मंगलवार, 1 जून 2010

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मीडिया मैनेजर करेगा
मीडिया मैनजमेंट
मीडिया के विस्तार के साथ साथ आयोजकों और मीडिया के साथ तालमेल का अभाव बना हुआ है। कई बार बड़े और अच्छे आयोजनों की खबर नहीं पहुंच पाती है। आयोजक संस्थाओं को प्रोफेशनल्स की भी जरूरत है। ऐसे में मीडिया मैनेजर आयोजनों के कव्हरेज एवं प्रकाशन हेतु प्रेस रिलीज तैयार करने का काम मीडिया मैनेजर करेगी। आवश्यकता होने पर फोटोग्राफी एवं वीडियो शूटिंग भी कराया जाता है। मीडिया मैनेजर द्वारा तैयार प्रेस रिलीज स्थानीय दैनिकों के साथ प्रमुख प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय समाचार पत्रों, टेलीविजन चैनल्स, दूरदर्शन, आकाशवाणी के साथ न्यूज एजेंसी को प्रेषित किया जाता है। फिलहाल मीडिया मैनेजर का कार्यक्षेत्र भोपाल होगा। मामूली सेवाशुल्क के साथ उपरोक्त सेवाएं आपको सुलभ कराते हैं। इससे न केवल आपके विभाग का मानवश्रम बचता है और प्रोफेशनल्स की मदद भी मिलती है। इस सेवा के लिये आप चाहें तो प्रति आयोजन अथवा वार्षिक तौर पर अनुबंध किया जा सकता है। मानदेय कार्यक्रम के अनुरूप तय किया जाएगा। भोपाल में होने वाले आयोजनों के लिये मनोज कुमार से सम्पर्क किया जा सकता है। उनका मोबाइल नम्बर ०९३००४६९९१८ है। उपरोक्त जानकारी मीडिया मैनेजर की विज्ञप्ति में दी गई है।

सोमवार, 31 मई 2010

मुद्दा

अपनों से ही परायापन क्यों?
किसी भी व्यवसाय का नेचर होता है कि वह अपने प्रतिद्वंदी कंपनी को बाजार में पिट दे। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि बाजार में खुद को खड़ा रखने के लिये दूसरों को पीटना जरूरी है। यह स्पर्धा मीडिया में भी चल रही है। अखबारों की प्रसार संख्या और टेलीविजन की टीआरपी को लेकर हो रही इस स्पर्धा को सही कहा जा सकता है किन्तु किसी पत्रकार अथवा मीडिया कर्मी के सुख-दुख में भी इस तरह स्पर्धा को मैं कतई उचित नहीं मानता। मेरा मानना यह है कि मेरे साथी भी मेरी बातों से सहमत होंगे। भोपाल में यह स्पर्धा काफी वक्त से चल रही है। एक अखबार दूसरे अखबार से और एक चैनल दूसरे चैनल से आगे निकल जाने के लिये बेताब है। आंकड़ों का खेल जारी है और इसे गलत नहीं कहा जा सकता लेकिन जो इन दिनों क्या बल्कि एक मुद्दत से हो रहा है वह निहायत गलत है। बीती रात एक अखबार में काम करने वाले साथी को किसी अज्ञात लोगों ने लूट लिया। इस लूट की खबर सारे अखबारों में है। लूट का शिकार हुए साथी का नाम भी दिया गया है किन्तु अखबार का नाम प्रकाशन से सभी अखबारों ने परहेज किया है। यह पहली घटना नहीं है। एक पखवाड़े के भीतर यह चौथी-पांचवीं घटना है। यह सुखद है कि खबरों के प्रकाशन में कोई परहेज नहीं किया जा रहा है किन्तु सवाल यह है कि अखबार का नाम प्रकाशित करने से क्या भला हो रहा है। अखबार में काम करने वाला साथी है और उस अखबार का नाम प्रकाशित किया जा रहा है तो ऐसा नहीं है कि इस खबर से अखबार की प्रसार संख्या में कोई वृद्वि या कमी हो रही है या अनावश्यक पब्लिसिटी हो रही है और साथी किसी टेलीविजन चेनल का है तो भी इसी तरह का कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो हमें सिखाया जाता था कि अपनी लाईन बड़ी करने के लिये किसी की लाईन को मिटाने की जरूरत नहीं है बल्कि स्वयं अपनी लाईन बड़ी करें। मीडिया की तीन बुनियादी बातें हैं जिनमें एक समाज को शिक्षित करना भी है। जब स्वयं मीडिया अपनों के साथ ऐसा बर्ताव करेगा तो वह समाज को कैसे और किस प्रकार की शिक्षा देगा, यह आत्ममंथन का विषय है। मैं समझता हूं कि यह मुद्दा व्यक्ति विशेष, संस्था विशेष का न होकर समूचे मीडिया जगत का है और इस पर पहल करना जरूरी है। अपने अनुभव से मैं यह कह सकता हूं कि इस तरह की खबरों पर मैनेजमेंट का बहुत गंभीर हस्तक्षेप नहीं होता है। मैनेजमेंअ उन खबरों पर जरूर एक्शन लेता है जो उनके व्यवसायिक हितों को चोट पहुंचाती है। जो लोग मेरा ब्लॉग पढ़ रहे हैं, मेरा उनसे अनुरोध है कि इस दिशा में वे अपनी राय दें, हस्तक्षेप करें और हम सब एक हैं कि आवाज बुलंद करें।

शनिवार, 29 मई 2010

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30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष
ये वक्त टेक्नालॉजी की पत्रकारिता का है
मनोज कुमार

एक समय था जब टेलीविजन नहीं था। इंटरनेट और सेटेलाईट चैनलों का नामोनिशाननहीं था। अखबार भी श्वेत श्याम हुआ करते थे। थोड़े से पेज जिसमें ज्यादतरअखबार आठ पन्नों का हुआ करता था। हर पेज की अपनी शान। खबरों की मारामारी।किसी संस्था या आयोजन की खबर को दो कॉलम की जगह मिल जाना बड़ी बात मानाजाता था। तस्वीरों का भी उतना जलवा नहीं था। अधिकतम तीन कॉलम की फोटो छपजाया करती थी और आठ पेज के अखबार में ऐसी बड़ी फोटो तब कुल जमा चार हुआकरती थी। एक पहले पन्ने पर, दो शहर की खबर में, एक प्रादेशिक पन्ने पर औरएक अन्तर्राष्ट्रीय समाचारों में। यह वह दौर था जब पत्रकारिता कीटेक्नालॉजी काम किया करती थी। खबरों को सूंघ कर, खोज कर निकाला जाता था।एक एक खबर का प्रभाव होता था। एक्शन और रिएक्शन होता था। लोग सुबह सवेरेअखबार की प्रतीक्षा किया करते थे लेकिन बदलते समय में सबकुछ बदल गया है।अब उस बेसब्री के साथ आम आदमी अखबार का इंतजार नहीं करता है। सुबह छह बजेअखबार आये या आठ बजे। जीवन की जरूरी चीजों में अखबार भी शामिल है इसलियेप्रतिदिन एक अखबार मंगा लिया जाता है। जिन घरों में बच्चे पढ़ रहे हैंउनके लिये कोई राष्ट्रीय दैनिक मंगा लिया जाता है वह भी अंग्रेजी का ताकिबच्चे को प्रतियोगी परीक्षा में आसानी हो सके। यह बदलाव आखिर आया क्यों?आखिर अखबारों के प्रति रूचि कम क्यों हुई? ऐसे अनेक सवाल हैं और हर सवालका जवाब बहुत ही आसान। यह बदलाव, अखबारों के प्रति पाठकों की कम होतीरूचि का एकमात्र कारण है टेक्नालॉजी की पत्रकारिता का अस्तित्व में आना।जब तक पत्रकारिता की टेक्नालॉजी काम कर रही थी, अखबारोंे की भूमिका अधिकप्रभावी थी लेकिन जब से टेक्नालॉजी की पत्रकारिता काम कर करने लगी है,अखबारों के प्रति रूचि कम होती जा रही है।त्ीन-चार दशक पहले टेलीविजन ने पांव पसारना शुरू किया था। इसके पहलेसमाचार पत्रों का एकछत्र राज्य था। पराधीन भारत में जनजागरण का कार्यसमाचार पत्रों ने किया था और जिन्होंने पूरी शिद्दत के साथ अपनी जवाबदारीनिभायी। समाचार पत्रों की ताकत इसी दौर में भारत की जनता ने महसूस किया।पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त होकर भारत एक नये देश और समाज के निर्माणमें जुट गया। इस दौर में भी समाचार पत्रों ने वही कार्य किया जो पराधीनभारत की मुक्ति के समय किया था। विकासशील भारत की संरचना और नये जमाने केहिन्दुस्तान के निर्माण में समाचार पत्रों का अविस्मरणीय योगदान रहा।स्वतंत्र भारत में समाचार पत्रों का विकास और विस्तार होने लगा लेकिन यहविकास और विस्तार अस्सी के दशक में तेजी से हुआ। इस समय तक आकाशवाणी एकविकल्प के रूप में मौजूद था किन्तु सरकारी नियंत्रण वाले इस इलेक्ट्रॉनिकप्रसार माध्यम के प्रति लोगों का बहुत विश्वास नहीं था। लोगों की दृष्टिमें यह बात पक्की हो गयी थी कि आकाशवाणी का अर्थ सरकारी भोंपू है।आकाशवाणी के बाद भारत में दूरदर्शन का आगमन हुआ। यह पत्रकारिता का नयाअनुभव था। कुछ अतिरिक्त सूचना तो मिलना आरंभ हुआ ही, अब दृश्य पत्रकारिताका श्रीगणेश भी हो चुका था। दूरदर्शन की विश्वसनीयता संदिग्ध थी।आकाशवाणी की तरह ही दूरदर्शन को भी लोग संदेह की नजरों से देखते थे औरउनका यह मानना था कि यह भी सरकारी भोंपू है और सरकार इसके माध्यम सेअपनी इमेज बिल्डिंग का काम कराती है। इसे भारत में बुद्वु बक्सा भी कहागया। हालांकि दूरदर्शन को भी कोई बहुत जगह नहीं मिली किन्तु आकाशवाणी सेज्यादा विस्तार दूरदर्शन को मिला। एक कारण तो यह था कि यह दूरदर्शन केमाध्यम से दृश्य पत्रकारिता का आरंभ हो चुका था। भारत में साक्षरता काप्रतिशत वैसे भी कम है और ऐसे में दूरदर्शन प्रभावशाली माध्यम के रूप मेंविकसित हुआ। इसके बाद दृश्य पत्रकारिता में क्रांतिकारी परिवर्तन आया तबजब सेटेलाइट के माध्यम से टेलीविजन के चैनलों का प्रसारण आरंभ हुआ।दूरदर्शन से अधिक इन निजी टेलीविजन चैनलांे को भारत में स्थान मिला औरविश्वास भी। लोगों को यह समझ में आने लगा कि जो जहां जैसा घट रहा है, उसेटेलीविजन दिखा देते हैं। समय गुजरने के साथ साथ चैनलों की संख्या सौ केआसपास हो चली है और इसी के साथ विश्वसनीयता का संकट भी उपजा है। इस परआगे चर्चा करेंगे। बहरहाल, समाचार पत्र, आकाशवाणी, दूरदर्शन, टेलीविजनचैनल्स के विस्तार के बाद पत्रकारिता का नया युग ई-जर्नलिज्म से आरंभहोता है। ई-जर्नलिज्म एक तरह से इलिट क्लास की पत्रकारिता कही जा सकती हैक्योंकि यह पूरी तरह से टेक्नॉलाजी की पत्रकारिता है। इसके लिये स्वयं काकम्प्यूटर, इंटरनेट और इसके संचालन की जानकारी उपयोगकर्ता को होना चाहिए।इसका पाठक वर्ग भी बेहद सीमित है। वही लोग पाठक हैं जिन्हें ई-जर्नलिज्मके संचालन की टेक्नॉलाजी का ज्ञान है। हालांकि ई-जर्नलिज्म समाचार पत्र,दृश्य एवं श्रव्य पत्रकारिता का एकजाई चेहरा है। बावजूद इसका क्षेत्रसीमित है और आम आदमी की पहुंच से बहुत दूर।इस तरह पत्रकारिता का विस्तार होता गया और विकास भी किन्तु इसी के साथसाथ विश्वसनीयता का संकट भी उपजा। एक समय था जब समाचार पत्रों कीविश्वसनीयता का कोई सानी नहीं था। अखबारों में छपी खबरें एकदम सत्य मानीजाती थी लेकिन टेलीविजन चैनलों के विस्तार के साथ समाचार पत्र और न्यूजचैनलों की खबरों में तुलना की जाने लगी। आम पाठक और दर्शक के लिये दोनोंमें कोई फर्क नहीं था किन्तु इस माध्यम के लोग इस फर्क को जानते थेकिन्तु इस मामले में वे असहाय बने रहे। समाचार पत्रों की आलोचना होनेलगी। आहिस्ता आहिस्ता समाचार पत्रों का चेहरा बदलने लगा। टेक्नालॉजी काविस्तार होने के साथ साथ अखबार रंगीन होते गये और लगभग अखबारों का स्वरूपसाइलेंट टेलीविजन का हो गया। रंगीन तस्वीरें और लोगों को भरमाने, उकसानेवाली खबरों को अधिकाधिक स्थान मिलने लगा। सामाजिक सरोकार की खबरें गुमहोने लगीं। खबरों में अतिशयता से इंकार करना मुश्किल था। कहीं तारीफ होरही थी तो कहीं लक्ष्य कर आलोचना की जाने लगी। तथ्यों को नजरअंदाज कियाजाने लगा और खबरों की गंभीरता कम होने लगी। एक प्रकार से अखबार एकप्रोडक्ट बन कर रह गये और अखबार की गंभीरता उसी तरह से कम होने लगी जिसतरह से शिक्षा के क्षेत्र में प्रभाव का उपयोग कर उसकी गंभीरता को कमकरने का प्रयास किया जाने लगा। मेरी राय में पत्रकारिता और शिक्षा एकदूसरे के पूरक हैं। शिक्षा जहां अक्षर ज्ञान का माध्यम है तो पत्रकारिताका दायित्व समाज को जागरूक बनाने का है। इस संदर्भ में यह उल्लेख करनाजरूरी लगता है कि जिस तरह विश्वविद्यालयों में कुलपति की गरिमा हुआ करतीथी, उस गरिमा का ह्ास हुआ है, कुछ कुछ वैसा ही अखबारों में सम्पादक कोलेकर हुआ है। शायद यही कारण है कि अखबारों की गरिमा और उसके प्रति समाजका विश्वास कुछ कम हुआ है।टेलीविजन के विस्तार और ई-जर्नलिज्म ने पत्रकारिता की टेक्नॉलाजी को गुमकर दिया है। अब सिर्फ और सिर्फ टेक्नॉलाजी की पत्रकारिता कार्य कर रहीहै। खबर को सूंघने और खोजने की प्रवृति कम होती जा रही है। इंटरनेट परउपलब्ध जानकारी को ही पाठकों को परोसा जा रहा है। ऐसा भी नहीं है किसमूची पत्रकारिता ऐसी ही हो गई है लेकिन काफी हद तक बदलाव दिख रहा है।मुझे याद पड़ता है कि जब हमारे क्राइम रिपोर्टर शाम को थाने में फोन परजानकारी लेकर अपराधों की खबर बनाते थे तो लगता था कि ये लोग कोई काम नहींकर रहे हैं और पुलिस की जानकारी को ही समाचार का स्वरूप् दे रहे हैंकिन्तु बदलते समय में अब यही सब कुछ हो रहा है। सूचना के अधिकार ने भीपत्रकारिता को सहूलियत दी है। जानकारी नहीं देने, गलत जानकारी देने औरजानकारी देने में आनाकानी करने वाले अफसरों के आगे पत्रकारों को बार बारघुमने की जरूरत खत्म हो गयी है। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी देनाविभाग की जवाबदारी है और इसमें गोलमाल की कोई गुंजाइश नहीं बच जाती है।एक तरह से खबरों की प्रामाणिकता तो बनती है लेकिन जो खोजी प्रवृत्ति काएक नेचर होता है, वह कहीं कमजोर हो रहा है। दरअसल जब हम खबरों को तलाशकरने जाते हैं तो कई और सूत्र और तथ्य हासिल हो जाते हैं जो नयी खबर केप्रति जिज्ञासा उत्पन्न करती थी किन्तु आइटीआई से मिली जानकारी एक खबर कोतो पुष्ट कर देती है किन्तु खबरों का विस्तार रूक जाता है।टेक्नालॉजी के इस दौर में पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों को भी अनदेखाकिया गया है। अब दुर्घटना की खबर श्वेत-श्याम नहीं हुआ करती है। मौतकितनी भी दर्दनाक हो, रंगीन ही छपती है। एक दुघर्टना में सौ पचास लोगोंकी मौत हो गयी है तो संख्या को अलग से हाईलाईट करने के लिये अलग रंग काइस्तेमाल किया जाता है। अस्सी के दशक में मैंने अपनी पत्रकारिता में अनेकघटनाओं को देखा है और समझा है। इंदिरा गांधी की हत्या, राजीव गांधी हत्याजैसी खबरों में कभी अखबार रंगीन नहीं छपे। यह एक राष्ट्रीय आपदा है औरकोई भी आपदा कभी रंगीन नहीं हो सकती है किन्तु अखबारों ने बदले समय मेंहादसे को, आपदा को भी रंगीन बना दिया है। इस बारे में हमारे दिग्गजसम्पादक पत्रकार कभी चर्चा करते नहीं दिखते हैं। उनकी चर्चा मेंपत्रकारिता की विश्वसनीयता, सम्पादक की खत्म होती सत्ता, पेड न्यूज आदिइत्यादि होती हैं। यह ठीक भी है कि जब हम नयी टेक्नालॉजी के दौर में हैंतो अखबार रंगीन ही होना चाहिए। ये जो बातें मैं कर रहा हूं, वह फिजूल कीहैं और यह पिछड़ों की तरह है। नये दौर में नये सोच वाले पत्रकार चाहिए। इससिलसिले में मुझे स्मरण हो आया कि शायद यही कारण है कि अब अखबारों कोअनुभवी पत्रकारों की नहीं बल्कि नौजवान पत्रकारों की जरूरत है जिनकी उम्रपैंतीस से पार न हो।टेक्नॉलाजी की पत्रकारिता से टेलीविजन की पत्रकारिता भी अछूता नहीं है।फर्क इतना ही है कि टेलीविजन की बंदिश यह है कि उसे टेक्स्ट के साथ साथदृश्य भी दिखाना होता है और इसके लिये खोजी प्रवृत्ति का होना जरूरी है।इस प्रवृत्ति से पत्रकारिता का विकास होता रहा है किन्तु खबरों को औरअधिक विश्वसनीय बनाने के फेर में पत्रकारिता की मर्यादा भूली जाने लगीहै। पत्रकारिता की सीमा को लांघ कर निजता का उल्लंघन किये जाने का बारबार आरोप न्यूज चैनलों पर लगता रहा है। इस आरोप को पूरी तरह स्वीकार न भीकरें तो अस्वीकार करने का कोई ठोस कारण नजर नहीं आता है। शायद यही कारणहै कि टेलीविजन की पत्रकारिता बहुत जल्द अविश्वसनीय होने लगी है। साख मेंयह गिरावट एक बड़ी चिंता का कारण है और इस पर मंंथन करना जरूरी है। इस तरहयह मान लेना चाहिए कि हम टेक्नॉलाजी की पत्रकारिता कर रहे हैं और आनेवाले दिनों में यही टेक्नालॉजी पत्रकारिता ही काम करेगी।लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं

गुरुवार, 20 मई 2010

मीडिया में पहला काम


राजेन्द्र माथुर पर बनी पहली फिल्म का इंदौर में प्रदर्शन
अब प्रभाष जोशी, राहुल बारपुते, एसपी सिंह और शरद जोशी पर बनेगी फिल्में

इंदौर। हिन्दी के आज़ाद भारत के चुनिन्दा संपादकों पर अब वृतचित्रों की श्रंखला बनाई जाएगी. इस कड़ी में पहली फिल्म राजेंद्र माथुर पर बन चुकी है. इसके बाद अब प्रभाष जोशी, राहुल बारपुते, सुरेन्द्र प्रताप सिंह और शरद जोशी पर फ़िल्में अगले तीन साल में पूरी हो जाएँगी. वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने यह बीड़ा उठाया है। इन फिल्मों पर फिलहाल शोध कार्य शुरू हो चुका है। प्रिंट, रेडियो और टीवी-तीनो विधाओं में काम कर चुके राजेश बादल के मुताबिक राजेंद्र माथुर पर बनी फिल्म का पहला शो इंदौर में हाल ही में हुआ। इंदौर से ही राजेंद्र माथुर ने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की थी। वे इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष भी रहे थे. इंदौर में उनके नाम पर बने राजेंद्र माथुर ऑडिटोरियम में इस फिल्म का प्रदर्शन हुआ. इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में पत्रकार, लेखक और विचारक उपस्थित थे। श्री बादल के मुताबिक इस फिल्म को बनाने में तीन साल लग गए। माथुरजी का निधन १९९१ में हुआ था और उस समय टीवी ने उद्योग की शक्ल देश में नहीं ली थी. इसलिए उनके वीडियो को जुटाने में काफी समय लगा। आधे घंटे की इस फिल्म में राजेंद्र माथुर के दुर्लभ वीडियो के अलावा ऊनके रेडियो साक्षात्कारों के हिस्से और ३६ साल में लिखे उनके चुनिन्दा लेखों के हिस्से शामिल किये गए हैं। इसके अलावा राजेंद्र माथुर की पत्रकारिता को समझने वाले और उनके करीब रहे लोगों से बातचीत भी इसमें दिखाई गयी हैं। राजेश बादल के मुताबिक यह फिल्म नए पत्रकारों के लिए बेहद उपयोगी तो है ही, उन लोगों के लिए भी काम की है, जिन्होंने न तो राजेंद्र माथुर को देखा है, न उनके साथ काम किया और न उनको पढ़ा है। श्री बादल ने बताया कि इस फिल्म के शो देश भर में हिंदी मीडिया से जुड़े लोगों के लिए किये जायेंगे. मीडिया संस्थानों और कॉलेजों में भी फिल्म दिखाई जायेगी, जहाँ पत्रकारिता पढाई जाती है. राजेंद्र माथुर पहले नई दुनिया इंदौर के प्रधान संपादक और फिर राष्ट्रीय दैनिक नवभारत टाइम्स के संपादक रहे। वैसे वे अंग्रेजी के प्रोफेसर थे लेकिन हिंदी पत्रकारिता में उनका योगदान अदभुत है। उनके लेखन के कई संकलन प्रकाशित हो चुके है। राजेश बादल ने बताया कि इस क्रम में अन्य पत्रकारों और संपादकों पर फिल्मों कि शूटिंग भी जल्द शुरू हो जाएगी। श्री बादल ने अपील की कि जिसके पास भी सुरेन्द्र प्रताप सिंह, प्रभाष जोशी, शरद जोशी और राहुल बारपुते के फोटो, वीडियो या अन्य दस्तावेज हों कृपया उन्हें प्रदान कर सहयोग करें। श्री बादल राजेंद्र माथुर और सुरेन्द्र प्रताप सिंह के साथ करीब बारह साल तक साथ काम कर चुके हैं और पिछले ३४ साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। कैसा रहा राजेंद्र माथुर का जीवन :- राजेन्द्र माथुर प्रखर पत्रकार और सहज इंसान थे. १९९१ में उनके निधन के बाद हिन्दी पत्रकारिता में बड़ी रिक्तता आई है। लेकिन उनके जीवन-मूल्यों और पत्रकारिता को आदर्श मानने वालों की संख्या भी बहुत है। वे आदर्श महापुरुषों की पूजा करवाने के बजाय ऊनके गुणों और विचारों को अपनाने के पक्षधर थे। उन्होंने विदेशी आक्रमण, अकाल, भूकम्प की परिस्थितियों में भी निराशा भरी टिप्पणियाँ नहीं लिखीं। ऐसे नाजुक अवसरों पर भी समाज में आत्मवि·ाास पैदा करने का प्रयोग उन्होंने सदा किया। अगस्त १९६३ में उन्होंने लिखा था-'हमारे राष्ट्रीय जीवन में दो बुराइयाँ घर कर गई हैं जिन्होंने हमें सदियों से एक जाहिल देश बना रखा है। पहली तो अकर्मण्यता, नीतिहीनता और संकल्पहीनता को जायज ठहराने की बुराई, दूसरी पाखंड की बीमारी, वचन और कर्म के बीच गहरी दरार की बुराई।' वे सभ्यता को अक्षुण्ण रखने के लिए जंगली जिंदादिली को जरूरी मानते थे। उनके लेखन में राष्ट्रवाद कूट-कूटकर भरा है, लेकिन भाषा, धर्म, क्षेत्र के आधार वाली कट्टरता कहीं नहीं मिलती। वास्तव में माथुर साहब समाज के हर व्यक्ति की गरिमा की रक्षा के पक्षधर थे। उनके लेखन में बेहद पैनापन था, लेकिन किसी तरह का पूर्वाग्रह और दुर्भावना का अंश कभी देखने को नहीं मिला। पं. नेहरू को आदर्श मानने के साथ वे स्वयं सच्चे अर्थों में 'डेमोक्रेट' संपादक थे। राजेन्द्र माथुरजी के ६० के दशक (१९६३ से १९६९) तक के लेखों का महत्व इक्कीसवीं शताब्दी में और बढ़ गया है। उन्होंने सदा ही जिम्मेदार पत्रकारिता पर बल दिया है। यही कारण है कि ऊनके लेखन में कभी जहर की बूँद नहीं दिखाई दी। वे ऋषि की तरह समाज और राजनीति का आकलन करते रहे।

बुधवार, 19 मई 2010

छत्तीसगढ़ की परम्परा और संस्कृति की संवाहक
फिल्म मया के बरखा 21 को पर्दे पर उतरेगी

छत्तीसगढ़ के रूचिवान सिने दर्शकों के लिये के लिये 21 मई 2010 का दिन खास महत्व का होगा। इस दिन अपने लोगों की अपनी बोली में भव्य फीचर फिल्म मया के बरखा रिलीज होगी। मया के बरखा छत्तीसगढ़ की गुरतुर बोली की पहली फिल्म नहीं है लेकिन पहली नहीं होने के बाद भी यह फिल्म कई मायनों में अलग ही महत्व रखती है। इस फिल्म में मुंबई के नामचीन कलाकारों का दखल है तो हबीब तनवीर की टीम के सहज और माटी से जुड़े किरदारों का सहज अभिनय भी। अपनी माटी और अपने लोगों की इस फिल्म का नाम मया के बरखा है। यह पूरी तरह फ्यूजन नहीं है किन्तु देशज की सुगंध दूर दूर तक छत्तीसगढ़ की माटी को महकाएगी। दुर्गा मीडिया साफ्टवेयर के बेनर तले बनी इस फिल्म का निर्देशन आशीष श्रीवास्तव ने किया है। इस फिल्म में प्राकृतिक रूप से धनवान छत्तीसगढ़ की परम्पराएं, संस्कृति, नदियों, कल कारखानों और उन सभी दृश्यों को जीवंत करने की कोशिश की है जिसके बूते छत्तीसगढ़ पूरी दुनिया में अलग से पहचाना जाता है। छत्तीसगढ़ की माटी में अनेक प्रेम कहानियां दर्ज हैं और यह दर्ज है कि प्रेम के बैरी भी। कुछ इसी कथानक को लेकर फिल्म की पटकथा बुनी गई है। आशीष युवा निर्देशक हैं और वे नये जमाने के छत्तीसगढ़ की पसंद नापसंद को खूब समझते हैं। उनकी इस समझ का परिचय फिल्म के हर हिस्से में दर्शकों को देखने को मिलेगा। जिंदगी के सच और प्रेम के महत्व को रेखांकित करती इस फिल्म के गीतों की धूम छत्तीसगढ़ के आंचल में बसे गांव गांव में गूंज रही है। फिल्म का संगीत कर्णप्रिय है। संगीतकार मॉरीस लाजरस उभरते हुए संगीतकार हैं। छत्तीसगढ़ की माटी में रचे बसे संस्कारों और संस्कृति के अनुरूप गीतों को संगीतबद्व किया है। वे हबीब तनवीर जैसे महान रंगकर्मी के सानिध्य में रहे इसलिये भी उनके संगीत में ठेठ देशज का अनुभव होता है। छत्तीसगढ़ी में इस फिल्म की पटकथा का रूपांतरण लेखक एवं पत्रकार मनोज कुमार ने किया है। छत्तीसगढ़ की माटी में जन्मे मनोज कुमार का रिश्ता छत्तीसगढ़ के साथ वैसा ही है जैसा कि एक मां और बेटेे का। भाषा, बोली, संस्कार और परम्पराओं के साथ बदलते दौर के युवाओं के मन की बात को उन्हीं की भावनाओ के अनुरूप् लिखा गया है। छत्तीसगढ़ के ही प्रतिभाशाली गीतकार गुरूीमत कांबो ने गीतों को पिरोया है और इन गीतों को नुपूर गडकरी, महुआ चटर्जी, अखिलेश तिवारी, महादेव हिरवानी एवं अमित चक्रवर्ती ने अपनी सुमधुर आवाज दी है। मया के बरखा छत्तीसगढ़ की उस परम्परा की फिल्म है जब कभी कहि देबे संदेश बनी थी। पांच-छह दशक से भी ज्यादा पुरानी इस फिल्म में भी मुंबई और स्थानीय कलाकारों की भूमिका थी। कहना न होगा कि जिस तरह से मया के बरखा को युवा दर्शकों के साथ समूचे छत्तीसगढ़ की जनता का प्यार और रिसपांस मिल रहा है, उससे यह फिल्म एक नया रिकार्ड बनायेगी।

गुरुवार, 13 मई 2010

मीडिया

अब खबर क्यों प्रभावी नहीं हैं?


-मनोज कुमार

इन दिनों अखबारों में इस बात को लेकर बड़ी बैचेनी है कि उनकी खबरों पर कोई एक्शन-रिएक्शन क्यों नहीं होता है। खबरें छप जाती हैं और उसे सरकार और शासन के स्तर पर कभी कोई नोटिस नहीं लिया जाता है। फौरीतौर पर यह महज रूटीन का मामला दिखता है किन्तु ऐसा है नहीं। आखिर जिन अखबारों ने कभी अंग्रेज शासकों को भारत छोड़ने के लिये मजबूर बेबस कर दिया, आज उन्हीं अखबारों की खबरों पर कोई प्रभाव या असर क्यों नहीं होता है। बात बहुत गंभीर है और इसे पत्रकारिता की विश्वसनीयता के साथ जोड़कर देखा जाए तो इस मुद्दे को विस्तार मिल सकता है। पत्रकारिता की विश्वसनीयता के क्या मायने हैं, यह पहले समझना होगा। विश्वसनीयता का सीधा अर्थ है छपी खबरों की पड़ताल करना और पीड़ित को न्याय दिलाना। यहां इस बात पर बहस हो सकती है कि पीड़ित को न्याय दिलाने से बात नहीं बनती है बल्कि दोषी पक्ष के खिलाफ भी प्रभावी कार्यवाही होना चाहिए। इस मामले में मेरी राय थोड़ी अलग है। जब पीड़ित को न्याय मिलेगा तो संबंधित पर असर न हो, यह तो संभव ही नहीं है। यूं भी हमारी मंशा पीड़ित को न्याय दिलाने की और व्यवस्था को दुरूस्त करने की है न कि किसी न्यायाधीश की तरह फैसला सुनाने की। एक बार फिर हम मुद्दे की ओर लौटते है कि आखिर खबरों पर कार्यवाही क्यों नहीं होती है। दरअसल इसके पीछे यही कारण है कि हम पत्रकार के बजाय जज की भूमिका में आ जाते हैं और जज बनना हमारा काम नहीं है। हमारा काम तो समाज और व्यवस्था के बीच सेतु का है। जो देखा, जो समझा और वस्तुस्थिति समाज के सामने रख दी लेकिन इन दिनों खबरांें में विचार भी प्रस्तुत किया जा रहा है जो खबरों के तेवर को कम ही नहीं करता बल्कि कई बार अविश्वसनीय बना देता है। दोषी पक्ष इसका लाभ लेकर पत्रकार पर यह आरोप मढ़ देता है कि खबर निरपेक्ष होकर नहीं लिखी गयी बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति को लक्ष्य रखकर खबर लिखी गयी। ऐसे में किसी खबर के इम्पेक्ट की बात करना व्यर्थ है।

मुझे यह बात भी लम्बे समय से चुभ रही है कि हम प्रतिदिन ज्यादा नहीं तो दस अलग किस्म की खबरें देते हैं जो खोजी प्रवृत्ति की होती है। इस मान से पूरे एक महीने की तुलना की जाए तो एक माह में दो सौ से ज्यादा खबरें होती हैं। अब इनमें कोई पांच दस खबरों पर कार्यवाही हो जाती है तो हम बड़े गर्व के साथ इम्पेक्ट लिखकर छापते हैं कि हमारी फलां खबर पर कार्यवाही हुई। सवाल यह है कि औसतन दो सौ खबरों में दस खबर पर कार्यवाही हुई और शेष बची खबर पर कोई एक्शन रिएक्शन नहीं हुआ तो इसे हम पत्रकारिता की सफलता मानें या अपनी विफलता। वैसे भी हम खबरों की खोज इसलिये ही करते हैं कि सरकार और शासन उन खबरों की तहकीकात करें और कार्यवाही कर व्यवस्था को सुदृढ़ करें। ऐसे में किसी खबर पर कार्यवाही से इतराना मुझे निजी तौर पर ठीक नहीं लगता है। पत्रकारिता को इस मुद्दे पर विवेचना करने की जरूरत है।

जहां तक मुझे याद है कि अस्सी के दशक में अखबार में खबर छपवाने के लिये विशेष प्रयास करना होता था और खबर छप गयी तो उसका विशेष महत्व होता था। चार लाइनों की खबरों को अखबार में किस तरह खोजबीन कर रिपोर्ट बनाना और रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद सरकार कार्यवाही के लिये मजबूर हो, इस तरह प्रस्तुत करना। छत्तीसगढ़ के पत्थलगांव क्षेत्र में टमाटर का उत्पादन इतना होता था कि खरीददार नहीं मिल पाते थे और किसान शाम होते होते दो रुपये में साठ किलो टमाटर बेचने के लिये मजबूर हो जाते थे। इस आशय की एक चार लाइन की खबर अखबार में छपी में । देशबन्धु में छपी इस खबर की पड़ताल कर रिपोर्ट प्रकाशित की गई। यह उदाहरण उस समय का है जब अर्जुनसिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने तत्काल कार्यवाही करते हुए वहां सॉस बनाने वाली फैक्ट्री लगाने के आदेश दिये। यह उदाहरण किसी अखबार या पत्रकार के गुणगान का नहीं है बल्कि यह बताने की कोशिश है कि सामाजिक सरोकार की खबरों पर कार्यवाही करने के लिये सरकार को किस तरह विवश होना पड़ता था। आज मामला उलटा ही है। खबरें बेहतर लिखी जा रही हैं। खोजबीन भी हो रही है, तथ्य और आंकड़ें भी प्रभावी हैं लेकिन लक्ष्य करके लिखी जाने के कारण खबरों का असर नहीं हो पा रहा है। एक व्यक्ति, एक संस्था और एक ही नेचर की खबरों के चलते पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग रहे हैं। हमें इस बात का चिंतन करना चाहिए कि खबरों को कोई क्यों गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है।

मंगलवार, 11 मई 2010

ऐसे में कैसे बचेगी लाडली?
मनोज कूमार
रूढ़िवादी भारतीय समाज की पहली पसंद हमेशा से बेटा रहा है। बेटियों को दूसरे दर्जे पर रखा गया। यही नहीं, पालन पोषण में भी उनके साथ भेदभाव जगजाहिर है। बेटियों को जन्म से माने के पहले मार देने की निर्मम खबरें अब बासी हो गयी है। बेटियों के साथ इस सौतेलेपन का दुष्परिणाम यह हुआ कि आहिस्ता आहिस्ता बेटियों की तादाद घटती गयी। यह स्थिति किसी भी समाज अथवा देश के लिये ठीक नहीं कहा जा सकता और भारत के स्तर पर तो यह बेहद चिंता का विषय रहा है। इस स्थिति से उबरने के लिये सरकार और समाज लगातार सक्रिय है। पिछले एक दशक में इस दिशा में खासा प्रयास किया गया। इन प्रयासों में करोड़ों के बजट का प्रावधान किया गया नतीजतन परिणाम सौ प्रतिशत भले ही न रहा हो लेकिन एक कदम तो आगे बढ़ा गया। कहना न होगा कि इन प्रयासों का परिणाम आने वाले समय में और भी व्यापक स्तर पर देखने को मिलता किन्तु एक साजिश के साथ न केवल लाड़ली पर खतरा मंडरा रहा है, सरकारी और निजी प्रयासों पर पानी फेरा जा रहा है बल्कि समाज में अनैतिकता को खामोशी के साथ बढ़ाया जा रहा है।
टेलीविजन के पर्दे पर और समाचार पत्रों में सेक्स को लेकर अनेक किस्म के विज्ञापन दिये जा रहे हैं। हर कंपनी के अपने दावे हैं और इन दावों की सच्चाई केवल इतनी है कि इससे सेक्स सफल हो या न हो, समाज में अनैतिकता बढ़ रही है। मुझे और मेरी उम्र्र के उन तमाम लोगों को याद होगा कि सामाजिक बंधन के चलते महिलायें माहवारी के समय रसोई से दूर रहती थीं। इन दिनांे में वे अलग-थलग बैठी रहती थीं। बचपन और किशोरावस्था का मन उनके इस अकेलेपन के कारण को समझने की कोशिश में लगा रहता था। जवाब नहीं मिलता था। थोड़ा डर और थोड़े लिहाज के बाद मन में आ रहे सवालों को झटक दिया जाता था। समय बदला और इस बदले समय में सारे मायने बदल गये। अब यह सवाल पांच साल की नन्हीं उम्र के बच्चों को जिज्ञासु नहीं बनाते हैं बल्कि वे इस उम्र में इस मामले के शिक्षक बन गये हैं। उन्हें महिलाओं की निजता के बारे में पूरा ज्ञान है। यह ज्ञान उन्हें परिवार से नहीं मिला। टेलीविजन के पर्दे पर कंडेाम और गर्भनिरोधक दवाआंें के सेक्सी विज्ञापनांे ने उन्हें बता दिया है कि उनकी निजता अब निजता नहीं रही। अभी कुछ समय से बाजार में प्रीगनेंसी टेस्ट करने की एक साधारण विधि आ गयी है जिसमें किसी युवती या स्त्री को किसी से कुछ बताने अथवा किसी अस्पताल में जाने की कोई जरूरत नहीं रह गयी है। वह मनचाहे ढंग से जांच कर सकती है। इसी तरह बाजार में ऐसी गोलियां और दूसरी चीजें उपलब्ध हैं जिसके उपयोग के बाद गर्भवती होने की संभावना लगभग क्षीण हो जाती हैं। अब तक प्रीगनेंसी टेस्ट के लिये पेथोलॉजी लेब का सहारा लिया जा जाता था जिससे कई बार यह सवाल उठता था ऐसा क्यों कराया जा रहा है। और जब रिपोर्ट पॉजिटिव आ जाए तो वह स्त्री या युवती सवालों के घेरे में कैद हो जाया करती थी। पचास रूप्ये के मामूली खर्च पर स्त्री को संदेह से परे कर दिया गया है। समाज में जिस तरह वर्जनाएं टूट रही हैं, उसमें उपर लिखी गयी बातें कोई अर्थ नहीं रखती हैं लेकिन मैं इसे दूसरे रूप में ले रहा हूं और इसके खतरे को दूसरी तरह से देख रहा हूं। गोलियों के सेवन के बाद गर्भवती न होने से किसी अनचाहे बच्चे की जान जाने का खतरा तो नहीं होता है लेकिन प्रीगनेंसी टेस्ट करने वाली पचास रूप्ये की टेस्ट पट््टी का अर्थ एक अजन्मे बच्चे को गर्भ में ही मार देेने का सबसे आसान तरीका निकाल लिया गया है।
इसे थोड़ा और विस्तार से समझेंं। एक तरफ पूरी दुनिया में बेटी बचाओ अभियान चल रहा है और दूसरी तरफ इस तरह टेस्ट की सुविधाएं तो खतरे को और भी बढ़ा रही हैं क्यांेकि प्रीगनेंसी का पता चलने के बाद चरित्रहीनता के दाग से बचने के लिये गर्भ गिराने का आनन-फानन में इंतजाम कर लिया जाता है। इसमें इतना भी वक्त नहीं होता है कि वे यह जान सकें कि आने वाली जान बेटा था या बिटिया। मान लीजिये एक समय में सौ ऐसी स्त्री प्रीगनेंसी की जांच कराती हैं और मेरा मानना है कि इसमें 98 लोग वे हैं जिन्होंने विवाहत्तेर संबंध कायम कर लिये हैं और वे बेटे या बिटिया के फेर में न पड़कर समस्या मानकर मुक्ति पाना चाहती हैं। इस स्थिति में सरकार और निजी प्रयास निरर्थक साबित होते जाएंगे क्योंकि अजन्मे जान को मारने वालों को यह पता ही नहीं है िकवह लाड़ली थी या लाडला। इस पूरे मामले में दुर्भाग्य की बात है कि टेलीविजन के पर्दे पर लोकप्रिय हो चुकी अभिनेत्री इस प्रोडक्ट के प्रचार प्रसा में जुड़ी हैं। शायद उन्हें इस बात का इल्म नहीं है कि वे किस तरह के विज्ञापनों का साथ दे रही हैं। इस मुद्दे पर हैरत और तकलीफ देेने वाली बात यह है कि समाज के दूसरे लोग भी बहुत जागरूक नहीं हैं। वे इसे रोजमर्रा की चीज बता कर किनारा कर लते हैं। कुछ लोग इस मुद्दे को उतना गंभीर नहीं मानते हैं बल्कि उनका सोचना है कि जब समाज में अनैतिकता बढ़ रही है तो इस पर चर्चा करने का लाभ क्या? कुछ लोग इसे सेक्स का विषय समझकर मानसिक जुगाली करने लगते हैं।
मेरी अपनी निजी राय है कि ऐसे विज्ञापनों के खिलाफ, ऐसी दवाईंया और प्रोडेक्ट के खिलाफ स्वयंसेवर संस्थाओं को, बुद्विजीवियों को और सामाजिक सरोकार से नाता रखने वालों को आगे आना चाहिए क्योंकि यह महज समाज में अनैतिकता को विस्तार नहीं दे रहे हैं बल्कि लाड़ली को बचाने के एक महायज्ञ के सफल होने के पहले उसमें व्यवधान उपस्थित करने के प्रयास में हैं। मीडिया की भूमिका इसमें कारगर हो सकती है और यह उसका दायित्व भी है िकवह ऐसे किसी भी प्रयासों के खिलाफ समाज को जागृत करे।

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...