मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

विज्ञापन की ‘लक्ष्मण रेखा’

    

    यह सच है कि दुनिया का पहला विज्ञापन वर्तमान मध्यप्रदेश के मंदसौर (तत्कालीन दशपुर) में पाया गया था, जो कि दशपुर अभिलेख है। यह गुप्त काल में 436-455 ईस्वी के आसपास संस्कृत में लिखा गया एक शिलालेख है। इस अभिलेख में रेशम बुनकरों के एक संघ के गुजरात से दशपुर आने और एक सूर्य मंदिर के निर्माण का वर्णन है, जिसे दुनिया के सबसे पुराने विज्ञापनों में से एक माना जाता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि देश का ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश के खातेे में दुनिया का पहला विज्ञापन करना भी है. समय के साथ विज्ञापन के तेवर और तासीर बदलता गया. हम यह मान सकते हैं कि विज्ञापन का मूल ध्येय समाज को सूचित करना होता है जैसा कि गुप्त काल में 436-455 निर्मित विज्ञापन के संदर्भ में भी उल्लेखित है कि इसका मुख्य उद्देश्य रेशम बुनकरों के संघ की उपलब्धि (एक सूर्य मंदिर का निर्माण) का प्रचार करना था। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि विज्ञापन का प्रथम गुण समाज को सूचित करना है. जिस गुप्तकाल के विज्ञापन की चर्चा हम कर रहे हैं और जिस काल में हम हैं, संचार साधनों की व्यापकता हो चुकी है. विज्ञापनों के इर्द-गिर्द हर पल-छिन कैद हो चुका है. आँख खुलने के साथ, बिस्तर में जाते तक विज्ञापन हमें बताता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है.

विज्ञापन का मनोविज्ञान यह भी कहता है कि एक ही उत्पाद को हर तरह से ऐसे प्रचारित करो कि उपभोक्ता उसे क्रय करने अथवा उपयोग करने के लिए विवश हो जाए. इसे अंग्रेजी में हैमरिंग भी कहते हैं अर्थात दिमाग में बार-बार जोर डालना. विज्ञापन तो कोई भी हो सकता है लेकिन विज्ञापन का निर्माण कैसे किया जाए? यहाँ विज्ञापन निर्माण कौशल की चुनौती होती है और इसमें सबसे जरूरी होता है कि विज्ञापन के लिए संवाद कैसे लिखें जाएं. इस संदर्भ में हाल ही में हमसे बिछुड़े पीयूष पांडे एक मानक गढ़ गए हैं. विज्ञापन लोगों के दिलों तक कैसे उतरे? पीयूष ने रोजमर्रा की जिंदगी से शब्द उठाये और उसे गढ़ा. जैसे चल मेरी लूना, क्या स्वाद है जिंदगी में, मिले सुर मेरा तुम्हारा, अबकी बार मोदी सरकार, दो बूंद जिंदगी की, एमपी गजब है, ठंडा मतलब कोका-कोला, बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर, हमारा बजाज, हर घर कुछ कहता है। विज्ञापनों मेंं उल्लेखित ये शब्द वो हैं जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में उपयोग में आते हैं और जब ये शब्द विज्ञापन के रूप में रेडियो, टेलीविजन और अखबारों के पन्ने पर उतरे तो लगा कि हमारी बात हो रही है. मन को मथने वाले शब्द ही बेजान वस्तुओं को भी जानदार बना देते हैं. यह कमाल पीयूष पांडे ने किया और वे सबको याद आए. याद करना होगा कि ‘वाशिंग पावडर निरमा’ भी ऐसा ही विज्ञापन है जो दशकों से लोग गुनगुना रहे हैं. 

विज्ञापन के व्यवसायिक पक्ष के साथ उसके सामाजिक और नैतिक मूल्यों की बात करते हैं तो केनवास बड़ा हो जाता है. यूँ तो विज्ञापन का बेसिक कांसेप्ट उत्पाद का अधिकाधिक विक्रय करना होता है लेकिन सामाजिक और नैतिक मूल्य का भी ध्यान रखा जाना चाहिए. नयी पीढ़ी को स्मरण नहीं होगा कि कोई चार दशक पहले मॉडल मधु सप्रे ने नंगे बदन सांप लपेटकर विज्ञापन किया था जिसकी भत्र्सना हुई. ऐसे और भी कई विज्ञापन हैं जिसे समाज ने नकार दिया. यह भारतीय समाज है और यहाँ वाशिंग पावडर निरमा या हमारा बजाज जैसा संवाद ही सफल हो पाता है. हमारे घरों में चींटियों से बचाव के लिए ‘लक्ष्मण रेखा’ का उपयोग किया जाता है. हम सबको पता है कि माँ सीता की सुरक्षा के लिए लक्ष्मण ने जो रेखा बाँधी थी जिसे ‘लक्ष्मण रेखा’ कहा गया. इस पंक्ति को उत्पादक ने खूबसूरत ढंग से उपयोग किया और सालों से बिना विवाद ‘लक्ष्मण रेखा’ का विक्रय कर रहे हैं.     

    तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की टीम ने कुछ ऐसे राजनीतिक विज्ञापन जारी किए जिसे आम मतदाता समझ ही नहीं पाया लेकिन 2014 में अबकी बार मोदी सरकार या चाय पर चर्चा सफलता का पैमाना बनी. कम्पनियाँ बारीकी से उपभोक्ता के व्यवहार को जाँचती है. कहा जाता है कि टूथपेस्ट की बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनी ने पेस्ट का मुँह अपेक्षाकृत बड़ा कर दिया जिससे जो पेस्ट एक माह चलता था, उसकी खपत बढ़ गयी. अन्य उत्पादों में समय-समय पर यह तकनीक अपनाया जाता है. 

 बावजूद इसके यह भारतीय समाज है जो कितना भी आधुनिक हो जाए, वह अपनी जमीन नहीं छोड़ता है. रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का यह अंक पीयूष पांडे को समर्पित है और उनके बहाने हम विज्ञापन के समाज का आकलन कर रहे हैं. विज्ञापन की दुनिया में जाने के लिए नयी पीढ़ी के पास बेशुमार अवसर है. और वह पीयूष पांडे के शब्द संयोजन को सीख ले तो आसमां और ऊँचा हो जाता है. विज्ञापन से सिर्फ उत्पाद नहीं बेचे जो बल्कि दिल का रिश्ता बनता है.

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

#बहने से बिसराने तक की ‘गैस गाथा’














छायाचित्र वरिष्ठ छायाकार श्री प्रकाश हतवलने की फेसबुक वॉल से साभार

प्रो. मनोज कुमार

चालीस बरस पहले भोपाल की में ‘हवा में जहर’ घुल गया था. यह जहरीली हवा  जिंदा बस्तियों में बहने लगी. इस जहरीली गैस को नाम दिया गया ‘मिक’ यानि मिथाइल आइसोसाइनेट और इसे गर्भाधारण किया था अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड ने. आँख, गला के जरिए शरीर के हर अंग में यह जहरीली हवा घुल गई. रात के घुप्प अँधेरे में घुली जहरीली गैस ने जैसे पूरी जिंदगी को जहरीला बना दिया. 2-3 दिसंबर की वह दरम्यानी भयावह रात जब एक-दूसरे को कुछ सूझ नहीं रहा था. आँखों के सामने अँधेरा, धडक़न रूक रही थी.  जाड़े के दिनों में बिस्तरों में लुके-छिपे लोगों में अचानक बला की जान आ गई. एक शोर उठा पीछे से. भागो, जान बचाओ. गैस रिस गई है. जानलेवा गैस. पलक झपकते ही सैकड़ों लोग भागने लगे. एक-दूसरे पर गिरते-पड़ते जान बचाने के लिए दौड़ पड़े. अपनी अपनी धडक़न बचाने की जद्दोजहद में रिश्ते बेमानी हो गए. कोई पिता को छोडक़र भाग रहा था तो कोई बच्चे को. माँ को खबर नहीं, बहू पीछे छूट गई. बचपन में हमनिवाला भाई-बहिन एक-दूसरे का हाथ छुड़ाकर खुद की जान बचाने में जुट गए थे. यह खौफनाक मंजर था उस रात की.   

हवा में बहती जहरीली गैस के खिलाफ पुराने भोपाल ने दौड़ लगा दी थी. कोई जयप्रकाश नगर से भाग रहा था तो किसी की टोली टीलाजमालपुरा से थी. आसपास के सारे मोहल्लेदार हवा में जहरीली गैस के विपरीत दिशा में भाग रहे थे. जिसे जो साधन मिला, उसी के हो गए. कौन छूटा और कौन साथ चल पड़ा, यह पलटकर देखने की फुर्सत किसी को नहीं थी. खाँसते, आँखें मलते लोगों से सीहोर-रायसेन जाने वाली सडक़ बेतरतीब भीड़ से भर गई. यह शिकायत बेनामी होगी कि कोई किसी का नहीं रहा. सच तो यह है कि वह वक्त किसी का नहीं था. जो भाग सके, भाग गए, जो जान बचा सके, वो बचा ले गए. पीछे मौत का मंजर था. लाशों का अंबार था. दिल दहलाने देने वाला मंजर. आँखों का पानी तो कब का सूख चुका था. आँसू आए भी तो कैसे? कहा गया कि यह दुनिया की भीषणतम औद्योगिक दुर्घटना थी. इसके पहले शायद ही दुनिया में कहीं इस तरह मौत का मातम मनाया गया हो.

यह भोपाल की खासियत है कि दिन बेहतर है तो रोज झगड़ेंगे लेकिन विपदा है तो मदद के लिए हजारों हाथ बढ़ जाएंगे. उस दिन भी वही हुआ. पुराना भोपाल और उसके वाशिंदे जार-जार रो रहे थे. उनके आँसू पोंछने के लिए भोपाल के हर कोने से हजारों हाथ मदद के लिए उठ खड़े हुए. जिन्हें बचा सकते थे, बचा लिए. हस्पताल लाशों और बीमारों से पट गया था. जहाँ-तहाँ पड़े हुए थे. आज चालीस साल बाद भी उस मनहूस रात को याद कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. बहने से बिसराने तक की गैस गाथा में कई अहम पड़ाव हैं. थोड़ा पीछे पलटकर देखें तो लगेगा कि ‘गैस गाथा’ आगे पाठ, पीछे सपाट वाली कथा बनकर रह गई है. जिन इलाकों में गैस रिसी थी, वे बेबस थे, मजबूर थे. यूका के खिलाफ आवाज उठाना तो क्या अपनी मदद के लिए भी आवाज नहीं उठा पा रहे थे. दिसंबर की तारीख आगे बढऩे लगी. दर्द बेइंतहा था लेकिन इलाज मामूली. मरने वाले मर रहे थे, कुछ वहीं पर तो कुछ तिल-तिल कर लेकिन भोपाल की छाती को छलनी करने वाली यूका वैसे ही बेशर्म की तरह मुस्कराता हुआ खड़ा था. हादसा बेबसी का ना होता और कोई दुर्घटना किसी आमफहम शहर में होती तो यूका की बिल्डिंग और इतराते गेस्टहाऊस को जमींदोज कर दिया जाता, जैसा गुस्साई भीड़ अक्सर कर दिया करती है. सत्ता के गठजोड़ ने यूका को बचा लिया. 

खैर, इसके बाद शुरू हुआ ‘राहत की गैस गाथा’. अंतरिम राहत के नाम पर छोटी-मोटी राशि लोगों को मरहम लगाने के नाम पर मिलने लगी. ‘गैस गाथा’ में प्रेमचंद की कहानी कफऩ अपने आपको दोहरा रहा था. ‘गैस गाथा’ में कफनचोरों की निकल पड़ी. बड़ी संख्या में बेनामी लोग खुद को कागज में गैस पीडि़त बताकर मुआवजा माँगने लगे. यहां भी ‘राहत की गैस गाथा’ में वही हुआ, जो होता आया है. पहले-पहल तो अपने अपने वोट बैंक पक्का करने के लिए बड़े राजनेता वहाँ पहुँच कर श्रद्धांजलि अर्पित करते थे. शोकसभा का आयोजन होता था और आहिस्ता आहिस्ता ‘राहत की गैस गाथा’ अब मुआवजे तक सिमट गया. इस ‘गैस गाथा’ में कई संवेदनशील और मानवीय प्रसंग भी सुनने और देखने को मिला. उस समय का एक कड़ुआ सच यह भी था कि गैस रिसी पुराने भोपाल में और अफवाह पहुँची भोपाल के कोने-कोने में. इसके बाद डर और जिंदगी बचाने की जद्दोजहद ने पूरा मंजर ही बदल दिया. उस समय के चश्मदीद बताते हैं कि इस अफवाह का शिकार एक नवविवाहित दंपति भी हुआ. पति बाथरूम में था और पत्नी उसका इंतजार में बैठी थी तभी ‘गैस गाथा’ के साथ पहुँची भीड़ ने उस नवविवाहिता को कहा कि अपनी जान बचाओ. वह कहने लगी, मेरे पति को आने दें लेकिन भीड़ ने नहीं सुना और उसे अपने साथ ले गई. कोई घंटा भर ना बीता होगा, अफवाह की धुँध छटी और वह वापस घर पहुँची. ‘गैस गाथा’ ने इस परिवार की खुशी को भी निगल लिया. आहत पति ने फरमान सुना दिया कि-जब वह चंद मिनट उसकी प्रतीक्षा नहीं कर सकती तो जीवन का साथ कैसे चलेगा. स्वाभाविक रूप से ‘गैस गाथा’ की अफवाह ने जिंदगी शुरू होने से पहले ही उसे मार दिया. ऐसे अनेक प्रसंग उस दरम्यान गुजरे. 

‘गैस गाथा’ का सबसे अहम किरदार मेरी रिपोर्टिंग में सुनील राजपूत मिला. उसने बताया था कि इस हादसे में उसके परिवार के 11 जनों की मौत हुई थी. एक छोटे भाई और एक छोटी बहन के साथ वह बच गया था. ‘गैस गाथा’ के वक्त सुनील कोई नौ बरस का था. वह अमेरिका तक गवाही देने गया. पूरे परिवार की अंतरिम राहत के रूप में लाखों रुपये मिले. भोपाल से अमेरिका पहुँचते-पहुँचते तक 9 बरस का सुनील सयाना हो गया था. पैसों की चकाचौंध ने उसका बचपन छीन लिया था. वह चालाक हो गया था. साल-दर-साल उसका लालच बढ़ता गया. लालच में उसने अपनी छोटे भाई-बहिन को जलाने की कोशिश की. वह गलत सोहबत में भी पड़ गया था. हालाँकि समय गुजरने के साथ वह बदलने लगा. अपने छोटे-भाई बहिन को खुशहाल जिंदगी देने की कोशिश की. इस सब में वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठा था. ‘गैस गाथा’  में सेवा कर रही संस्था ने सुनील की सुध ली और एक दिन वह भी दुनिया को अलविदा कह गया. ऐसे अनेक प्रसंग है जो ‘गैस गाथा’ को और भी संवेदनशील बना देते हैं. ‘राहत की गैस गाथा’ का एक दुखद पहलू यह भी रहा कि अनेक लोग बेकार और बेकाम हो गए. साथ में बाजार की रंगत भी बदलने लगी. राहत राशि से सौदा-सुलह बढ़ गया. 

इन सबके बीच ‘गैस गाथा’ का चालीसवां भी होने को आ गया. इन चालीस सालों में यक्ष प्रश्र की तरह यूका का कचरा पड़ा रहा.  जहरीली गैस बहने से लेकर बिसराने तक विवादों का लंबा सिलसिला चल पड़ा. ‘गैस गाथा’ का यह डरावना पक्ष था कि जितनी तबाही जहरीली हवा ने की थी, उससे कहीं अधिक तबाही का डर इस जहरीले कचरे से था. सरकार, जनता और अदालत से होता हुआ ‘गैस गाथा’ को बिसराने का समय आ गया था. अदालती आदेश के बाद पीथमपुर में जहरीले कचरे कें निपटान के लिए सहमति बनी. इसे लेकर अनेक तरह की आशंकाएँ व्यक्त की गईं लेकिन परीक्षण और जाँच के बाद सर्तकता के साथ बिसरा दिया गया. ‘गैस गाथा’ का यह अहम पड़ाव था. कल तक भोपाल भयभीत था, अब पीथमपुर में ‘जहर का डर’ समा गया था. ‘गैस गाथा’ का चालीसवां होने के साथ फौरीतौर पर ‘एंड’ मान लिया जाए लेकिन ‘एंडरसन गाथा’ इतिहास के काले पन्ने में दर्ज है. ‘गैस गाथा’ ने झीलों के शहर को दर्द के ऐसे सैलाब में डुबो दिया है कि चालीस क्या, चार सौ साल बाद भी जख्म दुखते रहेंगे. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

रविवार, 16 नवंबर 2025

प्रशांत किशोर कागज के फूल साबित
















प्रो. मनोज कुमार

बिहार इलेक्शन में प्रशांत किशोर कागज के फूल साबित हुए हैं. चुनाव परिणाम के पहले वे कह रहे थे कि उनकी पार्टी जनसुराज को 135 सीट मिली तो यह उनकी बड़ी हार होगी. यानि वे डेढ़ सौ से पार सीट की उम्मीद लगाये बैठे थे लेकिन परिणाम में वे शून्य पर खड़े रहे. वैसे थोड़ा उन्नीसा-बीसा मान लें तो बिहार का चुनाव परिणाम बहुत ज्यादा चौंकाने वाला नहीं है. लगभग सब पहले से तय था. यह चुनाव मैनेजेंट का परिणाम है. यादा होगा कि कभी कांग्रेस के सीनियर लीडर दिग्विजयसिंह ने कहा था कि चुनाव मैनेजमेंट से जीते जाते हैं तो कोहराम मच गया था लेकिन बीते दो दशकों में चुनाव मैनेजमेंट से ही जीते जा रहे हैं. मैनेजमेंट की परिभाषा अनेक तरह से गढ़ा जा सकता है, वह भी अपने-अपने तरीके से लेकिन निष्कर्ष यही निकलता है कि चुनाव मैनेजमेंट से जीते जाते हैं. हालाँकि इस चुनाव में कभी अपने चुनाव मैनेजमेंट के लिए ख्यात रहे प्रशांत किशोर नेपथ्य में चले गए. कभी भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत दिलाने का दावा करने वाले प्रशांत किशोर का खाता भी नहीं खुला. प्रशांत किशोर का कहना था कि मुझे बिहार की सेवा करना है।’ शायद मतदाताओं ने पहले ही उनकी मन की बात पढ़ लिया था, सो उन्हें सादगी से सेवा करने के लिए शून्य पर ला खड़ा किया.

प्रशांत किशोर की पहचान चुनावी रणनीतिकार के रूप में रही है और उन्हें कामयाबी भी मिलती रही है. उन्हें यह लगने लगा था कि जितनी मेहनत मैं दूसरे राजनीतिक दलों के लिए करता हूँ, उतनी स्वयं के लिए करूं तो मेरा अपना दबदबा होगा. शायद इसी सोच के साथ पीके ने जनसुराज पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में कूद पड़े. सारी रणनीति और मंसूबे धरे रह गए. कहां तो सिकंदर बनने निकले और कहां. ये होता है और हुआ भी. हालाँकि इसका दुष्परिणाम महागठबंधन को भी भुगतना पड़ा क्योंकि उनके हिस्से का वोट बंट गया. महागठबंधन को विपक्ष में बैठना था, बैठेंगे लेकिन स्वयं पीके अपने लिए कोई ठौर नहीं बचा पाये.

प्रशांत किशोर के बारे में मेरी धारणा यही रही है कि वे चुनावी रणनीतिकार के रूप में कामयाब हैं लेकिन राजनेता के रूप में वे फेलुअर साबित होंगे. वे ना तो असम के प्रफुल्ल कुमार मोहंता बन पाए और ना दिल्ली के अरविंद केजरीवाल. पीके का मुकाबला ना तो ममता बेनर्जी से था और ना शरद पवार से. वे उम्मीदों से उपजे नेता थे. वे विद्यार्थी आंदोलन से निकले होते तो मोहंता की तरह विजयी होते और तो और किसी जनआंदोलन से भी बने होते तो केजरीवाल होते लेकिन वे कागज की नाव पर सवार थे. अब प्रशांत किशोर का नया आरोप है कि बिहार में एनडीए ने जो दस-दस हजार रुपये महिलाओं को बांटे, वो विश्व बैंक का पैसा है और केन्द्र सरकार ने इसमें मदद की है. थोड़ी देर के लिए पीके के आरोप को मान भी लें तो क्या वे बताएंगे कि चुनाव परिणाम से पहले उनका यह आरोप सामने क्यों नहीं आया? इसे कहते हैं खिसीयानी बिल्ली खंबा नोंचे. अब तो पांच साल के लिए उन्हें बाहर ही खड़ा रहना होगा. रणनीतिकार से राजनेता बनने की उनकी मंसूबा से उनकी नई नवेली पार्टी जनसुराज की नैया तो डूबती दिख रही है. अब उनकी कंपनी की साख पर भी आंच आ सकती है. कल तो जो राजनीतिक पार्टियां उनकी कंपनी को अवसर देती थीं, वह अब शायद ना मिले.

प्रशांत किशोर के इस हाल से अनायस कुमार विश्वास का स्मरण हो जाता है कि उन्हें भी लगता था कि आम आदमी पार्टी उनके दम पर ही खड़ी हुई है. दिल्ली में सरकार बनाने में सारा दारमोदार उनके कंधों पर था. पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल को हाशिये पर रखने की भरपूर कोशिश के बाद सफल नहीं होने पर कुमार विश्वास को मंच पर कविता पढऩे लौटना पड़ा. हालांकि उनके मन में राजनेता न बन पाने का ऐसा मलाल है कि हर कविता के पहले वे अपनों ने धोखा दिया का, राग जरूर अलपाते हैं. एक बार तो उन्हें लगा कि वे राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और उनकी उम्मीद थी कि भाजपा उन्हें हाथोंहाथ लेगी. लेकिन वहां भी उन्हें निराशा मिली. ना आप ने राज्यसभा भेजा और ना भाजपा ने अपने खेमे में बुलाया. दरअसल राजनीति के मैदान में उतरना आसान है लेकिन स्वयं को बनाये रखना बहुत ही मुश्किल है. कुमार विश्वास और प्रशांत किशोर के पहले ऐसे दर्जनों लोग राजनीति में हाथ आजमा कर किनारा कर चुके हैं. आगे भी ऐेसे लोगोंं की भीड़ आएगी लेकिन राजनीति में उनका ही परचम फहरेगा जो सब छोडक़र, धक्के खाकर और उसी मेें रमे रहेंगे. राजनीति साधना और सर्मपण मांगती है. यह पार्टटाइम काम नहीं है बल्कि इसके लिए पैरों में छाले पड़ जाते हैं. कुछेक लोग होते हैं जो जहाज से उतर कर सफल हो जाते हैं लेकिन ऐसे थोड़े हैं. दिल्ली के बाद बिहार कुमार विश्वास और पीके के जरिए सिखाता है कि राजनीति की राह इतनी आसान नहीं. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

बुधवार, 5 नवंबर 2025

नाराजगी और आंदोलन से उपजे दल-1











प्रो. मनोज कुमार

भारतीय राजनीति में सर्वाधिक राजनीतिक दलों की स्थापना आपसी मनमुटाव के कारण हुई है. एक जेपी का जनआंदोलन याद रह जाता है जिसमें राजनीतिक दल नहीं बल्कि राजनेता उभरे लेकिन इसके बाद अलग-अलग राज्यों में अपनी-अपनी नाराजगी के चलते क्षेत्रीय क्षत्रप उभरते गए. आजादी के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में पहली टूट हुई और कांग्रेस (अर्स) और कांग्रेस (आई) का गठन हुआ. समय गुजररने के साथ वर्तमान में कांग्रेस ही अस्तित्व में है वही जनसंघ आगे चलकर जनता पार्टी बन गई और वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के रूप में अस्तित्व में है.माकपा, भाकपा और बसपा जैसी पार्टियां भी राजनीतिक मैदान में हैं. 2014 में अन्ना हजारे की अगुवाई में एक बड़ा जनआंदोलन हुआ जो भ्रष्टाचार के खिलाफ था. यह आंदोलन हाल ही में नेपाल में हुए जेनजी का ही लेकिन पृथक चेहरा था. इस आंदोलन से एक राजनीतिक पार्टी का उदय हुआ जिसे आम आदमी पार्टी का नाम दिया गया. आंदोलन के चलते देश में ऐसी हवा बही कि कांग्रेेस का सूपड़ा साफ हो गया और भारतीय जनता पार्टी सत्तासीन हो पायी. पूर्ण बहुमत के साथ गैर-कांग्रेसी सरकार का यह नया दौर था. अनेक राज्यों में भी इसका असर देखने को मिला. भाजपा को विजय की रणनीति बनाने में प्रशांत किशोर की अहम भूमिका रही. नरेन्द्र मोदी का जादू ऐसा चला कि लगातार तीसरी बार केन्द्र में भाजपा गठबंधन सरकार मौजूद है. पिछले चुनाव में कांग्रेस ने अपना प्रदर्शन जरूर सुधारा लेकिन अभी भी उनके लिए दिल्ली दूर है कि कहावत चरितार्थ हो रही है. 

बिहार विधानसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में देखें तो 1946 में बिहार की पहली सरकार का नेतृत्व श्री कृष्ण सिन्हा और अनुग्रह नारायण सिन्हा ने किया था।  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस  ने अगले दो दशकों तक राज्य को नियंत्रित किया; इस समय, प्रमुख नेता सत्येंद्र नारायण सिंह ने वैचारिक मतभेदों के कारण कांग्रेस छोड़ दी और जनता पार्टी में शामिल हो गए। 

1977 के चुनाव में, कांग्रेस को जनता पार्टी ने हरा दिया। जनता पार्टी ने बिहार की सभी चौवन लोकसभा सीटें जीतकर राज्य विधानसभा में सत्ता हासिल की। कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने । 1989 में राष्ट्रीय स्तर पर जीत के बाद 1990 में जनता दल बिहार की सत्ता में आया। लालू प्रसाद यादव, मुख्यमंत्री बने। नीतीश कुमार सहित अन्य समाजवादी विचारधारा वाले नेताओं ने धीरे-धीरे उनका साथ छोड़ दिया और 1995 तक मुख्यमंत्री रहे और उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, तो उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। संभवत: भारतीय राजनीति का यह पहला उदाहरण होगा।

वर्ष 2000 में जनता दल से अलग होकर रामविलास पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी का गठन किया। इसमें भी फूट पड़ जाने के बाद इसी नाम से राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी का उदय हुआ जिसके लीडर उपेन्द्र कुशवाहा हैं। इधर 2015 में जीतनराम मांझी का इस्तीफा होने के बाद उन्होंंने अपना नया दल हिन्दुस्तान अवामी मोर्चा का गठन कर लिया। राबड़ी देवी के कुशासन के बाद, समता पार्टी के उत्तराधिकारी जनता दल (यूनाइटेड) ने राष्ट्रीय जनता दल की जगह ली। उपेंद्र कुशवाहा ने 2013 में अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए दलबदल कर लिया। कुशवाहा पहले भी जदयू से अलग हुए थे, लेकिन सुलह के बाद वे जदयू में वापस आ गए थे। 2013 के दलबदल के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय लोक समता पार्टी की स्थापना हुई, जिसने 2014 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन करके तीन सीटें जीतकर प्रभावशाली प्रदर्शन किया। इसके बाद, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का प्रदर्शन प्रभावशाली नहीं रहा।  पार्टी ने फिर से खराब प्रदर्शन किया और 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी और एआईएमआईएम जैसे छोटे दलों के साथ नए गठबंधन की कोशिश की गई। ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट नामक इस नए गठबंधन ने चुनावों में 6 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की, लेकिन आरएलएसपी अपने गठबंधन सहयोगियों में सबसे ज़्यादा वोट शेयर होने के बावजूद एक भी सीट नहीं जीत पाई। हालाँकि, आरएलएसपी ने एक दर्जन निर्वाचन क्षेत्रों में जेडी(यू) के जातीय समीकरण को बिगाडऩे में कामयाबी हासिल की, जिसके परिणामस्वरूप 2020 के बिहार विधानसभा में जेडी(यू) की सीटों की संख्या घटकर 43 रह गई। भारतीय जनता पार्टी अब 75 सीटों के साथ उभरी।  सरकार गठन के बाद, जद (यू) ने बहुजन समाज पार्टी जैसी छोटी पार्टियों के नेताओं को अपने साथ जोडक़र अपना खोया हुआ वोट आधार वापस पाने के लिए लव-कुश गठबंधन (जिसे कुर्मी और कुशवाहा जाति का गठबंधन कहा जाता है ) को मज़बूत करने के लिए रामचंद्र प्रसाद सिंह और उमेश कुशवाहा को राष्ट्रीय और प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त करके संगठनात्मक बदलाव भी किए गए । इस गठबंधन को मज़बूत करने 2021 में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का जद (यू) में विलय था, जिसके बाद इसके नेता उपेंद्र कुशवाहा को जद (यू) के संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

बिहार की राजनीति में टूट-फूट और समीकरण बनते-बिगड़ते रहे हैं. प्रशांत किशोर भी बिहार की राजनीति में अपना सिक्का जमाने के लिए अपनी पार्टी जनसुराज का गठन किया. यह पार्टी ना तो विद्रोह से उपजी है और ना ही किसी आंदोलन के कारण. यह एक रणनीतिकार की राजनीतिक पार्टी है. फिलहाल इस समय जेडीयू और महागठबंधन के बीच संघर्ष है. पीके, ओवैसी जैसे लोग कितना चमत्कार कर पाते हैं, यह समय बताएगा लेकिन ये दोनों मुख्य दलों के वोट बैंक में सेंध लगाने का काम करेंगे, यह तय दिख रहा है. बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांतकिशोर की रणनीति कारगर रही तो समूचा परिदृश्य बदल सकता है लेकिन ये बिहार है. कल के अंक में हम विभिन्न राज्यों के राजनीतिक दलों के बारे में चर्चा करेंगे. (क्रमश:)

मेरा मध्य प्रदेश; हृदय प्रदेश का सप्तक

प्रो. मनोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार, भोपाल सप्तक अर्थात सात यानि मध्यप्रदेश के जन्म के सत्तर वर्ष। सब कुछ अनूठा, सबकुछ अलग। जब बना तब भी और आज स...