रविवार, 17 अक्टूबर 2010

समागम का नया अंक पेडन्यूज के खिलाफ आवाज उठाने वाले अखबारों को समर्पित

भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का अक्टूबर २०१० का अंक बिहार के दो प्रमुख समाचार पत्रों प्रभात खबर एवं हिन्दुस्तान को सलाम करता है जिन्होंने बातों से आगे बढ़कर व्यवहार में पेडन्यूज नहीं छापने का ऐलान किया है।

media

पत्रकारिता में हर कोई वरिष्ठ?

-मनोज कुमार

इन दिनों पत्रकारिता में वरिष्ठ शब्द का चलन तेजी से हो रहा है। सामान्य तौर पर इसके उपयोग से कोई आपत्ति नहीं होना चाहिए किन्तु हम शब्दों के सौदागर हैं तो शब्दों के उपयोग और प्रयोग से सावधान रहना चाहिए। अमूनन दो पांच वर्ष काम कर चुके पत्रकार अपने नाम के साथ वरिष्ठ पत्रकार का उपयोग करना नहीं भूलते हैं। वरिष्ठ शब्द के उपयोग के पीछे शायद मंशा अधिक सम्मान और स्वयं को वि·ासनीय बनाने की हो सकती है किन्तु मेरी समझ में पत्रकारिता एकमात्र ऐसा पेशा है जहां वरिष्ठ और कनिष्ठ शब्दों का बहुत कोई अर्थ नहीं है। हमारे पेशे में महत्व है तो आपके लेखन का। रिर्पाेटिंग करते हैं तो आपकी रिपोर्ट आपकी वरिष्ठता और कनिष्ठता का पैमाना बनती है और आप सम्पादक हैं तो समूचा प्रकाशन आपका आईना होता है। कदाचित लेखक हैं तो विषयों की गंभीरता आपके वरिष्ठता का परिचायक होती है। इधर अपनी लेखनी, रिपोÍटग और सम्पादकीय कौशल से परे केवल पत्रकारिता में गुजारे गये वर्षाें के आधार पर स्वयंभू वरिष्ठ बताने की ताक में लगे हुए हैं।

वरिष्ठ क्या होता है, इसकी मीमांसा भी कर लेते हैं। मेरी राय में वरिष्ठ से आशय उस शब्द से है जो किसी भी क्षेत्र में एक समय तक काम कर लेने एवं ख्याति प्राप्त कर लेने के बाद प्राप्त होता है। राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, डॉ. वेदप्रताप वैदिक, आलोक मेहता आदि इत्यादि ऐसे नाम हैं जो स्थापित हैं और जिन्हें आप स्वयं आगे आकर वरिष्ठ कहला कर स्वयं को गौरवांवित महसूस करते हैं किन्तु उन हजारों पत्रकारों को जिन्हें दो, पांच अथवा दस साल काम करते हुए हैं और वे अपने आपको वरिष्ठ पत्रकार लिखते हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं हूं। वरिष्ठता वास्तव में काम किये गये वर्षाें से नहीं होती है बल्कि काम में प्राप्त ख्याति से होती है।

मेरी बातों से असहमत साथी कह सकते हैं कि किसी समाचारपत्र अथवा पत्रिका में सम्पादक पद सुशोभित करने वालों को वरिष्ठ पत्रकार नहीं माना जाना चाहिए? मैं यहां भी ना में कहूंगा। सवाल यह है कि अपने सम्पादक रहने की अवधि में उन्होंने ऐसा क्या किया कि समाचार पत्र को अलग से ख्याति मिली। यदि ऐसा है तो उन्हें स्वयं ही वरिष्ठता का दर्जा मिल जाएगा किन्तु ऐसा नहीं है तब उन्हें इस तखल्लुस का स्वयं होकर उपयोग करना होगा। यह सर्वविदित है कि किस तरह आज के दौर में जोड़-तोड़ कर सम्पादक बना जाता है। कहीं राजनीतिक सिफारिश के बूते पर तो कहीं किसी और माध्यम से। किसी सम्पादक की सफलता उसके नाम से अखबार की पहचान हो, ऐसा होना चाहिए न कि अखबार के नाम से सम्पादक की पहचान हो। ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं जिनमें अखबार बाद में, सम्पादक पहले होते थे।

इन दिनों एक गलत परम्परा शासकीय विभाग भी डाल रहे हैं। वे जाने-अनजाने में ऐसे अनेक पत्रकारों के नाम के साथ वरिष्ठ पत्रकार जोड़ देते हैं जो किसी भी कीमत पर इसके हकदार नहीं हैं। उनके पीछे उनका मकसद उनके अखबारों में अपनी खबरों के लिये पर्याप्त जगह पाना होता है। शायद शासकीय विभाग अपने मकसद में कामयाब हो भी जाते होंगे किन्तु पत्रकार साथी एक बार वरिष्ठता पदनाम में कैद हो जाता है तो वह फिर कभी नहीं उबर पाता है। इन दिनों विभिन्न वेबसाइट एवं ब्लॉग में लिखने वाले पत्रकारों को भी वरिष्ठ पत्रकार लिखा जा रहा है, जो एक हद तक तो ठीक है किन्तु इसके बाद शायद नहीं। पत्रकारों के काम का लेखा-जोखा करने के बाद ही वरिष्ठ लिखा जाना बेहतर होगा। वरिष्ठ शब्द का मायने मेरे लिये अपने काम के प्रति अधिक जिम्मेदार होना है। जिम्मेदारी ही वरिष्ठता का दूसरा रूप है। वरिष्ठता शब्द का उपयोग सोच-समझ कर किया जाना ही वरिष्ठता शब्द का सम्मान किया जाना होगा।

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

media

अब क्यों बात नहीं होती पीत पत्रकारिता की?
मनोज कुमार
लगभग एक दशक पहले पत्रकारिता का भेद हुआ करता था। एक पत्रकारिता होती थी सकरात्मक एवं दूसरा नकरात्मक जिसे हम हिन्दी में पीत पत्रकारिता और अंग्रेजी में यलो जर्नलिज्म कहा करते थे। बीते एक दशक में पत्रकारिता का यह फर्क लगभग समाप्त हो चला है। अब पीत पत्रकारिता की बात नहीं होती है। हैरत नहीं होना चाहिए कि इस एक दशक में आयी पत्रकारिता की पीढ़ी को इस पीत पत्रकारिता के बारे में कुछ पता ही नहीं हो क्योंकि जिस ढर्रे पर पत्रकारिता चल रही है और जिस स्तर पर पत्रकारिता की आलोचना हो रही है, उससे ऐसा लगने लगा है कि समूची पत्रकारिता ही पीत हो चली है। हालांकि यह पूरी तरह सच नहीं है और हो भी नहीं सकता और होना भी नहीं चाहिए। पत्रकारिता की इस फिलासफी के बावजूद यह बात मेरे समझ से परे है कि ऐसा क्या हुआ कि पत्रकारिता से पीत शब्द गायब हो गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि समूची पत्रकारिता का शुद्विकरण हो गया हो और पूरी पत्रकारिता सकरात्मक भूमिका में उपस्थित दिखायी दे रही हो किन्तु यह भी नहीं है क्योंकि यदि ऐसा होता तो पत्रकारिता की आलोचना जिस गति से हो रही है, वह नहीं होती। इसका मतलब साफ है कि पत्रकारिता के मंच पर स्याह का रंग और गहराया है।
पत्रकारिता की इस समस्या को हल्के से नहींं लिया जाना चाहिए। स्कूल के दिनों में मास्टरजी सिखाया करते थे कि सफेद रंग का महत्व तब तक है जब तक कि काला रंग मौजूद हो और जब काला रंग गायब हो जाएगा तो सफेद महत्वहीन हो जाएगा और यही बात काले रंग के साथ भी है। उसका अस्तित्व भी सफेद पर टिका है। इस आधार पर पत्रकारिता के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि सकरात्मक पत्रकारिता को जानने और पहचानने के लिये पीत पत्रकारिता का भेद करना जरूरी है किन्तु जब समूची पत्रकारिता सकरात्मक हो जाएगी तो भेद कैसे होगा। दुर्भाग्य से इन दिनों समूची पत्रकारिता भले ही सकरात्मक न हो पायी हो किन्तु पीत जरूर हुयी है। इस स्थिति से पत्रकारिता को बचाना जरूरी होगा।

पत्रकारिता का विस्तार हुआ है और इसी के साथ विश्वसनीयता का संकट पैदा हुआ है तो सिर्फ इसलिये कि अब हम पीत पत्रकारिता की बात नहीं करते हैं। उसे नया नाम दे रहे हैं जैसे पेड न्यूज। पेडन्यूज भी तो पीत पत्रकारिता का हिस्सा है। मेरी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में बताया गया था कि पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लिखी गयी खबर अथवा दी गयी सूचना पीत पत्रकारिता कहलाती है। समाज हित में, देशहित में इससे बचना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि लगभग तीस साल पहले की पीत पत्रकारिता उतनी भी स्याह नहीं थी जितना कि आज हम महसूस कर रहे हैं। पत्रकारिता में सकरात्मकता का स्थान समाप्त हो रहा है तो इसका कारण यह नहीं है कि अच्छे लोगों ने काम करना बंद कर दिया है बल्कि सकरात्मक पत्रकारिता के समाप्त होने का भय इसलिये ज्यादा हो रहा है कि नयी पीढ़ी को पत्रकारिता की मुफलिसी, उसकी जवाबदारी नहीं बतायी जा रही है बल्कि उसे बताया जा रहा है कि जल्द से जल्द धनवान कैसे बनें?
यह सच है कि युवा मन वह भले ही पत्रकार हो, अच्छी जिंदगी जीने की चाहत होती है और जब यह ज्ञान मिले तो इससे ज्यादा सुखकर क्या होगा? अपने काम की कीमत हर प्रोफेशनल्स को मालूम होना चाहिए लेकिन इसके पहले अपने प्रोफेशन की जवाबदारी का अहसास होना ज्यादा जरूरी है और हो यही रहा है कि उत्तरदायित्व तो हमें मालूम नहीं लेकिन अधिकार के बारे में हम सजग हो गये हैं। यह एक सच है जिसने पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता में समाहित कर दिया है। यह सब सकारण नहीं हो रहा है और न ही सुनियोजित ढंग से बल्कि यह अनजाने में और अनियोजित ढंग से। इसके लिये डिग्री कॉलेजों की तरह रोज खुल रहे वो पत्रकारिता शिक्षण संस्था भी जवाबदार हैं।


रविवार, 29 अगस्त 2010

nathaa

नत्था के आगे क्या होगा ओंकारदास मानिकपुरी का?
मनोज कुमार
लगभग अनजाना सा एक लोककलाकार रातोंरात सुपरस्टार बन जाता है। सालांे से परदे के पीछे छिपे इस कलाकार की प्रतिभा किसी ने न देखी और न दिखायी दी। आमिर खान को धन्यवाद किया जाना चाहिए कि उसने छत्तीसगढ़ की माटी से हीरा तलाश कर करोड़ों दर्शकों तक पहुंचाया। आमिर के इस प्रयास के बाद भी ओंकारदास मानिकपुरी आज भी गुमनाम है। कोई जानता है और पहचानता है तो नत्था को। यह पहचान का संकट अकेले ओंकारदास मानिकपुरी का नहीं है बल्कि पहचान का यह संकट हर लोककलाकार के सामने है। इन संकटों में एक बड़ा संकट तो मैं यह देख रहा हंू कि आमिर खान ने पीपली लाइव बनाकर ओंकारदास को नत्था बना कर एक पहचान दिला दी किन्तु अब नत्था उर्फ ओंकारदास को और कितनी फिल्में मिल पाएंगी? कितने फिल्मकारों को नत्था की जरूरत होगी? क्या इनमें से कोई आमिर खान की तरह नत्था का उपयोग कर पाएगा? जवाब भी ओंकारदास के पहचान की तरह गुमनाम है। ओंकारदास पहले लोककलाकार नहीं हैं जिन्हें यह ख्याति मिली। इसके पहले भी और लोक कलाकार हैं जिन्हें यह अवसर मिला किन्तु इसके बाद वे गुमनामी के अंधेरे में डूब गये।
ओंकारदास ने पीपली लाइव में अभिनय कर यह तो जता दिया कि उनमें वे सब खूबियां हैं जो बड़े परदे की जरूरत है किन्तु इस कामयाबी ने ओंकारदास की आंखों में जो सपने जगाये हैं, वह आगे चलकर उसे निराश न कर दें। अपनी कामयाबी से खुश ओंकारदास भिलाई पहुंचने पर बातचीत में कहा है कि थियेटर में तो तंगहाली के दिन है। अब वह बच्चों को अच्छे से पढ़ा सकेगा। एक पिता होने के नाते यह चिंता जायज है किन्तु क्या उसे इस बात का वायदा मिला है कि आगे भी उन्हें फिल्में मिलेंगी? यदि ऐसा है तो यह बहुत बढ़िया खबर है और नहीं है तो चिंता की बात।

इन संकटों के बीच मुझे लगता है कि इन लोककलाकारों को एक किस्म के चरित्र में कैद रहने के बजाय फिल्म की हर वो खूबी सीखने की कोशिश करनी चाहिए ताकि फिल्मों में उनका भविष्य सुरक्षित हो सके। नत्था किसान बार बार दोहराया नहीं जाएगा लेकिन किसान के रूप में, मजदूर के रूप में, एक आम आदमी के रूप में ये कलाकार चरित्र अभिनेता बन सकते हैं इस दिशा में इन्हें कोशिश करनी चाहिए। फिल्म वालों को भी इस तरफ ध्यान देना चाहिए ताकि ओंकारदास मानिकपुरी ओंकारदास बना रहे, नत्था बन कर गुम न हो जाए।



मंगलवार, 3 अगस्त 2010

vivad

स्त्री के लिये कानून नहीं, मन साफ करें

-मनोज कुमार

केन्द्र सरकार के रवैये पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार की खबरें अभी धुंधली भी नहीं हुई थी कि एक और महाशय ने महिलाओं के प्रति अभद्र बयान दे डाला। हालांकि दो दिन बाद उन्होंने अपने बयान के लिये सफाई दी और माफी भी मांग ली। क्या इन महाशय के माफी मांग लेेने से समूची महिला समाज आहत हुई हैं, उनके जख्म पर मरहम लग जाएगा? मुझे तो नहीं लगता कि ऐसा हो पायेगा। इस पूरे मामले से एक बात यह जरूर साफ हो गई है कि स्त्री की स्वाधीनता के लिये हम चाहे जितना कानून बनाये, बंदिशें लगायें, इसके पहले हमारा मन साफ करना होगा। मन के भीतर जो रचा बसा है, वह दूर नहीं हो सका तो कानून केवल कागज में कैद हो कर रह जाएंगे। स्त्री के सम्मान के खिलाफ यह पहली बार नहीं बोला गया है। बार बार और हर बार किसी न किसी बहाने स्त्री को टारगेट पर रखा जाता है। यदि स्त्री चरित्रहीन है तो उसे ऐसा बनाने वाले तो हमारा पुरूष समाज ही है जो अपनी स्वार्थ की पूर्ति के लिये भेड़िये की तरह तरह तरह की साजिश करता रहता है।

राजनीति के मंचों पर पचास फीसदी आरक्षण देने से उनके अधिकारों की रक्षा तो हो जाएगी किन्तु जब स्त्री ही सुरक्षित नहीं रहेगी तो उनकी रक्षा कोैन करेगा। पेट के लिये अनाज की जरूरत होती है न कि अनाज के लिये पेट की जरूरत। कानून स्त्री की रक्षा करने के लिये बनता है और जब स्त्री ही नहीं बचेगी तो कानून किसके काम आएगा। उच्च पदों पर आसीन लोगों को बोलने से पहले अपने आप में मंथन करना होगा कि उनके बोलने का अभिप्राय क्या है और इसका असर पूरे समाज पर क्या होगा। चरित्र और नैतिकता की बातें करने वाले लोग जब अपनी सीमा लांघ जाते हैं तो इस तरह की समस्या उठ खड़ी होती है। यह बात भी तय है कि थोड़ा समय गुजर जाने के बाद लोग भूल जाएंगे किन्तु क्या इतिहास इस बात को विस्मृत कर पाएगा? क्या ऐसे बयान देेने वाले अपने आपको माफ कर पाएंगे? उन्हें तो न बोलने का मलाल है और न माफी मांगने पर शर्म।

इस पूरे संदर्भ में लगभग अनुचित किस्म की ही सही, शिकायत है कि मीडिया में ऐसे लोगों को स्थान नहंीं दिया जाना चाहिए। यह बात सही है कि मीडिया में ऐसे लोगों की करतूतांे को स्थान नहीं दिया गया तो लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि बड़ी बड़ी कुर्सियों पर बैठने वाले महानुभाव अपनी ही जननी अर्थात किसी भी स्त्री के बारे में कितने उम्दा खयाल रखते हैं। इसके बावजूद ऐसे बेहूदे बयान को उसकी हैसियत के अनुरूप् स्थान दिया जाना चाहिए। बल्कि इससे एक कदम आगे यह कि आने वाले दिनों में मीडिया में ऐसे लोगों को ब्लेकलिस्ट कर दिया जाना चाहिए और उनके नाम को, काम को कहीं भी स्थान नहीं दिया जाए। इस बात से किसी को इंकार नहीं होगा कि मीडिया अगर इन्हें स्थान न दे ंतो शायद कोई इन्हें जानें तक नहीं इसलिये ऐसे लोगों के खिलाफ मीडिया का रूख कठोर होना चाहिए।

सोमवार, 2 अगस्त 2010

RTI Aur Hum

आरटीआई का उपयोग और आपकी छवि

-मनोज कुमार

सूचना का अधिकार कानून का यदि आप उपयोग नहीं करते हैं तो समझ लीजिये कि आप इस संसार के सबसे अच्छे लोगों में हैं और इसका उपयोग करते हैं तो आप उन लोगों के बीच खलनायक के तौर पर माने जाएंगे जिनका आपके हस्तक्षेप से कुछ नुकसान होने की आशंका है। पहले तो आपको समझाया जाएगा कि आप भले आदमी हैं। आपकी ऐसी छवि नहीं है और जब आप इन बातों में नहीं आएंगे तो वे कहेंगे आखिर आप भी वैसे ही निकले। लब्बोलुआब यह है सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने वाले किसी भी उस व्यक्ति की जो आमतौर पर किसी विवादों में नहीं पड़ता है। मुझे पता नहीं कि आपने आरटीआई अर्थात सूचना के अधिकार के तहत कोई जानकारी मांगने का कभी कोई प्रयास किया या नहीं और यदि इस कानून का उपयोग आप कर रहे हैं तो आपके अनुभव की भी मुझे कोई जानकारी नहीं। इस मामले में मैं अपना अनुभव जरूर आज आपसे बांटना चाहूंगा।

आरटीआई है क्या, यह तो अब लोगों, खासतौर पर इलिट क्लास को बताने की जरूरत नहीं है। इसका उपयोग कहां और कैसे करना, यह भी उन्हें मालूम है और यह भी कि इसके उपयोग से उनके हितों पर क्या असर पड़ सकता है। कभी इस कानून का सच जानना है तो आप सीधे न सही, उस व्यक्ति के कान में फुसफुसा दीजिये कि आप फलां जानकारी के लिये सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने जा रहे हैं। यकिन मानिये, ऐसा करने से वे आपको रोकेंगे तो बिलकुल भी नहीं लेकिन आपको नेक सलाह दी जाएगी...कहां आप झंझट में पड़ रहे हैं। आपकी छवि ऐसी नहीं है। देख लेते हैं कि रास्ता कहां से निकल सकता है। मुझे एकाधि बार ऐसे अनुभव से गुजरना पड़ा है।

मैं नहीं जानता कि ऐसे सलाह देने वाले मेरे दोस्त हैं या दुश्मन लेकिन उन्होंने मेरे अधिकार का हनन जरूर किया है अथवा कर रहे हैं, यह मेरा मानना है। जब वे कहते हैं कि आपकी छवि ऐसी नहीं है तो मुझे लगता है कि सूचना के अधिकार के तहत मैं जानकारी मांगने गया तो इलिट वर्ग में कुख्यात हो जाऊंगा। जो लोग आरटीआई का उपयोग कर रहे हैं, लगभग हर आदमी को इसी नजर से देखा जाता है। सवाल यह है कि इस कानून के उपयोग से इतना डर क्यों? क्यों कानून के उपयोग से रोका जाता है? क्या इस कानून के तहत मांगी गई जानकारी से पोल खुल जाती है? इन सभी सवालों का जवाब हां में होगा क्योंकि डर इस बात का है कि आपके द्वारा मांगी गयी जानकारी उन तमाम गलत फैसलों और उन निहित स्वार्थों को सामने ले आएगी जो वे छिपाना चाहते हैं। यह भी सच है कि आरटीआई ने जानकारी छिपाने वालों की नींद उड़ा दी है। शायद यही कारण है कि आरटीआई का उपयोग करने वालों को लगभग असामाजिक तत्व मान लिया गया है। मध्यप्रदेश में नहीं किन्तु किसी अन्य राज्य में इस कानून का उपयोग करने वाले किसी एक्टिविस्ट को मौत के घाट उतार दिया गया है। मध्यप्रदेश इस मामले में अभी भीरू है लेकिन ये भीरू कब वीरता का परिचय दे बैंठेंगे, कहा नहीं जा सकता।

सूचना के अधिकार का डर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है क्योंकि इस अधिकार का उपयोग करने पर रोक तो नहीं है किन्तु जानकारी देने का अर्थ छिपी बातों को उजागर करना है। यह उनकी स्वेच्छारिता से नहीं, बल्कि कानून के डंडे के डर से हो रहा है। शायद यही वजह है कि पहले पहल तो हरसंभव कोशिश की जाती है कि किसी भी तरह से इस कानून का उपयोग नहीं किया जाए और किया गया तो उपयोगकर्ता को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यहां तक कि उसके साथ बैठने में भी परहेज किया जा रहा है जबकि कल तक उसी के साथ बैठने में यही लोग गर्व का अनुभव करते थे। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने का नागरिक हक संविधान में है और इस बारे में हीला-हवाली करने वालों के खिलाफ दंड का प्रावधान भी है। व्यावहारिक रूप् में देखा जाए तो अधिकांश मामलों में टालने का रवैया अख्तियार किया जाता है। यह भी सच है कि कानून का उपयोग करने वालों को पूरी प्रक्रिया पता नहीं होती है और इसका फायदा संबंधित लोग उठाने से नहीं चूकते हैं।

ऐसा भी नहीं है कि सूचना के अधिकार देने में लगभग सभी लोग खुद को बचाना चाह रहे हैं अथवा जानकारी देने से बचने की कोशिश में है। इसका एक पक्ष और भी है जिस पर गौर करना, सोचना और रास्ता निकालने की कोशिश करना चाहिए। नब्बे बल्कि पिचनाबे फीसदी जानकारी छिपायी जा रही है या नहीं दी जा रही है अथवा लेटलतीफ की जा रही है तो यह तंत्र की कमजोरी है किन्तु सूचना के अधिकार के तहत जानकारी चाहने वालों के समक्ष एक बड़ी बाधा उन लोगों से भी है जो निजी हित के लिये इसका उपयोग धड़ल्ले से कर रहे हैं। यह कहना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा है कि कौन सी जानकारी सर्वजनहित के लिये है और कौन सी जानकारी व्यक्तिगत हित अथवा परेशानी खड़ी करने के लिये। ऐसी स्थिति में कई बार आवश्यक होने के बावजूद सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मिल पाना दुष्कर कार्य हो जाता है। सूचना के अधिकार कानून से जुड़े लोगों से बात करने पर यह जानकारी मिलती है उनकी परेशानी का कारण ज्यादतर वे लोग होते हैं जो रंजिशवश जानकारी हासिल करना चाहते हैं। जानकारी उपलब्ध कराना कानूनी दायित्व है किन्तु इस सबमें समय और अर्थ दोनों का बड़ा नुकसान होता है। ये लोग इस बात को मानते हैं कि सही और जनहित से संबंधित जानकारी मांगी जानी चाहिए किन्तु सिर्फ जानकारी के लिये जानकारी मांगने से कई तरह की उलझने पैदा हो रही हैं। पहले से सूचना के तहत जानकारी मांगने वालों की लम्बी लाइन है। जो वास्तव में जनहित में अथवा न्याय पाने की गरज से जानकारी चाहते हैं, उन्हें परेशानी हो रही है। किसी भी विभाग का प्रशासकीय अमला सीमित है और एक जानकारी देने में उस प्रशासकीय अमले का सत्तर फीसद अमला जुट जाता है। मांगी गयी जानकारियों का कहां और किस तरह उपयोग किया जाएगा अथवा किया जा रहा है, इस बारेे में कुछ बातें अस्पष्ट हैं, इस बात का भी खुलासा किया जाना चाहिए।

सूचना के अधिकार के तहत जानकारी नहीं देने के प्रयास में संबंधित लोग नहीं रहते हैं तो कुछ परेशानियां अकारण इस कानून का उपयोग करने वालों से भी हो रही है। हालांकि दूसरा पक्ष शायद बड़ा नहीं है। यदि होता तो बार बार और हर बार सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने की बात से ही अड़चनें पैदा नहीं की जाती। ऊपर जिन पांच फीसदी लोगों का उल्लेख मैंने किया है, वह गैरवाजिब नहीं है किन्तु इन पांच फीसदी लोगों की आड़ लेकर पिचानबे फीसदी लोगों को जानकारी से वंचित किया जा रहा है, यह भी सच है। मुझे लगता है कि इस कानून का उपयोग करने से यदि कोई आपको खलनायक मान कर चलता है तो चले लेकिन आप अपने अधिकार का उपयोग करना नहीं भूलें। इसके लिये यह भी जरूरी है कि आप कानून का अध्ययन कर लें और उन बारीकियों को समझ लें जिससे आपको इस कानून के उपयोग में सुविधा होगी।

jago sathiyo

हम क्यों करें मुफ्त की समाजसेवा

-मनोज कुमार

लगभग एक सप्ताह पहले दिल्ली से आरंभ हो रहे किसी बेवसाइट के संचालक का फोन आया। वे चाहते थे कि मैं उनके लिये लिखूं। साथ ही उनकी मंशा थी कि मेरे ब्लॉग पर लगे आलेख का वे उपयोग करें। पहले पहल तो मुझे उनके आग्रह पर कोई आपत्ति नहीं हुई। मैंने हामी भर दी कि जो आलेख मेरे ब्लाग पर पब्लिश हो चुके हैं, उनका आप उपयोग कर सकते हैं। उन्होंने ऐसा किया भी। बेवसाइट शुरू होने के पहले तक मुझे पता नहीं था कि वे कितने और कैसे लेख का उपयोग करेंगे अथवा कर रहे हैं। इस बीच मैंने फोन करने वाले सज्जन को मेल से संदेश भेजा कि आप चाहें तो केवल आपके लिये आलेख लिखूंगा किन्तु इसके बदले मानदेय की व्यवस्था जरूर चाहूंगा। मेरे इस मेल का जवाब देना जरूरी नहीं समझा। अलबत्ता दो दिन बाद उनका संदेश मिला जिसमें बेबसाइट के आरंभ होने की सूचना थी। वेबसाइट पर जाकर सर्च किया तो पता चला कि मेरे दो आलेख का उपयोग किया गया है। एक आलेख मेरे नाम के साथ और एक आलेख बिना नाम के दिया गया है।

बेवसाइट के आरंभ होने पर बधाई का संदेश तथा एक नया आलेख बेवसाइट के लिये प्रेषित किया। अपनी शिकायत भी मैंने संदेश में भेजा। इस बार उन महाशय का जवाब आया इस सफाई के साथ कि इस वेबसाइट का संचालन कोई समाजसेवी संस्था करती है और जो लेखकों को भुगतान नहीं करती है। महोदय साथ में लिखते हैं कि वे मुझे अंधेरे में नहीं रखना चाहते हैं इसलिये जानकारी दे रहे हैं और साथ में लेख वापस भेज रहे हैं।

आप सोच रहे होंगे कि इस सब रामकहानी का मतलब क्या? आप ठीक सोच रहे हैं। दरअसल मैं अपने साथ हुए इस वाकये के माध्यम से यह बताना चाहता हूं कि बेवसाइट बनाने के लिये, संचालन के लिये तो सबके पास धन है किन्तु लेखकों को देने के लिये उनके पास कौड़ी नहीं है। यह ठीक है कि वे समाजसेवा करें किन्तु हम पत्रकार/लेखकों से मुफ्त की सेवा की उम्मीद क्यों रखते हैं। हमारा जीवन तो लेखन से ही चलता है और हम मुफ्त के चंदन घिसते रहे तो हमारी हालत समझी जा सकती है। बेवसाइट समाजसेवा के लिये है तो विज्ञापन क्यों लिया जा रहा है, उससे होने वाली कमायी आखिर किसके जेब में जा रही है। मैं अपने उन तमाम ब्लॉगर लेखक/पत्रकार साथियों से आग्रह करता हूं कि जो लोग समाजसेवा का दंभ भर रहे हैं, उनके लिये एक लाइन न लिखें। हम मीडिया के लोग हैं और मीडिया के लिये बिना शर्त लिख रहे हैं और लिखते रहेंगे। जिन्हें समाजसेवा का शौक है, वे हमसे कोई उम्मीद न करें।

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...