सोमवार, 2 मई 2011

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प्रेस दिवस पर खास
विकीलीक्स की पत्रकारिता के अर्थ
मनोज कुमार
विकीलीक्स की पत्रकारिता जनसरोकार की न होकर खोजी पत्रकारिता का आधुनिक चेहरा है बिलकुल वैसा ही जैसा कि कुछ साल पहले तहलका का था। विकीलीक्स और तहलका के होने का अर्थ अलग अलग है। तहलका खोजी पत्रकारिता का भारतीय संस्करण है और उसका रिष्ता खोजी होन के साथ साथ जन के सरोकार का भी था। उसके निषाने पर तंत्र और राजनेता, अफसर थे तो इसका अर्थ समाज को दिषा से देने से था किन्तु विकीलीक्स का होने का अर्थ कुछ और ही है। पहला तो यह कि विकीलीक्स हमारी भारतीय पत्रकारिता से बिलकुल अलग है। अचानक उदय हुए इस इंटरनेटिया पत्रकारिता ने कई देषों की नींद उड़ा देने के बाद भारतीय तंत्र को भी भेदने की कोषिष की है। कहना न होगा कि वह कई मायनों में कामयाब भी रहा है। विकीलीक्स की पत्रकारिता पर संदेह नहीं किया जा सकता है और न ही किया जाना चाहिए।
नये माध्यम की पत्रकारिता को मैं पत्रकारिय सरोकार से परे कुछ और खतरे तरफ देखने की कोषिष कर रहा हूं। विकीलीक्स तब चर्चा मंे आया जब उसने अमेरिका के तंत्र को भेदने की कोषिष की और कुछ रहस्य का खुलासा किया। जो खुलासा हुआ था उसमें भारत के साथ अमेरिका की दोमुंही नीति की बातें भी थीं। स्वाभाविक है कि इस खुलासे ने हर भारतीय मन को खुष किया। खुष होने लायक खुलासा था। यही विकीलीक्स भारत के तंत्र को भी भेदना षुरू किया। विकीलीक्स के खुलासे को लेकर भारतीय राजनीति दो भागों में बंट गयी है। जिनके खिलाफ मामला है, वे परेषान हैं और जिनके खिलाफ नहीं है, वे विकीलीक्स के पैरोकार बने हुए हैं। भारत जिस तेजी के साथ विष्व पटल पर छा गया है, उससे उसके विरोधियों की संख्या बढ़ रही है। भारत के पुराने दुष्मनों से तो पूरी दुनिया वाकिफ है। ऐसे में यह सवाल उपजना स्वाभाविक है कि कहीं कोई विकीलीक्स को औजार बनाकर हमारे तंत्र को नुकसान पहुंचाने की कोषिष तो नहीं कर रहा है। इस संदेह की पड़ताल करना चाहिए। 
ऐसे में यह अंदेषा सहज और स्वाभाविक है कि क्या विकीलीक्स का उद्देष्य महज पत्रकारिता है अथवा उनके साथ किसी और का हाथ है जो हमारी अस्मिता पर आंच लगते देखना चाहते हैं। यह बेहद दुखदायी है कि भारतीय मीडिया विकीलीक्स को हाथोंहाथ ले रही है। उसके खुलासे को खबर बनाकर छाप रही है। हमें यह याद रखना चाहिए कि खोजी पत्रकारिता में भारतीय पत्रकारिता ने हमेषा से अपना झंडा फहराया है किन्तु उसने कभी दूसरे देषों के तंत्र को न भेदने की कोषिष की है और न हस्तक्षेप की। याद रहे कि बोफोर्स घोटाला तकरीबन पच्चीस बरस बाद भी गूंज रहा है तो इसका श्रेय पत्रकार अरूण षौरी को जाता है। यह तो खोजी पत्रकारिता का एक नमूना है। यह एक ऐसा मामला था जिसका रिष्ता दूसरे देषों से भी था किन्तु भारत ने बोफोर्स को छोड़कर दूसरे मामलों में दखल नहीं दिया।
विकीलीक्स की पत्रकारिता को सपोर्ट करते हमारे लोगों को देखकर ऐसा लगता है कि सबने मान लिया कि वो जो कुछ बता रहा है, लिख रहा है, सत्य है और इसके अलावा बाकि सत्य से परे है। आखिर हम विदेषियों से इतना मोहित क्यों रहते हैं। अब तक षिक्षा और फैषन की बात थी तो किसी तरह पचा लिया गया किन्तु अब जब पत्रकारिता की बात है तो कम से कम मुझे यह हजम नहीं होगा कि कोई विदेषी हमारी धरती पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराये। विकीलीक्स के संस्थापक असांजे का एक बयान आया है कि उनका मकसद किसी सरकार को अस्थिर करना नहीं है बल्कि वह लोगों को न्याय दिलाना चाहते हैं। मेरा मानना है कि भारतीय मीडिया के पास इतनी ताकत है किवह अपने देष और देषवासियों की हितों की रक्षा के लिये अपनी कलम पैनी कर सके। विकीलीक्स को यह समझ लेना चाहिए कि यह वही भारत है जिसकी पत्रकारिता ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिये मजबूर कर दिया था। आजाद हिन्दुस्तान में जो लोग करप्ट हैं, उन्हें ठीक करना भी भारतीय पत्रकारिता को आता है। स्टिंग ऑपरेषन को लेकर विमत होना एक दूसरा मुद्दा हो सकता है किन्तु पत्रकारिता के इस नये औजार ने गड़बड़ियों की नींद हराम कर दी थी। विकीलीक्स की पत्रकारिता और भारतीय पत्रकारिता में बहुत अंतर है। हम अपनी खूबी और कमजोरी को खूब पहचानते हैं किन्तु विकीलीक्स हमारे बारे में यह जान ले, कतई जरूरी नहीं। विकीलीक्स ने भारतीय जमीन पर अपनी पत्रकारिता के बीज डाल दिये हैं, यहां तक तो ठीक है किन्तु अब हमें सर्तक रहना होगा क्योंकि भारतीय पत्रकारिता हमेषा से अजेय रही है और बनी रहेगी।

रविवार, 1 मई 2011

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जल संरक्षण और मानवाधिकार
    -मनोज कुमार

    जल ही जीवन है और जीवन की धुरी दायित्व एवं अधिकारों पर टिकी हुई है। प्रकृति का नियम है जीवन है तो मृत्यु निश्चित है। निराशा है तो आशा भी है अर्थात सब कुछ नकरात्मक नहीं है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हम भारतीयों में अधिकार पाने की भावना प्रबल हुई है। इसे अनुचित नहीं कहा जा सकता है किन्तु अधिकारों के साथ दायित्व के प्रति निराशा का भाव सवालिया निशान लगाता है। हम अपने अधिकारों के प्रति सर्तक और सजग हैं किन्तु दायित्व निभाने के समय हम इसकी अपेक्षा दूसरों से करते हैं। इन सब बातों का सीधा संबंध मानवाधिकारों से जुड़ा हुआ है। 
    इस समय मानव की बुनियादी जरूरतों में एक बड़ी जरूरत जल की है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जल पर हम अपना अधिकार जताने से कभी नहीं चूकते हैं किन्तु जल की बचत करने में हमारा रवैया लापरवाही का होता है जिससे हम दूसरे के अधिकारों का हनन करते हैं। जल हमारे लिये जितना जरूरी है उतना ही जरूरी इस पृथ्वी पर निवास करने वाले दूसरे मानव के लिये भी है। अनुभव यह बताता है कि हम अपनी जरूरत पूर्ति हो जाने के बाद दूसरों की जरूरतों को नजरअंदाज कर देते हैं। एक मानव का दूसरे मानव के प्रति यह व्यवहार मानवाधिकार हनन की श्रेणी में आता है।
    ग्रीष्म ऋतु के आरंभ होने के साथ ही जल संकट अपने पांव पसारने लगता है। बहुत ज्यादा तो नहीं किन्तु बीते डेढ़ दशक से इस बात की चेतावनी दी जा रही है कि अब जो वि·ा युद्ध होगा वह पानी के लिये होगा। इस चेतावनी को गंभीरता के साथ लिया जाना चाहिए। वि·ा युद्ध की चेतावनी निर्मूल साबित हो, यह हमारी कामना और कोशिश होगी किन्तु जो हालात स्थानीय स्तर पर बन रहा है उसके चलते भविष्य संकट भरा दिखता है। पानी न मिलने के कारण आपसी विवाद और इस विवाद के चलते आत्मघाती रास्ते अपनाये जा रहे हैं। एक दूसरे पर सांघातिक वार और कई बार तो जान लेने की नौबत आ जाती है। हाल ही में भोपाल की अदालत ने एक ऐसा ही फैसला दिया है जिसमें बीते वर्ष पानी के विवाद को लेकर हत्या हुई थी जिसमें आरोपियों को आजन्म कारावास की सजा सुनायी गयी।
    यह घटनाएं कानून की नजर में अपराध हैं। आज नगर, जिला, प्रदेश के स्तर पर पानी को लेकर विवाद जारी हैं। इस संदर्भ में यह याद कर लेना चाहिए कि पानी के बंटवारे को लेकर हमारे ही देश के राज्यों के बीच तनातनी का माहौल बना हुआ है। एक देश के ही लोग पानी पर अपना अपना अधिकार जता रहे हैं। अलग अलग मंचों पर समस्या का हल तलाशने का प्रयास जारी है किन्तु यही समस्या आने वाले दिनों में विकराल होने से इंकार करना मुश्किल होगा। देश की सीमा से पार भी पानी के लिये विवाद की स्थिति बनी हुई है और यही विवाद एक दिन वि·ा युद्ध में बदल जाए तो चेतावनी का सच हम सहजता से देख सकते हैं। पानी के लिये स्थानीय विवाद अथवा प्रादेशिक तनाव या कि वि·ा युद्ध एक शिक्षित समाज के लिये कलंक है क्योंकि हमने शिक्षा तो ली किन्तु हमारी शिक्षा अक्षर ज्ञान तक सीमित रह गयी। शिक्षा का अर्थ जागृत होना होता है और जलसंकट को लेकर समूची दुनिया को जागृत होना होगा।
    जलसंकट को लेकर मानवाधिकार हनन की शिकायतें बढ़ रही हैं तो हमारी परम्परा भी संकट में है। अतिथि के घर आने पर सबसे पहले स्वागत जल पिलाकर ही किया जाता था किन्तु अब इसमें कमी दिखायी दे रही है। सेवाभावी संस्थाएं मुसाफिरों के लिये  एकाध किलोमीटर के भीतर कम से कम दो सार्वजनिक प्याऊ का निर्माण करती थी। दूर-दराज से काम की तलाश में आये लोगों-व्यापारियों को भीषण गर्मी में शीतल जल पाकर राहत का अहसास होता था। बीते एक दशक में यह परम्परा टूटती नजर आ रही है। आहिस्ता-आहिस्ता प्याऊ की संख्या में कमी होती जा रही है। प्याऊ की संख्या घटने के पीछे एकमात्र कारण जलसंकट है। पानी की कमी के चलते प्याऊ बंद होते जा रहे हैं। परम्परा के इस क्षरण ने पानी के व्यवसाय को बढ़ाया है। शुद्धता का दावा करती बोतल बंद पानी अब लोग मोल देकर चुका रहे हैं। पानी मानव की बुनियादी जरूरत है और इस पर उसका अधिकार है किन्तु पानी के लिये कीमत चुकाना मानवाधिकार हनन का एक पहलू है। परम्परा के क्षरण और परम्परा के कारोबार में बदलने की यह मानसिकता भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारों का यह दायित्व बन जाता है कि वह परम्परा को जीवित रखने में सक्रियता दिखायें। जैसा की ठंड के मौसम में अलाव जलाने के लिये सरकार के पास एक अलग बजट होता है तो ग्रीष्मऋतु में बिना कीमत चुकाये हर आधे किलोमीटर की दूरी पर शासकीय प्याऊ संचालित किया जाकर मानवाधिकार को संरक्षित किया जाए।
    जल और मानवाधिकार को एक दूसरी नजर से भी देखने की जरूरत है। मुझे यहां इस बात का उल्लेख करते हुए प्रसन्नता होती है कि जब भोपाल की जीवनदायिनी बड़ा तालाब सूख गया था तब लगातार अथक प्रयास कर लोगों ने उसे पुनजीर्वित कर दिया। यह परम्परा भारतीय समाज की धरोहर है। अधिकारों के साथ दायित्व निभाने की यह कोशिश मानवाधिकार की रक्षा की दिशा में किये गये प्रयास के रूप में रेखांकित किया जाना चाहिए। मेरा मानना है कि राजधानी भोपाल में जब यह परम्परा को जीवित रखने का प्रयास हो सकता है तो इसकी आवाज दूर-दराज के गांव और कस्बो तक पहुंचाने की जरूरत है। हमारी पुरातन परम्परा रही है कि तालाबों और नदियों को जीवित करने के लिये हम श्रमदान करते हैं। आर्थिक रूप से सम्पन्न परिवार धन लगाते हैं और बाकि समाज श्रमदान कर इस प्रयास को सार्थकता प्रदान करता है। परम्परा के साथ अधिकार और दायित्व को संबद्ध कर देखा जाए तो हम पाएंगे कि मानवाधिकार की रक्षा में हम कामयाब हो रहे हैं। बार बार और हर बार मानवाधिकार की रक्षा के लिये सरकार या तंत्र से गुहार करने के बजाय हमें स्वयं होकर पहल करनी होगी। जल की बचत करते हैं, जलरुाोतों का संरक्षण और संवर्धन में पहल करते हैं तो निश्चित रूप से हम मानवाधिकार की रक्षा में पहल करते हैं।

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

aam admi ka neta


एक मई जन्मदिवस पर खास
न रूकने वाले और न कभी थकने वाले बिरजू भइया
-मनोज कुमार
छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय नेताओं की गिनती की जाएगी तो बृजमोहन अग्रवाल का नाम सबसे आगे होगा। उनकी लोकप्रियता जन की लोकप्रियता है। वे छत्तीसगढ़ के अपनी तरह के अकेले राजनेता हैं जिनके दरवाजे आम आदमी के लिये हमेषा से खुले रहे हैं। वे मंत्री हों या विधायक, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है और उन्हें इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता है कि उनसे मिलने वाला उनके  अपने दल का है या विरोधियों का। वे हर किसी से, हर समय दिल से मिलते हैं। मदद के लिये भी उनके दरवाजे खुले होते हैं। बृजमोहन की यह खासियत उनके कॉलेज के दिनों से रही है जब वे कॉलेज की राजनीति करते थे। सत्ता के मखमली रास्तों पर भी चले और कांटे भी चुभे किन्तु जनता ने हमेषा उन्हें हाथों हाथ लिया। वे अविभाजित मध्यप्रदेष में भी मंत्री बने तो स्वतंत्र राज्य छत्तीसगढ़ के सबसे प्रभावषाली मंत्रियों में एक हैं। उनका यह प्रभाव राजनीति नहीं बल्कि आम आदमी की ताकत का प्रभाव है। षायद यही कारण है  िकवे मुख्यमंत्री न होते हुए भी किसी मुख्यमंत्री से कम की ताकत नहीं रखते हैं।
विन्रमता और अनुषासन उन्होंने विरासत में पायी है। भारतीय जनता युवा मोर्चा से अपनी राजनैतिक पारी षुरू करने वाले बृजमोहन की गिनती उन लोगों में की जा सकती है जिन्होंने भाजपा को मध्यप्रदेष एवं छत्तीसगढ़ में पहचान दी। मध्यप्रदेष के वर्तमान मुख्यमंत्री षिवराजसिंह चौहान एवं पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती उनके साथी रहे हैं। आज भी षिवराजसिंह से उनका वही आत्मीय संबंध है जो आरंभिक दिनों में था। उनके इन्हीं प्रयासों का परिणाम कहा जाना चाहिए कि जब मध्यप्रदेष का विभाजन हुआ और छत्तीसगढ़ पृथक राज्य के रूप् में अस्तित्व में आया तो उन्हें छत्तीसगढ़ के नेता के रूप् मंे देखा जाने लगा। छत्तीसगढ़ नब्बे विधानसभा सीटों के साथ बना था। अंकगणित के आधार पर सत्ता कांग्रेस को मिली थी और भाजपा को विपक्ष में बैठना था लिहाजा यह माना गया कि कांग्रेस की नींद हराम करने में बृजमोहन ही सफल होंगे। भाजपा की अंदरूनी राजनीति को यह गंवारा नहीं हुआ। बृजमोहन को नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाये जाने से समर्थकों में आग लग गयी। सबने सीमा तोड़कर प्रदर्षन किया और बात हिंसा तक जा पहुंची। एकात्म परिसर तब आगजनी का षिकार हुआ।
इसका खामियाजा बृजमोहन को ही भुगतना पड़ा और उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। बृजमोहन पार्टी की इस कार्यवाही से निराष तो हुए किन्तु दुखी नहीं हुए। वे पार्टी लाईन का सम्मान करना जानते थे सो संयम रखकर पार्टी हाईकमान तक बात पहुंचायी और अविलम्बन उनका निष्कासन रद्द कर दिया गया किन्तु बृजमोहन किनारे कर दिये गये। तीन साल बाद राज्य में सत्ता की बागडोर कांग्रेस से फिसल कर भाजपा के हाथों में आयी और एक बार फिर हसरत बंधी कि अबकी सत्ता के षीर्ष में बृजमोहन होंगे किन्तु ऐसा नहीं हो सका। बृजमोहन को दूसरे नम्बर पर रखा गया। वे रूचिवान और संस्कारित हैं और उनकी रूचि कला संस्कृति में रही है सो संस्कृति, गृह और पर्यटन विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गयी। छोटी सी चीज को भी बड़ा बना देने की कला बृजमोहन में है सो उन्होंने संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय को महत्वपूर्ण बना दिया।
दषाब्दियों से छत्तीसगढ़ की धर्मस्थली राजिम में बहने वाली नदियों के संगम पर कुंभ की नींव डालने का श्रेय उन्हें ही जाता हैं। अपने प्रयासों को सफल करते हुए उन्होंने देषभर से साधुओं को आमंत्रित किया। दिग्गजों ने लगातार तीन साल तक यहां आकर कुंभ की बुनियादी जरूरतों को समझा और आखिरकार ऐलान कर दिया गया कि राजिम में प्रतिवर्ष कंुभ का आयोजन किया जाएगा। इस कुंभ को अर्धकुंभ का दर्जा दिया गया। पर्यटन के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ में अद्वितीय काम हुआ। अनेक अनुछुये और गुमनाम ऐतिहासिक स्थलों को उकेरा गया। विष्व पर्यटन नक्षे पर उन्हें स्थापित किया गया और एक बड़ा राजस्व देने वाले विभाग के रूप में छत्तीसगढ़ का पर्यटन विभाग स्थापित हो गया। संस्कृति के क्षेत्र में भी उन्होंने कुछ ऐसा ही काम किया।
काम के धुनी बृजमोहन को हमेषा पीछे करने की कोषिषें की जाती रही हैं। एक बार फिर उन्हें हाषिये पर धकेलने की कोषिष हुई जब उनसे गृह मंत्रालय वापस लिया गया। राजनीतिक गलियारों में इसे बृजमोहन के पर काटने की संज्ञा दी गई किन्तु लोगों को यह पता नहीं था कि बृजमोहन सत्ता के लिये नहीं, जनता के लिये बने हैं। सत्ता के लिये न तो वे जनसम्मान खोना चाहेंगे और न ही पार्टी के सामने कोई धर्मसंकट खड़ा करेंगे। उनके इस स्वभाव ने उनका कद और बढ़ा दिया। मुख्यमंत्री से विवाद करने वाले एक अन्य प्रभावषाली मंत्री को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था और विनम्र बृजमोहन ने अपना स्थान और बड़ा कर लिया। राज्य में भाजपा सरकार लोकप्रिय है किन्तु संकटमोचक के रूप में बृजमोहन हमेषा उपस्थित रहे हैं। राज्य में होने वाले उपचुनावों की कमान भाजपा ने बृजमोहन को सौंपी और वे पार्टी के विष्वास पर हमेषा खरा उतरे। स्थानीय निकायों के चुनाव में भी बृजमोहन ने भाजपा को जीत दिलायी।
बिरजू भइया के नाम से मषहूर हर दिल अजीज बृजमोहन अग्रवाल देररात तक काम करते हैं और आम लोगों से मिलने का समय भी यही होता है। वे न थकते हैं और न ही रूकते हैं। उनकी लोकप्रियता का मिसाल इसी बात से जान लीजिये कि छत्तीसगढ़ के किसी भी स्थान पर वे मुख्यअतिथि हों और उनके पहुंचने में देर नहीं बल्कि महादेर भी हो जाए तो लोग उनके आये बिना कार्यक्रम आरंभ नहीं करते हैं। षाम सात बजे होने वाले प्रोग्राम में वे एक बार तो दो बजे रात को पहुंचे तो देखा लोग उनके इंतजार में खड़े हैं। बृजमोहन की यह देरी कार्यक्रम स्थल से काफी दूर रहने के कारण हुई। इस वाकये में सबसे खास बात यह है कि आयोजक और अतिथि दोनों ही तत्पर रहे। मुसीबतजदा लोगों के लिये तो बृजमोहन के ही दरवाजे खुले हैं। खुले हाथों से मदद करना कोई उनसे सीखे। उनकी इसी खासियत की वजह से वे मीडिया के दोस्त कहलाते हैं। मुझे तो लगता है कि उनका जन्म एक मई को इसलिये ही हुआ क्योंकि वे राजनेता न होकर जननेता हैं और जननेता के लिये श्रमजीवी होना जरूरी है। मजदूर दिवस को सार्थक करता है बृजमोहन अग्रवाल का जन्मदिन। आज के समय में ऐसे राजनेता का मिलना दुलर्भ बात है किन्तु हम भाग्यषाली हैं कि हमारे साथ बृजमोहन हैं।


शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

aaj-kal

प्रताड़ना के औजार
मनोज कुमार

स्त्री को प्रताड़ित करने के लिये समाज ने कई तरह के औजार एकत्र कर लिये हैं। उसके जन्म से मृत्यु तक ऐसे अनेक औजार हैं जिन्हें वह समय समय पर रूप बदल बदल कर उपयोग में लाता रहा है। भ्रूण हत्या एक औजार है तो बाल विवाह दूसरा औजार और इससे भी बात न बने तो चरित्रहीन, डायन कहकर स्त्री को मरने के लिये छोड़ दिया जाए। विधवा स्त्री के जीवन का सच और उसके लिये प्रताड़ना का औजार तो पहले से तैयार है। किसी समय, कहीं कहीं आज भी सती नाम से एक औजार उपयोग में आ रहा है। प्रताड़ना के औजार के खिलाफ कागज पर कानून बनते रहे हैं किन्तु सच में औजार अपना काम निर्बाध रूप से कर रहा हैं। लगभग पांच बरस हो गए छत्तीसगढ़ की सरकार ने स्त्री प्रताड़ना के उस औजार को भोथरा करने के लिये टोनही निरोधक कानून बनाया था लेकिन आज भी स्त्री टोनही के नाम पर सार्वजनिक प्रताड़ना का षिकार हो रही हैंं। कहीं कहीं तो नौबत जान देने की आ जाती है। अब राजस्थान सरकार ने इसी औजार को भोथरा करने के लिये डायन कहने, प्रताड़ित करने या ऐसा कुछ करने के लिये कठोर कानून बनाने जा रही है। हम तो उम्मीद कर सकते हैं कि स्त्री प्रताड़ना का यह औजार भोथरा हो जाए किन्तु सच और कागज में एक फर्क होता है बिलकुल वैसे ही जैसा कि बाल विवाह रोकने के लिये षारदा एक्ट अस्तित्व में है किन्तु मानने वाले अदृष्य हैं। हर वर्ष बाल विवाह के नाम पर हजारों बच्चियां बेड़ियों में बांध दी जाती हैं।
भ्रूण हत्या पहले एक रिवाज रहा होगा किन्तु अब यह फैषन में आ गया है। सरकार भू्रण हत्या रोकने के लिये अथक प्रयास कर ले किन्तु बाजार ऐसा नहीं होने देगा। हर साल आंकड़ें आएंगे जिनमें बेटियां गुमनाम होती जाएंगी। सरकार ने लिंग परीक्षण पर रोक लगा दिया है तो बाजार ने एक छोटा सा हथियार ईजाद कर दिया है जिसके जरिये युवती यह जान लेगी कि वह गर्भवती है कि नहीं। लिंग परीक्षण की नौबत ही नहीं आने दी जाएगी। इस तरह सरकार का कानून भी नहीं टूट रहा है और भ्रूण हत्या भी जारी है। इस साजिष के खिलाफ सरकार कब आएगी? स्त्री प्रताड़ना का यह नया औजार फैषनपरस्त समाज को भा रहा है। नैतिकता की बातें आले में रख दी गई हैं। उसे कई झंझटों से मुक्ति और मुक्त जीवन का अहसास हो रहा है। स्त्री प्रताड़ना के इस नये औजार के बारे में सरकार फिर कभी कोई कानून बनाएगी, इसके पहले हमें ही जागना होगा। नहीं जागे तो बेटियों की गुम होती हंसी हमारी नींद ले उड़ेगी। समय रहते चेत जाने में ही हमारी भलाई है।
मैं इस बात को लेकर हैरान भी हूं और परेषान भी कि आखिर स्त्री प्रताड़ना के औजार बनाने वाले कितने षातिर दिमाग के हैं। उनकी षैतानी दिमाग में कभी यह सवाल नहीं उपजा कि बेटियां कम हो जाएंगी तो उन्हें राखी बांधने वाला कौन होगा? यह सवाल भी बाद का है पहले तो लोरी सुनाने वाली अम्मां ही नहीं रहेगी तो लोरी सुनने वाला कहां से आएगा? भीड़ में गुम होते ये सवाल आज हमारे सामने यक्ष प्रष्न बन कर खड़ा है। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूं कि समाज में पुरूष को कब टोनही या डायन कह कर बुलाया जाएगा या फिर कब उसे सता होने का गौरव प्राप्त होगा। अभी तो सवाल यही है  िकइस बार अक्षय तृतीया पर कितने मासूमों को ब्याह की बेड़ियों में जकड़ा जाएगा।

रविवार, 24 अप्रैल 2011

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भ्रष्टाचार की जड और उसका इलाज
-मनोज कुमार

अभी एक दो दिन में खबर पढ़ रहा था कि जायज काम के लिये रिष्वत देना गलत नहीं है। अन्ना साहेब के अभियान को इस खबर से ठेस पहुंची होगी। यह स्वाभाविक भी है किन्तु सवाल यह है कि भ्रष्टाचार की जड़ में क्या है? क्यों भ्रष्टाचार का हम इलाज नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं? भ्रष्टाचारियों को मारना या उन पर नियंत्रण पाना उतना मुष्किल नहीं है जितना कि भ्रष्टाचार के कारणों को ढूंढ़ना। हमारे देष में लाखों की संख्या में मौत इसलिये नहीं होती है कि उन्हें इलाज नहीं मिल पाया बल्कि मौतों का कारण उसकी बीमारी का समय रहते पता नहीं लग पाना होता है। अन्ना साहेब को और हमसब को इस दिषा में प्रयास करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार की जड़ को ढूंढ़ने का समवेत प्रयास करें।
मध्यप्रदेष में भ्रष्टाचार की जड़ को पहचााने की कोषिष की गई है और फकत सात महीनों में इसकेे परिणाम देखने को भी मिल रहे हैं। राज्य सरकार ने सात महीने पहले लोक सेवा गारंटी अधिनियम बनाया। यह अधिनियम लोकलुभावनी नहीं है और न ही यह अधिनियम सरकार को सत्ता में बने रहने की गारंटी देता है बल्कि यह आम आदमी के लिये राहत का कानून है। अधिनियम में षासन स्तर पर हर काम के लिये समय सीमा दी गई है। इस तयषुदा समयसीमा में काम नहीं करने वाले सेवकों को दंड भुगतना होगा। सात महीने बाद समीक्षा में जो आंकड़ें आये हैं, उन पर भले ही यकिन न किया जाए किन्तु इस बात पर यकिन किया जा सकता है कि लोगों को अधिनियम से राहत तो मिली है। आंकड़ें भरमाने और रिझाने के लिये होते हैं, खासकर तब जब वह सरकारी हों।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि लोकसेवा गारंटी अधिनियम और भ्रष्टाचार की जड़ ढूंढ़ने का आपस में क्या रिष्ता हो सकता है। सीधे न सही, किन्तु दोेनों के बीच गहरा रिष्ता है। समय पर काम नहीं होने के कारण आदमी परेषान हो जाता है और वह कोषिष करता है कि जैसे तैसे लेदेकर अपना काम करवा ले। षासकीय सेवक को भी यह रास्ता आसान लगता है कि समय पर काम नहीं करो तो झकमार कर आम आदमी उसकी हथेली गरम करेगा। जब बाबू स्तर का आदमी काम रोकने और करनेे के एवज में कमाता है तो इसका हिस्सा भी उसे उपर तक देना होता है। यह तंत्र का असली चेहरा है और मध्यप्रदेष सरकार ने इस चेहरे को पहचान लिया था। इसे आप सहज भाषा में ताजा हिन्दी फिल्म दम मारो दम के एएसपी कामथ के रूप में मुख्यमंत्री को और राणे के रूप में बाकि तंत्र को देख सकते हैं।
यहां हम भ्रष्टाचार राडिया के रार वाली नहीं कर रहे हैं बल्कि हम उस छोटे से पौधे की बात कर रहे हैं जो आगे चलकर वटवृक्ष बन जाता है और देष का अधिकांष उर्जा इस वटवृक्ष को उखाड़ने में लग जाता है जिससे हमारा स्वाभाविक विकास का रास्ता अवरूद्ध हो जाता है। आज अन्ना हजारे जैसे सक्रिय भारतीय की ताकत भ्रष्टाचार को हटाने में लगी हुई है तब सहज रूप से यह विचार आना स्वाभाविक है कि असली चेहरा तो यही है। मध्यप्रदेष में लोकसेवा गारंटी योजना सफल हो रही तो इसका अर्थ हुआ कि भ्रष्टाचार पर चोट हो रही है। समय पर काम की गारंटी ही भ्रष्टाचार को रोकने में कामयाब हो सकती है और भ्रष्टाचार के खिलाफ जूझ रहे लोगों को यह बात समझ लेना चाहिए कि चोट कहां करनी है।


शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

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कलम की विनम्रता और पत्रकारिता के संस्कार
मनोज कुमार

साल के दो महीने खास होते हैं जिनमें पहला महीना अप्रेल का होता है। इस महीने पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, पंडित माधवराव सप्रे और राजेन्द्र माथुर के नाम है तो दूसरा महीना मई का है। मई की पहली तारीख श्रमजीवियों के नाम है जिसे हम मजदूर दिवस के नाम पर जानते हैं। इसी महीने की तीन तारीख को प्रेस दिवस है और तीस मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं। ये दोनों महीने बेहद अर्थवान हैं, खासकर पत्रकारिता के लिये। यहां मैं मीडिया षब्द से परहेज करने की कोषिष करूंगा क्योंकि मेरा मानना है कि मीडिया का अर्थ पत्रकारिता से एकदम जुदा है। बहरहाल, हम पत्रकारिता के संदर्भ में बात करेंगे। पत्रकारिता के संदर्भ में दो बातें हैं कि इन दोनों महीनों की तारीख पत्रकारिता के पुरोधाओं से जुड़ी हुई है और इन तारीखों का सीधा संबंध कलम से है। मेरी बातें उलझी उलझी लग सकती हैं किन्तु इस पर जब विस्तार से लिखी गयी मेरी बातों को पढ़ेंगे, मनन करेंगे तो षायद आप भी मुझसे सहमत होंगे।
    दादा माखनलाल की विष्व प्रसिद्व रचना है पुश्प की अभिलाशा। इस कविता में उन्होंने फूल की विन्रमता का बखान किया है और इससे जुड़ी बात कलम की मैं कहता हूं। कलम भी आपको विनम्रता सिखाती है। आप देखेंगे कि आमतौर पर कलम नीचे की तरफ होती है अर्थात वह विनम्र है। पत्रकारिता भी विनम्रता सिखाती है और विनम्र पत्रकारिता ही दुनिया बदलने की ताकत रखती है। तलवार नीचे की तरफ होगी तो वह भीरूपन का परिचायक होगी किन्तु कलम ऊपर की तरफ होगी तो उसकी अकड़ दिखेगी। क्या कलम अकड़ दिखा सकती है? नहीं, कभी नहीं। कलम की प्रकृति रचने की है, सिखाने की है और रचियता हमेषा विनम्र होता है। जो लोग आस्तिक नहीं हैं वे भी इस बात को मानेंगे कि ईष्वर, अल्लाह, ईषु, गुरूनानक किसी ने भी, कहीं भी विनयषील व्यवहार के अलावा कोई सीख नहीं दी है।
जब हम यह मानते हैं कि कलम विन्रम है तो भला हममें विनम्रता क्यों नहीं आना चाहिए। पत्रकारिता का दायित्व समाज के किसी भी दायित्व से बड़ा है। दूसरे दायित्व कम नहीं हो सकते हैं किन्तु उनमें कहीं न कहीं, लाभ की लालसा बनी होती है किन्तु पत्रकारिता में लाभ का कोई लोभ नहीं होता है। पत्रकारिता सहज रूप् से एक सुंदर, विचारवान और विकसित समाज की रचना करने की कोषिष है। कुछ लोग इस बात को हजम नहीं कर पाएंगे कि आज जब चौतरफा पत्रकारिता के व्यवसायिक हो जाने की बात चल रही है, कदाचित प्रमाणित भी हो चुकी है तब मेरा यह कहना केवल काल्पनिक बातें हो सकती हैं। मेरा उन सभी लोगों से आग्रह है कि वे इसे दूसरी नजर से देखें। पत्रकारिता तो आज भी नफा-नुकसान से परे है। आप एक पत्रकार हैं तो आप खबर लिखते हैं समाज के लिये किन्तु जिस कागज पर खबर छपती है वह वस्तु है और वस्तु का सौदा होता है। आपकी लिखी खबर षब्द सत्ता है और इसकी कोई कीमत नहीं होती है। पत्रकार का लाभ इतना ही होता है कि उसे जीवनयापन के लिये वेतन के रूप् में कुछ हजार रुपये मिल जाते हैं। यदि आप और हम पत्रकार नहीं भी होते तो किसी और व्यवसाय में भी यही करते। संभवतः इसलिये ही हमें श्रमजीवि कहा जाता है क्योंकि श्रम ही हमारे जीवन का आधार है। हम सरस्वती के उपासक हैं और हमारी उपासना का माध्यम हमारी कलम है। इस कलम की विन्रमता देखिये कि यदि इसे आप सीधा कर देते हैं तो यह लिखने का उपक्रम रोक देती है किन्तु जैसे ही यह झुकती है, वह नदी के पानी की तरह बहने लगती है। हमारे विचार और कलम की स्याही एक सुंदर अभिव्यक्ति का माध्यम बनते हैं।
मेरा यह विचार महज एक लेख नहीं है बल्कि एक आग्रह है उस युवा पत्रकार पीढ़ी से जो इस महायज्ञ में षामिल तो हो गये हैं किन्तु उन्हंे अपनी ताकत का अहसास नहीं है। वे हर समय भ्रम की स्थिति में रहते हैं। अच्छा लिखना जानते हैं, अच्छा सोचते हैं और अच्छा करने का जज्बा भी उनमें है किन्तु उन्हें इस बात का इल्म नहीं है  िकवे फकीरी के पेषे में आये हैं। वे लिखेंगे तो समाज और देष में षुचिता का निर्माण होगा और उनके इस लिखे से अखबार का मालिक कदाचित मालामाल बनेगा। षुचिता और माल के बीच हमारी नयी पीढी को तय करना होगा कि वे आखिर उनका रास्ता क्या हो? वे माल की तरफ भागें या समाज में षुचिता के लिये जो जवाबदारी उनके कंधों पर है, उसे पूरा करें। इस बात को लिखने में मुझे परहेज नहीं है कि हममे से अनेक दिग्गज पत्रकार भावी पीढ़ी में कलम का संस्कार उत्पन्न करने के बजाय कमाने की संस्कृति पैदा कर रहे हैं। भावी पत्रकारों को इस गफलत में नहीं पड़ना चाहिए। हमें महान पत्रकार दादा माखनलाल की पत्रकारिता को, गांधीजी की पत्रकारिता को स्मरण में रखकर कलम के संस्कार को आगे बढ़ाना है। झुकने का अर्थ समझौता नहीं है बल्कि यह विनम्रता है और पत्रकारिता विनम्रता की पहली सीढ़ी है। पत्रकारिता के अवधूतों के प्रसंग में जो बातें लिखी हैं, वह मेरी भावना है और मेरा विष्वास है कि कलम के संस्कार की पत्रकारिता हमेषा अपनी आभा बिखरेते रहेगी।(लेखक मीडिया एवं सिनेमा की षोध पत्रिका समागम के सम्पादक एवं मीडिया अध्येता हैं।)

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

bachpan bachye

बचपन को ईमानदार बनाना जरूरी

-मनोज कुमार

अन्ना हजारे ने बेइमानों के खिलाफ हल्ला बोल दिया है। देखते ही देखते सैकड़ों लोग उनके मुरीद हो गये हैं। अपनी बात कहने के पहले अन्ना हजारें को मेरा सलाम। इस मुहिम से जुड़े कितने लोगों का यह मालूम है कि वास्तव में भ्रश्टाचार होता क्या है? पहली बात तो यह कि जो लोग अन्ना हजारे के साथ बेइमानों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं अथवा हो गये हैं, उनमें से ऐसे कितने लोग हैं जो राषनकार्ड बनवाने, रेल में आरक्षण पाने, टेलीफोन के बिल पटाने में बचने की कोषिष, बिजली की चोरी या ऐसे ही रोजमर्रा की जरूरत को जल्द से जल्द निपटा लेेने के लिये रिष्वत नहीं दिया है? मेरे खयाल में कुछ प्रतिषत को ऐसे लोग होंगे किन्तु इनकी संख्या मुट़ठी भर होगी और उन लोगों की तादात अधिक होगी जो कहेंगे कि बेइमानी तो अब हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है यानि भ्रश्टाचार को षिश्टाचार मानने और बताने वालों की संख्या अधिक है। क्या हम ऐसा सोचकर अथवा अपना समय बचाने के लिये जो बेइमानी कर रहे हैं, क्या वह इस मिषन के खिलाफ नहीं है।

दरअसल जीवन में बहुत सारी ऐसी गलतियां हम करते हैं और कर रहे हैं जिन्हें हम बेइमानी नहीं मानते हैं। अक्सर यह बात कही जाती है कि फलां अफसर बेहतरीन काम करता है। क्या किसी के पास जवाब है कि एक सरकारी मुलाजिम, भले ही वह अफसर क्यों न हो, सरकार खराब काम करने का वेतन देती है? जवाब ना में होगा तो फिर भला हम क्यों इनकी तारीफ के पुल बांधे? हमें इस बात का इल्म भी नहीं होता है कि एक आदमी की तारीफ करने से दूसरे अनेक लोगों में हीनभावना घरकर आती है जिससे पूरा तंत्र प्रभावित होता है और कदाचित बेइमानी की षुरूआत यहीं कहीं से होती है। सिर्फ पैसा लेना ही भ्रश्टाचार नहीं है बल्कि इसकी कहानी एक बड़े केनवास पर है।

जनलोकपाल बनना चाहिए और सरकार के साथ साथ पूरे देष को इसके लिये पहल करनी चाहिए किन्तु यह जनलोकपाल कागजी घोड़ा न बन कर रह जाए। मध्यप्रदेष में लोकसेवा गारंटी अधिनियम लागू है। काम की समय-सीमा भी सरकार ने तय कर दी है किन्तु वास्तव में क्या ऐसा हो रहा है? इस बात की पड़ताल की जानी चाहिए। सरकार ने ऐलान कर दिया कि षासकीय सेवकों को भ्रश्टाचार के लिये दंडित किया जाएगा किन्तु आज तक कितने ऐसे भ्रश्टों को सजा मिली है, सरकार बताने की स्थिति में नहीं है। छापे डल रहे हैं, माल निकल रहा है और एक नया भ्रश्ट बाहर आ रहा है किन्तु जांच पर जांच और तारीखों पर तारीख के चलते मामला जस का तस बना हुआ है। सरकार कह सकती है कि हम बेइमानों को पकड़ने की कोषिष कर रहे हैं किन्तु दंड तो तभी मिलेगा जब अपराध साबित होगा।

मेरी अपनी निजी सोच यही है कि अन्ना हजारे जैसे इस देष में सौ-पचास नहीं बल्कि लाखों की संख्या में ईमानदार लोग हैं जिनके लिये पैसे से बढ़कर वतन है। ऐसे लोगों को सामने लाइये और लोगों के लिये उन्हें रोल मॉडल के तौर पर प्रस्तुत कीजिये। आज की पीढ़ी तो भ्रश्टाचार में डूब चुकी है। बचाना है तो भविश्य को बचाइए। बचपन को बचाइए। उन्हें सिखायें कि ईमानदारी का फल क्या होता है। हर पिता, हर माता अपने बच्चों को नेक कथायें पढ़ायें और उनमें संयम उत्पन्न करें। धीरज रखना सिखायें न कि काम निकालने के लिये रिष्वत देकर समय बचाने की आदत डालें। उन्हें लोभ और लालच से बचायें। बच्चों को बचा लिया तो आप यकिन मानिये कि हमारा आने वाला कल बेइमान नहीं होगा। एक अन्ना हजारे के सामने आने से देष का भला नहीं होने वाला और न ही बेइमानों का पत्ता साफ होगा। यह कांेषिष जारी रहना चाहिए लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है बचपन को बचाना। बचपन बचा लिया तो मान लीजिये कि भ्रश्टाचार की जंग आपने जीत ली है।

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