सोमवार, 16 जून 2025

##विश्व सिकलसेल दिवस 19 जून







सिकलसेल के खिलाफ महामहिम का सामाजिक सरोकार

प्रो. मनोज कुमार

महामहिम अर्थात राज्यपाल के बारे में आमतौर पर धारणा यह है कि उनका सरोकार राज्य की सत्ता पर निगरानी रखना होता है और यह कि वे सामाजिक सरोकार से दूर रहते हैं। मध्यप्रदेश के महामहिम मंगूभाई पटेल ने इस धारणा को ध्वस्त करते हुए जता दिया है कि राज्यपाल राजभवन की चहारदीवारी में रहने के लिए नहीं बल्कि उनका भी समाज में हस्तक्षेप जरूरी है। सिकल सेल बीमारी को नेस्तनाबूद करने के लिए मध्यप्रदेश के गर्वनर मंगूभाई पटेल ने सर्वाधिक सक्रियता के साथ इस अभियान में जुटे हुए हैं। मध्यप्रदेश में गर्वनर श्री पटेल लगातार लोगों के बीच जाकर जागरूकता फैला रहे हैं। गर्वनर के इन प्रयासों का समाज में असर देखने को मिल रहा है। मध्यप्रदेश के शहडोल जिले से सिकल सेल एनीमिया के खात्मे के संकल्प के साथ एक जनअभियान की शुरूआत हो चुकी है। 

यह जान लेना जरूरी है कि सिकल सेल एनीमिया किस तरह आदिवासी समाज का काल का ग्रास बना रही है, यह जानने से पहले जरूरी है कि यह जान लें कि अकेले मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि देश के करीब 17 राज्यों 7 करोड़ से अधिक आदिवासीजन इस बीमारी की चपेट में हैं। आबादी के मान से मध्यप्रदेश एक बड़ा आदिवासी प्रदेश है लिहाजा मध्यप्रदेश सर्वाधिक प्रभावित राज्य माना जा सकता है. वैसे इस समय देश के 17 जिलों में इस बीमारी का प्रकोप है जिनमें मुख्य रूप से ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल में यह बीमारी जड़े जमाए हुए है। आए दिन जनजातीय समुदाय की मौतें एनीमिया सिकल सेल में कारण हो रही है। मध्यप्रदेश में एनीमिया सिकलसेल आदिवासी बाहुल्य इलाकों में ज्यादा फैला हुआ है उनमें शहडोल, उमरिया, अनुपपुर, बालाघाट, डिंडोरी, मंडला, सिवनी, छिंदवाड़ा, बड़वानी, अलीराजपुर, बुरहानपुर, बैतूल, धार, शिवपुरी, होशंगाबाद, जबलपुर, खंडवा, खरगोन, रतलाम, सिंगरौली और सीधी के नाम शामिल हैं. सिकल सेल रोग (एससीडी) एक क्रोनिक एकल जीन विकार है जो क्रोनिक एनीमिया, तीव्र दर्दनाक एपिसोड, अंग रोधगलन और क्रोनिक अंग क्षति और जीवन प्रत्याशा में महत्वपूर्ण कमी की विशेषता वाले दुर्बल प्रणालीगत सिंड्रोम का कारण बनता है।

एक रिपोर्ट के अनुसार आदिवासी जिलों में सरकारी स्वास्थ सेवाओं के हाल में पहले की तुलना में सुधार तो हुआ है लेकिन सिकल सेल एनीमिया को उतनी गंभीर बीमारी नहीं माना जा रहा है जितनी यह गंभीर है। हालाँकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत, भारत सरकार अपने वार्षिक पीआईपी प्रस्तावों के अनुसार सिकल सेल रोग की रोकथाम और प्रबंधन के लिए राज्यों का समर्थन करती है।  वित्त वर्ष 2023-24 के केंद्रीय बजट में, 2047 तक सिकल सेल एनीमिया को खत्म करने के लिए एक मिशन शुरू करने की घोषणा की गई है। इस मिशन में जागरूकता सृजन, प्रभावित क्षेत्र में 0-40 वर्ष आयु वर्ग के लगभग सात करोड़ लोगों की सार्वभौमिक जांच पर ध्यान केंद्रित किया गया है। केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों के सहयोगात्मक प्रयासों के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों और परामर्श. सिकल सेल रोग की जांच और प्रबंधन में चुनौतियों से निपटने के लिए मध्यप्रदेश में राज्य हीमोग्लोबिनोपैथी मिशन की स्थापना की गई है। प्रधानमंत्री द्वारा बीते 15 नवंबर 2021 को मध्यप्रदेश के झाबुआ और अलीराजपुर जिले और परियोजना के दूसरे चरण में शामिल 89 आदिवासी ब्लॉकों में स्क्रीनिंग के लिए एक पायलट परियोजना शुरू की गई। राज्य द्वारा दी गई रिपोर्ट के अनुसार कुल 993114 व्यक्तियों की जांच की गई है जिनमें से 18866 में एचबीएएस (सिकल ट्रेट) और 1506 (एचबीएसएस सिकल रोगग्रस्त) पाए गए हैं। इसके अलावा, राज्य सरकार ने रोगियों के उपचार और निदान के लिए 22 जनजातीय जिलों में हीमोफिलिया और हीग्लोबिनोपैथी के लिए एकीकृत केंद्र की स्थापना की है।

सिकल सेल एनीमिया खून की कमी से जुड़ी एक बीमारी है। इस आनुवांशिक डिसऑर्डर में ब्लड सेल्स या तो टूट जाती हैं या उनका साइज और शेप बदलने लगती है जो खून की नसों में ब्लॉकेज कर देती हैं। सिकल सेल एनीमिया में रेड ब्लड सेल्स मर भी जाती हैं और शरीर में खून की कमी हो जाती है। जेनेटिक बीमारी होने के चलते शरीर में खून भी बनना बंद हो जाता है। वहीं शरीर में खून की कमी हो जाने के कारण यह रोग कई जरूरी अंगों के डेमेज होने का भी कारण बनता है। इनमें किडनी, स्प्लीन यानि तिल्ली और लिवर शामिल हैं। 

लक्ष्य है कि साल 2047 तक इस रोग को भारत से जड़ से खत्म कर दिया जाए। इसी कड़ी में पीएम मोदी ने शहडोल में सिकल सेल कार्ड वितरण कर बीमारी की स्क्रीनिंग के लिए लोगों को जागरूक करने का संदेश दिया था। गर्वनर की देखरेख में राज्य सरकार भी सक्रिय हुई और पहले की तुलना में काफी कुछ सुधार देखने को मिल रहा है। सिकलसेल के खिलाफ इलाज और परीक्षण से ज्यादा जरूरी आदिवासी समाज को जागरूक करना है। इस बीमारी में सबसे अहम सिकल सेल बीमारी को रोकने का एक प्रभावी तरीका इस रोग से ग्रस्त स्त्री-पुरुषों में विवाह को रोकना है। लेकिन यह तभी संभव है, जब सिकल सेल रोगग्रस्त लोगों की पहचान हो और उनके बीच विवाह संबंधों पर रोक लगे। यह काम लोगों में इस रोग के प्रति जागृति फैलाने से ही हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार सिकल सेल एनीमिया 3 प्रकार का होता है। पहला प्रकार सिकल वाहक है, सिकल वाहक में कोई लक्षण दिखाई नहीं देते और ऐसे व्यक्ति को उपचार की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन ऐसे व्यक्ति को यह पता होना चाहिये कि वह सिकल वाहक है। यदि अनजाने में सिकल वाहक दूसरे सिकल रोगी से विवाह करता है, तो सिकल पीडि़त संतान पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है। दूसरे प्रकार के सिकल रोगी में सिकल सेल बीमारी के लक्षण दिखाई देते हैं। इन्हें उपचार की आवश्यकता होती है। सिकल बीटा थेलेसिमिया तीसरे प्रकार का सिकल सेल रोग है। बीटा थैलेसिमिया बीटा ग्लोबिन जीन में दोष के कारण होता है। सिकल सेल बीमारी अनुवांशिक बीमारी है. सिकल सेल रोगी के साथ खाना खाने, साथ रहने, हाथ मिलाने अथवा गले मिलने से यह रोग नहीं होता। यह बीमारी केवल माता-पिता से ही बच्चों में आ सकती है। सिकल सेल में रोगी की लाल रक्त कोशिकाएं हंसिए के आकार में परिवर्तित हो जाती हैं। हंसिए के आकार के ये कण शरीर के विभिन्न अंगों में पहुंच कर रुकावट पैदा करते हैं। इस जन्मजात रोग से ग्रसित बच्चा शिशु अवस्था से बुखार, सर्दी, पेट दर्द, जोड़ों एवं घुटनों में दर्द, सूजन और कभी रक्त की कमी से परेशान रहता है। सिकलसेल-एनीमिया ऐसा रक्त विकार है, जिसमें लाल रक्त कोशिकाएं जल्दी टूट जाती है। इसके कारण एनीमिया और अन्य जटिलताएं जैसे कि वेसो-ओक्लुसिव क्राइसिस, फेफड़ों में संक्रमण, एनीमिया, गुर्दे और यकृत की विफलता, स्ट्रोक आदि की बीमारी और यहां तक की पीडि़त के मौत तक की आशंका रहती है। 

सिकल सेल एनीमिया रोग दुनिया में है तो काफी पहले से, लेकिन वैज्ञानिकों को इसका पता पहली बार 1910 में कैरेबियाई देश ग्रेनाडा में चला। वहां इसे एक मेडिकल छात्र लिनस पॉलिंग और उसके सहयोगियों ने खोजा। उन्होंने बताया कि इस रोग से ग्रस्त रोगियो में सिकल हीमोग्लोबिन में एक असामान्य परिवर्तित इलेक्ट्रोफोरेटिक (विद्युत कण संचलन) गतिविधि देखने में आई है। 1949 में पहली बार इसे आण्विक रोग के रूप में पारिभाषित किया गया। 1957 में वेर्नन इनग्राम ने बताया कि सिकल सेल हीमोग्लोबिन रोग का मूल कारण हीमोग्लोबिक अणुओं में एकल अमीनो एसिड का प्रतिस्थापन है। इस रोग के कारणो का तो कुछ पता लग गया है, लेकिन इसका स्थायी इलाज अभी तक नहीं खोजा जा सका है। लिहाजा देश में सिकल एनीमिया को लेकर शुरू किया गया देशव्यापी अभियान इसी अनिवार्यता का हिस्सा है। 

मध्यप्रदेश के राज्यपाल श्री मंगूभाई पटेल इस बीमारी के खिलाफ जन-जागृति के लिए प्रयासरत हैं. अपने हर कार्यक्रम में वे लोगों को इस बीमारी के बारे में बताते हैं और इस बीमारी के खिलाफ खड़े होने का आग्रह करते हैं. सिकल सेल एनीमिया के खिलाफ इस जंग में सरकारों को राजनीतिक लाभ ना मिले लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता मौत के मुंह में समा रहे लोगों को नया जीवन जरूर मिल सकेगा. सिकल सेल एनीमिया के खिलाफ सरकार ने जो अभियान शुरू किया है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि इसका सुपरिणाम देखने को मिलेगा. इसमें सबसे प्रबल पक्ष यह है कि लोगों तक शासकीय अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी पहुंचे. यही नहीं, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का दस्ता घर-घर जाकर सरकारी दवाखाना में आने के लिए प्रेरित करे. स्कूलों, पंचायतों और आंगनवाड़ी में कैम्पेन चलाया जाए. सरकार ने अभियान शुरू किया है, यह तो एक पक्ष है लेकिन समाज का साथ में सक्रिय होना भी जरूरी है. राज्य की मोहन सरकार ने भी इस दिशा में सकरात्मक प्रयास कर रही है जिसका असर दिख रहा है. हालाँकि बीमारी का निदान किया जाना कठिन है लेकिन जनजागरूकता से इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है। एक संभावना का उदय हो चुका है. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) 

गुरुवार, 12 जून 2025

मोदी मैजिक के 11 वर्ष


       

 प्रो. मनोज कुमार
            साल 2014 के पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि देश की सत्ता में गैर-कांग्रेसी दल लगातार तीन बार सत्ता में बनी रह सकती है और अभी संभावना विपुल है. यह सोच स्वाभाविक भी थी कि जिस देश में एक वोट से केन्द्र की गैर-कांग्रेसी सरकार गिर जाए. खैर, यह चमत्कार है लोकतंत्र का तो यह कमाल है मोदी मैजिक का. प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने भारतीय समाज की नब्ज को थामा, जाँचा और उनकी जरूरतों के मुताबिक फैसले किए. यह कहना भी सर्वथा उचित नहीं है कि उनके सारे फैसले सार्थक साबित हुए लेकिन यह कहना उचित है कि उनके ज्यादतर फैसले जनता के हक में था. गाँव से लेकर सात समुंदर पार तक मोदी की आवाज गूँजती है. हालिया ऑपरेशन सिंदूर ने मोदी सरकार की लोकप्रियता को हजारों गुना बढ़ा दिया है. जैसा कि होता है विपक्ष सत्तासीन दल को निशाने पर लेती है लेकिन यह सब एक रिवाज है.  मोदी मैजिक यूँ ही नहीं चलता है. वह जानते हैं कि कब क्या कहा जाए और कब क्या फैसला किया जाए. उन्हें इस बात का भी अहसास है कि मीडिया जनता का मन बदलने की ताकत रखती है तो वे ऐसी जुगत बिठाते हैं कि मीडिया खुद उनकी मुरीद हो जाती है.  
        11 वर्ष पहले जाकर कुछ पलट कर देखना होगा. तब मोदी गैर-कांग्रेसी सरकार के पहले दमदार प्रधानमंत्री होते हैं पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने वाले.  स्वाभाविक है कि दशकों से सत्ता में काबिज लोगों के लिए यह सदमा सा था और मोदी को कमजोर करने के लिए वे रणनीति बनाते लेकिन वे मोदी मैजिक को समझ ही नहीं पाए. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं होकर अपने दस लाख के लिबास को चर्चा में ला दिया. मोदी विरोधी उनके लिबास की कीमत में उलझ गए और जनता को संदेश चला गया कि विरोधी मोदी को कमजोर करना चाहते हैं. भव्यता की यह रणनीति कारगर साबित हुई और विपक्ष का कीमती समय व्यर्थ के विवाद में आज भी जाया हो रहा है. मोदी मैजिक भारतीय मन को जानता है और चुपके से वे भव्यता से दिव्यता की ओर चल पड़े. उन्होंने पारम्परिक भारतीय परिधान को अपनी जीवनशैली में शामिल कर लिया. अब वे पायजामा कुरता के साथ जैकेट पहन कर सादगी के प्रतीक हो गए. यहाँ भी कमाल हो गया कि नेहरू जैकेट को रिप्लेस कर मोदी जैकेट ने युवाओं को मोह लिया. यही मोदी मैजिक है जो लोगों को बार-बार लुभाता है और वे पूरी ताकत के साथ सत्ता में वापसी करते हैं.  
        मोदी भारतीय मन को बेहतर ढंग से जानते हैं लेकिन मोदी को समझना किसी पहेली को हल करने जैसा है. 11 वर्षों के उनके कार्यकाल की समीक्षा की जाए तो देश में अपवाद स्वरूप कोई मिल जाएगा जिसे मोदी के अगले कदम के बारे में कुछ पता हो या वह यह बता पाए कि मोदी क्या करने वाले हैं. थोड़ा पीछे चलें तो देखेंगे कि वे गुजरात राज्य के सबसे लम्बे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री थे जिन्हें भाजपा और संघ ने 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री का चेहरा बनाया था. तब की सरकार को कटघरे में खड़ा कर युवाओंं के बीच एक नायक की तरह उभरे थे. यह वह वर्ग था जिसे राजनीति की समझ बहुत नहीं थी लेकिन देश में बदलाव की चाहत थी. चाय पर चर्चा से लेकर वे तूफानी गति से देश के दिल में जगह बना रहे थे. और भारतीय राजनीति में ऐसा कायापलट हुआ कि भारतीय जनता पार्टी नरेन्द्र मोदी को कैश कर केन्द्र की सत्ता पर काबिज हो गई. नरेन्द्र मोदी से लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बखूबी यह जानते थे कि जिस तेजी से उनकी लोकप्रियता आम भारतीय के मन में बनी है, उसे लम्बे समय तक बनाये रखना एक चुनौती है. जो आम आदमी के झटके में कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों को जमीन दिखा सकता है, वह मोदी के साथ भी ऐसा कर सकता है. और खांटी राजनीतिक दल और राजनेता मोदी को कटघरे में खड़ा करेंगे. मोदी का मीडिया मैनेजमेंट इतना सधा हुआ था कि खांटी राजनेता भी मात खा गए. विरोधी ही नहीं, उनके अपनी पार्टी के लोगों की समझ से भी बाहर रहे मोदी. मोदी जानते थे कि विरोधियों से लेकर मीडिया तक को भटकाना है तो कुछ ऐसा किया जाए कि उनकी चर्चा और आलोचना के केन्द्र मेें मोदी की राजनीति नहीं, बल्कि उनके दूसरे पक्ष को लेकर वे चर्चा में बने रहे.
        विपक्षी नेताओं को तो समझ ही नहीं आया तो उनके अपने ही विरोधी धड़ा भी शांत बैठ गया. परिणामत: पाँच वर्ष बाद केन्द्र में वापस मोदी सरकार की वापसी होती है. यही नहीं, अनेक राज्यों में भी भाजपा की सरकार सत्तासीन होती है बल्कि रिकार्ड कार्यकाल बनाती है. छत्तीसगढ़ में 15 साल तो मध्यप्रदेश में 18 महीने के छोटे से ब्रेक के बाद 20 वर्षों से अधिक समय से वह सत्तासीन है. इसके अलावा अनेक राज्यों में भाजपा सत्तासीन है. महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में भी भाजपा की सत्ता कायम है. आलम यह है कि मीडिया कभी सटीक रूप से यह नहीं बता पाया कि मोदीजी का अगला कदम क्या होगा? मीडिया अनुमानों को ही हेडलाइन बनाते रहे और हर बार गच्चा खाते रहे. कई बार तो मोदीजी के फैसलों से यह भी पता नहीं चलता कि उन्हें स्वयं को पता होता है कि नहीं कि उनका अगला कदम क्या होगा? उनके लिए फैसले का दूरगामी परिणाम क्या होगा, इसकी मीमांसा की जाती है लेकिन फौरीतौर पर मीडिया और आम आदमी को वे चमत्कृत कर जाते हैं.
        वे भारतीय मानस की नब्ज को बेहतर ढंग से पकड़ते हंै और उसी के अनुरूप वे फैसला करते हैं. भारत एक विशाल देश है और इस बहुसंख्य आबादी जिसमें बहु भाषा-भाषायी लोगों तक पहुँचना सरल नहीं होता है. ऐसे में उन्होंने आकाशवाणी पर प्रत्येक माह ‘मन की बात’ कार्यक्रम की शुरूआत की. ‘मन की बात’ कार्यक्रम के जो तथ्य और आँकड़ें को समझने की कोशिश की गई तो इसके लिए बकायदा एक रणनीति के तहत देशभर के अनाम से गाँव और ग्रामीणों को ‘मन की बात’ कार्यक्रम के लिए जोड़ा गया. देश का प्रधानमंत्री जब अपने कार्यक्रम में सुदूर आदिवासी गाँव की किसी महिला अथवा कोई उपलब्धि का उल्लेख करते हैं तो वह क्या, एक बड़ी आबादी उनकी मुरीद हो जाती है. लोग इस प्रयास में लग जाते हैं कि अगली बार ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री उनकी या उनके गाँव की कामयाबी का उल्लेख करें. आँकड़ों को जाँचें तो पता चलेगा कि घाटे में जा रहे आकाशवाणी की आय में बेशुमार वृद्धि हुई है. मोदीजी की तर्ज पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह और शिवराजसिंह ने भी रेडियो को माध्यम बनाया था लेकिन उन्हें वह सफलता नहीं मिली, जो मोदीजी के कार्यक्रम को मिल रही है. यही नहीं, ‘मन की बात’ कार्यक्रम की निरंतरता भी अपने आप में मिसाल कायम करती है. मोदीजी के पहले महात्मा गाँधी और इंदिरा गाँधी ने रेडियो के महत्व को समझा था लेकिन ‘मन की बात’ कार्यक्रम की तरह वे ऐसा कोई कार्यक्रम शुरू नहीं कर पाए थे.
        11 साल के मोदी सरकार के कार्यकाल की समीक्षा की जाए तो सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि समूचे भारतीय समाज की सोच और उनकी कार्यवाही को डिजीलाइटेशन कर दिया. अब हर सौदा-सुलह ऑनलाइन होगा. सरकारी दफ्तरों सेे कार्य के लिए भटकने की जरूरत नहीं है क्योंकि एक क्लिक पर आपका काम हो जाता है. इससे रिश्तवखोरी पर नियंत्रण पाया जा सका है. जन्म प्रमाण पत्र बनाने से लेकर पासपोर्ट बनाने तक के लिए अब दफ्तरों के चक्कर काटने की जरूरत नहीं है. मोदीजी बतौर प्रधानमंत्री सोशल मीडिया की ताकत भी जानते हैं सो वह अपनी बात एक्स से लेकर रील्स और इंटस्टा तक लेकर जाते हैं. यह पूरी कवायद करने के लिए उनकी टीम है लेकिन इसका मॉडल ऐसा बना हुआ है कि हर आम आदमी को महसूस होता है कि मोदीजी सीधे उनसे रूबरू हो रहे हैं. यही मोदीजी की ताकत बनती है और यही उनकी लोकप्रियता का कारण भी है.
        भारतीय राजनीतिक इतिहास में गैर-कांग्रेसी दल से तीसरी बार केन्द्र में सत्तासीन होने वाले मोदी हैं. मोदीजी का सबसे प्रबल पक्ष है कम्युनिकेशन का. कम्युनिकेशन की थ्योरी कहती है कि वही कामयाब कम्युनिकेटर है जो लोगों तक अपनी बात प्रभावी ढंग से पहुँचा सके. इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस दौर के सबसे बड़े संचारक के रूप में स्वयं को स्थापित किया है. वे जनसभा में लोगों को मोहित कर लेते हैं. आम आदमी से सीधे संवाद से मोदी सरकार के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ता है. मोदी जी कई बार जानते हुए भी ऐसे बयान देते हैं कि विरोधी उनकी आलोचना पर उतर आते हैं. मोदीजी आम आदमी के सायक्लोलॉजी को भी बेहतर ढंग से समझते हैं. अनेक बार स्थिति-परिस्थितियों के चलते आम आदमी निराशा में डूब जाता है तब यह देश के मुखिया की जवाबदारी होती है कि कैसे उसे उबारे और उसमें उत्साह का संचार करे. भारत ही नहीं, समूचे वैश्विक परिदृश्य में देखें तो महँगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दे मुंहबाये खड़े हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नौकरी करना नहीं, नौकरी देना सीखो के मंत्र के साथ नवउद्यमी बनाने के लिए स्र्टाटअप के लिए प्रोत्साहित किया. डेढ़ सौ करोड़ की आबादी को कम लागत वाले काम करने के लिए प्रोत्साहित किया. तब उनकी आलोचना इस बात को लेकर हुई कि भारत का युवा अब पकौड़े तलेगा लेकिन आलोचना करने वालों का तब मुँह बंद हो गया जब एक पानीपुरी बेचने वाले को आइटी ने पकड़ा तो वह करोड़पति निकला. मोदीजी आईटी से जुडऩे के लिए भारतीय युवाओं को प्रोत्साहित करते रहे हैं. एआई और चैटजीपीटी आने के बाद रोजगार के अवसर घट रहे हैं लेकिन एआई और चैटजीपीटी सीख लेते हैं तो रोजगार के नए विकल्प आपका इंतजार कर रहा है.
        निश्वित रूप से 11 वर्ष के कार्यकाल में सबकुछ भला-भला हुआ हो, यह तय नहीं है. एक मनुष्य के नाते अनेक अच्छी पहल हुई तो कुछ गलतियाँ भी हुई होंगी. वे क्या, पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री भी इसी श्रेणी में आते हैं. कई बार उनकी पार्टी के नेताओं के कदाचार पर उनसे प्रतिक्रिया माँगी जाती है तो यह बेमानी लगता है क्योंकि इस पर बोलने और कार्यवाही करने की जवाबदारी पार्टी की है ना कि प्रधानमंत्री की हैसियत से सरकार की. वे भारतीय और भारतीयता के लिए लोगों में जज्बा पैदा करते हैं और सनातन युग की ओर वापसी का संकेत देते हैं. डिग्री वाली शिक्षा से बाहर लाकर स्किलबेस्ड शिक्षा भारत को गुरुकुल की ओर ले जाता है. मानना चाहें तो मोदीजी का कार्यकाल आपको देशहित में लग सकता है और न मानना चाहें तो खामियाँ गिनाते रहिए.
        अपनी लम्बी राजनीतिक पारी और केन्द्र में 11 वर्ष के अपने कार्यकाल में मोदीजी युवा नेता नहीं रहे लेकिन वे एक जिम्मेदार बुर्जुग की भूमिका में आ गए हैं. यकिन ना हो तो अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की पत्नी उषा वेंस के अनुभव और उनकी बातों से समझ लें. इसी साल बीते अप्रैल में भारत दौरे को उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का परिवार आया था. वेंस की पत्नी ने यह भी कहा कि उनके तीन छोटे बच्चों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में उनके दादाजी की झलक दिखी. उन्होंने पीएम मोदी से मिलते ही उन्हें दादा जी माना लिया और वे उनसे लडिय़ाते रहे. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के साथ उषा वेंस और उनके तीन छोटे बच्चे इवान, विवेक और मीराबेल भी थे. दादा जी बन जाने की यह छवि भारतीय मन को जोड़ता है. यही भारत है, यही श्रेष्ठ है.(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

मंगलवार, 13 मई 2025

क्यों जरूरी है हर विषयों पर लिखना... ##

मनोज कुमार

एक दौर था जब जवानी इश्क में डूबी होती थी लेकिन एक यह दौर है जहाँ जवानी लेखन में डूबी हुई है. विषय की समझ हो या ना हो, लिखने का सऊर हो या ना हो लेकिन लिखना है, वह भी बिना तथ्य और तर्क के. ऐसे लेखकों की बड़ी फौज तैयार हो गई है जिसे हर विषय पर लिखना शगल हो गया है. जिन्हेंं अपने शहर के बारे में नहीं मालूम, जिन्होंने कभी इतिहास के पन्ने नहीं पलटे, वे सारे के सारे विषय विशेषज्ञ हो गए हैं. उन्हें शायद बात का भी भान नहीं है कि वे ऐसा करके अपना और अपने देश भारत वर्ष का कितना नुकसान कर रहे हैं. हालिया भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय कलमवीरों ने सारी हदें पार कर लिखना शुरू कर दिया. अखबारों के सम्पादकों की समझ बड़ी है तो उन्हें पता था कि अखबारों में जगह नहीं मिलेगी सो सोशल मीडिया पर टूट पड़े. आधी-अधूरी और अधकचरी जानकारी लेकर सौ-पचास शब्दों की टिप्पणी करने लगे. ऐसा लिखने वाले कुपढ़ लोगों को इस बात का भी भान नहीं था कि इससे देश और समाज को कितना नुकसान होगा लेकिन विशेषज्ञता झाडऩे के चक्कर में और सोशल मीडिया की स्वच्छंदता ने इन्हें बेलाग बना दिया था.

हैरानी ही नहीं, खतरनाक बात है कि जिन विषयों, खासकर रक्षा जैसे विषयों पर क्या जरूरत है लिखने की? क्यों हम बेताब हो रहे हैं लिखने के लिए. जबकि इन्हें यह भी नहीं मालूम की दो देशों के मध्य युद्ध की स्थिति कब बनती है? सेना की रणनीति कभी उजागर नहीं होती है और ना ही सरकार किस नीति पर कार्य योजना तैयार कर रही है, यह आम आदमी को पता ही नहीं होता है. इधर और उधर के खेल में मनचाहे ढंग से लिखा जा रहा है, बोला जा रहा है. यह सब बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है. बार बार यह चेताये जाने के बाद कि केन्द्र सरकार द्वारा जारी अधिकृत जानकारी पर ही भरोसा करें लेकिन ये हैं कि मानते ही नहीं. अच्छा होता कि ये सारे लोग स्वयं पर नियंत्रण रखते और सेना और सरकार को उनका कार्य करने देते लेकिन ऐसा नहीं किया गया. युद्ध भूमि में ही जाना देशभक्ति नहीं है बल्कि समाज में शांति और शुचिता बनाये रखने में भी अपना योगदान देकर देशभक्ति की जा सकती है. इन लोगोंंं के कारण सरकार पर अतिरिक्त दबाव है. समाज की शांति ना बिगड़े इसके लिए एक बड़ा अमला सोशल मीडिया की निगरानी के लिए तैनात करना पड़ा है. सोशल मीडिया पर नजर रखी जा रही है कि कोई भी ऐसी पोस्ट करने वालों के खिलाफ कार्यवाही की जाए. यदि ये लोग स्वयं को नियंत्रित कर लेते तो सरकार पर अनावश्यक ना दबाव होता और ना ही इस निगरानी पर अतिरिक्त बजट खर्च करना पड़ता. यह गैर जिम्मेदारी लेखन भी एक तरह का अपराध है.

अभिव्यक्ति की आजादी है लेकिन ऐसे मुद्दों पर खामोश रहना ही बेहतर होता. बल्कि यह भी होना चाहिए था कि ऐसा कोई कर रहा है, सोच रहा है तो उसे रोकने का प्रयास किया जाना चाहिए. जब सत्ता पक्ष और विपक्ष देश की सुरक्षा के लिए, सम्मान के लिए साथ हैं तो आपको क्या चूल मची है कि लिखते जाओ. मीडिया की भूमिका के बारे में कुछ कहना बेकार ही अपना ऊर्जा खर्च करना होगा. जिस तरह से मनगढंत खबरें दिखायी जा रही थीं, उससे आम आदमी के मन में धारणा गलत बन रही थी. आखिरकार सेना और सरकार की चेतावनी के बाद कुछ सम्हले लेकिन कब सम्हले रहेंगे, यह कहना मुश्किल है. टीआरपी की होड़ ने इन्हें भी बेलगाम कर दिया था. 

बिना समझे-बूझे और विषय की जानकारी के बिना गैर-जिम्मेदारी से लिखने की यह बीमारी समाज ने कोविड के दरम्यान भी देखा है. चंूकि उस समय हर व्यक्ति इस बात से भयभीत था कि जाने कब कोविड उन्हें घेर ले तो वह कभी कभी चुप्पी साध लेता था लेकिन तब भी वह गैरजिम्मेदारी लेखन से बाज नहीं आया. डॉक्टर और पुलिस के साथ जिम्मेदार मीडिया हर पल की खबर दे रहा था लेकिन कोविड के इंजेक्शन और दवाईयों को लेकर बेखौफ लिखा जा रहा था. कोविड ने कितनों को मौत की नींद सुला दिया और कितनों को श्माशान में जगह मयस्सर नहीं हुई, इस पर घर बैठे खबर लिखने वालों की कमी नहीं थी. यह गैर जिम्मेदाराना लेखन हर बार देखा जाता है. चूंकि सोशल मीडिया पर किसी का नियंत्रण नहीं है तो ऐसे कृत्य करने वालों की भरमार हो जाती है. एक किसी साहब ने सोशल मीडिया पर लिखा कि युद्ध में जाने के लिए कौन-कौन तैयार हैं लेकिन इन साहब ने यह बताने की जरूरत नहीं समझी कि वे अब तक घर पर क्यों हैं? क्यों उन्होंने रणभूमि में जाना स्वीकार नहीं किया. मध्यप्रदेश के ट्रक संचालकों ने सरकार से अनुरोध किया कि ऐसे वक्त में उनकी जरूरत है तो वे तैयार हैं. इस पर एक बुद्धिजीवि ने लिखा कि हम हैं तैयार. यह समझना मुश्किल था कि वे ट्रक संचालकों का हौसला बढ़ा रहे हैं या स्वयं ट्रक लेकर सेना की मदद के लिए जाने की बात कर रहे हैं. अफसोस कि ऐसे लोगों की संख्या बेशुमार है.

अभिव्यक्ति की आजादी है तो आप सम-सामयिक मुद्दों पर लिखिए. स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, किसान, महिलाएं, अपराध जैसे हजारों विषय है, इस पर लिखिए. कुछ गलत भी लिख दिया तो बहुत कुछ बिगड़ेगा नहीं लेकिन आपकी बुद्धि का खुलासा हो जाएगा. दरअसल ये जो तथाकथित लेखक हैं वे तर्क के साथ, तथ्यों के साथ नहीं लिख रहे हैं बल्कि उनका हथियार कुर्तक है. इनमें से ज्यादत को तो यह भी नहीं मालूम होगा कि 2025 के पहले युद्ध कब हुआ था? क्यों हुआ था और उसका परिणाम क्या निकला? इस बात पर भी बहस चल पड़ी है कि कौन सा शासक वजनदार था. इस सवाल को उठाने के पहले वे यह भूल जाते हैं कि समय और स्थिति के अनुरूप निर्णय लेना होता है. हाँ, इस बात से इंकार नहीं कि उस दौर का फैसला आज के लिए मिसाल है तो इस दौर के फैसले के परिणाम की प्रतीक्षा तो कीजिए. लेकिन हमारे पास संयम नहीं है. हम बेताब होकर जल्दबाजी में हर फैसला सुना देना चाहते हैं. ऐसा सवाल करने वाले और मिसाल देने वाले तथा गैरजिम्मेदाराना टिप्पणी करने वालों में कोई फर्क नहीं. बेहतर होगा कि हम सब एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका का निर्वाह करें. देश और समाज को मजबूत बनायें और सरकार को बेवजह मुसीबत में ना डालें. हम सब यह कर लेते हैं तो यह भी देशभक्ति की जीवंत मिसाल होगी.

गुरुवार, 1 मई 2025

## 26 साल का इंतजार और मेहनतकशों के हक में मोहन सरकार

 26 साल का इंतजार और मेहनतकशों के हक में मोहन सरकार

मनोज कुमार

कैलेंडर में दर्ज तारीख के हिसाब से हर साल एक मई को दुनिया के साथ हम लोग भी मई दिवस मनाते हैं. मजदूरों के हक-हूकुक की बातें करते हैं और इस दिन के साथ बिसरा देते हैं लेकिन मध्यप्रदेश मई दिवस के लिए 1 मई का इंतजार नहीं करेगा बल्कि हर साल सेलिबे्रट करेगा 25 दिसम्बर को. मोहन सरकार के एक फैसले ने ना केवल मई दिवस की तारीख का अर्थ ही बदल दिया बल्कि हजारों मजदूरों की आँखों से आँसू पोंछ लिए. हजारों मजदूर, 224 करोड़ रुपये और 26 सालों का लम्बा इंतजार. इन सालों में 26 बार मई दिवस आता-जाता रहा लेकिन आने-जाने वाली सरकारों के लिए यह एक आम मुद्दा था. न्याय के लिए बरसों से इंतजार करते करते अनेक मजदूरों की जीवनलीला खत्म हो गई. परिवार तंगहाली और बदहाली में जीता रहा. यहां-वहां से लेकर अदालत के दरवाजे तक इन मजदूरों ने गुहार लगायी लेकिन मामला सिफर रहा. सब कुछ हो रहा था लेकिन नहीं हुआ तो मजदूरों के हक में फैसला. करीब-करीब डेढ़ वर्ष पहले मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री का परिवर्तन होता है और शिवराजसिंह चौहान के स्थान पर डॉ. मोहन यादव नए मुख्यमंत्री बनते हैं. कभी शिवराजसिंह चौहान मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री का प्रभार सम्हालने वाले डॉ. यादव से भी कोई बड़ी उम्मीद सालों से अपनी मजदूरी पाने के लिए लड़ते मजदूरों को नहीं थी. लेकिन समय का लेखा कौन जानता है. मुुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अचानक से फैसला लिया और 26 सालों से अटकी उनकी मजदूरी का फैसला चंद मिनटों में कर दिया. डॉ. यादव के इस फैसले ने मोहन सरकार के प्रति लोगों में विश्वास का भाग जगा दिया. इसी के साथ 25 दिसम्बर, 2023 एक अमिट तारीख के रूप में मध्यप्रदेश के कैलेंडर में दर्ज हो गया है. मामला मालवा की कभी शान और इंदौर की पहचान रही हुकमचंद कपड़ा मिल के बंद हो जाने के बाद बेकार और बेबस हुए मजदूरों का है. साल-दर-साल गुजरता रहा और सब कुछ स्याह अंधेरे में कैद रहा. अदालत ने आदेश दिया कि हुकमचंद कपड़ा मिल के मालिकाना हक की जमीन को बेच कर मजदूरों की मजदूरी का भुगतान किया जाए. अनेक कोशिशों के बाद भी जमीन कौड़ी के मोल पड़ी रही. कोई खरीददार सामने नहीं आया और ना ही पूर्ववर्ती सरकारों ने कोई ठोस फैसला लिया. निराशा में डूबते-उतरते हजारों मजदूरों को लग रहा था कि अब उन्हें न्याय नहीं मिलने वाला लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मोहन सरकार ने फैसला लिया और चंद मिनटों में सभी मजदूरों को उनका बकाया मजदूरी, ग्रेज्युटी और दीगर भुगतान देेने का रास्ता साफ कर दिया.

मोहन सरकार का यह फैसला चौंकाने वाला था लेकिन था जनहित का फैसला. मालवा की तासीर ही कुछ अलग किस्म की है और उज्जैन से आने वाले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की तासीर भी मालवा की तरह ही है. वे स्वयं एक ऐसे परिवार से आते हैैं जिन्होंने मजदूरों का दर्द देखा है सो मुख्यमंत्री की नजर से नहीं बल्कि मनुष्य की नजर से उन्होंने इस मामले को देखा. देखा और समझा तो उन्होंने पहले भी था लेकिन मामला उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं था, सो खामोश रहे लेकिन सत्ता की बागडोर सम्हालते ही किसी और के अप्रोच किए बिना ही स्वयं संज्ञान लेकर मजदूरों की झोली में खुशी का फैसला डाल दिया. मोहन सरकार के इस फैसले से जैसे मालवा और खासतौर पर इंदौर झूूम उठा. इंदौर का मस्तिष्क शान से और गर्व से भर उठा. 

26 साल पहले हुकमचंद मिल बंद हुई थी। इसके बाद से मिल के पांच हजार से ज्यादा मजदूर वेतन, ग्रेच्युटी और अन्य लेनदारियों के लिए भटक रहे हैं। कोर्ट ने मिल की जमीन बेचकर मजदूरों का भुगतान करने का आदेश दिया था। कई बार नीलामी निकालने के बावजूद जमीन नहीं बिकी। हुकमचंद कपड़ा मिल के मामले में मोहन सरकार का यह फैसला दूरदर्शी था. अदालत के आदेश के बाद भी हुकमचंद कपड़ा मिल की जमीन ना बिक पाने पर उन्होंने सरकार के हक में लेकर नगर निगम इंदौर को सौंप दिया. अब इस जमीन पर आवासीय और व्यवसायिक गतिविधियां शुरू हो रही है. मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल को यह जमीन सौंप कर जिम्मेदारी दी गई है कि आवासीय और व्यवसायिक गतिविधियां शुरू की जाए.  सरकार ने मिल की जमीन का लैंड यूज औद्योगिक से बदलकर वाणिज्यिक और आवासीय कर दिया है। मिल की कुल जमीन में से 10.768 हेक्टेयर जमीन का लैंड यूज वाणिज्यिक और 6.752 हेक्टेयर जमीन का लैंड यूज आवासीय किया गया है। 

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने निर्देश दिए कि मध्यप्रदेश में जिन अन्य मिलों की देनदारियां शेष हैं, उन मिलों के प्रकरणों का निराकरण भी हुकुमचंद मिल के मॉडल के आधार पर कर मजदूरों को राहत दी जाए. यह एक सत्ताधीश का फैसला नहीं है औ ना ही इसे राजनीतिक चश्मे से देखा जाना चाहिए। यह एक मनुष्य का मनुष्य के लिए लिया गया फैसला है जिसे मानव कल्याण के रूप में देखा और समझा जाना चाहिए. जैसा कि डॉ. मोहन यादव के निर्देश हैं कि अन्य मिलों की देनदारियों को इसे ही मॉडल मानकर निपटारा किया जाए तो यह फैसले मध्यप्रदेश का ऐतिहासिक फैसला माना जाएगा.

एक समय था जब बड़े मजदूर संगठन हुआ करते थे. मजदूरों के हक के लिए वे सडक़ों पर उतर आते थे. कई बार उनकी मांगों को मान लिया जाता था तो कई बार ठुकरा दिया जाता था. धीरे-धीरे श्रमिक संगठन विलुप्त होते गए. मजदूर खुद के हक की लड़ाई खुद ही लड़ते रहे. मई दिवस का ताप समाप्त होता रहा और शायद यही कारण है कि 26 सालों से हुकुमचंद मिल के मजदूरों को उनका हक नहीं मिल पाया था. अभी और भी ऐसे मिल शेष हैं जिनके मामले निपटाया जाना है. अब श्रमिक संगठन कागज पर हैं और वे जमीन पर होते तो शायद हुकुमचंद मिल के श्रमिकों को 26 साल का इंतजार नहीं करना होता. खैर, अब मध्यप्रदेश के मेहनतकशों को श्रमिक संगठनों की जरूरत नहीं पड़ेगी जब सरकार ही उनके हक में फैसला ले रही है. शायद 1956 में मध्यप्रदेश की स्थापना के बाद मेहनतकशों के हक में ऐसा फैसला पहली बार किसी ने लिया है तो इसके लिए मोहन सरकार के हक में जाता है. मध्यप्रदेश अब गर्व से मई दिवस सेलिबे्रट करेगा.

बुधवार, 30 अप्रैल 2025

‘अक्षय’ संकल्प लें बाल विवाह के खिलाफ#

 ‘अक्षय’ संकल्प लें बाल विवाह के खिलाफ

मनोज कुमार

समय बदल रहा है लेकिन हमारी सोच आज भी वही पुरातन है. आधुनिक बनने का भले ही ढोंग करें लेकिन भीतर से हम रूढि़वादी हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो भारतीय समाज से बाल विवाह जैसी कुप्रथा कब की खत्म हो चुकी होती लेकिन ऐसा नहीं हुआ है. अनेक प्रयासों के बाद भी हर वर्ष बड़ी संख्या में बाल विवाह की खबरें हमें डराती हैं. सरकारों के प्रयासों से बाल विवाह में कुछ कमी आयी है लेकिन जरूरी है कि इस बार हम अक्षय तृतीया पर ‘अक्षय संकल्प’ लेेें कि हर स्तर पर बाल विवाह को हत्सोसाहित करेंगे.

भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है. अक्षय का अर्थ होता है जिसका कभी क्षय ना हो और इस दिन किए गए हर कार्य शुभ माने जाते हैं. वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाये जाने के कारण इसे अक्षय तृतीया का संबोधन मिला. अक्षय तृतीया का महत्व कई कारणों से है जिसमें परशुराम का जन्म, वेदव्यास का महाभारत लेखन का आरंभ होने के साथ ही माँ अन्नपूर्णा का जन्मदिन मनाया जाता है. इसी शुभ दिन स्वर्ग से पृथ्वी पर माता गंगा अवतरित हुई थी. माता गंगा को पृथ्वी पर अवतरित कराने के लिए राजा भागीरथ में हजारों वर्ष तक तपस्या की थी. मान्यता के अनुसार अक्षय तृतीया पर गंगा में डुबकी लगाने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं.

अक्षय तृतीया के दिन बिना किसी मुर्हूत के विवाह का मंगल कार्य पूरा किया जा सकता है इसलिए इस अवसर पर भारतीय समाज में विवाह को शुभ माना गया है. कुछ रूढि़वादी सोच ने व्यस्क के स्थान पर इस दिन बाल विवाह को शुभ मानकर उन्हें विवाह के पवित्र बंधन में बांध देते हैं. यह अनुचित है. कानून भी इसकी इजाजत नहीं देता है और यह स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह खतरनाक है. विवाह की कानूनी आयु लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लडक़ों के लिए 21 वर्ष है, उन लोगों की एक बड़ी संख्या के लिए अप्रासंगिक और महत्वहीन हो जाता है जो सदियों पुरानी परंपराओं और हठधर्मिता के कारण अंधे और भटके हुए हैं, जिन्हें वे अनुष्ठान कहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी बाल विवाह जैसी कुप्रथा पर टिप्पणी की थी. उनका कहना था कि देश में हजारों नाबालिग लड़कियों की शादी कर दी जाती है और उनके स्वास्थ्य, गर्भ धारण करने की क्षमता तथा इसके प्रतिकूल, आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रभावों की परवाह नहीं करते हुए उनसे शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं. निश्चित रूप से यह भारत जैसे विकसित देश के लिए एक धब्बा था जिसे केन्द्र और राज्य सरकार के प्रयासों से दूर किया जा सका है.

समय के साथ स्थितियों में परिवर्तन आने लगा है. बाल विवाह पर नियंत्रण पाने के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार ने ना केवल कानून सख्त किया बल्कि बच्चों, खासतौर पर बेटियों के हक में अनेक योजनाएं आरंभ की है. इसका परिणाम यह हुआ है कि समाज में बाल विवाह की कुप्रथा पर ना केवल रोक  लगी है बल्कि समाज का मन भी बदलने लगा है. सामाजिक रूढिय़ों के चलते उनका बचपन में ब्याह कर दिया जाता था. लेकिन पीछे कुछ वर्षों के आंकड़ें इस बात के लिए आश्वस्त कराते हैं कि समाज का मन बदलने लगा है.

तकरीबन डेढ बरस पहले मध्यप्रदेश में लिंगानुपात की जो हालत थी, उसमें सुधार आने लगा है. एक दशक पहले एक हजार की तादात पर 932 का रेसियो था लेकिन गिरते गिरते स्थिति बिगड़ गई थी. हाल ही में जारी आंकड़े इस बात की आश्वस्ति देते हैं कि हालात सुधरे भले ना हो लेकिन सुधार के रास्ते पर है. आज की तारीख में 1000 पर 930 का आंकड़ा बताया गया है. एक तरह से झुलसा देने वाली स्थितियों में कतिपय पानी के ठंडे छींटे पड़ रहे हैं. लगातार प्रयासों का सुपरिणाम है कि उनकी बेटियां मुस्कराती रहें और कामयाबी के आसमां को छुये लेकिन इसके लिए जरूरी होता है समाज का साथ और जो स्थितियां बदल रही है, वह समाज का मन भी बदल रही है.

यह कहना भी फिजूल की बात होगी कि पूर्ववर्ती सराकरों ने बिटिया बचाने पर ध्यान नहीं दिया लेकिन यह कहना भी अनुचित होगा कि सारी कामयाब कोशिशें इसी दौर में हो रही है. इन दोनों के बीच फकत अंतर यह है कि पूर्ववर्ती सरकारों की योजनाओं की जमीन कहीं कच्ची रह गयी थी तो वर्तमान सरकार ने इसे ठोस बना दिया. जिनके लिए योजनायें गढ़ी गई, लाभ उन तक पहुंचता रहा और योजनाओंं का प्रतिफल दिखने लगा. महिला एवं बाल विकास विभाग का गठन बच्चों और महिलाओं के हक के लिए बनाया गया था. इस विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह नयी योजनओं का निर्माण करें और महिलाओं को विसंगति से बचा कर उन्हें विकास के रास्ते पर सरपट दौड़ाये. योजनाएं बनी और बजट भी भारी-भरकम मिलता रहा लेकिन नीति और नियत साफ नहीं होने से कारगर परिणाम हासिल नहीं हो पाया. मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता की बागडोर सम्हालने के बाद डॉ. मोहन यादव ने बेटियों की ना केवल चिंता की बल्कि समय-समय पर उनकी खोज-खबर लेते रहे. जब मुखिया सक्रिय और सजग हो जाए तो विभाग का चौंकन्ना होना लाजिमी था. मुख्यमंत्री की निगहबानी में परिणामदायी योजनाओं का निर्माण हुआ और परिणाम के रूप में दस वर्ष में गिरते लिंगानुपात को रोकने में मदद मिली. एक मानस पहले से तैयार था कि बिटिया बोझ होती है और कतिपय सामाजिक रूढिय़ों के चलते उनका बचपन में ब्याह कर दिया जाता था. लेकिन पीछे कुछ वर्षों के आंकड़ें इस बात के लिए आश्वस्त कराते हैं कि समाज का मन बदलने लगा है.

बेटियों को रूढिय़ों से मुक्त कराने की दिशा में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं के साथ ही अनेक योजनाओं का श्रीगणेश किया गया था जिसका प्रतिफल मिला कि बाल विवाह जैसी कुरीतियों पर कुठाराघात होने लगा. प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की प्रेरणा से बीते वर्ष 2024 को ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ का शुभारंभ किया गया था. बाल विवाह मुक्त भारत अभियान देश को बाल विवाह मुक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित करेगा. यह अभियान बाल विवाह को खत्म करने और देश भर में युवा लड़कियों को सशक्त बनाने के लिए सरकार के चल रहे प्रयासों का एक प्रमाण है, जो एक प्रगतिशील और समतापूर्ण समाज सुनिश्चित करता है जहां हर बच्चे की क्षमता को पूरी तरह से साकार किया जा सके। जो विकसित भारत के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए लड़कियों और महिलाओं के बीच शिक्षा, कौशल, उद्यम और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए अनिवार्य है। उल्लेखनीय है कि बाल विवाह मुक्त भारत प्रधानमंत्री के वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के सपने से प्रेरित है। इस सपने को तब तक हासिल करना संभव नहीं है जब तक महिलाओं और लड़कियों को जीवन के सभी क्षेत्रों में पूर्ण, समान और सार्थक भागीदारी न मिले।

सनातन धर्म बहुमुखी है और वह समय के साथ अपनी सोच एवं दृष्टि में परिवर्तन करता है. अक्षय तृतीया पर अक्षय सोच के साथ समाज के सभी वर्ग मिलकर बाल विवाह जैसी कुप्रथा को समाप्त करने के लिए कृतसंकल्पित है. कानून अपना कार्य करेगा लेकिन समाज का हर वर्ग ‘अक्षय संकल्प’ ले ले कि वह इस कुप्रथा के खिलाफ खड़े हो जाएंगे

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