्ष बड़ी संख्या में बाल विवाह की खबरें हमें डराती हैं. सरकारों के प्रयासों से बाल विवाह में कुछ कमी आयी है लेकिन जरूरी है कि इस बार हम अक्षय तृतीया पर ‘अक्षय संकल्प’ लेेें कि हर स्तर पर बाल विवाह को हत्सोसाहित करेंगे.

भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है. अक्षय का अर्थ होता है जिसका कभी क्षय ना हो और इस दिन किए गए हर कार्य शुभ माने जाते हैं. वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाये जाने के कारण इसे अक्षय तृतीया का संबोधन मिला. अक्षय तृतीया का महत्व कई कारणों से है जिसमें परशुराम का जन्म, वेदव्यास का महाभारत लेखन का आरंभ होने के साथ ही माँ अन्नपूर्णा का जन्मदिन मनाया जाता है. इसी शुभ दिन स्वर्ग से पृथ्वी पर माता गंगा अवतरित हुई थी. माता गंगा को पृथ्वी पर अवतरित कराने के लिए राजा भागीरथ में हजारों वर्ष तक तपस्या की थी. मान्यता के अनुसार अक्षय तृतीया पर गंगा में डुबकी लगाने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं.

अक्षय तृतीया के दिन बिना किसी मुर्हूत के विवाह का मंगल कार्य पूरा किया जा सकता है इसलिए इस अवसर पर भारतीय समाज में विवाह को शुभ माना गया है. कुछ रूढि़वादी सोच ने व्यस्क के स्थान पर इस दिन बाल विवाह को शुभ मानकर उन्हें विवाह के पवित्र बंधन में बांध देते हैं. यह अनुचित है. कानून भी इसकी इजाजत नहीं देता है और यह स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह खतरनाक है. विवाह की कानूनी आयु लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लडक़ों के लिए 21 वर्ष है, उन लोगों की एक बड़ी संख्या के लिए अप्रासंगिक और महत्वहीन हो जाता है जो सदियों पुरानी परंपराओं और हठधर्मिता के कारण अंधे और भटके हुए हैं, जिन्हें वे अनुष्ठान कहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी बाल विवाह जैसी कुप्रथा पर टिप्पणी की थी. उनका कहना था कि देश में हजारों नाबालिग लड़कियों की शादी कर दी जाती है और उनके स्वास्थ्य, गर्भ धारण करने की क्षमता तथा इसके प्रतिकूल, आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रभावों की परवाह नहीं करते हुए उनसे शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं. निश्चित रूप से यह भारत जैसे विकसित देश के लिए एक धब्बा था जिसे केन्द्र और राज्य सरकार के प्रयासों से दूर किया जा सका है.

समय के साथ स्थितियों में परिवर्तन आने लगा है. बाल विवाह पर नियंत्रण पाने के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार ने ना केवल कानून सख्त किया बल्कि बच्चों, खासतौर पर बेटियों के हक में अनेक योजनाएं आरंभ की है. इसका परिणाम यह हुआ है कि समाज में बाल विवाह की कुप्रथा पर ना केवल रोक  लगी है बल्कि समाज का मन भी बदलने लगा है. सामाजिक रूढिय़ों के चलते उनका बचपन में ब्याह कर दिया जाता था. लेकिन पीछे कुछ वर्षों के आंकड़ें इस बात के लिए आश्वस्त कराते हैं कि समाज का मन बदलने लगा है.

तकरीबन डेढ बरस पहले मध्यप्रदेश में लिंगानुपात की जो हालत थी, उसमें सुधार आने लगा है. एक दशक पहले एक हजार की तादात पर 932 का रेसियो था लेकिन गिरते गिरते स्थिति बिगड़ गई थी. हाल ही में जारी आंकड़े इस बात की आश्वस्ति देते हैं कि हालात सुधरे भले ना हो लेकिन सुधार के रास्ते पर है. आज की तारीख में 1000 पर 930 का आंकड़ा बताया गया है. एक तरह से झुलसा देने वाली स्थितियों में कतिपय पानी के ठंडे छींटे पड़ रहे हैं. लगातार प्रयासों का सुपरिणाम है कि उनकी बेटियां मुस्कराती रहें और कामयाबी के आसमां को छुये लेकिन इसके लिए जरूरी होता है समाज का साथ और जो स्थितियां बदल रही है, वह समाज का मन भी बदल रही है.

यह कहना भी फिजूल की बात होगी कि पूर्ववर्ती सराकरों ने बिटिया बचाने पर ध्यान नहीं दिया लेकिन यह कहना भी अनुचित होगा कि सारी कामयाब कोशिशें इसी दौर में हो रही है. इन दोनों के बीच फकत अंतर यह है कि पूर्ववर्ती सरकारों की योजनाओं की जमीन कहीं कच्ची रह गयी थी तो वर्तमान सरकार ने इसे ठोस बना दिया. जिनके लिए योजनायें गढ़ी गई, लाभ उन तक पहुंचता रहा और योजनाओंं का प्रतिफल दिखने लगा. महिला एवं बाल विकास विभाग का गठन बच्चों और महिलाओं के हक के लिए बनाया गया था. इस विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह नयी योजनओं का निर्माण करें और महिलाओं को विसंगति से बचा कर उन्हें विकास के रास्ते पर सरपट दौड़ाये. योजनाएं बनी और बजट भी भारी-भरकम मिलता रहा लेकिन नीति और नियत साफ नहीं होने से कारगर परिणाम हासिल नहीं हो पाया. मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता की बागडोर सम्हालने के बाद डॉ. मोहन यादव ने बेटियों की ना केवल चिंता की बल्कि समय-समय पर उनकी खोज-खबर लेते रहे. जब मुखिया सक्रिय और सजग हो जाए तो विभाग का चौंकन्ना होना लाजिमी था. मुख्यमंत्री की निगहबानी में परिणामदायी योजनाओं का निर्माण हुआ और परिणाम के रूप में दस वर्ष में गिरते लिंगानुपात को रोकने में मदद मिली. एक मानस पहले से तैयार था कि बिटिया बोझ होती है और कतिपय सामाजिक रूढिय़ों के चलते उनका बचपन में ब्याह कर दिया जाता था. लेकिन पीछे कुछ वर्षों के आंकड़ें इस बात के लिए आश्वस्त कराते हैं कि समाज का मन बदलने लगा है.

बेटियों को रूढिय़ों से मुक्त कराने की दिशा में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं के साथ ही अनेक योजनाओं का श्रीगणेश किया गया था जिसका प्रतिफल मिला कि बाल विवाह जैसी कुरीतियों पर कुठाराघात होने लगा. प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की प्रेरणा से बीते वर्ष 2024 को ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ का शुभारंभ किया गया था. बाल विवाह मुक्त भारत अभियान देश को बाल विवाह मुक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित करेगा. यह अभियान बाल विवाह को खत्म करने और देश भर में युवा लड़कियों को सशक्त बनाने के लिए सरकार के चल रहे प्रयासों का एक प्रमाण है, जो एक प्रगतिशील और समतापूर्ण समाज सुनिश्चित करता है जहां हर बच्चे की क्षमता को पूरी तरह से साकार किया जा सके। जो विकसित भारत के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए लड़कियों और महिलाओं के बीच शिक्षा, कौशल, उद्यम और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए अनिवार्य है। उल्लेखनीय है कि बाल विवाह मुक्त भारत प्रधानमंत्री के वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के सपने से प्रेरित है। इस सपने को तब तक हासिल करना संभव नहीं है जब तक महिलाओं और लड़कियों को जीवन के सभी क्षेत्रों में पूर्ण, समान और सार्थक भागीदारी न मिले।

सनातन धर्म बहुमुखी है और वह समय के साथ अपनी सोच एवं दृष्टि में परिवर्तन करता है. अक्षय तृतीया पर अक्षय सोच के साथ समाज के सभी वर्ग मिलकर बाल विवाह जैसी कुप्रथा को समाप्त करने के लिए कृतसंकल्पित है. कानून अपना कार्य करेगा लेकिन समाज का हर वर्ग ‘अक्षय संकल्प’ ले ले कि वह इस कुप्रथा के खिलाफ खड़े हो जाएंगे

रविवार, 27 अप्रैल 2025

#प्रो मनोज कुमार की किताब "टारगेटेड जर्नलिज्म"

 "डायबिटीज का इलाज गुलाब जामुन से संभव है" इस चेतावनी से सजग 

करती प्रो मनोज  कुमार की किताब "टारगेटेड जर्नलिज्म"

        नैतिक आचरण पर आधारित परिवार की अगली पीढ़ी अगर मूल्यविहीन हो जाये, तो जो पीड़ा घर के सबसे बड़े बुजुर्ग की होती हैं, उसी दर्द को महसूस करने का नाम है,  प्रो मनोज कुमार की नई किताब "टारगेटेड जर्नलिज्म" ।

        यह किताब कल ही मेरे हाथ में आई है। लेखक एवं प्रोफेसर भाई मनोज कुमार से मेरा तीन दशक पुराना संबंध है। मैंने पत्रकारिता का ककहरा पहले दिन से इनके सानिध्य में बैठकर शुरू किया है। जब मैंने 1991 में पत्रकारिता में पहला कदम रखा था, तब यह विधा अपनी नैतिकता के चर्मोत्कर्ष को छूकर उतार पर चल पड़ी थी।

        देश को साहित्यकार एवं संपादक देने वाला नई दुनिया विभाजन के बाद बिकने पर आ गया था। कलरफुल फिल्मी कलाकारों के पोस्टर छाप कर दैनिक भास्कर अपनी ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा था। पाठकों की संख्या में नवभारत एवं दैनिक भास्कर रोज पूरे पेज के विज्ञापन छाप कर अपने पाठक संख्या की लड़ाई लड़ रहे थे। सामाजिक मूल्यों की पैरवी  करने वाला देशबंधु, स्वदेश, नवजीवन, अस्तित्व बचाने पर लगे हुए थे।     

        90 के दशक के बाद बदलाव आते चले गए और लिखने पढ़ने वालों से निकाल कर पत्रकारिता शब्दों के साहूकारों के हाथ में यात्रा पर निकल पड़ी। विचारों को समाज से रूबरू कराने के लिए शुरू किए गए अखबार दम तोड़ने लगे तथा कारोबार से जुड़े लोगों का इसमें प्रवेश शुरू हो गया। 

        कारोबार का उद्देश्य सिर्फ लाभ कमाना था, वही अखबारों का उद्देश्य होता चला गया। विचारवान लोग संपादक तक सीमित होते - होते बाद में कारोबार के दरबारी हो गए। जो कारोबारी धंधे में बिंदी लगाने का काम करते थे, वह संपादकीय की बिंदी चेक करने लगे। जब उन्हें बिंदी समझ में नहीं आई, तो संपादकीय छापना  ही बंद करवा दिया। खबर की  जिस बिंदी में धंधा कम दिखा, उसकी बिंदी हटा दी और जहां फायदा ज्यादा दिखा वहाँ बिंदी लगा दी। 

    मूल्य आधारित पत्रकारिता में जब पत्रकारिता के मूल्य लगने लगे तो हर खबर की कीमत तय होने लगी। इसी बात को निचोड़ कर रख दिया है प्रो मनोज कुमार ने अपनी पुस्तक "टारगेटेड जर्नलिज्म"  में।

         वैसे भी पत्रकारिता समाज का आईना है, आईने में वही दिखेगा जो समाज में हो रहा है। शिक्षक पढ़ाने से ज्यादा ट्यूशन पर ध्यान दे रहे हैं। डॉक्टर इलाज से ज्यादा जांच रिपोर्ट करवाने पर ध्यान दे रहे हैं। ऐसे में पत्रकारिता के चरित्र में वही अक्स दिख रहा है, जो समाज में चल रहा है। मशहूर व्यंगकार डॉ संपत सरल कहते हैं कि "पहले अखबार के पाठक हुआ करते थे, अब अखबार के ग्राहक होते हैं। जहां ग्राहक की बात होती है, वहां हर चीज धंधा बन जाती है।"

         प्रो मनोज कुमार की यह कृति पत्रकारिता की व्यावसायिक मानसिकता से सबको परिचित कराती है। पुस्तक का हर आलेख स्पष्ट करता है, कि जो दिख रहा है वह आपके स्वास्थ्य के लिए चाहे हानिकारक हो,  पर टेस्ट के हिसाब से लाजवाब है।   

        समाज में आप जिस तरह का आचरण चाहते है, उसी को परोस कर आपके जायके के अनुरूप पत्रकारिता को बना दिया है। नैतिक मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता सदैव बाजारवाद के खिलाफ थी, अब पत्रकारिता में खुद बाजारवाद आ गया है। 

        किताब के बारे में कहा जा सकता है कि इस किताब के माध्यम से पत्रकारिता करने वाली नई पीढ़ी को यह बताया जा सकता है, हम कहां से चले थे और अब किस मुकाम पर पहुंच चुके हैं। नैतिकता को बाजारवाद की चपेट में आने और व्यवसाय में बदलने की पीड़ा को इस पुस्तक के माध्यम से समझा जा सकता है।

        कुल मिलाकर प्रो मनोज कुमार की यह किताब पढ़ने के बाद जब भी आप कोई खबर पड़ेंगे, तो आपको खबर पढ़ने के बाद उसमें छुपा हुआ टारगेट सामने दिखने लगेगा। आपको हर खबर पढ़ते समय एहसास कराएगी की हकीकत कुछ और है, खबर में कुछ और टारगेट छुपा हुआ है। जो भी आप पढ़ रहे हैं वह व्यवसायिकता के टारगेट को पूरा कर रहा है और आपके जायके  के अनुसार खबरों की रेसिपी को प्रस्तुत कर रहा है। 

    हो सकता है किसी दिन डायबिटीज का मरीज  घर वालों से कह , देखो खबर आई है शुगर का इलाज, गुलाब जामुन खाने में छुपा हुआ है। बाद में पता चले इस खबर को टारगेट शहर के हलवाई ने करवाया था।

    यह किताब पाठकों के साथ पत्रकारिता से जुड़े हुए लोगों के लिए बेहतर अध्ययन सामग्री है।


लेखक प्रो. मनोज कुमार 

प्रकाशक लोक प्रकाशन, भोपाल

मूल्य 300,/

पृष्ठ 148

बुधवार, 23 अप्रैल 2025

#पंचायतों में आत्मनिर्भर होती महिलाएं


 







राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस पर 24 अप्रैल पर विशेष

पंचायतों में आत्मनिर्भर होती महिलाएं

मनोज कुमार

 73वें संशोधन के बाद पंचायती राज व्यवस्था में जो कमियां-खामियां थी, उसे दूर करने का प्रयास किया गया है और इस प्रयास के जरिए गाँधी के ग्राम स्वराज का स्वप्र मध्यप्रदेश की धरती पर सच होता नजर आ रहा है. इस संशोधन को लागू करने वाला मध्यप्रदेश पहला राज्य था. आहिस्ता-आहिस्ता पंचायत की सत्ता में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ायी गई. यही वजह है कि मध्यप्रदेश की स्त्री अब अधिकार सम्पन्न और आत्मनिर्भर हो चली हैं. स्वयं सहायता समूह ने पंचायतों की व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया है. अब गाँव की स्त्रियां आर्थिक रूप से मजबूत ही नहीं हैं बल्कि वे जागरूक भी हैं और समाज को जगा भी रही हैं. मध्यप्रदेश के गाँव-गाँव में स्व सहायता समूह अलख जगा रही हैं. स्त्रियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सरकार के प्रयासों ने सार्थक भूमिका निभायी है. हालांकि यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि स्त्रियों  की सत्ता में स्वतंत्र भूमिका है. आज भी सरपंच पति जैसी घटनाएं आम है. पंचायत सत्ता की इस कमी को समझते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सरपंच पति की व्यवस्था को जड़ से खत्म करने का आह्वान किया है. 

उल्लेखनीय है कि पंचायती राज व्यवस्था अनादिकाल से भारतीय समाज में लागू रहा है लेकिन अंग्रेजी शासन ने हमारी इस व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास किया. सबसे पहले पंचायतों को आर्थिक रूप से सुनियोजित ढंग से कमजोर किया गया और उसे आत्मनिर्भर बनने से रोका गया. देश के आजाद होने के बाद पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ और परिणामदायी बनाने के लिए अनेक स्तर पर कोशिश की गई. 1992 में पंचायती राज व्यवस्था में 73वां संशोधन कर अनेक स्तर पर पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने का प्रावधान किया गया. मध्यप्रदेश ने सर्वप्रथम इस संशोधन को लागू कर देश का पहला प्रदेश बना. यही नहीं पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई. गाँधी जी का कहना है कि प्रत्येक गाँव को एक आत्मनिर्भर स्वायत्त इकाई के रूप में स्थापित करना ही ग्राम स्वराज की अवधारणा का मुख्य लक्ष्य है. गांधी जी के अनुसार ग्राम स्वराज का वास्तविक अर्थ आत्मबल से परिपूर्ण होना है. स्वयं के उपयोग के लिए स्वयं का उत्पादन, शिक्षा और आर्थिक संपन्नता से है.

गाँधीजी ग्रामवासियों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे, शिक्षा को बढ़ावा देना चाहते थे, समाज से जातपात मिटा कर हर तबके के लोगों को मुख्यधारा में लाना चाहते थे. वे ग्रामीणों में स्व-चेतना के विकास के लिए नाटकशाला एवं सभाशाला भी खोलते हैं और मनुष्यों में स्व की चेतना जागृत करते हैं. ‘हिंदे-स्वराज’ की कल्पना ‘ग्राम-स्वराज’ का पर्याय बन जाता है. वे लिखते हैं- ग्राम स्वराज की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा जो अपनी अहम जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर निर्भर नहीं करेगा. वह परस्पर सहयोग से काम लेगा. हर गाँव में अपनी एक नाटकशाला, पाठशाला और सभाभवन रहेगा. बुनियादी तालीम के आखिरी दर्जे तक शिक्षा सबके लिए लाजमी होगी. जातपात और क्रमागत अस्पृश्यता के जैसे भेद आज हमारे समाज में पाए जाते हैं वैसे इस ग्राम समाज में बिल्कुल नहीं होंगे. गाँधीजी की दृष्टि से ग्राम स्वराज में आर्थिक व्यवस्था ही आदर्श नहीं, अपितु सामाजिक व्यवस्था का भी महत्व है. इसलिए वे सभी सामाजिक बुराइयों को दूर करने का प्रयास करते हैं. वे बताते हैं कि जब तक मनुष्य की सोच, चरित्र एवं कर्म शुद्ध नहीं हो जाए तब तक उसका सर्वांगीण विकास संभव नहीं है. वह मद्यपान निषेध पर जोर देते हैं तथा समाज से जातिवाद, छुआछूत आदि को खत्म करना चाहते हैं.  गाँधीवादी आदर्श सिर्फ कोरे आदर्श पर नहीं बल्कि यथार्थ और व्यावहारिक है और 73वें संशोधन में ग्राम स्वराज के स्वप्र को सच होते हुए दिख रहा है.

मोदी सरकार भी गाँधीजी के ग्राम स्वराज के सपनों को साकार करने के लिए संकल्पित है. सच तो यह है कि पूरा समाज मिलकर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में चल पड़े और इसका एक ही विकल्प है गाँवों को आत्मनिर्भर बनाना. गाँधीजी स्वयं मानते थे कि औद्योगिकरण बुरा नहीं है लेकिन सब कुछ उस पर ही निर्भर हो जाना बुरा है. केन्द्र सरकार की विभिन्न योजनाएँ हैं जिसमें कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है. निश्चित रूप से यह गाँधी विचार को विस्तार देने का ही प्रयास है. हम मानकर चलते हैं कि गाँधी का रास्ता ही अंतिम रास्ता है जिस पर चलकर हम आत्मनिर्भर बन सकते हैं. हालाँकि व्यवहार रूप में कई समस्या देखने में आयी. महिला तो निर्वाचित हो गईं लेकिन पंचायत की बागडोर घर के पुरुष के हाथों में रही. आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों द्वारा पंचायतों पर कब्जा जमाने की खबरें भी आती रही हैं. बावजूद इसके स्थितियाँ बदल रही है. 

पंचायत की सत्ता में महिलाओं की भागीदारी महज स्वप्र था. घूंघट में चेहरा छिपाये महिलाओं के बारे में कभी यह सोचा भी नहीं गया कि वे घर की देहरी पार कर पंचायत की सत्ता सम्हालेंगी. लेकिन अब यह स्वप्र नहीं, सच है और महिलाएं ना केवल गाँव की सत्ता सम्हाल रही हैं बल्कि गाँव की आर्थिक और सामाजिक स्थितियों को मजबूत बना रही हैं. मोहन सरकार और पंचायत मंत्री ने महिलाओं की सत्ता में रोड़े डालने वाले लोगों पर नकेल डालकर महिलाओं की सत्ता को आसान कर दिया है. यही नहीं, स्व सहायता समूह के माध्यम से महिलाओं को विभिन्न टे्रड में ट्रेंड किया जा रहा है. बैंकिंग जैसे दुरूह कार्य को इतना आसान बना दिया गया है कि महिलाओं के हाथों में लेपटॉप है और वे खाता खुलवाने से लेकर पैसा निकासी तक का सारा काम चुटकियों में कर रही हैं. कुछ तकनीकी कार्य बिजली मीटर रीडिंग हो या छिटपुट इलेक्ट्रिक मरम्मत का काम भी वे करने लगी हैं. सरकार ने नियम बना दिए हैं कि स्कूल गणवेश का पूरा काम अब स्व सहायता समूह को दिया जाएगा. सरकार के इस फैसले से उन्हें पर्याप्त काम मिल रहा है और गुणवत्ता पूर्ण बेहद रियायती दरों में कार्य पूर्ण हो रहा है. खान-पान की दुनिया में स्व सहायता समूह की धमक है. अचार, पापड़ के साथ ही जैविक पदार्थों में उनका पूरा हस्तक्षेप है. 

स्व सहायता समूह आर्थिक रूप से सम्पन्न होने के कारण अपनी जरूरतों के अब किसी साहूकार के पास हाथ महिलाओं को हाथ नहीं पसारना पड़ता है. वे आपस में ही अपनी जरूरत के अनुरूप राशि का आहरण कर लेती हैं और सुविधानुसार समय पर राशि वापस भी कर देती हैं. स्व सहायता समूह की महिलाओं ने इतिहास रच दिया है. बच्चों को अपने मन मुताबिक पढ़ाई करा रही हैं. एक दाग सरपंच पति का था, अब वह भी आहिस्ता आहिस्ता दूर हो रहा है. सरकारी डंडे और महिलाओं के जागरूक हो जाने के कारण पति खुद ही सत्ता से दूर हो रहे हैं. इक्का-दुक्का घटनाएं सामने आ रही हैं लेकिन कानूनी कार्रवाई के चलते दूसरी पंचायतों में स्थितियां सुधर रही हैं. स्व सहायता समूह की महिलाओं के प्रयासों से बाल विवाह के साथ ही अन्य सामाजिक कुरीतियों पर नियंत्रण लगा है. पंचायती राज व्यवस्था का चेहरा बदल रहा है और खासतौर पर महात्मा गाँधी के सपनों के अनुरूप लघु एवं कुटीर उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है. गाँधीजी चाहते थे कि महिलाएं आत्मनिर्भर हों और आर्थिक रूप से, शैक्षिक रूप से सशक्त बनें तो आज मध्यप्रदेश में उनका सपना सच हो रहा है. Photo by Google

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2025

#Manoj मनोज कुमार की नयी किताब #Targeted Journlism


 किताब का शीर्षक ‘टारगेटेड जर्नलिज्म’ आपको सोचने के लिए विवश करेगा और कुछेक के मन में आएगा कि यह क्या नकरात्मक शीर्षक है. दरअसल ऐसा कुछ नहीं है. यह तो सभी सुधिजन मानते हैं कि वर्तमान समय पत्रकारिता का नहीं है. यह मीडिया का दौर है और मीडिया के इस दौर में ध्येनिष्ठ पत्रकारिता को विलोपित कर टारगेटेड जर्नलिज्म में गढ़ दिया गया है. पत्रकारिता परिवार के हमारे पुराधाओं ने पत्रकारिता के लिए कहा करते थे-‘ठोंक दो’ अर्थात मुरब्बत करने की जरूरत नहीं लेकिन बदलते दौर में  ‘निपटा दो’ में बदल दिया है. पहले में एक ध्य था और अब लक्ष्य है. सच या गलत में कोई अंतर नहीं करना है बल्कि जो विरोध में खड़ा हो, उसे निपटा देना है. शायद इस सोच के चलते पत्रकारिता सवालोंं के घेरे में है.

यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि आज पत्रकारिता करना कितना कठिन कार्य है. बाहरी दबाव की बात ना भी करें तो संस्थान के भीतर मैनेजमेंट का दबाव इतना होता है कि हम निर्भिक होकर अपनी बात नहीं कह पाते हैं. ऐसे में स्वतंत्र रूप से लेखन एक माध्यम बच जाता है जहां हम अपने मन की बात कर सकते हैं. अपने लिखे को समाज तक पहुंचाने का संकट बड़ा है तो समाधान भी छोटा नहीं है. आज मीडिया केन्द्रित अनेक वेबसाइट्स है जहां आपके लेख प्रकाशित होते हैं. ब्लॉग लेखन इसी का एक हिस्सा है. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि हम नियमित रूप से लिखें. 

यह किताब नहीं है और ना ही किसी किस्म का दस्तावेजीकरण अपितु यह मेरे लेखों का संकलन मात्र है. यह किताब पत्रकारिता की नयी पीढ़ी के लिए काम आएगी, ऐसा मेरा विश्वास है.

शनिवार, 5 अप्रैल 2025

भारतीय जनता पार्टी : स्थापना दिवस 6 अप्रेल पर विशेष

शून्य से शिखर का सफर

मनोज कुमार

व्यक्ति या संस्था जब शिखर पर होता है तब उसकी विजयगाथा गायी जाती है और यह स्वाभाविक भी है. आज की भारतीय जनता पार्टी की बुनियाद में उसके संघर्ष के दिनों की यात्रा उसकी नींव है. 1951 में जनसंघ के रूप में यात्रा शुरू हुई और जनता पार्टी के रूप में विस्तार मिला और 6 अप्रेल 1980 को स्वयं की पहचान के साथ भारतीय जनता पार्टी की यात्रा आरंभ हुई तो अविरल चल रही है. कभी दो सांसदों के साथ लोकसभा में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने वाली भारतीय जनता पार्टी आज देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में उपस्थित है.    

यहां यह जान लेना जरूरी है कि भारतीय जनता पार्टी की यात्रा का आरंभ कहां से शुरू होता है. वैसे तो यह सबको पता है कि 6 अप्रेल 1980 को भाजपा का एक राजनीतिक पार्टी के रूप में गठन हुआ लेकिन भाजपा की रीति-नीति हिन्दुत्व की रही है और इसी आधार पर तब 1951 में हिंदू समर्थक समूह की राजनीतिक शाखा के रूप में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नींव डाला था. ध्येय था हिंदू संस्कृति के अनुसार भारत के पुनर्निर्माण की वकालत की और एक मजबूत एकीकृत राज्य के गठन का आह्वान। यात्रा आहिस्ता आहिस्ता आगे बढऩे लगा और 1967 तक भारतीय जनसंघ ने उत्तर भारत के हिंदी भाषी क्षेत्रों में अपनी मजबूत पकड़ बना ली थी। दस साल बाद, पार्टी ने हिंदी भाषी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत कर ली।

देश में 1977 में आपातकाल की समाप्ति के बाद जनसंघ का अन्य दलों के साथ विलय हो गया और इसके साथ ही जनसंघ के स्थान पर नया नाम मिला जनता पार्टी.  जनता पार्टी के गठन के बाद नयी ताकत दिखी और जनता पार्टी ने 1977 में कांग्रेस को पराजित कर दिया. जनता पार्टी में विलय हुई जनता पार्टी की रीति-नीति से अन्य दलों का मेल नहीं खाया और उनके रास्ते अलग अलग हो गए. पूर्व जनसंघ के पदचिह्नों को पुनर्संयोजित करते हुये अटल बिहारी वाजपेयी ने तीन अन्य राजनीतिक दलों के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। जनता पार्टी से अलग होकर सरकार की बागडोर अपने हाथ में ले ली। हालांकि, गुटबाजी और आंतरिक विवादों से त्रस्त होकर जुलाई 1979 में सरकार गिर गई। जनता गठबंधन के भीतर असंतुष्टों द्वारा विभाजन के बाद 1980 में औपचारिक रूप से भाजपा की स्थापना हुई। 

यद्यपि शुरुआत में पार्टी असफल रही और 1984 के आम चुनावों में केवल दो लोकसभा सीटें जीतने में सफल रही।  इसके बाद राम जन्मभूमि आंदोलन ने पार्टी को ताकत दी। कुछ राज्यों में चुनाव जीतते हुये और राष्ट्रीय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करते हुये 1996 में पार्टी भारतीय संसद में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। इसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया जो 13 दिन चली। 1998 में आम चुनावों के बाद भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का निर्माण हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी जो एक वर्ष तक चली। इसके बाद आम-चुनावों में राजग को पुन: पूर्ण बहुमत मिला और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार ने अपना कार्यकाल पूर्ण किया। इस प्रकार पूर्ण कार्यकाल करने वाली पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी। 2004 के आम चुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा और अगले 10 वर्षों तक भाजपा ने संसद में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभाई। 

उल्लेखनीय है कि भाजपा हिन्दुत्व के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त करती है और नीतियाँ ऐतिहासिक रूप से हिन्दू राष्ट्रवाद की पक्षधर रही हैं। इसकी विदेश नीति राष्ट्रवादी सिद्धांतों पर केन्द्रित है। जम्मू ृऔर कश्मीर के लिए विशेष संवैधानिक दर्जा खत्म करना, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करना तथा सभी भारतीयों के लिए समान नागरिकता कानून का कार्यान्वयन करना भाजपा के मुख्य मुद्दे हैं। 

भाजपा को 1989 में चुनावी सफलता मिलनी शुरू हुई, जब उसने अयोध्या में हिंदुओं द्वारा पवित्र माने जाने वाले एक क्षेत्र में हिंदू मंदिर के निर्माण की मांग करके मुस्लिम विरोधी भावना को भुनाया , लेकिन उस समय बाबरी मस्जिद (बाबर की मस्जिद) का कब्जा था। 1991 तक भाजपा ने अपनी राजनीतिक अपील में काफी वृद्धि की थी, लोकसभा (भारतीय संसद के निचले सदन) में 117 सीटों पर कब्जा कर लिया और चार राज्यों में सत्ता संभाली। 1998 में भाजपा और उसके सहयोगी दल वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के साथ बहुमत वाली सरकार बनाने में सफल रहे। उस वर्ष मई में, वाजपेयी द्वारा आदेशित परमाणु हथियार परीक्षणों की व्यापक अंतरराष्ट्रीय निंदा हुई। 13 महीने के कार्यकाल के बाद, गठबंधन सहयोगी ऑल इंडिया द्रविड़ प्रोग्रेसिव फेडरेशन (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कडग़म ) ने अपना समर्थन वापस ले लिया और वाजपेयी को लोकसभा में विश्वास मत हासिल करने के लिए बाध्य होना पड़ा, जिसमें वे एक वोट के अंतर से हार गये।

भाजपा ने 1999 के संसदीय चुनावों में एनडीए के आयोजक के रूप में चुनाव लड़ा, जो 20 से अधिक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों का गठबंधन था। गठबंधन ने सत्तारूढ़ बहुमत हासिल किया, जिसमें भाजपा ने गठबंधन की 294 सीटों में से 182 सीटें जीतीं। गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी के नेता के रूप में वाजपेयी फिर से प्रधानमंत्री चुने गए। हालाँकि वाजपेयी ने कश्मीर क्षेत्र को लेकर पाकिस्तान के साथ देश के लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष को सुलझाने और भारत को सूचना प्रौद्योगिकी में विश्व नेता बनाने की कोशिश की, लेकिन गठबंधन ने 2004 के संसदीय चुनावों में कांग्रेस पार्टी के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) गठबंधन के सामने अपना बहुमत खो दिया और वाजपेयी ने पद से इस्तीफा दे दिया। 2009 के संसदीय चुनावों में लोकसभा में पार्टी की सीटों का हिस्सा 137 से घटकर 116 रह गया क्योंकि यूपीए गठबंधन फिर से प्रबल हो गया ।

2014 के आम चुनावों में राजग को गुजरात के लम्बे समय से चले आ रहे मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारी जीत मिली।  2014 के लोकसभा चुनाव कांग्रेस शासन के प्रति असंतोष बढऩा था.  मोदी को भाजपा के चुनावी अभियान का नेतृत्व करने के लिए चुना गया. उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार पार्टी ने घोषित किया। भाजपा ने 282 सीटें जीतीं, जो सदन में स्पष्ट बहुमत था, और इसके एनडीए सहयोगियों ने 54 और सीटें जीतीं। मोदी ने 26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली.

दो सीटों पर विजय प्राप्त करने वाली भाजपा ने 2014 से जो विजय यात्रा आरंभ की तो पीछे पलट कर नहीं देखा. लोकसभा के साथ ज्यादतर राज्यों में भाजपा की सरकार बनती गई. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आइकॉन बनकर उभरे. वे समाज के सभी वर्गों में लोकप्रिय हो गए. वे अपने सख्त फैसले से अलग पहचान बना लिया. अयोध्या में राममंदिर निर्माण, जम्मू कश्मीर में बदलाव, तीन तलाक कानून खत्म करने, गोवध रोकने कानून, जीएसटी लागू कर देश में परिवर्तन की नयी बयार ला दी. भाजपा को बनाने और विस्तार देने में अटलविहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी और मुरली मनोहर जोशी का नाम लिया जा सकता है तो एक दशक में भाजपा को मजबूती देने वालों में नरेन्द्र मोदी के नाम का ही उल्लेख मिलेगा. भाजपा ने अपने संकल्प और दूरदृष्टि से आज वैकल्पिक नहीं बल्कि लोकतांत्रिक भारत में मुखर और प्रखर राजनीतिक दल के रूप में सशक्त उपस्थिति दर्ज करायी है. 

मेरा मध्य प्रदेश; हृदय प्रदेश का सप्तक

प्रो. मनोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार, भोपाल सप्तक अर्थात सात यानि मध्यप्रदेश के जन्म के सत्तर वर्ष। सब कुछ अनूठा, सबकुछ अलग। जब बना तब भी और आज स...