गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

उधार के सपने


मनोज कुमार
बैंक के भीतर जाना मेरे लिए आसान नहीं होता है। एक साहस का काम है और साहस जुटाकर जैसे ही मैंने बैेंक के दरवाजे पर पैर रखा, वहां कागज पर छपी इबारत सहसा मेरा ध्यान खींचकर ले गई। ‘सपने पूरे करें, किश्तों में मोबाइल लें।’ यानि दूसरे के महंगे मोबाइल की ओर ताकने की जरूरत नहीं। कर्ज देेने वाली इस इबारत में लिखा था कि आप किश्तों में पचास हजार रुपये कीमत की मोबाइल की खरीददारी कर सकते हैं। दीवार पर लगी इबारत ने मुझे भीतर तक हिला दिया था। बेटी के ब्याह के लिए पिता को कर्जदार होते देखा है, खेतों में फसलों के खराब हो जाने से किसानों को कर्जदार होते देखा है, कारोबार बढ़ाने के लिए कर्जदार होते देखा है और यह भी देखा है कि इसमें सबने अपनी सांसों की कीमत पर कर्ज लिया था। कुछ की सांसें टूट गई कर्ज चुकाते चुकाते तो कुछ कर्ज चुकाने के फेर में बिस्तर पकड़ लिया। शायद कर्ज का फर्ज है कि वह आपकी जिंदगी में जोंक की चिपक जाए और खून की आखिरी बूंद भी निचोड़ ले। कर्जदार होना कितना भयावह है और इसी अनुभव के साथ पुराने लोग कहते थे कि एक रोटी कम खा लो लेकिन कर्ज मत लो। ये वही लोग हैं कर्ज लेने वालों के लिए फब्तियां कसते हुए कहते थे कंबल ओढक़र घी पीना।
उस दौर में कर्ज लेने वालों के आंखों में पानी होता था। अब न वो लोग रहे और ना वो बात। बाजार की इस दुनिया में सबकुछ उधार का है। सपने आप पालिये और आपको पालने के लिए उधार एक पांव पर खड़ा है।  सपनों को पूरा करने के लिए ख्रीसे में दाम हो या ना हो, सपने आपके बड़े होने चाहिए, यह बाजार की शर्त है। सवाल यह नहीं है कि बाजार क्या कर रहा है, मेरे मन को तो यह सवाल मथ रहा है कि आखिर हम जा कहां रहे हैं? शादी-ब्याह के लिए कर्ज तो एक मजबूरी है और खेत में अच्छी फसल की आस में किसान कर्जदार बन जाए तो भी मन को मना लिया जाए लेकिन बड़े आलीशान मकान, बड़ी कार और अब मोबाइल जैसे फालूत यंत्र के लिए भी कर्ज? शिक्षा समाज और देश का निर्माण करती है लेकिन उधार की शिक्षा किस तरह देश और समाज का निर्माण करेगी, यह बात मेरी समझ से परे है। रोज-ब-रोज घपले घोटाले की खबरों में इस उधार की शिक्षा की छांह से आप इंकार नहीं कर सकते हैं। कलाम साहब हमारे लिए उदाहरण हैं कि वे अखबार बेचकर संसार के लिए ‘आइकॉन’ बने तो उसी भारत में उधार की शिक्षा कौन सा पाठ पढ़ाती है? क्या जरूरत है कि हमारे बच्चे विदेशों में पढऩे जाएं या फिर अपने ही देश के महंगे कॉलेजों में पढ़ें और क्यों हम अपने बच्चे को उधार की शिक्षा दें? एक ऑटो चालक पिता ने अपनी बेटी को उधार की शिक्षा नहीं दी लेकिन वह अपनी प्रतिभा से आज देश की अफसर बन चुकी है।  
बाजार से लेकर सरकार तक, सभी आमादा हैं कि आप की एक-एक सांस उनकी कर्जदार हो जाए और हम भी इसके लिए तैयार हैं। हम अपने सपनों को छोटा नहीं करते हैं, खर्चो मेें कटौती नहीं करते हैं, अपनी काबिलियत पर हमारा भरोसा ही नहीं रहा। उधार की गाड़ी में बैठकर मन और तन को खराब करना मंजूर है किन्तु सायकल पर चलना हमारी इज्जत को खाक कर देता है। बच्चे महंगी शिक्षा न लें तो उनका भविष्य चौपट है, भले ही सारी जिंदगी उधार की शिक्षा के नीचे दबे रहें। पैर में भले ही टूटी चप्पल हो लेकिन हाथ में महंगा एनराइड मोबाइल का होना जरूरी है। रातों की नींद इस बात को लेकर उड़ी रहे कि इस माह किश्त की अदायगी कैसे होगी लेकिन आलीशान मकान और गाड़ी को छोड़ देने का मतलब सभ्य समाज से बाहर हो जाना हमने मान लिया है। शर्मनाक तो यह है कि नौकरीपेशा से लेकर खेत मजदूर तक के लिए बाजार उधार का जाल बिछाये बैठा है। हर कोई कह रहा है कि उधार के सपने खरीदो। सपने नहीं  देखोगे तो जियोगे कैसे? जीने के लिए जरूरी है आपकी हर सांस पर उधारी चढ़ा हो।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

छत्तीसगढ़ में देवी उपासना के शक्तिपीठ

-अनामिका
नवरात्रि का छत्तीसगढ़ में विशेष महत्व है। प्राचीन काल में देवी के मंदिरों में जवारा बोई जाती थी और अखंड ज्योति कलश प्रज्वलित की जाती थी। यह परम्परा आज भी अनवरत जारी है। ग्रामीणों द्वारा माता सेवा और ब्राह्मणों द्वारा दुर्गा सप्तमी का पाठ और भजन आदि की जाती है। छत्तीसगढ़ में अनादिकाल से शिवोपासना के साथ साथ देवी उपासना भी प्रचलित थी। शक्ति स्वरूपा मां भवानी यहां की अधिष्ठात्री हैं। यहां के सामंतों, राजा-महाराजाओं, जमींदारों आदि की कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित आज श्रद्धा के केंद्र बिंदु हैं। छत्तीसगढ़ में देवियां अनेक रूपों में विराजमान हैं।
छत्तीसगढ़ में शक्ति पीठ और देवियों की स्थापना को लेकर अनेक किंवदंतियां प्रचलित है। देवियों की अनेक चमत्कारी गाथाओं का भी उल्लेख मिलता है। इसमें राजा-महाराजाओं की कुलदेवी द्वारा पथ प्रदर्शन और शक्ति प्रदान करने से लेकर लड़ाई में रक्षा करने तक की किंवदंतियां यहां सुनने को मिलती है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों में रतनपुर, चंद्रपुर, डोंगरगढ़, खल्लारी और दंतेवाड़ा प्रमुख है- रतनपुर में महामाया, चंद्रपुर में चंद्रसेनी, डोंगरगढ़ में बमलेश्वरी और दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी देवी विराजमान हैं वहीं अम्बिकापुर में महामाया और समलेश्वरी देवी विराजित हैं।  ऐसा माना जाता है कि पूरे छत्तीसगढ़ में महामाया और समलेश्वारी देवी का विस्तार अम्बिकापुर से ही हुआ है। शाक्त धर्म में आदि तत्व को मातृ रूप मानने की सामाजिक मान्यता है- उसके अनुसार नारी पूजनीय माने जाने लगी, विशेषत: माताओं और कुवांरी बालिकाओं का शाक्त धर्म में बहुत ऊंचा स्थान है।
यहां प्रमुख रूप से दो देवियां रतनपुर की महामाया और सम्बलपुर की समलेश्वरी देवी पूजी जाती है, शेष देवियां उनकी प्रतिरूप हैं और क्षेत्र विशेष का बोध कराती हैं- इनमें सरगुजा की सरगुजहीन दाई, खरौद की सौराईन दाई, कोरबा की सर्वमंगला देवी, अड़भार की अष्टभूजी देवी, मल्हार की डिडिनेश्वरी देवी, चंद्रपुर की चंद्रसेनी देवी, डोंगरगढ़ की बमलेश्वरी देवी, बलौदा की गंगा मैया, जशपुर की काली माता, मड़वारानी की मड़वारानी दाई प्रमुख हैं।  
गढ़ों के गढ़ छत्तीसगढ़ अनेक देशी राजवंशों के राजाओं की कार्यस्थली रही है। यहां अनेक प्रतापी राजा और महाराजा हुए जो विद्वान, शक्तिशाली, प्रजावत्सल और देवी उपासक थे। यही कारण है कि यहां अनेक मंदिर और शक्तिपीठ उस काल के साक्षी हैं। ये देवियां उनकी कुलदेवी थीं। यहां देवी रियासतों की स्थापना से लेकर उसके उत्थान पतन से जुड़ी अनेक कथाएं पढ़ने और सुनने को मिलती है।
रतनपुर में महामाया देवी का सिर है और उसका धड़ अम्बिकापुर में है।  प्रतिवर्ष वहां मिट्टी का सिर बनाये जाने की बात कही जाती है। इसी प्रकार संबलपुर के राजा द्वारा देवी मां का प्रतिरूप संबलपुर ले जाकर समलेश्वरी देवी के रूप में स्थापित करने की किंवदंती प्रचलित है। समलेश्वरी देवी की भव्यता को देखकर दर्शनार्थी डर जाते थे अत: ऐसी मान्यता है कि देवी मंदिर में पीठे करके प्रतिष्ठित हुई- सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में जितने भी देशी राजा-महाराजा हुए उनकी निष्ठा या तो रतनपुर के राजा या संबलपुर के राजा के प्रति थी- कदाचित मैत्री भाव और अपने राज्य की सुख, समृद्धि और शांति के लिए वहां की देवी की प्रतिमूर्ति अपने राज्य में स्थापित करने किये जो आज लोगों की श्रद्धा के केंद्र हैं।
चंद्रसेनी या चद्रहासिनी देवी सरगुजा से आकर सारंगढ़ और रायगढ़ के बीच महानदी के तट पर विराजित हैं- ऊन्हीं के नाम पर कदाचित चंद्रपुर नाम प्रचलित हुआ। पूर्व में यह एक छोटी जमींदारी थी- चंद्रसेन नामक राजा ने चंद्रपुर नगर बसाकर चंद्रसेनी देवी को विराजित करने की किंवदंती भी प्रचलित है। पहाड़ी में सीढ़ी के दोनों ओर अनेक धार्मिक प्रसंगों का शिल्पांकन है- हनुमान और अर्द्धनारीश्वर की आदमकद प्रतिमा आकर्षण का केंद्र है- रायगढ़, सारंगढ़, चाम्पा, सक्ती में समलेश्वरी देवी की भव्य प्रतिमा है।
बस्तर की कुलदेवी दंतेश्वरी देवी हैं जो यहां के राजा के साथ आंध्र प्रदेश के वारंगल से आयी और शंखिनी डंकनी नदी के बीच में विराजित हुई और बाद में दंतेवाड़ा नगर उनके नाम पर बसायी गयी। बस्तर का राजा नवरात्रि में नौ दिन तक पुजारी के रूप में मंदिर में निवास करते थे। देवी की उनके उपर विशेष कृपा थी। जगदलपुर महल परिसर में भी दंतेश्वरी देवी का एक भव्य मंदिर है। 
छत्तीसगढ़ के ग्राम्यांचलों में देवी को ग्राम देवी कहा जाता है और शादी-ब्याह जैसे शुभ अवसरों पर आदर पूर्वक न्योता देने की प्रथा है- भुखमरी, महामारी, और अकाल को देवी का प्रकोप मानकर ऊनकी पूजा-अर्चना की जाती है- प्राचीन काल में यहां नर बलि दिये जाने का ऊल्लेख प्राचीन साहित्य में मिलता है- आज पशु बलि दिये जाते हैं- बहरहाल, शक्ति संचय असुर और नराधम प्रवृति के नाश के लिये मां भवानी की उपासना आवश्यक है- इससे सुख, शांति और समृद्धि मिलने से इंकार नहीं किया जा सकता। 
लेखिका भोपाल में युवा पत्रकार हैं।

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन भोपाल में सम्पन्न, अगली मुलाकात मॉरीशस में


हिन्दी और भारतीय भाषाओं को तकनीकी के लिए परिवर्तित करना होगा- मोदी
-मनोज कुमार
34 वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद भारत को विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी का अवसर मिला और यह अवसर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के हिस्से में आया। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर कहा भी किसम्मेलन को मध्यप्रदेश और भोपाल में आयोजित करने का कारण बताते हुए कहा कि मध्यप्रदेश हिन्दी के लिये समर्पित राज्य है और भोपाल सफल आयोजन करने के लिये विख्यात है। श्रीमती स्वराज ने विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजनों की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 32 वर्षों बाद यह भारत में आयोजित हो रहा है। पहला सम्मेलन 1975 में नागपुर में हुआ था। तब से भोपाल के दसवें सम्मेलन तक आयोजन का स्वरूप बदला है। पहले के सम्मेलन साहित्य केन्द्रित थे लेकिन दसवाँ सम्मेलन भाषा की उन्नति पर केन्द्रित है। उन्होंने कहा कि भाषा की उन्नति के लिये संवर्धन ही नहीं संरक्षण की भी जरूरत पड़ रही है। 
दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में उद्घाटन भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि- भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। भाषा हर किसी को जोडऩे वाली होना चाहिए। हर भारतीय भाषा अमूल्य है। भाषा की ताकत का अंदाजा उसके लुप्त होने के बाद होता है। हिन्दी भाषा का आंदोलन देश में ऐसे महापुरूषों ने चलाया जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी, यह प्रेरणा देता है। भाषा और लिपि की ताकत अलग-अलग होती है। देश की सारी भाषाएँ नागरी लिपि में लिखने का आंदोलन यदि प्रभावी हुआ होता तो लिपि राष्ट्रीय एकता की ताकत के रूप में उभर कर आती हैं। यह बात आज दुनिया के अलग-अलग देशों में हिन्दी का महत्व बढ़ रहा है। भारतीय फिल्मों ने भी दुनिया में हिन्दी को पहुँचाने का कार्य किया है। डिजिटल दुनिया ने हमारे जीवन में गहरे तक प्रवेश कर लिया है। हमें हिन्दी और भारतीय भाषाओं को तकनीकी के लिए परिवर्तित करना होगा। बदले हुए तकनीकी परिदृश्य में भाषा का बड़ा बाजार बनने वाला है। उन्होंने विश्वास जताया कि विश्व हिन्दी सम्मेलन के माध्यम से हिन्दी को समृद्ध बनाने की पहल होगी और निश्चित परिणाम निकलेंगे।
बारह विषय के विमर्श प्रतिवेदन हुए प्रस्तुत : तीन दिवसीय दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में 12 विषय पर समानांतर सत्रों में विमर्श किया गया। इनमें आयी अनुशंसाओं को सत्रों के संयोजकों ने समापन अवसर पर प्रस्तुत किया। जिन विषय पर विद्वानों और हिन्दी-प्रेमियों ने विमर्श किया वो इस प्रकार है- गिरमिटिया देशों में हिन्दी, विदेशों में हिन्दी शिक्षण- समस्याएँ और समाधान, विदेशियों के लिए भारत में हिन्दी अध्ययन की सुविधा, अन्य भाषा राज्यों में हिन्दी, विदेश नीति में हिन्दी, प्रशासन में हिन्दी, विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी, संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी, विधि एवं न्याय क्षेत्र में हिन्दी और भारतीय भाषाएँ, बाल साहित्य में हिन्दी, हिन्दी पत्रकारिता और संचार माध्यमों में भाषा की शुद्धता, देश और विदेश में प्रकाशन : समस्याएँ एवं समाधान, शामिल हैं।
10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि हिन्दी भारत की राजभाषा के साथ संपर्क भाषा भी है। भारत की संस्कृति और जीवन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा हिन्दी है।  गृह मंत्री श्री सिंह ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा में हिन्दी शामिल होना चाहिये। जब अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के लिये दुनिया के 177 देश का समर्थन प्राप्त किया जा सकता है तो हिन्दी के लिये क्यों नहीं? हिन्दी दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा में से एक है। टेक्नालॉजी कंपनियों ने हिन्दी के महत्व को समझा है और वे इसे बढ़ावा दे रही हैं। इंटरनेट पर जिस भाषा में सबसे अधिक कंटेंट जनरेट होता है वह भाषा हिन्दी है। भारत में बोली जाने वाली सबसे पुरानी भाषा तमिल है और राष्ट्रीय स्तर पर मातृ भाषा संस्कृत है। 
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सम्मेलन से हिन्दी के प्रति सकारात्मक वातावरण बना है। श्री चौहान ने कहा कि हिन्दी को प्रोत्साहित करने और बढ़ावा देने के लिए मध्यप्रदेश सरकार समाज के साथ मिलकर हरसंभव प्रयास करेगी। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी बोलने वाले को श्रेष्ठ समझने की मानसिकता को बदलना होगा। उन्होंने कहा कि हमारे देश की संस्कृति और हिन्दी भाषा का गौरवपूर्ण इतिहास है। हिन्दी बोलने से सम्मान कम नहीं होता बल्कि और बढ़ता है। उन्होंने कहा कि सम्मेलन की अनुशंसाओं पर भारत सरकार आवश्यक कार्रवाई करेगी। मध्यप्रदेश सरकार अपने स्तर पर हिन्दी को प्रोत्साहित करने के ठोस कदम उठाएगी। उन्होंने हिन्दी को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए घोषणा की कि प्रदेश में राजभाषा विभाग को पुनर्जीवित किया जाएगा। प्रदेश में उपभोक्ता वस्तुओं का नाम हिन्दी में लिखा जाएगा। कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर हिन्दी में बनाए जाएँगे और शासकीय विज्ञापन हिन्दी में जारी किए जाएँगे। उन्होंने घोषणा की कि अटल बिहारी हिन्दी विश्वविद्यालय को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का संस्थान बनाया जाएगा। हिन्दी का उपयोग करना मानव अधिकार माना जाएगा। उच्च न्यायालयों के निर्णय हिन्दी में उपलब्ध करवाने के लिए अनुवादक नियुक्त किए जाएँगे। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को परस्पर ग्रहण किया जाएगा। जहाँ पर अँग्रेजी लिखना जरूरी होगा वहाँ हिन्दी में प्रमुखता से लिखा जाएगा। मध्यप्रदेश के सभी संस्थानों के नाम हिन्दी में लिखे जाएँगे। किसी अधिकारी-कर्मचारी के विरुद्ध हिन्दी में बोलने एवं काम करने पर निलंबन जैसी कार्रवाई नहीं की जाएगी। शासकीय पत्राचार हिन्दी में किया जाएगा। तकनीकी प्राक्कलन हिन्दी में बनाए जाएँगे। मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव एवं सभी विभागाध्यक्ष हिन्दी का प्रयोग करेंगे। प्रदेश में सभी प्रतियोगी परीक्षाएँ हिन्दी माध्यम में होगी। विधि अनुवादकों की नियुक्ति की जाएगी। हिन्दी अधिकारी नियुक्त किए जाएँगे। प्रदेश में हर वर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस आयोजित किया जाएगा। हिन्दी को प्रोत्साहित करने वाले व्यक्तियों को हिन्दी दिवस पर सम्मानित किया जाएगा। गैर हिन्दीभाषी अधिकारियों को हिन्दी का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रदेश में सभी सूचनाएँ और अधिसूचनाएँ हिन्दी में जारी की जाएँगी।
केन्द्रीय विदेश राज्य मंत्री जनरल डॉ. वी.के.सिंह ने प्रस्तावित किया कि विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्राप्त अनुशंसाओं के लिये विदेश मंत्रालय स्तर पर एक विशेष समीक्षा समिति गठित की जाएगी यह अनुशंसाओं को विभिन्न मंत्रालयों को अग्रेषित करेगी। वर्ष 2018 में 11वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन मॉरिशस में होगा। उनके इन दोनों प्रस्ताव को सम्मेलन में अनुमोदित किया गया। सांसद एवं आयोजन समिति के उपाध्यक्ष अनिल माधव दवे ने प्रख्यात अभिनेता अमिताभ बच्चन की अनुपस्थिति में उनके द्वारा प्रेषित पत्र पढ़ा। पत्र में बच्चन ने लिखा था कि  अपनी भाषा के सम्मान से ही कोई समाज बड़ा होता है।
विश्व हिन्दी सम्मान से विभूषित हुए देशी-विदेशी हिन्दीसेवी : समारोह में श्री अनूप भार्गव अमेरिका, कु. स्नेह ठाकुर कनाडा, डॉ. आई.एन.एस. जर्मनी, डॉ. अकीरा साकाखासी जापान, प्रो. ऊषा देवी शुक्ल दक्षिण अफ्रीका, सुश्री कमला रामलखन त्रिकास्त तुबेको, डॉ. देवंतदास लिथुवानिया, डॉ. नीलम कुमारी फिजी, डॉ. सारजिक अजामिन माताबदल मॉरिशस, गुलशन सुखलाल मॉरिशस, डॉ. इंदिरा गाजियाबादी रूस, इंदिरा कुमार दासनायक श्रीलंका, मोहम्मद इस्माइल सउदी अरब, श्री सुरजन परोही सूरीनाम, श्री कैलाश नाथ यू.के. एवं श्रीमती ऊषा राजे सक्सेना, यू.के. तथा भारत के डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय, डॉ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य, डॉ. एन.चन्द्रशेखरन नायर, डॉ. मधु धवन, सुश्री माधुरी जगदीश छेरा, प्रो. अनंत राम त्रिपाठी, कुमारी अहम कामे, वरमानंदन कामछा, डॉ. नागेश्वरम सुंदरम, प्रो. हरिराम मीणा, डा. व्यासमणि त्रिपाठी, डॉ. सुरेश कुमार गौतम, आदित्य चौधरी, डॉ.के.के अग्रवाल, अन्नू कपूर, अरविंद कुमार, माताप्रसाद एवं आनंद मिश्रा अभय को विश्व हिन्दी सम्मान से विभूषित किया गया।

रविवार, 6 सितंबर 2015

हिन्दी के आयोजनों को चश्मा उतार कर देखे


-मनोज कुमार
      मध्यप्रदेश भारत का ह्दयप्रदेश है और हिन्दी के एक बड़ी पट्टी वाले प्रदेश के रूप में हमारी पहचान है। हिन्दी हमारे प्रदेश की पहचान है और लगातार निर्विकार भाव से हिन्दी में कार्य व्यवहार की गूंज का ही परिणाम है कि चालीस साल बाद हिन्दी के विश्वस्तरीय आयोजन को लेकर जब भारत का चयन किया गया तो इस आयोजन के लिए मध्यप्रदेश को दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी सौंपी गई। गंगा-जमुनी संस्कृति वाले भोपाल में हिन्दी का यह आयोजन न केवल भोपाल के लिए अपितु समूचे हिन्दी समाज के लिए गौरव की बात है। भोपाल में हो रहा यह आयोजन हिन्दी को विश्व मंच पर स्थापित करने में मील का पत्थर साबित होगा, यह हिन्दी समाज का विश्वास है। मध्यप्रदेश, देश का ह्दयप्रदेश होने के नाते बहुभाषी और विविध संस्कृति वाला प्रदेश है। विभिन्न भाषा-बोली के लोग मध्यप्रदेश में निवास करते हैं किन्तु इन सबकी सम्पर्क भाषा हिन्दी है। अहिन्दी प्रदेशों से यहां रोजगार के लिए आने वाले लोग भी हिन्दी सीख कर गौरव का अनुभव करते हैं। यह छोटा सा तथ्य इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन के लिए सर्वथा उपयुक्त निर्णय है।
बहुतेरे ऐसे लोग भी हैं जिनके मन में इस बात की शंका है कि आखिरकार इस आयोजन का परिणाम क्या होगा या इनमें से कुछ इस संदेह से घिरे हुए हैं कि ऐसे आयोजनों का परिणाम शून्य होता है। ऐसे लोगों की शंका और संदेह बेबुनियाद है क्योंकि प्रयास का दूसरा पहुल संभावना होती है। विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया जाना एक प्रयास है और हिन्दी का भविष्य इसकी संभावना है। 1975 में पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन नागपुर में हुआ था। इसके बाद यह चौथा अवसर है जब हिन्दी का विश्व समागम भोपाल में होने जा रहा है। हिन्दी को विश्व मंच पर स्थापित करने की इस कोशिश का परिणाम आप जब दुनिया के नक्शे में देखेंगे तो सहज ही अनुमान हो जाएगा कि ऐसे आयोजन परिणाम शून्य होने के बजाय परिणाममूलक रहे हैं। दुनिया के अधिसंख्य विश्वविद्यालयों में हिन्दी का विशेष रूप से पठन-पाठन हो रहा है। विश्व के 150 से 180 देशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी की उपस्थिति इसका प्रमाण है। अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा स्वयं कहते हैं कि-‘हिन्दी विश्व की भाषा बनने जा रही है और हिन्दी को जानना सबके लिए आवश्यक है।’ क्या यह तथ्य हिन्दी के विश्व आयोजनों को सार्थकता प्रदान नहीं करता है?
वास्तव में भारतीय समाज के लिए हिन्दी मात्र एक भाषा नहीं है। हिन्दी भारतीय समाज की अस्मिता है, उसकी पहचान है। हिन्दी हमारी धडक़न है। हिन्दी अपने जन्म से लेकर हमारे साथ चल रही है, पल रही है और बढ़ रही है। ऐसे में हिन्दी को लेकर जो चिंता व्यक्त की जाती रही है, वह कई बार बेमानी सी लगती है क्योंकि जिस भाषा में भारत के करोड़ों लोगों का जीवन निहित है, जिस भाषा से उनकी पहचान है, उस भाषा को लेकर चिंता महज एक दिखावा है। इस संबंध में भूतपूर्व सांसद एवं सुविख्यात कवि श्री बालकवि बैरागी लिखते हैं कि-‘गैर हिन्दी भाषी लोग जैसी हिन्दी लिख या बोल रहे हैं, उन्हें वैसा करने दो। उनका उपहास मत करो। उन्हें प्रोत्साहित करो। अपने हकलाते तुतलाते बच्चों के प्रति जो ममत्व और वात्सल्य आप में उमड़ता है, उस भाव से उनकी बलाइयां लो। यह भाव हमारे अभियान के आधार में रहे। यह हिन्दी की शास्त्रीयता और शुद्धता का समय नहीं है। वह जैसा रूपाकार ले रही है, लेने दो।’ 
पिछले दो-तीन दशकों की विवेचना करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि हिन्दी घर-घर की भाषा बन गई। विश्व बाजार की नजर भारत के बड़े हिन्दी समाज पर है। मुठ्ठी भर अंग्रेजी के  मोहपाश में बंधे समाज से बाहर निकल कर हिन्दी समाज की भाषा-बोली में आना भारतीय बाजार की विवशता है। देश में प्रकाशनों की बात करें तो अनेक बड़े प्रकाशनों को हिन्दी की धरती पर आना पड़ा है। अंग्रेजी के संस्करणों का उन्होंने त्याग कर दिया है अथवा हिन्दी के साथ-साथ अंगे्रजी के प्रकाशन के लिए मजबूर हैं। इस मजबूरी में खास बात यह है कि कल तक हिन्दी का प्रकाशन अनुदित सामग्री पर निर्भर था किन्तु आज हिन्दी में मौलिक सामग्री का प्रकाशन हो रहा है। यहां तक कि हिन्दी की पठनीय सामग्री को अनुवाद कर अंग्रेजी में प्रकाशित किया जा रहा है। क्या इस तथ्य को भी नजरअंदाज कर दें? शायद ऐसा करना संभव नहीं होगा। 
मध्यप्रदेश की धरा अपने हिन्दी सेवकों से गौरवांवित होती रही है। हिन्दी सेवकों की यह श्रृंखला विशाल है। पराधीन भारत से लेकर वर्तमान समय तक, हर कालखंड में हिन्दी के गुणी सेवकों ने मध्यप्रदेश का गौरव बढ़ाया है। हिन्दी का यह गौरव बहुमुखी है। हिन्दी केवल अध्ययन, अध्यापन तक नहीं है और न ही साहित्य रचनाकर्म तक अपनी सीमारेखा खींच रखी है अपितु संगीत, कला, रंगमंच, सिनेमा और लोकजीवन में भी हिन्दी का विशिष्ट प्रभाव देखने को मिलता है। इस संबंध में सुविख्यात आलोचक डॉ. विजयबहादुर सिंह कहते हैं-‘ हिन्दी भी एक बड़े राष्ट्रीय जीवन की, एक अति प्राचीन देश की, बहुमान्य, बहुजन-संवेदी भाषा है। विश्व कोई एकल भाषा परिवार तो है नहीं। फिर हिन्दी और वृहत्तर अर्थों में हिन्दुस्तानी एक देश और समाज से मुक्ति संघर्ष, आत्माभिमान, परम्परा संवेदी, रूढि़-प्रतिरोधी, स्वातंत्र्यकामी चेतना की भाषा है। वह हमारे यथार्थ जीवन की, जमीन की बोलचाल तो है ही, हमारे सपनों की भी भाषा है।’
इस तरह यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हिन्दी के इस विश्व आयोजन को चश्मा लगाकर देखने के बजाय खुले और बड़े मन से देखे जाने की जरूरत है क्योंकि हिन्दी खुले मन की भाषा है। हिन्दी हमारी अस्मिता है, हमारी पहचान है। आलोचना करने के लिए बेबुनियाद आलोचना करने वालों से श्री बैरागी कहते हैं-‘खीजने, झल्लाने या किसी को कोसने से हम हिन्दी के निश्च्छल चरित्र को कोई नया आयाम नहीं दे पाएंगे। हम खुद पहले हिन्दी के हो जाएं और हिन्दी में हो जाएं। हिन्दी में सोचें और हिन्दी पर अवश्य सोचें। हिन्दी के संदर्भ में यह युग और यह शताब्दी चिंता की नहीं है। यह हमारी चेतना का युग है। आत्म मंथन और पूर्ण समर्पण का युग है। आपके हमारे बच्चे आज जिन खिलौने से खेल रहे हैं उनमें हिन्दी है या नहीं, इस पर नजर रखिए। जिस भ्रम को आप पाल रहे हैं, उसमें कहीं ऐसा तो नहीं है कि आप और हम अंतर्राष्ट्रीय बनने की जुगाड़ में राष्ट्रीय भी नहीं रहें। राष्ट्रीयता हमारी भाषा है और यही हमारा भारत है।’ अस्तु, भोपाल मेंं हो रहे दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन, हिन्दी को विश्व मंच पर स्थापित करने में मील का पत्थर साबित होगा, यह निश्चय है। मोबा. 09300469918

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

शोध पत्रिका "समागम" का नया अंक














शोध पत्रिका "समागम" का नया अंक हिंदी पर केंद्रित है. हिंदी के विविध पक्षों पर सारगर्भित लेखो के साथ शोध आलेख भी है. इस अंक का संपादन हिंदी की सुपरिचित साहित्यकार डॉ उर्मिला शिरीष ने किया है. भोपाल से प्रकाशित इस पत्र्रिका के संपादक मनोज कुमार है. 

बुधवार, 26 अगस्त 2015

लाइवलीहुड कॉलेज अर्थात कौशल उन्नयन

-मनोज कुमार
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से निकल कर धुर नक्सली जिला कांकेर के रास्ते में लाइवलीहुड कॉलेज का नाम लिखा पढ़ा तो एकबारगी समझ में ही नहीं आया कि यह कौन सा कॉलेज है और किस प्रकार की पढ़ाई होती है। कार अपनी र$फ्तार से चल रही थी और मन में जिज्ञासा उससे कहीं अधिक गति से। मैं जल्द से जल्द लाइवलीहुड कॉलेज के बारे में जान लेना चाहता था। तभी कार एक होटल के करीब रूकी। साथ के लोगों का ध्यान खाने-पीने में था तो मैं किसी ऐसे व्यक्ति को तलाश कर रहा था जो मुझे लाइवलीहुड कॉलेज के बारे में बता सके। इतने में देखा कि दो युवक लाइवलीहुड कॉलेज के बारे में बात कर रहे हैं। मेरी जिज्ञासा को शांत करने का इससे बेहतर अवसर नहीं मिल सकता था। मैं उन युवको के करीब गया और उनसे इस कॉलेज के बारे में पूछा तो उन्होंने तपाक से कहा-शायद आप हमारे छत्तीसगढ़ के नहीें हैं? मैंने हां में सिर हिलाया तो उन्होंने बताया कि इस लाइवलीहुड कॉलेज ने युवाओं की जिंदगी में रोमांचक बदलाव लाया है। 8-10वीं पास युवाओं से लेकर एमए,एमकाम युवाओं को इस कॉलेज में उनकी रूचि के अनुरूप विभिन्न ट्रेड में प्रशिक्षण दिया जाता है। अभी तक प्रशिक्षण के अभाव में रोजगार नहीं मिल पाता था लेकिन अब मुश्किल आसान हो गई है। अब हमारे पास रोजगार है और हम स्वयं के उद्यमी भी हैं।
युवकों से चर्चा के बाद यह तो पता चल गया कि लाइवलीहुड कॉलेज, औपचारिक शिक्षा देने वाले कॉलेजों से अलग है किन्तु इसके बारे में जब विस्तार से जानने का मौका मिला तो लगा कि छत्तीसगढ़ ने विकास के रास्ते बनाना खुद सीख लिया है। लाइवलीहुड कॉलेज मुख्यमंत्री कौशल उन्नयन योजना का एक उपक्रम है। राज्य के सभी 27 जिलों में लाइवलीहुड कॉलेज की स्थापना की गई है और इन कॉलेजों में राज्य के युवाओं को नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है। मोटेतौर पर अब तक एक लाख से अधिक युवाओं को विभिन्न कार्यों का प्रशिक्षण दिया गया है। प्रशिक्षण उपरांत कुछेक ने राज्य के उद्योगों में नौकरी प्राप्त कर ली है तो अनेक ऐसे हैं जिन्होंने स्वयं का उद्यम स्थापित कर जीवोकोपार्जन कर रहे हैं। लाइवलीहुड कॉलेज में ट्रेनिंग प्राप्त करने वालों में लडक़े और लड़कियां दोनों हैं। लाइवलीहुड कॉलेज का यह कांसेप्ट वास्तव में रोजगार की दिशा खोलने के लिए अनूठा है। 
जब उद्देश्य बड़ा हो और इरादा मजबूत हो, तो कोई भी लक्ष्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। कांकेर का केशरी इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है। कल तक रेलगाड़ी में सफर करना उसके लिए सपना था, आज वही केसरी दूसरे राज्य में जाकर अपने कौशल के बूते 10-12 हजार रुपये महीना कमा रहा है। केशरी अकेला नहीं है बल्कि 70 युवाओं को अत्याधुनिक मशीनों पर प्लास्टिक टंकी, टेबल, कुर्सी, मोबाईल व अन्य प्लास्टिक से बनने वाले उत्पादों के निर्माण का प्रशिक्षण दिया गया। छह महीने के प्रशिक्षण में वे अपने अपने कामों में इतना दक्ष हो गए कि तुरत-फुरत में हरियाणा की कम्पनी ने अपने पास बुला लिया।
इसी तरह लाइवलीवुड कालेज से प्रषिक्षण प्राप्त कर स्वरोजगार को अपनाने वाले कटघोरा विकासखण्ड के ग्राम डोंगरी का कृष्णादास महंत, विकासखंड करतला के ग्राम तरदा का नोहरलाल पटेल,विकासखंड पोड़ी उपरोड़ा के ग्राम लालपुर का राजू सिंह को भी किसी बड़े उद्योग में काम मिलने का इंतजार है लेकिन अभी भी वे बेरोजगार नहीं है। इलेक्ट्रिक कामों में प्रशिक्षण प्राप्त कर  विद्युत सुधार कार्य से महीने में 5 से 8 हजार रूपये की आमदनी कर रहे हैं। लोमेष कश्यप ने बताया कि प्रशिक्षण के बाद स्वयं का  लाइट डेकारेशन का प्रतिष्ठान स्थापित कर 7 सात हजार रूपये तक कमाई कर लेता है।  भानु प्रताप लाइवलीवुड कालेज में एक माह का प्रशिक्षण लेकर विद्युत उपकरण सुधारने,वायरिंग का कार्य सीखा है। आज खुद हाउस वायरिंग का ठेका लेकर कार्य करता है। इस कार्य से 7 से 8 हजार रूपये कमाई कर लेता है। 
हुनर है तो कदर है की भावना को लाइवलीहुड कालेज में चरितार्थ किया है। हुनरमंद युवा अब प्रशिक्षण प्राप्त कर आत्मनिर्भरता की राह में आगे बढ़ रहे हैं। प्रशिक्षण के अभाव में जहां पहले काम के लिए भटकना पड़ता था। वहीं अब प्रशिक्षित होकर मनचाहा रोजगार प्राप्त करने में कामयाब हो रहे हैं। काम के अभाव में उसे नाउम्मीदी एवं हताशा की परछाईया से पीछे छुड़ाने में सफलता मिल रही है। यह कहना है भिलाई स्थित लाइवलीहुड कालेज में प्रशिक्षण ले रहे कुमारी अनिता मित्रा  ने बताया कि वह बारहवी पास है और वह काम की तलाश में कई प्रतिष्ठानों के पास गई किन्तु उसे अप्रशिक्षित एवं अनुभव के अभाव में काम पर नहीं रखा गया। उन्होंने कौशल उन्नयन अंतर्गत अस्पताल प्रबंधन का कोर्स कर अब कोण्डागांव के प्राइवेट अस्पताल में काम कर रही है। वेतन भी अच्छा मिल रहा है और उस पैसे से वह अपने छोटे भाई की पढ़ाई का खर्च उठाने के साथ ही परिवार की जरूरत का खर्च भी वहन कर ले रही है। लाईवलीहुड कॉलेज जांजगीर में सिलाई-कढ़ाई का नि:शुल्क प्रशिक्षण प्राप्त कर रही 60 महिलाएं भी गणवेश सिलाई का कार्य कर रहीं है। चार माह के प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को नि:शुल्क यूनीफार्म, प्रतिदिन नि:शुल्क स्वल्पाहार प्रदान किया जा रहा है। श्रीमती सरिता महंत ने बताया कि सिलाई प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद वह स्वयं का सिलाई सेंटर खोलेंगी । इसी तरह कु. राधिका सूर्यवंशी ने का कहना है कि अब वो किसी पर आश्रित नही रहेंगी बल्कि स्वयं के साथ ही दूसरे लोगों को भी रोजगार दे सकेंगी। नैला की कुमारी प्रभा ने बताया कि सिलाई सिखाने वाली निजी संस्थाओं की फीस अधिक होनें के कारण उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी। लाईवलीहुड कालेज में नि:शुल्क आवसीय प्रशिक्षण की सुविधा मिलने से उनकी यह इच्छा पूरी हो गई है। 

ये लोग महज एक बानगी हैं लाईवलीहुड कॉलेज की सफलता के। पूरे राज्य में, हर जिले में और अब तहसील और विकासखंड स्तर तक लाईवलीहुड कॉलेज की चर्चा होने लगी है। राज्य सरकार युवाओं को स्वयं में आत्मनिर्भर बनाना चाहती है और केन्द्र सरकार की मंशा के अनुरूप कौशल उन्नयन का यह रास्ता एक नयी सुबह का संकेत करती है। छत्तीसगढ़ राज्य की इस नयी पहल लाईवलीहुड कॉलेज की प्रक्रिया को समझने के लिए दूसरे राज्यों के मंत्री-अधिकारी आए और वे इस कौशल उन्नयन के नए मॉडल को अपने राज्य में भी आरंभ करना चाहते हैं। नक्सली समस्या से जूझते छत्तीसगढ़ के लिए लाईवलीहुड कॉलेज एक आशा की किरण है जो स्वयं में आत्मनिर्भर बनाता है।

बुधवार, 19 अगस्त 2015

नए मिजाज का शहर

मनोज कुमार
यायावरी के अपने मजे होते हैं और मजे के साथ साथ कुछ अनुभव भी. मेरा यकीन यायावरी पत्रकारिता में रहा है. यायावरी का अर्थ गांव गांव, देश देश घूूमना मात्र नहीं है बल्कि यायावरी अपने शहर में भी की जा सकती है. मेरा अपना भोपाल शहर. ठंडे मिजाज का शहर, हमदर्द शहर. एक मस्ती और रवानगी जिस शहर के तासीर में हो, उस शहर में जीने का मजा ही कुछ और होता है. बड़े तालाब में हिल्लोरे मारती लहरें किसी को दीवाना बनाने के लिए काफी है तो संगीत की सुर-लहरियों में खो जाने के लिए इसी तालाब के थोड़े करीब से बसा कला गृह भारत भवन रोज ब रोज आपको बुलाता है. सुस्त शहर की फब्तियां भी इस शहर पर लोग दागते रहे हैं. जिन्हें पटियों पर बैठकर शतरंज खेलने का सउर ना हो, वह क्या जाने इस सुस्ती की मस्ती. यह वही पटिया है जहां भोपाल की गलियों से लेकर अमेरिका तक की चरचा भोपाली कर डालते हैं. पटिये की राजनीति ने किन किन को बुलंदियों तक पहुंचा दिया, इसकी खबर तो इतिहास ही रखता है. मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इससे किसी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है, परंतु चिंता सब रखते हैं कि इस बार मुख्यमंत्री की गद्दी पर कौन बैठेगा. मुख्यमंत्री की दौड़ में आगे-पीछे होते नेताओं को भी खबर नहीं होती है लेकिन पटियेबाजों को उनका पूरा इतिहास मालूम होता है. ऐसा है मेरा भोपाल.
मेरे भोपाल की बुनावट और बसाहट नवाबों ने की थी. वक्त के साथ नवाब फना हो गए. नवाब भले ही ना रहे लेकिन नवाबी तासीर भोपाल को दे गए. मेरा शहर भोपाल कभी जल्दबाजी में नहीं रहता है. सुकून की जिंदगी जीता है और भाईचारे के साथ यहां के लोग बसर करते हैं. गंगा-जमुनी संस्कृति इस शहर की तहजीब और पहचान है. पर ये क्या..मेरे भोपाल को किसी की नजर लग गयी है..वह भी महानगर बनने को बेताब नजर आने लगा है..भोपाल की तासीर बदलने लगी है..सुकून का मेरा भोपाल अब हड़बड़ी में रहता है..कभी घंटों की फिकर ना करने वाले भोपाली अब सेकंड का हिसाब रखने लगे हैं. खीर, सेंवई, घेवर और मीठे समोसे के साथ पोहे-जलेबी का स्वाद अब मुंह से उतरने लगा है. पिज्जा और बर्गर का चस्का भोपाल को लग गया है..मोटरसायकलों पर बैठे युवा को सेकंड में पिज्जा-बर्गर पहुंचाना है. यह जल्दबाजी महानगर की तासीर है. मेरा शहर भोपाल भी इस तरफ चल पड़ा है. को खां..कहने वाले भी अब गुमनाम हो रहे हैं..हाय, हलो के चलन ने भोपालियों को मेट्रो सिटी का सिटीजन बना दिया है, लगभग रेंगते हुए भटसुअर सडक़ से बाहर हो गए हैं..तेज रफ्तार से दौड़ती महंगी बसों ने इन खाली हुए सडक़ों पर कब्जा जमा लिया है. हवाओं से बात करते ये मोटरों ने भोपाल की सुस्ती को हवा कर दिया है.
पच्चीस-तीस बरस पहले जब मैं भोपाल आया था. तब यह शहर दो हिस्सों में बंटा था. पुराना भोपाल और नया भोपाल. बैरागढ़ की पहचान भोपाल के उपनगर के तौर पर था तो सही, लेकिन उसे भी पुराने भोपाल का हिस्सा मान लिया जाता था. नए भोपाल के पास नम्बरों के मोहल्ले थे. मसलन, दो नम्बर स्टाप से शुरू होते हुए पांच, छह, साढ़े छह, सात, दस, ग्यारह और बारह नम्बर तक था. अब भोपाल पसर रहा है. एक समय था भोपाल के एक छोर से दूसरे छोर जाने में ज्यादा से ज्यादा घंटे का वक्त लगता था, अब भोपाल के एक छोर से दूसरे छोर पहुंचने के लिए आपको लगभग आधा दिन का वक्त लग जाएगा. जयप्रकाश अस्पताल से बागमुगालिया जाना चाहें तो कम से कम दो घंटे का वक्त लगेगा. कई बार बढ़ती भीड़ के कारण यह समय और भी अधिक हो सकता है. ऐसा ही दूसरे और फैल गए इलाकों के लिए भी है. 
मेट्रो सिटी की इस नयी सूरत ने मेरे भोपाल के मायने ही बदल दिए हैं. कभी अपने जर्दा, पर्दा और मर्दा के लिए मशहूर भोपाल की जरदोजी दुनिया में ख्यात थी लेकिन एंडरसन ने ऐसे घाव दिए कि अब भोपाल गैस त्रासदी के लिए अपनी साख रखता है. तीस बरस पहले रिसी गैस से जो घाव मिले, वह आज भी रिस रहे हैं और जाने आगे कब तक रिसता रहेगा, कोई कह नहीं सकता. दुनिया भर से लोग मरहम लगाने के नाम पर आते हैं और जख्म कुरेद कर चले जाते हैं. यह हकीकत है, इससे आप इंकार नहीं कर सकते. इंकार तो इस बात से भी आप नहीं कर सकते कि इस गैस ने जिनके घर उजाड़े, वे तो दुबारा बस नहीं पाये लेकिन इस उजड़े हुए घरों की मिट्टी ने कई नए इमारतों की बुनियाद डाल दी. इस सच से उस दौर के आफिसर इत्तेफाक रखते हैं और बड़े मजे में फरमाते हैं-चलो, कुछ बातें करते हैं बनारस की. भूल जाइए उस गैस त्रासदी को. इस बयान से भी मेरा शहर तपता नहीं है. उसे खबर है कि जख्म देने वाले वही हैं तो उनसे दवा की क्या उम्मीद करें. 
मेरा भोपाल महानगर बन रहा है तो उसकी तासीर भी महानगर की होनी चाहिए. कभी पर्दानशी शहर कहलाने वाले मेरे भोपाल में अब पर्दा के लिए कोई जगह नहीं बची है, ऐसा लगने लगा है. खासतौर पर नए शहर के युवाओं का मिजाज तो यही बयान करता है. झील के आसपास कहीं एक-दूसरे के आगोश में गिरफ्त युवक-युवतियां तो कहीं मर्यादा को तार तार करते होठों का सरेराह रसपान करते युवा. जिस्मानी भूख अब कमरे से बाहर निकल कर सडक़ों पर दिख रही है. कुछ कहना बेकार और बेमतलब होगा क्योंकि ये नए मिजाज का शहर है. इस जवानी को और ताप देने के लिए कुछ और करने की जरूरत होती है. नशा न हो तो नशेमन की बात भी अधूरी रह जाती है. मेरे भोपाल में शराब का चलन नया नहीं है लेकिन इन दिनों नई रीत चल पड़ी है..हैरान हूं इस बात से कि देखते ही देखते शराबों की दुकानों की तादाद एकदम से बढ़ गई. हैरानी तो इस बात की है कि जिन्हें बेचने के लिए मुकम्मल ठिकाना नहीं मिला तो टेंट लगाकर अपना ठिकाना तय कर लिया..किसी ने चार पहिया गाड़ी को ही इसका पता बता दिया..जिस्म की नुमाईश और शराब के नए-नए ठिकाने.. और क्या चाहिए एक मेट्रोसिटी को..
अदब के मेरे शहर भोपाल में अभी रौनक बाकी है..झीलों का जिक्र होता है तो मेरे भोपाल का नाम छूटता नहीं और हरियाली की बात आती है तो मेरा भोपाल किसी से कमतर नहीं..विकास के इस दौड़ में भी मेरे भोपाल की हरियाली ने भी दम तोड़ा है लेकिन मरा नहीं है..लोगों में अपने शहर को लेकर जज्बा कायम है. बड़ी झील की सफाई का मसला सामने आया तो क्या अमीर और क्या गरीब..सब जुट गए थे श्रमदान के लिए.. देखते ही देखते बड़ी झील की तस्वीर बदल डाली..गाद ने झील को सिमटने के लिए मजबूर किया था तो भोपालियों के जज्बे ने गाद को बाहर का रास्ता दिखा दिया..लहरों से खेलना हो तो भोपाल की बड़ी झील में जरूर आएं..हर गम..हर दर्द..यकीनन आप भूल जाएंगे..मीठी यादें साथ लेकर जाएंगे..मेरा भोपाल बदल रहा है..लेकिन उम्मीद बदली नहीं है..आज भी बदलाव के इस दौर में भोपाली बटुआ से खूबसूरत कोई तोहफा नहीं होता है..इस खूबसूरत शहर को भले ही हम नए मिजाज के शहर के तौर पर देखने की कोशिश करें लेकिन देखना होगा आपको उसी झीरी से जहां कभी भोपाल था और हमेशा रहेगा..

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...